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एक पुराना सवाल

लघुकथा

गणित के सवालों से तो आप खूब दो-चार हुए होंगे. परंतु इस सवाल का गणित से कोई वास्ता नहीं है. या शायद हो भी. दरअसल यह एक बहुत पुराना सवाल है. एक बकरी है, जिसके गले में रस्सी है. रस्सी का दूसरा छोर खूंटे से बंधा है. बकरी को आजादी है कि रस्सी के दायरे में जितनी घास आती है, उससे अपने पेट की भूख मिटाए. बकरी ऐसा ही करती है. पर एक ही दायरे में घूमते-घूमते कभी-कभी उसका जी उकताने लगता है. उस समय वह रस्सा तुड़ाकर दायरे की कैद से निकल जाने की कोशिश करती है. तब बकरी का मालिक आकर उसकी रस्सी को और कस जाता है.

     गणित में ‘मान लीजिए’ भी चलता है. तो मान लीजिए कि ‘खूंटा बराबर ‘धर्म’, ‘रस्सी’ बराबर ‘ईश्वर’, और ‘बकरी’ बराबर ‘बेचारी जनता’. गणित में ‘स्थिरांक’ भी होते हैं. जो हर गणना पर असर डालते हैं. इस कहानी में भी ‘स्थिरांक’ हैं. यानी दो अदृश्य शक्तियां. एक है बकरी का मालिक. जो बकरी को भोजन देकर उसका सारा दूध हड़प लेना चाहता है. दूसरा है वह व्यापारी जो दूध का व्यापार करता है. और बदले में बकरी को बांधकर रखने के लिए रस्सा उपलब्ध कराता है. बकरी चाहे लाख कोशिश करे, वह उसकी कैद से बाहर जा ही नहीं पाती. इसी कोशिश में एक दिन उसकी जान चली जाती है.

‘बकरी की मुक्ति हुई है.’ मालिक और व्यापारी के अलावा तीसरा एक और भी प्राणी है, जो ऐसे मौकों पर बिना बुलाए आ धमकता है. और मुनाफे में से अपना हिस्सा लेकर चलता बनता है. आप उसको पुरोहित कहें, धर्म का दलाल कहें या कुछ और. पर वह हर ऐसे अवसर पर उपस्थित होता है. जहां बकरियां मुक्तिसंग्राम की तैयारी में जुटी हों. उसके जाते ही मालिक रस्सा लिए नई बकरी की तलाश में जुट जाता है.

आप बताइए, बकरी को यदि इनमें से किसी एक से निपटना हो, तो पहले किससे निपटे?

 

ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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