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डॉ. सुरेंद्र विक्रम का बालसाहित्य

किसी भी भाषा अथवा विधा की समृद्धि उसके शोध प्रबंधों की संख्या से आंकी जा सकती है. वे इस बात का प्रमाण होते हैं कि साहित्यकारों तथा बुद्धिजीवियों ने अपनी भाषा को कितना सहेजा, संवारा और समृद्ध किया है. ताकि समकालीनों के अलावा दूसरे भाषाभाषी, साथ में आने वाली पीढ़ियां भी उससे लाभान्वित हो सकें. साहित्यकार का परिवेश उसके लेखन में परिलक्षित होता है. अतएव रचनाकार तथा उसकी लेखन प्रवृत्तियों को जानना कहीं न कहीं उसके परिवेश, प्रकारांतर में पूरे समाज को समझना है. इसलिए जब किसी विधा में उसके लेखकों के जीवन और रचनाकर्म पर शोध होने लगें तो मान लेना चाहिए कि वह विधा विकास का एक और चरण पार कर कर चुकी है. हिंदी बालसाहित्य को लेकर ऐसा ही सुखद एहसास बना डॉ. स्वाति शर्मा की शोधकृति ‘हिंदी बालसाहित्य: डॉ. सुरेंद्र विक्रम का योगदान’ को देखकर. जाहिर है—यह पुस्तक डॉ. सुरेंद्र विक्रम के बालसाहित्य संबंधी अवदान का मूल्यांकन करने की कोशिश है. पुस्तक के आरंभ में ही डॉ.. स्वाति ने लिखा है, ‘उस समय शोध को लेकर मेरे मन में अनेक प्रश्न उठे, क्योंकि मुझे डॉ. सुरेंद्र विक्रम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी. हां, उनकी कुछ रचनाएं जरूर मैंने पत्रपत्रिकाओं में पढ़ी थीं.’ उनके अनुसार इस बारे में शोधनिर्देशिका द्वारा बताने पर ही उन्हें पता चला. पुस्तक की भूमिका में समाहित उनकी यह टिप्पणी व्यवहारतः उनकी ईमानदारी मानी जाएगी. पर इसके माध्यम से वे अनजाने हमारे शिक्षा जगत की कड़वी हकीकत से परचा देती हैं. युवा पीढ़ी को ज्ञानसमृद्ध करने की जिम्मेदारी उठाने वाले हमारे शिक्षकगण प्रायः समकालीन साहित्य और उसकी हलचलों से कटे होते हैं. पाठ्येतर पुस्तकों से उनका जुड़ाव नगण्य होता है. डॉ. स्वाति हिंदी साहित्य से सामान्य पाठक के रूप में भी जुड़ी होतीं तो शोधक्षेत्र तय करने में निर्देशिका पर उनकी निर्भरता न्यूनतम होती. तब वे वही क्षेत्र चुनतीं जिससे सुधी पाठक, शोधार्थी के रूप में भलीभांति बावस्ता होतीं. पर इसमें दोष न तो स्वाति का है न ही डॉ. विक्रम का. दोष वस्तुतः उस तंत्र का है, जो ज्ञान के सारे आयोजनों को एक अदद नौकरी और कमाई का माध्यम बना देता है. यह उल्लेख इसलिए प्रासंगिक है कि सुरेंद्र जी उन विरले बालसाहित्यकारों में है, जो शिक्षा और साहित्य दोनों मोर्चों पर अपनी सक्रियता बनाए रखते हैं. जो लोग बालसाहित्य से जुड़े हैं या इस क्षेत्र की हलचलों पर जराभी नजर रखते हैं, उनके लिए वे अपरिचित नहीं हो सकते. समीक्षात्मक एवं रचनात्मक दोनों ही क्षेत्रों में उनकी सक्रियता चर्चाओं को आमंत्रित करती है. बालसाहित्य पर महत्त्वपूर्ण गोष्ठीविमर्श उनके बिना पूरा हो, यह असंभव है. उनकी विलक्षण रचनात्मक ऊर्जा के कारण ही ‘बालभवन’ की एक गोष्ठी में डॉ. प्रकाश मनु ने उन्हें बालसाहित्य के विकास हेतु सर्वाधिक सक्रिय, समर्पित, हर मोर्चे पर जुझारू ‘हरावल दस्ते का मुखिया’ कहकर संबोधित किया था. सुरेंद्रजी जिस प्रकार बालसाहित्य कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाते हैं, उसको देखते हुए यह विशेषण एकदम सटीक है. इसलिए बालसाहित्य के किसी पाठक अथवा इस क्षेत्र में शोध की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति का उन्हें न जानना बहुत अजीब लगता है. इसके बावजूद इस पुस्तक की अपनी महत्ता है. सुरेंद्रजी के पाठकों, प्रशंसकों, समानधर्मा लेखकों के लिए तो यह उपयोगी ग्रंथ है.

