1 टिप्पणी

निष्कासन

वह दुनिया का शायद इकलौता गांव था. जहां न कोई छोटा था, न बड़ा. सब अपनी मेहनत का खाते. मिलजुलकर रहते. सुख में साझा करते, दुख में साथ निभाते. वहां जो भी था, सबका था. जो नहीं था, वह किसी के भी पास नहीं था. एक दिन गांव में एक तिलकधारी आया—

मैं तुम्हें ईश्वर से मिलवाने आया हूं!’ तिलकधारी ने गांववालों को संबोधित किया.

हम किसी ईश्वर को नहीं जानते. उसको अगर जरूरत होगी तो खुद चलकर आएगा.’

नादान हो तुम सब. ईश्वर की शरण में चलो, उसकी कृपा हुई तो रोजरोज कमरतोड़ मेहनत न करनी पड़ेगी.’

क्या हमारे एवज में तुम और तुम्हारा ईश्वर काम करेगा?’

छिः छिः….ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं कहते.’

तो क्या हममें से किसी को भी काम नहीं करना पड़ेगा?’

यह असंभव है, कुछ को तो काम करना ही पड़ेगा.’

तुम्हारा आशय है कि कुछ को काम से मुक्त करने के लिए बाकी को अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा काम करना पड़ेगा?’

ईश्वर ने सभी के लिए कोई न कोई कर्तव्य निर्धारित किया है.’

हमने भी तुम दोनों के लिए एक काम तय किया है, बोलो करोगे?’

बताओ?’

तुरंत बाहर निकलो और फिर कभी इस गांव की सीमा में प्रवेश मत करना. लौटकर अपने ईश्वर से कहना, हम इस धरती के एहसानमंद हैं, उसके नहीं.’

वह गांव आज तक भाईचारे और खुशहाली की मिसाल बना हुआ है.

ओमप्रकाश कश्यप

One comment on “निष्कासन

  1. karmyogi swayam divya hai. ishwar to hamesha unke bhitar hai tilakdhari aise hi ishwar kitalash me khood bhatkate hai, aur dusaro ko bahkate hain.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: