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अछूत

ईश्वर पुजारी को रोज चढ़ावा समेटकर घर ले जाते हुए देखता. उसे आश्चर्य होता. दिनभर श्रद्धालुओं को त्याग और मोहममता से दूर रहने का उपदेश देने वाला पुजारी इतने सारे चढ़ावे का क्या करता होगा? एक दिन उसने टोक ही दिया‘तुम रोज इतना चढ़ावा घर ले जाते हो. अच्छा है, उसे मंदिर के आगे खड़े गरीबों में बांट दिया करो. कितनी उम्मीद लगाए रहते हैं.’

रहने दो प्रभु. तुम क्या जानो इस दुनिया में कितने झंझट हैं. एक दिन मंदिर से बाहर जाकर देखो तब पता चले.’

ईश्वर को बात लग गई. उसने पुजारी से एक दिन मंदिर बंद रखने का आग्रह किया, ‘कल तुम्हें खुद कुछ नहीं करना पड़ेगा. मैं खुद इंतजाम करूंगा.’ पुरोहित सोच में पड़ गया. परंतु यह सोचकर कि लोग ईश्वर को मंदिर से निकलते देखेंगे तो अगले दिन दो गुना चढ़ावा आएगा, वह एक दिन कपाट बंद रखने को राजी हो गया. अगले दिन ईश्वर ने कमंडल उठाया. मंदिर की देहरी पर पहुंचा था कि भीतर से आवाज आई. आवाज में आदेश था. ईश्वर के पांव जहां के तहां जम गए‘सुनो! सबसे पहले उत्तर दिशा में जाना. उस ओर सेठों की बस्ती है. जो भी नकदी मिले संभाल कर रखना. फिर पश्चिम दिशा में जाना. उस ओर क्षत्रियों की बस्ती है. वे दान देने में कंजूस होते हैं. उनसे धनधान्य जो भी मिले, मना मत करना. जब तक पूर्व दिशा में पहुंचोगे, गृहणियां भोजन की तैयारी कर चुकी होंगी. वहां से जो भी भोजन मिले, संभाल कर रख लेना.’ ईश्वर चलने को हुआ. पीछे से पुजारी ने फिर टोक दिया‘सुनो! दक्षिण दिशा की ओर जाओ तो किसी को छूना मत. नकदी मिले तो दूर से लेना. भोजन मिले तो हाथ मत लगाना.’

क्यों!’

वे लोग अछूत हैं . किसी ने छू भी लिया तो अपवित्र हो जाओगे.’ ईश्वर को गुस्सा आया. उसने कमंडल फ़ेंक दिया. उसके बाद मंदिर से बाहर निकला तो कभी नहीं लौटा.

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अच्छे दिन

चारों ओर बेचैनी थी. गर्म हवाएं उठ रही थीं. ऐसे में तानाशाह मंच पर चढ़ा. हवा में हाथ लहराता हुआ बोला—

भाइयो और बहनो! मैं कहता हूं….दिन है.’

भक्तगण चिल्लाए—‘दिन है.’

मैं कहता हूं….रात है.’

भक्तगण पूरे जोश के साथ चिल्लाए—‘रात है.’

हवा की बेचैनी बढ़ रही थी. बावजूद उसके तानाशाह का जोश कम न हुआ. हवा में हाथ को और ऊपर उठाकर उसने कहा—‘चांदनी खिली है. आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’

पूनम की रात है….आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’ भक्तों ने साथ दिया.

अच्छे दिन आ गए….’ भक्तगण तानाशाह के साथ थे. दुगुने जोश से चिल्लाए—

अच्छे दिन आ…’ यही वह बात थी, जिसपर हवा आपा खो बैठी. अनजान दिशा से तेज झंझावात उमड़ा और तानाशाह के तंबू को ले उड़ा.

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समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’

एकदो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला.

तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’

मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’

फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. तानाशाह ने पूंजीपति को बुलवाया. पूंजीपति का बाजार पर दबदबा था. अगले ही दिन से बाजार से चीजें गायब होने लगीं. बाजार में जरूरत की चीजों की किल्लत बढ़ी तो लोगपरेशान होने लगे. रोजमर्रा की चीजों के लिए एकदूसरे से झगड़ने लगे. एकदूसरे पर अविश्वास बढ़ गया. समाज में आपाधापी, मारकाट और लूटखसोट बढ़ गई. मौका देख पुजारी सामने आया. लोगों को संबोधित कर बोला—

हमारी धरती सोना उगल रही है. कारखाने रातदिन चल रहे हैं. फिर भी लोग परेशान हैं, जरा सोचिए, क्यों?’

आप ही बताइए पुजारी जी….’

ईश्वर नाराज है. उसे मनाइए, सब ठीक हो जाएगा.’

जैसा सोचा था, वही हुआ. मंदिरों के आगे कतार बढ़ गई. कीर्तन मंडलियां संकट निवारण में जुट गईं.

तानाशाह खुहै. पुजारी और पूंजीपति दोनों मस्त हैं.

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राजा बदरंगा है

तानाशाह को नएनए वस्त्रों का शौक था. दिन में चारचार पोशाकें बदलता. एक दिन की बात. कोई भी पोशाक उसे भा नहीं रही थी. तुरंत दर्जी को तलब किया गया.

हमारे लिए ऐसी पोशाक बनाई जाए, जैसी दुनिया के किसी बादशाह ने, कभी न पहनी हो.’ तानाशाह ने दर्जी से कहा. दर्जी बराबर में रखे हंटर को देख पसीनापसीना था. हिम्मत बटोर जैसेतैसे बोला

हुजूर, आप तो देशविदेश खूब घूमते हैं. कोई ऐसा देश नहीं, जहां आपके चरण न पड़े हों. वहां जो भी अच्छा लगा हो, बता दीजिए. ठीक वैसी ही पोशाक मैं आपके लिए सिल दूंगा.’

तानाशाह को जहां, जिस देश में, जो पोशाक पसंद आई थी, सब दर्जी को बता दीं. उन सबको मिलाकर दर्जी ने जो पोशाक तैयार की, तानाशाह ने उसे पहनकर एक ‘सेल्फी’ ली और सोशल मीडिया पर डाल दी.

पहली प्रतिक्रिया शायद किसी बच्चे की थी. लिखा था‘राजा बदरंगा है.’

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तानाशाह—दो

बड़े तानाशाह के संरक्षण में छोटा तानाशाह पनपा. मौका देख उसने भी हंटर फटकारा—‘सूबे में वही होगा, जो मैं चाहूंगा. जो आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे राष्ट्रद्रोह की सजा मिलेगी.’ हंटर की आवाज जहां तक गई, लोग सहम गए. छोटा तानाशाह खुश हुआ. उसने फौरन आदेश निकाला—‘गधा इस देश का राष्ट्रीय पशु है, उसे जो गधा कहेगा. उसे कठोर दंड दिया जाएगा.’
आदेश के बाद से सूबे में जितने भी गधे थे सब ‘गदर्भराज’ कहलाने लगे. उन्हें बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी गई. कुछ गधे तो फूल कर कुप्पा हो गए. वे मौके-बेमौके जहां-तहां दुलत्ती मारने लगे. पूरे सूबे में अफरा-तफरी मच गई. कुछ दिनों के बाद छोटे तानाशाह ने एक भाषण में कहा—‘पिछली सरकारें, इतने वर्षों में कुछ नहीं कर पाई थीं. हमनें आने के साथ ही ‘गधा’ को ‘गदर्भराज’ बना दिया. इसे कहते हैं—‘सबका साथ—सबका विकास.’
भक्त-गण जय-जयकार करने लगे. ठीक उसी समय गधों का एक रेला आया. लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए. अकस्मात एक गधा मंच के पीछे से आया और छोटे तानाशाह को एक दुलत्ती जड़ दी. छोटा तानाशाह जमीन बुहारने लगा.

‘इसे समझा देना. हर गधा, ‘गधा’ नहीं होता. कहकर वह वहां से नौ-दो ग्यारह हो गया.

