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दंश : बारहबीं किश्त

धारावहिक उपन्यास

यही छल तो गरीबी का सच है.

मां ने दुख और अभावों को गले लगाया था. तमाम उम्र वह दूसरों के लिए संघर्ष करती रही. खटती रही अपने परिवार के लिए दिनरात. किसी से भी कभी शिकायत नहीं की. कभी किसी से कुछ मांगा भी नहीं. मां के जीवन की विडंबना भी यही है कि उसको अपनी अच्छाइयों के कारण ही जान से हाथ धोना पड़ा. एक ही झटके में हमारा भरापूरा घर तबाह हो गया. हमारे घर में गरीबी थी….अभाव थे. इसके बावजूद परिवार में संबंधों की घनी गरमाहट थी. बापू के साथ हम बच्चों का उतना वास्ता नहीं पड़ता था. उसका हमसे संबंध केवल जन्म देने तक सीमित था. बाकी जिम्मेदारियों के लिए मां को ही खटना पड़ता था. तो भी मां को बापू से शायद ही कोई शिकायत रही हो. संबंधों की गरमाहट के अलावा हमारे परिवार में ऐसा कुछ था भी नहीं, जिसपर गर्व किया जा सके. जिसके लिए दीर्घजीवी होने की कामना की जाए. किंतु जिस प्रकार हमारा घर उजड़ा. जिस तरह हमारे सिर से मां का साया….हम बच्चों को ममता से वंचित होना पड़ा, ऐसी बर्बादी….जीवन की ऐसी त्रासदी….घोर विडंबना….जीवन की दुखद परिणति, नियति किसी को भी न दे. अपने लिए तो क्या दुश्मन को यह दिन न देखना पड़े.

उन दिनों मेरी अवस्था ऐसी नहीं थी कि मृत्यु की विभीषिका को अनुभव कर सकूं. जान सकूं कि जीवन का रेगिस्तानी लू और लूअंधड़भरा सफर ममता की सघन छांव के बिना कैसे कटता है. तो भी मां के असमय चले जाने की वेदना अनंत थी. मां की जगह यदि बापू….नहींनहीं….हरगिज नहीं! अगर ऐसा होता तो मां जीते जी ही मर जाती. उस अभागिन की पुण्यात्मा तो बापू की पंकिल आत्मा के साथ जुड़ी थी. वह गठबंधन एक जन्म में कुछेक वर्षों का ही था. बापू के लिए तो संबंध जैसा संभवतः कुछ था ही नहीं. मगर मां उसे भी जन्मजन्मातर का मानती थी. मानो सुखसंपदा से सदासदा का वैर साध रखा हो उसने…..

मां अनोखी थी….वह दुनिया से गई तो भी निराले अंदाज में. जिंदगीभर बापू और हम सब की ज्यादतियां हंसतेहंसते सहती आई मां, पुलिस के अत्याचार हद से बढ़ते ही शेरनी बन गई. मैं अपनी मां पर गर्व करता आया था. उसकी मौत भी गर्व करने योग्य थी. मगर मैं इतना बड़े दिल का नहीं था कि मां की ऐसी मौत को उत्सव की तरह जी सकूं. मेरे लिए यह संभव भी नहीं था कि आंसुओं को आभूषण मानकर इतराऊं. सच तो यह है कि मैं खुलकर रोना चाहता था. पर रुलाई फूटते ही बापू मुझपर झपट पड़ता था….कसाई की तरह. आवाज निकलते ही गला दबाने को तैयार. बापू का गुस्सा देखकर मैं डर जाता था. आंखों में आए आंसू भीतर ही सूख जाते. सूनी आंखें, सूना मन….और यह अंतहीनदिषहीन भागदौड़….साथ में बेइंतिहा उदासी….चारों ओर अंधियारा ही अंधियारा. जैसे धरती कोई अंधा कुआं हो. अनंत दुखों से भरा हुआ. दर्दीला और डरावना….पंकिल और वीभत्स!

जिंदगी की ऐसी मार….वक्तविदूषक का इससे बड़ा मजाक….बचपन की ऐसी घनी त्रासदी भला और क्या हो सकती है. मेरी दुनिया पूरी तरह उजड़ चुकी थी. मां, जिसको मैं अपने प्राणों से बढ़कर चाहता था. वह दुनिया से जा चुकी थी. किंतु मेरी आंखों में आंसू की बूंद तक न थी. जीवन का सूनापन चारों ओर फैले रेगिस्तान की भांति, मेरी आंखों में उतर आया था. और मेरा बापू….मेरा अपना जन्मदाता मुझे रोने से रोक रहा था. मेरी सिसकियों पर भी अंकुश लगाए हुए था. अपने डर को छिपाने के लिए वह तानाशाह की तरह मेरी धड़कनों पर भी कब्जा बनाए रखना चाहता था.

