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अन्नाभाऊ साठे का उपन्यास ‘फकीरा’ : दलितों में वर्ग चेतना का स्वरघोष

लेखन शुरू करने से पहले ही मैं इस हकीकत को भली-भांति समझ चुका था कि जो कलाकार समाज की चिंता करत है, समाज भी उसकी चिंता करता है। मुझे इस देश के सामाजिक अंतर्विरोधों की भी जानकारी थी। मैं प्रतिदिन यही सपना देखता था कि मेरा देश खुशहाल और सभ्य होगा तथा यहां भरपूर समानता होगी। और महाराष्ट्र एक दिन धरती का स्वर्ग बनेगा। इन सपनों को देखते हुए ही मैंने अपना लेखनकर्म किया है। आप जीवन की सचाइयों को महज कल्पना और बुद्धिचातुर्य के भरोसे आप जीवन की हकीकत को नहीं समझ सकते। आपके दिल में उसे समझने की योग्यता होनी चाहिए। लेखक की आंखें जो देखती हैं, जरूरी नहीं है कि वही लेखन में मददगार होगा, इसके विपरीत वह उसे भटका भी सकती है। 

मैं इसमें पूरी तरह विश्वास रखता हूं कि यह धरती शेषनाग के फन पर नहीं टिकी है, अपितु यह दलितों और मजदूरों की हथेलियों पर टिकी है। मैं दलितों के जीवन को ईमानदारी और दृढ़ विश्वास से दर्शाने की कोशिश करता रहा हूं।’

—अन्नाभाऊ साठे, उपन्यास ‘वैजयंता’ की भूमिका से.

यह कहावत जीवन छोटा भले हो, सार्थक होना चाहिए—अन्नाभाऊ साठे पर एकदम खरी उतरती है। 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के वाटेगांव में जन्मे अन्नाभाऊ मात्र 48 वर्ष जिए थे। इतनी छोटी-सी उनकी जिंदगी जितनी संघर्षपूर्ण थी, उतनी रचनात्मक भी थी। मात्र दस वर्ष की अवस्था में वे नाटक-मंडलियों से जुड़ गए। जन्म गांव में हुआ था, परिस्थितियों ने मुंबई ला पटका। वहां सड़क किनारे लगे फिल्मी पोस्टरों और साइन बोर्डों को देखकर पढ़ना-लिखना सीखा। अपनी नाटक मंडली बनाई। मजदूर आंदोलनों से जुड़े। महाराष्ट्र निर्माण आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके साथ-साथ उन्होंने मराठी में 35 उपन्यास, 13 कथा संग्रह, 14 लोकनाट्य, 3 नाटक, एक यात्रा वृतांत, दर्जनों पोबाड़े, लोकगीत और एक यात्रा-वृतांत की रचना की। उनकी कृति ‘माझा रशियाचा प्रवास’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। उन दिनों भारत से ज्यादा वे रूस में प्रसिद्ध थे। उनकी कई कृतियों का रूसी अनुवाद हो चुका था। 1998 तक उनके सात उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी थीं। वे कदाचित अकेले ऐसे दलित साहित्यकार हैं, जिनकी रचनाएं 27 विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। दलित साहित्य सम्मेलन की शुरुआत करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। 1958 में दलित साहित्य सम्मेलन के प्रथम आयोजन में उन्हेंने कहा था—‘पृथ्वी किसी शेषनाग के फन पर नहीं, अपितु दलितों और श्रमजीवी वर्ग के कंधों पर टिकी हुई है।’

‘फकीरा’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसकी रचना 1959 में हुई थी। 1961 में इसे महाराष्ट्र सरकार के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजा गया। प्रकाशन के बाद से अब तक इसके करीब दो दर्जन संस्करण आ चुके हैं। इस उपन्यास में डॉ. आंबेडकर के सामाजिक न्याय और मार्क्स के वर्ग-संघर्ष दोनों को इस तरह पेश किया गया है कि वे परस्पर पूरक दिखाई पड़ते हैं।

फकीरा की कथावस्तु

उपन्यास का कथानक मुख्यत: दो गांवों के बीच फैला हुआ है। शिगांव और वाटेगांव। कहानी शिगांव से शुरू होती है। वहां हर साल ‘जोगिणी’ की जात्रा(यात्रा) निकाली जाती है। उस उत्सव में पूरा गांव शामिल होता है। जोगिणी यानी पीतल का कटोरा, जिसे ग्रामदेवी का प्रतीक माना जाता है। जोगिणी पर कब्जा होने का अर्थ है, ग्रामदेवी का अपने पक्ष में होना। यह पूरे गांव के लिए मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का विषय है। शिगांव वाले खुश हैं। क्योंकि जोगिणी उनके कब्जे में है। वे मग्न-मन ‘जात्रा’ की तैयारी पर हैं। उधर पड़ोस के वाटेगांव का शंकरराव पाटिल चाहता है कि जोगिणी उसके गांव आ जाए। ताकि उसकी और वाटेगांव की प्रतिष्ठा को चार चांद लग जाएं। वह यह सोचकर परेशान है कि गांव में एक भी लड़ाका ऐसा नहीं है,  जो शिगांव वालों से जूझकर जोगिणी को वाटेगांव ला सके। एक दिन वह रानोजी से अपने मन की बात कहता है। जाति से मांग रानोजी कठकाठी से मजबूत, फुर्तीला और दुस्साहसी है। पाटिल की बात उसे लग जाती है। वह जोगिणी को वाटेगाव लाने की ठान लेता है।

जोगिणी को शिगांव से लाना, पूरे गांव के साथ जंग जीतने जैसा है। जोगिणी जिस गांव के अधिकार में हो, वह प्राण प्रण से उसकी रक्षा करता है। जात्रा के दिन तो पूरा गांव हथियारों से लैस और सतर्क होता है। गांव की सीमा में पकड़ गए तो खैर नहीं। गांववाले तुरंत सिर कलम कर देते हैं। यह सोचकर कि जोगिणी लाते हुए मर भी गया तो यश का भागी बनूंगा—रानोजी बगैर किसी को बताए शिगांव के लिए निकल पड़ता है। वहां उसकी भेंट अपने दोस्त भैरू से होती है।  वह भैरू से वाटेगांव जाकर, शंकर पाटिल और विष्णुपंत तक यह संदेश पहुंचाने को कहता कि दोनों गांव की सीमा पर जोगिणी का स्वागत करने को तैयार रहें।

शिगांव में जात्रा अपने चरम पर थी। एक संकरे रास्ते पर मौका देख रानोजी जोगिणी पर झपट पड़ता है। शिगांव के सबसे ताकतवर आदमी को मारकर वह जोगिणी को अपने कब्जे में ले लेता है। फिर रात के अंधेरे का फायदा उठा, घोड़े पर सवार हो वहां से भाग छूटता है। गांव वाले उसका पीछा करते हैं। घोड़ा दौड़ाता हुआ रानोजी शिगांव की हद पार कर, वाटेगांव की सीमा में प्रवेश कर जाता है। नियमानुसार अब उसे कोई खतरा नहीं होना चाहिए। शिगांव वालों को वापस लौट जाना चाहिए। लेकिन नियम की परवाह किए बिना शिगांव वाले, रानोजी का पीछा करते हैं। आखिरकार वे रानोजी तथा उसके विश्वसनीय घोड़े ‘गबरिया’ को मार डालते हैं।

कथानक करवट बदलता है। कहानी घूमकर वाटेगांव के मांगबाड़ा में पहुंच जाती है। गरीबी से बेहाल, जातीय भेदभाव से सताए लोगों की बस्ती। एक-दूसरे से सटकर अपनी-अपनी दरिद्रता की कहानियों को सुनातीं, उनकी जिंदगी जैसी बेहाल उनकी झुग्गियां। छूत के डर से गांव वाले उसमें पांव रखने भी डरते हैं। लेकिन रानोजी के बलिदान के बाद हालात एकदम बदल जाते हैं। रानोजी ने जोगिणी को गांव लाने के लिए जान दी है। पूरे गांव का मान बढ़ाया है, इस कारण पूरे गांव में उसकी चर्चा है। हर किसी का हृदय रानोजी के प्रति सम्मान से भरा है। सब जानते हैं कि शिगांव वालों ने छल से रानोजी हत्या की है। वे रानोजी की मौत का बदला लेने को उतावले हैं। दोनों गांवों के बीच का तनाव खूनखराबे में न बदल जाए, इसलिए उसे रोकने के प्रयास भी हो रहे हैं। आखिरकार शिगांव वालों के माफी मांगने और रानोबा का सिर वापस करने की शर्त पर मामला सुलझ जाता है। जोगिणी वाटेगांव के कब्जे में आ जाती है। रानोजी का पूरे मान-सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।

फकीरा रानोजी का बड़ा बेटा है। अपने पिता से सवाई कठ-काठी। युद्ध कौशल में निपुण। बेहद साहसी, तेज और फुर्तीला। लोगों की मदद के लिए हमेशा आगे रहने वाला। पिता के बाद वह मांगबाड़े का नेता बनता है। दस वर्ष बाद कुछ शिगांव के कुछ युवक जोगिणी को वापस लाने का दुस्साहस करते हैं। फकीरा को उनके इरादों की भनक लग जाती है। वह जोगिणी की रक्षा के लिए मोर्चा जमा लेता है। वह शिगांव के लड़ाके का सफलतापूर्वक मुकाबला करता है। इससे पहले कि वह वाटगांव की सीमा से बाहर जाए, फकीरा उसे दबोच लेता है। चाहता तो वह पकड़े गए युवक का सिर कलम कर देता। यही नियम था। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। दंड स्वरूप केवल कलाई से उस युवक के हाथ काट लेता है।

फकीरा और दलित चेतना

‘फकीरा’ के माध्यम से हम सात-आठ दशक पहले के भारतीय गांवों के ताने-बाने को समझ सकते हैं। ब्रिटिश सरकार जब मांग जाति को अपराधी जातियों की श्रेणी में डाल देती है, तब गांव के सवर्ण विष्णुपंत और शंकर पाटिल उसके विरोध में आवाज उठाते हैं। कथापात्र फकीरा भी नए अध्यादेश के विरुद्ध है। उसका आक्रोश कई तरह से सामने आता है। उपन्यास में कुछ उपकथाएं भी चलती हैं। एक बार ऊंची जाति का चौगुले(ग्राम्य स्तर का सरकारी कर्मचारी) महार महिला की पिटाई कर रहा था। लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, वह नहीं माना। उस समय मांग जाति का बहादुर युवा सत्तु आगे आता है। चौगुले उससे झगड़ पड़ता है। गुस्साया सत्तु उसकी हत्या कर देता है।

इस घटना के बाद पुलिस और ऊंची जाति के लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं। सत्तु को घर छोड़ना पड़ जाता है। उसके बाद वह विद्रोही बन जाता है। वर्ग संघर्ष का योद्धा। वह सामंतों और सूदखोरों के बही-खाते जला देता है। दलितों पर अत्याचार करने वालों को दंडित करता है। सरकार उसके सिर पर ईनाम घोषित कर देती है। एक बार वह पुलिस और ऊंची जाति के हमलावरों के बीच बुरी तरह घिर जाता है। लोग इसकी खबर फकीरा तक पहुंचा देते हैं। फकीरा आनन-फानन में सत्तु की मदद कर, उसे दुश्मनों के चंगुल से सुरक्षित बाहर निकाल देता है।

उपन्यास की कथा-वस्तु जिस दौर की है, उसमें अकाल और महामारियां अकसर धाबा बोलती रहती थीं। उनका सबसे बुरा असर गरीब-विपन्न दलित बस्तियों पर पड़ता था। उस साल अकाल ने दस्तक दी तो मांगबाड़ा के लोग भूख से मरने लगे। फकीरा ने शंकर पाटिल और विष्णुपंत से फरियाद की। उन्होंने सरकार से मदद की गुहार की। लेकिन राहत पहुंचाने के लिए कोई नहीं आया। लोगों को भूख से बचाना फकीरा के लिए बड़ी चुनौती थी। पता चला कि अकाल की विभीषिका में भी धनाढ्यों के अन्न-भंडार भरे पड़े हैं। अपने साथियों को लेकर फकीरा ने उनपर हमला कर दिया। जानलेवा मुठभेड़ के बाद जीत फकीरा और उनके साथियों की हुई। उसने लूटे हुए अनाज भूख से छटपटाते दलित परिवारों में बराबर-बराबर बांट दिया। उसके बाद गांव में पुलिस आई। शंकर पाटिल और विष्णुपंत ने फकीरा का पक्ष लेते हैं। बताते हैं उसके कृत्य से सैकड़ों लोगों की प्राण-रक्षा हुई है। पुलिस को वापस लौट जाती है। कुछ दिनों के बाद दलितों के प्रति सहानुभूति रखने वाले विष्णुपंत और शंकरराव पाटिल को उनके पदों से हटा दिया जाता है।