 

पुस्तक में डॉ. विक्रम के जीवन और साहित्यिक अवदान के विभिन्न पक्षों पर चर्चा है. सुविधा की दृष्टि से पुस्तक की सामग्री को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है. पहले वर्ग में बालसाहित्य की अवधारणा, उसकी संक्षिप्त विकासयात्र तथा लेखक का संक्षिप्त जीवन परिचय दिया गया है. दूसरे में डॉ. विक्रम के बालसाहित्य की विभिन्न धाराओं में रचनात्मक लेखन का मूल्यांकन. पुस्तक के तीसरे हिस्से में उनके समीक्षात्मक लेखन के वर्गीकरण, विश्लेषण, मूल्यांकन, साक्षात्कार आदि को लिया जा सकता है. डॉ. विक्रम का योगदान बालसाहित्य के रचनापक्ष और आलोचना के क्षेत्र में लगभग बराबर है, मगर उनकी भरपूर प्रतिष्ठा आलोचना के क्षेत्र में है. लेखिका ने उनके रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन के बीच सामंजस्य बनाए रखने का सफल प्रयास किया है. गद्य एवं पद्य दोनों के बीच भी पुस्तक में संतुलन रखा गया है. समीक्षात्मक लेखन पर टिप्पणी करते समय उनके बालसाहित्य विषयक शोधपूर्ण कार्यों को महत्ता दी गई है, जो आवश्यक ही था. इनके लिए लेखिका प्रशंसा की पात्र हैं.

 

शोध प्रबंध को देखते हुए डॉ. विक्रम का जो व्यक्तित्व उभरता है, वह दिखाता है कि वे विद्यार्थी जीवन से ही बंधीबंधाई लीक को तोड़ते रहे हैं. पढ़नेलिखने में तेज थे. विद्यालय में सदा अव्वल आने वाले. हमारी शिक्षाव्यवस्था में विद्यार्थियों का वर्गीकरण हाईस्कूल से होने लगता है. पढ़ाई की दिशा निर्धारित करने के लिए बच्चे की रुचि नहीं, नंबर देखे जाते हैं. जो मेधावी होते हैं, वे विज्ञान के क्षेत्र में जाते हैं. सामान्य और पढ़ाई में कमजोर माने गए विद्यार्थियों को कला संकाय से समझौता करना पड़ता है. यह अघोषितसा नियम है. अपवाद जैसे हर जगह होते हैं, यहां भी हैं. सुरेंद्र जी के परिवार वाले चाहते थे कि बेटा इंजीनियर या वैज्ञानिक बने, परंतु उन्हें तो मित्र के साथ स्पर्धा के कारण, कविता लिखने का शौक चर्राया हुआ था. इसलिए इंटरमीडिएट प्रथम श्रेणी में पास करने के बावजूद जब सारे रास्ते खुले थे, सबको हैरानी में डालते हुए उन्होंने अपने लिए कला संकाय को चुना. अपवाद का साथ केवल यहीं तक न था. स्नातक के पश्चात चुनौती फिर मुंह बाये खड़ी थी. प्रथम श्रेणी लाकर उन्होंने अपने परिजनों को एक बार फिर अच्छे सपने देखने का अवसर दे दिया था. उनके मातापिता और भाई चाहते थे कि वे अपनी मेधा का सदुपयोग करते हुए ‘संघ लोकसेवा आयोग’ की उच्चतम परीक्षा पास कर, आईएएस अधिकारी बनें. प्रथम श्रेणी के प्रखर मेधावी विद्यार्थी की पहली पसंद प्रशासनिक सेवा या ऊंची सरकारी नौकरी होनी चाहिए थी. जिस प्रकार वे सुनियोजित तैयारी के साथ परीक्षा में जुटते आए थे, उसको देखते हुए प्रशासनिक सेवा में चुने जाने की संभावना कम न थी. भाई के आग्रह पर उन्होंने ‘भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व’ जैसा विषय लिया भी. परंतु इतिहास की कंदराओं में उनका मन अधिक दिन रमा नहीं. हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने अपवाद की डगर पर चलना पसंद किया और अपने लिए शिक्षा का क्षेत्र चुना. परास्नातक होते ही कविता के क्षेत्र में शोध करने जुट गए. ‘साहित्य में लघुमानव की प्रतिष्ठा और नैतिक संक्रमण’ जैसे विषय को चुना. शोध पूरा होते ही नाम के आगे ‘डॉक्टर’ जोड़ने के अधिकारी मान लिए गए. होना चाहिए था कि वे रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उसी में अपनी जगह तलाशते. सामान्य से अलग शोध क्षेत्र होने के कारण पर्याप्त संभावनाएं भी थीं. फिर पूर्ण विधा का दर्जा प्राप्त कविता का क्षेत्र….बालसाहित्य को तो अधिकांश बुद्धिजीवी, साहित्यकार विधा मानना तो दूर, गंभीर लेखन मानने तक को तैयार नहीं. अगर यही हो जाता तो बहुत बुरा होता. उन दिनों कानपुर में बालसाहित्य संबंधी हलचलें देशभर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती थीं. उनके प्रभाव में वे स्वयं को बालसाहित्य के अनुशासन में ढाल चुके थे. इसलिए शोधकार्य को केवल नौकरी तक सीमित रखा और जुट गए बालपत्रकारिता के इतिहास का पता लगाने. महीनों के परिश्रम का परिणाम आया ‘हिंदी बालपत्रकारिता: उद्भव एवं विकास’ के रूप में. इस शोधकर्म ने उन्हें हिंदी बालसाहित्य के क्षेत्र में स्थापित करने का काम किया. उन्हें भी लगा कि वे अपने जीवन की निर्धारित कर चुके हैं. रुचि के क्षेत्रों को महत्त्व देने, धारा के विपरीत बहने का साहस सुरेंद्र विक्रम में विद्यार्थी काल से रहा है. संक्षिप्त जीवनपरिचय के रूप में इस पुस्तक में भी उसे देखा जा सकता है.

 

पुस्तक से डॉ. विक्रम की बालकविताओं और बालकहानी के क्षेत्र में दक्षता का भी पता चलता है. उनकी बालकविताओ की विशेषता है—बिंबात्मकता. बालक कहानी सुनना पसंद करते हैं. कहानी यदि काव्यात्मक है तो और भी अच्छा. ऊपर से नाटकीय तत्व हों तो सोने पर सुहागा. ऐसी रचना बालपाठक की उमंगों को कई गुना बढ़ा देती है. डॉ. विक्रम वे कविता के बीच में कहानी को बड़ी कुशलता से ले आते हैं. कथातत्व एवं नादसौंदर्य का अद्भुत समन्वय करते हुए वे कविता को वहां ले जाते हैं, जहां वह बच्चों के खेल का हिस्सा बन जाती है. पुस्तक में डॉ. विक्रम के बालकाव्य की विशेषताओं का विस्तार सहित उल्लेख है. कुछ कविताएं तो इतनी अनूठी हैं कि पता ही नहीं चलता कि बच्चे खेल रहे हैं या कविता पढ़ रहे हैं—

 

अब्बक डूबा, डब्बक डूबा, नदी नहाया हाथी

दो गज लंबी सूंड चलाकर पानी लाया हाथी

गर्मी बढ़ी नहाया पोखर, तब सुस्ताया हाथी

अंपकडंपक कान हिलाकर हवा चलाया हाथी.(पृष्ठ 79)

 

डॉ. विक्रम ने किशोरोपयोगी कविताएं भी खूब लिखी हैं. जिनमें किशोरमन के उद्वेलन, आवेग तथा उनकी समस्याएं भी हैं. इन कविताओं के माध्यम से वे बालक के मनोविज्ञान को परखते हैं. उनके मन में झांकते हुए अनायास उनके संवादी बन जाते हैं. उनकी कविता स्वाभाविक और सहज है. बालमन के आवेग, जिज्ञासा, चिंताएं और समुद्वेलन उनकी कविता में सहज ही उतर आते हैं. कहानियों का विश्लेषण भी पुस्तक में है. स्वाति शर्मा के इस कथन में दम है कि डॉ. विक्रम की कहानियां लोकतत्व और आधुनिकता का सम्मिश्रण है. लोकोक्तियों, मुहावरों तथा लोकबिंबों के माध्यम से वे पाठक को सामाजिक अनुभव एवं बोध के करीब ले आते हैं. कुछ इस तरह कि संस्कृति को जाननेसमझने के साथसाथ बालक आधुनिकता से भी आबद्ध रहे. लेखिका का श्रम इसमें साफ झलकता है. पुस्तक के तीसरे हिस्से में समीक्षाएं एवं बालसाहित्य संबंधी शोध को स्थान मिला है. यही वह क्षेत्र है जिससे डॉ. विक्रम की वास्तविक पहचान जुड़ी है. ‘हिंदी बालपत्रकारिता का इतिहास’ के क्षेत्र में तो उनका योगदान अन्यतम है. लगभग सौ वर्ष के बालपत्रकारिता के इतिहास को खोजकर उन्होंने संहिताबद्ध किया है. डॉ. विक्रम आधुनिकता और लोकतत्व की युति से पाठक को बांध लेते हैं. उन्होंने अपेक्षाकृत कम बालकथाएं लिखी हंै, परंतु जितनी हंै, उससे उनकी रचनात्मक क्षमता का अनुमान लगाया जा सकता है. लेखिका ने उनके श्रमकौशल को अभिव्यक्त करने का पूरा प्रयास इस पुस्तक में किया है.

 

स्वाति शर्मा, डॉ. विक्रम की रचनाओं का रस, अलंकार तथा अन्य शैलीगत प्रवृत्तियों के आधार पर वर्गीकरण करती हैं. उनकी विवेचना लुभाती है. इससे पुस्तक को शास्त्राीय गरिमा प्राप्त होती है. उदाहरण के लिए यह कवितांश देखिए—

नभ में जिसकी गूंजे गाथा, होता जिससे ऊंचा माथा

रामकृष्ण की ऐसी धरती, निश्चल प्रेम सभी से करती

इसकी माटी उगले सोना, जिससे दमके कोनाकोना

इसपर हम बलिहारी जाते, श्रद्धा से हैं शीश झुकाते.(पृष्ठ 140)

 

