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वेन की कथा

वेन उदार है….’

वेन वीर है….’

वेन निष्पक्ष, न्यायकर्ता है….’

वेन का जन में विश्वास है….’

अब से वेन ही हमारे सम्राट होंगे….’

सम्राट अमर रहें….’ जयघोष के साथ दर्जनों मुट्ठियां हवा में लहराने लगीं. लोग खुशी से चिल्ला उठे. वेन को सम्राट चुन लिया गया. ऋषिकुल देखते रह गए. अभी तक उन्होंने राजतंत्रों को सजते देखा था. उनके लिए आशीर्वादकामना की थी. आवश्यकतानुसार प्रशस्तिवाचन भी किया था. लेकिन गणतंत्र जिसमें लोग अपना नेता स्वयं चुनें, जहां सभी को बराबर अधिकार होंउनकी समझ से बाहर था. उनके शास्त्र बताते थे कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है. उसे साधारण लोग भला कैसे चुन सकते हैं! ऋषिगण एक और बात से भी क्षुब्ध थे. परंपरानुसार वही राजाओं का अभिषेक करते आए थे. अब जनता स्वयं अपने राजा का अभिषेक कर रही थी. इस उत्साह के साथ कि ऋषिगण कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. अनमनेअनचाहे ढंग से साक्षी बने थे. यूं भी सीधे टकराव की अपेक्षा अवसर मिलते ही अदृश्य प्रहार करना उनकी आदत थी. इसी तरह उन्होंने स्थानीय कबीलों को पराजित कर, आर्यों की राह आसान की थी. वेन को राजा निर्वाचित करने वाले भी आर्यगण ही थे. अनार्यों के संपर्क में आने के बाद उन्होंने उनसे बहुत कुछ सीखा था. विशेषकर गणतंत्र और खेती करने की कला. वेदों में उनकी आस्था थी, लेकिन शांतसरल, बगैर किसी छलछंद का जीवन जीने वाले अनार्यों के पुरों को ध्वस्त करने के लिए ‘पुरंदर’ का बारबार आवाह्न करना उन्हें नापसंद था. वे असुर, निषाद, किरात, भील तथा अन्य अनार्यों की भांति कृषिकर्म को अपनाना चाहते थे. ताकि पशुओं के साथ यहां से वहां भटकने से मुक्ति मिले. जानते थे कि धरती की सीमा है. वह आवश्यकताएं सभी की पूरी कर सकती है. लालच, किसी एक का भी नहीं.

ऋषिकुलों की चिंता आर्य संस्कृति का विस्तार करने की थी. अभी तो केवल सरस्वती पार की है. वे आर्यसंस्कृति को नदी के उत्तर, पश्चिम में गंगायमुना के मैदानों तक ले जाना चाहते थे. चिंता का दूसरा कारण गणतंत्र और उसके प्रति जनों का आकर्षण था, जिसने उनके विशेषाधिकारों के आगे प्रश्नचिह्न लगा दिया था. उन्हें गणतंत्र का इतना भय था कि जब भी मिलते, आंखों में एक ही सवाल होता था—‘अगर प्रजा स्वयं राजा चुनने लगी तो हमारा क्या होगा!’

सम्राट वेन कृषि में रुचि लेते थे. सरस्वती के तटवर्ती बड़े भूभाग को उपजाऊ क्षेत्र में बदलने में उनकी बड़ी भूमिका थी. इसी गुण ने उन्हें राजा बनाया था. लक्ष्य स्पष्ट था. सम्राट चुने जाने के तत्काल बाद, बिना किसी औपचारिकता के वेन ने पुरवासियों को संबोधित करते हुए कहा था—

आज से कोई छोटाबड़ा नहीं होगा. हम सभी श्रम करेंगे. सरस्वती के पूर्व तथा उत्तरपश्चिम में बड़ा क्षेत्र अब भी अकृष्ट पड़ा है. उसे हम अपने स्वेद बिंदुओं से सींचकर उपजाऊ बनाएंगे, ताकि आर्यवर्त में आदर्श श्रम संस्कृति का विस्तार हो.’ वेन के प्रस्ताव का सभी ने हाथ उठाकर समर्थन किया था. लेकिन वहां उपस्थित ऋषिगणों के चेहरों पर तनाव छा गया—

सम्राट, हमारा कार्य यज्ञादि कर्मों का निष्पादन तथा शिक्षा देना है. आपके निर्णय से धर्म को क्षति पहुंचेगी.’

