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वह कला ही क्या जो आमजन के लिए न हो : डॉ. लाल रत्नाकर

फारवर्ड प्रेस में महिषासुर, मक्खलि गोशाल, कौत्स, अजित केशकंबलि सहित अन्य कई बहुजन नायकों के चित्र बनाकर उन्हें जनसंस्कृति का हिस्सा बना देने वाले डॉ. लाल रत्नाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध कलाकार हैं. अपने चित्रों में उन्होंने भारत के ग्रामीण जीवन को हमारे सामने रखा है. पिछले दिनों उनके आवास पर लंबी चर्चा हुई. देश की राजनीति से लेकर सामाजिकसांस्कृतिक मुद्दों पर वे बड़ी बेबाकी से बोले. यह आलेख उसी बातचीत का शब्दांतरण है.

अपने चित्रों के माध्यम से उत्तर भारत के गांव, गली, घरपरिवेश, हलबैल, खेतपगडंडी, पशुपक्षी, तालाबपोखर, यहां तक कि दरवाजों और चौखटों को जीवंत कर देने वाले डॉ. लाल रत्नाकर के बारे में मेरा अनुमान था कि उनका बचपन बहुत समृद्ध रहा होगा. समृद्ध इस लिहाज से कि वे सब स्मृतियां जिन्हें हम सामान्य कहकर भुला देते हैं या देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं, उनके मनमस्तिष्क में मोतीमाणिक की तरह टकी होंगी. सो मैंने सबसे पहले उनसे अपने बारे में बताने का आग्रह किया. मेरा अनुमान सही निकला. उन्होंने बोलना आरंभ किया तो लगा, उनके साथसाथ मैं भी स्मृतियात्रा पर हूं. वे बड़ी सहजता से बताते चले गए. बिना किसी बनावट और बगैर किसी रुकावट के. जितने समय तक हम दोनों साथ रहे, मैं उनकी जीवनयात्रा के प्रवाह में डूबताउतराता रहा.

संपन्न परिवार में जन्मे डॉ. रत्नाकर के पिता डॉक्टर थे, चाचा लेक्चरर. गांव और ननिहाल दोनों जगह अच्छीखासी जमींदारी थी. जिन दिनों उन्होंने होश संभाला डॉ. आंबेडकर द्वारा देश के करोड़ों लोगों की आंखों में रोपा गया समताआधारित समाज का सपना परवान चढ़ने लगा था. किंतु आजादी के वर्षों बाद भी देश के महत्त्वपूर्ण पदों एवं संसाधनों पर अल्पसंख्यक अभिजन का अधिकार देख निराशा बढ़ी थी. स्वाधीनता संग्राम में आमजन जिस उम्मीद के साथ बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की और कुर्बानियां दी थीं, वे फीकी पड़ने लगी थीं. दलित और पिछड़े मानने लगे थे कि केवल संवैधानिक संस्थाओं से उनका भला होने वाला नहीं है. इसलिए वे खुद को अगली लड़ाई के लिए संगठित करने में लगे थे. पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार सामाजिकराजनीतिक चेतना के उभार का केंद्र बने थे. जाति जो अभी तक उनके शोषण का कारण थी, वह संगठन की मुख्य प्रेरणा बनी थी. आजकल जैसे संघ और भाजपा के नेता अस्मितावादी आंदोलनों को जातिवादी कहकर उपेक्षितअपमानित करने की कोशिश करते हैं, तब यह काम कांग्रेस किया करती थी. ग्रामीण जीवन में जाति और समाज परस्पर पर्याय थे. अतएव जातिआधारित संगठनों के पीछे मुख्य विचार यही था कि संगठन की शक्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी कारगर सिद्ध होगी. लोग सामूहिक हितों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना सीखेंगे. जैसेजैसे लोकतांत्रिक चेतना का असर बढ़ेगा, जाति स्वतः अप्रासंगिक होती जाएगी. इस संकल्पना के मद्देनजर बिहार में त्रिवेणी संघ की नींव 1933 में ही पड़ चुकी थी. लेकिन पिछड़े वर्गों में राजनीतिक चेतना के अभाव तथा दुराग्रहों के कारण वह प्रयोग अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था. जो कांग्रेस त्रिवेणी संघ के नेताओं को जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त बता रही थी, उसी ने 1935 में ‘बैकवार्ड कास्ट फेडरेशन’ की स्थापना कर खुद को पिछड़ी जातियों का एकमात्र हितैषी दर्शाने की कोशिश की थी. उन दिनों नेतृत्व की बागडोर राममनोहर लोहिया के हाथों में थी. जो न केवल प्रखर वक्ता थे, बल्कि विचारों को लेकर भी पूरी तरह स्पष्ट थे. लोकतंत्र में यदि सभी के वोट का मूल्य बराबर है तो सत्ताप्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में मिलना चाहिए, इसे लक्ष्य मानकर गढ़ा गया उनका नारा, ‘पिछड़ा पावें सौ में साठ’ पिछड़ों के संगठन की प्रेरणा बना था. यही परिवेश किशोर लाल रत्नाकर के मानसनिर्माण का था. तो भी बड़े लोगों की बड़ीबड़ी बातें उन दिनों तक उनकी समझ से बाहर थीं. बस यह महसूस होता था कि कुछ महत्त्वपूर्ण घट रहा है. परिवर्तन यज्ञ में भागीदारी का अस्पष्टसा संकल्प भी मन में उभरने लगा था.

पढ़ाई की शुरुआत गांव की पाठशाला से हुई. हाईस्कूल शंभुगंज से विज्ञान विषयों के साथ पास किया. उन दिनों कला के क्षेत्र में वही विद्यार्थी जाते थे जो पढ़ाई में पिछड़े हुए हों. परंतु रत्नाकर का मन तो कला में डूबा हुआ था. हाथ में खड़िया, गेरू, कोयला कुछ भी पड़ जाए, फिर सामने दीवार हो या जमीन, उसे कैनवास बनते देर नही लगती थी. लोगों के घर कच्चे थे. गरीबी भी थी, लेकिन मन से वे सब समृद्ध थे. तीजत्योहार, मेलेउत्सवों में आंतरिक खुशी फूटफूट पड़ती. सामूहिक जीवन में अभाव भी उत्सव बन जाते. रत्नाकर का कलाकार मन उनमें अंतर्निहित सौंदर्य को पहचानने लगा था. गांव का कुआं, हलबैल, पत्थर के कोल्हू की दीवारें, असवारी, कुम्हार द्वारा बर्तनों पर की गई नक्काशी, सुघड़ औरतों द्वारा निर्मित बंदनवार, रंगोलियां और भित्ति चित्र उन्हें आकर्षित ही नहीं, सृजन के लिए लालायित भी करते थे. गांव की लिपीपुती दीवारों पर गेरू या कोयले के टुकड़े से अपनी कल्पना को उकेरकर उन्हें जो आनंद मिलता, उसके आगे कैनवास पर काम करने का सुख कहीं फीका था. जाहिर है, अभिव्यक्ति अपना माध्यम चुन रही थी. उस समय तक भविष्य की रूपरेखा तय नहीं थी. न ही होश था कि आड़ीतिरछी रेखाएं खींचकर, चित्र बनाकर भी सम्मानजनक जीवन जिया जा सकता है. गांवदेहात में चित्रकारी का काम मुख्यतः स्त्रियों के जिम्मे था. उनके लिए वह कला कम, परंपरा और संस्कृति का मसला अधिक था. उनसे कुछ आमदनी भी हो सकती है, ऐसा विचार दूर तक नहीं था.

मातापिता चाहते थे कि वे विज्ञान के क्षेत्र में नाम कमाए. उनकी इच्छा का मान रखने के लिए इंटर की पढ़ाई के लिए बारहतेरह किलोमीटर दूर जौनपुर जाना पड़ा. कुछ दिन साइकिल द्वारा स्कूल आनाजाना चलता रहा. मगर रोजरोज की यात्रा बहुत थकाऊ और बोरियतभरी थी. सो कुछ ही दिनों बाद विज्ञान का मोह छोड़ उन्होंने वापस शंभुगंज में दाखिला ले लिया. वहां उन्होंने कला विषय को चुना. घर पर जो वातावरण उन्हें मिला वह रोज नए सपने देखने का था. कला विषय में खुद को अभिव्यक्त करने की अंतहीन संभावनाएं थीं. धीरेधीरे लगने लगा कि यही वह विषय है कि जिसमें अपने और अपनों के सपनों की फसल उगाई जा सकती है. इंटर के बाद उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से बीए, फिर कानपुर विश्वविद्यालय से एमए तक की पढ़ाई की. तब तक विषय की गहराई का अंदाजा हो चुका था. मन में एक साध बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ने की भी थी. सो आगे शोध के क्षेत्र में काम करने के लिए वे कला संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. आनंदकृष्ण से मिले. उन्होंने मदद का आश्वासन दिया. लेकिन विषय क्या हो, इस सोच में कई दिन बीत गए.