बापू, कल्लू और बेला….’ मां को छोड़कर मैंने अपने छोटी बहन और भाइयों का नाम लिया. यह सोचकर कि बापू शायद उन्हीं के बहाने कुछ कहे….नर्मदिल होकर कुछ सोचे….पिता के धर्म को समझे. मैं अपने भाईबहनों से बड़ा था. थोड़ाबहुत समझदार भी था. दूसरे, चाहे जैसा भी हो, उस समय बापू का साया मेरे ऊपर था. बाकी तीनों तो अबोध थे. मांबाप के बिना वे रह ही नहीं सकते थे. बापू को उन मासूमों की कुछ तो फिक्र होगी….होनी ही चाहिए. मैं ऐसा ही सोचता था. पर यह निखालिस खुशफहमी थी मेरी. गलत था मैं जो ऐसा सोचता था. वह गुर्राया….आंखों ही आंखों में मुझे खा जाने की कोशिश की. इधरउधर देखकर मेरे ऊपर झुका. फिर धमकाया

चुप रह बदजात! बहुत जुबान चलती है तेरी. अब और ज्यादा तंग किया तो तुझे भी यहीं छोड़कर चला जाऊंगा.’

बापू की बात से लगा कि वह उन तीनों को छोड़ने का मन बना चुका है. मां का साया तो उठा ही. पिता के रहते हुए भी मेरे तीनों भाईबहन अनाथ हो गए. सोचकर मेरे दिल में हूकसी उठी. साथ में बापू के प्रति नफरत का तेज झौंका भी हृदय की गहराइयों से बाहर आया. मगर मैं कुछ बोल पाऊं, उससे पहले ही भारी असुरक्षाबोध मेरी बोलती बंद कर चुका था. भविष्य का डर मुझे सताने लगा. अनाथ जिंदगी की संभावना ने मुझे चुप कर दिया. मैं सचमुच बहुत भयभीत हो चुका था.

हम बापूधाम से काफी आगे निकल आए थे. एक अपेक्षाकृत कम भीड़भाड़ वाला इलाका देखकर बापू ने चाल कम कर दी. वहां जानपहचान वाले भी कम थे. इस कारण वह थोड़ा निश्चिंत हुआ था. मौका देखकर मुझे सावधान करने के लिए वह बोला—

चुपचाप चलता रह. किसी को जरा भी शक न होने पाए. पुलिस ने सुन लिया तो हमें जेल में भिजवा देगी. वहां जाकर हम दोनों को चक्की पीसनी पड़ेगी, समझा! पहले खुद बच लें. उसके बाद उन तीनों की भी सुध लेंगे.’

जीवन के सैकड़ों दिन जेल और हवालात में बिताने वाला बापू….पुलिस को हमेशा अपना हमदम….अपना दोस्त और सच्चा मददगार बताने वाला बापू….चुनाव के दिनों में उसकी मदद से अपने पसंदीदा नेता को जीत दिलाने वाला बापू. उसके साथ आंखमिचैली का खेल खेलने वाला, जाम से जाम टकराकर पीने वाला बापू अचानक इतना भयभीत हो सकता है, यह भी कम हैरानी की बात नहीं थी. यह वक्तविदूषक का क्रूर मजाक था कि जो बापू पुलिस को सदैव अपना मानता आया था, अब उसी से अपनी जान बचाता हुआ भाग रहा था.

इस घटना से मैंने सीखा कि आदमी सर्वाधिक मोह अपने प्राणों से रखता है. अपने जीवन और सुख की सुनिश्चितता के बाद ही वह दूसरों से जुड़ता है. इसके बाद ही वह रिश्तेनाते, सगेसंबंधियों की परवाह करता है. वह उन्हीं चीजों को चाहता है जो उसके सुख का माध्यम बनती हैं अथवा उसके लिए सुविधाएं जुटाने में मददगार बनती हैं. परोपकार, इंसानियत, नैतिकता जैसे भारीभरकम शब्द केवल मन की संतुष्टि के लिए जरूरी होते हैं. ये मनुष्य के लिए विशेष प्रकार के आनंद की सृष्टि करते है. उसके अहम् को ऊंचाई प्रदान करते है. मृत्योपरांत सुख की संभावना बढ़ाने, सुख को चिस्थायी बनाने के लिए आदमी, इन्हीं भारीभरकम शब्दों का सहारा लेता है. मनुष्य का प्रत्येक आयोजन अपने और अपने सुख के निमित्त होता है.

