दंश — छ्ठी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

बापू के स्वभाव को लेकर अनेक विचार मेरे दिमाग में आते. प्रायः हर विचार में वह मुझे खलनायक के रूप में दिखाई पड़ता. मन में उसके प्रति घृणा-नफरत जैसा न जाने क्या-क्या चलता रहता. परंतु मां का बापू के प्रति समर्पण मुझे उसके विरुद्ध मुंह खोलने न देता. कभी-कभी यही असमंजस अंतहीन तनाव का कारण बन जाता था. अब आप इसे मेरी कमजोरी कहें या उम्र का प्रभाव, तनाव बहुत देर तक ठहर नहीं पाता था. आदमी दुख को भुलाकर और सुख को बांटकर ही सुखी रह सकता है. यह मैंने किसी स्कूल या का॓लेज में नहीं, जीवन की पाठशाला में सीखा था.
जीवन की पाठशाला! सुनने में बहुत अच्छा लगता है. हकीकत में यह व्यंग्य के सिवा और क्या है. जिंदगी अपने आप में व्यंग्य है….निखालिस व्यंग्य! अगर हंसना भी चाहो तो आंखें नम हो जाती हैं. रोने की हसरत हो तो आंसू तक साथ नहीं देते. फिर भी, सुखमय हो कि दुखमय! समय तो बीतता ही है! और समय के साथ-साथ बीतती जाती है जिंदगी. हास और रुदन से भरी हुई.
जिसे हम परमात्मा कहते हैं. जिसको हम सुख-दुख का दाता, भाग्य-विधाता, जगत्पालक, करुणागार मानते हैं. जो कहा जाता है कि सबका जन्मदाता, संकट के समय सबकी रक्षा करने वाला है, उसके बारे में एक बात बहुत विचित्र है. कम से कम मुझे तो विचित्र ही लगती है. चतुर परमात्मा जब सुख देता है तो अनुभूति को शिथिल कर देता है. आदमी सुख में डूबा….समय की तेज रफ्तार के साथ उनींदा-सा बहा चला जाता है. सुख के खील-बतासे के समान हल्के-फुल्के दिन बिना पंख के हवा में उड़ने लगते हैं. आनंद के एहसास से भीगे, अलसाए-से वर्ष….हौल-हौले, चुपचाप फिसलते हुए चले जाते हैं. नदी-जल से तरल, पवित्र और सतत प्रवाहमान.
दुःख हो तो हमारी अनुभूतियां सहस्रगुनी हो जाती हैं. प्रत्येक पल त्रिशूल जितना पैना और घातक बन जाता है. दिन में सूरज की किरण विषैले कांटों सी चुभती हैं, रात्रि दर्द के अंगारे बरसाती है. परमात्मा जब दुःख देता है तो जीवन के प्रत्येक पल को इतना भारी और बोझिल बना देता है कि सफर दुरूह, जीवन पहाड़ जैसा लगने लगता है. आदमी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर कोई फैसला नहीं कर पाता.
सुखमय जिंदगी, यानी स्वप्नीली रातें…जिनमें समय का एहसास ही न हो…जिनमें आदमी सपनों के उड़नखटोले पर उड़ान भरता, खुशियों के हिंडोले में हर पल झूमता, गाता-सा रहता है. और दुखमय जिंदगी, जिसका हर पल पहाड़ जितना बोझिल होता है. उखड़ी सांसों और लुटी-पिटी धड़कनों के बावजूद, हांफते और कराहते हुए जिसे आदमी को अपनी नंगी पीठ पर ढोना पड़ता है.
बापू और मां दोनों साथ रहते थे….एक ही छत के नीचे सोते. दोनों ने साथ-साथ रहने, खाने-पीने, उठने-बैठने की कसमें खाई हुई थीं. तो भी, दोनों के जीवन में भारी अंतर था.
बापू के लिए जिंदगी मौज थी. मां के लिए बोझ! बापू के लिए जीवन उसकी बपौती था, मां के लिए एक चुनौती. बापू के लिए जीवन का हर पल उसके लिए खिलंदड़ेपन की सौगात था, मां के लिए जिम्मेदारी का एहसास.

*

कैसे बताऊं कि यह मां के जीवन की अंतिम घटना है. बेहद दर्दनाक….पीड़ामयी. ऐसी त्रासदी जिसने हमारे जीवन की धारा ही बदल दी थी. अपनी मामूली खुशियों और भारी-भरकम दुःखों के बीच जो परिवार जीना सीख चुका था, एक ही झटके में वह तिनकों-सा बिखर गया. वक्त की आंधी इन तिनकों को कहां-कहां ले गई, नहीं पता. मां का नियमित पूजा-पाठ निष्फल रह गया. निष्प्रह पति-भक्ति उसका उद्धार न कर सकी. सुबह-शाम की आरती, पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास….सब अनसुने रह गए. जिस जीवन को वह वरदान समझ रही, वह अनायास अभिशाप में बदल गया.
यह सब कैसे हुआ….किसने किया, वह समझ ही न पाई. समझने का मौका भी उसका कब मिल पाया. सुबह से शाम तक परमात्मा-परमात्मा रटना भी मां के किसी काम न आ सका. जीवन में सुख की कमी तो पहले से ही थी. उसकी तो हमें आदत थी. अपने दुःखों को मां चुप रहकर, हम उससे लिपटकर….आंचल में छिप-सिमटकर सह लेते थे. एहसास तक नहीं होता था उसका. मां के प्यार और वात्सल्य सुख के रहते दुःख की तीव्रता और अनिवार्यता भी आज जितनी नहीं थी.
उस दिन शाम होते ही मां को सूचना मिली थी कि बापू हवालात में बंद है. वह रोजमर्रा की-सी खबर, साधारण-सी घटना थी. जो हुआ वह नया नहीं था. अक्सर ऐसा ही होता. सुनकर मां ने चुप्पी साध ली. कैद हो गई थी अपनी ही अंतःकंदराओं में. समेट लिया था अपनी तमाम इंद्रियों को अपने ही भीतर. मानो गूंगी-बहरी, स्वार्थ की मारी दुनिया से बिलकुल कट जाना चाहती हो.
पर इस बार अंधड़ कुछ अधिक कालापन लिए हुए था. चेहरे पर बेचैनी कहीं ज्यादा मारक थी. तकदीर जाने कौन-सा खेल इस बार खेलना चाहती थी. मां शायद उसके गूढार्थ को समझ चुकी थी. तभी वह दुःखी थी. इतनी दुःखी वह पहले कभी नहीं दिखाई पड़ी थी. खबर मिलते ही वह निढाल-सी जमीन पर बैठ गई—अचल-अबोल! हम सब बच्चे मां को घेर कर खड़े हो गए. मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा. पर वह निस्पंद बनी रही. जिंदगी के दुःख-दर्द अकेले झेलने की अभ्यस्त थी वह. पर आज की व्यथा कुछ ज्यादा ही गहरी थी. क्यों गहरी थी, यह परखने की न मुझमें योग्यता थी, न मां से पूछने का साहस.
घंटों बाद कुछ संकेत मिला. इस बार मां को बताया गया था कि नया दरोगा बहुत सख्त है. उसने आने के साथ ही शहर के कई नामी-गिरामी बदमाशों को मार गिराया है. डंडे की जगह गोली से बात करता है. बडे़-बड़ों को वह भीतर कर चुका है. हवालातियों को पीटते समय तो वह पूरा कसाई बन जाता है. मां ने यह सुना तो सहम-सी गई. अनजाना-सा भय उसके चेहरे पर पसर गया. धड़कनें बैठने लगीं….
उसकी आंखें सूखी हुई थीं. मगर भीतर आंसुओं का जो समंदर उमड़ रहा था, पीड़ाओं का जो चक्रवात था, उसकी थाह पाना नामुमकिन था….नामुमकिन ही था. चांडाल थानेदार के कोप से बापू को बचाना जरूरी था. पर कैसे? यह समझ पाना मां की सरल बुद्धि से बाहर था. पूरी रात वह फर्श पर बैठी हुई बापू की प्रतीक्षा करती रही. जरा-सी आहट होते ही झुग्गी के दरवाजे तक दौड़ी चली आती. आंखें फाड़-फाड़ कर गलियारे में ताकती. चेहरे से हवाइयां उड़ रही थीं. पूरी रात मां तो मां, बापू की चारपाई भी उसके घर लौटने का इंतजार करती रही.
पड़ोस के औरत और मर्द बापू के बारे में जानने के लिए आते रहे. हरेक को वह गर्दन हिलाकर ‘ना’ कहती. पर आने वाला मां की चुप्पी से ही सब कुछ ताड़ लेता— दबे पांव वापस लौट जाता. कुछ की सहानुभति बिल्कुल सच्ची थी. पर मां खालिस सहानुभूति का क्या करती! कैसे तोष करती! बार-बार जवाब देने से मां की हालत विक्षिप्तों जैसी हो चुकी थी.
उस रात मां ने सैकड़ों बार अपने आराध्यदेव को टेरा. पचासियों देवताओं से अनगिनत मनौतियां मांगीं. झुग्गी में रहकर जो-जो टोने-टोटके वह कर सकती थी, वे सब सच्चे मन के साथ किए. उदास मन से अंटोक संकल्प भी किए. मां की विचित्र हरकतें देखकर हम कुछ देर तो अपना दुःख भुला देते….बाद में मां की वीरान आंखें हमारे भीतर भी रेगिस्तानी सन्नाटा भर देती थीं. रात जैसे-तैसे बीती. सुबह हुई. परंतु मां की परेशानी अंतहीन थी.
बापू को छुड़ाने की आस लेकर मां जिससे थोड़ी-सी भी उम्मीद थी, उसी के पास फरियाद लेकर पहुंची थी. हर एक के सामने वह रोई. गिड़गिड़ाई. बापू को छुड़वाने के लिए खूब आरजू-मिन्नतें कीं. उस दिन हमारी झुग्गी में चूल्हा न जला. जलाता भी कौन. एक मां ही थी जलाने वाली. उसे अपनी ही सुध न थी. उदास, निस्संवेद, वीरान-सी आंखों से वह तसल्ली जताने आए बस्ती के हर औरत-मर्द को देख रही थी.
अनोखी दुनिया में तरह-तरह के लोग. बस्ती की कुछ औरतें मां की हालत देखकर हंस रही थीं. उनमें कई ऐसी थीं जिन्हें मां की परेशानी महज नाटक लग रही थी—
‘देखती हो…इसे कहते हैं त्रियाचेहत्तर. जानबूझकर भी कैसी भली बनी रही है.’ औरतों का एक दल बातें कर रहा था.
‘घरवाला जब जेब भर-भर कर लाता था तब तो चुपचाप रख लेती होगी….’ दूसरी औरत ने जोड़ा.
‘मैं भी तो कहूं. हमारे घर में तो ढंग से चूल्हा नहीं जल पाता. इनके यहां रोज रात को पीने को कहां से आता है?’
‘भगवान सबकुछ देखता है बहन. उसके घर देर है….अंधेर नहीं.’
‘करनी-भरनी तो साथ-साथ चलती है. पाप किए हैं तो भुगतने ही पड़ेंगे.’
इन तीखी आलोचकों के बीच मां की समर्थक इक्का-दुक्का औरतें चुप्पी साधे रहतीं. कुछ को अफसोस था कि वे अभी तक गलतपफहमी का शिकार रहीं. एकाध औरत मां के पक्ष में बोल भी देती तो उसे बाकी औरतें दबा देती थीं.
निर्बल को समझने में सदैव देर होती है. सबल को खुद को समझाना नहीं पड़ता. कोई क्या सोचता है….मां का उस ओर ध्यान ही नहीं था. वह अपने दुःख से बेहाल-बदहवास होकर यहां-वहां भटक रही थी. छोटे बहन और भाइयों को तो मतंग चाचा अपनी झुग्गी में लिवाकर ले गए थे. मैं मां के साथ उसे परेशान देखकर, दुःखी था. उसे ढांढस बंधाने की हिम्मत भी मुझमें नहीं थी.
दिन कछुआ गति से बीच रहा था. बापू का इंतजार करते-करते हमारी आंखें फटी जा रही थीं. उसके लौटने की उम्मीदें धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही थीं. मेरे तो आंसू सूख चुके हैं. सुख-दुःख ज्यादा असर नहीं डालते. पर तुम ठहरे शहरी बाबू, दिल को थामे रहना बाबू!

*

बापू इस बार लंबा फंसा था…. उसपर चोरी का इल्जाम था. जिस रास्ते से वह लौटता था, वहां घड़ियों की बहुत बड़ी दुकान थी. उसी से चोरी हुई थी. रात को शटर तोड़कर चोर लाखों रुपये की घड़ियां चुरा ले गए थे. उस चोरी में बापू का कोई हाथ न था. जिस रात चोरी हुई, वह झुग्गी में ही था. हम सबके साथ. इस बात को हम जानते थे और हमारे पड़ोसी भी. मगर हमारी, हमारी मां और गरीब पड़ोसियों की यह जानकारी किसी भी काम की न थी—सारी गवाहियां और सबूत तब तक बेकार थे, जब तक पुलिस उन्हें न माने.
पुलिस किस तरह मानती है, यह बापू अच्छी तरह जानता था. और हम भी. इसके बावजूद पुलिस की सेवाएं जुटाना हमारे लिए असंभव था. सारे छुटभैया नेता….जो बापूधाम के वोटों को उंगलियों पर नचाने का दावा करते थे….जिनके साथ बापू ने महीनों-महीनों लगकर काम किया था. जिनकी हर महफिल, हरेक मंजिल का वह राजदार था….जो उसके सच्चे हमदम, पक्के दोस्त होने का दावा करते थे, वे सभी एक-एक कर मां के पास आए थे. जख्मों को कुरेदने….जले पर नमक छिड़कने या शायद हकीकत चीन्हने के लिए. सभी ने मां से कुरेद-कुरेदकर सवाल किए थे….
“कि माल लौटाकर बापू को छुड़ाया जा सकता है….कि रुपया तो हाथ का मैल है….कि आदमी सही-सलामत रहे तो माल की कमी नहीं….इससे ज्यादा भी आ सकता है….कि लाखों के माल में से हजार-दो हजार खर्च कर देने में ही भलाई है….कि एक दाव की कुर्बानी से इस दरोगा को खरीदकर आगे का रास्ता निष्कंट किया जा सकता है….उसके बाद पूरी पुलिस अपनी होगी….वरना जालिम दरोगा…”
मां भला क्या कहती. क्या जवाब देती. कौन उसकी बात पर विश्वास करता. सो ऐसे प्रश्नकर्ताओं के सामने मां पत्थरशिला बन जाया करती थी. मूक-अडोल बैठी रहती. वे लोग सामर्थ्य-भर प्रयास करते और जब काफी कुरेदने के बाद भी कुछ नतीजा न निकलता तो तसल्ली देकर उठ लेते थे. पुलिस का दावा था कि चोरी बापू ने ही की है. उसका सारा जोर बापू से अपराध कबूलवाने पर था. इसके लिए वह अपना हरेक हथकंडा आजमा रही थी.
हम जानते थे कि बापू को झूठ-मूठ फंसाया जा रहा है. परंतु पुलिस के आगे गिड़गिड़ाना हमारी विवशता थी. असली बात भी सबको मालूम थी और कुछ दिनों बाद तो शहर का बच्चा-बच्चा उसको जान गया. हालांकि असलियत कभी भी वास्तविकता नहीं बन सकी. बापू को लेकर कानून की किताबों में पुलिस ने जो लिख दिया था, वह झूठ होकर भी पत्थर की लकीर बना रहा. पुलिस ने जो सुनाना चाहा वही सबने सुना, पुलिस ने जो सिद्ध करना चाहा, उसी पर सबने विश्वास किया.
उन दिनों जो नया थानेदार आया था, वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था. कारगुजारी दिखाने के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकता था. झूठ-मूठ की गिरफ्तारियां. अखबार के जरिए सनसनी फैलाना. नकली मुठभेड़ के जरिये नाम बटोरना, उसके पसंदीदा काम थे. इसलिए चार्ज लेने के सप्ताह-भर के भीतर ही नए थानेदार ने अपने मातहत सिपाहियों की मीटिंग बुलाई थी. उस अतिगोपनीय अनौपचारिक बैठक की शुरुआत करते हुए उसने कहा था—
‘मुझे यह ठंडापन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है.’
‘सर! इलाके में पूरा अमन-चैन है…’
‘इस अमन-चैन को लेकर चाटूं या गली-गली ढिंढोरा पिटवाऊं?’
‘मेरा यह मतलब नहीं था, सर!’ मातहत अधिकारी सकपका गया.
‘तुम्हारा जो भी मतलब हो तुम जानो. मुझे इतना ठंडा इलाका हरगिज नहीं चाहिए.’ दरोगा ने धमकी दी. सबको मानो सांप सूंघ गया. तब नए थानेदार ने कहना शुरू किया—
‘इतना बड़ा इलाका है. फिर भी रजिस्टर खाली पड़ा रहता है. सिवाय मामूली चोरी-चकारी के कोई ढंग का काम ही नहीं होता यहां. आखिर यहां के लोग जीते कैसे हैं….कैसे जीते हो तुम सब?’
‘भले लोगों का इलाका है सर!’ मातहत ने मुंह खोला. इस आश्वस्ति के साथ कि इससे ‘जनाब’ का गुस्सा जरूर ठंडा पड़ जाएगा. लेकिन ‘जनाब’ तो सबको गर्म करने के इरादे से वहां पहुंचे थे. इसलिए इस बार आवाज में गुर्राहट भी घुल-मिल गई— ‘नहीं, इससे लगता है कि यहां की जनता को पुलिस पर जरा भी विश्वास नहीं है. वह जुर्म सहकर भी चुपचाप पड़ी रहती है. अगर यही रहा तो मैं अपनी रिपोर्ट में क्या लिखूंगा. यह कि इस चौकी की जरूरत ही नहीं है….कि यहां तैनात सारे के सारे लोग निकम्मे हैं….पुलिस के नाम पर कलंक हैं….कि सब खाली पड़े-पड़े मुटियाते रहते हैं….कि इससे तो अच्छा है कि सरकार इन्हें बार्डर पर भेज दे. कम से कम दुश्मन की एक गोली कम करने के काम तो आएंगे….साले-हरामखोर…मादरचोद!’
मातहत सिपाही समझ न सके कि क्या जवाब दिया जाए. नया साहब क्या चाहता है. पुराने थानेदार ने यहां तीन वर्ष काटे थे. उसका भी मानना था कि इतना शांत इलाका उसने कहीं नहीं देखा. तीन साल आराम से पड़ा-पड़ा मुटियाता रहा. चौथे वर्ष यह कहकर उसने तबादला करा लिया कि अगले साल बेटी का ब्याह करना है. सूखे इलाके में रहा तो बेटी ताउम्र कोसती रहेगी.
यह साहब उससे भी हजार कदम आगे है. और तब सबको असमंजस में देख नया दरोगा शातिराना मुस्कान के साथ बोला था—
‘देखो, मुझे न ज्यादा शांति चाहिए, न दंगे-फसाद. बस इलाका सुर्खियों में रहना चाहिए. मैं आगे जाना चाहता हूं और इसके लिए जो जरूरी समझूंगा, करूंगा. जब तक मैं यहां हूं, तब तक आप सबको भी वही करना पड़ेगा, जो मैं चाहूंगा….समझे.’ सभी सिपाही नए दरोगा के चेहरे की ओर देखने लगे थे. मानो आने वाले दिनों की योजनाएं बना रहे हों.
हकीकत में नए दरोगा ने आते ही हफ्ते की रकम बढ़ाने का ऐलान किया था. उसका कहना था कि सरकार जब हर वर्ष इनकम-टैक्स बढ़ा रही है तो इनकम भी बढ़नी ही चाहिए. उन सबकी इनकम का अक्षयस्रोत था— हफ्ता!
नए दरोगा की सहमति मिलते ही सभी दुकानदारों को आदेश पठा दिया गया. इस पर घड़ियों की दुकान का मालिक अड़ गया. ऐसे नासमझ और विद्रोही दुकानदार का असर दूसरों पर पड़े, ज्यादा शोर-शराबा हो उससे पहले ही उसे सबक सिखाना जरूरी था. नए दरोगा के पास इस काम के लिए हजार तरकीबें थीं. जिनमें से उसने एक की आजमाइश की गई. बार-बार अमल में लाई जा चुकी वह तरकीब उस बार भी कारगर सिद्ध हुई.
इससे पहले तक दुकानदारों का दिमाग सातवें आसमान पर था. एक झटके में वह गिरकर जमीन पर लोटने लगा. घड़ियों की दुकान का मालिक सबसे पहले पहुंचा. थानेदार साहब के दरबार में दंडवत करने. उसके पीछे-पीछे दूसरे दुकानदार भी आए. सच्चे श्रद्धासुमनों के साथ. थानेदार बाग-बाग. लेकिन मन की खुशी किसी पर जाहिर न होने दी. उसने उसी दिन अखबारों के जरिए चुनौती उछाली—
‘जिसने भी मेरे इलाके में यह हरकत की है वह संभल जाए. मैं उसे केवल चैबीस घंटे का समय देता हूं. मय माल थाने में आकर हाजिरी दे. तब हो सकता है कि मैं अदालत से उसपर रहम करने की फरियाद कर सकूं. चौबीस घंटे के बाद उसका शरीर होगा और मेरा डंडा. इतना मारूंगा कि भूत भी कांप उठें. यहां आने से पहले मैं बहुतों को सीधा कर चुका हूं. यहां भी एक-एक को सीधा करके मानूंगा. मैंने पुलिस के सभी जवानों को आदेश दे दिया है कि थाने में बैठकर मुजरिम का इंतजार करने के बजाय बाहर निकलें और आकाश-पाताल, बस्ती और जंगल जहां भी वह छिपा है, उसको चैबीस घंटे के भीतर हाजिर करें. जो भी चोर का पता लाएगा, मैं उसको ईनाम दूंगा, जो लापरवाही करता हुआ पाया गया, उसकी वर्दी उतरवा ली जाएगी.’
दरोगा की दी हुई टीप को स्थानीय अखबारों ने मोटे मोटे अक्षरों में छापा. उसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई. विरोधी दलों ने तुरंत शहर में गिरते अमन-चैन पर चिंता जाहिर कर विरोधी धर्म का निर्वाह किया. सत्तापक्ष ने दरोगा के सुर में सुर मिलाते हुए विपक्षियों के बहकावे से दूर रहने, ऐसी घटनाओं से उद्वेलित न होने का आवाह्न किया. उसी शाम दरोगा ने फिर अपने मातहतों की मीटिंग ली. जिसमें वह गर्व के साथ उपस्थित हुआ—
‘देखा! एक ही फूंक में हांडी कैसी उबलने लगी.’ दरोगा के चेहरे हाव-भाव सिर की टोपी, हाथ में घूमते डंडे, बगल में लटके रिवाल्वर ने साथ-साथ कहा था.
‘जी जनाब!’ मातहतों ने जोरदार हुंकारा भरा. सभी के चेहरे पर एकाएक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण बन जाने का संतोष झलक रहा था.
‘यह तो शुरुआत है….तुम लोग बस देखते जाओ.’
‘जी जनाब!’
‘शांति हो या सुख…दुनिया में हर चीज का मोल है. जिन्हें शांति चाहिए उन्हें उसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी.’
‘वजा फरमाया, कीमत तो उन्हें देनी ही होगी सिरीमान!’
‘और कीमत वही होगी जो मैं तय करूंगा.’
‘एकदम ठीक फरमाया जनाब!’
‘क्या ठीक फरमाया जनाब!’
‘जी…कीमत वही होगी जो आप तय करेंगे….!’ अचानक किए गए प्रश्न से मातहत हकलाने लगा था.
‘और तुम यहां थाने में पड़े-पड़े सेहत बनाओगे….लेडी कांस्टेबिल से इश्कबाजी करोगे?’ दरोगा ने डपटा.
‘ज् ज् जी नहीं जनाब! हम तो आपका हुक्म बजाएंगे.’
‘हां, मैं जो कीमत तय करूंगा उसको सही समय सीमा में वसूल करके लाना तुम्हारा काम होगा….समझ गए.’
‘जी…समझ गया जनाब!’
अनुशासन के नाम पर तोते की तरह रटाए गए शब्द सभी मातहतों ने एक साथ दोहराए. सभी प्रसन्न थे. नए दरोगा ने आते ही कम से कम एक चमत्कार तो किया. उससे पहले के दरोगा को वही बोलना पड़ता था जो शहर के नेता चाहते थे. वही करना पड़ता था, जो उन नेताओं के आकाओं के इशारे पर ऊपर से आदेश आता था. मगर पहली बार पूरा शहर नए दरोगा की बोली बोल रहा था.
पहले वाला दरोगा महीने में एक बार सब छुटभैये नेताओं से आशीर्वाद लेने जाता था. अमन-चैन बनाए रखने के लिए उनका आभार दर्शाता था. अब नेता खुद अमन-चैन की मांग लेकर थाने आ रहे थे. पहले वे पुलिस पर शक करते थे, अब आपस में ही एक-दूसरे पर संदेह में फंसे थे. उनके बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा था. नेताओं के आगे पुलिस पहले पस्त नजर आती थी, अब मस्त. कौन जाने कि यह उसका बड़बोलापन था या कोई राक्षसी ऐलान. जो भी था वह गरीबी और ईमानदारी की चिता जलाने जैसा था. जिसका पहला शिकार बापू बना था.

