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विचारहीन क्रांतियों का भविष्य

इसी दिसंबर के दूसरे सप्ताह में दक्षिणीपूर्वी चीन में मछुआरों के गांव वुकान के सैकड़ों किसान वहां की केंद्र सरकार के विरोध में सड़क पर उतर आए. देखते ही देखते प्रदर्शनकारियों की संख्या 20000 तक पहुंच गई. गुस्सा एक ग्रामीण की पुलिस हिरासत में हुई मौत पर भड़का था. स्थानीय प्रशासन का कहना था कि मृत्यु हृदयगति रुकने से हुई है. प्रदर्शनकारी ग्रामीण इसको पुलिस और सरकार की ज्यादती के रूप में देख रहे थे. उनके के नारे थे‘हमारी जमीनें वापस करो’, ‘खून का कर्ज चुकाना होगा.’ इन नारों के पीछे चीनी क्रांति में किसानों की भूमिका की स्मृतियां थीं. एक सूचना के अनुसार चीन में सरकारी नीतियों के विरोध में हर साल हजारों प्रदर्शन होते हैं. उनमें से दोतिहाई के पीछे भूमि समस्या होती है. वुकान के किसानों का विरोधप्रदर्शन उन सबमें बड़ा था. उसके माध्यम से चीन का नाम भी उन देशों में सम्मिलित हो गया, जहां लोग अपनी मांगों को लेकर सरकार के विरोध में सड़कों पर उतरे हैं. हालांकि वुकानवासियों का कहना है कि उन्हें चीनी सरकार के स्वरूप से कोई शिकायत नहीं है. वे बस इतना चाहते हैं कि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान दे.

सन 2011 स्वयंस्फूर्त जनविपल्वों के नाम रहा है. शुरुआत 25 जनवरी को मिस्र से हुई थी. वहां महंगाई और पुलिस ज्यादती के विरोध में लाखों मिस्रवासी कैरो के तहरीर चैक पर तानाशाह सम्राट हुस्नी मुबारक के विरोध में उतर आए थे. कैरो की सड़कें आंदोलनकारियों से भरी पड़ी थीं. विद्रोह का कारण था बढ़ी हुई बेरोजगारी, महंगाई, पुलिस की क्रूरता, भ्रष्टाचार, कल्याण योजनाओं के नाम पर छद्म, शासकों की विलासिता, लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता आदि. मिस्रवासी तीस वर्षों से सत्ता में बने तानाशाह हुस्नी मुबारक के शासन का अंत चाहते थे, जो अपने बाद मिस्र की गद्दी पर बेटे की ताजपोशी का ख्बाब देख रहे थे. सत्तापरिवर्तन से कम उन्हें कुछ भी स्वीकार न था. 20 अप्रैल को तानाशाह हुस्नी मुबारक के इशारे पर विद्रोह को बलपूर्वक कुचलने की जिम्मेदारी सेना पर डाल दी गई. सैनिकों ने बर्बरता का प्रदर्शन करते हुए निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीचार्ज कर दिया. गोलियां जानबूझकर सिर और छाती पर दागी गईं. तहरीर चौक की धरती खून से रंग गई. सेना की फायरिंग में 846 प्रदर्शनकारी मारे गए, 6000 से अधिक घायल हुए. इसके बावजूद तानाशाह का जनविद्रोह को कुचलने का ख्बाब पूरा न हो सका. हुस्नी मुबारक को सत्ता छोड़नी पड़ी. मिस्र की आग वहीं तक सीमित नहीं रही. जहांजहां शासन के नाम पर तानाशाही और जनमत की उपेक्षा थी, लोग विरोध करने सड़कों पर उतर आए. ट्यूनीशिया, बहरीन, यमन, लीबिया आदि अरब देशों में व्यापक जनविद्रोह हुआ. लीबिया में तो हालात गृहयुद्ध तक जा पहुंचे. वहां भी विद्रोह तानाशाह सरदार गद्दाफी की बेदखली के बाद ही ठंडा पड़ा. अलजीरिया, यमन, इराक, जोर्डन, मोरेक्को, कुवैत, ओमान के अलावा सउदी अरब, लेबनान, मोरिटेनिया, सुडान, पश्चिमी सहारा में भी जनविद्रोह ने असर दिखाया. परिणामस्वरूप यमन और ट्यूनीशिया की जनविरोधी सरकारों को भी धूल चाटनी पड़ी. सूडान का विभाजन हुआ और उसका दक्षिणी टुकड़ा छिटककर अलग हो गया. जनक्रांति ने लंबे समय से सत्ता शिखर पर बने आ रहे निरंकुश शासकों को उतार फेंका. बाकी देशों ने हवा का रुख परखते हुए प्रदर्शनकारियों को मनाने में ही भलाई समझी.

