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विविध की डायरी

बालकहानी

विविध के दादू को डायरी लिखने का शौक है. बोर्डिंग में जाने पर विविध को घर की याद आई तो उसने भी कलम उठा ली. ये पन्ने उसी की डायरी के हैं, जो उसने अपने दादू को संबोधित करते हुए लिखे हैं—

17 फरवरी 2015

आज बोर्डिंग का तीसरा दिन है. मैं दो दिनों तक लगातार सोचता रहा कि घर में कोई मुझे प्यार नहीं करता. बहुत शरारती हूं न! इसलिए मुझे घर से दूर कर दिया गया है. बीते दो दिन मैं लगातार अच्छा बालक बनने की कोशिश करता रहा. इन दो दिनों में मैंने कोई शरारत नहीं की. मुंह तक नहीं खोला. मुझे गुमसुम देख बच्चों ने मान लिया कि मैं बीमार हूं. वे मेरा हाल-चाल पूछने आए. जब उन्हें पता चला कि मुझे कुछ नहीं हुआ है, तो दब्बू कहकर मेरी हंसी उड़ाने लगे. मुझे उदास देखकर मैडम ने पूछा था—

‘घर की याद आ रही है विविध?’ मैं चुपचाप किताब में आंखें गढ़ाए रहा.

‘ऐसा सबके साथ होता है. धीरे-धीरे नए दोस्त बनते हैं. आदमी छूटे हुए को भूल जाता है.’ मैडम कहे जा रही थीं. वही गोल-मोल बातें. जैसी बड़े अकसर बच्चों के साथ करते हैं. मैं दादू के अलावा किसी और के साथ सहज हो ही नहीं पाता. मुझे आज भी याद है, जब मैं हाॅस्टल के लिए निकला था, तब दादू ने कहा था—‘दुनिया से जुड़ने के लिए खुद से जुड़ना बहुत जरूरी है.’

जब से आया हूं, यह बात मेरे दिमाग में लगातार चक्कर काट रही है.

‘मैडम, खुद से जुड़ना क्या होता है?’ मैंने पहली बार अपना मुंह खोला. मैडम चकित होकर मेरी ओर देखने लगीं. शायद ऐसे सवाल की उन्हें उम्मीद ही नहीं थी. कुछ देर बाद मेरे कंधों पर हाथ रख मुझे समझाते हुए बोलीं—

‘अपनी शक्तियों को समेटे रखना.’ फिर पहेली! मैं मैडम की ओर देखने लगा. बड़े लोगों को पहेली बूझने के लिए हम बच्चे ही क्यों मिलते हैं! दादू की पहेली क्या कम उलझन-भरी थी जो मैडम ने एक पहेली और दाग दी. मैंने देखा, मैडम मुस्करा रही थीं—

‘तुम समझदार हो. पर कुछ चीजें वक्त के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.’

ऊंह! यह क्या बात हुई. दादू होता तो कहता—‘समझा नहीं सकते तो बचाव का रास्ता ढूंढ लिया.’ पर मैं जानता हूं दादू ऐसा कभी नहीं कहते. उनके पास आने-जानेवालों का तांता लगा रहता है. उनमें कुछ विद्यार्थी भी होते हैं. दादू अपने पास आनेवाले वालों से अकसर कहा करते हैं—‘शब्दों से दोस्ती करो.’

उन लड़कों के पल्ले क्या पड़ता है, मुझे नहीं पता. परंतु शब्दों से दोस्ती की बात मैं समझ सकता हूं. दादू अस्सी बरस की अवस्था में रोज डायरी लिखते हैं. फुर्सत मिलते ही कुछ न कुछ पढ़ने लग जाते हैं. मेरे लिए यह पहेली अबूझ नहीं है. इसलिए घर छोड़ते समय मैंने सबसे पहला फैसला किया था—शब्दों से दोस्ती करने का.

घर से चलते समय दादू से नीली डायरी मांगकर लाया था. सोचा था उनकी तरह रोज कुछ न कुछ लिखूंगा. लेकिन पिछले दो दिन मन बेहद उदास रहा. शब्द जंगली हिरन की तरह पकड़ से दूर भागते रहे. आज मैंने ठान लिया था कि कुछ न कुछ लिखकर मानूंगा. कलम उठाई तो शब्द अपने आप उतरने लगे. तब पता चला कि शब्द दोस्ती के लिए हमसे भी ज्यादा उतावले होते हैं. मन से पुकारो तो कतार बांधे खुद-ब-खुद चले आते हैं. दादू ठीक कहते हैं—हर मंजा हुआ लेखक कमांडर की तरह होता है, शब्द उसके अनुशासित सेनानी.

