Tag Archive | किस्सा-कहानी

जागे हुए लोग

न जाने किस डर से ईश्वर की नींद टूट गई. पति को पसीना–पसीना देख ईश्वर पत्नी ने पूछा— ‘क्या हुआ प्रिय!’ ईश्वर की धड़कनें तेज थीं. एकाएक कुछ बोल न पाया. पत्नी ने दुबारा वही प्रश्न किया तो डरा–घबराया बोला— ‘मैंने सपने में देखा, बहुत सारे लोग, भूख, नंगे, नरकंकाल की तरह मेरी ओर दौड़े […]

Advertisement

Rate this:

कलयुग का दर्पीला राजा

कहानी आर्यवृत्त की है. वहां कलयुग के राजा ने आलीशान महल बनवाया. सागर तट पर बनी उस 27 मंजिला इमारत में सैकड़ों कमरे थे. महल में सोने के प्रस्तर थे, चांदी की छड़ें. महंगे आयातित कालीन. झाड़–फानूस, रंगीन लाइटें. आयातित मार्बल से बने स्नानगृह, आसमान की थाह मापने के लिए चार–चार उड़नखटोले. इमारत तैयार होने […]

Rate this:

भिखारी और ईश्वर

एक भिखारी हाथ में रोटी लिए मंदिर के द्वार पर पहुंचा और उसकी सीढ़ियों पर बैठकर खाने लगा. सहसा पीछे आहट हुई. भिखारी ने गर्दन घुमाई, देखा—ईश्वर है. भिखारी रोटी खाने में जुट गया. ‘तुम मेरे नाम पर रोटी मांगकर लाए हो, मुझसे पूछोगे नहीं?’ ईश्वर का स्वर शिकायती था. ‘पूरे दिन पुजारी तुम्हारे नाम […]

Rate this:

नींद

 मुंह अंधेरे चक्की की घरघराहट सुन ईश्वर की नींद उचट गई— ‘ऊंह! दिन–भर घंटों की आवाज और रात को चक्की की घर्र–घर्र, लोग सोने तक ही नहीं देते, लगता है पागल हो जाऊंगा!’ ईश्वर बड़बड़ाया और उठकर आवाज की दिशा में बढ़ गया. एक झोपड़ी के आगे वह रुका. दरवाजा खड़खड़ाने जा रहा था कि […]

Rate this:

निष्कासन

वह दुनिया का शायद इकलौता गांव था. जहां न कोई छोटा था, न बड़ा. सब अपनी मेहनत का खाते. मिल–जुलकर रहते. सुख में साझा करते, दुख में साथ निभाते. वहां जो भी था, सबका था. जो नहीं था, वह किसी के भी पास नहीं था. एक दिन गांव में एक तिलकधारी आया— ‘मैं तुम्हें ईश्वर […]

Rate this:

ईश्वर भागा

नए वर्ष की पूर्व संध्या पर बच्चे फुलझड़ियां छोड़ रहे थे. तभी ईश्वर उधर से आ निकला. बच्चों को खुश देख वह ठिठक गया, बोला—‘ऐसा क्या है, जो तुम इतने खुश हो?’ ‘कल नए वर्ष का पहला दिन है.’ ‘समय तो अनंत प्रवाह है. इसमें पहला और अंतिम क्या!’ ‘हम इंसान छोटी–छोटी चीजों में इसी […]

Rate this:

दंश : इकीसवीं किश्त

दंश : धारावाहिक उपन्यास जीवन को जो खेल समझते हैं, वे खिलवाड़ का शिकार बनकर रह जाते हैं. सवेरे सलीम के जगाने पर आंखें खुलीं. वह देर से मुझे खोज रहा था. उसी ने बताया कि मेरा मालिक प्लेटफार्म पर आ चुका है. मुझे कोसता हुआ वह भट्टी सुलगाने में व्यस्त है. तब आंखें मलते […]

Rate this:

दंश : 15वीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास सत्ता की प्रामाणिकता कोई अमूर्तन स्थिति नहीं है. वह सर्वानुकूल स्थितियों का श्रेष्ठतम चयन है. सबकुछ वक्त के हवाले कर देना. जितना यह सोचना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, असंभव–सा काम है. आदमी के भीतर छिपा हुआ डर, आगत की चिंता और भविष्य की अनिश्चितता के चलते यह संभव भी कहां हो […]

Rate this:

यदा-यदा हि…

‘यदा-यदा हि धर्मस्य….धरा पर जब-जब दुर्जन, दुराचारी बढ़ेंगे, भले लोग छले जाएंगे…मैं अवतार लेकर सज्जनों का उद्धार करने आऊंगा…’ ईश्वर ने गीता में कहा था, लिखा नहीं था. जिसने लिखा, उसने लिखने के बाद कभी उससे जिक्र तक नहीं किया. आरती, प्रसाद, भोग, घंटा-ध्वनि, पूजा-अर्चना, नाम-जप, जय-जयकार और अमरलोक-सुंदरी लक्ष्मी के संगवास में ईश्वर के […]

Rate this:

धूर्त्त लोमड़ी

जंगल से गुजरते कुत्ते का सामना लोमड़ी से हुआ तो वह चकरा गया. कारण था, लोमड़ी का बदला हुआ रूप. माथे पर तिलक, गले में रुद्राक्ष माला, कंधों पर रामनामी दुपट्टा. वह लोमड़ी के स्वभाव को जानता था. बात-बात में झूठ बोलना, कदम-कदम पर धोखा देना उसकी आदत थी. यह काम वह बिना किसी झिझक, […]

Rate this: