‘यदा-यदा हि धर्मस्य….धरा पर जब-जब दुर्जन, दुराचारी बढ़ेंगे, भले लोग छले जाएंगे…मैं अवतार लेकर सज्जनों का उद्धार करने आऊंगा…’ ईश्वर ने गीता में कहा था, लिखा नहीं था. जिसने लिखा, उसने लिखने के बाद कभी उससे जिक्र तक नहीं किया. आरती, प्रसाद, भोग, घंटा-ध्वनि, पूजा-अर्चना, नाम-जप, जय-जयकार और अमरलोक-सुंदरी लक्ष्मी के संगवास में ईश्वर के दिन पलक झपकते हवा हो जाते.
एक दिन एक परेशानहाल भक्त ने ईश्वर को उसके ‘वचन’ की याद दिला दी. उस शाम पुजारी पहुंचा तो ईश्वर ने अपना गुस्सा जता दिया— ‘लोगों ने मेरे उपदेश की पुस्तक छाप डाली और तुमने मुझे बताया तक नहीं…!’
‘प्रभो, वह अनर्थ तो आपके चहेते वेदव्यास ने किया था. कहें तो उसे स्वर्ग से बुलवाने का इंतजाम करूं?’
‘क्या किसी युद्ध में हमने वचन दिया था कि जब-जब धरती पर दुराचार…?’
‘बिलकुल-बिलकुल…वह तो आपका लाजवाब उपदेश है, घर-घर में पढ़ा-सुना जाता है. मैंने तो उसकी कैसेट भी मंगवा रखी है…’ पुजारी जोश में बोलता चला गया, तभी वह संभला—
‘आज अचानक आपको गीता की याद कैसे आ गई?’
‘आज एक भक्त ने बताया कि धरती पर अत्याचार बहुत बढ़ चुके हैं. पुजारियों ने धर्म को धंधा बना लिया है. भोग के नाम मोटा चढ़ावा खुद हड़प लेते हैं. धर्म के नाम पर वे लोगों को लड़वाते हैं. कथावाचक खुद को भगवान घोषित कर हैं. उनके आश्रम काले धन को पचाने का ठिकाना बन चुके हैं…कोई किसी की सुनता तक नहीं है. मुझे लगता है कि मेरे अवतार लेने का यही उचित समय है…’
पुजारी की आंखें चमकीं, बुझीं फिर चमकने लगीं— ‘स्वामी, आपकी सेवा में कोई बाधा न आए, इसलिए मैंने आजन्म ब्रह्मचारी रहने का प्रण लिया था. आप कुछ दिन रुकें, तब तक मैं कोई गरीब ब्राह्मणी ढूंढे लेता हूं…’
‘इससे पहले मैंने ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर ही जन्म लिया है. इस बार मैं परंपरा को तोड़ना चाहता हूं,…मैंने फैसला किया है कि आज दिन में जो भक्त आया था….’
‘आप एक मलेच्छ के घर जन्म लेंगे?’ पुजारी को धक्का लगा.
‘वह भी तो हमारी ही सृष्टि का है. ईमानदार है, भला और मेहनती भी है, दूसरों पर हमेशा उपकार करता है….उसके घर जन्म लूंगा तो उसकी सातों बेटियां अच्छे घरों में ब्याह दी जाएंगी, जिनके दहेज के लिए वह रात-दिन परेशान रहता है…’
‘उसकी बेटियां तो ब्याह दी जाएंगी, मगर आपके सारे मंदिर सूने पड़ जाएंगे…कोई सच्चा भक्त उनकी ओर झांकेगा तक नहीं. यह तो एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा धंधा है. सोच लीजिए, आपको क्या चाहिए…अपना भविष्य या उस आदमी का कल्याण….’
‘तुम मुझे धमकी दे रहे हो?’
‘सिर्फ आईना दिखा रहा हूं…आप हमारे उपकार को पल-भर में भुला देना चाहते हैं.’
‘कैसा उपकार?’ ईश्वर की जुबान लड़खड़ाने लगी थी.
‘हजारों-लाखों वर्ष से आप स्वर्ग में हैं. इतने वर्षों में यहां आपका एक भी मंदिर बना. जबकि धरती पर लाखों मंदिर-मस्जिद और दूसरे किस्म के धर्मालय हैं. जानते हैं क्यों! इसलिए कि आदमी खुद कहीं नहीं जाता, उसको बुलाया जाता है. इसके बदले यदि पुजारी आपके चढ़ावे का कुछ हिस्सा अपने पास रख लेता है तो आपका क्या जाता है….पेट तो हमारे भी हैं.’
ईश्वर प्रतिक्रिया में कुछ कहे उससे पहले ही किबाड़ की ओट में खड़ी उसकी पत्नी ने हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया—
‘स्वामी! आप ये क्या उल्टा-सीधा सोचते रहते हैं. जरा सोचिए, आप तो अवतार लेकर धरती पर चले जाएंगे, पीछे मेरा क्या होगा…?’ ईश्वर-पत्नी ने होठों पर कंटीली मुस्कान, जो उसने नरकवास कर रही एक अभिनेत्री से कड़ी मेहनत के बाद सीखी थी, के साथ अपनी बाहें पति के गले में डाल दीं. अब ईश्वर को तो पिघलना ही था.
ओमप्रकाश कश्यप

झूठ का सच

August 25, 2009

बाजार से गुजरते हुए कुत्ते की नजर दुकान में टंगे एक चित्र पर पड़ी तो गढ़ी की गढ़ी रह गई. उसके लिए उसकी कुतिया दुनिया की सबसे खूबसूरत मादा थी. सड़क पर चलते समय वह दोपाया मादाओं को रोज ही देखता. उनके पुते हुए चेहरे देख उसे हंसी आने लगती. निश्चय ही उनमें कुछ सुंदर भी रही होंगी. मगर पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था.

कुत्ते का मन चित्र में मौजूद स्त्री की ओर खिंचता चला गया. सिल्क की महंगी साड़ी, मंगलसूत्र, चेहरे पर दीप्ति. मनमोहिनी मुस्कान लिए वह ममतामयी मेज के चारों ओर बैठे अपने पति और बच्चों को खाना परोस रही थी. सामने थीं— तरह-तरह के व्यंजनों से भरी चमचमाती प्लेटें, फूली-फूली चपातियां. जीवन का सारा सौंदर्य मानो उस कमरे में समाया हुआ था.

‘वाह! यह सचमुच देवि अन्नपूर्णा है…’ कुत्ते के मुंह से बरबस निकला.

उस चित्र को वह घंटों तक एकटक निहार सकता था. तभी दुकानदार डंडा लेकर पहुंच गया. उसके बाद तो भूख उसे घंटों तक दौड़ाती रही. इस बस्ती से उस बस्ती, एक घर से दूसरे घर तक. लेकिन चित्र में मौजूद स्त्री का वह सुंदर, मुस्कुराता हुआ चेहरा उसके जहन में बना रहा.

कई घरों से दुत्कारे जाने के बाद किसी एक से एकाध टुकड़ा या रोटी मिलती. भूख को थोड़ा ढांढस बंधता. लेकिन दूसरा टुकड़ा जब तक हाथ लगता, आंतें पहले टुकड़े को पीसकर अवशिष्ट में बदल चुकी होतीं. भूख फिर से तांडव करने लगती. जीवन की इस विडंबना पर वह बार-बार अफसोस करता रहा. शहर के एक कोने में खर-पतवार की तरह उग रही बस्ती से गुजरते हुए एक स्त्री को सामान का थैला उठाकर तेज कदमों से गली से गुजरते देख, अचानक वह चौंका—

‘अरे, यह तो वही है.’ वह स्त्री के पीछे दौड़ने लगा. आमतौर पर उसके कदम घर की चौखट पर पहुंचकर थम जाया करते थे. मगर सम्मोहन में बंधा वह बैठक तक चला गया. वहां टंगे चित्र को देख उसका रहा-सहा संदेह भी जाता रहा. तभी दो छोटे-छोटे, दुबले, अधनंगे बच्चे स्त्री से चिपट गए. उन्हें संभालने की कोशिश करती अचानक वह पलटी तो कुत्ते को वहां देख हड़बड़ा उठी. उसके चेहरे पर थकान और पीड़ा के चिह्न थे. हैरान कुत्ता चित्र से उसकी तुलना करने लगा—

‘तुम वही हो न!’ कुत्ते ने चित्र की ओर इशारा किया.

‘गलत, वह मेरा झूठ है…’ कुत्ते को इतनी बारीक बात सुनने का अभ्यास न था—

‘क्या तुमने जानबूझकर वह चित्र खिंचवाया था, ताकि वर्तमान से आंखें चुरा सको?’

‘उन दिनों मैं मा॓डल थी. चित्र खिंचवाने के बदले मुझे ढेर सारे पैसे मिले थे.’

‘दिखाई तो नहीं देता…!’ कुत्ते ने उस छोटे, सीलन-भरे कमरे में नजर घुमाई. दीवारों का प्लास्टर उखड़ने लगा था. स्त्री पत्थर-शिला बनी रही—

‘यही हकीकत है. मा॓डलिंग की दुनिया में झूठ को सच दिखाना पड़ता है. इतनी कुशलता के साथ कि देखने वाले सौ फीसदी झूठ को एक सौ दस फीसदी सच मानने को बाध्य हो जाएं. फिर भी मेरे लिए वे हवा के पंखों पर सवार होकर उड़ने के दिन थे. यह जानने की समझ कहां थी कि झूठ की चमक-दमक के बीच जो रिश्ते बनते हैं, वे भी झूठे ही होते हैं…’

बड़ी-बड़ी बातें कुत्ते के सिर के ऊपर से गुजर जाती थीं. वह उन्हें समझने का प्रयास ही कर रहा था कि छोटा बच्चा रोने लगा. स्त्री उसको चुप कराने में जुटी तो कुत्ता वहां से खिसक लिया.

ओमप्रकाश कश्यप

अपने-अपने सफर पर जाते पादरी, मौलवी और पुजारी को एक तिराहे ने आपस में मिला दिया. आपसी संवाद की संभावना न होने के कारण तीनों बचकर निकल जाना चाहते थे. मगर रास्ता कौन दे! जान-बूझकर आड़ा हो जाने की हेठी कौन कराए—यानी बात फंस गई. त्रिभुज के तीन कोनों की तरह तीनों एक जगह खड़े के खड़े रह गए.
मुंह में राम-राम बगल में छुरी, तीनों ने यह कहावत अपने-अपने मजहब के अनुसार सुनी थी. राम जाने तीनों उस समय सचमुच मुस्कराए या मुस्कराने का सिर्फ नाटक ही किया. उस समय कुत्ता चौराहे पर ऊंघ रहा था. सामने बोर्ड पर लिखा था, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. वह पीछे हटता चला गया.
‘ईश्वर महान है!’ पुजारी ने वार्ता का शंखनाद किया.
‘बिलकुल सही फरमाया, श्रीमान! तभी तो बाइबिल में उसे परमपिता कहा गया है.’ पुजारी ने तत्काल जोड़ दिया. ‘परमात्मा दयालु भी है.’ ‘वाल्लाह! क्या बात कही, एकदम दुरस्त. कुरआन शरीफ में यही तो लिखा है. इस्लाम खुद इंसानियत पर अल्लाह का करम है.’ इस बार मौलवी आगे आ गया.
पुजारी सोच में पड़ गया. दोनों ने अपने-अपने आराध्य का नाम लिया था. उसके सामने समस्या थी कि अनगिनत देवी-देवताओं में से वह किसका नाम ले! हजारों धर्मग्रंथों में से किसे खास ठहराए.
‘परमात्मा बहुत शक्तिशाली है.’ काफी सोचकर पुजारी ने कहा. उसके सभी देवी-देवताओं के हाथों में हथियार थे. पुजारी को उम्मीद थी कि इस तर्क से वह अपने विरोधियों को चुप कर सकता है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
‘तभी तो वह इतनी बड़ी कायनात को संभाले रहता है. चांद-तारे सब खुदा के इशारे पर नाचते हैं.’ देर तक ऐसे ही बातचीत होती रही. एक भी बार पुजारी उनसे अपने मन की बात न कहलवा सका.
‘परमात्मा को अपनी आलोचना पसंद है. वह परमविवेकवान है. ’ पुजारी झुंझलाकर बोला. इस बार मौलवी और पादरी दोनों चुप पड़ गए. बिना प्रतिक्रिया दिए दोनों एक ओर हट गए. पुजारी जीत का एहसास लिए आगे बढ़ गया. लेकिन थोड़ी दूर जाते ही उसका मन पछतावे से भर गया. लगा कि उससे कुछ गलती हुई है. पुजारी की आखिरी बात पर कुत्ते का मन ताली बजाने को हुआ था. लेकिन उसको दुःखी देख कुत्ते की बुद्धि भी चकराने लगी.
उस घटना को अर्सा बीत चुका है. पुजारी जोर-जोर से आरती गाता है. पूरी ताकत समेटकर मंदिर के घंटे को बजाता है. ताकि दिमाग की नसें सुन्न हो जाएं. ताकि उस दिन जो शब्द जोश में उसके मुंह से निकले थे, वे फिर कभी याद न आएं. कुछ ऐसा ही या शायद कुछ अलग तरीके से उसके विरोधी भी करते हैं. जो परमविवेकवान है, वह अपनी आलोचना से क्यों घबराएगा—यह सोचकर कुत्ता धर्माचार्यों के अवसाद पर हैरान हो जाता है.
ओमप्रकाश कश्यप

दूरदृष्टि

August 21, 2009

महाभारत-कथा के अंतिम सर्ग तक सुनते-सुनते कुत्ता अचानक चौंक पड़ा, सोचने लगा—आखिर कोई तो बात होगी जो धर्मराज युधिष्ठिर समेत सारे पांडव हिमालय पर एक-एक कर गलते चले गए. स्वर्ग-द्वार पर सशरीर दस्तक देने वाला वाला प्राणी एक कुत्ता था. उसका पूर्वज. धर्म का देवता. कितना महान होगा वह. लेकिन आदमी है कि सिर्फ पांडवों का गुणगान करना है. श्वान-देवता को पूछता तक नहीं. दुनिया में बने हजारों-लाखों मंदिरों में श्वान-देवता का एक भी मंदिर नहीं…यह आदमी की कृतघ्नता नहीं तो और क्या है!
‘आदमी के संपर्क में रहकर कुत्तों ने सिर्फ खोया है.’ सोचते हुए कुत्ते ने श्रद्धावनत होकर अपने उस पुरखे को नमन कर तत्क्षण प्रतीज्ञा की, ‘मैं अपने पूर्वज, महान श्वान-देवता को उनका सम्मान वापस दिलाकर रहूंगा.’
दूसरे दिन कुत्ते ने श्वान देवता की प्रतिष्ठा के लिए जंगल में एक सभा का आयोजन किया गया. सम्मेलन में दूर-दूर से कुत्ते आए. सभी एक स्वर में श्वान-देवता का प्रशस्ति-गायन करने लगे. बार-बार तालियां बज रही थीं. तभी दो चोटीधारी वहां से गुजरे और सभा की कार्रवाही देखने के लिए खड़े हो गए. एक की चोटी में सात गांठें थीं, दूसरे की चोटी में मात्र एक. एक गुरु था, दूसरा चेला.
‘हमें भी अपने श्वान-देवता का मंदिर बनाना चाहिए…’ सुझाव आया. जोरदार तालियां बजीं. सुझाव ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया गया.
‘सुझाव तो ठीक है, लेकिन मंदिर का पुजारी कौन बनेगा?’ एक कुत्ते ने समस्या रखी. इसपर सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे.
‘श्वान-देवता की सेवा का अवसर अगर मुझे मिल जाए तो बहुत उपकार होगा…’ एक कोने से तेज आवाज उठी. कुत्तों का ध्यान दोनों चोटीधारियों की ओर चला गया. सभा में खुसर-पुसर होने लगी. फिर यह सोचकर कि जब तक कुत्तों में से कुछ पुजारी का काम सीखें, तब तक आदमी को पुजारी बनाने में कोई हर्ज नहीं है. दोपाया यदि कुत्ता-मंदिर का पुजारी बनेगा तो बाकी जानवरों की अलग मंदिर बनाने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी.
‘क्या तुम श्वान-देवता के मंदिर का पुजारी बनने को तैयार हो?’ सभा के अध्यक्ष ने पूछा.
‘मैं तो जन्मजात पुजारी हूं, जिजमान! मंदिर में मूर्ति हो या नहीं, अगर है तो किसकी है! यह मैं कभी नहीं सोचता.’ लंबी चोटी वाला बोला.
‘गुरुदेव? क्या अब हमें एक कुत्ते को देवता मानकर पूजना पड़ेगा?’ चेला असमंजस में था.
‘धरती पर तैंतीस करोड़ देवता है, एक और बढ़ जाए तो क्या फरक पड़ता है!’ गुरु ने उत्तर दिया. फिर चेले को सोचने का अवसर दिए बिना बोला—
‘यह मत सोच कि मूर्ति किसकी है. यह सोच कि आज कुत्ते का केवल एक मंदिर है. कल को दूसरा बनेगा. उसके बाद और भी बनेंगे. एक दिन धरती पर कुत्तों के हजारों मंदिर बन जाएंगे. उस समय उन सबका महंत कौन बनेगा? वही, जो सबसे पुराने मंदिर का पुजारी होगा…है कि नहीं?’
चेला गुरु की दूरदृष्टि के आगे नतशिर हो गया.
- ओमप्रकाश कश्यप

जंगल से गुजरते कुत्ते का सामना लोमड़ी से हुआ तो वह चकरा गया. कारण था, लोमड़ी का बदला हुआ रूप. माथे पर तिलक, गले में रुद्राक्ष माला, कंधों पर रामनामी दुपट्टा. वह लोमड़ी के स्वभाव को जानता था. बात-बात में झूठ बोलना, कदम-कदम पर धोखा देना उसकी आदत थी. यह काम वह बिना किसी झिझक, बिना लोक-लिहाज के करती. इसी में अपना बड़प्पन समझती थी. कुत्ते का हैरान होना स्वाभाविक था—
‘राधे-गोविंदम्, राधे-गोविंदम्…इस नाम में बड़ा सुख है, अनुपम आनंद…मेरे साथ-साथ तुम भी भजो, राधे-गोविंदम्…राधे-गोविंदम्…!’ लोमड़ी नाचने लगी.
‘अचानक यह परिवर्तन कैसे हुआ दीदी? क्या जंगल में घूमते-घामते कृष्ण-मुरारी के दर्शन हुए थे?’ कुत्ते ने पूछा.
‘राधे-गोविंदम्, राधे-गोविंदम्…कृष्ण-मुरारी तो मेरे हृदय में बसे हैं.’ लोमड़ी ने अपने दिल की ओर इशारा किया और आगे बढ़ गई. कुत्ता पीछे-पीछे चलने लगा. थोड़ी दूर जाने पर एक सियार दिखाई पड़ा. उसके मुंह में मांस का टुकड़ा था. लोमड़ी की लार टपकने लगी. कुत्ता पेड़ की ओट में छिप गया.
‘राधे-गोविंदम्, राधे-गोविंदम्…सियार भाई क्या आपको अपने प्राणों की जरा-भी चिंता नहीं है?’
‘क्या हुआ, बहन?’
‘दस दिन का भूखा शेर सर्कस से छूटकर जंगल में घूम रहा है. मुझपर तो मेरे गोविंदजी का आशीर्वाद है, इसीलिए कुछ बिगाड़ नहीं सकता. मगर आप सोच लीजिए, जिस प्राणी ने दस दिन से कुछ खाया-पिया न हो, उसकी क्या हालत होगी…’ सियार के पैर उखड़ गए. उसके जाते ही लोमड़ी ने मांस का टुकड़ा उठा लिया, जो सियार के मुंह खोलते ही जमीन पर जा गिरा था.
मांस खाने के बाद लोमड़ी ने डकार ली और आराम के लिए पेड़ के नीचे लेट गई. तभी भालू वहां से गुजरा. लोमड़ी को आराम फरमाते देख वह बराबर में बैठ गया—
‘मैं तो तुमसे परमात्मा के बारे में दो अच्छे बोल सुनने आया था. पर लग रहा कि बहुत थकी हुई हो?’
‘जंगल पर कोई कष्ट न आए, इसलिए तीर्थयात्रा पर गई थी. तीन दिन, तीन रात तक लगातार चलती रही…’
‘अरे, पहले क्यों नहीं बताया…मैं अभी तुम्हारे पैर दबाए देता हूं.’ भालू खुशी-खुशी बोला.
‘तुम्हें यह सब करने की क्या जरूरत है?’
‘मौंसी तुम पूरे जंगल की फिक्र करती हो, क्या मैं तुम्हारी जरा-सी सेवा भी नहीं कर सकता.’ कहकर भालू लोमड़ी के पैर दबाने लगा. थोड़ी देर बाद उसे नींद ने आ घेरा तो भालू वहां से उठकर चल दिया. उसके जाते ही कुत्ता वहां पहुंचा. कुत्ते को देखकर लोमड़ी ने आंखें खोल दीं, बोली—
‘तुमने पूछा था, यह परिवर्तन कैसे हुआ. तो सुनो. पहले पेट भरने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी. फिर भी पेट कभी भरता था, कभी नहीं. किसी के मुंह का निवाला छीनो तो वह पूरे जंगल में बदनाम कर देता था. अब वह बात नहीं है. जंगल के जानवर देखते ही अभिवादन करते हैं. शेर यह कहकर शिकार छोड़ देता है कि पहले मैं खा लूं….धोखा देने, झूठ बोलने पर अब पहले जैसी बदनामी नहीं होती. जानते हो, यह सब किसकी बदौलत संभव हुआ है, इनकी…’ लोमड़ी ने अपने दुपट्टे और कंठमाल की ओर इशारा किया—
‘मेरे लिए तो यही मेरे कृष्ण-मुरारी हैं. मेरी मानो तुम भी ऐसा ही कुछ कर लो…बाकी जिंदगी मजे लूटोगे.’
कुत्ता चुपचाप वापस बस्ती की ओर लौट पड़ा.
ओमप्रकाश कश्यप