खास बात यह नहीं है कि यह सब, जिसकी पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की थीमहज एक वर्ष में घटा है. हुस्नी मुबारक और गद्दाफी की वर्षों से चली आ रही निरंकुश सत्ताओं का अंत हुआ है. विचारणीय मुद्दा है कि सुमेरी सभ्यता के देश मिस्र से लेकर अरब तथा यूरोप के देशों और चीन के हालिया विरोध प्रदर्शन के पीछे किसी बड़े नेता या विचारधारा का योगदान नहीं है. भारत में हालात उतने गंभीर भले न सही, परंतु अन्ना हजारे के नेतृत्व में यहां सरकार पर कारगर भ्रष्टाचारनिरोधी कानून बनाने का जिस प्रकार का दबाव है तथा जनलोकपाल समर्थक आंदोलन को जिस तरह का व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है, वह अनपेक्षित है. माक्र्स के अनुयायी कह सकते हैं कि इन क्रांतियों के मूल में माक्र्सवादी प्रेरणाएं हैं. कदाचित वे सही भी हो सकते हैं. अन्ना के आंदोलन के पीछे यद्यपि दक्षिणपंथी ताकतें हैं, तथापि जनबल द्वारा सत्ताबल को हिला देने का केंद्रीय विचार वामपंथ की ही देन है. जिन नागरिक आंदोलनों के दम पर ये क्रांतियां सफल हुई हैं या चल रही हैं, उनका वास्ता जनसाधारण की रोजमर्रा की समस्याओं से है. महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती आर्थिक असमानता, गरीबी और भविष्य को लेकर असुरक्षाबोध ने लोगों को एकजुट होने को प्रेरित किया है. इसको सफल बनाने में आधुनिक संचारक्रांति का योगदान सर्वाधिक है. फेसबुक, यू ट्यूब, गुगल आदि साइटों ने नागरिकों को एकदूसरे से संपर्क बनाने का अवसर दिया. इंटरनेट पर उपलब्ध सूचना सामग्री और बेशुमार ज्ञानसंपदा से यह बात भी उनकी समझ में आने लगी है कि उनकी दुरवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है. कहा जा सकता है कि लोगों को जोड़ने, और प्रेरित करने का जो कार्य नेताओं का था, वह इस बार तकनीक ने कर दिखाया है.

