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औरत

बहू को ससुराल आए सात वर्ष हो चुके थे, परंतु सास-बहू दोनों में किसी को किसी से शिकायत न थी. बहू की कोशिश रहती कि ससुराल और मैके में कोई फर्क न समझे. रिश्तों की मर्यादा बनाए रखे. ऐसा करते-करते वह एकदम बेटी बन जाती. सास ऐसी कि मां और सास का अंतर पता न चलने दे. दिन में कुछ पल ऐसे भी आते जब सास-बहू दोनों सहेलियों की भूमिका में होतीं. इसलिए बहू जब दूसरी बार गर्भवती हुर्ह तो सास की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. उसने बहू की सुख-सुविधा के लिए हर जरूरी चीज का इंतजाम करा दिया. बहू की तबियत एकाएक बिगड़ी तो उसे नर्सिंग होम ले जाना पड़ा. डॉक्टर ने जो तारीख दी थी, उसके आने में पूरा पखबाड़ा शेष था. लेकिन नर्सिंग होम में जब बहू को तत्काल भर्ती करने तथा नवजात के लिए कपड़ों का इंतजाम करने को कहा तो सास चौंकी. माथे पर चिंता की अनगिनत रेखाएं उभर्र आईं— ‘और इंतजार नहीं कर सकते?’ डॉक्टर का कहना था. ‘दोनों ठीक तो हैं?’ ‘चिंता मत कीजिए मां जी….’ सुनकर सास ने कुछ राहत महसूस की. उसी समय बहू को प्रसव पीड़ा होने लगी. अब न तो सास, सास थी. न बहू, बहू. एक स्त्राी को पीड़ा से छटपटाते देख दूसरी स्त्राी बड़बड़ा रही थी— ‘नौ महीने तक पेट में रखो, जन्म देने के लिए पेट चिरवाओ और बड़े होते ही बच्चे अपनी हांकने लगते हैं. पूछते तक नहीं.’ प्राकृतिक रिश्ता सामाजिक रिश्तों पर भारी पड़ चुका था?

ओमप्रकाश कश्यप

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