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दंश — छ्ठी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

बापू के स्वभाव को लेकर अनेक विचार मेरे दिमाग में आते. प्रायः हर विचार में वह मुझे खलनायक के रूप में दिखाई पड़ता. मन में उसके प्रति घृणा-नफरत जैसा न जाने क्या-क्या चलता रहता. परंतु मां का बापू के प्रति समर्पण मुझे उसके विरुद्ध मुंह खोलने न देता. कभी-कभी यही असमंजस अंतहीन तनाव का कारण बन जाता था. अब आप इसे मेरी कमजोरी कहें या उम्र का प्रभाव, तनाव बहुत देर तक ठहर नहीं पाता था. आदमी दुख को भुलाकर और सुख को बांटकर ही सुखी रह सकता है. यह मैंने किसी स्कूल या का॓लेज में नहीं, जीवन की पाठशाला में सीखा था.
जीवन की पाठशाला! सुनने में बहुत अच्छा लगता है. हकीकत में यह व्यंग्य के सिवा और क्या है. जिंदगी अपने आप में व्यंग्य है….निखालिस व्यंग्य! अगर हंसना भी चाहो तो आंखें नम हो जाती हैं. रोने की हसरत हो तो आंसू तक साथ नहीं देते. फिर भी, सुखमय हो कि दुखमय! समय तो बीतता ही है! और समय के साथ-साथ बीतती जाती है जिंदगी. हास और रुदन से भरी हुई.
जिसे हम परमात्मा कहते हैं. जिसको हम सुख-दुख का दाता, भाग्य-विधाता, जगत्पालक, करुणागार मानते हैं. जो कहा जाता है कि सबका जन्मदाता, संकट के समय सबकी रक्षा करने वाला है, उसके बारे में एक बात बहुत विचित्र है. कम से कम मुझे तो विचित्र ही लगती है. चतुर परमात्मा जब सुख देता है तो अनुभूति को शिथिल कर देता है. आदमी सुख में डूबा….समय की तेज रफ्तार के साथ उनींदा-सा बहा चला जाता है. सुख के खील-बतासे के समान हल्के-फुल्के दिन बिना पंख के हवा में उड़ने लगते हैं. आनंद के एहसास से भीगे, अलसाए-से वर्ष….हौल-हौले, चुपचाप फिसलते हुए चले जाते हैं. नदी-जल से तरल, पवित्र और सतत प्रवाहमान.
दुःख हो तो हमारी अनुभूतियां सहस्रगुनी हो जाती हैं. प्रत्येक पल त्रिशूल जितना पैना और घातक बन जाता है. दिन में सूरज की किरण विषैले कांटों सी चुभती हैं, रात्रि दर्द के अंगारे बरसाती है. परमात्मा जब दुःख देता है तो जीवन के प्रत्येक पल को इतना भारी और बोझिल बना देता है कि सफर दुरूह, जीवन पहाड़ जैसा लगने लगता है. आदमी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर कोई फैसला नहीं कर पाता.
सुखमय जिंदगी, यानी स्वप्नीली रातें…जिनमें समय का एहसास ही न हो…जिनमें आदमी सपनों के उड़नखटोले पर उड़ान भरता, खुशियों के हिंडोले में हर पल झूमता, गाता-सा रहता है. और दुखमय जिंदगी, जिसका हर पल पहाड़ जितना बोझिल होता है. उखड़ी सांसों और लुटी-पिटी धड़कनों के बावजूद, हांफते और कराहते हुए जिसे आदमी को अपनी नंगी पीठ पर ढोना पड़ता है.
बापू और मां दोनों साथ रहते थे….एक ही छत के नीचे सोते. दोनों ने साथ-साथ रहने, खाने-पीने, उठने-बैठने की कसमें खाई हुई थीं. तो भी, दोनों के जीवन में भारी अंतर था.
बापू के लिए जिंदगी मौज थी. मां के लिए बोझ! बापू के लिए जीवन उसकी बपौती था, मां के लिए एक चुनौती. बापू के लिए जीवन का हर पल उसके लिए खिलंदड़ेपन की सौगात था, मां के लिए जिम्मेदारी का एहसास.