अरे वाह! आज तो मैं भी पहेलीनुमा बातें करने लगा. दादू का कुछ असर तो पड़ना ही है. डेढ़ घंटा लिखने में कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला. अब सोता हूं. मैडम बता रही थीं, कल प्रधानमंत्री जी संबोधित करने वाले हैं. देश का प्रधानमंत्री हम बच्चों से संवाद करे, मुझे तो यह सोचकर ही सिहरन होती है.

पता नहीं वे सिर्फ अपने मन की कहेंगे या हमारे मन की बात भी सुनेंगे.

18 फरवरी 2015

स्कूल में सुबह से ही हलचल थी. खुले मैदान में पंडाल लगाया गया था. सामने बड़ा टेलीविजन स्क्रीन था, जिसपर प्रधानमंत्री जी संबोधित करनेवाले थे. पिछले स्कूल में हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को जलसा होता था. बड़े-बड़े लोग आते. बच्चों को फलाहार भी मिलता. ‘क्या आज भी फलाहार बंटेगा?’ हर बच्चे के मन में यही ख्याल था. एक लड़का स्कूल के कमरों में बार-बार चक्कर लगा रहा था. एक-एक कर वह सारे कमरों में घूम चुका था.

‘अंबेश, क्या है, क्यों चक्कर काट रहे हो? जाकर अपनी क्लास के साथ बैठो.’ एक मैडम ने उसे डांटा. लेकिन अंबेश की आंखें अब भी इधर-उधर कुछ खोज रही थीं—

‘मैडम भूख लगी है.’ अंबेश ने मासूमियत से बताया.

‘सुबह तुम्हारी मम्मी ने नाश्ता नहीं कराया था?’

‘मैंने मना कर दिया था.’

‘क्यों मना कर दिया था?’

‘प्रधानमंत्री जी के टेलीविजन पर आने की खुशी में लड्डू बटेंगे….’

‘ठीक है, पर नाश्ता क्यों नहीं किया था?’

‘पिछली बार दो लड्डू मिले थे. पेट भरा होने के कारण मैं बस एक खा पाया था.’ बच्चे की मासूमियत देख मैडम हंसी. आसपास मौजूद बच्चे भी अपनी हंसी न रोक सके.

प्रधानमंत्री जी समय पर बोले. अच्छी-अच्छी बातें बर्ताइं. मामूली लगनेवाली सफाई जैसी बातें भी. घर में दादू भी सफाई पर जोर देते थे. पर मैं लापरवाही कर जाता था. आज पता चला कि मामूली लगनेवाली हर बात मामूली नहीं होती. गांधी जी छोटी-छोटी बातों पर अमल करके ही बड़े आदमी बने थे. आइंस्टाइन के चाचा ने यूक्लिड की ज्यामिती की छोटी-सी पुस्तक भेंट में दी थी. यदि आंइस्टाइन उस पुस्तक को पुरानी और मामूली समझकर एक ओर रख देते तो क्या इतने बड़े वैज्ञानिक बन पाते!

प्रधानमंत्री जी का संदेश पूरा होते ही हमसे मैदान में चलने को कहा गया. चार टुकड़ों में बांटकर हमें मैदान की सफाई का काम सौंपा गया. प्रधानमंत्री जी के संदेश का असर. हम सभी उत्साहित थे. चार मैडम बच्चों को निर्देश दे रही थीं—

‘विविध वो कागज उठाकर डस्टबिन में डालो.’ एक मैडम ने मुझसे कहा तो मैं दौड़ पड़ा. जैसे पंख लगे हों. हम बच्चों के लिए यह एक खेल था. परंतु मैडम का खड़े-खडे़ आदेश देना मुझे अच्छा नहीं लगा. मैदान बड़ा था. थोड़ी ही देर में उस खेल से उकताहट होने लगी. दूसरे बच्चे भी थकावट महसूस करने लगे. चारों मैडम जैसे एक ही दिन में पूरे मैदान की सफाई का संकल्प ले चुकी थीं. क्या प्रधानमंत्री जी का संदेश केवल हम बच्चों के लिए था? क्या वे हमें निरा बच्चा समझते हैं. मैं सोच ही रहा था कि एक ओर से रोने की आवाज सुनाई दी. सभी उस ओर दौड़ पड़े. पता चला कि एक मैडम ने छोटे बच्चे को ईंट उठाकर एक ओर रखने को कहा था. बच्चा ईंट संभाल न पाया और गिर गया. घुटने छिलने से वह रोये जा रहा था. बालक की मरहम-पट्टी की गई. उसके बाद हमारा मन उस काम से ऊब गया. प्रधानमंत्री जी की कही अच्छी-अच्छी बातें हवा हो गईं.