मानव जीवन का प्रथम लक्ष्य अपने लिए सुख बरोटना है. जहां भी तथा जैसे भी मिले. कम से कम बापू तो यही मानता था. और बापू के साथ भटकतेठोकरे खाते हुए इन बातों पर मुझे भी विश्वास हो चला था. हालांकि मां का जीवन और विचारधारा इसके बिल्कुल विपरीत थी. वह सदा ही त्याग और परोपकार की मूरत बनी रही. दूसरों की खुशी के लिए ही आजीवन खटती रही. मैं मां से हमेशा ही प्रभावित रहा. मगर उसके असमय चले जाने से उसके जीवन सिद्धांतों पर मुझे संदेह होने लगा था.

कभीकभी मां की हालत मुझे उस बेबस बकरी के समान लगती जो चुपचाप अपने मालिक के इशारों का पालन करती है और एक दिन उसकी भूख को मिटाने के लिए ही चुपचाप अपने जीवन की कुर्बानी दे देती है. मां ने भी बापू की खातिर अपने प्राणों का बलिदान दिया था. बिना सुखदुख, राग द्वैष के यंत्रवत या कहो कि सर्वस्व समर्पण की भावना के साथ. नीरस और उदासीभरा मेहनती जीवन जीते हुए उसने अपना बलिदान किया था.

पूरे दिन हम शहर में भटकते रहे. बापू लोगों की नजरों से खुद को बचाता रहा. शाम तक छिपातेछिपाते वह पुनः रेलवे स्टेशन पहुंच गया. मैं बापू का हाथ उसकी छाया की तरह उसके पीछे लगा था. रात्रि का पहला पहर शुरू ही हुआ था. प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़भाड़ थी. उद्घोषक बारबार गाड़ियों के बारे में घोषणा कर रहा था. भीड़ के बीच कुछ सिपाही भी मौजूद थे. अपनी खोजी आंखों से इधरउधर ताड़ते हुए. बापू पुलिस के साथ रह चुका था. उसकी रगरग को पहचानने का दावा वह अब भी कर रहा था. हालांकि दोस्ती का भ्रम टूट चुका था.

मैं और बापू साथसाथ थाने से निकले थे. पुलिस की ज्यादती का गवाह मैं था और बापू भी. बापू जानता था कि खुद को बचाने के लिए हमें फंसाना चाहेगी. इसीलिए नौदस वर्ष के लड़के साथ अधेड़ उम्र के आदमी को वह अवश्य खोज रही होगी. यही सोचकर बापू ने मुझे भीड़ के बीच छिपे रहने को कहा था. वह आगे बढ़कर खुद भी यात्रियों के दूसरे जत्थे मे सम्मिलित हो गया. वक्त बीतने के साथसाथ पिछले चैबीस घंटों में हमने इतना कुछ एक साथ देखा और भोगा था कि मन से डर की अनुभूति ही मिटने लगी थी. और अब तो पुलिस के साथसाथ आंखमिचैली का खेल खेलने में भी मजा आने लगा था.

सुबह जब बापू अपनी बस्ती में किसी से मिलने गया था तो उसके घर से बासी रोटियां उठा लाया था. दिन में भटकते….इधर से उधर भागते, बचतेबचाते हुए हमने वही रोटियां चबा ली थीं. लेकिन चार रोटियां कब तक सहारा देतीं. बारह घंटे बाद भूख फिर सताने लगी. मगर भविष्य की अनिश्चितता में भूखप्यास की चिंता भी हम नहीं कर पा रहे थे. हालांकि भूख जब अंतड़ियों को आहिस्ताआहिस्ता छीलने लगती तो वे कुलबुला उठती थीं. इससे पहले भी भूख के कई दिन हमने साथसाथ गुजारे थे. पर यह नया अनुभव था. इस बार भूख के साथ डर था और मां के चले जाने का गम भी. ऊपर से भागमभाग. सारे दुःखदर्द मानो एक साथ हमलावर हो उठे थे.

एक रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आकर रुकी तो सारे यात्री उस पर एक साथ टूट पड़े. चीखपुकार से प्लेटफार्म गूंजने लगा. अजीबसी अफरातफरी मची थी. इस शोरशराबे, यात्रियों की आपाधापी के बीच कुछ देर के लिए बापू से मेरी नजर हट गई. सहसा मैंने खुद को भीड़ के रेले में फंसा हुआ पाया. भीड़ छंटी तो अकस्मात् मुझे धक्कासा लगा. बापू अपने स्थान से गायब था. मैं उसको इधरउधर खोजने लगा. तभी गाड़ी के चलने का संकेत हुए. प्लेटफार्म से फिसलती हुई मेरी नजर गाड़ी के सबसे आगे वाले डिब्बे के दरवाजे पर पड़ी. उस पर झूल रहे यात्रियों के बीच बापू भी फंसा था. उसने अपना मुंह भीतर की ओर किया हुआ था, जिससे मैं उसे देख न सकूं.