उधर रत्नाकर को एकएक दिन खटक रहा था. इसी उधेड़बुन में वे एक दिन डॉ. आनंदकृष्ण के घर जा धमके. उस समय तक डॉ. रायकृष्ण दास जीवित थे. वे लोककलाओं की उपेक्षा से बहुत आहत रहते थे. बातचीत के दौरान उन्होंने ही प्रोफेसर आनंदकृष्ण को लोककला के क्षेत्र में शोध कराने का सुझाव दिया. प्रोफेसर आनंदकृष्ण ने उनसे आसपास बिखरी लोककलाओं को लेकर कुछ सामग्री तैयार करने को कहा. इस दृष्टि से वह लोक खूब समृद्ध था. रत्नाकर ने यहांवहां बिखरे कलातत्वों के चित्र बनाने आरंभ कर दिए. चौखटों, दीवारों पर होने वाली नक्काशी, रंगोली, पनघट, तालाब, कोल्हू, मिट्टी के बर्तन, असवारी वगैरह. उस समय तक लोककला के नाम लोग केवल ‘मधुबनी’ को जानते थे. पूर्वी उत्तरप्रदेश के गांव भी लोक कला का खजाना हैं, इसका अंदाजा किसी को न था. अगली बार वे आनंदकृष्ण जी से मिले तो उन्हें दिखाने के लिए भरपूर सामग्री थी. प्रोफेसर आनंदकृष्ण उनके चित्रों को देख अचंभित रह गए, ‘अरे वाह! इतना कुछ. यह तो खजाना है….खजाना, अद्भुत! लेकिन तुम्हें अभी और आगे जाना है. मैं तुम्हारा प्रस्ताव आने वाली बैठक में पेश करूंगा.’ उस मुलाकात के बाद रत्नाकर को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. विश्वविद्यालय ने ‘पूर्वी उत्तरप्रदेश की लोककलाएं’ विषय पर शोध के लिए मुहर लगा दी. शोध क्षेत्र नया था. संदर्भ ग्रंथों का भी अभाव था. फिर भी वे खुश थे. अब वे भी इस समाज को एक कलाकार और अन्वेषक की दृष्टि से देख सकेंगे. बुद्धिजीवी जिस सांस्कृतिक चेतना की बात करते हैं, उसके एक रूप को पहचानने में उनका भी योगदान होगा. अथक परिश्रम, मौलिक सोच और लग्न से अंततः शोधकार्य पूरा हुआ. डिग्री के साथ नौकरी भी उन्हें मिल गई. अब दिनोंदिन समृद्ध होता विशाल कार्यक्षेत्र उनके समक्ष था.

डॉ. लाल रत्नाकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के चितेरे हैं. उनका अनुभव संसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में समृद्ध हुआ है. इसका प्रभाव उनके चित्रों पर साफ दिखाई पड़ता है. उनके चित्रों में खेत, खलिहान, पशुपक्षी, हलबैल, पेड़, सरिता, तालाब अपनी संपूर्ण सौंदर्य चेतना के साथ उपस्थित हैं. स्त्री और उसकी अस्मिता को लेकर अन्य चित्रकारों ने भी काम किया है, लेकिन ग्रामीण स्त्री को जिस समग्रता के साथ डॉ. लाल रत्नाकर ने अपने चित्रों में उकेरा है, भारतीय कलाजगत में उसके बहुत विरल उदाहरण हैं. उनके अनुभव संसार के बारे में जानना चाहो तो उन्हें कुछ छिपाना नहीं पड़ता. झट से बताने लगते हैं, ‘मेरी कला का उत्स मेरा अपना अनुभव संसार है.’ फिर जीवन और कला के अटूट संबंध को व्यक्त करते हुए कह उठते हैं, ‘जीवनानुभवों को कला में ढाल देना आसान नहीं होता, परंतु जीवन और कला के बीच निरंतर आवाजाही से कुछ खुरदरापन स्वतः मिटता चला जाता है. जीवन से साक्षात्कार कराने की खातिर कला समन्वयसेतु का काम करने लगती है.’

वान गॉग का कहना था कि महान कृतियां छोटीछोटी वस्तुओं को साथ लाने से बनती हैं. गॉग ने अनियोजित मशीनीकरण की त्रासदी को अपनी आंखों से देखा था. उनीसवीं शताब्दी के उस महान चित्रकार ने ‘आत्म’ की खोज हेतु पहले पादरी का चोला पहना. चर्च का माहौल उस विद्रोही चित्रकार को जमा नहीं तो पैटिंग पर उतर आया. कला उसके लिए धर्म का विकल्प थी. जीवन में साढ़े आठ सौ चित्र बनाने वाला वह चित्रकार आजीवन गरीबी से जूझता रहा. लेकिन कभी किसी ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाया नहीं, न ही कोई धार्मिक चित्र बनाया. उसके चित्रों में खान मजदूर, जूते, प्याज जैसे अतिसाधारण पात्र और वस्तुएं हैं. डॉ. रत्नाकर भी अपने चित्रों के जरिये ‘आत्म’ की खोज के लिए प्रयत्नरत रहते हैं और इसके लिए उन छोटी से छोटी चीजों को चित्रों में स्थान देते हैं, जिनके बारे में हम जैसे साधारण लोग मानते हैं कि वहां कला हो ही नहीं सकती. उनके चित्र आजादी के बाद से हमारे संघर्षशील देहात में उभरती आत्मचेतना का दर्पण हैं. उनमें किसान, मजदूर, घास छीलती, गायभैंस दुहती, चक्कीचूल्हा चलाती वे स्त्रियां हैं, जिनके सपने धर्म, परंपरा और संस्कृति की बलि चढ़ जाते हैं. अपने कई चित्रों में उन्होंने कृष्ण को विविध रूपों में पेश किया है. लेकिन उनके कृष्ण देवता न होकर श्रमसंस्कृति से उभरे लोकनायक हैं. वे गाय चरा सकते हैं, दूध दुह सकते हैं और अपनों को संकट से बचाने के लिए ‘गोवर्धन’ जैसी विकट जिम्मेदारी भी उठा सकते हैं.

कला को लोग कल्पना से जोड़ते हैं. कहा जाता है कि हर कलाकार की अपनी दुनिया होती है, जिसमें वह अपने पात्रों के साथ जीता है. वे पात्र मूर्त्त भी हो सकते हैं, अमूर्त्त भी. कलाकार के निजी संसार में दूसरों का दखल संभव नहीं होता. इसलिए चलताऊ भाषा में उसे किसी और दुनिया का जीव मान लिया जाता है. उस समय हम भूल जाते हैं कि कलाकार होने की पहली शर्त उसकी संवेदनशीलता है. कल्पना आसमान से उतर सकती है. वह किसी और दुनिया या समाज के बारे में भी हो सकती है. संवेदनाओं के लिए अपने परिवेश से अंतरंगता जरूरी है. प्रत्येक कलाकार पहले अपने परिवेश से अंतरंग होता है. उसमें अंतर्निहित सौंदर्य को आत्मसात् करता है. इसके साथसाथ उसमें जो असंतोष और अधूरापन है, उसे भी गहराई के साथ अनुभूत करता है. फिर अपनी सृजनात्मकता तथा परिवेश में व्याप्त सौंदर्य, असंतोष, अधूरापन और सुखदुख की घनीभूत स्मृतियों के बल पर वह अपने लिए समानांतर लोक की रचना कर लेता है. वह कलाकार की अपनी दुनिया होती है. उसके लिए काल्पनिक और यथार्थ की दुनिया में अधिक अंतर नहीं होता. उसका ‘आत्म’ दोनों के बीच विचरण करता रहता है. इस यात्रा एवं तज्जनित उद्वेगों से प्रेरित हो वह जो रचता है, वह काल्पनिक होकर भी यथार्थ के करीब होता है. गॉग के शब्दों में यह चित्र का सपना देखने, फिर सपने को कैनवास पर उतारने की कला है.

डॉ. रत्नाकर के कृतित्व को लेकर बात हो और स्त्री पर चर्चा रह जाए तो बात अधूरी मानी जाएगी. उनके चित्रों में ‘आधी आबादी’ आधे से अधिक स्पेस घेरती है. इसकी प्रेरणा उन्हें अपने घर, गांव से ही मिली थी. दादा के दिवंगत हो जाने के बाद खेती संभालने की जिम्मेदारी दादी के कंधों पर थी. जिसे वह कर्मठ वृद्धा बिना किसी दैन्य के, कुशलतापूर्वक संभालती थीं. इसलिए उनके चित्रों को हम ग्रामीण स्त्री के सपनों और स्वेदबिंदुओं के प्रति एक कलाकार की विनम्र श्रद्धांजलि के रूप में भी देख सकते हैं. आप उनके चित्रों में काम करतीं, मंत्रणा करतीं, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करतीं, नितनए सपने बुनती स्त्रियों से साक्षात कर सकते हैं. ग्रामीण स्त्री के जितने विविध रूप और जीवनसंघर्ष हैं, सब उनके चित्रों में समाए हुए हैं. लेकिन उनकी स्त्री अबला नहीं है. बल्कि कर्मठ, दृढ़निश्चयी, गठीले बदन वाली, सहज एवं प्राकृतिक रूपसौंदर्य की स्वामिनी है. वह खेतिहर है, अवश्यकता पड़ने पर मजदूरी भी कर लेती है. उसका जीवन रागानुराग से भरपूर है. उसमें उत्साह है और स्वाभिमान भी, जिसे उसने अपने परिश्रम से अर्जित किया है. कमेरी होने के साथसाथ उसकी अपनी संवेदनाएं हैं. मन में गुनगुनाहट है. गीतसंगीत, नृत्य और लय है. वे ग्रामीण स्त्री के सहजसुलभ व्यवहार को निरा देहाती मानकर उपेक्षित नहीं करते. बल्कि ठेठ देहातीपन के भीतर जो सुंदरसलोना मनस् है, अपनों के प्रति समर्पण की उत्कंठा है—उसे चित्रों के जरिये सामने ले आते हैं. यह हुनर विरलों के पास होता है. इस क्षेत्र में डॉ. रत्नाकर की प्रवीणता असंद्धिग्ध है.