नेताओं के आगे विश्वसनीयता का संकट पैदा करने वाली तकनीक क्या सचमुच व्यक्तिनिरपेक्ष है? क्या इसके गलत संदर्भों में प्रयुक्त होने की संभावना ही नहीं, ऐसे कुछ सवाल भी इस आंदोलन से उपजे हैं? मिस्र, अरब, चीन, यूरोप से लेकर भारत की जनता द्वारा चलाए जा रहे परिवर्तनकामी आंदोलन उस मध्यवर्गीय युवा चेतना का सुफल हैं, जो शिक्षा और कार्यकुशलता के मामले में कहीं आगे है. उसका विश्वास है कि पूंजीवादी दबावों तथा सरकारों की काहिली के चलते उसको अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है. सवाल यह है कि बगैर केंद्रीय विचारधारा के क्या सचमुच कामयाब क्रांति संभव है? यदि ‘हां’ तो उसका भविष्य कैसा होगा? प्रसंगवश साठ के दशक की उन स्थापनाओं चर्चा आवश्यक है, जिनमें विचारधारा के अंत की बात कही गई थी. दूसरे विश्वयुद्ध में हिरोशिमा एवं नागाशाकी पर बमप्रहार से पूरी मनुष्यता आहत हुई थी. उधर जीत से बौराये अमेरिका के विश्वविद्यालयों में नई आलोचना का पाठ पढ़ाया जा रहा था. कहा जा रहा था कि नई कविता वह है जिसमें द्वंद्व हो, तनाव हो, मानवीय स्वभाव के समुद्वेलन भी हों, परंतु कवि अपना दृष्टिकोण, कोई विचार उसमें प्रस्तुत न करे. सकारात्मक बोध को प्रबंधन और प्रकारांतर में विकास का मूलमंत्र बताया जा रहा था. उन दिनों जान डेनियल बेल नामक एक अमेरिकी ने ‘विचारधारा का अंत’(एंड आ॓फ आइडियोला॓जी, 1960) नामक पुस्तक लिखकर खलबली मचा दी थी. इसी की तुक से तुक मिलाते हुए विद्वानों ने ‘इतिहास का अंत’, ‘साहित्य का अंत’ जैसी घोषणाएं बाद में कीं. उन ठेठ उपयोगितावादी मान्यताओं का उच्छिष्ट भारतीय परिवेश में ‘कला कला के लिए’ की यथास्थितिवादी अवधारणा के रूप में आया जो आज भी विद्यमान है. अतिकलावादी अवधारणा ने शास्त्रीय संगीत को अमीरों की संगत और चित्रकला को उनके ड्राइंगरूम तक सिमटा दिया है. इधर कुछ दशकों से विद्वान कहने लगे हैं कि गणतांत्रिक समाजवाद के रूप में मनुष्य अपनी मेधा के उच्चतम शिखर तक जा पहुंचा है. यहां से और ऊपर जाना संभव नहीं! क्या सचमुच ऐसा ही है? गणतांत्रिक समाजवाद यदि मानवीय मेधा का शिखरतम बिंदू है तो प्रकारांतर में क्या उससे नीचे आना ही मानव नियति है? क्या सच में परिवर्तन के लिए केंद्रीय विचारधारा अनावश्यक है?

विदेशी सत्ता से मुक्त होने के लिए एक सैद्धांतिक लड़ाई भारत ने भी अंग्रेजों से लड़ी थी. उसमें अहिंसा और सविनय अवज्ञा जैसे बड़े सैद्धांतिक विचार थे. और गांधीजी जैसा विराट व्यक्तित्व था. फिलहाल ऐसा कोई केंद्रीय विचार नहीं है. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के केंद्रीयनायक अन्ना हजारे स्वयं को गांधीवादी न कहकर गांधीकार्यकर्ता मानते हैं. उनका कहना है कि उनपर गांधी जी की शिक्षा का प्रभाव है, इसलिए अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व कर लेते हैं. वे स्वयं पर शिवाजी का प्रभाव भी मानते हैं और सही उद्देश्य के लिए हिंसा को भी अपनाने से नहीं चूकते. शराब छुड़ानी हो तो शराबी को पेड़ से बांधकर उसकी पिटाई करने से भी उन्हें गुरेज नहीं है. गांधीजी और शिवाजी दोनों ही हमारे राष्ट्रनायक हैं. लेकिन आत्मसम्मान वापस लाने के दोनों रास्ते जुदा थे. गांधी जी साध्य और साधन दोनों की पवित्रता पर जोर देते थे. शिवाजी ने उस समय तलवार उठाई जब मुगल सामंत आततायी बने थे. उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को एकत्रित कर, मराठा राज्य की स्थापना की. इतिहास में दोनों का स्थान महत्त्वपूर्ण है. शिवाजी के समय तक ‘सत्याग्रह’ और ‘सविनय अवज्ञा’ जैसे राजनीतिक विचारों का उदय भी नहीं हुआ था और कदाचित उनका समय भी नहीं था.