सबसे बड़ा अधर्म तो दूसरों पर आश्रित जीवन जीना है. प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपना भोजन स्वयं अर्जित करे.’—एक ओर से प्रतिक्रिया आई.

कुपित ऋषि भीड़ की ओर देखने लगे. सम्राट वेन किसी भी प्रकार के विग्रह से बचना चाहते थे. लेकिन वे यह भी नहीं चाहते थे कि दूसरों को काम से जी चुराने का बहाना मिले. अतएव ऋषिगणों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा—

मैं जानता हूं कि आपका कार्य बेहद महत्त्वपूर्ण है. बहुमुखी विकास के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है. लेकिन बराबरी पर आधारित समाज की रचना के लिए श्रम भी अत्यावश्यक है.’

अंततः एक निर्णय लिया गया कि सरस्वती के पश्चिमी तट से सटी उपजाऊ, सिंचित और कृषियोग्य भूमि ऋषिगणों को दे दी जाए तथा शेष जन, राजा के नेतृत्व में नदी के उत्तरपूर्वी हिस्से पर मौजूद जंगलों को साफ कर, भूमि को कृषि योग्य बनाने का संकल्प लें.

ऋषिगणों ने सहमति दे दी.

वर्षों के परिश्रम द्वारा तैयार की गई सिंचित भूमि को ऋषिकुलों को दिए जाने पर जनों में रोष था. वेन ने उन्हें समझा लिया. अपने राजा की सलाह मानकर जन सरस्वती के पूर्वाेत्तर क्षेत्रों में जमीन तैयार करने लगे. बीहड़ जंगलों को साफ कर, जमीन को कृषियोग्य बनाना कम चुनौतीवाला काम न था. फिर भी वे खुश थे. उनका राजा उनके साथ था. कदमकदम पर राह दिखाता. उनका मनोबल बढ़ाता हुआ. आखिर परिश्रम रंग लाया. खेत लहलहाने लगे. विश फलनेफूलने लगा. सरस्वती के पश्चिमी पाट पर ऋषिगण भी खेती करते थे.

कुछ वर्ष बीते. मौसम समय पर आए, गए. वेन का राज्य तरक्की करता गया. अचानक प्रकृति की रंगत बदली. बादल जो वर्षों तक धरा सरसाते आए थे, रूठने लगे. एक के बाद एक, अनेक वर्ष बिना बारिश के बीत गए. फसलें सूखीं, जमीन पपड़ाने लगी. मौसम के सहारे खेती करनेवाले किसानों पर दुर्भिक्ष वार पर वार करने लगा. गणतंत्र की स्थापना के बाद राज्य समृद्ध हुआ था. धनधान्य की कभी कमी न रहती थी. यह पहला अवसर था, जब कोठार खाली थे. भूखे पेट नैतिकता पिघलने लगी. आदमी आदमी का दुश्मन बन गया. चोरी और लूट की घटनाएं बढ़ गईं. उधर ऋषिगणों के खेत अब भी लहलहा रहे थे. सदानीरा सरस्वती की उनपर कृपा थी. पाट से सटे खेतों को भरपूर पानी उपलब्ध था. भूख से पीड़ित जनों को देख वेन से न रहा गया. उन्होंने विशके निवासियों की बैठक बुलाने का फैसला कर लिया. बैठक में सभी को संबोधित करते हुए सम्राट ने कहा—

यह विश हम सबसे बना है. हमारे सुखदुख भी साझे होने चाहिए. मैं चाहता हूं कि ऋषिगण दुर्भिक्ष पीड़ित जनों की सहायता करें. जब तक संकट टल नहीं जाता, तब तक अपने खेतों में काम करने दें. उनके परिश्रम के बदले अनाज का एक हिस्सा उन्हें दे.’ आशा के विपरीत ऋषिगणों ने सहयोग से इन्कार कर दिया. उल्टे ग्रामीणों को नास्तिक तथा वेन को नास्तिकों का राजा कहकर वे उनका उपहास करने लगे. भूखेप्यासे जन पहले ही क्षुब्ध थे. अपने प्रिय सम्राट को ‘नास्तिक’ संबोधन उन्हें गाली जैसा लगा. वे क्रोध से उबलने लगे. क्रोध के अतिरेक मैं उनका धैर्य डोलने लगा.

हमें हमारे खेत वापस चाहिए….यदि वे नहीं मिले तो हम उनमें आग लगा देंगे.’ कई जन एक साथ चीखे.’

रुको! वे हमारे बच्चों के शिक्षक हैं. हमें उनका सम्मान करना चाहिए.’ वेन चीखचीखकर भीड़ को शांत करने की कोशिश में लगे थे. मगर लोग जैसे पगला चुके थे. भूख उनकी नैतिकता को निगल चुकी थी. विवेक क्रोध की मार से धराशायी था. सम्राट वेन उग्र जनों और ऋषियों के बीच दीवार बनकर खड़े थे. दोनों को समझाने की कोशिश, शांति के लिए लगातार अपील करते हुए. जन गुस्से से बेकाबू थे. नैतिकता और भूख के द्वंद्व में जीत भूख की हुई. निर्देश की अवहेलना करते हुए उग्र भीड़ आगे बढ़ी. सम्राट रास्ते में अड़े थे. भूख और क्रोध से अंधी हुई भीड़ उन्हें कुचलते हुए निकल गई.

सम्राट वेन….’ वेन को क्षतविक्षत अवस्था में जमीन पर पड़े देख कोई चीखा. सच जानते ही लोग सकते में आ गए. जो जहां था, वहीं थम गया. क्रोध के स्थान पर ग्लानिभाव उमड़ने था. सभी की निगाहें जमीन पर थीं. प्रायश्चित से वे दोहरे हुए जा रहे थे. ऋषिगण जो कुछ देर पहले घबराए हुए थे, रुक गए.

देर तक सन्नाटा छाया रहा. लोग व्यथित थे. जिस सम्राट को उन्होंने अपनी इच्छा से चुना था. जो उनके हितों का रखवाला था, उसका अंत उनके अपने ही हाथों हुआ. यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा थी. ग्लानिबोध से दबे लोग अपने आप से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. अवसर अनुकूल देख ऋषिगण आगे आकर कहने लगे—

भाइयो! अपने मन को शांत करें. ईश्वर एकमात्र कर्ता है. जो हुआ वह पहले से ही तय था. इसमें आपका कोई दोष नहीं है. हमारे प्रिय सम्राट को ईश्वर के राज्य में शरण मिली है. उसी परमात्मा का आदेश है कि आप हमारे साथ चलें. आश्रमों के द्वार आपके लिए खुले हैं.’ आप इसे ईश्वर के नाम का नशा माने या प्रलोभन, प्रजाजनों की अज्ञानता कहें अथवा दुर्भिक्ष की मार का असर—आत्मपीड़ा में डूबे, पापबोध के मारे, भूख से व्याकुल, निढाल जन अंततः ऋषिगणों के पीछेपीछे चलने लगे.

सहसा एक निषाद तेजी से आगे आया. अधनंगा तन, ठिगनी, परिश्रमतपी काया. आगे चल रहे ऋषियों को संबोधित कर वह चीखा—‘उसे ईश्वर ने नहीं तुम लोगों ने मारा है. तुम हत्यारे हो….तुम सब हत्यारे हो. धर्म के नाम का धंधा करने वाले. महाराज की हत्या तुम सबने मिलकर की है. मुझे तुम्हारी दिखावटी करुणा नहीं चाहिए.’

कहता हुआ वह जंगल की ओर दौड़ गया. मगर उसकी आवाज पूरे नभमंडल को देर तक गूंजती रही.

ओमप्रकाश कश्यप

(नोट : एक अन्य जगह आया है कि वेन ने कृषि ने लिए पशुशक्ति की आवश्यकता को देखते हुए यज्ञों में दी जाने वाली बलि पर नियंत्रण लगा दिया था. जिससे पुरोहित वर्ग उनसे नाराज हुआ. उन्होंने वेन के विरुद्ध जनता को उकसाना आरंभ किया. वेन की हत्या उसी षड्यंत्र का परिणाम थी )

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