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दंश : तैइसवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

जमींदारी समाप्त हो चुकी थी. मगर पूंजी के साथ नए किस्म का सामंतवाद अपनी जगह बना रहा था. विल्मोर का कारोबार बड़ी तेजी से जम रहा था. केवल चार साल के छोटे से अंतराल में कंपनी की सालाना बिक्री दो गुनी हो चुकी थी. कंपनी को अपने नए कारखाने के लिए जमीन की आवश्यकता थी. ब्रजरतन सिंह पर मालिकों को अब भी पूरा भरोसा था. वे जानते थे कि वह जमीन का इंतजाम कर ही देगा. और हुआ भी यही. ब्रजरतन सिंह जमीन बेचने को तैयार हो गया. उसके पिता ने सुना तो फौरन बुलवा भेजा—

‘पुरखों के समय की यही थोड़ी-सी जायदाद बाकी है. उसको बेचना ठीक न होगा. फिलहाल तुम उन्हें मना कर दो.’ चारपाई पर लेटे हुए बीमार बाप ने सलाह दी.

‘क्यों?’

‘विल्मोर का विरोध बढ़ता ही जा रहा है. खबर मिली है कि लोग शराब के कारखाने के विरोध में एकजुट हो रहे हैं. इस बार विरोध पहले से कहीं बड़ा होने की संभावना है.’

‘लोगों को जितना मैं जानता हूं उससे कहीं अधिक आप जानते है. हर नई चीज का विरोध करना उनकी फितरत है.’

‘तुम्हें शायद पूरी बात मालूम नहीं. अखबारों में कंपनी के विरोध में लगातार लिखा जा रहा है. पिछले चार सालों में ही यहां पर शराब की खपत तीन गुनी बढ़ चुकी है. इससे आपसी रंजिश, घरेलू झगड़ों के मामले भी बढ़े हैं. घर बिखरने की खबरें भी इधर कई आई हैं. अकेले इसी जिले में पिछले वर्ष सौ से ज्यादा मुकदमे केवल तलाक की खातिर दाखिल किए गए हैं.’

‘जानता हूं….इसीलिए विल्मोर की ओर से एक अखबार निकाले जाने की योजना बन रही है.’

‘कंपनी अखबार निकालेगी?’

‘इसमें हैरानी की क्या बात है. जब वे लोग कंपनी को बदनाम करने के लिए अखबार निकाल सकते हैं, तो कंपनी के पास इतना रुपया तो है कि अपने विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दे सके. धंधे के लिए आखिर क्या नहीं करना पड़ता.’ विट्ठल ने मंजे हुए व्यवसायी की तरह जवाब दिया.

गजरतन सिंह का हालांकि पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था. परंतु वे उस दौर के आदमी थे जब पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में देखा जाता था. पत्रकारों की जमात में बहुत ही इज्जत थी. महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, लोकमान्य तिलक, डाॅ. भीमराव आंबेडकर का लिखा उन्होंने स्वयं भले ही न पढ़ा हो, मगर उसके बारे सुना वे अक्सर करते थे. जिसको लेकर उनके मन में बहुत ही सम्मान था. अतः पत्रकारिता के व्यावसायिक इस्तेमाल के बारे में तो वे सोच भी नहीं सकते थे. ऐसी स्थिति में विल्मोर द्वारा अखबार निकाले जाने की योजना पर उनका चैकना स्वाभाविक ही था.

‘अखबार का धंधे से क्या संबंध?’