प्रश्न है कि एक लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के विरोध में क्या दोनों को साथसाथ साधा जा सकता है? मुझे लगता है कि नहीं. लोकतंत्र में आग्रह चलते हैं, जिदें नहीं. चाहे वे समूह की ही क्यों न हों. यदि ऐसा न हो तो लोकतंत्र बहुमत की ‘दादागिरी’ बनकर रह जाए, जबकि आदर्श लोकतंत्र में ‘अल्पमत’ को भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है, जितना ‘बहुमत’ को. अंतर सिर्फ इतना होता है कि वहां बहुमत के आधार पर चुने गए जनप्रतिनिधियों को शासन की जिम्मेदारी सौंपी जाती है. इस अपेक्षा के साथ कि बगैर किसी भेदभाव और दुराग्रहों के लोकतंत्र के जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाएंगे. अन्ना यदि वीर शिवा और गांधी जी दोनों को साधना चाहते हैं तो कहना होगा कि वे जनवादी उपकरणों का उपयोग अपनी जिद के लिए कर रहे हैं. उनके समर्थकों में ऐसे लोगों की संख्या भी काफी है जो आंख के बदले आंख और हाथ के बदले हाथ काट लेने को ही न्याय समझते हैं. जिनके लिए सरकारें डंडे के जोर से चलती हैं. आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा बेकार की चीजें हैं. ऐसे ही लोग अन्ना की बातों पर ताली बजाते हैं. उनके समर्थन में खिंचे चले आते हैं. इसके पीछे एक कारण आंदोलन की केंद्रीय विचारधारा का अभाव भी हो सकता है. वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार के लिए कोई ठोस विचार भी उनके पास नहीं है. जनलोकपाल आंदोलन नकार पर टिका हुआ है. जिसकों कांग्रेस विरोध तक सीमित कर राजनीतिक रंग दे दिया गया है, इससे उसकी धार कुंद हुई है. टीम अन्ना के एक सदस्य का कहना है कि अगले चरण में वे सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए पंचायती व्यवस्था में सुधार हेतु प्रयासरत होंगे. लेकिन भारतीय गांव आज भी जाति और आर्थिक स्तर पर बुरी तरह विभाजित हैं. समाज का रूप अर्धसामंती है. बिना सामाजिकआर्थिक समानता के क्या पंचायती राज्य का आदर्श ढांचा तैयार किया जा सकता है? अन्ना हजारे या टीम के पास ऐसे सवालों का कोई जवाब नहीं है. कदाचित वे इस फेर में भी हीं पड़ना चाहते.

ऐसे में अन्ना हजारे द्वारा स्वयं को सिर्फ गांधीकार्यकर्ता कहना क्या सच में उनकी विनम्रता है या आंदोलन के पीछे केंद्रीय विचारधारा की कमी को पाटने की कोशिश? अन्ना मंजे हुए नेता की तरह भाषण देते हैं. सरकार को चुनौती देने वाले अंदाज में संवाद करते हैं. शरद पंवार कांड पर पहले ‘सिर्फ एक’ कहकर चैंकते हैं, फिर अपने वक्तव्य का स्पष्टीकरण देते हैं. लेकिन जब लगता है कि सरकार प्रकरण पर चुप्पी साधे है, महंगाई के कारण बचाव की मुद्रा में है तथा महाराष्ट्र में पंवार का विरोध करना समर्थक राजनीतिक दलों को लाभ पहंुचा सकता है, तब वे एकाएक सामने आकर हमलावर का समर्थन करने लगते हैं. उस समय वे मंजे हुए राजनीतिक नेता की भांति व्यवहार करते हैं. आप कहेंगे कि मंजे हुए नेताओं की तो सरकार में भी कमी नहीं है. पक्षविपक्ष माइक उखाड़ू नेताओं से भरा पड़ा है. आखिर क्या कारण है जो कपिल सिब्बल जैसे वकृत्व कुशल नेता, अन्ना का विरोध करते हुए खलनायक मान लिए जाते हैं. दिग्विजय सिंह बोले तो जनता उन्हें बड़बोला कहकर नजरंदाज कर देती है. कांग्रेसी नेताओं के विरोध का पूरा फायदा अन्ना हजारे को मिलता है. युवाओं के दिल में उनकी लकदक खादी और भी चमक उठती है! यह सब हमारी आंखों देखते हो रहा है. पर इसलिए नहीं कि अन्ना नैतिकता के सर्वोच्च पायदान पर हैं या उनके पीछे कोई बड़ा विचार है. न इसलिए कि टीम अन्ना के सदस्यों में कोई चाणक्य या सुकरात आ घुसा है, जो विपक्ष के सभी तर्कों की काट रखता हो टीम अन्ना के सदस्य साधारण बुद्धिसंपन्न जुगाड़ू किस्म के लोग हैं. उन्हें तकनीक के साथसाथ विश्वभर के उन युवाओं का साथ भी मिला रहा है जो सोशल साइटों के माध्यम से संपर्क में रहते हैं.