तब अकेलेपन के एहसास से ही मैं घबरा गया. दिल की धड़कनें बेतहाशा बढ़ गईं. घबराहट से मेरी पूरी देह थरथरा उठी. गाड़ी गति पकड़ती जा रही थी. मुझे लगा कि अब यदि एक पल भी चूका तो मैं बापू को हमेशा के लिए खो दूंगा. मां के साथसाथ बापू से भी अलग हो जाना पड़ेगा. तब अनाथबेसहारा की जिंदगी जीना….मुझे लगा कि दुनिया, रेलगाड़ी की गति साथसाथ वीरान और सुनसान होती जा रही है. आगे एक पल भी गंवाए बिना मैंने गाड़ी की ओर दौड़ लगा दी. पिछला डिब्बा मेरे सामने था. गाड़ी की गति लगातार बढ़ती जा रही थी. मेेरे सामने जीवन और मरण जैसी चुनौती थी. मैंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. बेतहाशा दौड़ता हुआ मैं पिछले दरवाजे तक पहुंचा. बस एक कदम और….तभी मुझे लगा कि मैं हवा में उड़ रहा हूं. सहसा मैं ऊपर उठने लगा. दरवाजे पर खड़ी सवारियों ने मुझे बांह पकड़कर खींच लिया था. उसके बाद कब और कैसे मैं यात्रियों से खचाखच भरे डिब्बे में पहुंचा, इसका मुझे पता नहीं न चला.

काफी देर तक मैं अपनी उखड़ी सांसों पर नियंत्रण करने का प्रयास करता रहा. वह बहुत मुश्किल काम था. एक सवारी ने मेहरबानी करते हुए मुझे खिड़की के बराबर में थोड़ीसी जगह दे दी. इसके बाद तो गाड़ी के हिचकोलों ने थपकियों का काम किया. मैं कई घंटों से जगा हुआ था. देह थकान से चूर थी. मैंने दिमाग को ढीला छोड़ दिया. नींद ने अपना असर दिखाया. रेलगाड़ी मुझे जिंदगी के नए सफर की ओर ले जा रही थी. जिससे मैं पूरी तरह अनजान था.

गाड़ी की गति कम होने लगी तो मैं सावधान हो गया. डिब्बे में छायी सरगर्मी ने बता दिया था कि स्टेशन अब दूर नहीं. इस बीच मैं एक झपकी ले चुका था. शरीर हलकापन अनुभव कर रहा था. इसलिए जैसे ही गाड़ी रुकी मैं अगले डिब्बों की ओर भाग लिया. मुझे लगने लगा था कि बापू और मेरा साथ बहुत लंबा नहीं है. वह कभी भी मुझे छोड़कर जा सकता है. परंतु न जाने किस डर या उम्मीद में मैं उसका पीछा जा रहा था. इस बीच गाड़ी के चलने का संकेत हुआ तो मैं तुरंत उस पर सवार हो गया. बापू का डिब्बा अभी भी बहुत आगे था. इसके बाद जहां भी गाड़ी रुकती, मैं अगले डिब्बे की ओर बढ़ जाता था.

चौथे स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकी, मैंने बापू को डिब्बे से बाहर आते हुए देखा. उसके पीछेपीछे मैं भी उतर गया. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी. प्लेटफार्म पर गहरा सन्नाटा था. वहां उतरने वाले यात्री भी गिनेचुने ही थे. शायद कोई कस्बा रहा हो. उनसे बचने का भरसक प्रयास करते हुए मैं बापू का पीछा कर रहा था. समयसर्वेसर्वा की घोर मनमानी, वक्तविदूषक का इससे बड़ा और भला क्या हो सकता है कि जो बापू पुलिस को हमेशा अपना मानता हुआ आया था, अब उसी से अपनी जान बचाता हुआ भाग रहा था. मैं उसका पीछा करने का प्रयास कर रहा था. कि तभी अपने कंधे पर किसी का दबाव देखकर चौंक पड़ा—

! इतनी रात गए यहां प्लेटफार्म पर क्या कर रहा है, हरामखोर?’

मैंने गर्दन उठाकर देखा, एक भारीभरकम सिपाही मेरी ओर घूर रहा है. पुलिस की वर्दी देखकर मुझे थाने का दृश्य याद आ गया. घबराहट में मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा. जैसेतैसे मैंने खुद को संभाले रखा. भागने या घबराहट दिखाने से उसे शक हो सकता था. इसलिए मैं अड़कर खड़ा हो गया.

