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जमींदार की बेटी

कुत्ता रास्ते में जा रहा था. तभी एक घर से रोने की आवाज सुनाई पड़ी.
‘यह तो जमींदार की बेटी की आवाज है.’ कुत्ते के मुंह से अनायास निकला.
‘जमींदार की बेटी को भला क्या कमी है, जो वह रोएगी?’ साथ चल रही कुतिया ने कहा. कुत्ता भी हैरान था—
‘कोई न कोई कारण तो जरूर होगा.’
‘चलो देखते हैं.’ करुण आवाज से आहत कुतिया हवेली में घुसती चली गई. कुत्ता सावधान था. बड़े लोग पीठ पर वार करने की कला में निपुण होते हैं. जमींदार इसके लिए अपने नौकरों को चुनता है. खुद को काफी निडर समझने वाला कुत्ता जमींदार और दूसरे बडे़ लोगों के संपर्क में आने से पहले अतिरिक्त रूप से सावधान हो जाता था. कुतिया के पीछे-पीछे हवेली में घुसते समय भी वह चारों तरफ देख रहा था.
भीतर जमींदार की बेटी जमीन पर बैठी रो रही थी. उसकी मां पलंग पर बैठी अपने लाडले बेटे को खाना खिला रही थी.
‘कान मत खा, चुपचाप रोटी खा ले.’ मां ने रोती हुई बेटी को डांटा.
‘मैं तो तेरे हाथ से ही खाऊंगी.’ लड़की ने जिद की.
‘खिला दूंगी बाबा, पहले भइया का पेट तो भर जाए.’
‘उसका पेट भर चुका है. कई बार डकार आ चुकी है.’ लड़के का पेट सचमुच भर चुका था. बहन को खिझाने के लिए वह धीरे-धीरे मुंह चला रहा था. बीच-बीच में वह उसको चिढ़ा भी देता. इसपर लड़की और जोर से रोने लगती थी.
‘सत्यानाशिन! भइया को खा लेने दे…’ मां ने एक बार फिर डांटा. उसके बाद लड़के की ओर मुड़कर बोली, ‘उसकी ओर मत देख, खा ले बेटा, मेरा राजा बेटा…ये खीर ले, मक्खन ले, अरे, लड्डू तो तेने चखे तक नहीं, खाकर देख. मैंने तेरे लिए खालिश मलाई के बनाए हैं.’
‘तू रोज उसी को खिलाती है.’ लड़की फिर मचली.
‘हाय, हाय! इस लड़की को तो देखो, कमबख्त अपने भाई को भी खाते नहीं देख पाती. रात-दिन क्लेश करती रहती है…’
लड़का धीरे-धीरे जुगाली करता रहा. मां खुशामद करती रही. जननी को तो तरस नहीं आया, मगर नींद ने उस लड़की पर कृपा की. वह रोते-रोते सो गई. उसी समय जमींदार भीतर से निकला. कुत्ता और कुतिया दरवाजे की ओट से देख रहे थे. लड़की को जमीन पर पड़े देख जमींदार की त्योरियां चढ़ गईं—
‘घड़ी-भर आराम करने की सोचकर आया था. तेरी बेटी ने आसमान सिर पर उठा लिया. कुंवर को ढंग से जिमा तो दिया न!’
‘जी!’ जमींदार पति के सामने पड़ते ही स्त्री कांप उठी.
‘ठीक है, इस लड़की को तो मैं कल ही इसके ननिहाल पहुंचवा दूंगा. जब तक यह रहेगी, कुंवर को चैन से खाने भी न देगी.’ जमींदार पांव पटकता हुआ दरवाजे की ओर बढ़ा. कुतिया और कुत्ता निकलकर सड़क पर आ गए.
‘छिः छिः! कितने कठोर मां-बाप हैं.’ बाहर निकलते ही कुतिया बोली.
‘तू नहीं जानती. इस लड़की के भाग्य अच्छे हैं, जो अभी तक जीवित है. वरना जमींदार लोग तो बेटी को जन्म के साथ ही…’
‘एक ही कोख से जन्मे दो बच्चों के बीच इतना भेदभाव किसलिए?’ कुतिया ने बात बीच ही में काट दी. मानो कुत्ता आगे जो कहने वाला था, उसको सुनने की उसमें हिम्मत ही न हो.
‘जमींदार लोग बेटियां ब्याहकर लाते हैं, बेटियां देना उनकी शान के विरुद्ध माना जाता है.’
‘यदि बेटियां ही नहीं रहीं, तो लाएंगे कहां से?’
‘ये तो वही जानें, घमंड अंधा भी तो होता है…जाने दे, यही तो दुनियादारी है. अब हम भी पेट का इंतजाम करते हैं.’ कुत्ते ने कहा. मगर कुतिया के कानों में उस लड़की के रोने की आवाज अब भी गूंज रही थी.
‘सुनो जी, मेरी तो भूख ही मर चुकी है. पांवों में एक भी कदम चलने की ताकत नहीं है. तुम जाओ, मैं यहीं इंतजार करती हूं.’
‘मुझे भी भूख कहां है, हम उस लड़की का दुःख बांट तो नहीं सकते, पर उसके लिए एक वक्त उपवास तो रख सकते हैं.’ कुतिया की मनःस्थिति को समझते हुए कुत्ते ने कहा. उसके बाद दोनों उपवास काटने के लिए एकांत की तलाश में जुट गए.
ओमप्रकाश कश्यप

6 comments on “जमींदार की बेटी

  1. पते की बात कही है आपने।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  2. बहुत ही श्रेष्‍ठ कथा। कन्‍या भ्रूण हत्‍या और कन्‍याओं की स्थिति पर कितनी ही कहानियां लिखी गयी हैं लेकिन आपने जिस सुंदरता के साथ अपनी बात कही है, वह काबिले तारीफ है। बधाई।

  3. ऐसी बोधकथाएँ हमारे अंतर्मन को संस्कारित करती हैं। पुरानी विधा के द्वारा नव संस्कार के आप के प्रयत्न सफल हों।

  4. Very Nice Story . I like to thanks to wriitter
    The story says to us keep watch daughter safe .

  5. bhai ji aapne aaj ke sabse jvlant mudde par baat kahi hai aap vastav me parsnsha ke patr hai likhate raho me aapke shath hu

  6. […] जमींदार की बेटी July 2009 5 comments 3 […]

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