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धर्म के नाम पर

भीषण ठंड वाली रात….वर्षा से भीगती सर्द हवाओं से दांत किटकिटाती हुई. सभी अपनेअपने घरझोंपड़े में दुबके हुए थे. अचानक एक कुत्ता दंपति अपने पिल्लों के साथ भटकता हुआ उधर से गुजरा. उन्हें रात बिताने के लिए आसरे की तलाश थी. लेकिन घरों के दरवाजे बंद थे. तभी बिजली कड़की और उसकी चमक पिल्ले की आंखों में समा गई.

मां, उधर देख….वहां कोई नहीं है. हमारी रात वहां मजे से कटेगी.’

कुतिया कांप उठी, बोली, ‘उधर नहीं वह भगवान का घर है.’

तो क्या हुआ? हम भी तो उसी के बनाए हुए हैं.’

लेकिन यह घर आदमी का बनाया हुआ है और आदमी का मानना है कि ईश्वर के घर में पत्थर की मूर्तियां रह सकती हैं. हम जैसे कमजोर जीव नहीं.’ बिजली फिर कड़की. इस बार दूसरा पिल्ला कहने लगा, ‘उसे छोड़ो बापू. इधर देखो, कितना बड़ा घर है. एकदम साफसुथरा और इसके दरवाजे भी खुले हैं. हम यहां आराम से रह सकते हैं.’

नहीं बेटा! परिस्थितियों से त्रस्त बेबस कुत्ते ने कहा. बेटा वह मस्जिद है. खुदा का ठिकाना. अल्लाह के बंदे यहां उसकी इबादत करते हैं.’

रात बिताने के अल्लाह के घर से अच्छी भला और कौनसी जगह हो सकती है.’ सर्दी से कांपता हुआ पिल्ला बोल.

मौलवी साहब का कहना है कि हमारे छूने से मस्जिद नापाक हो जाएगी.’ कुत्ते ने समझाने की कोशिश की.

पिताजी, क्या तुम मुझे छूकर नापाक हो जाते हो?’

धत्! ऐसा भी कहीं होता है?’ कहते हुए कुत्ते ने पीठ थपथपाई.

मां, मेरे छूने से क्या तू अपवित्र हो जाती है?’ पिल्ले ने अपनी मां से भी वही सवाल किया.

कैसी बात करता है पगले, तू तो मेरे कलेजे का टुकड़ा है.’ कहते हुए कुतिया ने पिल्ले को अपने अंक में भर लिया. पिल्ला अपने सवालो का समाधान चाहता था. इसलिए पीछे हटता हुआ बोला— ‘जब मेरे छूने से आप दोनों नापाक नहीं होते तो वह; जिसके बारे में बताते हैं कि वह सबका मांबाप है, कैसे नापाक हो सकता है?’

कुतिया और कुत्ता दोनों में से किसी के भी पास इस सवाल का जवाब नहीं था. इसलिए वे दाएंबाएं सट गए. ताकि वह इधरउधर देखकर ज्यादा सवाल न पूछे. थोड़ी दूर जाने के बाद ही एक सूखीसी ठेकरी उन्हें दिखाई पड़ी. कुत्ता अपने परिवार के साथ वहीं लेट गया. पिल्ले मौसम की मार झेल नहीं पाए और सुबह होतेहोते वहीं ढेर हो गए. मिट्टी से वास्ता क्या? कुतिया और कुत्ता दोनों ने एक नजर अपने पिल्लों के बेजान पड़ चुके शरीरों को देखा. मिट्टी को माथे से लगाया और नए ठिकाने की तलाश में चल दिए.

मुंहअंधेरे एक आदमी निकला. मृत पिल्लों में से उसने एक को उठाया और थोड़ी दूर जाकर दायीं ओर को उछाल दिया. उसके कुछ ही मिनटों के बाद एक और आदमी बाहर आया. इधरउधर देखकर उसने दूसरे पिल्ले की लाश को उठा लिया. फिर उसे जोरजोर से घुमाने लगा और अपनी पूरी ताकत से घुमाते हुए बायीं ओर उछाल दिया.

सुबह होते ही गांव में घमासान मच गया. जान बचाने के लिए कुतिया और कुत्ता को जंगल में शरण लेनी पड़ी. दिनभर हायतोबा, चीखपुकार, मारकाट मची देख उनकी गांव लौटने की हिम्मत ही न पड़ी. रात होतेहोते सबकुछ थम गया. आसरे की तलाश उन दोनों को फिर गांव खींच लाई. किंतु गांव तो अब श्मशान में बदल चुका था. चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं. घरझोंपड़ियां तबाह हो चुके थे.

सुबह अपने बच्चों की मौत पर तो मैंने छाती पर पत्थर रख लिया था….मगर आज गांव में जो देखा….इतनी लाशें गिरी हैं कि कोई रोने वाला भी नहीं है.’ कुतिया ने कहा….उदास तन और भरेभरे मन से.

हम कोई आदमी थोड़े ही हैं जो अपनापराया देखें. , रात से जो अब तक मरे हैं उन सभी पर रो लेते हैं.

कुछ देर बाद ही वह उजाड़ और मनहूस गांव कुत्ता दंपति की रुलाई से थरथराने लगा.

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “धर्म के नाम पर

  1. कथा सुनायी आपने मुख्य पात्र है श्वान।
    पता नहीं इस देश में सुधरे कब इन्सान।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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