लेखिका द्वारा इसे वीररस की कविता घोषित किया गया है. मुझे इसमें संदेह है. एक अन्य असंगति ‘वैज्ञानिक शब्दावली’ शीर्षक अनुच्छेद में है. वहां लेखिका ‘कंप्यूटर’, ‘एक्सरे’, ‘रोबोट’ के नामोल्लेख को वैज्ञानिक बता जाती हैं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी सूटबूट धारी व्यक्ति को देखते ही आधुनिक मान लेना, विचारों से वह चाहे जितना दकियानूसी हो. इन उपकरणों के शोध एवं निर्माण के पीछे विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का योगदान है. कंप्यूटर का चलना और कंप्यूटर कैसे काम करता है? यह जानना दोनों भिन्न बाते हैं. एक केवल व्यावहारिक ज्ञान है. दूसरा वैज्ञानिक बोध से जुड़ा है. मेरी निगाह में वैज्ञानिक शब्दावली वह हो सकती है जो क्या, क्यों और कैसे के समाधान की ओर ले जाती हो. साधारण उपभोक्ता के लिए ‘कंप्यूटर’, ‘रोबोट’ आदि केवल मशीन हैं. इसलिए किसी रचना के साथ ‘वैज्ञानिक’ विशेषण तब जोड़ा जाना चाहिए जब उसमें किसी वैज्ञानिक तथ्य, प्रणाली आदि का समावेश हो.

 

पुस्तक के आरंभ में डॉ. स्वाति की टिप्पणी, डॉ. सुरेंद्र विक्रम को मैंने किसी विशेष वादविवाद के दायरे में न रखकर हिंदी बालसाहित्य की विकासमान परंपरा के एक अंग के रूप में ग्रहण किया है, वैसे भी उनकी उपलब्धियां किसी वादविवाद से परे भी हैं’—हमको उसी शाश्वतसी बहस कि ‘कला कला के लिए’ या ‘कला जीवन के लिए’ की ओर ले जाती है. इस बहस को लेकर गत पांचछह शताब्दी में हजारों पृष्ठ रंगे जा चुके हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद समर्थक बुद्धिजीवियों ने ‘विचारधारा का अंत’ जैसे जुमले उछालने शुरू कर दिए थे. सोवियत संघ के पतन के बाद इन प्रवृत्तियों को और हवा मिली. ‘कला जीवन के लिए’ जैसी सरोकार युक्त अभिव्यक्तियां हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बहुत परेशान करती हैं. हालांकि मौलिक ज्ञान के क्षेत्र में गत 1000 वर्षों के दौरान व्याप्त सन्नाटे पर वे प्रायः मौन साधे रहते हैं. इसलिए यहां विवाद पर पानी फेरना तो चलेगा, परंतु ‘वाद’ से किनारा करना किसी भी बौद्धिक आयोजन को निस्तेज कर देने जैसी हरकत है. इसके अभाव में किसी साहित्यिक कृति का कोई मूल्य ही नहीं रह जाता. तब वह निरा प्रचार साहित्य होगा. दुःख की बात यह है कि अधिकांश शोध इसी दृष्टि के तहत किए जाते हैं. इसलिए वे किसी नई बहस को आमंत्रित नहीं कर पाते. शायद इसी कारण हमारे विश्वविद्यालय ज्ञान के अनुर्वर प्रदेश माने जाते हैं. इस शोध प्रबंध से विमर्श की कुछ नई धाराएं फूटें, तभी इसकी सार्थकता है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

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जंगलतंत्र

प्यास बुझाने की चाहत में नदी तट पर पहुंची बकरी वहां मौजूद शेर को देख ठिठक गई. शेर ने गर्दन घुमाई और चेहरे को भरसक सौम्य बनाता हुआ बोला‘अरे, रुक क्यों गई, आगे आओ. नदी पर जितना मेरा अधिकार है, उतना तुम्हारा भी है.’

शेर की बात को बकरी टाले भी तो कैसे! उसने मौत के आगे समर्पण कर दिया. जब मरना ही है तो प्यासी क्यों मरे. यही सोच वह पानी पीने लगी. पेट भर गया. शेर ने बकरी को छुआ तक नहीं. बकरी चलने लगी तो शेर ने टोक दिया‘तुम कभी भी, कहीं भी बिना किसी डर के, बेरोकटोक आ जा सकती हो. जंगल के लोकतंत्र में सब बराबर हैं.’ बकरी डरी हुई थी. शेर ने जाने को कहा तो फौरन भाग छूटी. देर तक भागती रही. काफी दूर जाकर रुकी

मैं तो नाहक की घबरा गई थी. शेर होकर भी कितने अदब से बोल रहा था. यह सब लोकतंत्र का कमाल है. पर लोकतंत्र है क्या….? क्या वह शेर से भी खतरनाक है? बकरी सोचने लगी. पर कुछ समझ न सकी.

तभी उसे दूसरी ओर से बकरियों का रेला आता हुआ दिखाई दिया. आगे एक सियार था. कंधे पर रामनामी दुपट्टा डाले. तिलक लगाए. वह गाता हुआ बढ़ रहा था. पीछे झूमती हुई बकरियां जा रही थीं.

हम जिन भेड़िया महाराज के दर्शन करने जा रहे हैं. वे पहले बहुत हिंस्र हुआ करते थे. बकरियों पर देखते ही टूट पड़ते. जब से परमात्मा की कृपा हुई है, तब से अपना सबकुछ भक्ति को समर्पित कर दिया है.’ सियार ने बकरी को समझाया.

बकरी शेर का बदला हुआ रूप देख चुकी थी. उसने भेड़िया के पीछे मंत्रामुग्धसी चल रहीं बकरियों पर नजर डाली.

आज शेर कितना विनम्र था. संभव है भेड़िया का भी मन बदल गया हो. वह पीछेपीछे चलने लगी. एक स्थान पर जाकर भेड़िया रुका. बकरियों को संबोधित कर बोला

यह काया मिट्टी की है. इसका मोह छोड़ दो. संसार प्रपंचों से भरा हुआ है. देह मुक्ति में ही आत्मा की मुक्ति है.’

उसी समय दायीं ओर से शेरों की टोली ने प्रवेश किया. बकरियां उन्हें देखकर डरीं, परंतु गीदड़ का प्रवचन चलता रहा

डरो मत! यह मौत जीवन का अंत नहीं है. इसके बाद भी जीवन है. बड़े सुख के लिए इस देह की कुर्बानी देनी पड़े तो पीछे मत रहो.’ इस बीच बायीं ओर भेड़ियाओं का समूह दिखाई पड़ा तो सियार ने प्रवचन समाप्त होने की घोषणा कर दी. बकरियां उसके सम्मोहन से बाहर निकलने का प्रयास कर ही रही थीं कि दायेंबायें दोनों ओर से उनपर हमला हुआ. शेर और भेड़िया एक साथ उनपर टूट पड़े. एक भी बकरी बच न सकी. थोड़ी देर बाद जंगल का राजा शेर झूमता हुआ वहां पहुंचा.

जन्मदिन मुबारक हो जंगल सम्राट.’ भेड़िया और शेर सभी ने एक स्वर में कहा. सियार एक कोने में खड़ा था.

महाराज, पहले हम जब भी हमला करते थे तो बकरियां विरोध करती थीं. आज सियार ने न जाने क्या जादू किया कि विरोध की भावना ही नदारद थी. इस शानदार दावत के लिए इसको ईनाम मिलना चाहिए.’ शेर और भेड़िया ने जुगलबंदी की.

हमने सोच लिया है, आज से ये जंगल के मंत्री होंगे.’ जंगल के सम्राट ने गर्वीले अंदाज में कहा. इसी के साथ पूरा जंगल ‘जन्मदिन’ और ‘मंत्रीपद’ की मुबारकबाद के नारों से गूंजने लगा.

सियार अगले ही दिन से दूसरे जानवरों को फुसलाने में जुट गया. मंत्री पद बचाए रखने के लिए यह जरूरी भी था.

ओमप्रकाश कश्यप

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जागे हुए लोग

न जाने किस डर से ईश्वर की नींद टूट गई. पति को पसीनापसीना देख ईश्वर पत्नी ने पूछा

क्या हुआ प्रिय!’ ईश्वर की धड़कनें तेज थीं. एकाएक कुछ बोल न पाया. पत्नी ने दुबारा वही प्रश्न किया तो डराघबराया बोला

मैंने सपने में देखा, बहुत सारे लोग, भूख, नंगे, नरकंकाल की तरह मेरी ओर दौड़े चले आ रहे हैं….!’

ऐसे लोगों से आप भला क्यों डरने लगे?’

सब के सब गुस्से में थे. अपनी दुर्दशा के लिए मुझे कोसते हुए. कोई मुझे तानाशाह कह रहा था, कोई परजीवी और कोई….’

और क्या कह रहे थे?’ पति की घबराहट ने ईश्वरपत्नी को भी डरा दिया.

कह रहे थे….ईश्वर को मंदिर में रहना है, रहे. हम आजाद हैं. आज के बाद वही करेंगे, जो हमें सही लगेगा. किसी के बहकावे में नहीं आएंगे.’

पुजारी से कहो, समझाए. तुम्हारे नाम का चढ़ावा वही तो खाता है.’

उसने भी हाथ खड़े कर दिए. कह रहा था मैं उसी को भरमा सकता हूं जो सोया हुआ हो. जागे हुए इंसान को भरमाना मेरे बस की बात नहीं है.’

उसने ऐसा कहा?’

हां, जागे हुए लोग भाग्य के भरोसे रहना छोड़ देते हैं.’

अब हमारा क्या होगा?’

लोग जाग रहे हैं. हमें भी जाग जाना चाहिए.’

मैं समझी नहीं?’

मैं तो लोगों के भ्रम से जन्मा हूं. यदि भ्रम ही नहीं रहा तो हम कहां?’

फिर!’

फिर क्या? भ्रम की मौत तो एक न एक दिन निश्चित है.’ कहकर ईश्वर ने गहरी चुप्पी साध ली.

ओमप्रकाश कश्यप

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कलयुग का दर्पीला राजा

कहानी आर्यवृत्त की है. वहां कलयुग के राजा ने आलीशान महल बनवाया. सागर तट पर बनी उस 27 मंजिला इमारत में सैकड़ों कमरे थे. महल में सोने के प्रस्तर थे, चांदी की छड़ें. महंगे आयातित कालीन. झाड़फानूस, रंगीन लाइटें. आयातित मार्बल से बने स्नानगृह, आसमान की थाह मापने के लिए चारचार उड़नखटोले.

इमारत तैयार होने पर लिफ्ट में सवार होकर कलयुग का राजा महल की सबसे ऊंची छत पर मुआयना करने पहुंचा. गर्व से उसका सीना चैड़ा हो गया. अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, आसमान की ओर मुंह कर बोला

देखा पिता जी, अब यह आसमान मेरी मुट्ठी में है.’ ऊपर से कोई आवाज न आई. परंतु कलयुग के राजा का दर्प न घटा. उसने नीचे झांका. सड़क पर गाड़ियां, मनुष्य कीड़ेमकोड़ों की तरह नजर रेंगते हुए आए. उसका सीना और भी चौड़ा हो गया.

ये सब मेरे लिए ही उठतेबैठते और खातेकमाते हैं. मैं इस देश और इन सबका भाग्यविधाता हूं.’

सहसा उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. लगा कि आसपास हजारों आदमी भूख से कराह रहे हैं. पूरी इमारत उनके रुदन से थर्रा रही है. चांदी की छड़ें जो उसने बड़े मान से लगवाई थीं, वे स्लम बस्तियों से आने वाली करुणाद्र हवा से बेआब हो चुकी है. वह घबराकर लिफ्ट की ओर दौड़ा. लेकिन वहां भी आलमे बेनूरी थी. डर से उसने अपनी आंखें बंद कर लीं. अचानक उसके कानों में लोगों की सिसकियां गूंजने लगीं. उसको लगा मानो भूख से पीड़ित लाखों लोग उस इमारत के नीचे दबे पड़े हैं. उसकी कराह से इमारत की नींव डगमगा रही है.

राजा के साथ चल रहे सेवकों ने उसको जैसेतैसे नीचे उतारा. पर कलयुग के राजा की तबीयत न सुधरी. अगले दिन एक नजूमी ने राजा की तबीयत और इमारत दोनों का मुआयना किया.

महाराज, इमारत मनहूस है.’

हमने तो सारे वास्तुदोष भूमि पूजन से पहले ही दूर करा लिए थे.’

इमारत में पूरब की ओर कम खिड़कियां हैं. उधर की हवा का न आना ही सारे दोष की जड़ है.’

ऐसा क्या है उस हवा में?’

महाराज आप बहुत व्यस्त रहते हैं. यदि अवसर तो शांत मन से उस हवा को सुनने की कोशिश करना. उसमें से मधुर संगीत उभरता सुनाई देगा. फिर बीच से एक आवाज….फिर उस सुरीली आवाज में एक मंत्र….मनुष्यता का मंत्र!

मनुष्यता का मंत्र?’

हां, मनुष्यता का मंत्र यानी जियो और जीने दो.’

यह कहां बिकता है?’ कलयुग के राजा के खरीदनेबेचने के अभ्यस्त दरबारी ने पूछा.

नजूमी हंसता हुआ वहां से चल दिया.

पागल है.’ नजूमी के जाते ही कलयुग के राजा के दरबारियों ने उसे समझाने की कोशिश की. राजा को दरबारियों की बात अच्छी लगी. लेकिन उस इमारत की ओर झांकने की उसकी हिम्मत फिर कभी न पड़ी. आज भी वह इमारत वीरान पड़ी है. जब भी उसका ख्याल कलयुग के राजा के मन में आता है, कानों में हजारों भूखेनंगे, बेसहारा, फुटपाथी लोगों की चीखें गूंजने लगती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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अफीम

कुछ आदमियों की देखादेखी सियार ने भी भगवान’ बनने की सोची. उसने बकरियों को इकटठा किया और प्रवचन करने लगा. कुछ ही देर में दर्जनों बकरियां वहां जमा हो गईं. सियार जो सुनकर गया था उसी को दोहराने लगा

यह काया मिट्टी की है. इसका मोह कभी मत करना. इससे किसी का उपकार हो तो भी पीछे मत रहना. संसार प्रपंचों से भरा हुआ है. माया से मुक्ति में ही आत्मा की मुक्ति है. तभी सच्चा सुख संभव है.’

यह उपदेश भेड़ियों को भी देना चाहिए.’ श्रोता बकरियों में से किसी ने कहा. उसकी ओर ध्यान दिए बिना सियार कहता रहा

ऊपर वाला सब देखता है. उसके घर देर है, अंधेर नहीं. देरसबेर सभी को न्याय मिलता है. जो भी कमजोर को सताता है, उसको नर्क की आग में जलना पड़ता है.’

हम कमजोर, किसी को भला क्या सता सकती हैं. दिनभर में दो मुट्ठी घास मिल जाए तो उसी से काम चला लेती हैं. इसके बावजूद हमें कभी शेर तो कभी भेड़िया का शिकार होना पड़ता है.’ आवाज फिर आई.

सियार का तटस्थ प्रवचन चलता रहा

मौत जीवन का अंत नहीं शुरुआत है. इसके बाद जो दुनिया है. वहां न शेर का डर है न भेड़िया का. सच्चे आनंद के लिए देह भी कुर्बान करनी पड़े तो पीछे मत रहो.’