आधुनिक कला में देह को अकसर बाजार से जोड़कर देखा जाता है. यहां डॉ. रत्नाकर के चित्र एकदम अलग हैं. बाजार गांवदेहात में भी होते हैं. लेकिन वे लोगों की जरूरत की चीजें उपलब्ध कराने के जरूरी ठिकाने कहलाते हैं. अपने मुनाफे के लिए वे जरूरतें बनाते नहीं हैं. इस तरह कुछेक अपवादों को छोड़कर गांवों में बाजारवाद की भावना से दूर बाजार होता है, ऐसे ही डॉ. रत्नाकर के स्त्रीसंबंधी चित्रों में स्त्रीदेह तो है, मगर किसी भी प्रकार के देहवाद से परे है. राजा रविवर्मा ने भी गठीले और भरे देह वाली स्त्रियों के चरित्र बनाए हैं. लेकिन उनमें से अधिकांश चित्र या तो अभिजन स्त्रियों के हैं या फिर उन देवियां के, जिनका श्रम से कोई वास्ता नहीं रहता. वे उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो परजीवी है, दूसरों के श्रमकौशल पर जीवन जीता है. कुल मिलाकर रविवर्मा के चित्रों में वे स्त्रियां हैं, जिन्हें बाजार ने बनाया है. चाहे वह बाजार उपभोक्ता वस्तुओं का हो अथवा धर्म का. डॉ. रत्नाकर की स्त्रियां बाजारवाद की छाया से बहुत दूर हैं. उनके लिए देह जीवनसमर में जूझने का माध्यम है. इसलिए वहां दुर्बल छरहरी काया में भी अंतर्निहित सौंदर्य है. इस बारे में उनका कहना है, ‘मेरे चित्रों के पात्र अपनी देह का अर्थ ही नही समझते. उनके पास देह तो है, परंतु देह और देहवाद का अंतर वे समझ नहीं पाते.’ हम जानते हैं, देह और देहवाद के बीच वही मूलभूत अंतर है जो असली और नकली के बीच होता है. बकौल डॉ. रत्नाकर, ‘बाजारीकरण देह में लोच, लावण्य और आलंकारिकता तो पैदा करता है, मगर उससे स्त्री की अपनी आत्मा गायब हो जाती है. वह निरी देह बनकर रह जाती है. मैंने अन्य चित्रकारों द्वारा चित्रित आदिवासी भी देखे हैं. उनके चित्रों के आदिवासी मुझे किसी स्वर्गलोक के बाशिंदे नजर आते हैं. ऐसे लोग जो हर घड़ी बिना किसी फिक्र के आनंदोत्सव में मग्न रहते हैं. उसके अलावा मानो कोई काम उन्हें आता नहीं है.’ वे आगे बताते हैं, ‘मुझे यह कहने में जरा भी अफसोस नहीं है कि मेरे बनाए गए चित्रों के पात्र सुकोमल स्त्री तथा बलिष्ठ पुरुष का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन स्त्रीपुरुषों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने अपना रूपसौंदर्य खेतखलिहानों के धूपताप में निखारा है. मुझे उस यथार्थ के सृजन में सुकून प्राप्त होता है, जो चिंतित अथवा बोझिल है. उन स्त्रियों की वेदना उकेरने में भी मुझे शांति की अनुभूति होती है, जिनके पुरुष अपना सारा बल और तेज, रोग, व्याधि, कर्ज, जमींदारों के अत्याचार और समय के हवाले कर चुके हैं.’ उनके द्वारा गढ़ गए स्त्रीचरित्रों में प्राकृतिक रूपवैभव है, इसके बावजूद वे किसी भी प्रकार के नायकवाद से मुक्त हैं. वे न तो लक्ष्मीबाई जैसी ‘मर्दानी’ हैं, न ‘राधा’ सरीखी प्रेमिका, न ही इंदिरा गांधी जैसी कुशल राजनीतिज्ञ. वे खेतोंखलिहानों में पुरुषों के साथ हाथ बंटाने वाली, आवश्यकता पड़ने पर स्वयं सारी जिम्मेदारी ओढ़ लेने वाली कमेरियां हैं. जो अपने क्षेत्र में बड़े से बड़े नायक को टककर दे सकती हैं.’ और जब डॉ. रत्नाकर यह कहते हैं तो वे किसी एक शहर या प्रदेश के कलाकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कलाधर्मी होने का गौरव प्राप्त कर लेते हैं.

अपने चित्रों के लिए वे जिन रंगों का चुनाव करते हैं, वह आकस्मिक नहीं होता. बल्कि उसके पीछे पूरी सामाजिकता और जीवन रहस्य छिपे होते हैं. उनके स्त्रीचरित्र रंगों के चयन को लेकर बहुत सजग और संवेदनशील होते हैं. वे उन्हीं रंगों का चयन करते हैं, जो उनके जीवनउत्सव के लिए स्फूर्त्तिदायक हों. उनके अनुसार लाल, पीला, नीला और थोड़ा आगे बढ़ीं तो हरा, बैंगनी, नारंगी जैसे आधारभूत रंग ग्रामीण स्त्री की चेतना का वास्तविक हिस्सा होते हैं. उत्सव और विभिन्न पर्वों, मेलेत्योहारों पर ग्रामीण स्त्री इन रंगों से दूर रह ही नहीं पाती. प्रतिकूल हालात में इन रंगों के अतिरिक्त ग्रामीण स्त्री के जीवन में, ‘जो रंग दिखाई देते हैं, वह सीधेसीधे कुछ अलग ही संदेश संप्रेषित करते हैं. उन रंगों में प्रमुख हैं—काला और सफेद, जिनके अपने अलग ही पारंपरिक संदर्भ हैं.’

हम जानते हैं कि विज्ञान की दृष्टि में ‘काला’ और ‘सफेद’ आधारभूत रंग न होकर स्थितियां हैं. पहले में सारे रंग एकाएक गायब हो जाते हैं; और दूसरी में इतने गड्मड्ड कि अपनी पहचान ही खो बैठते हैं. भारतीय स्त्री, खासतौर पर हिंदू स्त्री जीवन के साथ जुड़कर ये रंग किसी न किसी त्रासदी की ओर इशारा करते हैं. बहरहाल, रंगों के साथ स्त्री का सहज जुडाव उसे प्रकृति और सत्य के समीप रखता है. डॉ. रत्नाकर अपनी प्रेरणाओं के लिए लोक पर निर्भर हैं. यह सवाल करने पर कि क्या उन्हें लगता है कि वे अपने चित्रों के माध्यम से लोक को संस्कारित कर रहे हैं, वे नकारने लगते हैं. उनकी दृष्टि का लोक स्वयंसमृद्ध सत्ता है, ‘अपने आप में वह इतना समृद्ध है कि उसे संस्कारित करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’ किसी भी बड़े कलाकार में ऐसी विनम्रता केवल उसके चरित्र का अनिवार्य गुण नहीं होती, बल्कि लोक को पहचानने की जिद में आत्म को बिसार देने के लिए भी यह अनिवार्य शर्त है.

एक बहुत पुरानी बहस है कि ‘जीवन कला के है या कला जीवन के लिए.’ इसका समर्थन और विरोध करने वालों के अपनेअपने तर्क हैं जो विशिष्ट परिस्थिति के अनुसार अदलतेबदलते रहते हैं. यह हमारे समय की विडंबना है कि गरीब और साधारणजन के नाम पर रची गई कला, उसके किसी काम की नहीं होती. ऐसा नहीं है कि उन्हें इसकी समझ नहीं होती. दरअसल कलाकार की परिस्थितियां और उसका विशिष्टताबोध किसी भी रचना को जिस खास ऊंचाई तक ले जाते हैं, उसका मूल्य चुकाना जनसाधारण की क्षमता से बाहर होता है. यह त्रासदी कमोबेश हर कला के साथ जुड़ी है. संभ्रांत होने की कोशिश में कला अपने वर्ग की पहुंच से बाहर हो जाती है. डॉ. रत्नाकर कला का उद्देश्य जीवन और समाज को सौंदर्यवान बनाने में मानते हैं, ‘जीवन के सारे उपक्रम अंततः इस दुनिया को सुंदर बनाने के उपक्रम हैं. कला के विविध माध्यम कहीं न कहीं हमारे कार्यव्यापार को व्यापक और सरल बनाते हैं. इसकी जरूरत इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है, हां आपूर्ति जबजब कटघरे में खड़ी होगी, तबतब इस तरह के सवाल जरूर उठाए जाते रहेंगे. आखिर वह कला ही क्या जो आमजन के लिए न हो.’

पिछले कुछ वर्षों में डॉ. रत्नाकर की कला के सरोकार और भी व्यापक हुए हैं. वे संभवतः अकेले ऐसे चित्रकार हैं जो सामाजिक न्याय की साहित्यिक अवधारणा को चित्रों के जरिए साकार कर रहे हैं. उन्होंने विशेषरूप से ‘फारवर्ड प्रेस’ के लिए ऐसे चित्र बनाए हैं, जिनके बुनियादी सरोकार आम जन की राजनीति और सामाजिक न्याय से हैं. यह समझते हुए कि सांस्कृतिक दासता, राजनीतिक दासता से अधिक लंबी और त्रासद होती है. उसका सामना केवल और केवल जनसंस्कृति के सबलीकरण द्वारा संभव है—उन्होंने परंपरा से हटकर ऐसे लोकउन्नायकों के चित्र बनाए हैं, जो भारतीय बहुजन के वास्तविक नायक रहे हैं. अपने स्वार्थ की खातिर, अभिजन संस्कृति के पुरोधा उनका जमकर विरूपण करते आए हैं. अतः जरूरत उस गर्द को हटाने की है जो वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों ने बहुजन संस्कृति के नायकों के चारित्रिक विरूपण हेतु, इतिहास के लंबे दौर में उनपर जमाई है. डॉ. रत्नाकर ने बहुजन संस्कृति के जिन प्रमुख उन्नायकों के चित्र बनाए हैं, उनमें नास्तिक विचारक कौत्स, आजीवक मक्खलि गोसाल अजित केशकंबलि, पौराणिक सम्राट महिषासुर आदि प्रमुख हैं. कुछ और चित्र जो उनसे अपेक्षित हैं, उनमें महान आजीवक विद्वान पूर्ण कस्सप, बलि राजा, पुकुद कात्यायन आदि का नाम लिया जा सकता है.

यह ठीक है कि भारत के सांस्कृतिक इतिहास में इन बहुजन विचारकों एवं महानायकों के चित्र तो दूर, सूचनाएं भी बहुत कम उपलब्ध हैं. लेकिन असली चित्र तो देवीदेवताओं के भी प्राप्त नहीं होते. उनके बारे में प्राप्त विवरण भी हमारे पौराणिक लेखकों और कवियों की कल्पना का उत्स हैं. मूर्ति पूजा का जन्म व्यक्ति पूजा से हुआ है. इस विकृति से हमारा पूरा समाज इतना अनुकूलित है कि उससे परे वह कुछ और सोच ही नहीं पाता है. हर बहस, सुधारवाद की हर संभावना, आस्था के नाम पर दबा दी जाती है. मूर्तियों और चित्रों में गणेश, राम, सीता, कृष्ण, विष्णु आदि को जो चेहरे और भंगिमाएं आज प्राप्त हैं, उनमें से अधिकांश उन्नीसवीं शताब्दी के कलाकार राजा रविवर्मा की देन हैं. अतः बहुजन दार्शनिकों और महानायकों के चरित्र को उनके चित्र के माध्यम से उजागर करने की डॉ. रत्नाकर तथा ‘फारवर्ड प्रेस’ की मुहिम न केवल सराहनीय बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया क्रांतिकारी कदम है. डॉ. रत्नाकर का यह कार्य इतना मौलिक और महान है कि सिर्फ इन्हीं चित्रों के लिए वे कला इतिहास में लंबे समय तक जाने जाएंगे. डॉ. रत्नाकर प्रशंसकों में से एक वरिष्ठ साहित्यकार से.रा. यात्री लिखते हैं—

‘भारत के सम्पूर्ण कला जगत में वह एक ऐसे विरल चितेरे हैं जिन्होंने अनगढ़, कठोर और श्रम स्वेद सिंचित रूक्ष जीवनचर्या को इतने प्रकार के रमणीक रंगप्रसंग प्रदान किए हैं कि भारतीय आत्मा की अवधारणा और उसका मर्म खिल उठा है. आज रंग संसार में जिस प्रकार की अबूझ अराजकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है उनका सहज चित्रांकन न केवल उसे निरस्त करता है वरन भारतीय परिवेश की सुदृढ़ पीठिका को स्थापित भी करता है.’

मैं समझता हूं देश के वरिष्ठतम साहित्यकारों में से एक यात्री जी की प्रामाणिक टिप्पणी के बाद कुछ और कहने को रह ही नहीं जाता.

ओमप्रकाश कश्यप

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वेन की कथा

वेन उदार है….’

वेन वीर है….’

वेन निष्पक्ष, न्यायकर्ता है….’

वेन का जन में विश्वास है….’

अब से वेन ही हमारे सम्राट होंगे….’

सम्राट अमर रहें….’ जयघोष के साथ दर्जनों मुट्ठियां हवा में लहराने लगीं. लोग खुशी से चिल्ला उठे. वेन को सम्राट चुन लिया गया. ऋषिकुल देखते रह गए. अभी तक उन्होंने राजतंत्रों को सजते देखा था. उनके लिए आशीर्वादकामना की थी. आवश्यकतानुसार प्रशस्तिवाचन भी किया था. लेकिन गणतंत्र जिसमें लोग अपना नेता स्वयं चुनें, जहां सभी को बराबर अधिकार होंउनकी समझ से बाहर था. उनके शास्त्र बताते थे कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है. उसे साधारण लोग भला कैसे चुन सकते हैं! ऋषिगण एक और बात से भी क्षुब्ध थे. परंपरानुसार वही राजाओं का अभिषेक करते आए थे. अब जनता स्वयं अपने राजा का अभिषेक कर रही थी. इस उत्साह के साथ कि ऋषिगण कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. अनमनेअनचाहे ढंग से साक्षी बने थे. यूं भी सीधे टकराव की अपेक्षा अवसर मिलते ही अदृश्य प्रहार करना उनकी आदत थी. इसी तरह उन्होंने स्थानीय कबीलों को पराजित कर, आर्यों की राह आसान की थी. वेन को राजा निर्वाचित करने वाले भी आर्यगण ही थे. अनार्यों के संपर्क में आने के बाद उन्होंने उनसे बहुत कुछ सीखा था. विशेषकर गणतंत्र और खेती करने की कला. वेदों में उनकी आस्था थी, लेकिन शांतसरल, बगैर किसी छलछंद का जीवन जीने वाले अनार्यों के पुरों को ध्वस्त करने के लिए ‘पुरंदर’ का बारबार आवाह्न करना उन्हें नापसंद था. वे असुर, निषाद, किरात, भील तथा अन्य अनार्यों की भांति कृषिकर्म को अपनाना चाहते थे. ताकि पशुओं के साथ यहां से वहां भटकने से मुक्ति मिले. जानते थे कि धरती की सीमा है. वह आवश्यकताएं सभी की पूरी कर सकती है. लालच, किसी एक का भी नहीं.

ऋषिकुलों की चिंता आर्य संस्कृति का विस्तार करने की थी. अभी तो केवल सरस्वती पार की है. वे आर्यसंस्कृति को नदी के उत्तर, पश्चिम में गंगायमुना के मैदानों तक ले जाना चाहते थे. चिंता का दूसरा कारण गणतंत्र और उसके प्रति जनों का आकर्षण था, जिसने उनके विशेषाधिकारों के आगे प्रश्नचिह्न लगा दिया था. उन्हें गणतंत्र का इतना भय था कि जब भी मिलते, आंखों में एक ही सवाल होता था—‘अगर प्रजा स्वयं राजा चुनने लगी तो हमारा क्या होगा!’

सम्राट वेन कृषि में रुचि लेते थे. सरस्वती के तटवर्ती बड़े भूभाग को उपजाऊ क्षेत्र में बदलने में उनकी बड़ी भूमिका थी. इसी गुण ने उन्हें राजा बनाया था. लक्ष्य स्पष्ट था. सम्राट चुने जाने के तत्काल बाद, बिना किसी औपचारिकता के वेन ने पुरवासियों को संबोधित करते हुए कहा था—

आज से कोई छोटाबड़ा नहीं होगा. हम सभी श्रम करेंगे. सरस्वती के पूर्व तथा उत्तरपश्चिम में बड़ा क्षेत्र अब भी अकृष्ट पड़ा है. उसे हम अपने स्वेद बिंदुओं से सींचकर उपजाऊ बनाएंगे, ताकि आर्यवर्त में आदर्श श्रम संस्कृति का विस्तार हो.’ वेन के प्रस्ताव का सभी ने हाथ उठाकर समर्थन किया था. लेकिन वहां उपस्थित ऋषिगणों के चेहरों पर तनाव छा गया—

सम्राट, हमारा कार्य यज्ञादि कर्मों का निष्पादन तथा शिक्षा देना है. आपके निर्णय से धर्म को क्षति पहुंचेगी.’

सबसे बड़ा अधर्म तो दूसरों पर आश्रित जीवन जीना है. प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपना भोजन स्वयं अर्जित करे.’—एक ओर से प्रतिक्रिया आई.

कुपित ऋषि भीड़ की ओर देखने लगे. सम्राट वेन किसी भी प्रकार के विग्रह से बचना चाहते थे. लेकिन वे यह भी नहीं चाहते थे कि दूसरों को काम से जी चुराने का बहाना मिले. अतएव ऋषिगणों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा—

मैं जानता हूं कि आपका कार्य बेहद महत्त्वपूर्ण है. बहुमुखी विकास के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है. लेकिन बराबरी पर आधारित समाज की रचना के लिए श्रम भी अत्यावश्यक है.’

अंततः एक निर्णय लिया गया कि सरस्वती के पश्चिमी तट से सटी उपजाऊ, सिंचित और कृषियोग्य भूमि ऋषिगणों को दे दी जाए तथा शेष जन, राजा के नेतृत्व में नदी के उत्तरपूर्वी हिस्से पर मौजूद जंगलों को साफ कर, भूमि को कृषि योग्य बनाने का संकल्प लें.

ऋषिगणों ने सहमति दे दी.

वर्षों के परिश्रम द्वारा तैयार की गई सिंचित भूमि को ऋषिकुलों को दिए जाने पर जनों में रोष था. वेन ने उन्हें समझा लिया. अपने राजा की सलाह मानकर जन सरस्वती के पूर्वाेत्तर क्षेत्रों में जमीन तैयार करने लगे. बीहड़ जंगलों को साफ कर, जमीन को कृषियोग्य बनाना कम चुनौतीवाला काम न था. फिर भी वे खुश थे. उनका राजा उनके साथ था. कदमकदम पर राह दिखाता. उनका मनोबल बढ़ाता हुआ. आखिर परिश्रम रंग लाया. खेत लहलहाने लगे. विश फलनेफूलने लगा. सरस्वती के पश्चिमी पाट पर ऋषिगण भी खेती करते थे.

कुछ वर्ष बीते. मौसम समय पर आए, गए. वेन का राज्य तरक्की करता गया. अचानक प्रकृति की रंगत बदली. बादल जो वर्षों तक धरा सरसाते आए थे, रूठने लगे. एक के बाद एक, अनेक वर्ष बिना बारिश के बीत गए. फसलें सूखीं, जमीन पपड़ाने लगी. मौसम के सहारे खेती करनेवाले किसानों पर दुर्भिक्ष वार पर वार करने लगा. गणतंत्र की स्थापना के बाद राज्य समृद्ध हुआ था. धनधान्य की कभी कमी न रहती थी. यह पहला अवसर था, जब कोठार खाली थे. भूखे पेट नैतिकता पिघलने लगी. आदमी आदमी का दुश्मन बन गया. चोरी और लूट की घटनाएं बढ़ गईं. उधर ऋषिगणों के खेत अब भी लहलहा रहे थे. सदानीरा सरस्वती की उनपर कृपा थी. पाट से सटे खेतों को भरपूर पानी उपलब्ध था. भूख से पीड़ित जनों को देख वेन से न रहा गया. उन्होंने विशके निवासियों की बैठक बुलाने का फैसला कर लिया. बैठक में सभी को संबोधित करते हुए सम्राट ने कहा—

यह विश हम सबसे बना है. हमारे सुखदुख भी साझे होने चाहिए. मैं चाहता हूं कि ऋषिगण दुर्भिक्ष पीड़ित जनों की सहायता करें. जब तक संकट टल नहीं जाता, तब तक अपने खेतों में काम करने दें. उनके परिश्रम के बदले अनाज का एक हिस्सा उन्हें दे.’ आशा के विपरीत ऋषिगणों ने सहयोग से इन्कार कर दिया. उल्टे ग्रामीणों को नास्तिक तथा वेन को नास्तिकों का राजा कहकर वे उनका उपहास करने लगे. भूखेप्यासे जन पहले ही क्षुब्ध थे. अपने प्रिय सम्राट को ‘नास्तिक’ संबोधन उन्हें गाली जैसा लगा. वे क्रोध से उबलने लगे. क्रोध के अतिरेक मैं उनका धैर्य डोलने लगा.

हमें हमारे खेत वापस चाहिए….यदि वे नहीं मिले तो हम उनमें आग लगा देंगे.’ कई जन एक साथ चीखे.’

रुको! वे हमारे बच्चों के शिक्षक हैं. हमें उनका सम्मान करना चाहिए.’ वेन चीखचीखकर भीड़ को शांत करने की कोशिश में लगे थे. मगर लोग जैसे पगला चुके थे. भूख उनकी नैतिकता को निगल चुकी थी. विवेक क्रोध की मार से धराशायी था. सम्राट वेन उग्र जनों और ऋषियों के बीच दीवार बनकर खड़े थे. दोनों को समझाने की कोशिश, शांति के लिए लगातार अपील करते हुए. जन गुस्से से बेकाबू थे. नैतिकता और भूख के द्वंद्व में जीत भूख की हुई. निर्देश की अवहेलना करते हुए उग्र भीड़ आगे बढ़ी. सम्राट रास्ते में अड़े थे. भूख और क्रोध से अंधी हुई भीड़ उन्हें कुचलते हुए निकल गई.

सम्राट वेन….’ वेन को क्षतविक्षत अवस्था में जमीन पर पड़े देख कोई चीखा. सच जानते ही लोग सकते में आ गए. जो जहां था, वहीं थम गया. क्रोध के स्थान पर ग्लानिभाव उमड़ने था. सभी की निगाहें जमीन पर थीं. प्रायश्चित से वे दोहरे हुए जा रहे थे. ऋषिगण जो कुछ देर पहले घबराए हुए थे, रुक गए.

देर तक सन्नाटा छाया रहा. लोग व्यथित थे. जिस सम्राट को उन्होंने अपनी इच्छा से चुना था. जो उनके हितों का रखवाला था, उसका अंत उनके अपने ही हाथों हुआ. यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा थी. ग्लानिबोध से दबे लोग अपने आप से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. अवसर अनुकूल देख ऋषिगण आगे आकर कहने लगे—

भाइयो! अपने मन को शांत करें. ईश्वर एकमात्र कर्ता है. जो हुआ वह पहले से ही तय था. इसमें आपका कोई दोष नहीं है. हमारे प्रिय सम्राट को ईश्वर के राज्य में शरण मिली है. उसी परमात्मा का आदेश है कि आप हमारे साथ चलें. आश्रमों के द्वार आपके लिए खुले हैं.’ आप इसे ईश्वर के नाम का नशा माने या प्रलोभन, प्रजाजनों की अज्ञानता कहें अथवा दुर्भिक्ष की मार का असर—आत्मपीड़ा में डूबे, पापबोध के मारे, भूख से व्याकुल, निढाल जन अंततः ऋषिगणों के पीछेपीछे चलने लगे.

सहसा एक निषाद तेजी से आगे आया. अधनंगा तन, ठिगनी, परिश्रमतपी काया. आगे चल रहे ऋषियों को संबोधित कर वह चीखा—‘उसे ईश्वर ने नहीं तुम लोगों ने मारा है. तुम हत्यारे हो….तुम सब हत्यारे हो. धर्म के नाम का धंधा करने वाले. महाराज की हत्या तुम सबने मिलकर की है. मुझे तुम्हारी दिखावटी करुणा नहीं चाहिए.’

कहता हुआ वह जंगल की ओर दौड़ गया. मगर उसकी आवाज पूरे नभमंडल को देर तक गूंजती रही.

