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ईश्वर की हत्या

ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’ नीत्शे का कहा

जैसे ही कुत्ते ने सुना, उसके कान खड़े हो गए. वह घबरा गया.

जो ईश्वर बिना हथियार कहीं आताजाता नहीं, भूत, भविष्य,

वर्तमान की खबर रखता है, उसकी हत्या भला कौन कर सकता

है. और अगर हत्या हुई है तो ईश्वर के भरोसेमंद आदमी ने ही

की होगी. हो सकता है, पुजारी को कुछ मालूम हो. वह दौड़कर

मंदिर पहुंचा. भक्तगण घर जा चुके थे. पुजारी दिनभर का चढ़ावा

समेटकर घर जाने की तैयारी में था. कुत्ते ने नीत्शे का लिखा

उसको दिखाया और पूछा—

सुना तुमने, ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’

यह सुनते ही पुजारी के चेहरे का रंग उतर गया—‘मुझे नहीं

मालूम, मैंने कुछ नहीं किया…’

कैसे नहीं मालूम, मंदिर में तुम्हीं तो रहते हो.’

मुझे सचमुच कुछ नहीं पता.’ पुजारी गिड़गिड़ाया.

फिर वही बात, रोज ईश्वर को भोग लगाते हो, उसे आरती सुनाते

हो, सुबहशाम दावा करते हो कि ईश्वर मंदिर में पधार चुका

हैसचसच बताओ, तुमने ईश्वर को आखिरी बार इस मंदिर में

कब देखा था?’

सच कहूंमेरा ईश्वर तो इस मूर्ति से आगे कभी बढ़ा ही नहीं.

इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता.’ पुजारी रोने लगा. अंतत:

कुत्ता उसे छोड़कर आगे बढ़ने को हुआ तो पुजारी ने पीछे से

टोका—

सुनो, ईश्वर मर चुका है, यह बात किसी को बताना मत. लोगों

का भरम जितने दिन बना रहे, उतना ही अच्छा. अब इस उम्र में

मैं कोई दूसरा काम भी तो नहीं सीख सकता. और हां, तुम्हारे

हिस्से का चढ़ावा मैं तुम्हें सुबहशाम सौंपता रहूंगा.’ कुत्ता पुजारी

की बात अनसुनी कर आगे बढ़ गया. वहां से वह एक चौपाल पर

पहुंचा, जहां कीर्तन हो रहा था. गांव के बड़ेबड़े लोग वहां मौजूद

थे. उनके पास पहुंचकर वह बोला—

नीत्शे का कहना है कि ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की

है?’

वही नीत्शे जो सुकरात को जोकर बताता है?’

हां वही…!’

वह तो दार्शनिक है, भला झूठ क्यों बोलेगाहमें यह कीर्तन

रुकवा देना चाहिए, क्यों सरपंच जी?’ एक पढ़ेलिखे आदमी ने

कहा.

हां, सबको एक न एक दिन मरना तो है ही…’ बराबर में बैठा

एक वुजुर्ग बोला. इसपर सरपंच भड़क उठा—‘चुप रहो,’ मगर

अगले ही पल उसके क्रोध पर पानी पड़ गया. फिर बराबर में बैठे

अपने चेले चपाटों को समझाते हुए कहने लगा—

देखो, ईश्वर मरा है या जिंदा, इससे मेरे लिए कोई फर्क नहीं

पड़ता. मैं तो इतना जानता हूं कि अगले महीने चुनाव हैं. इतने

सारे वोटरों को जोड़े रखने के लिए ही मैंने यह कीर्तन रखा है. मैं

इसको अचानक नहीं रुकवा सकता.’

पर क्या यह उचित होगा?’

कैसे उचित नहीं होगाईश्वर को देखा किसने है! समझ लो, जब

वह जीवित था, हमारे लिए तब भी एक लाश ही था…’ सरपंच ने

निस्पृह भाव से कहा और कीर्तन की धुन पर गर्दन हिलाने लगा.

एक लाश की पूजा…ऊंह!’ कुत्ता के मुंह से अनायास निकला.

अगले ही पल उसने टांग उठाई, हल्का हुआ और आगे बढ़ गया.


ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “ईश्वर की हत्या

  1. लाश पड़ी पड़ी सड़ रही है, हर ओर सडांध और बदबू फैली हुई है. इस लाश को कोई जलाता या दफनाता क्यों नहीं? ‘एक लाश की पूजा…ऊंह!’

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