‘वही जो कंपनी का मुनाफा देने वाली दूसरी चीजों से है.’ विट्ठल ने हंसकर बताया, ‘हम अपने अखबार के माध्यम से लोगों को बताएंगे कि कारखाने के जरिए लोगों का कितना भला हुआ है. सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला है. इलाके का विकास हुआ है. शराब तो पहले भी पी जाती थी. लेकिन उन दिनों वह घरों में कच्ची काढ़ी जाती थी. इस कारण उसके सही आंकड़े मौजूद नहीं हैं. पर इतना तय है कि अनगढ़ तरीके से बनी शराब मशीनों द्वारा साफ की गई शराब से कहीं अधिक खतरनाक थी. कंपनी के कारण लोगों को अब अच्छी किस्म की शराब मिल जाती है. जिससे घटिया शराब पीने से होने वाली मौते कम हुई हैं. ऊपर से कंपनी एक डिसपेंसरी भी चलाती है. जिसका लाभ कंपनी के कर्मचारियों के अतिरिक्त गांववाले भी उठाते हैं.’

‘लगातार बढ़ती रंजिशों तथा तलाक के बढ़ते मामलों पर तुम क्या सफाई दोगे?’

‘यही कि कंपनी के आने से लोग जागरूक हुए हैं. पहले लोग थाने और पुलिस के नाम से घबराते थे. औरतें जुर्म सहकर भी घर में पड़ी रहती थीं. अब वह बात नहीं रही. लोग विरोध करना सीख रहे हैं.’

‘तुम्हें लगता है कि लोग तुम्हारे झूठ पर विश्वास कर लेगें?’

‘क्यों नहीं. इसके अलावा उनके पास रास्ता भी क्या है.’ विट्ठल ने भरे आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘हमारे साथ भी पके-पकाए बुद्धिजीवियों एक टीम है. वे तलाक के मामलों को बहुत आसानी से स्त्री-चेतना और उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ देंगे. गांव के आपसी झगड़ों की व्याख्या सामाजिक न्याय के लिए होने वाले संघर्ष के रूप में की जाएगी.’

गजरतन सिंह समझ ही नहीं पाए कि क्या उत्तर दें. बेटा जिन शब्दों का प्रयोग कर रहा था वे उन्होंने पहली बार तो नहीं, लेकिन बहुत कम सुने थे. इस कारण आश्चर्य भी था और जमाने के इतनी तेजी से बदलने पर हैरानी भी. उन्हें याद आया कि शराब का कारखाना लगाने से पहले कंपनी ने वहां चीनी का कारखाना लगाने के लिए लाइसेंस लिया था. पहले-पहल जमीन भी चीनी का कारखाना लगाने के लिए खरीदी गई थी. इलाके में गन्ने की पैदावार बहुतायत से थी. इस कारण चीनी मिल पहले भी कई चल रहे थे. मगर विल्मोर द्वारा दूसरे कारखानों से कई गुना अधिक जमीन खरीदने पर उन्हें आश्चर्य जरूर हुआ था. यही नहीं जब कंपनी ने किसानों को आॅफर दिया कि वे खूब गन्ना उपजाएं तो उन्हें भी लगा था कि अब इलाके की कायापलट होने के दिन आ ही गए है.

कंपनी की ओर से गन्ने का बीज नाकुछ कीमत पर बांटा गया था. जिससे किसानों ने खुलकर गन्ने की खेती में हाथ आजमाए. पहले वर्ष खूब पैदावार हुए. किसानों के चेहरे खिल गए. मगर चैथे साल ही मिट्टी पर भुरभुरापन साफ नजर आने लगा. इससे घबराकर उन्होंने दूसरी फसल की बुवाई की. लेकिन उपज उम्मीद से काफी कम रही. गरीब और अनपढ़ किसानों को समझाने वाला, उनकी समस्या पर विचार करने वाला कोई नहीं था. उन्हें हालात से समझौता करना ही पड़ा. वे उधार लेकर भी गन्ने की बुवाई करने को मजबूर हो गए.

किसी अखबार में उन दिनों छपा भी था कि कंपनी जो बीज किसानों को देती है वे भारतीय जलवायु के अनुसार ठीक नहीं हैं. उनके उपयोग से जल-स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है. इस रिपोर्ट की कुछ दिनों तक खूब चर्चा रही. संसद तक में हंगामा हुआ. सरकार ने एक जांच समिति भी बनाई. उसके बाद क्या हुआ, कोई नहीं जानता. शायद सरकार भी नहीं.

