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नियुक्ति

अकादमी के शीर्षस्थ पद के लिए प्रत्याशियों को बुलाया गया. भर्ती के लिए दो प्रकार की परीक्षाएं तय थीं. पहली परीक्षा के लिए प्रत्याशियों को एक हॉल में बिठाया गया. उनके ठीक सामने एक मंदिर था. मंदिर में एक त्रिशूल रखा गया था. त्रिशूल के आगे पत्र-पुष्प, फूलमालाएं, चंदन लेप, धूप-दीप-नैवेद्य रखे थे. बराबर में दो प्लेट. उनमें से एक में नीले रंग के कार्ड रखे थे. दूसरी में केसरिया. नीले कार्ड पर ‘हथियार’ लिखा था. केसरी पर ‘पूजा’. परीक्षा की शुरुआत करते हुए परीक्षक ने प्रत्याशियों से कहा—‘आपको बताना है, त्रिशूल हथियार है या पूजा?’ जो त्रिशूल को हथियार मानते हैं, वे नीला कार्ड उठाकर इस कक्ष में बाईं ओर रखी कुर्सियों पर बैठ जाएं. पूजा मानने वाले केसरिया कार्ड उठाकर दायीं दिशा में स्थान ग्रहण करें. प्रत्याशियों के चेहरे खिल उठे. एक-एक कर सभी त्रिशूल के सामने जाते और अपनी पसंद का कार्ड उठाकर यथास्थान बैठ जाते. पहला चरण संपन्न होने पर परीक्षक ने खडे़ होकर कहा—
‘जिन प्रत्याशियों ने नीले कार्ड उठाए हैं, वे जा सकते हैं.’ तीन को छोड़कर बाकी सभी प्रत्याशी प्रस्थान कर गए.
‘चुने हुए प्रत्याशियों का साक्षात्कार होगा.’ परीक्षक ने बताया. उसके बाद पहले प्रत्याशी को बुलाया गया—
‘तुमने कैसे तय किया कि त्रिशूल पूजा है?’
‘बड़ा आसान था.’ पहले प्रत्याशी ने कहा, ‘त्रिशूल के आगे धूप-दीप-नैवेद्य रखे थे. बस मैं समझ गया कि त्रिशूल पूजा है.’
‘शाबाश! अपनी रचनात्मक उपलब्धियों के बारे में भी बताइए?’
‘मैने गाय पर एक हजार से ऊपर निबंध लिखे हैं.’
‘गुड! आप प्रतीक्षा कर सकते हैं.’ तदनंतर दूसरे प्रत्याशी को बुलाया गया. उसके सामने भी वही सवाल रखे गए.
‘त्रिशूल मंदिर में था. मंदिर को देखते ही मैं ध्यान-मग्न हो गया. उसके बाद तो मुझे सब पूजा मय नजर आने लगा.’
‘अपनी रचनात्मक उपलब्धियों पर भी प्रकाश डालिए?’
‘मैने गहन शोध से पता लगाया है कि आज रामेश्वरम हैं, हजारों वर्ष पहले वहां एक कारखाना था. जिसमें पुष्पक विमान बना करते थे. कारखाना इतना बड़ा था कि तैतीस करोड़ देवताओं में से हर एक के पास पुष्पक विमान था. उससे वे सातों लोकों की यात्रा किया करते थे?’
‘लेकिन शोध से तो वहां किसी कारखाने के प्रमाण नहीं मिलते?’
‘कैसे मिलता, देवताओं की तरह उनका कारखाना भी सिर्फ उनके परमभक्तों को दिखाई पड़ता था.’
‘फिर आपने कैसे पता लगाया?’
‘बड़ी कठिन साधना करनी पड़ी. प्रभुकृपा से यह भी पता चला कि एक कारीगर ने पुष्पक विमान का डिजायन वहां मौजूद शिलाखंड पर बना दिया था. वास्कोडिगामा जब भारत आया तो वह उस शिला को अपने देश वापस ले गया था. आधुनिक हवाई जहाज उसी की नकल हैं.’
तीसरे प्रत्याशी से भी वही प्रश्न किए गए. उसने छूटते ही कहा—
‘त्रिशूल हथियार होगा महादेव के लिए हमारे लिए तो वह केवल पूजा है?’
‘क्या आप हथियार की जरूरत नहीं समझते?’
‘हरगिज नहीं, हमारी रक्षा के लिए देवता जो हैं.’
‘शाबाश, आपकी रचनात्मक उपलब्धियां?’
‘जी, फेसबुक, ट्विटर, वाटअप वगैरह पर एक सौ एक अकाउंट हैं.’
‘इतने एकाउंट की क्या जरूरत है?’
‘जरूरत है सर. इससे भी ज्यादा की जरूरत है. मुझे ही देखिए सुबह से ही कंप्यूटर पर बैठ जाता हूं और फेसबुक, ट्विटर, वाटअप वगैरह जितनी भी सोशल साइट हैं, सभी पर वामपंथियों को कोसता रहता हूं.’
‘इसके लिए तो वामपंथ को बहुत पढ़ना पड़ता होगा?’
‘कैसी बात करते हैं सर, गालियां देने के लिए पढ़ने की क्या जरूरत है?’
तीसरे प्रत्याशी को उसी क्षण नियुक्तिपत्र थमा दिया गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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