ओमप्रकाश कश्यप

(नोट : एक अन्य जगह आया है कि वेन ने कृषि ने लिए पशुशक्ति की आवश्यकता को देखते हुए यज्ञों में दी जाने वाली बलि पर नियंत्रण लगा दिया था. जिससे पुरोहित वर्ग उनसे नाराज हुआ. उन्होंने वेन के विरुद्ध जनता को उकसाना आरंभ किया. वेन की हत्या उसी षड्यंत्र का परिणाम थी )

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औरत

बहू को ससुराल आए सात वर्ष हो चुके थे, परंतु सास-बहू दोनों में किसी को किसी से शिकायत न थी. बहू की कोशिश रहती कि ससुराल और मैके में कोई फर्क न समझे. रिश्तों की मर्यादा बनाए रखे. ऐसा करते-करते वह एकदम बेटी बन जाती. सास ऐसी कि मां और सास का अंतर पता न चलने दे. दिन में कुछ पल ऐसे भी आते जब सास-बहू दोनों सहेलियों की भूमिका में होतीं. इसलिए बहू जब दूसरी बार गर्भवती हुर्ह तो सास की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. उसने बहू की सुख-सुविधा के लिए हर जरूरी चीज का इंतजाम करा दिया. बहू की तबियत एकाएक बिगड़ी तो उसे नर्सिंग होम ले जाना पड़ा. डॉक्टर ने जो तारीख दी थी, उसके आने में पूरा पखबाड़ा शेष था. लेकिन नर्सिंग होम में जब बहू को तत्काल भर्ती करने तथा नवजात के लिए कपड़ों का इंतजाम करने को कहा तो सास चौंकी. माथे पर चिंता की अनगिनत रेखाएं उभर्र आईं— ‘और इंतजार नहीं कर सकते?’ डॉक्टर का कहना था. ‘दोनों ठीक तो हैं?’ ‘चिंता मत कीजिए मां जी….’ सुनकर सास ने कुछ राहत महसूस की. उसी समय बहू को प्रसव पीड़ा होने लगी. अब न तो सास, सास थी. न बहू, बहू. एक स्त्राी को पीड़ा से छटपटाते देख दूसरी स्त्राी बड़बड़ा रही थी— ‘नौ महीने तक पेट में रखो, जन्म देने के लिए पेट चिरवाओ और बड़े होते ही बच्चे अपनी हांकने लगते हैं. पूछते तक नहीं.’ प्राकृतिक रिश्ता सामाजिक रिश्तों पर भारी पड़ चुका था?

ओमप्रकाश कश्यप

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नियुक्ति

अकादमी के शीर्षस्थ पद के लिए प्रत्याशियों को बुलाया गया. भर्ती के लिए दो प्रकार की परीक्षाएं तय थीं. पहली परीक्षा के लिए प्रत्याशियों को एक हॉल में बिठाया गया. उनके ठीक सामने एक मंदिर था. मंदिर में एक त्रिशूल रखा गया था. त्रिशूल के आगे पत्र-पुष्प, फूलमालाएं, चंदन लेप, धूप-दीप-नैवेद्य रखे थे. बराबर में दो प्लेट. उनमें से एक में नीले रंग के कार्ड रखे थे. दूसरी में केसरिया. नीले कार्ड पर ‘हथियार’ लिखा था. केसरी पर ‘पूजा’. परीक्षा की शुरुआत करते हुए परीक्षक ने प्रत्याशियों से कहा—‘आपको बताना है, त्रिशूल हथियार है या पूजा?’ जो त्रिशूल को हथियार मानते हैं, वे नीला कार्ड उठाकर इस कक्ष में बाईं ओर रखी कुर्सियों पर बैठ जाएं. पूजा मानने वाले केसरिया कार्ड उठाकर दायीं दिशा में स्थान ग्रहण करें. प्रत्याशियों के चेहरे खिल उठे. एक-एक कर सभी त्रिशूल के सामने जाते और अपनी पसंद का कार्ड उठाकर यथास्थान बैठ जाते. पहला चरण संपन्न होने पर परीक्षक ने खडे़ होकर कहा—
‘जिन प्रत्याशियों ने नीले कार्ड उठाए हैं, वे जा सकते हैं.’ तीन को छोड़कर बाकी सभी प्रत्याशी प्रस्थान कर गए.
‘चुने हुए प्रत्याशियों का साक्षात्कार होगा.’ परीक्षक ने बताया. उसके बाद पहले प्रत्याशी को बुलाया गया—
‘तुमने कैसे तय किया कि त्रिशूल पूजा है?’
‘बड़ा आसान था.’ पहले प्रत्याशी ने कहा, ‘त्रिशूल के आगे धूप-दीप-नैवेद्य रखे थे. बस मैं समझ गया कि त्रिशूल पूजा है.’
‘शाबाश! अपनी रचनात्मक उपलब्धियों के बारे में भी बताइए?’
‘मैने गाय पर एक हजार से ऊपर निबंध लिखे हैं.’
‘गुड! आप प्रतीक्षा कर सकते हैं.’ तदनंतर दूसरे प्रत्याशी को बुलाया गया. उसके सामने भी वही सवाल रखे गए.
‘त्रिशूल मंदिर में था. मंदिर को देखते ही मैं ध्यान-मग्न हो गया. उसके बाद तो मुझे सब पूजा मय नजर आने लगा.’
‘अपनी रचनात्मक उपलब्धियों पर भी प्रकाश डालिए?’
‘मैने गहन शोध से पता लगाया है कि आज रामेश्वरम हैं, हजारों वर्ष पहले वहां एक कारखाना था. जिसमें पुष्पक विमान बना करते थे. कारखाना इतना बड़ा था कि तैतीस करोड़ देवताओं में से हर एक के पास पुष्पक विमान था. उससे वे सातों लोकों की यात्रा किया करते थे?’
‘लेकिन शोध से तो वहां किसी कारखाने के प्रमाण नहीं मिलते?’
‘कैसे मिलता, देवताओं की तरह उनका कारखाना भी सिर्फ उनके परमभक्तों को दिखाई पड़ता था.’
‘फिर आपने कैसे पता लगाया?’
‘बड़ी कठिन साधना करनी पड़ी. प्रभुकृपा से यह भी पता चला कि एक कारीगर ने पुष्पक विमान का डिजायन वहां मौजूद शिलाखंड पर बना दिया था. वास्कोडिगामा जब भारत आया तो वह उस शिला को अपने देश वापस ले गया था. आधुनिक हवाई जहाज उसी की नकल हैं.’
तीसरे प्रत्याशी से भी वही प्रश्न किए गए. उसने छूटते ही कहा—
‘त्रिशूल हथियार होगा महादेव के लिए हमारे लिए तो वह केवल पूजा है?’
‘क्या आप हथियार की जरूरत नहीं समझते?’
‘हरगिज नहीं, हमारी रक्षा के लिए देवता जो हैं.’
‘शाबाश, आपकी रचनात्मक उपलब्धियां?’
‘जी, फेसबुक, ट्विटर, वाटअप वगैरह पर एक सौ एक अकाउंट हैं.’
‘इतने एकाउंट की क्या जरूरत है?’
‘जरूरत है सर. इससे भी ज्यादा की जरूरत है. मुझे ही देखिए सुबह से ही कंप्यूटर पर बैठ जाता हूं और फेसबुक, ट्विटर, वाटअप वगैरह जितनी भी सोशल साइट हैं, सभी पर वामपंथियों को कोसता रहता हूं.’
‘इसके लिए तो वामपंथ को बहुत पढ़ना पड़ता होगा?’
‘कैसी बात करते हैं सर, गालियां देने के लिए पढ़ने की क्या जरूरत है?’
तीसरे प्रत्याशी को उसी क्षण नियुक्तिपत्र थमा दिया गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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विविध की डायरी

बालकहानी

विविध के दादू को डायरी लिखने का शौक है. बोर्डिंग में जाने पर विविध को घर की याद आई तो उसने भी कलम उठा ली. ये पन्ने उसी की डायरी के हैं, जो उसने अपने दादू को संबोधित करते हुए लिखे हैं—

17 फरवरी 2015

आज बोर्डिंग का तीसरा दिन है. मैं दो दिनों तक लगातार सोचता रहा कि घर में कोई मुझे प्यार नहीं करता. बहुत शरारती हूं न! इसलिए मुझे घर से दूर कर दिया गया है. बीते दो दिन मैं लगातार अच्छा बालक बनने की कोशिश करता रहा. इन दो दिनों में मैंने कोई शरारत नहीं की. मुंह तक नहीं खोला. मुझे गुमसुम देख बच्चों ने मान लिया कि मैं बीमार हूं. वे मेरा हाल-चाल पूछने आए. जब उन्हें पता चला कि मुझे कुछ नहीं हुआ है, तो दब्बू कहकर मेरी हंसी उड़ाने लगे. मुझे उदास देखकर मैडम ने पूछा था—

‘घर की याद आ रही है विविध?’ मैं चुपचाप किताब में आंखें गढ़ाए रहा.

‘ऐसा सबके साथ होता है. धीरे-धीरे नए दोस्त बनते हैं. आदमी छूटे हुए को भूल जाता है.’ मैडम कहे जा रही थीं. वही गोल-मोल बातें. जैसी बड़े अकसर बच्चों के साथ करते हैं. मैं दादू के अलावा किसी और के साथ सहज हो ही नहीं पाता. मुझे आज भी याद है, जब मैं हाॅस्टल के लिए निकला था, तब दादू ने कहा था—‘दुनिया से जुड़ने के लिए खुद से जुड़ना बहुत जरूरी है.’

जब से आया हूं, यह बात मेरे दिमाग में लगातार चक्कर काट रही है.

‘मैडम, खुद से जुड़ना क्या होता है?’ मैंने पहली बार अपना मुंह खोला. मैडम चकित होकर मेरी ओर देखने लगीं. शायद ऐसे सवाल की उन्हें उम्मीद ही नहीं थी. कुछ देर बाद मेरे कंधों पर हाथ रख मुझे समझाते हुए बोलीं—

‘अपनी शक्तियों को समेटे रखना.’ फिर पहेली! मैं मैडम की ओर देखने लगा. बड़े लोगों को पहेली बूझने के लिए हम बच्चे ही क्यों मिलते हैं! दादू की पहेली क्या कम उलझन-भरी थी जो मैडम ने एक पहेली और दाग दी. मैंने देखा, मैडम मुस्करा रही थीं—

‘तुम समझदार हो. पर कुछ चीजें वक्त के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.’