चीनी कारखाने के नाम पर खरीदी गई जमीन पर विल्मोर ने साथ ही साथ शराब के कारखाने का निर्माण भी शुरू कर दिया था. मामला फिर चर्चा में आया तो कंपनी ने यह कहकर कि वह अपनी अधिकांश शराब का निर्यात करेगी, मामले को घुमाने की चेष्टा की. उस समय विदेशी मुद्रा के प्रति देश में पनप रहे लालच ने कंपनी की सारी आलोचनाओं पर पानी डाल दिया. उत्पादन आरंभ होते ही विवाह, उत्सव तथा विभिन्न किस्म के कोटे के माध्यम से शराब की स्थानीय खपत को बढ़ावा दिया जाने लगा. कंपनी का उत्पादन लगातार बढ़ता गया. साथ में उसका मुनाफा भी. उत्पादन बढ़ाने के लिए आसपास के चीनी कारखानों से निकले शीरे का उपयोग भी शराब बनाने के लिए किया जाने लगा.

और अब सात वर्ष के भीतर ही दूसरे शराब कारखाने का निर्माण….गांधी और विनोबा के देश का यह हाल. सोचते हुए गजरतन सिंह ने गहरी सांस ली. परंतु ऐसे अफसोस से आखिर हो भी क्या सकता था. नए कारखाने के लिए जमीन देने का भरोसा विट्ठल दे ही चुका था. बदले में कंपनी की ओर से भरोसा दिलाया गया था कि ठेकेदारी के अतिरिक्त अखबार के मालिकों में विट्ठल का भी नाम जाएगा. बल्कि उसी के हाथ में अखबार का सारा काम रहेगा. कंपनी तो हर अंक में सिर्फ एक विज्ञापन देगी, जिससे अखबार का सारा खर्च निकल जाया करेगा.

‘रोज शराब का विज्ञापन देखकर तो लोग अखबार से मुंह मोड़ने लगेंगे.’ विट्ठल ने शंका व्यक्त की.

‘घबराओ मत! विज्ञापन देने के और भी बहाने हैं!’

‘मतलब?’ साधारण बुद्धि विट्ठल कुछ समझ न सका.

‘आपसी भाई-चारा, देश-प्रेम, सांप्रदायिक सद्भाव, साक्षरता, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दांे पर छपे विज्ञापन तो लोग पसंद करेंगे ही. कंपनी अपने अखबार में शराब का एक भी विज्ञापन नहीं जाने देगी.’ विट्ठल को भरोसा दिलाया गया. जैसे पहले से ही सबकुछ तय हो.

विट्ठल और अखबार….पढ़ाई के नाम से ही दूर भागने वाले, बामुश्किल सात जमात पढ़े विट्ठल को अखबार का प्रभारी बनाया जाने वाला है, यह बात भी कम चांैकाने वाली नहीं थी. पर जैसा कि वक्त था, जिस तरह की अनहोनी वे अब तक देखते आ रहे थे, एक मामूली-सी दिखने वाली कंपनी देखते ही देखते कैसे अपने पांव फैलाती जा रही थी. ऐसे बहुत से मसले थे जो उन्हें चैंकाते आ रहे थे. और अब तो सब कुछ जैसे सामान्य सा लगने लगा था.

और जब लगने लगे कि सबकुछ आसान होता जा रहा है, तब यह मान लेना चाहिए कि सभी कुछ गड़बड़ा रहा है.

सच में ही बहुत कुछ गड़बड़ा रहा था.

विल्मोर! यानी विल-मोर अर्थात अधिकाधिक कामनाएं….मतलब उफनती हुई इच्छाएं….यानी अधिकाधिक उपभोग….भोग ही भोग….यानी वर्तमान से असंतोष….निरंतर बढ़ती जातीं मर्यादाहीन चाहतें, नैतिकता और न्याय को त्यागकर सबकुछ अपने लिए समेट लेने, हड़प लेने की नीति—यही रहस्य था कंपनी के नामकरण का. यही संदेश वह देना चाहती थी, दे ही रही थी. अखबार शुरू होतो ही कंपनी के जरखरीद बुद्धिजीवियों ने अरस्तु द्वारा मनुष्य की दी गई सर्वसम्मत परिभाषा के साथ मखौल किया था. उसको तोड़-फोड़कर अपने स्वार्थ के लिए उसका दुरुपयोग करते हुए उन्होंने गढ़ा था कि—

‘मनुष्य उपभोगशील प्राणी है. हम उपभोग को सलीकेदार बनाने में मदद करते हैं.’

यह अखबार के मुख्य पृष्ठ पर एक आप्तवाक्य के रूप में छापा जाता था. उसका विमोचन भी कंपनी के प्रांगण में ही हुआ था. जिसमंे राजधानी तक की राजनीतिक हस्तियां पधारी थीं. तभी लोगों ने जाना कि दुनिया की चंद बड़ी कंपनियों में से एक है—विल्मोर! प्रायः सभी देशों में उसके कारखाने, विस्तृत नेटवर्क है. लाखों कामगारों के बल पर कंपनी हर साल खरबों डालर की कमाई करती है.

कमाई में निरंतर इजाफा करने के लिए कंपनी के पास तेजतर्रार अधिकारी थे. इरादों के पक्के और भरोसेमंद. व्यावसायिक स्पर्धा में जिन्हें आनंद आता. चुनौतियों से निपटने में वे पारंगत थे. लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे हर प्रकार की दाव आजमाने में माहिर थे. साम-दाम-दंड-भेद सभी नीतियां उन्हें भाती. उनकी नजरों में रुपया भगवान था. उसको कमाना पूजा. रास्ता चाहे जो हो, रुपया जिस रास्ते से अघिक आए वही उन्हें प्यारा था.

हेमंत बनर्जी, यही नाम था विल्मोर के स्थानीय प्रभारी का. लंदन में पले-बढ़े और विदेशी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त बनर्जी के बारे में विख्यात था कि उसका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज दौड़ता है. बशर्ते उसके किसी निर्णय से कमाई होती हो. उम्र केवल पैंतीस साल थी. लेकिन महत्त्वाकांक्षाएं कूट-कूट कर भरी थीं. उसने शुरुआत तो मामूली क्लर्क के रूप में की थी. किंतु बहुत जल्दी उसने जता दिया कि वह उन लोगों में से नहीं जो दूसरों के आदेश के बिना एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकते.

उसमें निर्णय लेने का गजब का साहस था. यहां तक कि बदनामी और नुकसान का खतरा उठाकर भी वह रिस्क ले सकता था. उसने कई ऐसे काम किए थे जिनके बारे में फैसला लेने में बड़े-बड़े भी हिचकिचा जाएं. लेकिन अपनी सूझ-बूझ से उसे कामयाबी लगातार मिलती गई. जिससे वह मैनेजमेंट की निगाह में निरंतर ऊपर चढ़ता चला गया. हिंदुतान में जब कंपनी ने अपना शराब कारखाना लगाने का फैसला किया तो कंपनी-बोर्ड के सभी सदस्यों ने एकमत से हेमांग का ही समर्थन किया.

कुछ ही वर्षों में हेमांग ने दिखा दिया कि उनका निर्णय गलत नहीं था. कंपनी पांच वर्षों में ही यदि दूसरा कारखाना लगाने की हालत में थी तो उसके पीछे निश्चय ही हेमांग की कड़ी मेहनत और दूरंदेशी थी. यह अप्रतिम रूप से मेधावी हेमांग का ही कमाल था कि अपने व्यावसायिक कौशल से उसने न केवल कंपनी के लाभ-स्तर को बनाए रखा था बल्कि आलोचनाओं से भी उसकी रक्षा की थी. इसलिए जब हेमांग ने कंपनी डायरेक्टरों के सामने अखबार निकालने की योजना रखी तो बिना किसी प्रतिरोध के उन्होंने उसको स्वीकार कर लिया. यही नहीं योजना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने हेमांग के कंधों पर डाल दी. अखबार निकालने के पीछे हेमांग का सोच था कि विल्मोर के विरुद्ध बनते माहौल से निपटने केे लिए अपना कोई सशक्त मंच हो. जिससे जनमानस तैयार किया जा सके. विरोधियों को जवाब दिया जा सके.