*

कैसे बताऊं कि यह मां के जीवन की अंतिम घटना है. बेहद दर्दनाक….पीड़ामयी. ऐसी त्रासदी जिसने हमारे जीवन की धारा ही बदल दी थी. अपनी मामूली खुशियों और भारी-भरकम दुःखों के बीच जो परिवार जीना सीख चुका था, एक ही झटके में वह तिनकों-सा बिखर गया. वक्त की आंधी इन तिनकों को कहां-कहां ले गई, नहीं पता. मां का नियमित पूजा-पाठ निष्फल रह गया. निष्प्रह पति-भक्ति उसका उद्धार न कर सकी. सुबह-शाम की आरती, पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास….सब अनसुने रह गए. जिस जीवन को वह वरदान समझ रही, वह अनायास अभिशाप में बदल गया.
यह सब कैसे हुआ….किसने किया, वह समझ ही न पाई. समझने का मौका भी उसका कब मिल पाया. सुबह से शाम तक परमात्मा-परमात्मा रटना भी मां के किसी काम न आ सका. जीवन में सुख की कमी तो पहले से ही थी. उसकी तो हमें आदत थी. अपने दुःखों को मां चुप रहकर, हम उससे लिपटकर….आंचल में छिप-सिमटकर सह लेते थे. एहसास तक नहीं होता था उसका. मां के प्यार और वात्सल्य सुख के रहते दुःख की तीव्रता और अनिवार्यता भी आज जितनी नहीं थी.
उस दिन शाम होते ही मां को सूचना मिली थी कि बापू हवालात में बंद है. वह रोजमर्रा की-सी खबर, साधारण-सी घटना थी. जो हुआ वह नया नहीं था. अक्सर ऐसा ही होता. सुनकर मां ने चुप्पी साध ली. कैद हो गई थी अपनी ही अंतःकंदराओं में. समेट लिया था अपनी तमाम इंद्रियों को अपने ही भीतर. मानो गूंगी-बहरी, स्वार्थ की मारी दुनिया से बिलकुल कट जाना चाहती हो.
पर इस बार अंधड़ कुछ अधिक कालापन लिए हुए था. चेहरे पर बेचैनी कहीं ज्यादा मारक थी. तकदीर जाने कौन-सा खेल इस बार खेलना चाहती थी. मां शायद उसके गूढार्थ को समझ चुकी थी. तभी वह दुःखी थी. इतनी दुःखी वह पहले कभी नहीं दिखाई पड़ी थी. खबर मिलते ही वह निढाल-सी जमीन पर बैठ गई—अचल-अबोल! हम सब बच्चे मां को घेर कर खड़े हो गए. मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा. पर वह निस्पंद बनी रही. जिंदगी के दुःख-दर्द अकेले झेलने की अभ्यस्त थी वह. पर आज की व्यथा कुछ ज्यादा ही गहरी थी. क्यों गहरी थी, यह परखने की न मुझमें योग्यता थी, न मां से पूछने का साहस.
घंटों बाद कुछ संकेत मिला. इस बार मां को बताया गया था कि नया दरोगा बहुत सख्त है. उसने आने के साथ ही शहर के कई नामी-गिरामी बदमाशों को मार गिराया है. डंडे की जगह गोली से बात करता है. बडे़-बड़ों को वह भीतर कर चुका है. हवालातियों को पीटते समय तो वह पूरा कसाई बन जाता है. मां ने यह सुना तो सहम-सी गई. अनजाना-सा भय उसके चेहरे पर पसर गया. धड़कनें बैठने लगीं….
उसकी आंखें सूखी हुई थीं. मगर भीतर आंसुओं का जो समंदर उमड़ रहा था, पीड़ाओं का जो चक्रवात था, उसकी थाह पाना नामुमकिन था….नामुमकिन ही था. चांडाल थानेदार के कोप से बापू को बचाना जरूरी था. पर कैसे? यह समझ पाना मां की सरल बुद्धि से बाहर था. पूरी रात वह फर्श पर बैठी हुई बापू की प्रतीक्षा करती रही. जरा-सी आहट होते ही झुग्गी के दरवाजे तक दौड़ी चली आती. आंखें फाड़-फाड़ कर गलियारे में ताकती. चेहरे से हवाइयां उड़ रही थीं. पूरी रात मां तो मां, बापू की चारपाई भी उसके घर लौटने का इंतजार करती रही.