आक्रोश

August 18, 2009

शाम का समय. कुत्ता घूमता हुआ बस्ती के बाहर आया और रास्ते में एक झोपड़ी को देख ठिठक गया. झांककर देखा तो भीतर, हाथ में झाड़ू लिए एक बुढ़िया गुस्से से लाल-पीली हो रही थी—
‘आ, तू भी आ मुंह झौंसे, तुझे भी देखूं!’ बुढ़िया कुत्ते को देखते ही बरस पड़ी.
कुत्ता पीछे हटा, पर जिज्ञासा बनी रही. कुछ क्षण पश्चात दरवाजा ठेलकर फिर भीतर झांकने लगा—
‘बहुत गुस्से में है माई, किसी से लड़ रही थी?’ कुत्ता ने विनम्र रहने का भरसक प्रयास किया.
‘क्यों, तुझे क्या?’
‘गुस्सा थूक दे माई. किसी ने तुझे सताया हो तो बता, मैं अपने पैने दांतों से उसको नंगा करके भरी भीड़ में खींचता हुआ ले जाऊंगा.’ सहानुभूति ने रंग जमाया. बुढ़िया नरम पड़ने लगी—
‘दुनिया से तो निपट लूं, लेकिन जब ऊपरवाला ही दगा करने लगे कहां जाऊं!’
‘ऊपरवाला! क्या तुम ईश्वर के बारे में कह रही हो?’
‘हां, मरा वही आया था, पर मैंने झाड़ू मारकर भगा दिया.’ ‘भगा दिया…ईश्वर को भगा दिया?’ कुत्ते को लगा कि बुढ़िया का दिमाग फिर गया है.
‘बचपन से ही उसे पूजती हुई आ रही हूं. पहले उसको भोग लगाती, बाद में मुंह जूठा करती. जब जवान हुई तो सुंदर-संपन्न वर के लिए पूजती रही. ससुराल आई तो यहां ऐसा कुछ भी नहीं था. फिर भी घर की खुशहाली, पति और बच्चों के सुख-शांति के लिए पूजा-पाठ करती रही. मगर गरीबी की किच-किच से कभी बाहर न आ सकी. ऊपर से भरी जवानी में वैधव्य ओढ़ लिया. उसको किस्मत का लेखा मानकर सहने की कोशिश कर ही रही थी कि पिछले वर्ष एक दुर्घटना में बेटा-बहू भी साथ छोड़कर चलते बने. मेरा ईश्वर से विश्वास उठने लगा. फिर भी मन के किसी कोने में आस बनी रही कि उसके घर में देर है, अंधेर नहीं…भगवान ने जो मेरे लिए नहीं किया, वह मेरे पोते के लिए जरूर करेगा. मेरी पूजा अकारथ नहीं जाएगी. लेकिन आज….!’
‘आज क्या हुआ माई?’
‘‘मैं आंखों की अंधी, अकेली…दाने-दाने को मोहताज. चार साल के बच्चे को लेकर जैसे-तैसे दिन काट रही हूं. ले-देकर जमीन का एक टुकड़ा है. उस पर भी जमींदार दांत गढ़ाए बैठा है. मैं न्याय के लिए ईश्वर के आगे डकरा रही थी, आज वह आया भी तो कहने लगा कि जमींदार के जुर्मों का हिसाब तो उसके अगले जन्म में ही संभव है.’
‘तब तक हम दोनों क्या करें?’ मैंने पूछा था.
‘सब्र कर माई, पाप का घड़ा भरते-भरते ही भरता है.’ वह बोला.
‘मेरी सारी जिंदगी सब्र करते ही बीती है, तुझे अब भी पाप का घड़ा भरने का इंतजार है…अगर कुछ कर नहीं सकता तो मुझे ही उठा ले?’ मुझे गुस्सा आने लगा था. पर वह बोला—
‘समय से पहले तो मौत भी मेरे हाथ नहीं है.’
तू ही बता, इससे ज्यादा मैं कितना सहती—
‘मुंहझौंसे, न्याय तेरे हाथ में नहीं है, किसी की जिंदगी बचाना तेरे हाथ में नहीं है. और यदि मौत भी तेरे हाथ में नहीं है तो जिंदगी-भर बैठे-बैठे खाता क्यों रहा. शुरू में ही मना कर देता तो मैं कोई दूसरा रास्ता खोज लेती.’ और उसके बाद तो मैं उसपर झाड़ू लेकर पिल पड़ी. आखिर उसे मुंह छिपाकर भागना पड़ा.’’
बुढ़िया की बात सुनकर कुत्ता पहले तो हंसा, मगर अगले ही पल गंभीर हो गया. तभी बुढ़िया का पोता उछलता-खेलता बाहर से आया. कुत्ते को राहत-सी मिली, बच्चे को मन ही मन आशीस देता हुआ वह आगे बढ़ गया.
ओमप्रकाश कश्यप