ऊंह! यह क्या बात हुई. दादू होता तो कहता—‘समझा नहीं सकते तो बचाव का रास्ता ढूंढ लिया.’ पर मैं जानता हूं दादू ऐसा कभी नहीं कहते. उनके पास आने-जानेवालों का तांता लगा रहता है. उनमें कुछ विद्यार्थी भी होते हैं. दादू अपने पास आनेवाले वालों से अकसर कहा करते हैं—‘शब्दों से दोस्ती करो.’

उन लड़कों के पल्ले क्या पड़ता है, मुझे नहीं पता. परंतु शब्दों से दोस्ती की बात मैं समझ सकता हूं. दादू अस्सी बरस की अवस्था में रोज डायरी लिखते हैं. फुर्सत मिलते ही कुछ न कुछ पढ़ने लग जाते हैं. मेरे लिए यह पहेली अबूझ नहीं है. इसलिए घर छोड़ते समय मैंने सबसे पहला फैसला किया था—शब्दों से दोस्ती करने का.

घर से चलते समय दादू से नीली डायरी मांगकर लाया था. सोचा था उनकी तरह रोज कुछ न कुछ लिखूंगा. लेकिन पिछले दो दिन मन बेहद उदास रहा. शब्द जंगली हिरन की तरह पकड़ से दूर भागते रहे. आज मैंने ठान लिया था कि कुछ न कुछ लिखकर मानूंगा. कलम उठाई तो शब्द अपने आप उतरने लगे. तब पता चला कि शब्द दोस्ती के लिए हमसे भी ज्यादा उतावले होते हैं. मन से पुकारो तो कतार बांधे खुद-ब-खुद चले आते हैं. दादू ठीक कहते हैं—हर मंजा हुआ लेखक कमांडर की तरह होता है, शब्द उसके अनुशासित सेनानी.

अरे वाह! आज तो मैं भी पहेलीनुमा बातें करने लगा. दादू का कुछ असर तो पड़ना ही है. डेढ़ घंटा लिखने में कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला. अब सोता हूं. मैडम बता रही थीं, कल प्रधानमंत्री जी संबोधित करने वाले हैं. देश का प्रधानमंत्री हम बच्चों से संवाद करे, मुझे तो यह सोचकर ही सिहरन होती है.

पता नहीं वे सिर्फ अपने मन की कहेंगे या हमारे मन की बात भी सुनेंगे.

18 फरवरी 2015

स्कूल में सुबह से ही हलचल थी. खुले मैदान में पंडाल लगाया गया था. सामने बड़ा टेलीविजन स्क्रीन था, जिसपर प्रधानमंत्री जी संबोधित करनेवाले थे. पिछले स्कूल में हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को जलसा होता था. बड़े-बड़े लोग आते. बच्चों को फलाहार भी मिलता. ‘क्या आज भी फलाहार बंटेगा?’ हर बच्चे के मन में यही ख्याल था. एक लड़का स्कूल के कमरों में बार-बार चक्कर लगा रहा था. एक-एक कर वह सारे कमरों में घूम चुका था.

‘अंबेश, क्या है, क्यों चक्कर काट रहे हो? जाकर अपनी क्लास के साथ बैठो.’ एक मैडम ने उसे डांटा. लेकिन अंबेश की आंखें अब भी इधर-उधर कुछ खोज रही थीं—

‘मैडम भूख लगी है.’ अंबेश ने मासूमियत से बताया.

‘सुबह तुम्हारी मम्मी ने नाश्ता नहीं कराया था?’

‘मैंने मना कर दिया था.’

‘क्यों मना कर दिया था?’

‘प्रधानमंत्री जी के टेलीविजन पर आने की खुशी में लड्डू बटेंगे….’

‘ठीक है, पर नाश्ता क्यों नहीं किया था?’

‘पिछली बार दो लड्डू मिले थे. पेट भरा होने के कारण मैं बस एक खा पाया था.’ बच्चे की मासूमियत देख मैडम हंसी. आसपास मौजूद बच्चे भी अपनी हंसी न रोक सके.

प्रधानमंत्री जी समय पर बोले. अच्छी-अच्छी बातें बर्ताइं. मामूली लगनेवाली सफाई जैसी बातें भी. घर में दादू भी सफाई पर जोर देते थे. पर मैं लापरवाही कर जाता था. आज पता चला कि मामूली लगनेवाली हर बात मामूली नहीं होती. गांधी जी छोटी-छोटी बातों पर अमल करके ही बड़े आदमी बने थे. आइंस्टाइन के चाचा ने यूक्लिड की ज्यामिती की छोटी-सी पुस्तक भेंट में दी थी. यदि आंइस्टाइन उस पुस्तक को पुरानी और मामूली समझकर एक ओर रख देते तो क्या इतने बड़े वैज्ञानिक बन पाते!

प्रधानमंत्री जी का संदेश पूरा होते ही हमसे मैदान में चलने को कहा गया. चार टुकड़ों में बांटकर हमें मैदान की सफाई का काम सौंपा गया. प्रधानमंत्री जी के संदेश का असर. हम सभी उत्साहित थे. चार मैडम बच्चों को निर्देश दे रही थीं—

‘विविध वो कागज उठाकर डस्टबिन में डालो.’ एक मैडम ने मुझसे कहा तो मैं दौड़ पड़ा. जैसे पंख लगे हों. हम बच्चों के लिए यह एक खेल था. परंतु मैडम का खड़े-खडे़ आदेश देना मुझे अच्छा नहीं लगा. मैदान बड़ा था. थोड़ी ही देर में उस खेल से उकताहट होने लगी. दूसरे बच्चे भी थकावट महसूस करने लगे. चारों मैडम जैसे एक ही दिन में पूरे मैदान की सफाई का संकल्प ले चुकी थीं. क्या प्रधानमंत्री जी का संदेश केवल हम बच्चों के लिए था? क्या वे हमें निरा बच्चा समझते हैं. मैं सोच ही रहा था कि एक ओर से रोने की आवाज सुनाई दी. सभी उस ओर दौड़ पड़े. पता चला कि एक मैडम ने छोटे बच्चे को ईंट उठाकर एक ओर रखने को कहा था. बच्चा ईंट संभाल न पाया और गिर गया. घुटने छिलने से वह रोये जा रहा था. बालक की मरहम-पट्टी की गई. उसके बाद हमारा मन उस काम से ऊब गया. प्रधानमंत्री जी की कही अच्छी-अच्छी बातें हवा हो गईं.

अच्छा हुआ, सफाई का काम भी रोक दिया गया.

21 फरवरी 2015

बीते दिन एक भी क्लास नहीं लगी थी. मुझे वह दिन बहुत अच्छा लगता है, जब स्कूल हो पर पढ़ाई बिलकुल न हो. उस दिन लगता है कि स्कूल हम बच्चों के हिसाब से चल रहा है. बाकी दिनों में तो हम बच्चों को ही स्कूल के हिसाब से चलना पड़ता है.

बच्चे को चोट लगने की घटना का असर हम सबके मन पर था. मैडम उसी की चर्चा कर रही थीं. कक्षा खाली थी. बच्चों को मौका मिला. वे उछल-कूद मचाने लगे. किसी एक ने कागज उछाला तो देखा-देखी दूसरे बच्चे भी शुरू हो गए. उसके बाद तो मानो होड़-सी मच गई. फर्श पर कागज ही कागज नजर आने लगे. एक दिन पहले प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया संदेश मानो बेअसर हो गया. शोर-शराबा सुनकर मैडम आईं. बच्चों को डांटकर उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया. कक्षा में गंदगी देख मुझे बहुत बुरा लग रहा था. अच्छा होता मैडम जी डांटने के बजाय हम सबसे सफाई करने को कहतीं.

तभी आहट सुनाई पड़ी. दरवाजे पर प्रिंसीपल मैडम थीं. बच्चे उन्हें देखकर खड़े हो गए. हम सब डरे हुए थे कि कक्षा में गंदगी देख प्रिंसीपल मैडम अवश्य डांटेंगीं. डर से हमारे दिल जोर से धड़क रहे थे. प्रिंसीपल मैडम ने कक्षा में एक नजर दौड़ाई, फिर किसी से कुछ भी कहे बगैर फर्श पर बिखरे कागजों को उठाने लगीं. हम सब स्तब्ध—

‘अरे….रे मैडम, आप छोडि़ए, मैं कराती हूं.’ मैडम ने आगे बढ़कर उन्हें रोकने की कोशिश की. प्रिंसीपल मैडम चुपचाप काम में लगी रहीं. यह देखते ही बच्चे अपनी-अपनी सीट छोड़ कागज बीनने में लग गए. कुछ ही क्षणों में कमरा साफ हो गया. प्रिंसीपल मैडम बिना एक भी शब्द कहे चुपचाप चली गईं. उनकी चुप्पी हम सब पर भारी थी. सभी अपराधबोध से ग्रस्त थे.