पड़ोस के औरत और मर्द बापू के बारे में जानने के लिए आते रहे. हरेक को वह गर्दन हिलाकर ‘ना’ कहती. पर आने वाला मां की चुप्पी से ही सब कुछ ताड़ लेता— दबे पांव वापस लौट जाता. कुछ की सहानुभति बिल्कुल सच्ची थी. पर मां खालिस सहानुभूति का क्या करती! कैसे तोष करती! बार-बार जवाब देने से मां की हालत विक्षिप्तों जैसी हो चुकी थी.
उस रात मां ने सैकड़ों बार अपने आराध्यदेव को टेरा. पचासियों देवताओं से अनगिनत मनौतियां मांगीं. झुग्गी में रहकर जो-जो टोने-टोटके वह कर सकती थी, वे सब सच्चे मन के साथ किए. उदास मन से अंटोक संकल्प भी किए. मां की विचित्र हरकतें देखकर हम कुछ देर तो अपना दुःख भुला देते….बाद में मां की वीरान आंखें हमारे भीतर भी रेगिस्तानी सन्नाटा भर देती थीं. रात जैसे-तैसे बीती. सुबह हुई. परंतु मां की परेशानी अंतहीन थी.
बापू को छुड़ाने की आस लेकर मां जिससे थोड़ी-सी भी उम्मीद थी, उसी के पास फरियाद लेकर पहुंची थी. हर एक के सामने वह रोई. गिड़गिड़ाई. बापू को छुड़वाने के लिए खूब आरजू-मिन्नतें कीं. उस दिन हमारी झुग्गी में चूल्हा न जला. जलाता भी कौन. एक मां ही थी जलाने वाली. उसे अपनी ही सुध न थी. उदास, निस्संवेद, वीरान-सी आंखों से वह तसल्ली जताने आए बस्ती के हर औरत-मर्द को देख रही थी.
अनोखी दुनिया में तरह-तरह के लोग. बस्ती की कुछ औरतें मां की हालत देखकर हंस रही थीं. उनमें कई ऐसी थीं जिन्हें मां की परेशानी महज नाटक लग रही थी—
‘देखती हो…इसे कहते हैं त्रियाचेहत्तर. जानबूझकर भी कैसी भली बनी रही है.’ औरतों का एक दल बातें कर रहा था.
‘घरवाला जब जेब भर-भर कर लाता था तब तो चुपचाप रख लेती होगी….’ दूसरी औरत ने जोड़ा.
‘मैं भी तो कहूं. हमारे घर में तो ढंग से चूल्हा नहीं जल पाता. इनके यहां रोज रात को पीने को कहां से आता है?’
‘भगवान सबकुछ देखता है बहन. उसके घर देर है….अंधेर नहीं.’
‘करनी-भरनी तो साथ-साथ चलती है. पाप किए हैं तो भुगतने ही पड़ेंगे.’
इन तीखी आलोचकों के बीच मां की समर्थक इक्का-दुक्का औरतें चुप्पी साधे रहतीं. कुछ को अफसोस था कि वे अभी तक गलतपफहमी का शिकार रहीं. एकाध औरत मां के पक्ष में बोल भी देती तो उसे बाकी औरतें दबा देती थीं.
निर्बल को समझने में सदैव देर होती है. सबल को खुद को समझाना नहीं पड़ता. कोई क्या सोचता है….मां का उस ओर ध्यान ही नहीं था. वह अपने दुःख से बेहाल-बदहवास होकर यहां-वहां भटक रही थी. छोटे बहन और भाइयों को तो मतंग चाचा अपनी झुग्गी में लिवाकर ले गए थे. मैं मां के साथ उसे परेशान देखकर, दुःखी था. उसे ढांढस बंधाने की हिम्मत भी मुझमें नहीं थी.