आडंबर

August 17, 2009

कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी ने सामने से आ रहे संन्यासी को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी. मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी—
‘महाराज! मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं. आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें. मैं जब तक जियूंगी, अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी.’
बकरी की करुण पुकार का संन्यासी पर कोई असर न पड़ा. वह निर्लिप्त भाव से बोला—
‘मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि मैं एक संन्यासी हूं. जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे. हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है. समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है. यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा…’
‘मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे…’ बकरी रोने लगी. ‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले. याद रख, मृत्यु नए जीवन का द्वार है. सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं, मोह माया से उपजता है. माया विकारों की जननी है. विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं…’
बकरी निराश हो गई. संन्यासी के पीछे आ रहे कुत्ते से रहा न गया, उसने पूछा—‘महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं?’
‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा. सुंदर पत्नी, भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी. बेशुमार जमीन-जायदाद…मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया. सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर…जैसे कीचड़ में कमल…’ संन्यासी डींग मारने लगा.
‘आप चाहें तो बकरी की प्राणरक्षा कर सकते हैं. कसाई आपकी बात नहीं टालेगा.’
‘मौत तो निश्चित ही है, आज नहीं तो कल, हर प्राणी को मरना है.’ तभी सामने एक काला भुजंग नाग फन फैलाए दिखाई पड़ा. संन्यासी के पसीने छूटने लगे. उसने कुत्ते की ओर मदद के लिए देखा. कुत्ते की हंसी छूट गई.
‘मृत्यु नए जीवन का द्वार है…उसको एक न एक दिन तो आना ही है…’ कुत्ते ने संन्यासी के वचन दोहरा दिए.
‘मुझे बचाओ.’ अपना ही उपदेश भूलकर संन्यासी गिड़गिड़ाने लगा. मगर कुत्ते ने उसकी ओर ध्यान न दिया.
‘आप अभी यमराज से बातें करें. जीना तो बकरी चाहती है. इससे पहले कि कसाई उसको लेकर दूर निकल जाए, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना है…’ कहते हुए वह छलांग लगाकर नाग के दूसरी ओर पहुंच गया. फिर दौड़ते हुए कसाई के पास पहुंचा और उसपर टूट पड़ा. आकस्मिक हमले से कसाई के औसान बिगड़ गए. वह इधर-उधर भागने लगा. बकरी की पकड़ ढीली हुई तो वह जंगल में गायब हो गई.
कसाई से निपटने के बाद कुत्ते ने संन्यासी की ओर देखा. वह अभी भी ‘मौत’ के आगे कांप रहा था. कुत्ते का मन हुआ कि संन्यासी को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाए. लेकिन मन नहीं माना. वह दौड़कर विषधर के पीछे पहुंचा और पूंछ पकड़कर झाड़ियों की ओर उछाल दिया, बोला—
‘महाराज, जहां तक मैं समझता हूं, मौत से वही ज्यादा डरते हैं, जो केवल अपने लिए जीते हैं. धार्मिक प्रवचन उन्हें उनके पापबोध से कुछ पल के लिए बचा ले जाते हैं…जीने के लिए संघर्ष अपरिहार्य है, संघर्ष के लिए विवेक, लेकिन मन में यदि करुणा-ममता न हों तो ये दोनों भी आडंबर बन जाते हैं.’
ओमप्रकाश कश्यप

क्रीतदास

August 15, 2009

ईश्वर बदल चुका है. अब वह अपनी चिंता पहले से ज्यादा करता है. भक्त का मन देखने, उसकी भावना को सम्मान देने से अधिक वह चढ़ावे पर नजर रखता है. चढ़ावा अच्छा और भक्त की जेब भारी हो तो ईश्वर खुद चलकर भक्त के दरवाजे तक चला आता है.
‘ईश्वर मालदार के लिए उसके खूंटे पर बंधी गाय है.’ कुत्ता चलते-चलते निष्कर्ष पर पहुंचा. रास्ते में मंदिर पड़ा. रोज पुजारी मंदिर की जूठन उसके आगे डाल दिया करता था. इस लालच में वह भी उस ओर बरबस खिंचा चला आता था. मगर उस दिन प्रसाद को सूंघने तक का मन न हुआ. जैसे ही वह आगे बढ़ा, पीछे से पुजारी चीखा—
‘मूर्ख, भगवान के प्रसाद को छोड़कर जा रहा है.’
‘आज मन नहीं है.’ कुत्ते ने बिना मुडे़ कहा.
‘जानता नहीं कि प्रसाद को छोड़कर जाना पाप है.’
‘गाय को खिला दीजिएगा…बेमन से खाना भी पुण्य नहीं है.’ पुजारी कुत्ते को गालियां देने लगा. कुत्ता आगे बढ़ गया. सामने से ईश्वर आता हुआ दिखाई दिया. कुत्ते का उससे पहले कभी सामना नहीं हुआ था. इसलिए स्वभाव के अनुकूल वह उसपर भौंकने लगा.
‘पहचाना नहीं, मैं ईश्वर हूं…’
‘अच्छा, किस सेठ की ड्योढ़ी से आ रहे हैं?’ कुत्ते को मजाक सूझा.
‘सरपंच के बेटे का जन्म दिन था. वह मेरा बहुत बड़ा भक्त है.’
‘मैंने कल भी मंदिर से एक छाया को बाहर निकलते था?’
‘मैं ही था. कल एक सेठ की बेटी का विवाह था. यह मंदिर उसी ने बनवाया है. याद किया तो आशीर्वाद देने चला गया.’
‘और उससे पहले….?’
‘ध्यान नहीं है, शायद जमींदार की हवेली में…अरे हां, वहीं गया था, तुमने तो सुना होगा, उसकी पत्नी मेरी कितनी बड़ी पुजारिन है.’
‘उससे पहले किसी बड़े अधिकारी को आशीर्वाद देने गए होंगे?’
‘तुम्हें कैसे पता? उससे पहले मैं दरोगा के घर गया था. सभी जानते हैं, वह कितना बड़ा भक्त है. हर वर्ष भंडारे पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा देता है.’
‘पिछली बार किसी गरीब की झौपड़ी में कब गए थे, जरा याद करके बताइए?’ ईश्वर बगलें झांकने लगा. कुछ देर बाद बोला—
‘मेरे लिए अमीर-गरीब सब बराबर हैं. याद कर महाभारत में क्या लिखा है, मैंने दुर्योधन के महल में छप्पन भोग खाने के बजाय विदुर के घर अलोने साग को महत्त्व दिया था.’
‘ऐसे नाटक तो हिंदुस्तान के नेता रोज ही करते हैं. एक दिन गरीब के घर सो लेने, उसके घर का अलोना साग खा लेने से यदि लाखों-करोड़ों लोगों को, वर्षों तक बुद्धू बनाया जा सके तो कौन यह जादू नहीं करना चाहेगा!’
‘तुम मुझपर इल्जाम लगा रहे हो?’
‘इल्जाम नहीं प्रभो, हकीकत बयान कर रहा हूं. दरअसल आपकी स्थिति भी मुझसे भिन्न नहीं है, जिसके घर ज्यादा भरी थाली की उम्मीद हो, उस ओर हम दोनों ही खिंचे चले जाते हैं. दरअसल हम दोनों ही क्रीतदास हैं…क्रीतदास!’ कुत्ते ने कहा और ईश्वर को असमंजस की अवस्था में छोड़ आगे बढ़ गया. ओमप्रकाश कश्यप

अपराधबोध

August 14, 2009

सड़कछाप कुत्ता मजदूरों, कबाड़ बीनने वाले बच्चों, भिखारियों और फटेहाल आदमियों पर ही क्यों भौंकता है, कोई यह जाने न जाने, कुत्ते को अच्छी तरह मालूम था. पिछली बार वह एक धनी मालिक के बंगले पर रहता था. उसके पास बेशुमार दौलत थी. बड़े-बड़े आदमियों का वहां आना-जाना था. पर न जाने क्यों वह डरता बहुत था. बंगले के चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ लगवाई हुई थी. रात होते ही उनमें करंट छोड़ दिया जाता. कई चौकीदार थे, जिन्हें वह थोड़े-थोड़े दिन बाद बदलता रहता. दरवाजे पर आए हर व्यक्ति को वह संदेह की निगाह से देखता. उसे हमेशा यही लगता कि हर किसी की निगाह उसकी संपत्ति पर है. गरीब, फटेहाल मजदूरों और कबाड़ियों पर दया करने के बजाय वह उनसे बुरी तरह चिढ़ता. पालतू कुत्तों को आदेश था कि ऐसे किसी भी आदमी को दरवाजे के सामने टिकने न दें.
एक दिन न जाने क्या हुआ कि पुलिस के दो जवान धड़धड़ाते हुए बंगले में घुसे और अमीर मालिक को हथकड़ी डालकर ले गए. बंगले पर मोटा सरकारी ताला डाल दिया गया. कुत्ता ‘बेरोजगार’ होकर सड़क पर आ गया. मगर पुराने मालिक ने जो सिखाया था उसका असर बना रहा. गरीब, लाचार, फटेहाल आदमी को संदेह की निगाह से देखना, देखते ही उसपर टूट पड़ना उसका स्वभाव बन गया. मानो वे उसके प्रतिद्विंद्वी हों.
उस दिन कुत्ता सवेरे-सवेरे भोजन की तलाश में गांव की गलियों में घूम रहा था. एक लड़की को कबाड़ के ढेर पर झुके देख उसका माथा ठनका. जवानी की दहलीज पर खड़ी वह लड़की कबाड़ से काम की चीजें छांट रही थी. पीठ पर लटके टाट के थैले की तनियां उसने अपने माथे पर फंसा रखीं थीं. कपड़े जगह-जगह से फटे थे. उनको सीं-गांठकर देह ढकने लायक बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन जगह-जगह लगी थेगड़ियां भी पुरानी होकर गल-फट चुकी थीं. मानो जवान शरीर को ढकने में नाकाम होने पर खुद शर्मिंदा हो रही हों. कुत्ता उसको देख भौंकने लगा. लड़की ने उसकी ओर ध्यान न देकर काम में लगी रही—
‘शायद मुहल्ले में नई-नई आई है. पर मेरी उपेक्षा करके यहां कोई भी टिक नहीं सकता.’ सोचते हुए कुत्ता लड़की के एकदम सामने आकर और जोर से भौंकने लगा. लड़की अपने काम में जुटी रही.
‘कहीं बहरी तो नहीं,’ कुत्ता लड़की के और करीब चला गया. इस बार लड़की ने उसकी ओर देखा. उसकी आंखों में करुणा थी. कुत्ते को इसमें अपनी विजय का एहसास हुआ. वह अपने दांत लड़की के शरीर के एकदम करीब ले गया. मानो काट ही खाने वाला हो. सहसा लड़की का आक्रोश भड़का. वह सीधी हुई. दोनों हाथ माथे की ओर ले जाकर थोड़ी-सी पीछे की ओर घूमी और झोला उतारकर कुत्ते के सामने पटक दिया. फिर अब तक जमा की गई एक-एक वस्तु को फेंकने लगी—
‘तेरे ऊपर मुहल्ले की चौकीदारी का भार है न! तो यह देख, देख…मैंने इस मुहल्ले से क्या-क्या चोरी किया है. यह देख रद्दी कागज, प्लास्टिक के टुकड़े, नेपकिन, लोहे की जंग लगी तार, डिब्बे, कांच की शीशियां, ढक्कन, गला हुआ गत्ता, फटी हुई टोकरी, टाट, पुराने-चिथड़े कपड़े. यह देख, इसका तो मैं नाम भी नहीं जानती, देख इन्हें, और ले जाकर अपने मालिकों को सौंप दे. वे तेरी पीठ थपथपाएंगे. अच्छा-अच्छा खाने को देंगे. नहीं रुक, पकड़ मुझे और अपने नुकीले दांतों से फाड़ डाल मेरी देह को.’ लड़की फट पड़ी और जोर-जोर से रोने लगी. सामने कबाड़ का थैला खुला पड़ा था. कुत्ते ने खुद को इतना लज्जित, इतना मर्माहत इससे पहले कभी महसूस नहीं किया था. ओमप्रकाश कश्यप

निर्मैल्य

August 13, 2009

गंगा स्नान के बाद साधु बाहर निकला तो कुत्ता उसके पीछे-पीछे चल दिया. दोनों काफी दूर निकल गए.
‘वे प्राणी भी कितने अभागे हैं, जो गंगा तट पर आकर बगैर नहाए रह जाते हैं.’ कुत्ते को सुनाते हुए साधु ने अपनी श्रेष्ठता का दंभ भरा. उसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई—
‘वे लोग और भी अभागे हैं, जो पाप धोने के लिए गंगा में उतरते हैं और बाहर निकलते ही दुबारा पाप में लिप्त हो जाते हैं.’
कुत्ते का उत्तर सुनकर साधु भड़क उठा—
‘क्षुद्र प्राणी, तू भला क्या जानेगा. मेरा तो रोम-रोम, बल्कि पूरा जीवन ही पवित्र है. इसमें पाप के लिए स्थान कहां! मेरी साधना के प्रताप से तो अन्य प्राणी भी मेरे संपर्क में आकर पापमुक्त हो जाते हैं.’
‘सिर से पांव तक कीचड़ में लिप्त रहने वाला केंचुआ भी यही समझता है.’
कुत्ते के कटाक्ष पर साधु आग-बबूला होकर चिमट से उसको मारने दौड़ा. कुत्ता हंस पड़ा— ‘अरे…रे, आप तो नाराज हो गए धर्माधिराज! मैंने तो बस यूं ही पूछ लिया था. आखिर जो निष्पाप और पवित्र हो वह हर पखवाड़े गंगा में पाप धोने क्यों जाएगा?’
इस बार साधु से रहा न गया. उसने चिमटा उठाया और कुत्ते का निशाना बांधकर दे मारा. कुत्ता चतुराई से झुक गया. चिमटा सामने से आ रहे फकीर के जा लगा. माथे से निकलती खून की धार को रोकने का प्रयास करता हुआ फकीर वहीं जमीन पर पसर गया.
‘मूर्ख, तेरी वजह से एक भले आदमी को चोट खानी पड़ी है.’ साधु गरजा. कुत्ता पहले ही खुद को अपराधी मान चुका था. उसकी गर्दन झुक गई—
‘मैं अपने अपराध के लिए दंड सहने को तैयार हूं.’ कहते हुए कुत्ते ने खुद को साधु और फकीर के आगे समर्पित कर दिया. फकीर उठकर कुत्ते के पास आया. उसकी पीठ पर हाथ फिराता, प्यार लुटाता हुआ बोला—
‘बेटा, तू निःकलुश और निष्पाप है. पापी तो वे हैं जो अपना अपराध दूसरों के सिर मंडकर भी ऎंठे फिरते हैं. गंगाजल की शीतलता जब इनका क्रोध ही ठंडा न कर सकी तो मन में छिपे मैल को कैसे धो सकती है. यही लोग धर्म और धाराओं को अपवित्र करते हैं.’
साधु की गर्दन लटक गई.
ओमप्रकाश कश्यप