दरअसल कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी जैसे कांग्रेसी नेता विपक्ष को दबाने के लिए अभी जिन हथियारों का प्रयोग करते आए हैं, वे अन्ना पर कारगर इसलिए नहीं हैं, क्योंकि वे दूसरे नेताओं की भांति ऊपर से थोपे हुए नहीं हैं. उन्हें युवाओं ने अपना नेतृत्व स्वेच्छापूर्वक सौंपा है. ऐसे लोगों ने उन्हें अपना मसीहा माना है, जो सरकार की वादाखिलाफी से तंग आ चुके हैं. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि गत पचाससाठ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जो पतन हुआ है, उसका सर्वाधिक नुकसान उस वर्ग को उठाना पड़ा है, जो नेताओं पर भरोसा करके मतदान करने घर से निकलता है, लेकिन सरकार बनते ही वादाखिलाफी और अवहेलना से तंग आकर अगले पांच वर्षों तक माथा पीटता रहता है. संसदीय लोकतंत्र में सरकारें चुनी जाने के पश्चात प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाई जाती हैं. जिनमें विपक्ष की भूमिका प्रतिस्पर्धी कंपनी की जितनी होती है. इसी वर्ग के लोग आहत मन से अन्ना के ओजस्वी भाषण पर ताली बजाते हैं. वादाखिलाफ नेताओं को सबक सिखाने के लिए वही उनके आंदोलन में शरीक भी होते हैं. उनकी संख्या भले मुट्ठीभर सही, लेकिन बहुदलीय लोकतंत्र में विभिन्न पार्टियों के बीच विभाजित मतदाताओं में उनकी उपस्थिति अन्ना और उनके समर्थकों का हौसला बनाए रखती है.