उसने अखबार के संपादक के लिए विज्ञापन निकाले. ऊंचे वेतन और सुविधाओं का प्रलोभन दिया. परंतु विल्मोर की कुख्याति के कारण जमे-जमाए संपादकों में से एक भी उसके अखबार की जिम्मेदारी संभालने को सहमत न हुआ. तब उसे विट्ठल की सुध आई और उसने एक चांस लेना ही उचित समझा. इस तरह का रिस्क लेने के लिए वह पहले से ही जाना जाता था. उसका सोच था कि विट्ठल के नेतृत्व में एक संपादक मंडल का गठन करना. ताकि उसके माध्यम से अखबार को मनमाना रूप दिया जा सकता है. बाद में यदि किसी कारण अखबार की बदनामी होती है, तो उससे भी विल्मोर को दूर रखा जा सकेगा.

विट्ठल को संपादक बनाने का विल्मोर को एक लाभ यह भी हुआ कि दूसरे कारखाने के अच्छी जमीन बिना किसी खास प्रयास के और कम दामों पर मिल गई. जिसके लिए उसकी खूब प्रशंसा भी हुई.

ईंटों का भट्टा….ठेकेदारी और अब संपादकी. इन सब कार्यों से विट्ठल की छवि एक उद्यमी के रूप में स्थापित हो चुकी थी. जिससे नए लोगों के साथ उसका संपर्क बना. संपर्क का दायरा तो उसके पिता गजरतन सिंह का भी था. जमींदारी के चवालीस गांवों में उनका सिक्का चलता था. पंचायत में उनका फैसला अंतिम माना जाता था. मगर विट्ठल के संपर्क का दायरा बड़ा था. वे नए जमाने के लोग थे, जिनके व्यवसाय अनेक क्षेत्रों में फैले हुए थे.

इन्हीं संपर्कों का एक लाभ यह भी हुआ कि मध्यावधि चुनावों के दौरान कांग्रेस उसे टिकट देने को तैयार हो गई. वह भी राजनीति में जोर आजमाइश करने का मन बना चुका था. उसका विचार था कि विल्मोर को भी अपने भरोसे के आदमियों की राजनीति में जरूरत है, जो सरकार के साथ रहकर उसके हितों की पैरवी कर सकें. लेकिन हेमांग बनर्जी को जैसे ही उसकी इच्छा के बारे में जानकारी मिली, उसने चुनाव से हट जाने की सलाह दी. विट्ठल समझ नहीं पाया कि उसे इससे कंपनी का कौन-सा हित सध सकता है—

‘अब तो पार्टी हाई कमान भी मेरे नाम पर अपनी मुहर लगा चुका है. ऐसी स्थिति में चुनाव से हटने का परिणाम होगा, कांग्रेस के बड़े नेताओं में अपनी छवि खराब कर लेना.’ विट्ठल ने हेमांग के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा.

‘जानता हूं, लेकिन यही तो अवसर है, जब आप उनके सामने अपनी हैसियत का प्रदर्शन कर सकते हैं.’

‘मैं समझा नहीं….!’ विट्ठल सचमुच दुविधा में था.

‘पिछली विधानसभा अपने दो वर्ष भी पूरे नहीं कर पाई, बीच ही में राजनीतिक उठा-पटक की शिकार हो गई. नई विधानसभा पांच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा करेगी, यह भी पक्का नहीं है. दूसरे प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की हालत को देखते हुए एक तो जीत पक्की नहीं है, जीत भी गए तो चंद विधायकों के रहते लालबत्ती की गाड़ी से ज्यादा कुछ हासिल कर सकोगे इसमें भी संदेह है.’