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मंत्रबल

बैठे-ठाले

संघ के सिद्धपुरुष का मंत्र द्वारा चीन के छक्के छुड़ाने का बयान सुन, एक उत्साही पत्रकार उनके दरबार में जा धमका—

सर! यदि मंत्रजाप द्वारा दुश्मन की कमर तोड़ी जा सकती है तो परमाणु बम बनाने के लिए अरबों रुपये खर्च करने की क्या आवश्यकता है?’

हट बुड़बक!’ सिद्धपुरुष का चेहरा तमतमा गया. आंखें लाल पड़ गईं, ‘कलयुगी पत्रकार, सच को कभी समझ ही नहीं सकते. नारदजी होते तो अभी दूध का दूध, पानी का पानी कर देते.’

पत्रकार सहम गया. दैवी प्रेरणा से धीरेधीरे सिद्ध पुरुष का कोप शांत हुआ, बोले—

सुनो! एक बार की बात है. हनुमानजी गंधमादन पर्वत पर विश्राम कर रहे थे. तब संत पुरुषों का रेला उनके पास पहुंचकर विनती करने लगा—‘महाराज, देश के उत्तरपश्चिम में असुर दुबारा सिर उठाने लगे हैं. ऋषिगण परेशान हैं. असुर यज्ञादि को खंडित कर राम कार्य में बाधा पहुंचाते हैं.’

रामकाज में बाधा!’ सुनते ही हनुमानजी लालभभूका हो गए. वे बुढ़ा भले गए थे. लेकिन बल और तेज ज्यों का त्यों था. सो उन्होंने गदा उठाई और उत्तरपश्चिम दिशा में चला दी. गदा गिरते ही धरती थर्रा गई. बबंडर आसमान तक छा गया. जोर का धमाका हुआ….’

कहतेकहते सिद्धपुरुष कुछ पल रुके. फिर बोले—‘कुछ समझे या कंपलीटली लालभुझक्कड़ टाइप पत्रकार हो. चलो हम ही बताए देते हैं—जहां वह गदा जाकर गिरी वह स्थान था—पोखरण और तारीख थी, 18 मई 1974.

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तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमनचैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’

आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगाफसाद, चोरी चकारी, लूटमार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना पसंद नहीं करते.’ तानाशाह खुष हुआ. उसने अधिकारी को ईनाम दिया. कुछ दिनों के बाद एक गुप्तचर ने तानाशाह को खबर दी—‘लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है सर!’

तानाशाह को एटमबम से इतना डर नहीं लगता था, जितना लोगों के सोचने से. परंतु डर सामने आ जाए तो तानाशाह कैसा—

आदमी हैं तो दिलोदिमाग दोनों होंगे.’ तानाशाह ने लापरवाही दिखाई. गुप्तचर के जाते ही तानाशाह ने अधिकारी को तलब किया—‘हमें खबर मिली है कि लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है. लोग जरूरत से ज्यादा सोचें, यह हमें हरगिज पसंद नहीं है.’

आदेश दें तो सबको जेल में डाल दूं. चार दिन भीतर रहेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी.’

नहीं, तुम उनसे बस इतना करो कि जैसे हम हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, वे भी केवल हमारे बारे में सोचें.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. कुछ दिन के बाद गुप्तचर फिर हाजिर हुआ.

सर! लोग कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं.’

हमारे बारे में ही सोचते हैं न.’ तानाशाह हंसा. मानो गुप्तचर का मखौल उड़ा रहा हो.

जी, बस आप ही के बारे में सोचते हैं.’

हम उनके भाग्यविधाता जो ठहरे.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. गुप्तचर की आगे कुछ कहने की हिम्मत न हुई. वह चलने को हुआ. सहसा पीछे से तानाशाह ने टोक दिया—

जरा बताओ तो वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं?’

जीमैंने लोगों को कहते सुना है….’

रुक क्यों गए, जल्दी बताओ?’

सब यही कहते हैं कि तानाशाह बुरा आदमी है.’

तानाशाह का चेहरा सफेद पड़ गया. हंटर हाथ से छूट गया. सहसा वह चिल्लाया—‘हरामखोरों को जेल में डाल दो. मैंने कहा था, मुझे सोचनेसमझने वाले लोग नापसंद हैं. सबको जेल में डाल दो.’

आजकल वह पागलखाने में है.