अच्छा हुआ, सफाई का काम भी रोक दिया गया.

21 फरवरी 2015

बीते दिन एक भी क्लास नहीं लगी थी. मुझे वह दिन बहुत अच्छा लगता है, जब स्कूल हो पर पढ़ाई बिलकुल न हो. उस दिन लगता है कि स्कूल हम बच्चों के हिसाब से चल रहा है. बाकी दिनों में तो हम बच्चों को ही स्कूल के हिसाब से चलना पड़ता है.

बच्चे को चोट लगने की घटना का असर हम सबके मन पर था. मैडम उसी की चर्चा कर रही थीं. कक्षा खाली थी. बच्चों को मौका मिला. वे उछल-कूद मचाने लगे. किसी एक ने कागज उछाला तो देखा-देखी दूसरे बच्चे भी शुरू हो गए. उसके बाद तो मानो होड़-सी मच गई. फर्श पर कागज ही कागज नजर आने लगे. एक दिन पहले प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया संदेश मानो बेअसर हो गया. शोर-शराबा सुनकर मैडम आईं. बच्चों को डांटकर उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया. कक्षा में गंदगी देख मुझे बहुत बुरा लग रहा था. अच्छा होता मैडम जी डांटने के बजाय हम सबसे सफाई करने को कहतीं.

तभी आहट सुनाई पड़ी. दरवाजे पर प्रिंसीपल मैडम थीं. बच्चे उन्हें देखकर खड़े हो गए. हम सब डरे हुए थे कि कक्षा में गंदगी देख प्रिंसीपल मैडम अवश्य डांटेंगीं. डर से हमारे दिल जोर से धड़क रहे थे. प्रिंसीपल मैडम ने कक्षा में एक नजर दौड़ाई, फिर किसी से कुछ भी कहे बगैर फर्श पर बिखरे कागजों को उठाने लगीं. हम सब स्तब्ध—

‘अरे….रे मैडम, आप छोडि़ए, मैं कराती हूं.’ मैडम ने आगे बढ़कर उन्हें रोकने की कोशिश की. प्रिंसीपल मैडम चुपचाप काम में लगी रहीं. यह देखते ही बच्चे अपनी-अपनी सीट छोड़ कागज बीनने में लग गए. कुछ ही क्षणों में कमरा साफ हो गया. प्रिंसीपल मैडम बिना एक भी शब्द कहे चुपचाप चली गईं. उनकी चुप्पी हम सब पर भारी थी. सभी अपराधबोध से ग्रस्त थे.

‘मौन शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली होता है.’ दादा जी अकसर कहा करते थे. उसका मतलब आज समझ में आया.

मैडम ठीक ही कहती थीं. कुछ बातें समय के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.

फरवरी 22 2015

कल की घटना का बहुत गहरा असर पड़ा है. बच्चों ने कागज के कनकौए उड़ाना छोड़ दिया है. कक्षा में, खेल के मैदान पर या रास्ते में, बच्चों को कहीं भी गंदगी दिखती है, तो उसे चुपचाप उठाकर डस्टबिन के हवाले कर देते हैं. कक्षा में सभी शांत रहते. मानो जा चुके हांे कि शोर अपने आप में गंदगी है. लंच करने से पहले सब एक-एक कर हाथ धोते है. छोटी-छोटी बातें बड़ा सुख दे जाती हैं. मेरा मन स्कूल में लगने लगा है. कुछ लड़के दोस्त बने हैं. उन्हीं में एक लड़का है वेदांत. उसके घर में एक दादी है. जब मैं उससे अपने दादू की बातें करता हूं, वह अपनी दादी की बातें सुनाने लगता है. इससे एक बात तो समझ में आती है. परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी का होना बेहद जरूरी है. वे न हों तो घर कितना बोझिल हो जाए.

पढ़ाई शुरू हो चुकी है. होमवर्क काफी था. काफी समय उसे निपटाने में ही निकल गया. सोता हूं.

फरवरी 27 2015

कई दिनों से डायरी लिखने का काम छूटा रहा. आज कक्षा में मैडम ने बताया था कि दस दिन बाद स्कूल का सालाना उत्सव शुरू होगा. उसके लिए नाटक तैयार करने का काम उन्हीं को सौंपा गया है. अपनी नई जिम्मेदारी पर वे बहुत उत्साहित थीं. इसलिए कक्षा में आने के साथ ही उन्होंने कहा था—

‘‘दो नाटकों में से पहला नाटक राजा और उसके वजीर की कहानी है. दूसरे में एक नेता और जनता होगी.’ यह सुनकर हम बच्चों ने ताली बजाकर अपनी खुशी प्रकट की थी.