‘मौन शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली होता है.’ दादा जी अकसर कहा करते थे. उसका मतलब आज समझ में आया.

मैडम ठीक ही कहती थीं. कुछ बातें समय के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.

फरवरी 22 2015

कल की घटना का बहुत गहरा असर पड़ा है. बच्चों ने कागज के कनकौए उड़ाना छोड़ दिया है. कक्षा में, खेल के मैदान पर या रास्ते में, बच्चों को कहीं भी गंदगी दिखती है, तो उसे चुपचाप उठाकर डस्टबिन के हवाले कर देते हैं. कक्षा में सभी शांत रहते. मानो जा चुके हांे कि शोर अपने आप में गंदगी है. लंच करने से पहले सब एक-एक कर हाथ धोते है. छोटी-छोटी बातें बड़ा सुख दे जाती हैं. मेरा मन स्कूल में लगने लगा है. कुछ लड़के दोस्त बने हैं. उन्हीं में एक लड़का है वेदांत. उसके घर में एक दादी है. जब मैं उससे अपने दादू की बातें करता हूं, वह अपनी दादी की बातें सुनाने लगता है. इससे एक बात तो समझ में आती है. परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी का होना बेहद जरूरी है. वे न हों तो घर कितना बोझिल हो जाए.

पढ़ाई शुरू हो चुकी है. होमवर्क काफी था. काफी समय उसे निपटाने में ही निकल गया. सोता हूं.

फरवरी 27 2015

कई दिनों से डायरी लिखने का काम छूटा रहा. आज कक्षा में मैडम ने बताया था कि दस दिन बाद स्कूल का सालाना उत्सव शुरू होगा. उसके लिए नाटक तैयार करने का काम उन्हीं को सौंपा गया है. अपनी नई जिम्मेदारी पर वे बहुत उत्साहित थीं. इसलिए कक्षा में आने के साथ ही उन्होंने कहा था—

‘‘दो नाटकों में से पहला नाटक राजा और उसके वजीर की कहानी है. दूसरे में एक नेता और जनता होगी.’ यह सुनकर हम बच्चों ने ताली बजाकर अपनी खुशी प्रकट की थी.

‘विविध तुमसे इस नाटक में हिस्सा लेने को कहा जाए तो क्या बनना चाहोगे, राजा या वजीर?’ मैडम ने मुझसे पूछा. मैं ऐसे सवाल के लिए तैयार न था.

‘कुछ भी नहीं मैडम?’ थोडी देर बाद मैंने उत्तर दिया.

‘क्या तुम्हें नाटक में हिस्सा लेना अच्छा नहीं लगता?’

‘मुझे राजा या उसका वजीर बनना अच्छा नहीं लगता.’

‘क्यों?’

‘राजा और वजीर तो बीते जमाने की बातें हैं’ मैंने उत्तर दिया था. उस समय मेरे दिमाग में गांव की एक घटना चक्कर काट रही थी. दादू के पास गांव के कुछ लोग आए थे. दशहरे के अवसर पर नाटक मंडली को बुलाने की बात थी.

‘इस बार गांव वाले राजा नल का नाटक देखना चाहते हैं.’ लोगों के साथ आए ग्राम प्रधान ने कहा था. इस पर दादू का उत्तर था—

‘राजा-महाराजाओं का जमाना तो कभी का लद चुका है प्रधान जी.’

‘फिर?’

‘मेरा बस चले तो मैं ऐसी नाटक मंडली को गांव में बुलाऊं जो सुभाष चंद बोस या महात्मा गांधी पर नाटक खेले.’

‘विविध, क्या तुम दूसरे नाटक मैं नेता का पाठ करना चाहोगे?’ मुझे चुप देख मैडम ने पूछा था.

‘नहीं, जनता का?’

‘तुम तो नेता का पाठ आसानी से कर सकते हो?’ मैडम ने मुझे समझाने की कोशिश की थी.

‘दादू बताते हैं, हमारे देश में जनता ही नेता को चुनती है. नेता गलती करे तो उसको उतार फैंकती है. इसलिए मैं जनता बनना चाहूंगा…..समझदार जनता.’

‘सही कह रहा है मैडम.’ कक्षा में किसी ने पीछे से कहा था—‘जनता भी तो सफाई करती है….गंदे नेताओं की सफाई.’

मुझे लगा कि हमारी बातें सुनकर मैडम भी खुश हैं. शाम को उन्होंने बताया था कि ‘राजा और वजीर’ नाटक का विचार त्याग दिया गया है. उसके स्थान पर अब महात्मा गांधी के दांडी मार्च पर आधारित नाटक खेला जाएगा. डांडी मार्च की कहानी मैं दादू के मुंह से सुन चुका था. उसके बाद मैडम ने मेरी ओर देखते हुए कहा था—‘जानते हो विविध नाटक को बदलने का फैसला तुमसे बातचीत के बाद लिया गया है और मीटिंग के दौरान प्रिंसीपल मैडम ने कहा था—

‘‘लोकतंत्र में जनता भी सफाई करती है….देश की सफाई. यदि देश स्वस्थ रहेगा तो नागरिक अपने आप स्वस्थ्य होते चले जाएंगे.’’

ओमप्रकाश कश्यप

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मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं

मैडम लोगों से अपील कर रही थीं—

भाइयो और बहनो!

हमें भ्रष्टाचार को जमने नहीं देना है. जड़ समेत उखाड़ फेंकना है. यह बात भ्रष्टाचार ने सुन ली. वह पत्रकार का रूप धारण कर मैडम के सामने जा धमका—

‘जाने दीजिए मैडम, क्यों नाहक गाल बजा रही हैं, आपके मंत्री खुद भ्रष्टाचार में फंसे हैं.

ऐसी बातें मैडम को सुनाई नहीं पड़ती थीं. वे कहती गईं—

‘हमें विरोधियों की बातों में नहीं आना है. सरकार ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक योजना बनाई है. हम किसी भी भ्रष्ट अधिकारी को टिकने नहीं देंगे.’

पत्रकार बने भ्रष्टाचार को हंसी आई. एक अधिकारी जिससे वह मन खीझता था, उसका राजधानी से हाल ही मैं चंडीगढ़ तबादला हुआ था. सहसा उसको चुहल सूझी, बोला—‘मैडम! क्या आप सत्यनाथ जी को वापस बुला रही हैं? वे जिस दफ्तर में भी गए हैं, वहीं उन्होंने विजीलेंस की स्वतंत्र शाखा खोल दी है. उनका नाम सुनते ही बड़े-बड़े अधिकारियों के पसीने छूट जाते हैं. रात-दिन यही प्रार्थना करते रहते हैं कि जिस दफ्तर में वे स्वयं गए हैं, वहां सत्यनाथ जी का तबादला न हो.’

‘राजधानी में ईमानदार अधिकारियों की कमी नहीं है.’

भ्रष्टाचार ने दिमाग पर जोर डाला, एक और अधिकारी का नाम उसके दिमाग में आया—‘सो तो है. जो जा चुका उसको वापस क्या बुलाना? वैसे मेरी नजर में एक और अधिकारी हैं, जिसने भ्रष्टाचार की नाक में नकेल डालने का काम किया है. परंतु आपकी सरकार उसे महीनों से घर बैठे तनख्वाह दे रही है.’

‘मैं विभागों के काम में हस्तक्षेप नहीं करती.’

‘परंतु अब भ्रष्टाचार के कारण विधानसभा में खिंचाई तो आपकी हो रही है.’

‘खिंचाई तो प्रधानमंत्री की भी हो रही है. हम दोनों एक ही मैडम के चेले हैं. जब वे नहीं घबराते तो मैं क्यों डरूं. वैसे यह सब विपक्ष की चाल है. अगले साल चुनाव हैं. सरकार को बदनाम करने के लिए उन्हें कोई न कोई मुद्दा चाहिए…’

भ्रष्टाचार को मैडम का आचरण देख तसल्ली हुई. वह जाने लगा. तो मैडम ने पूछा—‘उस अधिकारी का नाम बताइए, जिसको सरकार घर बैठाकर तनख्वाह दे रही है.’

भ्रष्टाचार मुस्कराया. उसने नाम बता दिया.

‘थेंक्य यू! सेक्रेटरी को अपने अखबार का नाम लिखवा देना, सरकारी विज्ञापन मिलते रहेंगे.’

एक घंटे बाद खबर आई कि उस अधिकारी को राजधानी से बाहर पटक दिया गया है.

भ्रष्टाचार को यही उम्मीद थी. उसका चेहरा खिल गया. अकस्मात उसे वह पंक्ति याद आई, जो मैडम के नाम से दीवारों, पोस्टरों पर जगह-जगह लिखी हुई थी. भ्रष्टाचार ने अपनी तरह से उसकी पैरोडी की—‘मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं.’

ओमप्रकाश कश्यप

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