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मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं

मैडम लोगों से अपील कर रही थीं—

भाइयो और बहनो!

हमें भ्रष्टाचार को जमने नहीं देना है. जड़ समेत उखाड़ फेंकना है. यह बात भ्रष्टाचार ने सुन ली. वह पत्रकार का रूप धारण कर मैडम के सामने जा धमका—

‘जाने दीजिए मैडम, क्यों नाहक गाल बजा रही हैं, आपके मंत्री खुद भ्रष्टाचार में फंसे हैं.

ऐसी बातें मैडम को सुनाई नहीं पड़ती थीं. वे कहती गईं—

‘हमें विरोधियों की बातों में नहीं आना है. सरकार ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक योजना बनाई है. हम किसी भी भ्रष्ट अधिकारी को टिकने नहीं देंगे.’

पत्रकार बने भ्रष्टाचार को हंसी आई. एक अधिकारी जिससे वह मन खीझता था, उसका राजधानी से हाल ही मैं चंडीगढ़ तबादला हुआ था. सहसा उसको चुहल सूझी, बोला—‘मैडम! क्या आप सत्यनाथ जी को वापस बुला रही हैं? वे जिस दफ्तर में भी गए हैं, वहीं उन्होंने विजीलेंस की स्वतंत्र शाखा खोल दी है. उनका नाम सुनते ही बड़े-बड़े अधिकारियों के पसीने छूट जाते हैं. रात-दिन यही प्रार्थना करते रहते हैं कि जिस दफ्तर में वे स्वयं गए हैं, वहां सत्यनाथ जी का तबादला न हो.’

‘राजधानी में ईमानदार अधिकारियों की कमी नहीं है.’

भ्रष्टाचार ने दिमाग पर जोर डाला, एक और अधिकारी का नाम उसके दिमाग में आया—‘सो तो है. जो जा चुका उसको वापस क्या बुलाना? वैसे मेरी नजर में एक और अधिकारी हैं, जिसने भ्रष्टाचार की नाक में नकेल डालने का काम किया है. परंतु आपकी सरकार उसे महीनों से घर बैठे तनख्वाह दे रही है.’

‘मैं विभागों के काम में हस्तक्षेप नहीं करती.’

‘परंतु अब भ्रष्टाचार के कारण विधानसभा में खिंचाई तो आपकी हो रही है.’

‘खिंचाई तो प्रधानमंत्री की भी हो रही है. हम दोनों एक ही मैडम के चेले हैं. जब वे नहीं घबराते तो मैं क्यों डरूं. वैसे यह सब विपक्ष की चाल है. अगले साल चुनाव हैं. सरकार को बदनाम करने के लिए उन्हें कोई न कोई मुद्दा चाहिए…’

भ्रष्टाचार को मैडम का आचरण देख तसल्ली हुई. वह जाने लगा. तो मैडम ने पूछा—‘उस अधिकारी का नाम बताइए, जिसको सरकार घर बैठाकर तनख्वाह दे रही है.’

भ्रष्टाचार मुस्कराया. उसने नाम बता दिया.

‘थेंक्य यू! सेक्रेटरी को अपने अखबार का नाम लिखवा देना, सरकारी विज्ञापन मिलते रहेंगे.’

एक घंटे बाद खबर आई कि उस अधिकारी को राजधानी से बाहर पटक दिया गया है.

भ्रष्टाचार को यही उम्मीद थी. उसका चेहरा खिल गया. अकस्मात उसे वह पंक्ति याद आई, जो मैडम के नाम से दीवारों, पोस्टरों पर जगह-जगह लिखी हुई थी. भ्रष्टाचार ने अपनी तरह से उसकी पैरोडी की—‘मेरी दिल्ली मैं ही बिगाड़ूं.’

ओमप्रकाश कश्यप

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