‘विविध तुमसे इस नाटक में हिस्सा लेने को कहा जाए तो क्या बनना चाहोगे, राजा या वजीर?’ मैडम ने मुझसे पूछा. मैं ऐसे सवाल के लिए तैयार न था.

‘कुछ भी नहीं मैडम?’ थोडी देर बाद मैंने उत्तर दिया.

‘क्या तुम्हें नाटक में हिस्सा लेना अच्छा नहीं लगता?’

‘मुझे राजा या उसका वजीर बनना अच्छा नहीं लगता.’

‘क्यों?’

‘राजा और वजीर तो बीते जमाने की बातें हैं’ मैंने उत्तर दिया था. उस समय मेरे दिमाग में गांव की एक घटना चक्कर काट रही थी. दादू के पास गांव के कुछ लोग आए थे. दशहरे के अवसर पर नाटक मंडली को बुलाने की बात थी.

‘इस बार गांव वाले राजा नल का नाटक देखना चाहते हैं.’ लोगों के साथ आए ग्राम प्रधान ने कहा था. इस पर दादू का उत्तर था—

‘राजा-महाराजाओं का जमाना तो कभी का लद चुका है प्रधान जी.’

‘फिर?’

‘मेरा बस चले तो मैं ऐसी नाटक मंडली को गांव में बुलाऊं जो सुभाष चंद बोस या महात्मा गांधी पर नाटक खेले.’

‘विविध, क्या तुम दूसरे नाटक मैं नेता का पाठ करना चाहोगे?’ मुझे चुप देख मैडम ने पूछा था.

‘नहीं, जनता का?’

‘तुम तो नेता का पाठ आसानी से कर सकते हो?’ मैडम ने मुझे समझाने की कोशिश की थी.

‘दादू बताते हैं, हमारे देश में जनता ही नेता को चुनती है. नेता गलती करे तो उसको उतार फैंकती है. इसलिए मैं जनता बनना चाहूंगा…..समझदार जनता.’

‘सही कह रहा है मैडम.’ कक्षा में किसी ने पीछे से कहा था—‘जनता भी तो सफाई करती है….गंदे नेताओं की सफाई.’

मुझे लगा कि हमारी बातें सुनकर मैडम भी खुश हैं. शाम को उन्होंने बताया था कि ‘राजा और वजीर’ नाटक का विचार त्याग दिया गया है. उसके स्थान पर अब महात्मा गांधी के दांडी मार्च पर आधारित नाटक खेला जाएगा. डांडी मार्च की कहानी मैं दादू के मुंह से सुन चुका था. उसके बाद मैडम ने मेरी ओर देखते हुए कहा था—‘जानते हो विविध नाटक को बदलने का फैसला तुमसे बातचीत के बाद लिया गया है और मीटिंग के दौरान प्रिंसीपल मैडम ने कहा था—

‘‘लोकतंत्र में जनता भी सफाई करती है….देश की सफाई. यदि देश स्वस्थ रहेगा तो नागरिक अपने आप स्वस्थ्य होते चले जाएंगे.’’

ओमप्रकाश कश्यप

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2 comments on “विविध की डायरी

  1. आदरनीय कश्यप जी ,
    मैं एक हिंदी शिक्षिका हूँ और अपने बच्चों को डायरी लेखन विधा सिखा रही हूँ | क्या मैं आपकी यह डायरी उन्हें पढ़ने के लिए उदहारण के तौर पर ले सकती हूँ?
    अनुमति देकर अनुग्रजित कीजिये |
    धन्यवाद ,
    कुमुदिनी मेंडा

    • आदरणीय कुमुदिनी मंडा जी
      नमस्कार.
      आपने ‘विविध की डायरी’ में रुचि दिखाई, इसके लिए बहुत-बहुत आभार. यह एक कहानी है, जिसे डायरी की शैली में लिखा गया है. बच्चों के लिए लिखी गई इस रचना का उपयोग बच्चों के अध्यापन के लिए हो, इससे बेहतर इसका उपयोग हो ही नहीं सकता. आप इस कहानी का सहर्ष उपयोग कर सकती हैं. मुझे ख़ुशी होगी. इससे अधिक मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि आप बच्चों के लिए नवीन सामग्री की खोज में रहती हैं. देश, विशेषकर हिंदी में ऐसे प्रयोगधर्मी अध्यापक/अध्यापिकाएं कम हैं.
      यदि आप अध्यापन के दौरान बच्चों के अनुभव, उनकी जिज्ञासाएं साझा करेंगी तो मुझे बेहद प्रसन्नता होगी. इससे मुझे बच्चों के मन को समझने में मदद मिलेगी.
      पुन: आभार.
      ओमप्रकाश कश्यप
      opkaashyap@gmail.com

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