Tag Archive | व्यंग्य

आधुनिक लोककथा/ईश्वर की मौत

ईश्वर की मौत देवनगरी से संदेश वायरल हुआ कि बीती रात ईश्वर दिवंगत हुआ. अगले सात दिनों तक तीनों लोकों में शोककाल लागू रहेगा. इस दौरान न तो इंद्रलोक में अप्सराओं का नृत्य होगा. न कोई हवन, कीर्तन, पूजा–पाठ वगैरह. संदेश की प्रति आधिकारिक रूप से भी तीनों लोकों में पहुंचा दी गई. नारद चाहते […]

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समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’ ‘एक–दो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला. ‘तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’ ‘मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’ ‘फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. […]

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मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं

मैडम लोगों से अपील कर रही थीं— भाइयो और बहनो! हमें भ्रष्टाचार को जमने नहीं देना है. जड़ समेत उखाड़ फेंकना है. यह बात भ्रष्टाचार ने सुन ली. वह पत्रकार का रूप धारण कर मैडम के सामने जा धमका— ‘जाने दीजिए मैडम, क्यों नाहक गाल बजा रही हैं, आपके मंत्री खुद भ्रष्टाचार में फंसे हैं. […]

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ईश्वर भागा

नए वर्ष की पूर्व संध्या पर बच्चे फुलझड़ियां छोड़ रहे थे. तभी ईश्वर उधर से आ निकला. बच्चों को खुश देख वह ठिठक गया, बोला—‘ऐसा क्या है, जो तुम इतने खुश हो?’ ‘कल नए वर्ष का पहला दिन है.’ ‘समय तो अनंत प्रवाह है. इसमें पहला और अंतिम क्या!’ ‘हम इंसान छोटी–छोटी चीजों में इसी […]

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शापग्रस्त

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000013820 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000013803 एक  कमंडलधारी माथे पर मोटा–सा तिलक लगाए कहीं जा रहा था. एक कुत्ता सामने से आकर उसपर भौंकने लगा. ‘मूर्ख! मुझपर भौंकता है. जानता नहीं कि मैं पुजारी हूं. शाप दे दूं तो यहीं भस्म हो जाएगा.’ ‘तुम स्वयं शापग्रस्त हो. फिर मुझे भला क्या शाप दोगे?’ कुत्ते ने हंसकर […]

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जनतंत्र में जूते

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000035524 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000035507 जूते आजकल नई भूमिका में हैं. अभी तक इन्हें फैशन की वस्तु माना जाता था. आजकल विरोध प्रदर्शन का औजार बनने लगे हैं. पहले कलम को लोकतंत्र का पहरुआ माना जाता था. जहां भी कोई चूक देखी, दन से अखबार में लिख मारा. बड़ी–बड़ी तीसमारखां ताकतें भी कलम से कांपती […]

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अतृप्त आत्माओं के चुनावी संकल्प

  चुनावों का मौसम है. जिधर देखो उधर अतृप्त आत्माएं विचर रही हैं. सेवा करने का एक अदद मौका मिले तो मन को तृप्ति हासिल हो. सबके पास अपनी पार्टी और उसकी दी गई कुर्सी है. जिसके पास पार्टी नहीं है, उसने पार्टी बना ली है. इस देश में वोटर मिलना कठिन है, पार्टी बनाना […]

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सहना मां की आदत है

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000038537 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000038520 फत्तु उठ. हाथ–मुंह धो. झोला उठा. काम पर चल. मां से कह चा बनाए. रोटियां सेके, देर न करे. जल्दी–जल्दी हाथ चलाए. कमीज का बटन टूटा है, मां से कह, तुरंत आकर टांके. चप्पल नहीं मिल रही. कह, खोज कर लाए. अरे, रूमाल भी गायब है. मां को बता. वही […]

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सनक, ना चीन्है ठांव-कुठांव-दो

उस समय भी वे सनकाए हुए थे. सनक की खनक के साथ-साथ यात्रा आगे बढ़ रही थी. मंत्री जी नई सनक थी पागलों के बीच भाषण देकर उन्हें अपना बनाने की. देश में पागलों की संख्या कम नहीं. कवि-कलाकार और दूसरे ऐसे ही संस्कृति-कर्मियों, सरकार से लोककल्याण की अपेक्षा रखने वालों तथा इन मुद्दों पर […]

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सनक, ना चीन्है ठांव-कुठांव: एक

कल झंडियां लगाते-लगाते थक गया था फत्तु! चल आज एक कहानी सुन… नेताओं के हजार हाथ…हजार शौक…पर अपने मंत्रीजी का बस एक ही शौक. बात-बात में सनकाने का. जैसे मंत्री जी लाजवाब, वैसे ही उनकी सनकें भी लाजवाब होतीं. एक से बढ़कर एक. सनकाने के हजारों हजार तरीके. नए और अनोखे. मौके-बेमौके वह ऐसे-ऐसे सनकाते…ऐसे-ऐसे […]

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