सुना नहीं मादर….’

छोटी बहन को ढूंढ रहा हूं साब.’ मैंने हिम्मत जुटाकर कहा.

क्या हुआ उसको?’

आज शाम को खेलतीखेलती अचानक गायब हो गई. हमारा पूरा परिवार परेशान है.’ मैंने बहाना बनाया.

रहता कहां है?’

उस ओर की झुग्गियों में!’ मैंने डरतेडरते विपरीत दिशा की ओर हाथ उठा दिया. शायद इस ओर कोई झुग्गी बस्ती रही हो. सिपाही कुछ शांत हुआ. पर उसका घूरना रुका नहीं. जैसे इसी बहाने मेरे अंतर्मन में झांक लेना चाहता हो. पूरे विश्वास के बोला गया झूठ सिपाही को शायद सच लगा था. लेकिन आदत या कहो कि पेशे से मजबूर. डंडा हिलाते हुए उसने मुझे फिर हड़काया—

चल भाग….बहन चो….! अगर दुबारा इधर दिखा तो पीछे से पूरा घुसेड़ दूंगा.’ मुझे मौक़ा मिला. रामराम कहता हुआ मैं उसी दिशा में भाग लिया, जिस ओर बापू गया था.

साला नाटकबाज….उठाईगीरा! ये हरामखोर बहाने भी कैसेकैसे बना लेते हैं.’ सिपाही के शब्द मेरे कानों में पड़े. कुछ देर के लिए मन अपने ही प्रति घिन से भर गया. लेकिन बापू का ध्यान आते ही मैं फिर सावधान हो गया. कुछ ही क्षण पहले मैंने प्लेटफार्म के किनारे की बढ़ते बापू की एक झलक देखी थी. एक पल की देरी भी मुझे बापू से हमेशा के लिए अलग कर सकती है, यही सोचकर मंै उसी दिशा में भाग निकला जिधर बापू को जाते हुए देखा था. मैं बेतहाशा दौड़ता गया, दौड़ता ही गया. प्लेटफार्म के बाहर घनाकाला अंधियारा था. परंतु मेरे जीवन पर भीतरबाहर छाए अंधेरे के आगे उसकी कालिमा एकदम फीकी नजर आती थी.

जिंदगी ने मुझे डसा था. अब वही मुझे बारबार भटका रही थी.

*

जिंदगी और मेरे बीच चल रही जद्दोजहद में मेरी कोशिश खुद को बचाए रखने की थी.

समय भले ही चंचल हो….अपनी अनिश्चिता के लिए जमानेभर में खूब बदनाम भी हो….उसका विदूषकी व्यवहार लोगों से भले ही खूब छल करता हो. परंतु वह इस सभ्यता का महानतम शिक्षक रहा है. समय की पे्ररणाएं सर्वाधिक कारगर सिद्ध होती हैं. उसके पाठ को जो जितने करीब से महसूस करता है, उतना ही वह उससे सीखता, सबक लेता है. समय अगर भटकाता है तो भटके हुओं को राह भी वही दिखाता है. समय जब परीक्षा लेता है, तो उससे गुजरने की हिम्मत पहले ही भर देता है. जो लोग समय की इस चाल को समझ नहीं पाते, वही समय से डरते, घबराते हैं. समय नासमझों के लिए छलीप्रपंचक और समझदारों के लिए सर्वाेत्तम मार्गदर्शक है. शायद इसीलिए कभी समय को छलिया बताकर उससे सावधान रहने की सलाह दी जाती है तो कभी महाबली कहकर उसकी स्तुति की जाती है.

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो समय की चाल को समझ ही नहीं पाते, वे उससे सिर्फ भागते ही रहते हैं. जैसे कि बापू और मैं….

पुलिस और टिकट चैकरों की नजर से बचताबचाता बापू प्लेटफार्म से बाहर की ओर निकला था. परंतु कुछ दूर जाने के बाद ही वह समझ गया कि इतनी रात गए प्लेटफार्म से दूर जाना खतरे से खाली नहीं. पहरेदार या गश्त पर निकले सिपाहियों की उसपर नजर पड़ सकती है. इसीलिए स्टेशन की दीवार के सहारे चलता हुआ वह प्लेटफार्म के दक्षिणी छोर की ओर बढ़ गया. वहां जामुन का पेड़ था और पर्याप्त अंधेरा भी. गाड़ी आने पर पैदा हुई हलचल अब शांत पड़ चुकी थी. वह अपेक्षाकृत छोटा प्लेटफार्म था जहां बहुत कम गाड़ियां रुकती थीं. इसीलिए स्टेशन कर्मचारियों के व्यवहार पर भी शिथिलता छाई रहती थी. गाड़ी जाने के बाद ड्यूटी पर तैनात सिपाही अपनीअपनी कुर्सी में धंस चुके थे.