नए पाटिल के दिल में गरीबों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। इसी बीच पुलिस हाजिरी कानून ले आई। उसके अनुसार हर मांग को पाटिल के घर जाकर, हाजिरी देने का आदेश दिया गया। अकाल के दौर में, जो समय भोजन का इंतजाम पर लगना चाहिए था, वह हाजिरी देने में खपने लगा। इससे वहां रोष पसरने लगा। पाटिल के दरबार में अपराधी की तरह खड़े होना फकीरा के लिए बेहद अपमानजनक था। सरकारी कानून की आड़ में ऊंची जातियां मनमानी कर रही थीं। मांगबाड़ा के हालात दिन-पर-दिन बिगड़ने लगे। एक दिन पाटिल ने फकीरा का भी अपमान कर दिया। यह संदेश देने के लिए कि अन्याय की अति ही विद्रोह को जन्म देती है—फकीरा ने सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। उसने खजांची रघुनाथ ब्राह्मण के पास जाकर खजाने की चाबी सौंपने को कहा। गांव में हल्ला मच गया। ऊंची जाति के लोग खजांची के मददगार बनकर पहुंच गए। पूरी रात चले संघर्ष के बाद जीत फकीरा की हुई। उसने लूटे हुए खजाने को लोगों में बांट दिया। उस लुहार को भी हिस्सा दिया, जिसे उसने खजाने के संदूक को काटने के लिए मजबूर किया था। सरकारी खजाने को लूटना सरकार को चुनौती देने जैसा था। इसपर फकीरा ने कहा था—‘एक न एक दिन मरना तो हम सभी को है। मैं एक शेर की तरह मरना चाहता हूं।’

फकीरा : एक जननायक

पुराने जमाने में धीरोदत्त नायकों के जो गुण हुआ करते थे, वे सब फकीरा के चरित्र में हैं। अपने पिता की भांति वह भी निर्भीक और बहादुर है। पूर्वजों को शिवाजी द्वारा भेंट की गई तलवार पर गर्व करता है। संकटकाल में दूसरों की मदद को तत्पर रहता है। कुछ गुण फकीरा को धीरोदत्त नायकों से भी आगे ले जाते हैं। जैसेकि संकटकाल में सरकारी खजाने को लूटकर गरीबों में बराबर-बराबर बांट देना। दार्शनिकों की भाषा में इसे ‘वितरणात्मक न्याय’ कहा जाता है। उपन्यास का संदेश है कि राज्य जब अपने कर्तव्य में चूक जाए; अथवा सत्ता से नजदीकी रखने वाली शक्तियां मनमानी पर उतर आएं तो वर्ग-संघर्ष आवश्यक हो जाता है। नागरिक समस्याओं की ओर से लापरवाही सत्तु और फकीरा जैसे जन नायकों को जन्म देती हैं।  

उपन्यास की रचना 1959 की है। उस समय तक आजादी को 12 वर्ष बीत चुके थे। वह दो ऐसी पीढ़ियों का संगम था जिसमें एक पीढ़ी ने आजादी की जंग को जिया था, दूसरी ने आजादी के वातावरण में होश संभाला था। अपने माता-पिता से आजादी से जुड़े सपनों और संघर्षों की कहानियां सुनी थीं। अब उसे लग रहा था कि वास्तविकता और देखे गए सपनों में कोई तालमेल नहीं है। इस एहसास ने ही युवा पीढ़ी के मन में संघर्ष की भावना ने जन्म लिया था। ध्यातव्य है कि जिन हालात में जीवन जीते हुए अन्नाभाऊ साठे ने अपना विपुल लेखन किया, उन्हीं हालात से ‘दलित पैंथर्स’ के नायक भी रह चुके थे। उन्होंने दलित पैंथर्स की स्थापना 1972 में, ‘फकीरा’ के प्रकाशित होने के लगभग 12 वर्ष बाद हुई। ‘दलित पैंथर्स’ की स्थापना और ‘फकीरा’ का चरित्र दोनों दोनों अपने समय और समाज से उपजी हताशा की देन हैं। इस विश्वास की देन हैं कि राज्य और समाज जब मामूली अधिकारों के संरक्षण में भी कोताही बरतने लगे जो हिंसात्मक प्रतिवाद जरूरी बन जाता है।

‘फकीरा की शुरुआत एक धार्मिक-सांस्कृतिक ‘जोगिणी’ से होती है। मगर अंत तक आते-आते लोक संस्कृति और परंपराएं बहुत पीछे छूट जाती हैं। उपन्यास पूरी तरह से दलितों की समस्याओं तथा उनके संघर्ष पर केंद्रित हो जाता है। यही इसकी खूबी है। यहूदी कहावत है—‘अगर मैं अपने लिए नहीं हूं, तो मेरे लिए कौन होगा? यदि मैं केवल अपने लिए हूं, तो मैं क्या हूं? यदि मैं इसे अभी तक नहीं समझा, तो कब समझूंगा?’ साठे बताना चाहते हैं कि दलितों, पिछड़ों, बहुजनों की समस्याओं के समाधान के लिए न तो कथित ऊंची जातियां मददगार होंगी, न ही कोई दैवी चमत्कार उन्हें उनसे मुक्ति दिलाएगा। इसके लिए उन्हें एकजुट होकर खुद ही आगे आना पड़ेगा।   

—ओमप्रकाश कश्यप

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