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ईश्वर भागा

नए वर्ष की पूर्व संध्या पर बच्चे फुलझड़ियां छोड़ रहे थे. तभी ईश्वर उधर से आ निकला. बच्चों को खुश देख वह ठिठक गया, बोला‘ऐसा क्या है, जो तुम इतने खुश हो?’

कल नए वर्ष का पहला दिन है.’

समय तो अनंत प्रवाह है. इसमें पहला और अंतिम क्या!’

हम इंसान छोटीछोटी चीजों में इसी तरह खुशियां ढूंढ लेते हैं. ईश्वर के सवाल पर बच्चों को चुप देख वहां बैठे एक वुजुर्ग ने कहा.

ईश्वर पलटा. बूढ़ा निर्विकार बैठा रहा. ईश्वर की त्योरियां चढ़ने लगीं

बड़े ढीठ हो. मुझे देखकर भी खड़े नहीं हुए. मैं ईश्वर हूं, क्या जानते नहीं!’

भूख लगी है?’ बूढ़े ने अप्रत्याशित प्रश्न किया. पुजारी की तरह ईश्वर भी अब तक दूसरों के श्रम का खाता आया था. बूढ़े द्वारा सीधा सवाल करने पर वह चिढ़ गया.

तुम मुझे भोजन कराओगे….मैं पूरी दुनिया का पेट भरता हूं.’

अगर ऐसा है तो मेरे साथ चलो. मेरा बेटा अपनी बीमार सास को देखने ससुराल गया है. लौटने में तीनचार दिन लगेंगे. इधर पलेवा के बाद खेत आ चुके हैं. उसके लौटने तक खेतों की जुताईबुवाई में तुम मेरी मदद करो. इस साल जो भी फसल होगी, मैं याद रखूंगा कि उसमें तुम्हारा भी योगदान है.’

मूर्ख, तुम मुझसे हल चलवाओगे!’

मेरा पेट तो अन्न से भरता है. बातों से तुम केवल अपने भक्तों का पेट भर सकते हो, मेरा नहीं.’ बूढ़ा हंसते हुए बोला.

ईश्वर की बोलती बंद. वह गर्दन झुका, आगे बढ़ने लगा. बच्चे जो तन्मयता से यह संवाद सुन रहे थे, ताली पीटपीटकर गाने लगे‘ईश्वर भागाईश्वर भागा.’ उनके नए साल के उत्सव में एक खेल और जुड़ गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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