बापू जामुन के वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया. मैं कुछ देर तक दूर खड़ा उसको देखता रहा. वह अपेक्षाकृत सुनसान और खुला इलाका था. शहर की भीड़भाड़ से बिल्कुल अलग. मैं जन्म से अब तक बापूधाम में रहा था. घिचपिच….एकदूसरे से सटी झुग्गियों, आदमियों की रेलमपेल के बीच. इस तरह का अनुभव मेरे लिए पहला था. कोई और न भी हो तो मां और उसका एहसास वहां पर अकेलेपन से बचाए रखना चाहता था. हवा में ठंडक थी. रात का सन्नाटा और ठहरी हुई उदास जिंदगी. सब मिलकर अजीब से भय को जन्म दे रहे थे. मैं बापू के निकट जाने से घबरा रहा था. हालांकि जानता था बापू खुद डरा हुआ है. इसीलिए मुझसे नर्मी से पेश आना उसकी मजबूरी है….यही सोचकर मैं धीरेधीरे बापू की ओर बढ़ने लगा.

वह अपने आप में डूबा हुआ था. मेरे पहुंचने की भनक भी उसे नहीं लग पाई थी. काफी देर तक मैं उसके पीछे चुपचाप खड़ा रहा. फिर चबूतरे पर बैठ गया. तभी उसने गर्दन घुमाई. मुझे देखा. उसकी आंखों में घना विस्मय था. कुछ देर तक मैं गुमसुमसा बैठा रहा. बापू भी चुप्पी साधे रहा. जैसे आगे की बात सोच ही नहीं पा रहा हो या अपनी ही निगाह में इतना अधिक गिर चुका हो कि आगे के लिए शब्द उसका साथ छोड़ चुके हों. जो हो, धीरेधीरे वह अपने अवसाद से उभरा और मौन तोड़ते हुए बोला—

तेरी मां के मरने के बाद मेरा दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा. पिछले स्टेशन पर जाने कब गाड़ी आई और बेध्यानी के आलम में मैं कब उस पर सवार हो गया, यह पता ही नहीं चला. बदकिस्मती से बाकी सब तो छूट ही चुका है. तू भी बिछड़ जाता तो बड़ा पाप लगता मुझे. फिर तेरी मां को मैं क्या जवाब देता. खैर, बहुत अच्छा किया तूने जो पीछेपीछे चला आया. यह छोटासा कस्बा है. इतना छोटा भी नहीं कि हम दो प्राणी यहां निभ न सकें. यहां के एकदो आदमियों को मैं पहचानता भी हूं. वे सभी पैसे और रसूख वाले हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि इस भरी मुसीबत में वे मेरा साथ देंगे. एक बार वे अपना लें उसके बाद पुलिस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी.’

हमने पुलिस का क्या बिगाड़ा है बापू?’ मैंने मासूमसा सवाल किया.

तेरी मां ने ही पुलिस का क्या बिगाड़ा था!’ बापू ने उलटा सवाल किया और अपनी निगाह आसमान की ओर टिका दी. जहां तारे छितराए हुए थे. बीचबीच में बादल के दोचार टुकड़े आसमान की पहरेदारी कर रहे थे. वे जैसे ही किसी नन्हे तारे को चमकता हुआ देखते, आगे बढ़कर उसका मुंह ढांप देते थे, मानो दुनिया की चश्मेबद् से बचाए रखना चाहते हों.

आसमान की ओर ताकते हुए बापू ने आगे कहा— ‘अभी तो तू बालक है. लेकिन बड़ा होने के बाद समझ जाएगा कि हर इंसान के भीतर एक भेड़िया छिपा होता है. वही उसको सामान्य स्थितियों में भी हिंसक बनाए रहता है. पुलिस को खूब सिखायासमझाया जाता है कि कानून के हक में सिपाही अपने भीतर के भेड़िया को सिर न उठाने दंे. पर ऐसा कभी होता नहीं. बल्कि अक्सर इसका उल्टा ही होता है. स्वार्थ, लालच और कानून की वर्दी सिपाहियों के भीतर बैठे कुदरती भेड़िये को और उग्र बना देती है. जिसका नतीजा गरीब आदमियों को ही भुगतना पड़ता है. क्योंकि अमीर और समर्थ के आगे तो भेड़िये भी मेमनों जैसा व्यवहार करने लगते हैं.’

