Tag Archive | omprakash kashyap

तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमन–चैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’ ‘आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगा–फसाद, चोरी चकारी, लूट–मार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना […]

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छोटा मंदिर : बड़ा मंदिर

एकांत देख बड़े मंदिर का ईश्वर अपने स्थान से उठा. बैठे–बैठे शरीर अकड़ा, पेट अफरा हुआ था. डकार लेते–लेते नजर सामने खड़ी कृषकाय आकृति पर नजर पड़ी. बड़े मंदिर का ईश्वर कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ी—— ‘हम दोनों एक हैं.’ ‘होंगे, मुझे क्या!’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने तपाक से कहा. ‘बस्ती […]

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वयं ब्रह्माव

तानाशाह हंटर फटकारता है. लोग सहमकर जमीन पर बिछ जाते हैं. कुछ पल बाद उनमें से एक सोचता है—‘तानाशाही की उम्र थोड़ी है. जनता शाश्वत है.’ उसके मन का डर फीका पड़ने लगता है. ‘अहं ब्रह्मास्मिः!’ कहते हुए वह उठ जाता है. उसकी देखा–देखी कुछ और लोग खड़े हो जाते हैं. सहसा एक नाद आसमान […]

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वेन की कथा

‘वेन उदार है….’ ‘वेन वीर है….’ ‘वेन निष्पक्ष, न्यायकर्ता है….’ ‘वेन का जन में विश्वास है….’ ‘अब से वेन ही हमारे सम्राट होंगे….’ ‘सम्राट अमर रहें….’ जयघोष के साथ दर्जनों मुट्ठियां हवा में लहराने लगीं. लोग खुशी से चिल्ला उठे. वेन को सम्राट चुन लिया गया. ऋषिकुल देखते रह गए. अभी तक उन्होंने राजतंत्रों को […]

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औरत

बहू को ससुराल आए सात वर्ष हो चुके थे, परंतु सास-बहू दोनों में किसी को किसी से शिकायत न थी. बहू की कोशिश रहती कि ससुराल और मैके में कोई फर्क न समझे. रिश्तों की मर्यादा बनाए रखे. ऐसा करते-करते वह एकदम बेटी बन जाती. सास ऐसी कि मां और सास का अंतर पता न […]

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नियुक्ति

अकादमी के शीर्षस्थ पद के लिए प्रत्याशियों को बुलाया गया. भर्ती के लिए दो प्रकार की परीक्षाएं तय थीं. पहली परीक्षा के लिए प्रत्याशियों को एक हॉल में बिठाया गया. उनके ठीक सामने एक मंदिर था. मंदिर में एक त्रिशूल रखा गया था. त्रिशूल के आगे पत्र-पुष्प, फूलमालाएं, चंदन लेप, धूप-दीप-नैवेद्य रखे थे. बराबर में […]

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विविध की डायरी

बालकहानी विविध के दादू को डायरी लिखने का शौक है. बोर्डिंग में जाने पर विविध को घर की याद आई तो उसने भी कलम उठा ली. ये पन्ने उसी की डायरी के हैं, जो उसने अपने दादू को संबोधित करते हुए लिखे हैं— 17 फरवरी 2015 आज बोर्डिंग का तीसरा दिन है. मैं दो दिनों […]

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मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं

मैडम लोगों से अपील कर रही थीं— भाइयो और बहनो! हमें भ्रष्टाचार को जमने नहीं देना है. जड़ समेत उखाड़ फेंकना है. यह बात भ्रष्टाचार ने सुन ली. वह पत्रकार का रूप धारण कर मैडम के सामने जा धमका— ‘जाने दीजिए मैडम, क्यों नाहक गाल बजा रही हैं, आपके मंत्री खुद भ्रष्टाचार में फंसे हैं. […]

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डॉ. सुरेंद्र विक्रम का बालसाहित्य

किसी भी भाषा अथवा विधा की समृद्धि उसके शोध प्रबंधों की संख्या से आंकी जा सकती है. वे इस बात का प्रमाण होते हैं कि साहित्यकारों तथा बुद्धिजीवियों ने अपनी भाषा को कितना सहेजा, संवारा और समृद्ध किया है. ताकि समकालीनों के अलावा दूसरे भाषा–भाषी, साथ में आने वाली पीढ़ियां भी उससे लाभान्वित हो सकें. […]

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जंगलतंत्र

प्यास बुझाने की चाहत में नदी तट पर पहुंची बकरी वहां मौजूद शेर को देख ठिठक गई. शेर ने गर्दन घुमाई और चेहरे को भरसक सौम्य बनाता हुआ बोला—‘अरे, रुक क्यों गई, आगे आओ. नदी पर जितना मेरा अधिकार है, उतना तुम्हारा भी है.’ शेर की बात को बकरी टाले भी तो कैसे! उसने मौत […]

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