लोकतंत्र के नाम पर सरकार का छद्म जनता की समझ में पहले भी आता था. तब अपने गुस्से और नाराजगी को दिखाने का कोई माध्यम उसके पास नहीं था. नई संचारक्रांति ने यह संभव कर दिखाया है. इस क्रांति ने युवाओं को अभिव्यक्ति और संपर्क का जो अवसर दिया वह किसी भी प्रकार की मर्यादा या बंधन से परे है. इसने युवावर्ग को इतने आत्मविश्वास से लैस कर दिया है कि वह बदमिजाज सत्ताओं के दिमाग ठिकाने लगाने की सोचने लगा है. बढ़ती महंगाई और आर्थिक असमानता ने उनकी आंच को और भी हवा दी है. पूंजीवाद सरकार की भूमिका को सीमित कर चुका है. कुछ वर्ष पहले तक देखें तो सरकारें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि के लिए जिम्मेदार मानी जाती थीं. भारत में आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं का आधार भी यही कार्यक्रम रहे हैं. सरकार के पास पूंजी भले कम हो, व्यापारिक घाटे के बावजूद वह शिक्षा, स्वास्थ्य, बालकल्याण, सड़क, आवास आदि क्षेत्रों में जो कदम उठाती थी, उससे उसकी छवि कल्याणकारी राज्य की बनती थी. वही सरकार तथा उसके नेताओं को मानसम्मान भी प्रदान करती थी. धीरेधीरे सरकार ने इन दायित्वों से कन्नी काटना आरंभ कर दिया. रोजगार के अवसर समाप्त कर दफ्तरों को चलाने का काम नौकरशाही और ठेकेदारों के सुपुर्द किया जाने लगा. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अविवेकी व्यावसायीकरण हुआ तो आवास क्षेत्र पर भूमाफिया और दलाल हावी हैं. सरकार में जनप्रतिनिधियों से ज्यादा अंबानी और टाटा की चलती है. किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा करने के बजाय सरकार कारपोरेट जगत के नफानुकसान के बारे में सोचती है. दूसरे शब्दों वे सब कारण जो सरकार के लोककल्याणकारी और जनहितैषी होने की छवि विनिर्मित करते थे, खत्म हो चुके हैं. नेताओं का काम लोगों के दिल में पैठ बनाने के बजाय बूथ मेनेजमेंट तक सिमट चुका है. जनता के बीच अपनी छवि गंवा चुके नेतागण में संसद में भी अपनी गरिमा और मानमर्यादा भूलते जा रहे हैं. वे विपक्ष को तर्क से झुकाने के बजाय तेज बोलकर या संसद को ठप्प कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं. इसीलिए वे अन्ना के आगे आभाहीन और बेअसर हैं. न इसलिए कि अन्ना का नैतिक स्तर बहुत ऊंचा है. उजाड़ हो चुकी राजनीति और दागदार नेताओं के बीच अन्ना की सफेदी लोगों को बेदाग नजर आती है. फेसबुक, आदि संचार माध्यमों द्वारा अन्ना की जो छवि गढ़ी गई है, वह काम कर रही है. इससे पहले तक छवि निर्माण का काम ऊपर से होता आया है. अटलविहारी से लेकर सोनिया गांधी तक, सबकी छवि गढ़ने का काम मीडिया करता आया है. वह इस बार भी भूमिका में है, परंतु इस बार उसकी डोर सरकार के बजाय मध्यवर्गी युवाओं के हाथ है. पहली बार ऐसा हुआ है जब देश के मध्यवर्गी युवाओं ने अपना नायक स्वयं गढ़ा है. हालांकि उन्हीं का एक वर्ग ऐसा भी है जो अन्ना को मुखैटे की तरह इस्तेमाल कर अपने फासीवादी मंसूबे साधना चाहता है. बाकी का अन्ना प्रेम मिट्टी को भगवान मान लेने जैसी निष्ठा है. इससे अन्ना की छवि फिलहाल अधिक स्थायी दिखती है.

बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के चल रही इन क्रांतियों का भविष्य क्या है, विकल्प की तलाश में जूझ रहे समाजों के आगे बड़ा सवाल यह भी है. यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिन देशों में जनता के प्रयासों द्वारा सत्तापरिवर्तन संभव हुआ है, वहां के समाज राजनीतिक चरित्र में अभी तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है. गत फरवरी में मिस्र में हुए सत्तापरिवर्तन हुए चुनावों के बाद वहां धार्मिक उदारवादी दल की विजय हुई, दूसरा स्थान कट्टरपंथी विचारधारा वाले दल को मिला है. प्रशासन वहां अब भी सेना की हुक्मरानी से चलता है. इसी 20 दिसंबर को पुलिसिया दमन के विरोध में हजारों महिलाएं सड़क पर उतर आईं. यह 1919 में ब्रिटिश उपनिवेश के विरुद्ध हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सबसे बड़ा था. हालिया जनक्रांति में सक्रिय भूमिका निभा चुकी महिलाएं, सत्तापरिवर्तन के बावजूद अपने अपमान से आहत थीं. जनलोकपाल आंदोलन को देखते हुए मुझे चार्टिस्ट आंदोलन की याद आती है. उनीसवीं शताब्दी में इंग्लेंड में जनाधिकारों की मांग को लेकर एक ‘चार्टर’ बनाया गया था. जिसमें व्यापक मताधिकार, गुप्त मतदान समेत चुनाव सुधार संबंधी कुल छह मांगें रखी गई थीं. एक मुद्दा भ्रष्टाचार से मुक्ति लिए मजबूत कानून बनाना भी था. वह आंदोलन 1838 से 1859 तक चला था. अपनी मांगों के समर्थन में आंदोलनकारी पैंसठ लाख तक हस्ताक्षर कराने में सफल रहे थे. चार्टिस्ट आंदोलन अंततः ब्रिटिश सरकार की मनमानी के कारण बिखराव का शिकार हुआ. फिर भी आंदोलनकारी आम मताधिकार, चुनावों में हिस्सेदारी जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण अधिकार पाने में सफल रहे थे. इस कामयाबी के बावजूद समाज में आमूल परिवर्तन का शुभारंभ तभी संभव हो सका जब पू्रधों, बेकुइन, माक्र्स, ऐंग्लस, मिल आदि जनवादी विचारकों ने पूंजीवाद के चरित्र को बेनकाब करने के लिए अपनी दमदार कलम का इस्तेमाल किया. इससे मजदूर वर्ग संगठित हुआ. दोनों में अंतर है तो यही कि ‘चार्टिस्ट’ आंदोलन के पीछे था॓मस पेन, विलियम थांपसन, था॓मस स्पेंस, विलियम आ॓ग्लिव जैसे मानवाधिकारवादी विचारकों एवं अर्थशास्त्रियों की प्रेरणाएं थीं. लेखकोंसाहित्यकारों का बड़ा समूह उस आंदोलन के समर्थन में था. इसके साथसाथ उसमें समाज के बड़े वर्ग की साझेदारी थी. जबकि अन्ना हजारे अभी तक खास तबके के मध्यवर्गी युवाओं का ही समर्थन प्राप्त कर सके हैं. दूसरा वर्ग उन्हें संदेह की दृष्टि से देखता है. चूंकि अन्ना या उनकी टीम के स्तर पर दूसरे वर्ग से संवाद कायम करने की कोई गंभीर कोशिश नजर नहीं आती, ऐसे में इस आंदोलन का एक फासीवादी चेहरा आलोचकों को नजर आता आता है. इन कमियों के बावजूद लोकतंत्र में ऐसे आंदोलनों की प्रासंगिकता से इनकार नहीं किया जा सकता. अगर इतिहास पर भरोसा करें तो अन्ना की विचारहीन क्रांति को एक प्रतिबद्ध वैचारिक आंदोलन का पूर्वाभास माना जा सकता है. वही इसका वास्तविक अभीष्ट होगा. लेकिन उसके लिए सर्वसाधारण के समर्थन और वैकल्पिक चिंतन की जरूरत होगी, जिसका वर्तमान आंदोलन में अभाव बना हुआ है.

ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

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5 comments on “विचारहीन क्रांतियों का भविष्य

  1. शानदार! ऐसी दृष्टि! बहुत कुछ कहा गया है यहाँ। सोचने-जानने-समझने लायक कई बातें। बहुत धन्यवाद आपका।

  2. सामायिक ….बेहतरीन आलेख.

  3. आपने सही प्रश्‍न उठाया है कि विचारहीन क्रान्तियों का भविष्‍य क्‍या होने वाला है। शुरू में ही यह स्‍पष्‍ट कर देना ठीक होगा कि मिस्र और अरब विश्‍व में जो हो रहा है उसकी तुलना भारत में अण्‍णा के आंदोलन से नहीं की जा सकती। मिस्र की जनता इतिहास का एक छूटा हुआ कार्यभार पूरा कर रही है जो कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण उस क्षेत्र में संपन्‍न नहीं हो पाया था। निश्‍चय ही मिस्री जनता का विद्रोह रेडिकल तेवर लिए हुए है और उसने लोगों की शक्ति को निर्बंध किया है और वह काफी हद तक व्‍यवस्‍था परिवर्तन की लड़ाई है और उम्‍मीद यही है कि आने वाले काफी समय तक वहां अफरातफरी की स्थिति रहेगी। भारत में अण्‍णा का आंदोलन व्‍यवस्‍था में पैबंदसाजी की लड़ाई है और इस‍ मायने में इसका एक प्रतिक्रियावादी चरित्र भी है और वह यह है कि इसने व्‍यवस्‍था के मूलभूत चरित्र को बदलने के लिए संघर्ष करने के बजाय लोगों को गुमराह किया है कि केवल भ्रष्‍टाचार मिटा देने से सब समस्‍या हल हो जाएगी। वैसे यह कोई नई बात नहीं है हर व्‍यवस्‍था अपने भीतर से समय-समय पर ऐसे लोगों को पैदा करती रहती है जो ऊपर से रैडिकल लगते हैं लेकिन जो लड़ाई को एक खास चौहद्दी से बाहर नहीं जाने देते। विकल्‍प के अभाव में जनता कुछ हद तक उनके पीछे आती भी है क्‍योंकि जनता के पास लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। खासकर ऐसी स्थिति में जबकि रेडिकल बदलाव वाली ताकतें तैयार न हों तो जनता बैठकर नायकों का इंतजार नहीं करती रहेगी वो समय-समय पर स्‍वत:स्‍फूर्त विद्रोह करती रहेगी। आपको बहुत धन्‍यवाद कि आपने यह प्रश्‍न उठाया और इसका कोई श्‍योर शॉट रास्‍ता नहीं है। अण्‍णा के आंदोलन को जिस मध्‍यवर्गीय युवा जमात ने समर्थन दिया था, ऐसा नहीं हो सकता कि उसका एक छोटा सा हिस्‍सा भी व्‍यवस्‍था परिवर्तन की बात न सोचे। इसलिए उम्‍मीद तो यही है कि एकबार जिन युवाओं ने दिमाग खोलकर सोचना शुरू कर दिया है तो वे आधे-अधूरे बदलावों और सुधारों को क्रान्ति मानकर संतुष्‍ट नहीं हो जाएंगे, वे भगतसिंह के सपने के बारे में भी जरूर सोचेंगे। और एक बार जिसने व्‍यवस्‍था परिवर्तन की बात सोचनी शुरू कर दी तो उसे विचार और विचारधारा से जुड़ना पड़ेगा। जिन्‍हें वर्तमान व्‍यवस्‍था में ही पैबंदसाजी करनी है उन्‍हें विचार की जरूरत नहीं है लेकिन जिन्‍हें आमूलचूल बदलाव करने हैं और ढांचे को नए सिरे से खड़ा करना है उसे विचार की आवश्‍यकता जरूर पड़ेगी।

    • जजय भाई, लंबी और सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए मैं आभारी हूं. आपका कहना एकदम सही है कि मिस्र की क्रांति और भारत में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन की सीधी तुलना संभव नहीं है. मिस्र ने जो सफलता हिंसा के रास्ते प्राप्त की है, भारत उसको 64 वर्ष वहले अहिंसक क्रांति द्वारा पा चुका है. मेरी तुलना का आधार दोनों के पीछे स्पष्ट विचारधारा का अभाव है. मिस्र के चुनावों में धार्मिक उदार और कट्टरपंथी क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर रहे हैं. अब लोकप्रिय राजनीति की मजबूरियों को ध्यान में रखते हुए अगले पांच—दस वर्षों की कल्पना कर लीजिए. सत्ता में बने रहने के लिए जो उदार है, दूसरे वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए वह अपने धार्मिक आग्रहों को मजबूत दिखाने की कोशिश करेगा, जबकि कट्टरपंथी उदारता का चोला धारण कर मतदाताओं की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास करेगा. कोई भी दल यह कोशिश नहीं करेगा कि लोगों के जनतांत्रिक सोच में सुधार लाया जाए. कुछ ऐसा ही भारत में भी घटा था. आजादी के समय हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने कल्पना की थी कि स्वराज्य आते ही स्थितियां अपने आप बदल जाएंगी. यही सोचते हुए गांधीजी ने कांग्रेस को भंग कर देने का सुझाव दिया था. पर उनकी बात अनसुनी कर दी गई. अन्ना कानून के जरिये भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं. इसपर मुझे किसी विचारक की वर्षों पहले पढ़ी ये पंक्तियां अनायास याद आ जाती हैं, उसने कहा था कि दुनिया के सारे कानून बेकार हैं. क्योंकि भले आदमी को उनकी आवश्यकता नहीं पड़ती और बुरे को उससे सुधारा नहीं जा सकता. यह सोच शायद कुछ परंपरावादी लगे, परंतु मेरा मानना है कि बिना सार्वजनिक नैतिकता के राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण असंभव है. सफल लोकतंत्र के लिए अच्छी नेता ही नहीं जागरूक जनता भी चाहिए. नमस्कार….

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