बापू जैसे अपने आप से कह रहा था. या फिर अपनी स्थिति साफ करना चाहता था. लेकिन मेरे मन में उसके प्रति जो गुस्सा था, वह अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ था. इसलिए उसका ध्यान अपनी ओर मोड़ते हुए मैंने कहा—

तुम तो मुझे छोड़कर ही चले आए थे?’

कहा न अक्ल मारी गई थी मेरी. तेरी मां के जाने के बाद…..’ बापू अकड़कर बोला. उसी तरह जैसा कि उसका स्वभाव था. किसी भी बात का तर्कसंगत जवाब उससे बन ही नहीं पाता था. अपनी इसी कमजोरी छिपाए रखने के लिए वह गुस्सेमारपीट पर उतर आता. दर्द और तनाव यदि बहुत बढ़ जाए तो रोने भी लग जाता था. उस समय मेरी ओर देखते हुए अगले ही क्षण वह उदास हो गया. बात जो कहना चाहता था वह हवा हो गई अथवा उसका मन झूठ का सहारा नहीं ले पाया. गहरे असमंजस के बीच कुछ देर तक वह चुप्पी साधे रहा. फिर मुझे धीरज बंधते हुए, मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला—

जो हुआ उसे पूरी तरह भुला दे. मैं तेरे साथ हूं….देखता जा तू, मैं सब संभाल लूंगा.’

मैं जानता था कि बापू अपने सामर्थ्य से बहुत बड़ी बात कह रहा है. अपनी इतनी बड़ी जिंदगी में वह कभी खुद को नहीं संभाल पाया. उसे संभालतेसंभालते मां ने अपनी जान दे दी थी और अब वह खुद संभलने और दूसरों को संभालने का दावा कर रहा है. यह एकदम अविश्वसनीय और असंभवसी बात थी. मां होती तो मैं बापू की बात पर कतई भरोसा न करता. पर उस समय एकमात्र वही मेरा अवलंबन था.

बापू, यहां हमारा घर तो है नहीं?’ मैंने कहा था. सिर पर छत का एहसास कितना जरूरी है, यह मैंने पिछले दो दिनों में भलीभांति जान लिया था. उतारचढ़ाव से भरे इस दौर में मैंने जीवन की कई कड़वी सचाइयों का सामना किया था.

घर आदमी के अनुभवों को सीमित करता है, उनकी रफ्तार को शिथिल बनाता है. पर यह भी आदमी के सामथ्र्य से बाहर की बात है कि वह रातदिन अनुभवांे की तलाश में भटकता फिरे. दिनभर के नएनए अनुभवों को सहेजने, विश्लेषित करने और उन्हें अपनी स्मृति में सुरक्षित बनाए रखने के लिए उसको ठहराव की जरूरत होती है. जिसमें वह पूरी दुनिया, अनुभवों के संसार से कट जाना चाहता है. घर मनुष्य को एकांतिक वातावरण प्रदान करता है. आदमी के सिर से छत का आवरण हट जाए तो रोमांचक अनुभवों की बाढ़सी आ जाती है. छत का आसरा न हो तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाए. आदमी को आदमी बनाने वाली चीज वे सूक्ष्म संवेदनाएं ही होती हैं, जिन्हें एक छत के नीचे रहते हुए हम अपनों के साथ बांटते हैं, तय करते हैं कि दिनभर के अनुभवों में से किन्हें छोड़ा जाए और किन्हें सहेजकर रखा जाए. सूक्ष्म संवेदनाएं ही परिवार को एकात्मता प्रदान करती हैं. किंतु जीवन निरी प्रयोगशाला भी नहीं है कि उसकी डोर कोरे अनुभवों के हाथ सौंप दी जाए. छतें आदमी के अनुभवों को भी विराम देती हैं. इसलिए दिनभर इधरउध्र भटकने वाला मनुष्य शाम को छत के तले विराम ले लेता है.

बापू ख्यालों में उलझा हुआ था. देर तक मैं उसके चेहरे की ओर देखता रहा. स्याह अंधेरे के बीच भी उसकी छोटी और गोल आंखें साफ, चमकीली नजर आ रही थीं.

बापू हमारा घर…..’ मुझे बापूधाम की अपनी छोटीसी, टीनटप्पर से ढकी झुग्गी की याद आ गई.

पहले रोजगार का ठिकाना हो जाए, उसके बाद घर भी तलाश लेंगे.’ बापू ने सहज भाव से उत्तर दिया. उसकी बातों से लगा कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझने लगा है. इससे मुझे थोड़ी तसल्ली हुई. हौसला भी बढ़ा—

कल्लू, हरिया ओर बेला का क्या होगा?’ बेला हम सब में छोटी थी. वह बिल्कुल मां पर गई थी. इकलौती बेटी होने के कारण बापू भी उसको खूब प्यार करता था. हम भाइयों को उसने शायद ही कभी गोदी में बिठाया हो. पर बेला बापू को देखते ही उसकी गोद में बैठ जाती थी. घने नशे की हालत में भी, बापू उसे खूब दुलारता और प्यार करता था. मुझे आशा थी कि बेला का नाम सुनते ही वह भावुक हो उठेगा. परंतु यह भी मेरी उन अनेक गलतफहमियों का हिस्सा था जो बापू को लेकर मैं उस समय अपने मन में पाले हुए था.