तभी न जाने कहां से आकर भेड़ियों का दल बकरियों पर टूट पड़ा. दर्जनों बकरियां मारी गईं. भेड़ियों से डरे सियार ने भागने की कोशिश की तो एक भेड़िया ने टोक दिया

डरो मत, तुम तो बड़े काम के जीव हो यार….आज से पहले हम जब भी हमला करते थे तो बकरियां थोड़ाबहुत विरोध करती थीं. तुमने उन पर न जाने क्या जादू किया कि किसी ने ‘चूं’ तक नहीं की. बिना मेहनतमशक्कत अच्छी दावत हो गई. आज से तुम्हीं इस जंगल के मंत्री हुए.’

भेड़ियों की सरदारी में मंत्री बना सियार, उसी दिन से ’अफीम’ बांटने लगा. भोजन के नाम पर उसको अब भी जूठन ही मिलती. लेकिन बकरियों के सामने ही सही, भेड़ियों ने उसे भगवान मान लिया है, सियार को इससे संतोष है.

ओमप्रकाश कश्यप

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भिखारी और ईश्वर

एक भिखारी हाथ में रोटी लिए मंदिर के द्वार पर पहुंचा और उसकी सीढ़ियों पर बैठकर खाने लगा. सहसा पीछे आहट हुई. भिखारी ने गर्दन घुमाई, देखाईश्वर है. भिखारी रोटी खाने में जुट गया.

तुम मेरे नाम पर रोटी मांगकर लाए हो, मुझसे पूछोगे नहीं?’ ईश्वर का स्वर शिकायती था.

पूरे दिन पुजारी तुम्हारे नाम पर कमाई करता हैं, उससे कितना लिया, जो मुझसे मांग रहे हो?’ रोटी खाना छोड़ भिखारी ने पूछा.

पुजारी बेईमान है. मेरे नाम पर चारचार मंदिरों का चढ़ावा खाता है. मुझे मूर्ति में चुपचाप छिपे रहने को कहता देता है.’

और तुम डर जाते हो.’ ईश्वर चुप, कुछ बोल न पाया.

जानते हो, उन चार मंदिरों में से एक मेरा खेत और घर छीनकर बनाया गया है. मैंने कानून के जरिये घर वापस लेने की कोशिश की तो पुजारी के भड़कावे पर गांववालों ने मेरे हाथपांव तोड़ मुझे अपाहिज बना दिया. मेरा घर घरखेत सब छीन लिया गया. उस समय मैंने तुम्हारे आगे भी फरियाद की थी, लेकिन तुमने तुमने उसको मेरा कर्मयोग बताकर चुप्पी साध ली थी.’

मैंने तो पुजारी ने जो समझाया, वही कहा था.’ कहकर ईश्वर ने गर्दन झुका ली. भिखारी ने उसके चेहरे पर पसरी दीनता को देखा और बिना कुछ कहे रोटी उसके हाथ में थमा दी.

और तुम?’

भिखारी हूंकिसी भी दरवाजे पर जाकर पेट भर लूंगा. तुम ठहरे ईश्वर. मंदिर से बाहर गए तो भोलेभाले लोगों का विश्वास छलनी हो जाएगा.’ भिखारी ने कटाक्ष किया और ईश्वर को दीनमुद्रा में वहीं छोड़ आगे बढ़ गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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नींद

 मुंह अंधेरे चक्की की घरघराहट सुन ईश्वर की नींद उचट गई

ऊंह! दिनभर घंटों की आवाज और रात को चक्की की घर्रघर्र, लोग सोने तक ही नहीं देते, लगता है पागल हो जाऊंगा!’ ईश्वर बड़बड़ाया और उठकर आवाज की दिशा में बढ़ गया. एक झोपड़ी के आगे वह रुका. दरवाजा खड़खड़ाने जा रहा था कि बांस की टटिया हाथ लगते पीछे खिसक गई. सामने बुढ़िया थी. चक्की चलाती हुई. बराबर में झिंगली खाट पर एक आदमी दुनियाजहान से बेखबर सो रहा था. बुढ़िया के बाल थे सन जितने सफेद. दिखने में वह हड्डियों का तांता नजर आती थी. यह देख ईश्वर ने कहा

माई, इस उम्र में तुम्हें चक्की न पीसनी पड़े, इसलिए वरदान देता हूं कि तुम्हारा कनस्तर आटे से हमेशा भरा रहे.’

मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए.’ बुढ़िया ने बेरुखी दिखाई.

माई! अपने लिए न सही, मेरे लिए ले लो. दिनभर मंदिर के घंटे की आवाज और रात को चक्की की घरघर. नींद पूरी नहीं हो पाती.’ ईश्वर अपने अहं से एक पायदान नीचे उतरा.

परे हट! बड़ा आया वरदान देने वाला. मेरे आदमी को देख, दिनभर लोहे के कारखाने में कानफोड़ू आवाज के बीच काम करता और रात को गहरी नींद सोता है. तू दूसरों के श्रम पर पलता और अपने ही जैसे परजीवियों को संरक्षण देता है. मंदिर की चारदीवारी से निकलकर एक दिन मेरे आदमी के साथ कारखाने में काम करके देख. चक्की की घरघराहट तो क्या, बादलों की गड़गड़ के बीच भी गहरी नींद आएगी.