*

पहला शिकार! शायद गलत कहा मैंने. वहां आने से पहले वह दरोगा बापू जैसे जाने कितने लोगों को अपना शिकार बना चुका था. बापू जैसे लोग तो होते ही शिकार होने के लिए हैं….क्यों बाबू!
‘जनाब! यह गरीब आदमी है. पिछले दरोगा साहब इससे बिना कुछ लिए ही छोड़ देते थे.’ एक हवलदार बापू को जानता था. शायद थोड़ी-बहुत भलमनसाहत उसमें बाकी थी. बेगुनाह को थानेदार द्वारा अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की खातिर बलि चढ़ाया जाना उसको अखरा था. इसीलिए उसको रोकने की हल्की-सी कोशिश उसने की थी. परंतु नया दरोगा अपनी ही किस्म का आदमी था. उसने बेशर्मी का साथ कहा था—
‘हम भी इससे कुछ नहीं लेंगे. पर कानून तो अपना काम करेगा.’
बापू ने समझा था कि यह पकड़ा-धकड़ी रस्मी है. लोक-दिखावा है. हवालात में दो-चार घंटे रखकर पुलिस गिरफ्तारी का नाटक करेगी. दरोगा अखबारों में अपना फोटू-सोटू छपवा लेगा….बस! उसके बाद उसे छोड़ दिया जायेगा. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका था. इसीलिए पुलिस ने जब उसे पकड़ा था तो उसके प्रति अपनी दोस्ती निभाते हुए वह खुद को छुड़ाने के बजाए, चीखने-चिल्लाने लगा था. लोग उसका नाटक देखकर हंसने लगे. तभी दरोगा का जोरदार तमाचा बापू के मुंह पर पड़ा. उसके मुंह से खून निकल आया. आंखों में लाल-पीले तारे झिलझिलाने लगे.
बापू इससे पहले भी पुलिस की मार झेल चुका था. परंतु वह केवल रस्मअदायगी जैसी होती थी. पुलिस और उसके ‘अपनों’ के अंतरग भाईचारे का प्रतीक जैसी. उसमें शोर तो होता. देखने वाला भी कांप उठता था. पर असल में वह होती बिल्कुल खोखली थी. पुलिस उसे सचमुच मार सकती है—यह बापू के लिए अकल्पनीय था. उसका विश्वास डोलने लगा. सामने खड़े दरोगा की ओर उसने देखा. नया रंगरूट, अनजान चेहरा. तभी ऐसा हुआ है. पुलिसिया मार की कला तो आते-आते ही आती है.
इसके अनाड़ीपन के कारण ही चोट गहरी पहुंची है—बापू मन को समझाने लगा. सहसा उसकी आंखों में चमक और होठों पर मुस्कान छा गई. थानेदार के पीछे खड़ा हवलदार उसे कुछ जाना-पहचाना-सा लगा था. उसी के माध्यम से नए थानेदार को सुनाते हुए उसने कहा था—
‘हुजूर पहचाना नहीं! मैं आपका पुराना ताबेदार घुरिया….घुरिया ठेकेदार!’ बापू अपनी शराब मंडली में ठेकेदार के नाम से भी जाना जाता था. पीठ पीछे गाली देने वाले लोग भी सामना होने पर बापू को इसी नाम से पुकारते. यह संबोधन बापू को बहुत प्रिय था. शाम की बैठकी के समय इसी विशेषण के सहारे उसकी जेब आसानी से खाली कराई जा सकती थी.
‘एक आखिरी चाल और….आपको याद नहीं उस दिन आपने मेरी आखिरी अठन्नी भी दाव में जीत ली थी. वैसे आप जैसा किस्मत का धनी भी मैंने नहीं देखा. इस जगह पर जाने कितनों ने दाव लगाया. कितने एकदम नंगे होकर गए. पर आपको मैंने आज तक नंगा होते नहीं देखा. किस्मत की मेहरबानी से बड़ा नहीं छोटा दाव तो आपका लग ही जाता है. मेरे भाग्य में तो वह भी नहीं है, ठेकेदारजी.’
कुछ ऐसी ही बातें करीब-करीब हर रोज सुनने को मिल जातीं, जो बापू का दिमाग खराब करने के लिए काफी थी. अपनी तारीफ सुनते ही वह आपे से बाहर हो जाता. उसके बाद उठता तो दिन की कमाई को हवा में उड़ाकर. परंतु उस दिन बापू का हर दाव उल्टा पड़ रहा था.
बापू की बात पूरी होने से पहले की दरोगा का दूसरा तमाचा उसके गाल पर पड़ा था. जिससे बाकी के शब्द भीतर ही दबे रह गए. दरोगा ने हवलदार को इशारा किया. पुराने सारे संबंध उस इशारे के साथ ही बिसरा दिए गए. हवलदार आगे बढ़ा और बापू की पीठ, कूल्हे, कंधे, टांग, बांह आदि पर दनादन डंडे बरसाने लगा. यह घटना सड़क के बीचों-बीच घटी थी. सो तमाशा देखने के लिए भीड़ जमा होने लगी थी.
‘साले…हराम की औलाद…सूअर के बीज…मेरे इलाके में आकर हाथ साफ करता है. मादरचोद…बता कहां छिपाया है माल?’ कहते हुए दरोगा ने बापू का गरेबान कसकर भींच लया. पीछे से हवलदार दनादन डंडे बरसाए जा रहा था. उसके लिए दरोगा को खुश करना जरूरी था. बापू जैसे लोगों का क्या! वे तो ऐसे ही कामों में इस्तेमाल होने के लिए जन्म लेते हैं.
‘साहब! दम घुट रहा है. हाथ जरा ढीला रखें. वरना मारा जाऊंगा.’ बापू नीचे से फुसफुसाया. उसके मन में विश्वास अभी भी शेष था कि पुलिस अपनी है. वह मारपीट दोस्ताना है. मजबूरी जो ठहरी. कभी-कभी ऊपरवालों के दबाव में ऐसा करना पड़ जाता है. बापू की यह गलतफहमी अंत तक कायम रही. पुलिस उसे थाने ले गई. हवालात में ठूंस दिया गया. उसकी कनपटियों से खून बह रहा था. देह डंडों की मार से सूज चुकी थी. कपड़े फटकर तार-तार हो चुके थे और अब चिथड़ों के समान लटक रहे थे. तो भी बापू के चेहरे पर शिकन न थी. उसके चेहरे पर भरोसा था. वही भरोसा चौबीस घंटे हवालात में काटने के बाद भी बना हुआ था….क्रमश:.

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ओमप्रकाश कश्यप

दंश — पांचवी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

गरीब लोगों का तो वक्त भी सगा नहीं होता, बाबू. वह बदलता है, ताकि हम जैसे बेसहारा लोगों पर नई-नई विपत्तियां ला सके. उन्हें कठघरे में खड़ा कर सके.

सब्जी मंडी बसी तो सब्जी से लदे बड़े-बड़े ट्रक वहां आने लगे. काम बढ़ा तो पल्लेदारों की जरूरत बढ़ी. रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ. बापूधाम के सैकड़ों मर्द-औरत मंडी में काम करने लगे. बापू भी उन्हीं में से एक था. मगर पल्लेदारी के काम से उसकी कमाई कम, गंवाई अधिक थी. तो भी वह उससे खुश था. मुझे तो याद नहीं आता कि उसने अपने काम-धंधे को लेकर कभी कोई शिकायत की हो. खाली हाथ घर लौटने पर भी मुंह चिढ़ाया हो.

कठिन मेहनत, झूठ, चालाकी, बेईमानी, धक्का-मुक्की, गाली-गलौच और भागम-भाग से वह दिन-भर में जितना कमाता, उसे सूरज ढलने से पहले शराब की दुकान पर न्योछावर कर आता था. घर की सुध ठन-ठन गोपाल बन जाने के बाद ही आती. अंधेरा होने पर घर लौटता तो मुंह लटकाकर, मुंह से भद्दी-भद्दी गालियां निकालता, नशे से लड़खड़ाता हुआ.

बापू जैसा भी रहा हो, मां के गुस्से का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी. खाली जेब देखकर मां उसपर नाराज ना हो, इसलिए उसके हाथ पर रखने के लिए बापू को अक्सर कुछ उधार लेना पड़ता. फिर अगले दिन के चार-पांच घंटे उस उधार को चुकाने के नाम हो जाते. बापू के दिए पांच-दस रुपयों से घर कैसे चलता. इस कारण भरपाई के लिए मां को भी काम करना पड़ता.

कभी-कभी, खासकर बरसात के दिनों में मंडी में ट्रकों का आना घट जाता. इससे काम का टोटा पड़ने लगता. बापू को दूसरा कोई काम तो आता नहीं था. मां गृहस्थी से समय निकाल कर इधर-उधर से कुछ कमाकर लाती, कबाड़ बीनती. फिर भी कभी-कभी ऐसा हो ही जाता था कि अंगीठी बिना दहके रह जाती. कभी शाम को खाना खाते समय हम सबकी आंखों से आंसू बहने लगते. छोटी बहन, भाई सब सिसकारी भरने लग जाते.

उस दिन घर में प्रायः तरीदार सब्जी बनी होती. नमक-मिर्च और पानी के तरल घोल जैसी. दाल के गिनती के दाने. उनकी भरपाई मिर्चों से की जाती. खाते ही हम सबका गला जलने लगता. चेहरा लाल-भभूका. छोटे-भाई बहन पानी-पानी चिल्लाने लगते. मां उसके लिए पहले ही तैयार होती. तत्काल पानी से भरी कटोरियां आगे सरका दी जातीं.
गट…गट….गट….गट….!

इतना पानी भीतर जाता कि पेट फूलने लगता. खाने की गुंजाइश ही न रहती. घूंट-घूंट कर पानी पीते हुए सब अपने-अपने ठिकाने पर जाकर लेट जाते. मैं मां की चालाकी को समझता था. गर्दन झुकाए हुए वह सबको खाली पेट उठते हुए देखती. दुःखी होती. उस समय उस पर क्या बीतती होगी, मैं नहीं बता सकता. इसे मैं मां की मजबूरी समझकर चुपचाप उठ जाता. पेट-दर्द या भूख नहीं है, का बहाना करते हुए. उस समय मां मेरी ओर ऐसे देखती जैसे वह घोर अपराधी हो.
शराबी के रूप में कुख्यात होने के कारण दुकानदार बापू को दूसरे पल्लेदारों से कम पसंद करते थे. ठलवार के दिनों में उसकी मुश्किलें और भी बढ़ जातीं. उन दिनों पेट और शराब की भूख मिटाने के लिए वह छोटी-मोटी चोरियां करने लगता. झूठ तो वह पानी की तरह बोलता. पैसा कमाने के लिए पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, ईमान-धरम देखना उसे बुरा लगता था.

रोटी के जुगाड़ में बापू कभी-कभी जेबतराशी पर भी उतर आता. यह बात अलग है कि इस काम में वह पूरी तरह अनाड़ी था. उसको विश्वास था कि जेबतराशी का काम उसे पूरी तरह फल ही नहीं सकता. उस्ताद का शाप जो सिर पर है. बात आपको अविश्वसनीय लगेगी. पर बापू इसे पूरी तरह सच मानता था. इसलिए जेबतराशी के समय उसका हाथ कांपने, कलेजा धक-धक करने लगता था.

नशे की हालत में बापू ने एक बार रहस्य खोला था. यह कि उसने एक बार भूल से अपने उस्ताद ही की जेब पर हाथ डाल दिया था. हालांकि यह पाप गलतफहमी के कारण हुआ था. उस्ताद उस समय खुद ड्यूटी पर थे. सूट-बूट में लैस, पढ़े-लिखे साहब जैसे. बहुत दिनों से वे एक सेठ का पीछा कर रहे थे, जो थोक में खरीददारी करने शहर आता था. अनाड़ीपना था उसका. जिससे आसामी को पहचानने में गलती कर बैठा. जबकि उस्ताद की पहली सीख ही यह थी कि हाथ डालने से पहले अच्छी तरह शिकार का हुलिया परखो. हजार बार सोचो. बातचीत और चाल-ढाल से यदि कोई जाना-पहचाना-सा नजर आए तो इरादा बदल दो. माल साफ करने से जरूरी है, बच निकलना. पहले बचाव के बारे में सोचो. पकड़ में आया जेबतराश खुद तो मुश्किल में पड़ता ही है, अपने उस्ताद की बदनामी की वजह भी बनता है.

उस दिन शराब की तलब और नादानी में बापू ने उस्ताद की सलाह भी बिसरा दी थी. उस्ताद तो उस्ताद ठहरा. उसने फौरन बापू का हाथ थाम लिया. अपना आदमी समझकर बापू को ज्यादा मारा-पीटा तो नहीं. हां शाप देने की पुरातन परंपरा की नकल करते हुए उसने गुस्से से इतना जरूर कहा थाµ

‘उस्ताद की सलाह और उसके बड़प्पन का ख्याल न करते हुए तूने जो गुस्ताखी की है, वह अक्षम्य है. इसलिए मैं कहे देता हूं कि तू अपनी जिंदगी में कभी कामयाब जेबतराश नहीं बन पाएगा.’
कलयुग के परशुराम द्वारा अपने कर्ण को दिया गया शाप था यह.

**

बापू मन से तो पहले ही कमजोर था. उस्ताद के बोलों ने उसे जकड़-सा लिया. कील की तरह यह शाप उसके दिलों-दिमाग में गढ़ गया. इस घटना के बाद बापू जब भी किसी जेब पर अपनी उंगलियों का कमाल पेश करने की कोशिश करता, मन में समाया हुआ दर्द उसकी शिराओं को लस्त-पस्त कर देता. उसके बाद तो वह संभलने की चाहे जितनी कोशिश करे, उंगलियां थरथरा ही जाती थीं. इस कारण वह अनेक बार भीड़ के हाथों पिट भी चुका था.

बस कडंक्टर और सिपाहियों से उसकी अच्छी पटती थी. जेबतराशी भी दरअसल मिला-जुला धंधा होता है. उसमें जेबतराश की उंगलियों का कमाल होता है. पुलिस का आशीर्वाद और कडंक्टर की मदद उसको कामयाब बनाते हैं. समझौते के अनुसार हर जेबतराश को भीड़ की मार से सुरक्षित बचा लाना उन्हीं की जिम्मेदारी होती है. जिसे वे अपनी पूरी ईमानदारी से निभाते थे. बापू को भी इस समझौते का लाभ मिलता था.

कभी-कभी भीड़ बेकाबू होकर अच्छी-खासी धुनाई भी कर देती. जिससे बापू को हफ्तों तक चारपाई पकड़नी पड़ जाती. मगर उस धंधे में यह भी एक संभावना, बापू यह जानता था. इसलिए पुलिस की मार-पीट का उसपर कोई असर ही नहीं होता था. मां यदि बापू को समझाने का प्रयास करती तो मां की नादानी मानकर वह उसपर हंसता. यदि मां फिर भी न माने तो नाराज हो जाता था—

‘अब रहने भी दे….बहुत ज्यादा लाड़-प्यार के पीछे छिपे तेरे मतलबी स्वभाव को मैं खूब जानता हूं.’

‘आप किसी खतरे में न पड़े, मैंने तो इसीलिए कहा था.’

‘ठीक है, सुन लिया. अब मुंह बंद कर ले.’

बापू मां को बुरी तरह धमका देता. कुछ देर बाद उसको लगता कि कुछ ज्यादती हुई है. तब वह नरम पड़कर मां को समझाते हुए कहता—‘बावरी, रिस्क कहां नहीं है. सड़क पर चलते-चलते आदमी बस के नीचे आ जाता है. बिजली के खंबे से तार टूटकर गिर सकता है. कोई दुश्मन गोली से उड़ा सकता है. वक्त का क्या भरोसा, हैजा-हार्ट अटैक वगैरह कभी भी, कुछ भी हो सकता है. कुछ न होने तक कुछ न कुछ करते रहने का नाम ही जिंदगी है, समझी!’

इस पर मां नासमझ की तरह चुप्पी साध लेती.

हवालात से बापू की दोस्ती थी. जेलों से प्यार. इन्हें वह अपना असली घर कहता. पुलिस को अपना मित्रा-सखा मानता. उसके और भीड़ के हाथों सरेआम पिटना उसकी आदत में शामिल हो चुका था. इसके लिए वह तैयार भी रहता. इस मामले में उसका उस्ताद ही उसका आदर्श था. उसी का हवाला देते हुए वह अक्सर कहा करता था—

‘एक बार पुलिस का डंडा देह को भा जाए तो आदमी बेखौफ हो जाता है. उसे दुनिया का हर काम भला लगने लगता है.’

बापू जीवन कि प्रत्येक क्षेत्र में फिसड्डी रहा. उसकी बदकिस्मती रही कि वह असल जिंदगी में न तो लगकर मेहनत-मजदूरी कर पाया. न किसी और काम में हाथ मांज सका. तो भी जिंदगी में उसका संघर्ष हमेशा चलता रहा. कामयाबी के लिए वह कदम-कदम जूझता रहा. इन धंधों का रोमांच अक्सर बापू को अपनी ओर खींचता. परंतु अपनी जिद और ताउम्र कोशिश के बाद भी वह एक नाकामयाब इंसान ही बन पाया. कामयाबी उससे हमेशा चार कदम आगे चलती रही. असफलताएं उसका मुंह चिढ़ाती रहीं. उस्ताद के शाप को वह ताउम्र अपने कंधों पर ढोता, रात-दिन पछताता रहा.

एक-दो घटनाएं अपवाद कही जा सकती हैं. जब उसने लंबा हाथ मारा था. मगर तब तक बस चालकों, कडंक्टरों और पुलिस की देनदारी इतनी बढ़ चुकी थी कि सारी कमाई पिछले कर्ज चुकाने में ही निकल गई. बापू को खाली हाथ रह जाना पड़ा. उसका दावा है कि उस्ताद की मेहरबानी से उस बार उसने इतना बड़ा हाथ मारा था, जितना कि बाकी जेबतराश पूरी जिंदगी में नहीं कर पाते. तरसते ही रहते हैं. अगर सिर पर बेइंतिहा कर्ज न होता और खबर मिलते ही सारे कर्जदार एक साथ वसूली को न आ धमकते तो आज वह भी शाही जिंदगी के मजे लूट रहा होता. बापूधाम की ओर तो वह पांव भी न धरता.

‘तो और कहां जाता?’ उस समय बापू से अगर कोई यह सवाल कर बैठता तो मुझे पूरा विश्वास है कि उसकी जुबान उसका साथ छोड़ जाती. दरअसल बापू जानता था कि उसका वजूद ही बापूधाम से जुड़ा हुआ है. जेल-हवालात को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं आता कि वह कभी भी शहर छोड़कर गया हो; या किसी दूसरे शहर का नाम भी अपनी जुबान पर लाया हो.

यह तो तय है कि बापू की आयु बापूधाम की आयु से अधिक थी. दूसरे बहुत से लोगों की तरह वह भी से बाहर से आया था. लेकिन कहां से यह उसने न तो कभी बताया था, न हमने जानने की कोशिश ही की थी. और तो और मां ने भी अपने पिछले जीवन को लेकर रहस्य बनाया हुआ था.

बापू कई बार जेलयात्रा कर चुका था. हवालात जाने की तो गिनती ही न थी. मां उसे खूब समझाती. पर बेकार….नाकामयाब रह जाती वह. कमाल का जिद्दी था बापू. जब भी पुलिस या भीड़ से मार खाकर घर लौटता तो मां शिकायत करती. बाज आने को कहती. खुशामद करती, रूठती और मनाती भी. बापू कुछ देर तक तो चुप्पी साधे रहता. बात जब उसकी सहनसीमा से बाहर हो जाती तो भड़क उठता—

‘चुप रह! तू ठहरी औरतजात. कमजोर दिल की. अरी भगवान, पिटना तो हम मरदों के लिए फायदेमंद रहता है. देह की मालिश हो जाती है….उसपर पुलिस के हाथों मार खाना तो और भी शुभ. न जाने कितने नेता पुलिस की मार खाने के बाद ही दुनिया में सन्नाम हुए हैं. गांधी, नेहरू, पटेल….!’

सुनकर मां निस्पंद-सी खड़ी रहती….पाथरशिला-सी अबोल. न ‘हूं’ कहती थी न ‘हां’. सिर्फ दुख को अपने भीतर समेटने के लिए अपने आप से लड़ती. इस कशमकश में आंखें अगर नम हो जातीं तो उन्हें तुरंत पोंछ लेती. जहां आंसुओं का मोल न हो, वहां उन्हें दिखाने से क्या लाभ. मां शायद यही सोचती थी.

मां की चुप्पी बापू पर बिल्कुल उल्टा डालती. जोश में भरकर वह आगे कहता—

‘बस बहुत हो चुका भगवान! दिन-भर का थका-मांदा घर लौटा हूं. कुछ सेवादारी कर. पांव दबा और  नहीं तो सिर की मालिश ही कर दे.’ कहकर वह बेशर्म की तरह हंस देता. फिर चारपाई पर पसर जाता. मां वहां से उठकर अपने काम में लग जाती. तब बापू हममें से किसी एक को पांव दबाने का हुक्म सुनाता. दूसरा उसकी देह की मालिश करने लगता. चार साल का छुटकी उसके सिरहाने बैठकर अपने मासूम हाथों से उसका माथा सहलाने लगती. उस समय शराब का तेज भभका उसकी सांसों से छूट रहा होता. पर हम सभी को उसे सहने का अभ्यास हो चला था.

**

बापू अनपढ़ जरूर था, नादान नहीं. दिमाग उसका हवा से भी तेज दौड़ता. फर्क इतना-भर था कि वह अपनी जल्दबाजी और उतावलेपन में हमेशा मार खा जाता. बस्ती में सभी के साथ उसका उठना-बैठना था. शायद इसीलिए छुटभैये नेता उसको महत्त्व देने लगे थे. वह बड़ी आसानी से दूसरों की बातों में आ जाता. इस कमजोरी को वे जानते थे. बापू बिना कुछ लिए महीनों तक उनके लिए काम कर सकता था. किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम पर बापू की सक्रियता देखते ही बनती. उस दौरान बापूधाम में उसके सिर पर सबसे ज्यादा जिम्मेदारियां होतीं. बेगार की तरह. जिनमें से अधिकांश को वह स्वयं ही अपने ऊपर ले लेता था.

बापू की अस्थिरता उसपर भारी पड़ती थी. उसके बारे में यह अनुमान लगा पाना कठिन था कि कब क्या कर बैठे. सुबह काम पर जाने से पहले मां से कहकर जाता कि मसाला पीसकर रखे, शाम को मछली-भात बनाया जाएगा. हम प्रसन्नमन शाम होने का इंतजार करने लगते. बापू देर रात गए खाली हाथ घर लौटता, बताता कि आज किस्मत अच्छी नहीं थी. जुए में हाथ उल्टा पड़ गया. कभी जल्दी लौटने को कहकर जाता. पर खबर आती कि ‘फलां को पुलिस ले गई है….’ पूरी रात बिताकर सुबह घर लौटता.

मां बापू के हवालात में बंद होने की सूचना से उद्वेलित तो होती. मगर रोजमर्रा की सी बात होने के कारण वह जल्दी ही संभल भी जाती थी. ऐसी दर्दनाक स्थितियों से गुजरना वह अपनी नियति मान चुकी थी. बापू हवालात में घंटा-दो घंटा या अधिक से अधिक एक रात गुजारता. सुबह का सूरज निकलने से पहले ही उसको छोड़ दिया जाता. तब वह छाती फुलाए घर लौटता. ऐंठता हुआ-सा, जैसे किसी मैराथन में फतह पाकर लौटा हो. जिस रात बापू हवालात में होता, घर की एकमात्र चारपाई पर सोने के लिए हम भाई-बहनों में रार ठन जाती. मां के फैसले के बाद जिसे भी मौका मिलता वह चारपाई पर सोने के अपने शाही शौक को पूरा कर लेता था.

चारपाई उतनी ही पुरानी थी, जितनी बापूधाम बस्ती. या फिर मां और बापू की गृहस्थी. उसकी हालत भी बापूधाम जैसी जर्जर और उजाड़ बनी हुई थी. बाकी रातों में जब बापू घर होता, हम सभी बच्चे मां के साथ जमीन पर सोते थे. का॓करोचों और झींगुरों के बीच.

मां अक्सर औंधे मुंह सोती. हमारे लिए मां का औंधे मुंह सोना वर्षों तक रहस्य ही बना रहा. कई बार यह घिनौना ख्याल भी आया भी कि मां नीचे मुंह करके छिपकर कुछ खाती रहती है. कई बार सोचा कि इससे शायद मां को पीठ-दर्द से आराम मिलता हो. आज ऐसे ओछे विचारों के बारे में सोचकर ही मन आत्मग्लानि से भर उठता है. मगर मां को लेकर मैं ऐसा सोचता था, बल्कि वर्षों तक ऐसे ही सोचता रहा— ऐसी गंदी मानसिकता थी मेरी, यह भी एक सचाई है.

एक रात मेरी नींद अनायास ही टूट गई. उस दिन मां के औंधे मुंह सोने का रहस्य खुला. मां पीठ के बल लेटी सिसक रही थी. उसका चेहरा आंसुओं से तर था. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी. आसपास की झुग्गियों से खर्राटों की आवाजें आ रही थीं. मां से उसकी हिचकियों की वजह जान सकूं, उस समय मुझमें यह साहस नही था. जब कुछ और न सूझा तो मैं उससे सटकर लेट गया. मां संभवतः मेरी मनःस्थिति को समझ चुकी थी. या फिर यह दो आत्माओं के मूक संवाद, अपनेपन के एहसास का परिणाम रहा हो. उसने मुझे अपनी छाती से कसकर भींच लिया था.

मां की सिसकियों को कारण आगे भी न तो मैंने कभी पूछा, न उसने कभी बताया. कारण साफ था. जिंदगी में यदि दो-चार गम हों तो उनका हिसाब रखा जाए. दर्द मामूली हो तो आदमी उसके इलाज के बारे सोचे. मगर जब गम बेशुमार हों. जीने का अर्थ ही चुपचाप आंसू पीना हो. अपना पहाड़-सा दर्द सीने पर लिए जब अकेले ही अकेले घुटना हो, तो दर्द और सिसकियों से समझौता ही करना पड़ता है. उनका कारण नहीं खोजा जाता.
क्यों, मैंने ठीक कहा न बाबू!

मां आंसुओं से गठबंधन कर चुकी थी. मैं वैसा करने की कोशिश कर रहा था.

साधारण स्त्री की तरह ही मां अपने पति यानी मेरे बापू से पूरा प्यार करती थी. जहां तक बन पड़ता, उसकी देखभाल भी करती. साल के एक-चौथाई दिन वह किसी न किसी देवी-देवता के नाम पर उपवास रखती. मां के उपवास के बारे में हमें पता भी नहीं लग पाता था. अपने आप में मस्त थे हम. ऐसे में कौन उसका ध्यान रखता. न मां कभी अपने व्रत-उपवास का ढिंढोरा पीटती थी. परंतु साल में एक बार दूर से देखकर ही हम समझ जाते थे कि आज करवाचौथ का दिन—मां का उपवास है. सिर्फ करवाचौथ के दिन मां के उपवास का खुलासा हो पाता था.
उस दिन वह काम से नागा करती. सारे दिन घर ही रहती. चाहती तो यह थी कि बापू भी घर से न निकले. पर अपनी लापरवाहियों और दुर्व्यसनों में डूबा बापू ऐसे बंधनों को फिजूल मानता था. मां की खुशामद भी उस पर बेअसर रहती. किसी न किसी बहाने वह घर से निकल ही जाता था.

उस दिन दोपहर होने तक मां नहा-धो लेती. उसके बाद अपनी मांग में ढेर सारा गहरा लाल सिंदूर पूरती. माथे पर बड़ी-सी टिकुली लगाती. बालों को खुला रखती. मां के बालों की कोमलता और लंबाई हम उसी दिन देख पाते थे. हमीं क्यों उस दिन पूरी बस्ती मां के सादगी-भरे सौंदर्य से धन्य हो जाती थी.

बापू के लिए वह दिन बहुत गुमान-भरा होता. मां को बुरा लगेगा, इसकी परवाह किए बगैर वह उस दिन भी जमकर पीता. देर रात गए घर लौटता. मां उसके इंतजार में बैठी होती. कभी-कभी तो चंद्रमा निकल कर बुढ़ाने लगता. औरतें अघ्र्य चढ़ाकर सो चुकी होतीं. तो भी बापू के पांव घर में न पड़ते. रात जाने कितनी बीच चुकी होती. उस दिन मां बापू की चारपाई पर किसी को भी सोने न देती. हममें से जो जिद करता उसको खूब डांट पड़ती. अकेली उसके पाए से कमर टिकाकर बैठी रहती. मां को नींद आने लगती. तब कहीं जाकर बापू घर लौटता. मां कुछ कहे, उससे पहले ही अपने पतित्व पर गुमान करता हुआ वह कहता—

‘समझता हूं….भूखी है! सुबह से तेने कुछ भी नहीं खाया है. पर खुशी मना. सोने से पहले ही सही, मैं अपने घर तो लौट आया. वरना बहुत-से मर्द तो आज की रात भी अपनी ब्याहता के बजाय माशुका की बांहों में बिताते हैं.’

सुबह से भूखी-प्यासी, तिल-तिलकर बाट जोहती मां, बापू की रूखी-सूखी बातें सुनकर सिहर-सिहर जाती. फिर होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाने लगती. मानो कोई टोटका या मंत्र-जाप कर रही हो….कि मनौतियां मांग रही हो….प्रार्थना कर रही हो अपनी अपनी देवी मां से….मना रही हो रूठे हुए ईश्वर को कि उसकी गृहस्थी चाहे जैसी भी, जितने भी दुःख-अभावों से भरी है, सही-सलामत रहे. मां के दुख से बेपरवाह, मन ही मन ऐंठता हुआ बापू अपने बिस्तर की ओर बढ़ जाता था.

कभी-कभी ऐसा भी होता कि मां बापू का इंतजार कर रही होती. जबकि बापू पुलिस के हत्थे चढ़कर हवालात में ऊंघ रहा होता. करवाचौथ या कोई और व्रत हो तो बापू को हवालात से निकलने का खास बहाना मिल जाता. याद आते ही वह पुलिस को अपने पुराने संबंधों का हवाला देता. लेने-देने की बात आती तो भी पीछे नहीं रहता. नकद न हो तो उधार का वायदा कर छूट आता था.

नियमित रूप से पीना बापू की आदत बन चुकी थी. घर में वह तभी घुसता जब पांव लड़खड़ा रहे होते. अगर दिन में ठीक-ठाक कमाई हो जाती. जेब में, यदि नकद नारायणा हो….रकम अपनी या फिर उधार ही क्यों न हो, उस समय उसका उत्साह देखते ही बनता था. उस दिन नशे में होते हुए भी होशोहवास में होने का दिखावा करता. घर में घुसते ही अपने कूल्हे मटकाने लगता. जोश में भरकर वह कोई चालू फिल्मी गाता. हम सब बच्चे कौतूहल से उसे देखने लगते. फिर उसको घेरकर खड़े हो जाते थे. बापू को अपनी संतान से जरा भी प्यार, मोह-ममता नहीं थी. कम से कम हमें तो यही लगता था. जब वह बहुत प्रसन्न होता तो पचास पैसे या एक रुपये का सिक्का हमारी हथेलियों पर रख देता. उस समय सबकुछ भुलाकर बापू पर गुमान करते हुए हम बाहर की ओर भाग छूटते.

हमारे बाहर निकलते ही वह मां को बाहों में भर लेता था. फिर जोर से भींचता. मां कसमसाती….नाक से आती शराब की घिनघिनाती हवा उसे तड़फा देती. इसकी परवाह किए बिना बापू बड़ी बेशर्मी से कोई चालू शेर मां को सुनाने के लिए बोलता. परंतु मां की कसमसाहट जरा-भी कम होने का नाम न लेती थी. उसका नशा हमारी भूखी-प्यासी मां पर कितना कहर ढाता है, इसपर हमारा ध्यान ही नहीं जाता था. पैसे हथेली पर आते ही बापू की भंड़ैती हमें प्यारी लगने लगती. उसका हर दोष हमारी नजरों में बड़प्पन बन जाता. पर नशे में देर तक संभले रहना संभव न होता. अंततः मां ही उसका सहारा बनती. वह उसे जैसे-तैसे बिस्तर तक पहुंचा देती.

चारपाई पर पड़ने से पहले बापू खूब ऐक्टिंग करता. मां उसे देख-देखकर परेशान होती. खाना वह तभी खाता जब उसका नशा ढीला पड़ जाता. बापू को खिलाने के बाद मां उसके बचे हुए कौर निगलती. नशा यदि गहरा हो तो बापू की आंखें सुबह ही खुलतीं. इस कारण मां को भूखी ही सोना पड़ता था. उस रात वह बापू की जूठन भी मां के गले का कौर न बन पाती थी.

बापू की मनमानियां अनंत थीं. मगर मां की सहनशीलता भी अतुलनीय थी.

क्रमश:…

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ओमप्रकाश कश्यप

दंश – चौथी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

इस प्रकार मेरा नामकरण बापूधाम की परंपरा के अनुसार ही हुआ. मैं परमात्मा सेन कहलाने लगा. इस नामकरण की सूचना परमात्माशरण को कई वर्ष बाद मिली. तो भी वह बहुत प्रसन्न हुआ. चुनाव हारने का जो गम था, वह इस घटना के बाद काफी कम हो गया. अपनी खुशी जाहिर करते हुए परमात्माशरण ने बापू के पसंदीदा ‘ब्रांड’ की दो बोतलें, मां और मेरे लिए कुछ कपड़े भिजवाए थे. बोतलें तो मां को दिखाए बिना ही बापू ने खुशी-खुशी कब्जा ली थीं. मगर कपड़ों के साथ ऐसा कर पाना संभव नहीं था.

कपड़े बहुत महंगे न होते हुए भी हमारी पहुंच से बहुत दूर थे. तो भी शराब की बोतलों के साथ आए कपड़ोंमां को न जाने क्या असंगति दिखाई दी कि उसने बापू को बुलाकर तुरंत वह सौगात लौटा देने को कहा. बापू उस समय परमात्माशरण की भिजवाई गए शराब के नशे में झूम रहा था. मां का प्रस्ताव उसे बचकाना-सा लगा. साथ में उस ‘बड़े आदमी’ का अपमान भी. वह मां को धमकाकर बड़बड़ाता हुआ लौट गया.

आस-पड़ोस की औरतें और मर्द मां तथा मुझे मिली सौगात पर रीझ रहे थे. पूरी बस्ती में परमात्माशरण के बड़प्पन का बखान हो रहा था. मां चुप थी. परंतु उसके मन में भारी हलचल थी. उसी शाम खाना बना लेने के बाद मां सुलगती हुई अंगीठी को झुग्गी के बाहर ले आई. और चौक में, बस्ती के स्त्री-पुरुषों के सामने, उसने एक-साथ कर सौगात में मिले सारे कपड़े आग के हवाले कर दिए.

बापू ने सुना तो वह बहुत नाराज हुआ. मगर मां ने हमेशा की तरह उस दिन भी लंबी चुप्पी साथ ली थी. बापू का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया. मैं दुखी था. तमाशबीन लोग बेहद असमंजस में थे. खूबसूरत कपड़ों को लपटों में झोंक देना उनकी निगाह में सरासर मूर्खता थी. उस समय मां ने इतनी गहरी चुप्पी साधी हुई थी कि उससे कुछ भी कहने या पूछने की उनकी हिम्मत ही न पड़ी. ऐसे अवसर पर मां से कोई प्रश्न कर पाना मेरे लिए तो सरासर असंभव था. बापू भी हिम्मत कहां जुटा पाया था.

जाने कौन-सी चिढ़ थी. मां बिल्कुल नहीं चाहती थी कि उसकी पहली संतान का नामकरण किसी नेता के नाम पर हो. आगे जो भी बच्चे जन्मे, हर बार मां ने जैसे जिद ही ठान ली थी. बापू ने उनका नामकरण भी बापूधाम की परंपरा के अनुसार करने का प्रयास किया था. मगर हर बार मां ऐसी अड़ी कि बापू का बस चल ही नहीं पाया. बापू भी कम जिद्दी न था. मां का विरोध कभी-कभी उसको अपनी मर्दानगी पर हमला लगता था. इसलिए अपनी जिद और निष्ठा का दर्शाते हुए बापू ने मेरे छोटे भाई-बहनों को अपनी पसंद और बापूधाम की परंपरा के अनुसार अलग नाम दिए भी थे. मगर शराब के कारण उसकी स्मृति जवाब दे चुकी थी. इसलिए वह बहन को छुटकी और भाइयों को छूटकू या छोटे ही कह पाता था. परिणाम यह हुआ कि उसके द्वारा दिए गए नाम विस्मृति का शिकार बनते गए और मुझे छोड़कर मेरे सभी भाई-बहन को मां के दिए नाम ही चल पाए.

आखिर मेरे नाम पर ही मां ने समझौता क्यों किया था? दरअसल उसमें एक पेंच था, जिसके कारण मां चाहकर भी मेरे नामकरण पर विरोध नहीं जता पाई थी. मां की ईश्वर में अटूट आस्था भूख, अभाव, उत्पीड़न और निरंतर संत्रास सहकर भी खंडित नहीं हुई थी. उसको पक्का विश्वास था कि ईश्वर दु:खी और संतृस्त लोगों पर अपनी मेहरबानियां लुटाता है. उसके घर में देर भले हो, अंधेर कतई नहीं है. एक न एक दिन वह अपनी कृपा-दृष्टि उसकी ओर फेरेगा ही. उस दिन सारे दुःखों का अंत हो जाएगा. उन अनजाने सुख-भरे दिनों को लेकर मां ने अनेक सपने सजाए हुए थे. उन्हीं के नाम पर वह हरेक दुःख और कष्ट को ईश्वर का वरदान मानकर, खुश रहने का प्रयास करती. हमें भी ढांढस बंधाती थी.

मां अक्सर कहा करती थी कि ईश्वर अपने सच्चे भक्तों की तरह-तरह से परीक्षा लेता है. भक्त को चाहिए कि वह सदैव उसका आभार माने. उसकी मेहरबानी के आगे सिर झुकाए. हमेशा, हर पल याद रखे उसको, प्रार्थना करता रहे उसकी. तमाम तरह की मुश्किलों और झंझटों के बीच मां ईश्वर को न कभी खुद भूलती थी, न हमें भूलने देती थी. न वह ईश्वर से कभी कोई शिकायत ही करती थी. हम यदि कुछ कहते तो नाराज हो जाती. उस समय हमें कुछ कहने के बजाय वह खाना छोड़ देती थी. मानो हमारे पाप का प्रायश्चित कर ईश्वर से रहम की भीख मांग रही हो.

ऐसे समय मां को निराहार महसूस करना मुझे भीतर ही भीतर कंपा देता. अनजाने पाप की अनुभूति से भयभीत होकर मैं मां को जैसे-तैसे मनाने लगता. और जैसे बिल्कुल मोम की बनी हो, जरा-सी कोशिश में वह फौरन पिघल जाती थी—

‘देख परमात्मा, आगे अगर तूने कुछ गलत-सलत कहा तो मैं हमेशा के लिए अन्न-जल का त्याग कर दूंगी. अब तू जा और मंदिर में माथा टेक कर आ.’

झुग्गी के एक कोने में रखी पुरानी तस्वीरों के सामने एक दिया रखा रहता था. उसी स्थान को मां मंदिर कहती थी. हमें उसके बारे में सोचकर भी हंसी आ जाती थी. पर उस समय मैं फौरन उस ‘मंदिर’ की दौड़ जाता था. मां के कहे अनुसार माथा नवाने.

दुबारा कोई चूक न कर बैठूं, इसलिए पीछे-पीछे मां भी चली आती…धूप देने. और वह अपने दोनों हाथों से जलते दिए की धूम्र को हमारे सिर पर ढहराती हुई मन ही मन न जाने कौन-सा मंत्र बांचने लगती थी. उस समय ईश्वर की अनुभूति तो दूर ही रहती, मगर मां के वात्सल्य से मन भर-भर जाता था.

मां के प्रति तमाम स्नेह और सम्मान के बावजूद मैं ईश्वर में कभी भरोसा नहीं कर पाया. मुझे वह भी धरती के अधिकांश लोगों की तरह बेहद काईयां और मतलबपरस्त दिखाई पड़ता था. जो केवल बड़े लोगों को, उन लोगों को दूसरों का हक छीन लेते हैं, स्वार्थी और खुशामदी हैं—और बड़ा, और घमंडी, और स्वार्थी, और काईयां, और निर्मम बनाने का काम करता है. अगर वह सचमुच कहीं है तो इतना गूढ़, इतना जटिल है कि हम जैसे गरीब, साधारण, सुबह-शाम रोटी की चिंता में मरने वाले मनुष्यों के लिए उसको, उसकी बनाई गई व्यवस्था को समझ पाना असंभव ही है.

इस तरह भी वह उन्हीं का है, जिनके पास रुपया-पैसा, जमीन-जायदाद, वुद्धि-वैभव सब कुछ है. सोचते-सोचते मुझे यह एहसास होने लगता कि ईश्वर इस सृष्टि का सबसे बड़ा सरमायेदार है. वह अपने आशीर्वाद का वहीं निवेश करता है, जहां से उसको दुगुने की वापसी की उम्मीद होती है.

लेकिन मेरे ये उल्टे-सीधे खयालात केवल मेरे ही थे. दिखावे के लिए तो मैं कभी-कभी मां को रिझाने के लिए मंदिर के दिये को चमकाने के लिए रेत से रगड़ने लग जाता था. उस दिन पूजा के बाद मां मेरी हथेली पर भाई-बहनों से ज्यादा प्रसाद रखती, सिर पर हाथ भी फिराती थी, मानो आशीर्वाद लुटा रही हो.

मेरा नाम परमात्मा से शुरू होता था. परमात्मा जो मां की आस्था का या कहें कि उसके वजूद का केंद्र था. इसीलिए परमात्माशरण के प्रति सरेआम विरोध प्रकट करने के बावजूद मां ने मेरे नाम को स्वीकार कर लिया था. इस तरह शायद परमात्मा की कृपा से ही मेरा परमात्मा सेन नाम, मां की मंजूरी भी पा गया.

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मजबूरी में दी गई मंजूरी थी वह.

अनंत परेशानियां थीं और ढेर सारे अभाव. साथ में खूब तनाव भी. तो भी मां हालात से हमेशा संतुष्ट नजर आती. न किसी से शिकवा, ना कोई शिकायत— हमेशा अपने काम में जुटी रहती. मशीन की तरह काम करते-करते उसका शरीर छीज चुका था. देह ठठराने लगी थी. खाल असमय ही लटकती जा रही थी. देखने में वह अलगनी पर लटकी हुई पुरानी धोती के समान नजर आती. फिर भी उन आंखों में कुछ ऐसा अवश्य था जो हमें जिंदगी से जोड़े रखने का काम करता. जिसके कारण बापू की लापरवाहियों-नाकामियों की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता था. बापू को घर की जरा भी चिंता नहीं थी. शराब और जुए से यदि कुछ बच जाता तो उसे वह मां के हवाले कर देता.

घर चलाने के लिए मां कोठियों में चौका-बासन करती. कभी बस्ती की दूसरी औरतों के साथ मेहनत-मजदूरी करने शहर की ओर निकल पड़ती थी. लौटती तो इधर-उधर से कबाड़ बटोरती हुई. जिसे फुर्सत के समय अलग-अलग छांटती. उस कबाड़ के बदले माचिस की डिब्बी या नमक की पुड़िया घर में आ जाती. उस अतिरिक्त की कमाई से मां को बहुत संतोष होता. अपनी गृहस्थी के प्रति मां जितनी गंभीर थी, बापू उतना ही लापरवाह. उसकी उपयोगिता मां की मांग रंगने और घर पर बच्चे पैदा करने तक सीमित थी. जिसे वह चाहे-अनचाहे निभाए जा रहा था. अपने पति-धर्म का निर्वाह करते हुए बापू ने मां की कोख से छह बच्चों को जन्म दिया था. जिनमें दो असमय ही ऊपर जा चुके थे. बचे चारों में मैं सबसे बड़ा, बाकी मुझसे छोटे थे. इनमें हम तीन भाई थे—एक बहन, सबसे छोटी. वही मां की ज्यादा लाडली भी थी.

बड़ा होने के कारण मैं बहुत कुछ समझने लगा था. बापू जब मां को डांटता-डपटता तो मुझे उसपर बहुत गुस्सा आता. परंतु मां का पक्ष लेकर यदि मैं बापू से कुछ कहता तो मां उल्टे मुझे डांटने लगती. बड़ों के बीच में न पड़ने का निर्देश देती. कभी बच्चों पर हाथ न उठाने वाली मां, इस बात के लिए मेरी पिटाई भी कर देती थी. तब मैं मां से भी नाराज हो जाता. परंतु थोड़ी-सी देर के लिए. क्योंकि मां से ज्यादा देर तक अबोल रह पाना मेरे लिए बड़ा ही कठिन था. मां तो मां थी ही, मुझे अबोल देखकर वह खुद रोने लग जाती थी.

बापूधाम में मर्दानगी मापने के कुछ तय पैमाने थे. जो मर्द अपनी औरत पर जितना अधिक हाथ उठाता, वह उतना ही बहादुर होने का दम भरता. इसे साबित करने के लिए कुछ मर्द बड़ी-बड़ी मूंछे भी पाल लेते. जिन्हें वे समय-असमय ऐंठते रहते. औरतें हमेशा ही दबती हों, ऐसी बात भी नहीं थी. किसी झुग्गी से आ रही आवाजों में कोई औरत कभी-कभी शेरनी की तरह दहाड़ रही होती. उस समय अच्छे-अच्छे मर्द भीगी बिल्ली बन जाते. जिनकी पत्नियां डरी-डरी रहतीं, उन्हें बस्ती के मर्दों में अपनी मूंछे ऐंठते रहने का बहाना मिल जाता. कभी-कभी ऐसे मर्द को बहुत गुस्सैल मान लिया जाता. औरतें उसकी चर्चा मुंह दबाकर करतीं. लोग उसके मुंह लगने से कतराते. शादी-विवाह जैसे सार्वजानिक अवसरों उसका गुस्सा किवदंती गढ़ने के काम आता.

हालांकि पढ़ी-लिखी होने का दावा करने वाली औरतें इस तर्क से ज्यादा सहमत नहीं थीं. प्रकट रूप में वे इसे मर्दों का पागलपन ही बतातीं. तो भी यदि कोई मर्द अपनी औरत पर सरेआम हाथ उठा रहा होता तो वे इसे पति-पत्नि का निजी मामला बताकर चुप्पी साध लेती थीं. स्त्री-अस्मिता और उसके सम्मान की वकालत करने वाले कई संगठन बापूधाम में बन चुके थे. मगर उनकी हैसियत कुछ झुग्गियों के आगे टंगे बोर्डों तक ही सीमित थी या फिर साप्ताहिक और मासिक गोष्ठियों तक. कोई और काम न होने के कारण वे बस्ती में औरतों को अनचाहे गर्भ से बचने या परिवार नियोजन के बारे मे सलाह देते हुए नजर आते. किसी भी संगठन की पहुंच अपने कार्यकर्ताओं के स्वार्थ से बाहर न थी. ऐसे में उनका प्रभावी हो पाना असंभव ही था.

मां की निगाहों में पति भले ही भगवान का रूप हो, मगर मेरे मन में बापू के प्रति कोई लगाव न था. वह हमारे घर का मुखिया था, क्योंकि मां ऐसा मानती थी. लेकिन हमारे लिए तो मां ही घर की सबकुछ थी. यह अलग है कि बापू जब खाने-पीने की सामग्री घर में लाता तो मैं सबकुछ भूलकर उससे लिपट जाता था. उस समय दिल में छिपे सारे गुस्से, समूची नफरत को भुलाकर मैं बापू से खूब प्यार जताता, मनुहार करता. जो भी काम वह बताता उसे दौड़-दौड़कर निपटाता था.

मां को अक्सर कमर-दर्द रहता था. घर की हालत देखकर उसका स्थायी इलाज कराना असंभव जैसा ही था. मां भी कमर के दर्द को बीमारी मानने को तैयार नहीं थी. घर के दुख, अभाव और तखलीफों की तरह कमर का दर्द भी उसकी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुका था. हम उसे कराहते हुए सुनते. दर्द से तड़पते हुए देखते. कभी हंसकर टाल देते. कभी-कभी मां की तड़फ मुझे भीतर तक घायल कर जाती. कहीं कुछ टूटने-दरकने लगता. बहुत पीड़ा होती. मैं इलाज की सलाह देता. मां हंसकर टाल देती. नहीं तो कोई बहाना ही बना देती थी.

मां का कराहना हमें थोड़ी देर परेशान करता. उसके बाद हम सब पत्थर के बन जाते. शिला की मांनिद निस्पंद-निःसंवेद. मां की कराह उन शिलाओं से टकरा-टकराकर दम तोड़ने लगती. धीरे-धीरे उन शिलाओं से कीलें उभरने लगतीं. तब उसका कराहना हमें असह् लगने लगता. हम उससे ऊबने लगते. कभी-कभी झुंझला भी पड़ते थे. बापू तो मां के कराहने और तड़पने को उसका नाटक बताकर, उसकी हर कराह पर हंसी बिखेरने लगता था. बापू का हंसना हमें भी एक तमाशे जैसा लगता. उस समय हम तीनों भाई भी बापू के साथ मिल जाते. फिर चारों मिलकर मां की खूब खिंचाई करते. उसका जमकर मजाक उड़ाते थे. लेकिन मासूम छुटकी, उसने तो ढंग से चलना भी न सीखा था. मां कराहती तो वह उससे लिपटकर उसके चेहरे और गर्दन पर अपनी नन्ही उंगलियां फिराने लगती थी. मानो उसको तसल्ली दे रही हो.

हमारी बातों का उत्तर दिए बिना मां काम में जुटी रहती. बल्कि वह दुगुनी फुर्ती दिखाने लगती थी. अपने काम में वह पूरी तरह लीन हो जाना चाहती. जिससे दर्द का एहसास घट जाए. हम सबकी जली-कटी-सी बातें उसे सुनाई ही ना दें. दर्द जब इतना बढ़ जाता कि चलना-फिरना भी संभव न हो, तब वह चुपचाप जमीन पर लेटकर बोतल से कमर की सिकाई करने लगती थी.

मां को सिकाई करते देख पहले बापू घर से रफूचक्कर हो जाता. उसके पीछे हम तीनों भी एक-एक कर घर से निकल जाते. लौटते तब तक मां रोटी सेंक चुकी होती. मां ने अपना काम कैसे निपटाया, यह पूछे बिना हम चारों रोटियों पर टूट पड़ते. कभी-कभी बापू उस समय घर लौटता जब हम सब सो चुके होते. खाना खाने के बाद चुपचाप मां की बगल में लेट जाता. दर्द से जूझती मां उससे खुद को बचाने का प्रयास करती. छटपटाती, मगर बापू की जिद के आगे आखिरकार निढाल हो जाती थी. हम बापू की उखड़ती सांसों को साफ-साफ सुनते. उस समय कई बार छुटकी रोने भी लगती तो मां उसको अपनी बगल में लिटा कर चुप कराने लगती थी.

मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं है जब मां ने अपनी बीमारी में हमसे कोई मदद मांगी हो. या बीमारी के कारण उसने कोई काम अधूरा छोड़ा हो. मां की मान्यता थी कि ईश्वर सात आसमानों के परे रहकर भी सबकुछ देखता-समझता है. मेरा नाम तो वह कुछ इस प्रकार तड़पफते हुए लेती थी मानो सातवें आसमान के उस पार बैठे परमात्मा को पुकार रही हो.

मां की करुण पुकार, उसकी मूक और निस्सीम वेदना भी हम बच्चों के बीच हंसी-ठट्ठे का बहाना बन जाती. बापू तो किसी न किसी बहाने मां का मजाक उड़ाता ही था. हम सब मिलकर इस बात की चर्चा भी खूब करते कि मां का ईश्वर गूंगा और बहरा है. तभी तो मां की सुबह से शाम तक की करुण पुकार की अनदेखी कर देता है. कभी मदद को नहीं आता. ना ही कोई कारण बताता है.

कभी-कभी परमात्मा कहकर मां अपने ईश्वर को पुकार रही होती और मैं उसके पास दौड़कर पहुंच जाता था. मां सहसा चैंक पड़ती. फिर अपनी पीड़ा को दबाकर हंसने लग जाती. उसकी हंसी निर्मल और पवित्रा थी. मां को हंसते हुए देखना मुझे बहुत अच्छा लगता. इसलिए यह कार्य मैं मां की हंसी के लोभ में भी कर देता था.

ईश्वर की सत्ता में मुझे कभी भरोसा नहीं रहा. तो भी मां को हंसते हुए देखकर मेरे मन में अनायास एक विराट छवि आकार लेने लगती थी. ठीक वैसी ही कल्पना जैसी मां रामायण-महाभारत की कथा सुनाते समय ईश्वर को लेकर करती थी. कभी-कभी तो मुझे भी उसकी सत्ता और पवित्रता पर यकीन होने लगता. उस समय मैं मन ही मन ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारते हुए, उससे मां के लिए ऐसी ही कभी न खत्म होने वाली हंसी मांगने लगता था.

पता नहीं, मेरी प्रार्थना में खोट था या ईश्वर के होने की बात झूठ थी. मैं कई-कई दिनों तक मां के चेहरे पर मुस्कान देखने को तड़फ जाता. मां की गंभीर मुद्रा देखकर ईश्वर के प्रति मेरी आस्था फिर डगमगाने लगती. तब मैं बेचैन होकर मन ही मन ईश्वर को कोसने लगता था.

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मां साधारण रूप रंग की थी. पर उसकी गिनती बापूधाम की खूबसूरत स्त्रियों में होती. मां को यह उपलब्धि उसके अच्छे स्वभाव के कारण प्राप्त थी. उसका तो अपनी दैहिक सुंदरता की ओर ध्यान भी नहीं जाता था. मां का पूरा लगाव घर-भर की खुशहाली और हमारी खुशी से था. वह एक अनपढ़ औरत थी और सहनशीलता को स्त्री का स्वाभाविक आभूषण मानती थी. इस सहनशीलता के कारण ही वह बापू के साथ बंधी हुई थी. वरना बापूधाम में ही ऐसे कई उदाहरण थे जब अपने पति के निकम्मेपन से तंग आकर कई औरतें घर छोड़कर भाग चुकी थीं. मां ने इस बारे में शायद ही कभी सोचा था. पिछले सोलह वर्षों से वह इस इकतरफा-से रिश्ते को निभाती आ रही थी.

बस्ती में दूसरी किस्म के भी उदाहरण थे. अनेक पुरुष इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते या तो खुद पत्नी बदल लेते अथवा उनकी पत्नियां नई ‘ओट’ की तलाश में चुपचाप बस्ती छोड़ जाती थीं. मां उन बहुत थोड़ी स्त्रियों में थी जो विवाह के बाद एक ही ’खूंटे’ से बंधी हुई थीं. मां इस बात के लिए भी बापू की बहुत तारीफ करती थी कि दूसरे मर्दों की तरह वह घर से बाहर जरा भी ताकाझांकी नहीं करता. बापू भी जब बहुत प्रसन्न होता तो मां को इस बात की याद जरूर दिलाता था. पति के प्रत्येक वाक्य को आप्तवचन मानने वाली मां, यह सुनते ही गदगद हो जाती. श्रद्धा के अतिरेक में कभी वह बापू के पांव छू लेती या आत्ममुग्धता की मारी वह भोली स्त्री शराब के नशे में डूबे बापू के पांव दबाने लगती थी.

पति सेवा और ईश्वर में अटूट आस्था के कारण भी बस्ती की औरतें मां का सम्मान करती थीं. हालांकि इसी बात पर अनेक उसका मजाक भी उड़ाती थीं. तो भी औरतों की बतकही के बीच मां की प्रशंसा होना आम बात थी. मां को तो बतकही की फुर्सत ही नहीं थी. पर बस्ती की औरतों के मुंह से अपनी मां की प्रशंसा सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता था. इसलिए मुहल्ले में चार स्त्रियां बतकही को जमा हों तो मैं जाकर चुपके से उनके बीच खड़ा हो जाता था. ताकि मां के बारे में दो अच्छे बोल सुन सकूं. और जब मां का जिक्र आता तो मेरा दिल जोर-जोर से उछलने लगा. ऐसा होता तो मेरी देह का रोम-रोम पुलक उठता था.

आपके लिए यह बहुत बचकानी और मूर्खता वाली बात हो सकती है. मगर अभाव और संघर्षों से भरे समय में दो अच्छे बोल मन को कितनी तसल्ली देते हैं, इसे वही जान सकता है जो इन स्थितियों से गुजरा हो. जो किसी अपने के प्यार के साए में जिंदगी की कड़ी धूप से बचता रहा हो. जिसने लंबे बीहड़ सफर के बाद जहां-तहां अमराई की छांव पाई हो. वही उसकी खुशबू, शीतलता और पवित्रा छांव का सच्चा भोग कर सकता है.

मेरे मन में मां के प्रति अटूट श्रद्धा थी. और प्रशंसा की भावना भी. परंतु घर को बचाए रखने के लिए मां जिस तरह अपने सुख एवं खुशियों का बलिदान करती आ रही थी, जिस तरह वह हम सब की खुशियों के लिए तिल-तिल गलती जा रही थी, उसका कोई जोड़ न था. ऐसे में उसकी प्रशंसा अगर सारे शहर के नहीं तो बापूधाम के लोग अवश्य करें, यही मेरी नन्ही-सी अभिलाषा थी.

ऐसी ही कामनाओं तथा अनंत कष्टों के बीच हमारे दिन गुजरते जा रहे थे.

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मेरे जीवन का वह बेहद कठिन समय मां के आंचल की छाया में हंसते-खेलते बीत रहा था. जब भी मुश्किलें चट्टान बनकर रास्ते में अड़ जातीं….वीरानी-भरे सफर में रास्तों में जब कांटे उभरने लगते….दुःख के अंतहीन पहाड़ बीचोंबीच आकर खड़े हो जाते….परेशानियां तपते रेगिस्तान की तरह तन-बदन जलाने लगतीं, तब मां का प्यार और धैर्य मेरा संबल बन जाता था.

हम गरीब जरूर थे. मगर मां के रहते गरीबी का एहसास हमें छू भी नहीं पाता था.

भूख संसार की सबसे बड़ी हकीकत है. ऐसा प्रत्येक विचार जो रोटी का समर्थन करता हो,

जिंदगी की बात करता हो— नैतिकता है. पेट की भट्टी के लिए ईंधन की भरपाई करने वाला हर काम जायज होता है, परंपरानिष्ट और धर्मानुकूल भी.

बापूधाम जब बसा तो चारों ओर वीरानगी थी. गिने-चुने लोग थे. जो शहर से दूर वीतरागी-सा जीवन जीते थे. गाय, भैंस, गदहा, सूअर, कुत्ता, बिल्ली और कभी-कभी जीवन की भागदौड़ से उकताया घोड़ा भी, चरने के बहाने शहर से उस ओर निकल आते थे. उन्हें देखते ही दर्जनों कुत्ते न जाने कहां-कहां से निकलकर बवाल खड़ा कर देते. उनके पीछे-पीछे नंग-धड़ंग बच्चे भी झुग्गियों से बाहर आ जाते तो अच्छा-खासा तमाशा हो जाता था. वर्षों तक ऐसा ही चलता रहा. फिर देखते ही देखते बस्ती के उत्तर वाले मैदान में सब्जी मंडी खड़ी हो गई. उन्हीं दिनों बात है. बस्ती खाली कराने के लिए निगम की ओर से दस्ता भी पहुंचा था.

उससे पहले सब्जी मंडी खड़ी होने की सूचना पर ही बापूधाम में नए-नए लोग आकर बसने लगे थे. उनकी झुग्गियां सिर छिपाने का ठिकाना-भर नहीं थीं. वे बहुत बड़ी-बड़ी थीं. गांव-घर छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में आए लोगों की चाहत तो महज एक छत थी, कच्ची या पक्की जैसी भी मिल जाए. लेकिन वक्त बदलने के साथ लोग-बाग जमीन की कीमत पहचानने लगे. खाली जगह देखकर ऐसे लोगों में उसे घेरने की होड़ जैसी लगी थी. जिनके पास शहर में रहने के ठीक-ठाक ठिकाने थे, वे भी झुग्गी के नाम पर जमीन कब्जाने लगे. कई झुग्गियों पर हमेशा ताले लटके रहते थे. कुछ ने किरायेदार रख छोड़े थे. बापूधाम के पुराने बांशिदे नए लोगों को थोड़ी ईष्र्या और सम्मान के साथ देखते थे.

जो हो, बस्ती को खाली कराने के लिए जब दस्ता वहां पहुंचा तो वही लोग सीना तानकर उसके आगे खड़े हो गए थे. उनके साथ औरतें भी थीं. जिन्हें पहली बार वहां देखा जा रहा था. वे औरतें किसी भी बात में मर्दों से पीछे नहीं थीं. पुरुषों के कंधे से कंधा मिलकर उन्होंने सरकार और कार्रवाही दस्ते के विरुद्ध ऐसी नारेबाजी की कि उसे निराश लौटना पड़ा. उसके बाद तो निगम ने जब-जब सरकारी जमीन खाली कराने की कोशिश की, हर बार जोरदार हंगामा हुआ. हर बार निगम का विरोध बढ़ता गया. साथ में बढ़ती गई बापूधाम की भीड़. आखिर निगम को ही शांत होकर बैठना पड़ा. इसी के साथ बापूधाम को अपने नेता भी मिल गए. वही एक दिन मिलकर शहर से बिजली के तार खींच लाए.

पहली बार बापूधाम में बिजली के लट्टू चमकते दिखाई पड़े तब वहां के पुराने बाशिंदों ने राजनीति की ताकत को पहचाना. दो-चार झुग्गियों के नाम पर शहर से खींचे गए तार धीरे-धीरे प्रत्येक झुग्गी तक फैल गए. बिल के नाम पर हर झुग्गी से जमा हुआ रुपया, कुछ छुटभैये नेताओं के घर कुछ अफसरों की भेंटपूजा के काम आने लगा. बदले में नेताओं ने लोगों को मिट्टी का तेल, राशनकार्ड जैसे छोटे-मोटे काम निपटा लेने की जिम्मेदारी संभाल ली.

पता नहीं यह लोकतंत्र की ताकत थी कि गरीबी का मखौल. बापूधाम का आशीर्वाद पाकर नेता उठते चले गए. मगर बापूधाम की हैसियत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. सिवाय इसके कि झुग्गियां बंटकर छोटी होती चली गईं. जिन झुग्गियों पर पहले एक-दो बच्चे थे. उनमें पांच-छह तक हो गए. नालियों ने बेपाट होकर गलियों को घेर लिया. उनमें कीड़े कुछ और गिजबिजाने लगे. कुकर्म पर परदा डालने के लिए नालियां पहले भी काम आती थीं, अब वे और अधिक भरोसेमंद हो गईं. मलेरिया वहां की घरघुस्सु बीमारी थी. अब हैजा और दमे बीमारी भी उसके साथ शामिल हो गई. बापूधाम में रोग औरतों को भी होते थे, लेकिन दाई के अलावा सिर्फ मौत ही उनको समझ पाती थी.

बाबू! वक्त यदि ऐसे ही बदलता है, तो क्यों बदलता है?…

क्रमश:

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ओमप्रकाश कश्यप

दंश – तीसरी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

आज बापूधाम को बसे वर्षों बीत चुके हैं. विधवा की मामूली झोंपड़ी से महानगर का सबसे बड़ा वोट उत्पादक क्षेत्र बनने की, बापूधाम की कथा बेहद रोमांचक है. मगर कितने लोग हैं जो इस हकीकत से परिचित हैं. सिवाय बस्ती के दो-चार बूढ़ों या सीलन और दीमक से नाममात्र को बचे थोड़े-से सरकारी रिकार्ड के.

बापूधाम नाम बस्ती के लिए बहुत ही शुभ सिद्ध हुआ था. नामकरण के बाद बस्ती ने जिस गति से तरक्की की थी, वह भी अपने आप में एक मिसाल है. बापूधाम शहर की प्रगति को मापने का पैमाना बन चुका था. आदर्श और सर्वमान्य पैमाना. जिसमें चूक की जरा भी संभावना नहीं थी.

बापूधाम में झुग्गियों की संख्या में जितनी वृद्धि होती, उतने ही वहां की गरीबी को चार चांद लग जाते थे. उसी अनुपात में बढ़ जाती थी महानगर की जनसंख्या. उससे भी चार गुना महानगर के अमीरों की अमीरी बढ़ जाती. इधर झुग्गियां बढ़तीं….उधर कोठियां. इधर नालियों में कीचड़, कीचड़ में गिजबाते कीड़ों की संख्या बढ़ती, उधर सड़क पर दौड़ती कारें, कारों की लंबाई, उनकी चमक बढ़ती चली जाती….कि जैसे होड़ लगी हो आपस में….झुग्गियों में रहनेवाले यदि सौ बढ़ते तो कोठियों की जनसंख्या केवल पांच ही बढ़ पाती. मगर उनकी अमीरी सौ गुनी आगे खिसक जाती थी.

ऐसा नहीं है कि बापूधाम के बसने का कभी विरोध नहीं हुआ. बल्कि हर मलिन बस्ती की तरह बापूधाम की जनता को भी शुरू में खूब कष्ट सहने पड़े थे. स्वच्छता और शुचिता की दुहाई देनेवाले लोग तो आज भी कम नहीं हैं. पर वे लोग जानते हैं कि उनके घरों को साफ-सुथरा रखने के लिए शहर में ऐसा ठिकाना जरूरी है, जहां उनके घरों-मकानों के साथ-साथ उनके दिलों और दिमागों की गंदगी को समेटा जा सके. बापूधाम जैसी बस्तियां इसी कारण महानगरों की जरूरत बन जाती हैं. जो काम गटर का करतीं हैं और नाम अपने नेता का. उनका धर्म होता है शेष महानगर को साफ-सुथरा रखना.

खैर, संकट के दिनों में भी उस युवा नेता ने, जब तक वह जिंदा रहा, बापूधाम की रक्षा ढाल बनकर की थी. जब-जब लोगों के भड़कावे पर पुलिस परेशान करना शुरू करती, तब-तब वह बीच में आ जाता था. जब तक जिया तब तक बापूधाम के निवासी उसके कृतज्ञ बने रहे. लेकिन यह कृतज्ञता उनके मतदान के निर्णय को प्रभावित नहीं कर पाती थी. अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए उस युवा नेता को भी बोतलों का सहारा लेना पड़ता था. ठीक ऐसे ही जैसे दूसरे उम्मीदवार करते थे. बल्कि हकीकत तो यह है कि इस नजराने की शुरुआत भी उसी ने की थी.

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मेरे जन्म की कथा तो और भी विचित्र है, बाबू!

बापू अनपढ़ भले ही हो, पर नालायक नहीं था. कमी सिर्फ इतनी थी कि उसका दिमाग केवल शराब के मामले में तेज चल पाता था. घर चलाने को मां थी ही. बाकी काम भी जैसे-तैसे सध जाते. जो छूट जाते उनका अफसोस घर के बाकी सदस्यों को हो तो हो, बापू कतई परवाह नहीं करता था. बोतलों का हिसाब रखने में बापू से कभी भूल नहीं होती थी. बल्कि दुनिया-भर का एक यही काम था, जिसे वह पूरी ईमानदारी और प्रवीणता के साथ निपटाता. छोटे-मोटे विवादों को छोड़कर बापू की कोई आलोचना भी नहीं होती थी. अपने इसी हुनर के कारण वह बस्ती के अधिकांश घरों में पहचाना जाता. यही उसकी एकमात्र योग्यता थी. शायद यही उसके जीने का मकसद भी.

चुनाव की घोषणा होते ही बापू की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं. हर पार्टी, हर नेता की ओर से उसे ससम्मान बुलावा आता. बल्कि उसे बुलाने और अपने पक्ष में रखने के लिए नेताओं और पार्टियों में होड़ मच जाती थी.

उन दिनों बापू के पास खूब बोतलें आतीं. वोटों की खेती जमकर लहलहाए, इसके लिए हर नेता शराब की नहरें बहाने को तैयार रहता. शराब की इतनी पेटियां आतीं कि झुग्गी में उन्हें रखने के लिए जगह कम पड़ जाती. तब पड़ोस की कुछ झुग्गियां किराये पर लेनी पड़ जातीं. उनका नकद किराया न तो कोई मांगता था, न ही उसकी जरूरत पड़ती थी. हर रोज बढ़िया शराब पेट-भर पीने को मिलती रहे, झुग्गी-मालिक इसी में खुश रहता था. यदि कभी-कभार नकद किराया देना पड़े तो उसका बोझ उम्मीदवार मिलकर उठाते थे.

महानगर के सारे पुलिसकर्मी बापू को पहचाते थे. चुनाव के दिनों में तो पुलिस बापू की हर संभव मदद करती. बदले में एक-दो बोतल देकर बापू भी पुलिस को बहलाए रखता था. हर पुलिसिया बापू के साथ अदब से पेश आता. चुनाव की आहट के साथ ही सिपाहियों के लिए भेंट का कोटा अलग से तय कर दिया जाता. उसकी व्यवस्था भी नियमानुसार कर ली जाती थी. तमाम कवायद का लाभ मतदान के दिन देखने को मिलता. जब बापू और उसके आदमियों को ‘ठप्पा मारने’ के लिए ‘लाइन क्लीनर’ मिलती. कभी-कभी झगड़ा भी हो जाता. उस समय बापू जान पर खेलकर भी अपने उम्मीदवार का काम पूरा करता था.

उम्मीदवार को दिया गया वचन हमेशा निभाया जाता. कुछ सिपाही बापू के ‘एहसान’ का बदला बाद में चुकाते. वे उसके छोटे-मोटे अपराधों को नजरंदाज कर जाते थे. बापू शराब के बदले मिली छूट को सिपाहियों की दरियादिली मानता. हालांकि वह डरपोक भी कम न था. पुलिस का संरक्षण पाकर भी उसने शायद ही कभी बड़ा हाथ मारा हो. पुलिस के कहे-अनकहे को वह अच्छी तरह समझता था.
बापूधाम के निवासी गरीब भले हों, परंतु एहसानफरामोश वे हरगिज न थे. कर्ज लेते तो उसे चुकाना भी जानते थे. एहसान लेते तो उसका मोल देना भी उनके स्वभाव का हिस्सा था. अपने आचरण में बापूधामवासी पूरी तरह ईमानदार थे. यही उनकी खूबी थी. जिस शाम को चुनाव प्रचार संपन्न होता, उस रात बस्ती के सारे मर्द एक जगह जुटते. सभा होती. आपस में विचार-विमर्श और हंसी-दिल्लगी भी चलती रहती. उन सभाओं की अनौपचारिक अध्यक्षता प्रायः बापू ही करता था.

सभा में उम्मीदवारों द्वारा भिजवाई गई शराब और उसकी क्वालिटी पर भी चर्चा होती. प्रत्येक ब्रांड के स्वाद पर बस्ती के मतदाताओं की राय ली जाती. सभा में मौजूद लोग अपना-अपना मत देते—अनुभव सुनाते और निर्णय लेते थे. जिस ब्रांड के पक्ष में सबसे अधिक मत पड़ते. आम राय भी करीब-करीब उसी उम्मीदवार के पक्ष में बनती, जिसने वह ब्रांड भेंट किया होता. उस उम्मीदवार की प्रशंसा में हर कोई कसीदे पढ़ता. सभा की समाप्ति पर जोरदार दावत होती. बोतलें खुलतीं. उठते-उठते शराब के कई दौर चलते. इस अवसर पर सारा इंतजाम बापू की ओर से होता. नशे के कारण जब संभलना मुश्किल हो जाता, तभी अपने-अपने घर लौटने की बारी आती. ऐसी महफिलें देर रात तक जमतीं. शिकवे-शिकायत और यहां तक कि मारपीट के भी कई-कई दौर चलते. गाली-गलौच, हंगामे और नशे के साथ-साथ मस्ती बढ़ती ही जाती.

झुग्गियों में बंद औरतें दरवाजों की ओट से मर्दों के कारनामे देखतीं. कभी हंसती तो कभी उदास होतीं. कभी अपने-अपने मर्द पर गर्व करतीं तो कभी उसकी नासमझी पर छाती पीटने लगतीं. पत्नियों को घंटों इंतजार करवाने, तड़फाने के बाद पति लोग अपने-अपने घर में घुस जाते थे. भीतर जाते ही औरतें उन्हें सहारा देतीं. सहारा देने के लिए स्त्रियों का झुग्गी से बाहर आना निषिद्ध था. पतियों की मर्दानगी को ललकारने जैसा भीषण अपराध. जिसकी सजा हाथा-पाई से लेकर तलाक तक पहुंच जाती थी.

एकाध अपवाद को छोड़कर औरतें भी अपनी ‘सीमा’ में रहती थीं. उस समय तक सारा शहर ऊंघने लग जाता. दिन-भर वाहनों का बोझ उठाने से थकी हुई सड़कें, अंधेरे की मोटी चादर ओढ़कर, सोने की कोशिश करतीं. परंतु कई बार जल्दी पहुंचने के चक्कर में ट्रक ड्राइवर अपने वाहन को बापूधाम की ओर मोड़ देते थे. उसकी ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर ट्रक धड़धड़ाता हुआ गुजरता. मानो कोई आतंकवादी हो. दिन-भर के काम से थके लोगों की नींद उचट जाती. उन्हें अपनी निरीहता का, बलत्कृत होने जैसा एहसास होता.

ट्रक ड्राइवर को गालियां देना तो निभ जाता. इससे अधिक पंगा लेना उनके बूते से बाहर था. फिर ट्रक भी तो उन्हीं मालिकों के थे, जहां वे नौकरी करते थे. इसलिए करवट बदलकर लेट जाना मजबूरी थी. नींद मैं खलल न पड़े इसके लिए कुछ लोग दो पैग ज्यादा चढ़ा लेते. फिर सभाओं-महफिलों में इस चतुराई का बखान बढ़-चढ़कर किया करते थे.

नशा ज्यों-ज्यों गुलाबी होता, बस्ती के लोगों की कर्तव्यपरायणता जोर मारने लगती. गृहस्थ लोगों के लिए रात्रि का अंधेरा और एकांत, कुछ कर दिखाने का अवसर उपलब्ध कराते. सन्नाटा उनकी रगों को रूमानियत से भर देता. वे यह कसम खाकर कि बीते दिनों में जिसने उनके लिए ‘बढ़िया’ का इंतजाम किया था, जिससे कि उनकी आज की शाम रंगीन हुई है, उसके लिए एक नया और निष्ठावान मतदाता पैदा करना, उनका पुरुषोचित धर्म है, अपने कर्तव्य-पालन में तल्लीन हो जाते.

दिन-भर राजनीति और अपने पतियों के निठल्लेपन को कोसनेवाली पत्नियां अभिसार के कोमल पलों में पति के आगे तन-मन न्योछावर कर देतीं. वे लोकतंत्र को समृद्धि प्रदान करने वाले, पावन-पुनीत और आनंदक कार्य में पति को पूरा सहयोग प्रदान करतीं.

स्त्री और पुरुष के उस देहात्मिक सम्मिलन से बापूधाम में जीवन खूब समृद्ध होता. झुग्गियां किलकारियों से गूंजती ही रहतीं. आत्मसंतोष और धैर्यशीलता बापूधाम के निवासियों के चरित्र की प्रमुख विशेषताएं थीं. गुस्सा उन्हें बहुत कम, शायद ही कभी आता. गलियों से गुजरते समय कीचड़ उनके कदमों से लिपट जाता, वे उसे भी अपने साथ लेकर काम पर निकल जाते. बदबू आते-जाते उनके नथूनों में हलचल मचाती, वे मुंह से दो-चार भीषण किस्म की गालियां निकालकर अपना कलेजा ठंडा कर लेते. भूख और बेकारी सताने लगती, तो नियति से समझौता कर घर में बैठ जाते….बच्चों को मारने-पीटने लगते. बाहर अगर कोई बड़ी खटपट हो जाती तो पति लोग अपनी पत्नियों को पीटकर उसका आवेग उतार देते थे.

नियति का वरदान कि बापूधम की स्त्रियां एकदम ‘गाय’ थीं. गुस्सा आने पर मैके जाने की धमकी देने के अलावा उन्हें कुछ आता ही नहीं था. पुरुष जानते थे कि मैके से लौटना तय है. अतः स्त्रियों की यह धमकी कारगर नहीं हो पाती थी. जलकर मरने की धमकी तो कोई नादान स्त्री ही देती. वह भी अपनी धमकी पर अमल नहीं कर पाती थी. हालांकि स्टोव और मिट्टी का तेल बापूधाम की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा थे. स्टोव फटने की दुर्घटनाएं भी अक्सर हो रहतीं, जिन्हें किस्मत की दगाबाजी कहकर नजरंदाज कर दिया जाता था. पुलिस आकर सब मामला रफा-दफा कर जाती. बल्कि ऐसे मामलों में वही सबसे बड़ी मददगार सिद्ध होती थी.

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तो बापू ऐसी थी हमारी बस्ती जहां मेरा बचपन बीता.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानी बापू के नाम पर बसी वह बस्ती, देश के लोकतंत्र की आधारशिला थी. अगर मैं यह कहूं कि बापू के इस देश में लोकतंत्र का भविष्य, बापूधाम में जन्मे मतदाताओं के फैसलों या उनकी मूर्खताओं पर टिका हुआ था, तो यह भी गलत नहीं होगा. इस देश में महानगरों और

महानगरों में बापूधाम जैसी बस्तियों की भले ही कमी न हो, तो भी मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारी बस्ती जितने भरोसेमंद, भले और सस्ते, मात्र आश्वासनों के बदले अपनी नाक में खुशी-खुशी नकेल डलवा लेने वाले, भूखे पेट अपने नेता की जय-जयकार करने वाले मतदाता, इस देश में शायद ही किसी और बस्ती के हों.

मतदाताओं का प्रचुर उत्पादन बगैर गरीबी और शराब के संभव न था. गरीबी उन्हें सपने दिखाती. शराब वोटर-उत्पादन प्रक्रिया के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती. बापूधाम इन सब घटनाओं को पूरी आत्मीयता के साथ आत्मसात कर लेता था. चुनाव काल में हुए स्त्री-पुरुष संसर्ग से जो संतान जन्म लेती, उसका नामकरण अपने पसंदीदा नेता या उसकी पार्टी के नाम पर किया जाता.

आप मानें या न मानें, बापूधामवासियों को नामकरण का बहुत अच्छा अभ्यास था. जिनकी रुचि राजनीति में होती, वे अपनी संतान का नाम अपने पसंदीदा दल के नाम पर रख लेते थे. जिनके मुंह पर किसी खास ब्रांड का स्वाद चढ़ा होता, वे पसंदीदा ब्रांड को ही नामकरण का आधार बना लेते थे. मतदान हेतु किसी उम्मीदवार-विशेष के पक्ष में बनी तात्कालिक सहमति या असहमति का इस नामकरण संस्कार से कोई लेना-देना न था. हर व्यक्ति अपने पसंदीदा नेता, दल या ब्रांड के आधार पर अपने कुलोत्पन्न, भावी मतदाता का नामकरण करने को स्वतंत्र रहता था.

बापूधाम के लोग शराब पीकर भले ही वोट देते हों, परंतु वे कृतघ्न कदापि न थे. एहसान का बदला चुकाना उनका स्वभाव था. लोकतंत्र उनके हाथों में सर्वथा सुरक्षित है—यह सभी बुद्धिजीवियों का मानना था. उस रात के संसर्ग से उत्पन्न संतान, अगर वह लड़की हो तो उसका नाम सपइया, बसपइया, कांग्रेसो, भैपई या भजपई वगैरह रख लिया जाता. अगर लड़का हो तो भी कोई गम नहीं. उस अवस्था में इन्हीं नामों को संशोधित कर, तत्काल इनके पुर्लिंग शब्द गढ़ लिए जाते.

बस्तीवाले नए-नए नाम गढ़ने की कला में प्रवीण थे. बड़े होकर वे बच्चे भी अपने नामकरण-रहस्य का पूरा लाभ उठाते. तब उन्हें अपने नाम से साम्य रखनेवाली पार्टी के पिछलग्गुओं में बड़ी आसानी से स्थान मिल जाता था. आगे चलकर वही लोग सस्ते चुनाव-कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध मतदाता-वर्ग में गिने जाते. ताली बजाना आमतौर पर सभ्य लोगों का गुण होता है. परंतु बचपन से ही अभ्यास करने के कारण वे इस कला में भी निपुणता प्राप्त कर लेते थे. ऐसी स्थिति में दल-विशेष की ओर से जब भी कोई कार्यक्रम होता तो उन्हें तालियां बजाने के लिए साधिकार बुलवाया जाता.

चुनाव के दिनों में वही बैनर टांगने और पोस्टर चिपकाने का काम बिना किसी लालच, पूरी निष्ठा के साथ करते. सौभाग्यवश इनमें अगर कोई लड़का दबंग निकल आता तो उसके नेता की लाॅटरी खुल जाती. उस लड़के को बूथ लूटने जैसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी. एन्काउंटर की घड़ी आने तक वह पूरे जोशो-खरोश के साथ बूथ लूटने का काम करता, नेताओं के दूसरे काम साधता. अपने नेता के इशारे पर वे लड़के उसके प्रतिद्वंदी को डराने, धमकाने से लेकर ‘टपकाने’ तक का कार्य खुशी-खुशी कर देते थे. उनके लिए जरूरत पड़ने पर चरस और गांजा सप्लाई करते, झूठ बोलते, जेल-हवालात जाते. अपने घर-परिवार, बीबी-बच्चों यहां तक कि खुद को भी दाव पर लगाए रखते….

देश में आदमी की औसत जीविता भले की सत्तरवें वर्ष को छू रही हो. मगर राजनेताओं की मेहरबानी से बापूधाम में वह चालीस से ऊपर नही झांक पाई थी. बापूधामवासी इसी से प्रसन्न थे. भूख-बेकारी, हारी-बीमारी, नेता और पुलिस की मेहरबानी से जितना भी जीवन उन्हें मिलता, वे सहर्ष जी लेते. मरते समय भी उनकी जुबान पर अपने नेता का नाम रहता….दिल में उसके लिए देश की सबसे बड़ी कुर्सी की कामना.

बहरहाल, ऐसे दबंग लड़कों को तरक्की भी जल्दी मिलती. पार्टी हाईकमान की मेहरबानी से ऐसे काम के लड़कों को अविलंब पार्टी-संगठन से जोड़ लिया जाता. अगर इसके बाद भी उनका दबंगपना बना रहे तो गली-मुहल्ले की दादागिरी, लड़कियों को छेड़ने और पुलिस को धमकाने के अधिकार भी उन्हें बारी-बारी से प्राप्त हो जाते.

बापू इन सबका प्रेरक था. वह बिना किसी भेदभाव से हर नेता को ‘लड़के’ उपलब्ध कराता. यही कारण है कि सब बापू की इज्जत करते थे. तुम कहोगे कि पढ़ाई? रात-दिन अपने नेता की सेवा करने वाले बच्चे स्कूल कब जाते थे? बड़े नादान हो बाबू! पढ़ाई-लिखाई की जरूरत तो उन लोगों को पड़ती है, जिन्हें अपना भविष्य अनिश्चित जान पड़ता हो. बापूधाम में तो कुछ भी अनिश्चित नहीं था, भूख और बेकारी, गरीबी और लाचारी, नेता की गुलामी, पुलिस की लताड़, जिंदगी की ठोकरों से लेकर अंत में मौत की ताबेदारी तक….सभी कुछ एकदम सुनिश्चित था.

तो ऐसा था मेरा बापू और हमारा बापूधाम! जहां मैं जन्मा और पला-बढ़ा. जहां मैंने कदम-कदम चलना सीखा. जहां मुझे देवी जैसी मां मिली. जहां रहकर मैंने दुनिया को जाना-समझा. जहां बेशुमार ठोकरें मिलीं और जहां मेरी बरबादी की यह दर्दभरी दास्तान लिखी गई.

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मेरे जन्म की कथा बड़ी विचित्र है….!

अनहोनी जैसा था मेरा जन्म. हालांकि बापूधाम के लिए यह बहुत ही सामान्य घटना थी. चुनावों के आठ-नौ महीने बाद वहां ऐसी अनहोनियां अक्सर घटती रहती थीं. मां बताया करती थी कि बापू ने मुझे एक निर्दलीय उम्मीदवार परमात्माशरण से पूरे पांच सौ रुपये और ‘अंग्रेजी का अद्धा’ लेने के बाद पैदा किया था. उसकी शराब का स्वाद बापू के मुंह ऐसा चढ़ा कि वह महीनों तक केवल परमात्माशरण का नाम जपता रहा.

यद्यपि उन चुनावों में बापू ने अपना कीमती वोट, बस्ती में बनी आम सहमति के आधार पर, किसी और उम्मीदवार को दिया था. यह भी सच है कि चुनाव में परमात्माशरण की हार हुई थी. उसकी हार भी पहले से ही तय थी. परमात्माशरण के चुनाव हार जाने का बापू को जरा भी गम नहीं था.

जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं, अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और बापूधाम की परंपरा के अनुसार, वह अपनी संतान का नाम परमात्माशरण या उसके द्वारा भेजे गए ब्रांड के नाम के आधार पर रख सकता था. बापूधाम में कई लड़कों के नाम रमन्ना, विहस्कर, लड़कियों के ब्रांडो, रमाली, जिन्नी जैसे थे. परमात्माशरण द्वारा भिजवाए गए ब्रांड का स्वाद भी अनूठा था. बापू बात-बात पर उसका नाम लेता, उसके स्वाद की दुहाई देता था. उसकी चसक महीनों तक उसके दिलो-दिमाग पर सवार रही. बावजूद इसके वह मानता था कि ब्रांड से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है—परमात्माशरण! जिसने दरियादिली दिखाते हुए वह अद्भुत ब्रांड बस्तीवालों तक पहुंचाया है.

बापू ने कई दिनों तक इस मुद्दे पर सोचा. बापूधाम के गुणीजनों से सलाह-मशविरा किया. सभी का मत था कि यद्यपि ‘ब्रांड’ अनूठा है, महत्त्वपूर्ण है. लेकिन परमात्माशरण की कृपा उससे भी ऊपर है, क्योंकि उसी ने उस ब्रांड के दर्शन कराए हैं. अपने तर्क के समर्थन में गुणीजनों ने यह दोहा भी पढ़ा था—

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय.

दोहा सुनाने के साथ ही गुणीजनों ने उसकी व्याख्या भी कर दी थी—

‘परमात्माशरण गुरु है. वही ब्रांड ‘गोविंद’ से मिलवाने वाला है. इसीलिए बाबा कबीरदास जी के अनुसार परमात्माशरण का दर्जा उससे भी ऊपर है?

बापू तो परमात्माशरण की मेहरबानी से इतना अभिभूत था कि अगर उसका बस चलता तो परिवार के सारे सदस्यों के नाम परमात्माशरण के नाम के अनुसार बदल देता. मां के लिए तो उसने एक नया नाम सोच भी लिया था—परमी! या परमपियारी…! जो भी नाम मां को पसंद आए. बापू ने उदारता का प्रदर्शन करते हुए, इन दोनों नामों में से कोई एक नाम अपने लिए चुनने का प्रस्ताव मां के आगे भी रखा था. परंतु मां सुनते ही बिफर पड़ी थी.

मैंने मां को पहली बार इतने कोप में, बापू से झगड़ते हुए देखा था. जो हो मां के गुस्से को देख बापू को पूरे परिवार के नाम बदलने का इरादा छोड़ना ही पड़ा. अंततः बहुत सोच-विचार के पश्चात, बापू ने मुझे नाम दिया था—परमात्मा!

परमात्माशरण के प्रति अपनी पूरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाने लिए वह मुझे उसका पूरा नाम देना चाहता था. किंतु शराब से लड़खड़ाती हुई जुबान द्वारा, परमात्मा के साथ ‘शरण’ का उच्चारण करना लंबा और बहुत मुश्किल-भरा काम था. हालांकि बापू ने इसका अभ्यास करने की काफी कोशिश की थी.

बापू के संगी-साथियों ने बताया था कि एक बार निश्चित हो जाने के पश्चात वह कई दिनों तक ‘परमात्माशरण….परमात्मा..शरण’ रटने की कोशिश करता रहा था. परंतु शराब से ढीली पड़ी जुबान कभी परमात्मा सुरण कहती तो कभी परमात्मा हरण तक फिसल जाती. वह चाहे जैसा भी हो, था तो मेरा बाप ही. अपनी औलाद का नाम परमात्मा हरण या परमात्मासुरण कहने की बेशर्मी तो दिखा नहीं सकता था. यह तो परमात्माशरण के प्रति घोर कृतघ्नता होती. अंततः उसे परमात्मा सेन से ही संतोष करना पड़ा.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

दंश—धारावाहिक उपन्यास

दूसरी किश्त

नमस्ते, बाबू साहेब!

हुजूर! मैं परमात्मा सेन उर्फ परमात्मा शरण वल्द घुरिया, उर्फ घनश्याम आपको अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूं—सुनिएगा न!

सिरीमान! कहानी शुरू करूं उससे पहले आपसे एक गुजारिश है. जरा धीरज बनाए रखिएगा. क्योंकि बात जरा लंबी है. हां, यदि बोर होने लगेंतो शरमाइएगा मत. हाथ उठा देना. मैं चुप हो जाऊंगा. पर मुझे विश्वास है कि आप बोर नहीं होंगे. क्योंकि आगे जो मैं बताने जा रहा हूं वह मेरे घर का मामला है. दुख, तखलीफों और संघर्ष में आकंठ डूबा हुआ. दूसरे की असफलता की कहानी रुचिकर तो होती ही है. उसमें ईर्ष्या के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती.

मैं वायदा करता हूं कि आगे जो भी कहूंगा, बिल्कुल सच कहूंगा. वे बातें बिलकुल साफ-साफ कहूंगा जो मुकम्मल हैं, जो मेरे साथ घटीं. वे नहीं जो घटते-घटते रह गईं.

बाबू साहेब! मेरे ‘मैं’ की कहानी जो असल में एक अ-कहानी ही है, भारत के एक महानगर के बड़े वोट-उत्पादक क्षेत्र से प्रारंभ होती है. आप हैरान हैं यह सुनकर? लगता है मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ आपको. या फिर कड़वी सचाई ने आपके होश फाख्ता कर दिए हैं. हो तो यह भी सकता है कि आप अभी बात की तह तक पहुंच ही नहीं पाए हों. अथवा यह भी कि आप जानबूझकर अनजान बनने का नाटक कर रहे हों.

जो हो….अपनी आप जानें. मैंने तो जो जिया, जैसा भोगा वही कहूंगा, एकदम साफ-साफ!

तो यह कहानी एक महानगर की है. महानगर जो अपनी भीड़ के लिए जाने जाते हैं. और भीड़ से ही विस्तार पाते हैं. उस भीड़ में मेरे जैसे और भी कई ‘मैं’ हो सकते हैं. यह कहानी किसी और के ‘मैं’ की भी हो सकती है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कहानी मेरे ‘मैं’ की है या किसी और के ‘मैं’ की. इस महानगर की है या उस महानगर की.

हर महानगर एक तालाब होता है. दिखावे के लिए उसमें दस-पांच कमल खिले होते हैं. सतह से ऊपर…महानगर के मुखौटे के माफिक. प्रत्येक महानगरवासी उन्हीं को अपनी हकीकत मानता है. हर जगह उसी का प्रदर्शन करता रहता है. मगर पानी की सतह के नीचे, घने दलदल में, बेशुमार कीड़े गिजबिजाते रहते हैं. और यह तो हम सभी जानते हैं कि झांड़-झंखाड़ के बीच, बदबूदार कीचड़ में रेंगते, गिजबिजाते और गिरते-पड़ते कीड़ों की भीड़ में कोई भी ‘मैं’ विशिष्ट नहीं होता. इसलिए कोई भी कहानी निरपेक्ष नहीं होती. ना ही सर्वथा अनोखी.

चूंकि इस कहानी को मैं सुना रहा हूं. इसलिए मान लीजिए कि यह कहानी मेरे ही ‘मैं’ की है. वह कहानी किसी भी ‘मैं’ की हो सकती है. इसलिए मैंने इसे अ-कहानी माना है.

महानगरों को अगर भारत की प्रगति का प्रतीक माना जाए तो वहां की प्रगति का ग्राफ दर्शाती हैं—बेशुमार झुग्गियां. जितनी अधिक झुग्गियां उतनी ही अधिक गरीबी. जितनी अधिक गरीबी…चंद लोगों के पास उतनी ही ज्यादा अमीरी. जितनी ज्यादा झुग्गियां, उतना ही बड़ा महानगर. जितना बड़ा महानगर, उतना ही उसका महत्त्व.

महानगरों की रौनक में झुग्गियां उतनी ही जरूरी होती हैं जितनी कि फैशन परेडों में परंपरागत भारतीय परिधान. देश की किस्मत बदलने निकले सुरसामुखी नेताओं के लिए ये झुग्गियां ही सौभाग्य के द्वार खोलती हैं. ये अगर मेहरबान हों तो गली-गली चप्पलें चटकानेवाला शोहदा, कुबेर के खजाने पर बैठ, देश का भाग्य-विधाता बन जाता है. एक हिस्ट्रीशीटर को आममाफी मिल जाती है. अनपढ़, गंवार, कूंपमंडूक और निर्बुद्धि आदमी देश का कर्णधार, नीति-निर्माता मंत्री और राष्ट्राध्यक्ष बन जाता है. बूढ़ा होते-होते वह विदेशी बैकों में पांच-सात खाते खुलवा लेता है. बीमार होकर इलाज के बहाने विदेश यात्राएं करता है. उसका इलाज कराते-कराते देश बीमार पड़ने लगता है. मरने से पहले वह अपने कुंटुबियों के नाम तीन-चार महानगरों जितनी संपत्ति छोड़ जाता है.

और देश! वह तो गरीब की गाय ठहरा. पक्ष और विपक्ष जिसे बारी-बारी दुहते हैं. दुहते ही रहते हैं.

झुग्गियों को महानगर की जनसंख्या-वृद्धि के सामूहिक कुटीर उद्योग भी माना जा सकता है. इन्हीं के दम पर सरकारें बनती हैं. इन्हीं के दम पर सत्तापक्ष देश की संपत्ति की लूट-खसोट करता है—विपक्ष सत्ता में आने के सपने पालता है. यहीं बूथ कैप्चरिंग के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार किए जाते हैं. सरकार अपनी योजनाएं इन्हीं को ध्यान में रखकर बनाती है…विदेशों से मोटा कर्ज लेकर बड़े-बड़े वायदे करती है. मगर झुग्गियों तक आते-आते योजना-राशि चुकने लगती है. समा जाती है बेईमान दलालों, घूसखोर अफसरों और लंबोदरी नेताओं के पेट में. विवश होकर सरकार को अगले चुनावों तक केवल आश्वासन से काम चलाना पड़ता है. आश्वासन लोकतंत्र की प्राण-वायु हैं. ये मंत्री और कुर्सी के बीच फेवीकोल से भी मजबूत जोड़ बनाते हैं. जिंदगी में आश्वासन, हवा, पानी और बिजली जैसे ही जरूरी हैं.

झुग्गियों में तो बिना आश्वासन के बात बन ही नहीं सकती. भूख, गरीबी, महंगाई, नोंक-झोंक और बेकारी की चैमुखी मार से जब जनता का दम घुटने लगता है तो चतुर मंत्री आश्वासन की प्राणवायु छोड़कर उन्हें नई आशाएं प्रदान करता है. जिन नेताओं के पास आश्वासनों का अक्षय भंडार हो, वे संसद की मारपीट में भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं. जीते जी महानता के तंबू में रहते हैं, मरने के बाद अमर कहे जाते हैं.

बाबू साहेब! ऐसे ही एक महानगर में एक मलीनतम बस्ती थी—बापूधाम! मैं वहीं पर पैदा हुआ था या यह कहो कि पैदा किया गया था.

बापूधाम की बसावट कब शुरू हुई, इसके बारे में तो बापू को भी ठीक-ठीक जानकारी नहीं थी. लेकिन बस्ती के बुजुर्ग बताया करते थे कि जब से हमारे शहर को महानगर बनने का शौक चर्राया, तभी से इस बस्ती के दिन बहुरे थे. इससे पहले वहां गंदा नाला बहता था. जिसमें शहर-भर का गंदा पानी आता था. शहर ज्यों-ज्यों तरक्की कर रहा था, त्यों-त्यों उस नाले की गहराई और चौड़ाई भी बढ़ती जा रही थी. साथ-साथ बढ़ रहा था नाले का पानी…पानी में कीचड़…कीचड़ में गिजबिजाते हुए कीड़ों की संख्या…बदबू का अनुपात. नेताओं के झूठ और अनाचार…अधिकारियों के निकम्मेपन और भ्रष्टचार जैसा.

बात उन दिनों की है जब उस शहर ने महानगर बनने का ख्वाब देखना शुरू ही किया था. बताते हैं कि उन दिनों एक किस्मत की मारी, बेचारी, विधवा स्त्री अपने पेट में पल रहे पाप को मिटाने के लिए, खुद भी मिटने का संकल्प लेकर गंदे नाले के पास पहुंची थी. उससे पहले भी कई प्राणी, जिंदगी से निराश हो, मुक्ति-कामना के साथ वहां पहुंच चुके थे. महानगर के उच्छिष्ट की भांति, गंदा नाला उन्हें भी अपने भीतर समा लेता था.

विधि का विधान, नाले के निकट पहुंचते-पहुंचते उस स्त्री के मन में प्राणों का मोह उभर आया. ममता दुनियावी संघर्षों और लांछनाओं पर भारी पड़ने लगी. वात्सल्य-भरी छातियों में दूध उतरने लगा. मरने का इरादा छोड़ स्त्री ने इधर-उधर से कबाड़ जुटाया. कुछ बांस-बल्लियों, टाट-पन्नियों का जुगाड़ किया. चार-पांच दिन लगे थे झॊंपड़ी बनाने में. उसी में वह रहने लगी. मृत्यु पर जीवन की विजय हुई. जिंदगी रफ्ता-रफ्ता राह पकड़ने लगी. लोगों का स्वभाव! कुछ दिनों तक तो उस औरत के बारे में टीका-टिप्पणी होती रही. धीरे-धीरे बात आई-गई हो गई. लोगों ने गंदे नाले, उसमें बहने वाले उच्छिष्टों, कीड़ों, जानलेवा बदबू और वहां भटकने वाले आवारा-फालतू बेहया जानवरों के साथ-साथ उस विधवा-मां को भी स्वीकार कर लिया.

समय ने करवट ली. विधवा स्त्री की झोंपड़ी किलकारियों से भर गई. उसके बाद तो उस स्थान की भाग्य-रेखा ही बदल गई. कालांतर में गंदा नाला समाज के बहिष्कृत और संतप्त लोगों की शरणस्थली बनने लगा. न केवल मनुष्य, बल्कि समाज द्वारा ठुकराए हुए जानवर भी जैसे कुत्ता, सूअर, बूढ़ी गाय, टूटी टांगवाला मरियल-सा गधा, मरणासन्न सांड, बिल्लियां, यहां तक कि एक सींगवाला बैल भी वहां पहुंच गया.

धीरे-धीरे गंदा नाला महानगर में अपनी पहचान बनाने लगा. एक उत्साही पत्रकार ने उसपर एक लेख लिखकर नाम कमाया, तो एक जनवादी बनने चले कवि ने लंबी, भाव-प्रवण कविता मंच पर इतनी बार सुनाई कि बाकी कवि अगले वर्ष उसका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करने के बारे में सोचने लगे.

कहते हैं कि इत्र और इश्क छिपाए नहीं छिपते. उस मिट्टी में छिपी गंदे नाले की गंध से कुछ सभ्य किस्म के लोग वहां जाने से भले ही बचते रहे हों. मगर उसमें फूलता-फलता वोट-बैंक नेताओं का मन ललचाने के लिए पर्याप्त था. और फिर जैसा कि स्वाभाविक ही था, एक युवा नेता की नजर उसपर गढ़ गई. नेता बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी था. उस उर्वर भूमि में उसने अपने सपनों की फसल को खूब लहलहाते हुए देखा. उसके बाद तो उसकी आंखों में शुभ सपनों की कतार जैसी लग गई. धीरे-धीरे प्रदेश के मंत्री की कुर्सी भी उसके सपनों में आने लगी. कई बार उसने खुद को संसद भवन में अपनी भारीकम तोंद को खुजाते हुए देखा. आगे कदम बढ़ाने के इतनी उम्मीद पर्याप्त थी.

और फिर एक दिन उस क्रांतिकारी नेता ने क्रांति का आवाह्न किया. सभी को हैरान करते हुए उसने उस बस्ती को गोद लेने की घोषणा कर दी. बाद में संपर्क काम आए. चाटुकारिता ने गुल खिलाया. बस्ती दिनों-दिन फैलती चली गई. पूरे महानगर के मजदूर बेलदार, जेबकतरे, नशैड़ी, रिक्शा-ठेलेवाले…धंधा करने वाली गरीब औरतें, फकीर, जोगी, नट, कलंदर, जुलाहे, मोची, यहां तक कि चोर-उच्चके और उठाईगीरे भी वहां जाकर बसने लगे. कीचड़ से उठने वाले बुलबुलों-सी वह बस्ती भी फलने-फूलने लगी.

युवा नेता की मेहनत रंग ला रही थी. उस समय तक उस दिनों-दिन फूलती-फैलती बस्ती का नामकरण संस्कार भी नहीं हो पाया था. अपनी सुविधा के लिए लोग कुछ भी पुकार लेते थे. हालांकि गंदा नाला अब कहीं नजर नहीं आता था. शहर का गंदा पानी सीवर में ढकेल दिए जाने के बाद से वह मामूली बरसाती नाली जैसा ही दिखता था. झुग्गियों की महा-भीड़ में वह नाली भी गुमशुदा थी. जैसे कि शिवालिकों में गंगा. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि गंदा नाला कहीं गायब नहीं हुआ था. बल्कि वहां के निवासियों की आत्मा में रच-बस गया था. उतर गया था उनके मानस में. तथाकथित सभ्य और बड़े लोगों को तो उस बस्ती में रहनेवालों की देह से भी गंदे नाले की गंध आती. इस कारण जब तक कोई मतलब न हो, वे उनसे दूर-दूर ही रहते थे.

युवा और महत्त्वाकांक्षी नेता की निगाह अभी भी अपने भविष्य पर टिकी थी. अब उसकी चिंता बस्ती का नामकरण करने की थी.

‘नेहरूपुरी कैसा रहेगा?’ उसने अपने आप से पूछा था.

‘नेहरू का जमाना तो कभी का लद चुका.’ मन के किसी कोने ने चेताया.

‘राजीव गांधी नगर…आजकल उनकी पत्नी सरकार की सर्वेसर्वा है. बेटा राहुल प्रधानमंत्री की कुर्सी से बस चार कदम दूर हैं. नगर निगमवाले बस्ती की ओर झांकेंगे भी नहीं.’

‘आजकल सरकारें पांच साल से ज्यादा टिकती ही कहां हैं. दूसरी पार्टी के सत्ता में आते ही संभालना मुश्किल हो जाएगा.’ बुद्धि ने तर्क किया.

‘मानने दो, आजकल कांग्रेस से अच्छी पट रही है. जितना वे बुरा मानेंगे उतना ही इधर वाले खुश हो जाएंगे.’

‘इन दिनों अच्छी पट रही है. किंतु हमेशा यही स्थिति रहेगी, इसकी क्या गारंटी है? खासकर चुनावों में. इधर नहीं तो उधर से ही सही, टिकट पक्का करना है तो कांग्रेस-भाजपा का मोह छोड़ना ही होगा.’

नेता के साथ कशमकश की यह स्थिति कई दिनों तक बनी रही. वह बस्ती को सुंदर और टिकाऊ नाम देना चाहता था. इस बीच उसकी पत्नी ने ‘निर्मला कुटीर’ नाम सुझाया. निर्मला उसका अपना नाम था. वह चाहती थी कि पति अपने पति-धर्म का निर्वाह करे. मगर युवा नेता को सस्ती किस्म की भावुकता नापसंद थी. हालांकि वह जानता था कि हर कामयाब नेता राजनीति का पहला शिकार अपने परिवार को ही बनाता है. इसमें भी उसकी अर्धांगिनी का नंबर सबसे पहले आता है. बाद में भले ही पीढ़ियों तक उन सबका उद्धार करता रहे. इसलिए पत्नी की नाराजगी से घबराए बिना उसने नाम खोजने का काम जारी रखा.

कुदरत की मेहरबानियों का कोई अंत नहीं! युवा नेता के मुंह से ठीक यही शब्द निकले थे जब सौभाग्य के प्रतीक-सा एक नाम अचानक उसके दिमाग में आ कौंधा था—बापूधाम! वह उछल पड़ा था. अपने भीतर उसको बापू का तेज छलछलाता, उछलता, कूदता-सा महसूस हुआ. लगा था कि इस नाम में ‘महान’ बनाने के सारे तत्व मौजूद हैं. नाम नहीं पारस पत्थर है, जिससे भी जुड़ेगा, उसको कंचन कर देगा. भूख, गरीबी, बेकारी, महामारी और सैकड़ों किस्म की व्याधियों के तले दिन-रात पिसने वाले वहां के बाशिंदों को भी बस्ती का नया नाम बहुत पसंद आया. भीड़ का धर्म निभाते हुए वे युवा नेता की जय-जयकार करने लगे. उसे अपने कंधों पर उठाकर नाचने लगे.

नेता को अपने सपने करीब नजर आने लगे…!

देखते ही देखते उस बस्ती में एक मसीहा उतरने लगा. नेता की पत्नी जिद्दी थी. वह घर छोड़कर जाने की धमकी दे चुकी थी. परंतु पति को मिलते सम्मान ने उसकी जिद भी ढीली कर दी. कुछ वर्षों तक वह नेता बापूधाम के वोटों का इकलौता अधिकारी बना रहा. उन्हीं के दम पर वह पार्षद का चुनाव लड़ा और विजयी हुआ. आगे उसकी योजना विधानसभा और संसद तक जाने की थी कि एक कार दुर्घटना ने उसकी लंबी दिखने वाली उड़ान को विराम दे दिया.

बापूधाम…!

मैं उसी बापूधाम में पैदा हुआ था, बाबू!

मेरा बापू कोई नेता नहीं था. किसी पार्टी के साथ उसका कोई संबंध भी नहीं था. इसके बावजूद चुनाव के दिनों में उसके रंग-ढंग पूरी तरह बदल जाते थे. उन दिनों हमारी झुग्गी अचानक खास बन जाती. बापू को पूछने वाले लोगों की भीड़ दरवाजे पर लगी रहती. इससे खुश होकर बापू, सावन के गधे-सा फूला-फूला फिरता. शहंशाह की तरह लोगों को आदेश देता, बात-बात पर उन्हें गरियाता और जरूरत पड़ने पर प्यार लुटाने का नाटक भी करता था.

अपने ही बापू की तुलना गधे के साथ करना बदतमीजी है. मगर मैंने सच कहने का वचन दिया है. अपनी भावनाएं वे जिस भी रूप में मेरे मन में उठी हैं—आपसे छिपा नहीं सकता. इस गुस्ताखी के लिए कृपया मुझे क्षमा करें. दरअसल जिंदगी मेरे बापू के लिए बोझ थी. अगर मां बापू की जिंदगी में नहीं आती तो वह कभी का इस बोझ से छुटकारा पा चुका होता. हालांकि मां का आना भी बापू के लिए खास उत्साह न जगा सका. अपनी बे-ख्वाब जिंदगी को वह बोझ की तरह ढोए जा रहा था. इस तथ्य को वह स्वयं भी जानता था और वे लोग भी, जिनके लिए वह उस बोझ को उठाए हुए था.

बाकी दिनों में बापू को गरियाने वाले लोग, चुनावों में उसे अपना नेता मान लेते थे. वे अपनी छोटी-छोटी समस्याएं लेकर उसके सामने इस प्रकार आते, मानो उसके हाथ में जादू की छड़ी हो, अथवा वह कोई मंत्री या सांसद हो. बापू भी पल्लेदारी और चोरी के अपने रोजमर्रा के धंधे को थोड़े दिनों के लिए छोड़कर सिर पर टोपी सजा, मौसमी नेता बन जाता. देश की राजनीति और शराब को एक समझनेवाले लोग उन दिनों उसके आगे-पीछे घूमते, सलाम बजाते थे.

किसी खास विचारधारा, सिद्धांत या वाद से बापू को कोई मतलब न था. न वह इनमें से किसी का अर्थ ही समझता था. पर वह अकेला आदमी था जो खद्दर पहनकर भी सच बोलने की हिम्मत रखता था और बोलता भी था. नशा ठीक-ठाक हो तो मां सरस्वती उसके कंठ में विराजमान हो जातीं. उस हालत में वह बोतल को नचा-नचाकर कहता था—

‘संविधान-फंविदान को गोली मारो दद्दा! असल ताकत तो इसमें भरी है. यही ससुरी वोटर को खींचकर ‘बुलेट बाॅक्स’ तक ले जाती है. अगर ये लालपानी ना मिले तो देश-भर के बुलेट बा॓क्सों पर कुत्ते लोटते हुए नजर आएं.’

बैलेट बा॓क्स को बापू हमेशा ‘बुलेट बा॓क्स’ ही कहता. उसके लिए भाषणबाजी, नेता द्वारा किया गया काम, कस्मे-वायदे एकदम बकबास और फिजूल थे…चुनावों में कामयाबी दिलाती है—शराब की तीखी गंध, उसकी मात्रा और उसकी दमदार क्वालिटी, ऐसा वह मानता था.

सिर्फ उन्हीं दिनों वह मुंह पर आई बात साफ-साफ कहता. बाकी दिनों में वह चुप्पा किस्म का इंसान था और जरूरत पड़ने पर ही बोलता. राजनीति में जाने के लिए अनेक कारण होते हैं. और होने भी चाहिए. कुछ लोग जानबूझकर बेईमानी का रास्ता चुनते हैं. सजा से बचने की कोशिश उन्हें राजनीति से जोड़ देती. कुछ के लिए जेलें वरदान बन जाती हैं. कुछ गुंडागर्दी, दहशत और दमन का रास्ता चुनकर देश की गर्दन पर सवार हो जाते हैं और बड़ी बेशर्मी से सवारी गांठने लगते हैं.

इन सबसे अलग कारण था बापू का. शराब की लत उसे नेताओं के करीब ले आती थी. उसको भरोसा था कि उसकी अक्ल केवल नशे की हालत में ही काम कर पाती है. हर पैग के साथ दिमाग की सक्रियता को जोड़ने के लिए एक तुकबंदी उसने गढ़ी हुई थी—

एक पैग में थोड़ा-थोड़ा

दूसरे पैग में अरबी घोड़ा

तीसरे पैग में उड़नखटोला

चौथे पैग में राम निहोरा

व्यवहार में यह तुकबंदी अर्थहीन ही थी. जिसपर अमल कर पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव जैसा था. उस समय वह पैगों की गिनती समेत दुनिया-जहान को पूरी तरह भुला देता. उठता तो झूमते हुए. जब बोतल खाली हो चुकी होती. अपनी ही बात पर अमल न कर पाने का बापू को अफसोस जरूर होता. मगर उसके लिए खुद को दोषी कभी नहीं मानता था. इस बारे में यदि कोई उसे छेड़ता तो उसके सब्र का बांध यकायक टूट जाता—

‘हरामखोर-साले-शराब में भी मिलावट करते हैं. भगवान करे उनके बदन में भी वही कीड़े पड़ें जो शीरा को शराब में बदलने का काम करते हैं.’

‘कक्का, उस शराब को पिएगा कौन?’ कोई शरारती उकसावे का काम करता.

‘वे कीड़े ही पिएंगे और मरेंगे, हरामखोर….सूअर!’ हिकारत-भरा जवाब मिलता. आश्चर्य की बात! बापूधाम के अधिकांश मतदाताओं पर बापू का प्रभाव था. देश में राजनीति रोज-रोज करवटें बदलती. कभी वह धर्म की नाव पर सवार होती—कभी जाति की. कभी महंगाई मुद्दा बनती, कभी प्रांतीयता सिर उठाने लगती. दिमागदार लोग कभी आतंकवाद पर चिंता व्यक्त करते, कभी विदेशनीति की खामियों पर. कभी बढ़ती जनसंख्या की पर अपनी चिंता और ज्ञान बघारने लगते. देश की राजनीति में प्रतिदिन नया मसला जन्म ले रहा होता. लेकिन हमारा बापूधाम इन सब परिवर्तनों से अलग और अछूता था.

एक तरह से यह भी बापू का ही कमाल था. राजनीति करने का बापू का अंदाज एकदम निराला था. यूं तो चुनाव के दिनों में बाकी नेताओं की देखा-देखी वह भी खद्दर पहनता. लेकिन असली काम शराब की बोतलों से साधता था. चुनाव का मौसम शुरू होते ही हमारी झुग्गी शराब की पेटियों से भर जाती. बस्ती में मतदाताओं के बीच शराब बांटने की जिम्मेदारी बापू की ही होती. वह अनपढ़-गंवार जरूर था. लेकिन हिसाब का पक्का—कभी भूल नहीं करता था. इस बात को पूरा बापूधाम मानता. इसी कारण चुनाव के दिनों में ही बापू की इज्जत भी होती थी.

मतदान होने के पखवाड़े पहले से ही बस्ती में उत्सवी माहौल बन जाता. प्रत्येक झुग्गी में मतदाताओं की संख्या के हिसाब से बोतलें बांटी जातीं. लेकिन यह मानते हुए कि आज के गैर वोटर भविष्य के पक्के मतदाता हैं, उनको वोटरों से आधी शराब देने का नियम था. यह नियम भी बापू का ही बनाया हुआ था. जिसे बस्तीवालों के साथ-साथ उनके वोटों के खरीददार, चाटुकार नेता सभी मानते थे.

स्त्रियां प्रायः शराब नहीं पीती थीं. मगर बोतलों के बंटवारे के समय अपना हिस्सा मांगने में वे कभी चूकती नहीं थीं. पत्नी के हिस्से की शराब भी पति को पीने को मिलती. इसलिए इन दिनों उजाड़ मान ली गई गृहस्थियों में भी प्यार उमड़ने लगता. एक पत्नी के रहते दूसरे विवाह पर कानून कुछ भी सोचता हो, बापूधाम में दो पत्नीधारी पति को एक पत्नीधारी पति से अधिक शराब मिलती. इस कारण लोग दबे मुंह उन स्त्रियों के नाम भी गिनाने लगते थे, जिनसे उनके दबे-छिपे संबंध हों. मगर बापू को धोखा दे पाना आसान नहीं था. जब तक उन दबे-छिपे संबंधों से वोट बढ़ने की पक्की संभावना न हो, वह उनकी बातों में नहीं आता था.

मामला भले ही शराब बांटने का हो. सामाजिक सरोकारों और शुचिता का भी ध्यान रखा जाता. नियमानुसार बिना विवाह के साथ रह रहे स्त्री-पुरुष को, स्त्री का हिस्सा नहीं मिलता था. परंतु लिखित आचारसंहिता के अभाव और वोट की संभावना को देखते हुए बापू नियम में ढील दे देता था. अगर वह इंकार करे तो वे स्त्रियां स्वयं बापू के पास आकर बहस करने लगती थीं. बापू की कमजोरी थी कि वह बहस से घबराता. अतः वोट की संभावना ना हो, तो भी वह स्त्रियों की बात मान लेता था.

मुफ्त में मिली शराब गंगाजल के समान पवित्र मानी जाती. ऐसी अवस्था में बापू को पुजारी का दर्जा मिलना ही था. बापू के लिए वे दिन बड़ी मौज के होते—वह और उसके साथी तरह-तरह के ब्रांड का ‘मजा’ लेते. मतपेटियां खुलने तक बापू नशे में ‘टुल्ल’ रहता. बाहर रहना, बाहर खाना…बाहर ही पीना-सोना. घर को तो वह करीब-करीब भूल ही जाता था.

शराब का दौर सुबह से ही शुरू हो जाता. सुबह के नाश्ते के साथ शाम का कार्यक्रम भी बन जाता. जो उम्मीदवार अच्छी किस्म की शराब बांटता, वही अच्छा माना जाता. शराब के स्वाद के आधार पर बापूधाम के लोग अलग-अलग पार्टी में बंट जाते. जिस उम्मीदवार द्वारा भिजवाई गई शराब का स्वाद जीभ को भा जाता, अगले दिन उसी के पोस्टरों से झुग्गियां पाट दी जातीं. घर-घर उसी का झंडा हवा में फहराने लगता. कुछ ऐसे भी थे जिन्हें शराब की गंध से ही परहेज था. पर ऐसे लोगों की संख्या बस्ती में बहुत ही कम थी. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता. इस उपेक्षा पर वे लोग बदले हुए वक्त को कोसते. मनुष्य के गिरते आचरण और मर्यादाओं की दुहाई देते. फिर ठंडे पड़ जाते. निर्णायक स्थिति में न होना और निर्णायक स्थिति तक पहुंचने के लिए चमत्कार की उम्मीद बांधे रहना, ऐसे लोगों की आदत में शुमार था.

बस्ती में बोलबाला उन्हीं का था जो बोतलों से ‘दिल का’ नाता रखते. ऐसे लोगों को बोतल के साथ-साथ यदि नकद-नारायण भी हाथ लग जाएं तो मानो कमाल हो जाता. लड़खड़ाती जुबान, पिलपिले चेहरे, खोखले-कफ-भरे सीनों और डगमगाते हुए कदमों से अपने चहेते उम्मीदवार की जीत का नारा लगाते हुए लोग, टोलियां बनाकर बाहर निकल पड़ते. विभिन्न चुनावी दल नए-नए मुद्दे लाते. कभी परिवर्तन तो कभी विकास के नारे लगाते. जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता की लहरें बापूधाम में भी खूब उठतीं. मगर धीरे-धीरे सब अपने आप दबती चली जाती थीं.

बापूधाम में सर्वाधिक कारगर मुद्दा थी— शराब! वही हर बार सबसे सशक्त मुद्दा बनती. शराब सस्ती हो या महंगी, देशी हो या विदेशी, सबके कद्रदान उस बस्ती में थे. वे उसे अपना ही लेते थे. मगर चुनाव के मैदान में वही उम्मीदवार टिकता, जो सबसे महंगी शराब बंटवाता.

गांधी जी भले ही शराब को पाप और पतन की निशानी कहते रहे हों. भले ही उन्होंने मदिरापान का आजन्म विरोध किया हो. परंतु उन्हीं के नाम पर बसे बापूधाम में शराब के बड़े-बड़े विशेषज्ञ बसते थे. वे बोतल का रंग देखकर ही उसके स्वाद का अंदाजा कर लेते. यह ठीक ऐसा ही है जैसे उस युवा महत्त्वाकांक्षी और तेजी से उभरते हुए नेता ने, जो बापूधाम के बसने के पश्चात कुछ ही अर्से में देश की राजनीति में ‘खासमखास’ बन चुका था, अल्पकाल में ही सरकारी सौदों में कमीशन के अवसरों की पहचान करने में प्रवीणता प्राप्त कर ली थी.

बापूधाम के मतदाताओं की यही समझ वहां की राजनीति का भविष्य तय करती थी. इसी पर टिका था—महानगर के दर्जनों नेताओं का भविष्य, घूसखोर अफसरों के घर की शांति. बापूधाम में ‘अंग्रेजी’ का क्रेज ‘देसी’ से कहीं ज्यादा था. देशी की चार बोतलों के बदले अंग्रेजी का अद्धा भी उन्हें मंजूर था. अंग्रेजी वाले उम्मीदवार को वरीयता भी दी जाती थी.

बापूधाम में हरेक नेता का भविष्य उसके द्वारा भिजवाई गई बोतलों से तय होता था. जिस उम्मीदवार की भिजवाई गई शराब का स्वाद बस्तीवालों को नापसंद रहता, चुनावों में उसकी लुटिया डूबनी तय होती. जिस प्रत्याशी की शराब वहां के बाशिंदों की जीभ को भा जाती, उसकी जीत के लिए दुआएं की जातीं. उसके साथ चलनेवाला नालायक किस्म का नेता भी बापूधाम पहुंचकर अतिविशिष्ट बन जाता था. ऐसे उम्मीदवार को लोग सिर-माथे लेते थे. आदमी तो आदमी, बस्ती की औरतें भी उसकी प्रशंसा में कसीदे गढ़तीं. पूरी बस्ती में उसकी ‘वाह-वाह’ होती रहती. युवा लड़कियां ऐसे उम्मीदवार का नाम सुनते ही शरमा जाती थीं. तो बाबू! ऐसे थी बस्ती और वहां के लोग—जहां मैं जन्मा था…. क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

दंश : धारावाहिक उपन्यास

धारावाहिक उपन्यास

[मित्रो! लंबे विराम के बाद संधान पर मैं फिर उपस्थित हूं. इस बार संभवत: लंबी मुलाकात के लिए. यह मुलाकात किश्तों में चलेगी. माध्यम होगा उपन्यास—दंश. यह मान लिया गया है कि इंटरनेट लंबी रचनाओं के लिए नहीं है. मेरा मानना है कि गंभीर पाठक रचना की लंबाई नहीं, उसकी गुणवत्ता पर निगाह रखते हैं. एक बार यदि कोई रचना पाठकों की पारखी निगाह को चढ़ जाए तो फिर उसको पाठकों की कमी नहीं रहती. इसी विश्वास के साथ मैं यह उपन्यास पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं. इस निवेदन के साथ कि यदि यह सचमुच पठनीय है, यदि इसमें जरा भी साहित्यिकता है तो कृपया मेरा उत्साहवर्धन करें. वरना कोई बाध्यता नहीं है. मुझे भी जब लगेगा कि पाठक बोर होने लगे हैं तो तत्काल विराम दे दूंगा...

आप सभी मित्रों के साथ सजग संवाद की अपेक्षा में उपन्यास दंश की पहली किश्त प्रस्तुत है. —ओमप्रकाश कश्यप]

पहली किश्त

उद्बोधन


क्या कहूं तुझे जिंदगी! स्वप्न या सच….पहेली या परिणति….अभिशाप या वरदान….मेहरबानी या मनमानी….खेल या खिलौना….बता तो? क्या कहूं? कौन-सा नाम दूं तुझे? नहीं, तू हमारे लिए सच नहीं है. तू सच होगी उनके लिए जो हर महफिल….हर मंडी में अपनी अस्मिता नीलाम किया करते हैं….जिनकी आत्मा मर चुकी है….जिनके लिए जिंदगी झूठ का कारोबार है. हमारे लिए तो तू उनींदी आंखों का ख्वाब है. निष्फल रह जाना जिसकी नियति है. तू परिणति होगी उनके लिए जो अपनी ताकत और दौलत के दम पर अपने प्रत्येक झूठ को सच में बदलने का निर्लज्ज प्रयास किया करते हैं….स्वार्थ जिन्हें उकसाता—अहं बरगलाता है. हमारे लिए तो तू सनातन अबूझ पहेली है, जिसे अंतिम सांस तक अनसुलझी ही रहना है.

जिंदगी, तू वरदान होगी उनके लिए जो निरीह आंखों से उनके सपने नोंच लेते हैं. फिर उनकी मासूमियत पर हंसते-हंसते उनका उपहास करते हैं. क्रूरता जिन्हें भाती….बेशर्मी जिन्हें लुभाती है. हम जैसों के लिए तो तू घोरतम अभिशाप है, जिसे जन्म-जन्मांतर तक हमें अपनी गर्दन पर ढोना है. तू वक्त की डरावनी किताब का ऐसा काला-कुलिश पन्ना है, जिसपर कोई कामयाब इबारत लिखी ही नहीं जा सकती. तू मेहरबानी होगी तो उनके लिए जो दूसरों की बरबादी की जमीन पर अपनी खुशियों की फसल उगाना चाहते हैं. जो जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर दंगे कराते हैं, भोले-मासूम लोगों को आपस में लड़वाते हैं और सैंकड़ों-हजारों लाशों से गुजरते हुए मसीहा बनने का नाटक करते हैं. नंगई जिनका स्वभाव है….लफंगई जिनका पेशा. हमारे लिए तो तू दर्द की मनमानी….वक्त के हाथों की दोधारी आरी है. जिसे हर पल, हर घड़ी आते-जाते हमारी सांस, हमारी आस और हमारे विश्वास को रेशा-रेशा कतरना है.

हां, तू खेल होगी, पर सिर्फ उन्हीं के लिए जो अपने चेहरों पर सैकड़ों किस्म के मुखौटे लगाए रहते हैं, जो अपनी असलियत को अपनी परछाईं से भी छिपाकर रखते हैं. फरेब जिनका ईमान है, गद्दारी जिनकी शान. हमारे लिए तो तू स्वार्थी, उदंड, निष्ठुर और निर्मम हाथों का बेजान खिलौना है. उससे जब तक उनकी खुशी हो खेलें, ऊब जाएं तो चिंदी-चिंदी करके फेंक दें. उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. क्योंकि तू उनपर मेहरबान है. हमारा तो कोई मन नहीं, मान नहीं. आन नहीं, शान नहीं. इज्जत नहीं, अस्मत नहीं. वे हमें ठुकराते हैं—तू उन्मुक्त अट्टहास करने लगती है. मिटाना उनकी आदत है, मिटना हमारी नियति. हमें मिटाने वालों पर तू मेहरबान रहती है….उनके लिए तू अपने वरदानों का खजाना खोल देती है. ऐसे में तुझे कैसे कहें अपना…क्यों करें प्यार, क्यों जिएं….क्यों तेरे बोझ को उठाएं. जिससे मान नहीं….उसपर गुमान क्यों करें….कैसे करें….कब तक करें?

ओ, वक्त विदूषक की प्रेमिका…!

संघर्षमयी छलना…!

परिस्थितियों की मनमानी…!

नियति की निर्ममता…!

कमबख्त हाथों की कुटिलता…!

दुर्भाग्य की काली-स्याह-प्रच्छन्न रेखा…!

इसके अतिरिक्त क्या कहूं तुझे,

बता तो…कौन-सा नाम दूं तुझे?

तेरा कहना मानकर आंखें जब सपना देखने को तैयार हो जाती हैं, तो तू उनकी पलकों से नींद नोंच लेती है. सपनों को सच में बदलना तो दूर, तू उनके रोजमर्रा के यथार्थ को भी छलावा बना देती है. तू हमको बताती है कि सभी अपने हैं, उनपर विश्वास करो. परंतु तेरी बातों में फंसकर जब कोई भला आदमी दुनिया पर भरोसा करने लगता है तो तू उसे नादान कहकर हंसती है. वह छलता चला जाता है. कदम-दर-कदम! सांसें रीत जाती हैं. पर तेरी छलना से मुक्ति नहीं मिलती. मरीचिका की तरह तू उसे दौड़ाती और तड़फाती है….तेरी निर्ममता का अंत नहीं….लोगों को बरबाद होते देख तू हंसती, उत्सव मनाती है.

तू कहती है कि प्यार दुनिया की सबसे हसीन दौलत है. परंतु जब कोई मासूम दिल प्यार के गीत गुनगुनाने लगता है तो तू एक झटके में उसके टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहती है—कर ही देती है. तू भरोसा दिलाती है—आगे बढ़ो, सफलता तुम्हारे कदम चूमने को तैयार है. तेरा कहना मान जब कोई सीधा-सरल मनुष्य अपने कदम आगे बढ़ाता है तो तू मरीचिका बनकर उसको दौड़ती है. इतनी जोर से कि वह हांफने लगता है. उसकी हालत पर तू निष्ठुर अट्टहास करती है. उसकी बेबसी तेरे कलेजे को ठंडक पहुंचाती है. छटपटाहट से तुझे अत्यधिक सुकून मिलता है. निराशा में डूबे और टूटे हुए इंसान से तू बड़ी-बड़ी बातें करती है. तू उनसे कहती है कि हंसो! क्योंकि हंसी कुदरत की अनमोल धरोहर है. वरदान है, नियति का और तुम हंसने के ही लिए बने हो. और तेरा कहा मानकर आदमी जब अपने दुख-दर्द को भुलाकर हंसने की कोशिश करता है तो तू उदासी बनकर उसकी आंखों से छलक पड़ती है—

ओ! निर्लज्ज आंखों में छिपी क्रूरता…!

निष्ठुर अधरों की कुटिल हंसी…!

छलनामय जीवन की चिर विडंबना…!

परिस्थितियों की नागपाश…!

छली विषकन्या…!

जरा सोच! इतनी निष्ठुरता क्यों? ऐसी निर्लज्जता कब तक? इससे पहले कि इंसानियत से लोगों का विश्वास उठ जाए….भोली-निर्दोष आंखों का समंदर रोते-रोते रीत जाए. लोग परस्पर विश्वास करना ही छोड़ दें….प्यासे दिल प्यार करना भूल जाएं. हसरतें वीरान रेगिस्तान में बदल जाएं. बचपन सपने देखना छोड़ दे, जवानी अपनी मस्ती भुला बैठे….इससे पहले कि एहसास की अर्थी सजे….संवेदनाएं तड़प-तड़पकर दम तोड़ लें. मेरा कहना मान….तू अपना आचरण बदल ले, जिंदगी!

रहम कर, खुद को बदल ले जिंदगी!

इस कहानी में मैं हूं—मगर यह कहानी केवल मेरी नहीं है! यह उस जिंदगी की कहानी है जिसने मुझे सांसें दीं, पर कभी अपना नहीं समझा.

जिसने मुझे ठुकराया….लांछनाएं और प्रताड़नाएं दीं. जो बार-बार छलती रही….अपनी ही सांसों का गला घोंटने की कोशिश लगातार करती रही.

यह कहानी है—जिंदगी की जिंदगी से जद्दोजहद की. जिंदगी को ठुकराकर उससे प्यार करने, लगातार हारने और जीत के लिए बार-बार संघर्ष करने की.

इस कहानी में ‘मैं’ जिंदगी को समझने के लिए जिंदगी से लगातार खेलता रहा. जिंदगी को जीने की चाहत में उससे दूर और दूर भागता रहा. अब मैं आपको अपनी उसी बेरहम जिंदगी के करीब ले जाऊंगा. आगे सिर्फ आप रहें और मेरी नाबाद-नामुराद जिंदगी. साथ में वे कथापात्र भी जिन्होंने मेरी इस कहानी को….मेरी जिंदगी, उसके हर रंग को मुक्कमल बनाया है. बेशुमार दर्द दिया तो हंसते-हंसते दर्द को पीते रहने की बेशुमार हसरतें भी.

मैं फिर दोहराता हूं कि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है. अकेली जिंदगी की कोई कहानी नहीं होती. अकेली जिंदगी से कोई कहानी नहीं बनती. हां, जिंदगी के अकेलेपन की हजारों-हजार कहानियां हो सकती हैं. जिंदगी के अकेलेपन से हजारों-हजार कहानियां निकल भी सकती हैं—जैसी कि यह है. मैं तो इस कहानी का नायक भी नहीं हूं. नायक है मेरी कठपुतली जिंदगी. जिसकी डोर हमेशा अदृश्य हाथों में रही. पर यह कोई विषाद गीत नहीं—केवल एक कहानी है. दुनिया की अनगिनत दर्दनाक कहानियों में से एक…उनसे कुछ अलग, कुछ-कुछ मिलती-जुलती-सी.

बस! अब आगे आप रहें और मेरी, इस मैं विहीन जिंदगी की टूटी-फूटी दास्तां.  क्रमश:…

ओमप्रकाश कश्यप

यदा-यदा हि…

‘यदा-यदा हि धर्मस्य….धरा पर जब-जब दुर्जन, दुराचारी बढ़ेंगे, भले लोग छले जाएंगे…मैं अवतार लेकर सज्जनों का उद्धार करने आऊंगा…’ ईश्वर ने गीता में कहा था, लिखा नहीं था. जिसने लिखा, उसने लिखने के बाद कभी उससे जिक्र तक नहीं किया. आरती, प्रसाद, भोग, घंटा-ध्वनि, पूजा-अर्चना, नाम-जप, जय-जयकार और अमरलोक-सुंदरी लक्ष्मी के संगवास में ईश्वर के दिन पलक झपकते हवा हो जाते.
एक दिन एक परेशानहाल भक्त ने ईश्वर को उसके ‘वचन’ की याद दिला दी. उस शाम पुजारी पहुंचा तो ईश्वर ने अपना गुस्सा जता दिया— ‘लोगों ने मेरे उपदेश की पुस्तक छाप डाली और तुमने मुझे बताया तक नहीं…!’
‘प्रभो, वह अनर्थ तो आपके चहेते वेदव्यास ने किया था. कहें तो उसे स्वर्ग से बुलवाने का इंतजाम करूं?’
‘क्या किसी युद्ध में हमने वचन दिया था कि जब-जब धरती पर दुराचार…?’
‘बिलकुल-बिलकुल…वह तो आपका लाजवाब उपदेश है, घर-घर में पढ़ा-सुना जाता है. मैंने तो उसकी कैसेट भी मंगवा रखी है…’ पुजारी जोश में बोलता चला गया, तभी वह संभला—
‘आज अचानक आपको गीता की याद कैसे आ गई?’
‘आज एक भक्त ने बताया कि धरती पर अत्याचार बहुत बढ़ चुके हैं. पुजारियों ने धर्म को धंधा बना लिया है. भोग के नाम मोटा चढ़ावा खुद हड़प लेते हैं. धर्म के नाम पर वे लोगों को लड़वाते हैं. कथावाचक खुद को भगवान घोषित कर हैं. उनके आश्रम काले धन को पचाने का ठिकाना बन चुके हैं…कोई किसी की सुनता तक नहीं है. मुझे लगता है कि मेरे अवतार लेने का यही उचित समय है…’
पुजारी की आंखें चमकीं, बुझीं फिर चमकने लगीं— ‘स्वामी, आपकी सेवा में कोई बाधा न आए, इसलिए मैंने आजन्म ब्रह्मचारी रहने का प्रण लिया था. आप कुछ दिन रुकें, तब तक मैं कोई गरीब ब्राह्मणी ढूंढे लेता हूं…’
‘इससे पहले मैंने ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर ही जन्म लिया है. इस बार मैं परंपरा को तोड़ना चाहता हूं,…मैंने फैसला किया है कि आज दिन में जो भक्त आया था….’
‘आप एक मलेच्छ के घर जन्म लेंगे?’ पुजारी को धक्का लगा.
‘वह भी तो हमारी ही सृष्टि का है. ईमानदार है, भला और मेहनती भी है, दूसरों पर हमेशा उपकार करता है….उसके घर जन्म लूंगा तो उसकी सातों बेटियां अच्छे घरों में ब्याह दी जाएंगी, जिनके दहेज के लिए वह रात-दिन परेशान रहता है…’
‘उसकी बेटियां तो ब्याह दी जाएंगी, मगर आपके सारे मंदिर सूने पड़ जाएंगे…कोई सच्चा भक्त उनकी ओर झांकेगा तक नहीं. यह तो एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा धंधा है. सोच लीजिए, आपको क्या चाहिए…अपना भविष्य या उस आदमी का कल्याण….’
‘तुम मुझे धमकी दे रहे हो?’
‘सिर्फ आईना दिखा रहा हूं…आप हमारे उपकार को पल-भर में भुला देना चाहते हैं.’
‘कैसा उपकार?’ ईश्वर की जुबान लड़खड़ाने लगी थी.
‘हजारों-लाखों वर्ष से आप स्वर्ग में हैं. इतने वर्षों में यहां आपका एक भी मंदिर बना. जबकि धरती पर लाखों मंदिर-मस्जिद और दूसरे किस्म के धर्मालय हैं. जानते हैं क्यों! इसलिए कि आदमी खुद कहीं नहीं जाता, उसको बुलाया जाता है. इसके बदले यदि पुजारी आपके चढ़ावे का कुछ हिस्सा अपने पास रख लेता है तो आपका क्या जाता है….पेट तो हमारे भी हैं.’
ईश्वर प्रतिक्रिया में कुछ कहे उससे पहले ही किबाड़ की ओट में खड़ी उसकी पत्नी ने हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया—
‘स्वामी! आप ये क्या उल्टा-सीधा सोचते रहते हैं. जरा सोचिए, आप तो अवतार लेकर धरती पर चले जाएंगे, पीछे मेरा क्या होगा…?’ ईश्वर-पत्नी ने होठों पर कंटीली मुस्कान, जो उसने नरकवास कर रही एक अभिनेत्री से कड़ी मेहनत के बाद सीखी थी, के साथ अपनी बाहें पति के गले में डाल दीं. अब ईश्वर को तो पिघलना ही था.
ओमप्रकाश कश्यप

झूठ का सच

बाजार से गुजरते हुए कुत्ते की नजर दुकान में टंगे एक चित्र पर पड़ी तो गढ़ी की गढ़ी रह गई. उसके लिए उसकी कुतिया दुनिया की सबसे खूबसूरत मादा थी. सड़क पर चलते समय वह दोपाया मादाओं को रोज ही देखता. उनके पुते हुए चेहरे देख उसे हंसी आने लगती. निश्चय ही उनमें कुछ सुंदर भी रही होंगी. मगर पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था.

कुत्ते का मन चित्र में मौजूद स्त्री की ओर खिंचता चला गया. सिल्क की महंगी साड़ी, मंगलसूत्र, चेहरे पर दीप्ति. मनमोहिनी मुस्कान लिए वह ममतामयी मेज के चारों ओर बैठे अपने पति और बच्चों को खाना परोस रही थी. सामने थीं— तरह-तरह के व्यंजनों से भरी चमचमाती प्लेटें, फूली-फूली चपातियां. जीवन का सारा सौंदर्य मानो उस कमरे में समाया हुआ था.

‘वाह! यह सचमुच देवि अन्नपूर्णा है…’ कुत्ते के मुंह से बरबस निकला.

उस चित्र को वह घंटों तक एकटक निहार सकता था. तभी दुकानदार डंडा लेकर पहुंच गया. उसके बाद तो भूख उसे घंटों तक दौड़ाती रही. इस बस्ती से उस बस्ती, एक घर से दूसरे घर तक. लेकिन चित्र में मौजूद स्त्री का वह सुंदर, मुस्कुराता हुआ चेहरा उसके जहन में बना रहा.

कई घरों से दुत्कारे जाने के बाद किसी एक से एकाध टुकड़ा या रोटी मिलती. भूख को थोड़ा ढांढस बंधता. लेकिन दूसरा टुकड़ा जब तक हाथ लगता, आंतें पहले टुकड़े को पीसकर अवशिष्ट में बदल चुकी होतीं. भूख फिर से तांडव करने लगती. जीवन की इस विडंबना पर वह बार-बार अफसोस करता रहा. शहर के एक कोने में खर-पतवार की तरह उग रही बस्ती से गुजरते हुए एक स्त्री को सामान का थैला उठाकर तेज कदमों से गली से गुजरते देख, अचानक वह चौंका—

‘अरे, यह तो वही है.’ वह स्त्री के पीछे दौड़ने लगा. आमतौर पर उसके कदम घर की चौखट पर पहुंचकर थम जाया करते थे. मगर सम्मोहन में बंधा वह बैठक तक चला गया. वहां टंगे चित्र को देख उसका रहा-सहा संदेह भी जाता रहा. तभी दो छोटे-छोटे, दुबले, अधनंगे बच्चे स्त्री से चिपट गए. उन्हें संभालने की कोशिश करती अचानक वह पलटी तो कुत्ते को वहां देख हड़बड़ा उठी. उसके चेहरे पर थकान और पीड़ा के चिह्न थे. हैरान कुत्ता चित्र से उसकी तुलना करने लगा—

‘तुम वही हो न!’ कुत्ते ने चित्र की ओर इशारा किया.

‘गलत, वह मेरा झूठ है…’ कुत्ते को इतनी बारीक बात सुनने का अभ्यास न था—

‘क्या तुमने जानबूझकर वह चित्र खिंचवाया था, ताकि वर्तमान से आंखें चुरा सको?’

‘उन दिनों मैं मा॓डल थी. चित्र खिंचवाने के बदले मुझे ढेर सारे पैसे मिले थे.’

‘दिखाई तो नहीं देता…!’ कुत्ते ने उस छोटे, सीलन-भरे कमरे में नजर घुमाई. दीवारों का प्लास्टर उखड़ने लगा था. स्त्री पत्थर-शिला बनी रही—

‘यही हकीकत है. मा॓डलिंग की दुनिया में झूठ को सच दिखाना पड़ता है. इतनी कुशलता के साथ कि देखने वाले सौ फीसदी झूठ को एक सौ दस फीसदी सच मानने को बाध्य हो जाएं. फिर भी मेरे लिए वे हवा के पंखों पर सवार होकर उड़ने के दिन थे. यह जानने की समझ कहां थी कि झूठ की चमक-दमक के बीच जो रिश्ते बनते हैं, वे भी झूठे ही होते हैं…’

बड़ी-बड़ी बातें कुत्ते के सिर के ऊपर से गुजर जाती थीं. वह उन्हें समझने का प्रयास ही कर रहा था कि छोटा बच्चा रोने लगा. स्त्री उसको चुप कराने में जुटी तो कुत्ता वहां से खिसक लिया.

ओमप्रकाश कश्यप

आलोचना-पसंद

अपने-अपने सफर पर जाते पादरी, मौलवी और पुजारी को एक तिराहे ने आपस में मिला दिया. आपसी संवाद की संभावना न होने के कारण तीनों बचकर निकल जाना चाहते थे. मगर रास्ता कौन दे! जान-बूझकर आड़ा हो जाने की हेठी कौन कराए—यानी बात फंस गई. त्रिभुज के तीन कोनों की तरह तीनों एक जगह खड़े के खड़े रह गए.
मुंह में राम-राम बगल में छुरी, तीनों ने यह कहावत अपने-अपने मजहब के अनुसार सुनी थी. राम जाने तीनों उस समय सचमुच मुस्कराए या मुस्कराने का सिर्फ नाटक ही किया. उस समय कुत्ता चौराहे पर ऊंघ रहा था. सामने बोर्ड पर लिखा था, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. वह पीछे हटता चला गया.
‘ईश्वर महान है!’ पुजारी ने वार्ता का शंखनाद किया.
‘बिलकुल सही फरमाया, श्रीमान! तभी तो बाइबिल में उसे परमपिता कहा गया है.’ पुजारी ने तत्काल जोड़ दिया. ‘परमात्मा दयालु भी है.’ ‘वाल्लाह! क्या बात कही, एकदम दुरस्त. कुरआन शरीफ में यही तो लिखा है. इस्लाम खुद इंसानियत पर अल्लाह का करम है.’ इस बार मौलवी आगे आ गया.
पुजारी सोच में पड़ गया. दोनों ने अपने-अपने आराध्य का नाम लिया था. उसके सामने समस्या थी कि अनगिनत देवी-देवताओं में से वह किसका नाम ले! हजारों धर्मग्रंथों में से किसे खास ठहराए.
‘परमात्मा बहुत शक्तिशाली है.’ काफी सोचकर पुजारी ने कहा. उसके सभी देवी-देवताओं के हाथों में हथियार थे. पुजारी को उम्मीद थी कि इस तर्क से वह अपने विरोधियों को चुप कर सकता है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
‘तभी तो वह इतनी बड़ी कायनात को संभाले रहता है. चांद-तारे सब खुदा के इशारे पर नाचते हैं.’ देर तक ऐसे ही बातचीत होती रही. एक भी बार पुजारी उनसे अपने मन की बात न कहलवा सका.
‘परमात्मा को अपनी आलोचना पसंद है. वह परमविवेकवान है. ’ पुजारी झुंझलाकर बोला. इस बार मौलवी और पादरी दोनों चुप पड़ गए. बिना प्रतिक्रिया दिए दोनों एक ओर हट गए. पुजारी जीत का एहसास लिए आगे बढ़ गया. लेकिन थोड़ी दूर जाते ही उसका मन पछतावे से भर गया. लगा कि उससे कुछ गलती हुई है. पुजारी की आखिरी बात पर कुत्ते का मन ताली बजाने को हुआ था. लेकिन उसको दुःखी देख कुत्ते की बुद्धि भी चकराने लगी.
उस घटना को अर्सा बीत चुका है. पुजारी जोर-जोर से आरती गाता है. पूरी ताकत समेटकर मंदिर के घंटे को बजाता है. ताकि दिमाग की नसें सुन्न हो जाएं. ताकि उस दिन जो शब्द जोश में उसके मुंह से निकले थे, वे फिर कभी याद न आएं. कुछ ऐसा ही या शायद कुछ अलग तरीके से उसके विरोधी भी करते हैं. जो परमविवेकवान है, वह अपनी आलोचना से क्यों घबराएगा—यह सोचकर कुत्ता धर्माचार्यों के अवसाद पर हैरान हो जाता है.
ओमप्रकाश कश्यप

दूरदृष्टि

महाभारत-कथा के अंतिम सर्ग तक सुनते-सुनते कुत्ता अचानक चौंक पड़ा, सोचने लगा—आखिर कोई तो बात होगी जो धर्मराज युधिष्ठिर समेत सारे पांडव हिमालय पर एक-एक कर गलते चले गए. स्वर्ग-द्वार पर सशरीर दस्तक देने वाला वाला प्राणी एक कुत्ता था. उसका पूर्वज. धर्म का देवता. कितना महान होगा वह. लेकिन आदमी है कि सिर्फ पांडवों का गुणगान करना है. श्वान-देवता को पूछता तक नहीं. दुनिया में बने हजारों-लाखों मंदिरों में श्वान-देवता का एक भी मंदिर नहीं…यह आदमी की कृतघ्नता नहीं तो और क्या है!
‘आदमी के संपर्क में रहकर कुत्तों ने सिर्फ खोया है.’ सोचते हुए कुत्ते ने श्रद्धावनत होकर अपने उस पुरखे को नमन कर तत्क्षण प्रतीज्ञा की, ‘मैं अपने पूर्वज, महान श्वान-देवता को उनका सम्मान वापस दिलाकर रहूंगा.’
दूसरे दिन कुत्ते ने श्वान देवता की प्रतिष्ठा के लिए जंगल में एक सभा का आयोजन किया गया. सम्मेलन में दूर-दूर से कुत्ते आए. सभी एक स्वर में श्वान-देवता का प्रशस्ति-गायन करने लगे. बार-बार तालियां बज रही थीं. तभी दो चोटीधारी वहां से गुजरे और सभा की कार्रवाही देखने के लिए खड़े हो गए. एक की चोटी में सात गांठें थीं, दूसरे की चोटी में मात्र एक. एक गुरु था, दूसरा चेला.
‘हमें भी अपने श्वान-देवता का मंदिर बनाना चाहिए…’ सुझाव आया. जोरदार तालियां बजीं. सुझाव ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया गया.
‘सुझाव तो ठीक है, लेकिन मंदिर का पुजारी कौन बनेगा?’ एक कुत्ते ने समस्या रखी. इसपर सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे.
‘श्वान-देवता की सेवा का अवसर अगर मुझे मिल जाए तो बहुत उपकार होगा…’ एक कोने से तेज आवाज उठी. कुत्तों का ध्यान दोनों चोटीधारियों की ओर चला गया. सभा में खुसर-पुसर होने लगी. फिर यह सोचकर कि जब तक कुत्तों में से कुछ पुजारी का काम सीखें, तब तक आदमी को पुजारी बनाने में कोई हर्ज नहीं है. दोपाया यदि कुत्ता-मंदिर का पुजारी बनेगा तो बाकी जानवरों की अलग मंदिर बनाने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी.
‘क्या तुम श्वान-देवता के मंदिर का पुजारी बनने को तैयार हो?’ सभा के अध्यक्ष ने पूछा.
‘मैं तो जन्मजात पुजारी हूं, जिजमान! मंदिर में मूर्ति हो या नहीं, अगर है तो किसकी है! यह मैं कभी नहीं सोचता.’ लंबी चोटी वाला बोला.
‘गुरुदेव? क्या अब हमें एक कुत्ते को देवता मानकर पूजना पड़ेगा?’ चेला असमंजस में था.
‘धरती पर तैंतीस करोड़ देवता है, एक और बढ़ जाए तो क्या फरक पड़ता है!’ गुरु ने उत्तर दिया. फिर चेले को सोचने का अवसर दिए बिना बोला—
‘यह मत सोच कि मूर्ति किसकी है. यह सोच कि आज कुत्ते का केवल एक मंदिर है. कल को दूसरा बनेगा. उसके बाद और भी बनेंगे. एक दिन धरती पर कुत्तों के हजारों मंदिर बन जाएंगे. उस समय उन सबका महंत कौन बनेगा? वही, जो सबसे पुराने मंदिर का पुजारी होगा…है कि नहीं?’
चेला गुरु की दूरदृष्टि के आगे नतशिर हो गया.
- ओमप्रकाश कश्यप