तू उनकी फिक्र मत कर. उन्हें तेरे मतंग चाचा पाल लेंगे.’

मतंग चाचा तो केवल रात को घर लौटते हैं. पूरे दिन तो वे सड़क पर गागाकर भीख मांगते हैं.’ बापू की बात सुनकर मैं डर गया. मुझे डर था कि कहीं मतंग चाचा बेला को भीख मांगना ही न सिखा दें. जिससे मां को नफरत थी. इसीलिए वह दिल से बेहद भले, मतंग चाचा को नापसंद करती थी और हमें उनकी झुग्गी में जाने से रोकती थी. बापू शायद मेरे दिल की बात समझ चुका था. इसीलिए बोला—

मलंग चाचा ने यदि उन्हें ठीक से नहीं रखा तो पुलिस अनाथालय भिजवा देगी.’

अनाथालय के बारे में तब तक मुझे कोई जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि अनाथालय ऐसी जगह होगी जहां पुलिस को मनमानी करने की आजादी हो. इससे मैं घबरा गया—

वहां उन्हें रोटी कौन देगा बापू?’

अभी तो मुझे अपनी ही रोटियों की चिंता है. कुछ कामधंधा मिले तो उन सबको मैं अपने साथ लिवा लाऊंगा.’ बापू ने सूखे स्वर में कहा. जाहिर है कि वह मुझे बहलाना चाहता था. सुनकर मुझे धक्का लगा. मन उसके प्रति ग्लानि से भर गया. थोड़ी देर पहले जो भरोसा उसके प्रति उमड़ा था, वह एक झटके में हवा हो गया. मेरी मनःस्थिति का अंदाजा शायद बापू को था. इसलिए मुझे तसल्ली देने के लिए उसने कहा—

वे तीनों अभी बहुत छोटे हैं. तेरी मां होती तो ठीक था. अभी तो हमारा ही तयठिकाना नहीं है. ऐसे में उन्हें अपने साथ हम कैसे रख पाएंगे. साल दो साल वे अनाथालय में रह लें. वहां उन्हें अच्छा खानापीना और रहने को मिलेगा.’

मेरे मन में आया कि बापू से कहूं कि यदि अनाथालय में रहने को छत और भरपेट भोजन है तो मुझे भी वहीं भेज दें. मैं अपने तीनों भाईबहनों की देखभाल भी करता रहूंगा. लेकिन कहने के साथ ही बापू ने फिर चुप्पी साध ली थी. जैसे जो उसने कहा उस पर उसे स्वयं भी भरोसा न हो. यह देख मेरे मन में भी अनेक दुश्चिंताएं उभरने लगीं. मां का अभाव मुझे फ़िर खलने लगा.

रात धीरेधीरे खिसक रही थी. मुझे बापू से कोई उम्मीद न थी. लेकिन उस समय वही मेरा एकमात्र सहारा था. संबंध की गर्माहट को बचाए रखने के प्रयास में मैंने खुद को उससे सटा लिया. हवा में बढ़ती ठंडक से थोड़ी राहत मिली. सुबह होने में अभी बहुत देर थी. कुछ देर पहले ही एक रेलगाड़ी बिना रुके गुजरी थी. उसके गुजरने से भंग हुआ सन्नाटा फिर स्थायीभाव लेने लगा था. थकान और दिमागी बोझ. धीरेधीरे एक नशासा मेरी आंखों में समाने लगा. नींद अपना जादुई असर दिखाने लगी. मैंने खुद को ढीला छोड़ दिया. इस बात से अनजान और कदाचित बेफिक्र भी कि आगे जो सफर मेरी प्रतीक्षा कर रहा है, वह भीषण यंत्रणाओं से भरा होगा. ऐसी यंत्रणाओं से जो मेरी कल्पना से भी बाहर हैं. उनसे मुझे अकेले ही निपटना होगा. मां के बिना….अपने भाईबहनों और किसी संगीसाथ के बिना. बापू के साथ…. अथवा शायद अकेले ही….! मां की स्मृतियों के साथ.

कोई कुछ भी कहे, कैसा भी दावा करे. हर आदमी जिंदगी की जंग में हमेशा अकेला ही रहता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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