दिन कछुआ गति से बीच रहा था. बापू का इंतजार करते-करते हमारी आंखें फटी जा रही थीं. उसके लौटने की उम्मीदें धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही थीं. मेरे तो आंसू सूख चुके हैं. सुख-दुःख ज्यादा असर नहीं डालते. पर तुम ठहरे शहरी बाबू, दिल को थामे रहना बाबू!

*

बापू इस बार लंबा फंसा था…. उसपर चोरी का इल्जाम था. जिस रास्ते से वह लौटता था, वहां घड़ियों की बहुत बड़ी दुकान थी. उसी से चोरी हुई थी. रात को शटर तोड़कर चोर लाखों रुपये की घड़ियां चुरा ले गए थे. उस चोरी में बापू का कोई हाथ न था. जिस रात चोरी हुई, वह झुग्गी में ही था. हम सबके साथ. इस बात को हम जानते थे और हमारे पड़ोसी भी. मगर हमारी, हमारी मां और गरीब पड़ोसियों की यह जानकारी किसी भी काम की न थी—सारी गवाहियां और सबूत तब तक बेकार थे, जब तक पुलिस उन्हें न माने.
पुलिस किस तरह मानती है, यह बापू अच्छी तरह जानता था. और हम भी. इसके बावजूद पुलिस की सेवाएं जुटाना हमारे लिए असंभव था. सारे छुटभैया नेता….जो बापूधाम के वोटों को उंगलियों पर नचाने का दावा करते थे….जिनके साथ बापू ने महीनों-महीनों लगकर काम किया था. जिनकी हर महफिल, हरेक मंजिल का वह राजदार था….जो उसके सच्चे हमदम, पक्के दोस्त होने का दावा करते थे, वे सभी एक-एक कर मां के पास आए थे. जख्मों को कुरेदने….जले पर नमक छिड़कने या शायद हकीकत चीन्हने के लिए. सभी ने मां से कुरेद-कुरेदकर सवाल किए थे….
“कि माल लौटाकर बापू को छुड़ाया जा सकता है….कि रुपया तो हाथ का मैल है….कि आदमी सही-सलामत रहे तो माल की कमी नहीं….इससे ज्यादा भी आ सकता है….कि लाखों के माल में से हजार-दो हजार खर्च कर देने में ही भलाई है….कि एक दाव की कुर्बानी से इस दरोगा को खरीदकर आगे का रास्ता निष्कंट किया जा सकता है….उसके बाद पूरी पुलिस अपनी होगी….वरना जालिम दरोगा…”
मां भला क्या कहती. क्या जवाब देती. कौन उसकी बात पर विश्वास करता. सो ऐसे प्रश्नकर्ताओं के सामने मां पत्थरशिला बन जाया करती थी. मूक-अडोल बैठी रहती. वे लोग सामर्थ्य-भर प्रयास करते और जब काफी कुरेदने के बाद भी कुछ नतीजा न निकलता तो तसल्ली देकर उठ लेते थे. पुलिस का दावा था कि चोरी बापू ने ही की है. उसका सारा जोर बापू से अपराध कबूलवाने पर था. इसके लिए वह अपना हरेक हथकंडा आजमा रही थी.
हम जानते थे कि बापू को झूठ-मूठ फंसाया जा रहा है. परंतु पुलिस के आगे गिड़गिड़ाना हमारी विवशता थी. असली बात भी सबको मालूम थी और कुछ दिनों बाद तो शहर का बच्चा-बच्चा उसको जान गया. हालांकि असलियत कभी भी वास्तविकता नहीं बन सकी. बापू को लेकर कानून की किताबों में पुलिस ने जो लिख दिया था, वह झूठ होकर भी पत्थर की लकीर बना रहा. पुलिस ने जो सुनाना चाहा वही सबने सुना, पुलिस ने जो सिद्ध करना चाहा, उसी पर सबने विश्वास किया.
उन दिनों जो नया थानेदार आया था, वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था. कारगुजारी दिखाने के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकता था. झूठ-मूठ की गिरफ्तारियां. अखबार के जरिए सनसनी फैलाना. नकली मुठभेड़ के जरिये नाम बटोरना, उसके पसंदीदा काम थे. इसलिए चार्ज लेने के सप्ताह-भर के भीतर ही नए थानेदार ने अपने मातहत सिपाहियों की मीटिंग बुलाई थी. उस अतिगोपनीय अनौपचारिक बैठक की शुरुआत करते हुए उसने कहा था—
‘मुझे यह ठंडापन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है.’
‘सर! इलाके में पूरा अमन-चैन है…’
‘इस अमन-चैन को लेकर चाटूं या गली-गली ढिंढोरा पिटवाऊं?’
‘मेरा यह मतलब नहीं था, सर!’ मातहत अधिकारी सकपका गया.
‘तुम्हारा जो भी मतलब हो तुम जानो. मुझे इतना ठंडा इलाका हरगिज नहीं चाहिए.’ दरोगा ने धमकी दी. सबको मानो सांप सूंघ गया. तब नए थानेदार ने कहना शुरू किया—
‘इतना बड़ा इलाका है. फिर भी रजिस्टर खाली पड़ा रहता है. सिवाय मामूली चोरी-चकारी के कोई ढंग का काम ही नहीं होता यहां. आखिर यहां के लोग जीते कैसे हैं….कैसे जीते हो तुम सब?’
‘भले लोगों का इलाका है सर!’ मातहत ने मुंह खोला. इस आश्वस्ति के साथ कि इससे ‘जनाब’ का गुस्सा जरूर ठंडा पड़ जाएगा. लेकिन ‘जनाब’ तो सबको गर्म करने के इरादे से वहां पहुंचे थे. इसलिए इस बार आवाज में गुर्राहट भी घुल-मिल गई— ‘नहीं, इससे लगता है कि यहां की जनता को पुलिस पर जरा भी विश्वास नहीं है. वह जुर्म सहकर भी चुपचाप पड़ी रहती है. अगर यही रहा तो मैं अपनी रिपोर्ट में क्या लिखूंगा. यह कि इस चौकी की जरूरत ही नहीं है….कि यहां तैनात सारे के सारे लोग निकम्मे हैं….पुलिस के नाम पर कलंक हैं….कि सब खाली पड़े-पड़े मुटियाते रहते हैं….कि इससे तो अच्छा है कि सरकार इन्हें बार्डर पर भेज दे. कम से कम दुश्मन की एक गोली कम करने के काम तो आएंगे….साले-हरामखोर…मादरचोद!’
मातहत सिपाही समझ न सके कि क्या जवाब दिया जाए. नया साहब क्या चाहता है. पुराने थानेदार ने यहां तीन वर्ष काटे थे. उसका भी मानना था कि इतना शांत इलाका उसने कहीं नहीं देखा. तीन साल आराम से पड़ा-पड़ा मुटियाता रहा. चौथे वर्ष यह कहकर उसने तबादला करा लिया कि अगले साल बेटी का ब्याह करना है. सूखे इलाके में रहा तो बेटी ताउम्र कोसती रहेगी.
यह साहब उससे भी हजार कदम आगे है. और तब सबको असमंजस में देख नया दरोगा शातिराना मुस्कान के साथ बोला था—
‘देखो, मुझे न ज्यादा शांति चाहिए, न दंगे-फसाद. बस इलाका सुर्खियों में रहना चाहिए. मैं आगे जाना चाहता हूं और इसके लिए जो जरूरी समझूंगा, करूंगा. जब तक मैं यहां हूं, तब तक आप सबको भी वही करना पड़ेगा, जो मैं चाहूंगा….समझे.’ सभी सिपाही नए दरोगा के चेहरे की ओर देखने लगे थे. मानो आने वाले दिनों की योजनाएं बना रहे हों.
हकीकत में नए दरोगा ने आते ही हफ्ते की रकम बढ़ाने का ऐलान किया था. उसका कहना था कि सरकार जब हर वर्ष इनकम-टैक्स बढ़ा रही है तो इनकम भी बढ़नी ही चाहिए. उन सबकी इनकम का अक्षयस्रोत था— हफ्ता!
नए दरोगा की सहमति मिलते ही सभी दुकानदारों को आदेश पठा दिया गया. इस पर घड़ियों की दुकान का मालिक अड़ गया. ऐसे नासमझ और विद्रोही दुकानदार का असर दूसरों पर पड़े, ज्यादा शोर-शराबा हो उससे पहले ही उसे सबक सिखाना जरूरी था. नए दरोगा के पास इस काम के लिए हजार तरकीबें थीं. जिनमें से उसने एक की आजमाइश की गई. बार-बार अमल में लाई जा चुकी वह तरकीब उस बार भी कारगर सिद्ध हुई.
इससे पहले तक दुकानदारों का दिमाग सातवें आसमान पर था. एक झटके में वह गिरकर जमीन पर लोटने लगा. घड़ियों की दुकान का मालिक सबसे पहले पहुंचा. थानेदार साहब के दरबार में दंडवत करने. उसके पीछे-पीछे दूसरे दुकानदार भी आए. सच्चे श्रद्धासुमनों के साथ. थानेदार बाग-बाग. लेकिन मन की खुशी किसी पर जाहिर न होने दी. उसने उसी दिन अखबारों के जरिए चुनौती उछाली—
‘जिसने भी मेरे इलाके में यह हरकत की है वह संभल जाए. मैं उसे केवल चैबीस घंटे का समय देता हूं. मय माल थाने में आकर हाजिरी दे. तब हो सकता है कि मैं अदालत से उसपर रहम करने की फरियाद कर सकूं. चौबीस घंटे के बाद उसका शरीर होगा और मेरा डंडा. इतना मारूंगा कि भूत भी कांप उठें. यहां आने से पहले मैं बहुतों को सीधा कर चुका हूं. यहां भी एक-एक को सीधा करके मानूंगा. मैंने पुलिस के सभी जवानों को आदेश दे दिया है कि थाने में बैठकर मुजरिम का इंतजार करने के बजाय बाहर निकलें और आकाश-पाताल, बस्ती और जंगल जहां भी वह छिपा है, उसको चैबीस घंटे के भीतर हाजिर करें. जो भी चोर का पता लाएगा, मैं उसको ईनाम दूंगा, जो लापरवाही करता हुआ पाया गया, उसकी वर्दी उतरवा ली जाएगी.’
दरोगा की दी हुई टीप को स्थानीय अखबारों ने मोटे मोटे अक्षरों में छापा. उसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई. विरोधी दलों ने तुरंत शहर में गिरते अमन-चैन पर चिंता जाहिर कर विरोधी धर्म का निर्वाह किया. सत्तापक्ष ने दरोगा के सुर में सुर मिलाते हुए विपक्षियों के बहकावे से दूर रहने, ऐसी घटनाओं से उद्वेलित न होने का आवाह्न किया. उसी शाम दरोगा ने फिर अपने मातहतों की मीटिंग ली. जिसमें वह गर्व के साथ उपस्थित हुआ—
‘देखा! एक ही फूंक में हांडी कैसी उबलने लगी.’ दरोगा के चेहरे हाव-भाव सिर की टोपी, हाथ में घूमते डंडे, बगल में लटके रिवाल्वर ने साथ-साथ कहा था.
‘जी जनाब!’ मातहतों ने जोरदार हुंकारा भरा. सभी के चेहरे पर एकाएक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण बन जाने का संतोष झलक रहा था.
‘यह तो शुरुआत है….तुम लोग बस देखते जाओ.’
‘जी जनाब!’
‘शांति हो या सुख…दुनिया में हर चीज का मोल है. जिन्हें शांति चाहिए उन्हें उसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी.’
‘वजा फरमाया, कीमत तो उन्हें देनी ही होगी सिरीमान!’
‘और कीमत वही होगी जो मैं तय करूंगा.’
‘एकदम ठीक फरमाया जनाब!’
‘क्या ठीक फरमाया जनाब!’
‘जी…कीमत वही होगी जो आप तय करेंगे….!’ अचानक किए गए प्रश्न से मातहत हकलाने लगा था.
‘और तुम यहां थाने में पड़े-पड़े सेहत बनाओगे….लेडी कांस्टेबिल से इश्कबाजी करोगे?’ दरोगा ने डपटा.
‘ज् ज् जी नहीं जनाब! हम तो आपका हुक्म बजाएंगे.’
‘हां, मैं जो कीमत तय करूंगा उसको सही समय सीमा में वसूल करके लाना तुम्हारा काम होगा….समझ गए.’
‘जी…समझ गया जनाब!’
अनुशासन के नाम पर तोते की तरह रटाए गए शब्द सभी मातहतों ने एक साथ दोहराए. सभी प्रसन्न थे. नए दरोगा ने आते ही कम से कम एक चमत्कार तो किया. उससे पहले के दरोगा को वही बोलना पड़ता था जो शहर के नेता चाहते थे. वही करना पड़ता था, जो उन नेताओं के आकाओं के इशारे पर ऊपर से आदेश आता था. मगर पहली बार पूरा शहर नए दरोगा की बोली बोल रहा था.
पहले वाला दरोगा महीने में एक बार सब छुटभैये नेताओं से आशीर्वाद लेने जाता था. अमन-चैन बनाए रखने के लिए उनका आभार दर्शाता था. अब नेता खुद अमन-चैन की मांग लेकर थाने आ रहे थे. पहले वे पुलिस पर शक करते थे, अब आपस में ही एक-दूसरे पर संदेह में फंसे थे. उनके बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा था. नेताओं के आगे पुलिस पहले पस्त नजर आती थी, अब मस्त. कौन जाने कि यह उसका बड़बोलापन था या कोई राक्षसी ऐलान. जो भी था वह गरीबी और ईमानदारी की चिता जलाने जैसा था. जिसका पहला शिकार बापू बना था.

*

पहला शिकार! शायद गलत कहा मैंने. वहां आने से पहले वह दरोगा बापू जैसे जाने कितने लोगों को अपना शिकार बना चुका था. बापू जैसे लोग तो होते ही शिकार होने के लिए हैं….क्यों बाबू!
‘जनाब! यह गरीब आदमी है. पिछले दरोगा साहब इससे बिना कुछ लिए ही छोड़ देते थे.’ एक हवलदार बापू को जानता था. शायद थोड़ी-बहुत भलमनसाहत उसमें बाकी थी. बेगुनाह को थानेदार द्वारा अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की खातिर बलि चढ़ाया जाना उसको अखरा था. इसीलिए उसको रोकने की हल्की-सी कोशिश उसने की थी. परंतु नया दरोगा अपनी ही किस्म का आदमी था. उसने बेशर्मी का साथ कहा था—
‘हम भी इससे कुछ नहीं लेंगे. पर कानून तो अपना काम करेगा.’
बापू ने समझा था कि यह पकड़ा-धकड़ी रस्मी है. लोक-दिखावा है. हवालात में दो-चार घंटे रखकर पुलिस गिरफ्तारी का नाटक करेगी. दरोगा अखबारों में अपना फोटू-सोटू छपवा लेगा….बस! उसके बाद उसे छोड़ दिया जायेगा. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका था. इसीलिए पुलिस ने जब उसे पकड़ा था तो उसके प्रति अपनी दोस्ती निभाते हुए वह खुद को छुड़ाने के बजाए, चीखने-चिल्लाने लगा था. लोग उसका नाटक देखकर हंसने लगे. तभी दरोगा का जोरदार तमाचा बापू के मुंह पर पड़ा. उसके मुंह से खून निकल आया. आंखों में लाल-पीले तारे झिलझिलाने लगे.
बापू इससे पहले भी पुलिस की मार झेल चुका था. परंतु वह केवल रस्मअदायगी जैसी होती थी. पुलिस और उसके ‘अपनों’ के अंतरग भाईचारे का प्रतीक जैसी. उसमें शोर तो होता. देखने वाला भी कांप उठता था. पर असल में वह होती बिल्कुल खोखली थी. पुलिस उसे सचमुच मार सकती है—यह बापू के लिए अकल्पनीय था. उसका विश्वास डोलने लगा. सामने खड़े दरोगा की ओर उसने देखा. नया रंगरूट, अनजान चेहरा. तभी ऐसा हुआ है. पुलिसिया मार की कला तो आते-आते ही आती है.
इसके अनाड़ीपन के कारण ही चोट गहरी पहुंची है—बापू मन को समझाने लगा. सहसा उसकी आंखों में चमक और होठों पर मुस्कान छा गई. थानेदार के पीछे खड़ा हवलदार उसे कुछ जाना-पहचाना-सा लगा था. उसी के माध्यम से नए थानेदार को सुनाते हुए उसने कहा था—
‘हुजूर पहचाना नहीं! मैं आपका पुराना ताबेदार घुरिया….घुरिया ठेकेदार!’ बापू अपनी शराब मंडली में ठेकेदार के नाम से भी जाना जाता था. पीठ पीछे गाली देने वाले लोग भी सामना होने पर बापू को इसी नाम से पुकारते. यह संबोधन बापू को बहुत प्रिय था. शाम की बैठकी के समय इसी विशेषण के सहारे उसकी जेब आसानी से खाली कराई जा सकती थी.
‘एक आखिरी चाल और….आपको याद नहीं उस दिन आपने मेरी आखिरी अठन्नी भी दाव में जीत ली थी. वैसे आप जैसा किस्मत का धनी भी मैंने नहीं देखा. इस जगह पर जाने कितनों ने दाव लगाया. कितने एकदम नंगे होकर गए. पर आपको मैंने आज तक नंगा होते नहीं देखा. किस्मत की मेहरबानी से बड़ा नहीं छोटा दाव तो आपका लग ही जाता है. मेरे भाग्य में तो वह भी नहीं है, ठेकेदारजी.’
कुछ ऐसी ही बातें करीब-करीब हर रोज सुनने को मिल जातीं, जो बापू का दिमाग खराब करने के लिए काफी थी. अपनी तारीफ सुनते ही वह आपे से बाहर हो जाता. उसके बाद उठता तो दिन की कमाई को हवा में उड़ाकर. परंतु उस दिन बापू का हर दाव उल्टा पड़ रहा था.
बापू की बात पूरी होने से पहले की दरोगा का दूसरा तमाचा उसके गाल पर पड़ा था. जिससे बाकी के शब्द भीतर ही दबे रह गए. दरोगा ने हवलदार को इशारा किया. पुराने सारे संबंध उस इशारे के साथ ही बिसरा दिए गए. हवलदार आगे बढ़ा और बापू की पीठ, कूल्हे, कंधे, टांग, बांह आदि पर दनादन डंडे बरसाने लगा. यह घटना सड़क के बीचों-बीच घटी थी. सो तमाशा देखने के लिए भीड़ जमा होने लगी थी.
‘साले…हराम की औलाद…सूअर के बीज…मेरे इलाके में आकर हाथ साफ करता है. मादरचोद…बता कहां छिपाया है माल?’ कहते हुए दरोगा ने बापू का गरेबान कसकर भींच लया. पीछे से हवलदार दनादन डंडे बरसाए जा रहा था. उसके लिए दरोगा को खुश करना जरूरी था. बापू जैसे लोगों का क्या! वे तो ऐसे ही कामों में इस्तेमाल होने के लिए जन्म लेते हैं.
‘साहब! दम घुट रहा है. हाथ जरा ढीला रखें. वरना मारा जाऊंगा.’ बापू नीचे से फुसफुसाया. उसके मन में विश्वास अभी भी शेष था कि पुलिस अपनी है. वह मारपीट दोस्ताना है. मजबूरी जो ठहरी. कभी-कभी ऊपरवालों के दबाव में ऐसा करना पड़ जाता है. बापू की यह गलतफहमी अंत तक कायम रही. पुलिस उसे थाने ले गई. हवालात में ठूंस दिया गया. उसकी कनपटियों से खून बह रहा था. देह डंडों की मार से सूज चुकी थी. कपड़े फटकर तार-तार हो चुके थे और अब चिथड़ों के समान लटक रहे थे. तो भी बापू के चेहरे पर शिकन न थी. उसके चेहरे पर भरोसा था. वही भरोसा चौबीस घंटे हवालात में काटने के बाद भी बना हुआ था….क्रमश:.

****

ओमप्रकाश कश्यप

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