ईश्वर से कुछ बोलते न बना. वह अपनासा मुंह लेकर लौट गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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निष्कासन

वह दुनिया का शायद इकलौता गांव था. जहां न कोई छोटा था, न बड़ा. सब अपनी मेहनत का खाते. मिलजुलकर रहते. सुख में साझा करते, दुख में साथ निभाते. वहां जो भी था, सबका था. जो नहीं था, वह किसी के भी पास नहीं था. एक दिन गांव में एक तिलकधारी आया—

मैं तुम्हें ईश्वर से मिलवाने आया हूं!’ तिलकधारी ने गांववालों को संबोधित किया.

हम किसी ईश्वर को नहीं जानते. उसको अगर जरूरत होगी तो खुद चलकर आएगा.’

नादान हो तुम सब. ईश्वर की शरण में चलो, उसकी कृपा हुई तो रोजरोज कमरतोड़ मेहनत न करनी पड़ेगी.’

क्या हमारे एवज में तुम और तुम्हारा ईश्वर काम करेगा?’

छिः छिः….ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं कहते.’

तो क्या हममें से किसी को भी काम नहीं करना पड़ेगा?’

यह असंभव है, कुछ को तो काम करना ही पड़ेगा.’

तुम्हारा आशय है कि कुछ को काम से मुक्त करने के लिए बाकी को अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा काम करना पड़ेगा?’

ईश्वर ने सभी के लिए कोई न कोई कर्तव्य निर्धारित किया है.’

हमने भी तुम दोनों के लिए एक काम तय किया है, बोलो करोगे?’

बताओ?’

तुरंत बाहर निकलो और फिर कभी इस गांव की सीमा में प्रवेश मत करना. लौटकर अपने ईश्वर से कहना, हम इस धरती के एहसानमंद हैं, उसके नहीं.’

वह गांव आज तक भाईचारे और खुशहाली की मिसाल बना हुआ है.

ओमप्रकाश कश्यप

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2011 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

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A New York City subway train holds 1,200 people. This blog was viewed about 4,700 times in 2011. If it were a NYC subway train, it would take about 4 trips to carry that many people.

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आराधक


रोटी के लिए दरदर भटकने वाले

बीमारखजेडे़, आवारा कुत्ते से

पूछा मैंनेदेखा है ईश्वर को कभी?

हां, बोला वह बडे़ जोश से

होता है वह अलशेसियनसा

प्यारा, खूबसूरत, सदा जवान

चालाक और फुर्तीला

बुद्धिमान ओर ताकतवर

बेहद वफादार भी

न बहुत मोटा न पतला

न बहुत नाटा न ऊंचा

सीपीसा गोलमटोल

चमकदार आंखों वाला छरहरा

समय से भी तेज रफ्तार वालाश्वानश्रेष्ठ

मेरी तरह दरदर नहीं भटकता वह

रोटी के मामूली टुकड़े की खातिर

नहीं सहता डंडे, दुत्कार

सुबहदोपहरशाम

मिलता है सुस्वादु भोजन उसे

मैंने बिल्ली से भी पूछा

कुत्ते ने जो भी लक्षण बताए

वैसा कोई कुत्ता जो असलियत में ईश्वर है

दिखा है कभी?

सुनकर हंस पड़ी बिल्ली

इतना नादान नहीं है ईश्वर

कि जनम ले तो धारण करे कुत्ते का रूप

दरदर भटकता फिरे रोटी के टुकड़े को

ईश्वर तो है बहुत कुछ बिलौंटे जैसा

गोल बड़ीबड़ी आंखों, भरीभरी देह

तेज दिमागफुर्तीला

जो उल्टा सकता है बड़े से बड़ा मांट

उसको नहीं करना पड़ता शिकार

चूहे स्वयं चले आते हैंमुक्ति की चाहत में

जहां वह रहता हैबहती हैं वहां

दूधदही की नदियां

सपने में कई बार कर चुकी हूं दर्शन

उस महाविभूति के

तस्वीर लिए रहती हूं आंखों में हमेशा

ध्यान करो तुम भी उसका

ताकि कर सको दर्शन

दुनिया के सिरजनहार के

कंचनसी देह जिसकी दिपदिप दमकती है

भेड़बकरीचूहाचमकादड़

उल्लूकौआतीतरबटेर

गधाघोड़ायहां तक कि जमीन पर रेंगने वाला गुबरीला कीड़ा भी

जहांजहां मैं गयामिला ईश्वर के वंशज

और उसके प्रतिरूप से

झूठे हैं वे सभीकहा था पंडित ने

ईश्वर तो है वैसा ही

जैसा बसाया है मैंने मंदिर में

मूरत में

मैं ईश्वर की बजाए

मिलता हूं ईश्वर की संतति से हर रोज

सुनता हूं उनके बड़ेबड़े दावे

और घबराकर

ईश्वर से मिलने का

छोड़ देता हूं इरादा

++++

हर आराधक

स्वार्थ के अनुरूप

रचता है अपना देवता

एक नहीं अनेक

जरूरत पड़ने पर

लगाता है देवताओं की मंडी

फिर उतरता है मंडी में

कभी बनकर खरीदार

कभी दर्शक

कभी बनकर शिकारी

                             ओमप्रकाश कश्यप

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