‘फिर?’

‘तुम्हारे पीछे हटने पर टिकट की दावेदारी किसकी होगी?’

‘पिछला चुनाव हार चुके महादेव पंडित की….!’

‘वही महादेव पंडित जो इस इलाके से दो बार विधायक रह चुके हैं?’ हेमांग ने पूछा. कुछ ऐसे अंदाज में जैसे जानता सब हो, विट्ठल से केवल हामी भरवाना चाहता हो.

‘हां….इस बार भी उन्हीं का टिकट पक्का था. बड़ी कोशिश के बाद हाईकमान उनका टिकट काटकर मेरे नाम पर राजी हुआ है.’ विट्ठल के स्वर में वेदना थी. हेमांग बनर्जी का हस्तक्षेप उसको दुःख पहंुचा रहा था.

‘तब तो और भी अच्छा हुआ. हेमांग बनर्जी ने कहा, ‘तुम्हारे पीछे हटने पर टिकट सीधे महादेव पंडित के पक्ष में जाएगा. अगर वे जीते तो तुम्हारे एहसानमंद रहेंगे. तीन महीने बाद ही प्रदेश से राज्यसभा की दो सीटें भरी जानी हैं. उस समय तुम्हारा दावा मजबूत होगा. सोच लो, साल-दो-साल की विधायकी चाहिए या छह वर्ष तक राज्यसभा की सदस्यता?’

दरअसल हेमांग बनर्जी नहीं चाहता था कि विट्ठल किसी पार्टी से जुड़े. लोग उसको विल्मोर का करीबी मानते थे. और यह सच भी था. ऐसे में विट्ठल के किसी एक पार्टी से जुड़ने का मतलब था, कंपनी पर किसी पार्टी विशेष की समर्थक होने की मुहर लगा लेना. जबकि दूरगामी सफलता के लिए राजनीतिक तटस्थता की नीति पर अमल करना अत्यावश्यक था. उसका मानना था कि विट्ठल राज्यसभा में रहकर कंपनी के लिए ज्यादा लाभप्रद हो सकता है.

विट्ठल को उम्मीदवारी से कदम वापस लेने के पीछे हेमांग का महादेव पंडित को दिया गया वचन भी था. यह सब अंदर की बातें हैं, जिनकी विट्ठल तक को खबर नहीं थी. दरअसल जैसे ही महादेव पंडित को यह भनक लगी कि इस बार पार्टी हाईकमान उनका टिकट काटकर विट्ठल को देने की योजना बना रहा है, वह तत्काल हेमांग बनर्जी से मिला था. हेमांग ने तब मदद करने का आश्वासन दिया था. महादेव को उपकृत करके हेमांग ने कंपनी का एक हितैषी और पैदा कर लिया था. विट्ठल तो था ही.

हेमांग बनर्जी की रणनीति कामयाब हुई. राज्यसभा की सदस्यता मिलने की उत्सुकता में विट्ठल नाम वापस लेने के साथ-साथ चुनावों में महादेव पंडित की मदद करने को भी तैयार हो गया. इससे चुनाव के समीकरण महादेव पंडित के पक्ष में आ गए. महादेव पंडित ने भी अपना वचन निभाया. जीतने के साथ ही उसने राज्यसभा की सीट के लिए विट्ठल के पक्ष में जोरदार अभियान चलाकर उसकी दावेदारी को पक्का कर दिया.

राजनीति और व्यापार दोनों मोर्चों पर मिल रही अप्रत्याशित सफलता ने विट्ठल को दंभी बना दिया था. इस बीच बूढ़े और कमजोर हो चले गजरतन सिंह को अचानक पक्षाघात हुआ. सुबह-सुबह विट्ठल की घरवाली जब ससुर को रोटियां पहंुचाने पहुंची तो उन्हें चारपाई पर ओंधे मुंह लेटे देखकर वह बुरी तरह घबरा गई. आनन-फानन में विट्ठल को बुलाया गया. डाॅक्टर और वैद्य भी आए. मगर तन के रोग से मन का रोग कहीं ज्यादा गहरा था.

रात-दिन की देखभाल, डाॅक्टर और हकीमों की फौज के बावजदू गजरतन सिंह का स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया. विट्ठल उन दिनों बहुत व्यस्त हो चला था. हर रोज आने-जाने वालों की भीड़, अखबार काम तथा राजनीति का गोरखधंधा ऐसे मामले थे, जिनसे उसका बचाव ही नहीं था. इस कारण वह पिता की देखभाल के लिए भी समय निकालने में असमर्थ रहा.

हवेली के सामने खाली पड़ी पंचायती चैपाल को बैठक का रूप गजरतन सिंह ने ही दिया था. ताकि सुबह-शाम मिलने आए लोगों के साथ खुलकर बातें की जा सकें. बीमार होने तक उनका पलंग उसी बैठक में रहा. विट्ठल ने अपने मिलने-जुलने वालों के लिए हवेली के दालान में जगह बनाई हुई थी. लेकिन राज्यसभा का सदस्य बनने के साथ ही उससे मिलने को आने वाले लोगों की संख्या कई गुना बढ़ गई. हवेली की बैठक छोटी पड़ने लगी. अंततः स्थिति से निपटने के लिए बीमार और अशक्त गजरतन सिंह के पलंग को हवेली के बगल में बने छोटे कमरे में पहुंचा दिया गया.

बुढ़ापे और बीमारी की भांति गजरतन सिंह ने उस विस्थापन को भी स्वीकार कर लिया. किसी जमाने में अपनी ताकत से इलाके-भर पर छाप छोड़ने वाले गजरतन सिंह, ताकत जाते ही उसकी मनमानी के शिकार होकर एक कमरे में जीवन की बाकी सांसे गिनने को विवश कर दिए गए.

ताकत का धर्म कमजोर को सहारा देना है. लेकिन प्रायः वह अपना उपयोग कमजोर को अपदस्थ करने के लिए करती है.

दूसरा शराब कारखाना चलते ही कच्चे माल के लिए शीरे की जरूरत और भी बढ़ गई. कंपनी अभी तक आसपास की मिलों से शीरा खरीदकर उसको शराब में बदलती थी. खपत बढ़ने से उसकी सप्लाई कम पड़ने लगी. दूसरे विल्मोर की जरूरत को देखते हुए बाकी मिलों ने अपने शीरे के दाम बढ़ा दिए थे. वे दूसरे राज्यों में शीरे की बिक्री कर रहे थे, जहां अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिल जाते थे. इससे विल्मोर को शराब की कीमतें स्थिर रखने में परेशानी हो रही थी.

कंपनी द्वारा बनाई गई शराब का बड़ा हिस्सा निर्यात होता था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डाॅलर की गिरती कीमतों ने भी कंपनी के लिए समस्याएं खड़ी की थीं. कंपनी के सामने मूल्यवृद्धि या मुनाफे से समझौता, सिर्फ दो ही रास्ते थे. मूल्यवृद्धि के बाद स्पर्धा में बने रहना कठिन था. मुनाफे में गिरावट आने पर कंपनी के मालिक नाराज हो सकते थे. हेमांग दोनों की स्थितियों से बचना चाहता था. सरकार द्वारा नई अर्थनीतियों के अंतर्गत विदेशी शराब के आयात को अनुमति दिए जाने के बाद बाजार में स्पर्धा पहले ही बहुत बढ़ चुकी थी. और मूल्यवृद्धि का अभिप्राय था, स्पर्धा से बिलकुल बाहर हो जाना. किंतु हेमांग इतनी जल्दी हार मानने वालों में से न था. कुछ सोचते हुए उसने विदेशों को निर्यात की जाने वाली शराब की कुछ पेटियां गाड़ी में लदवाने को कहा और महादेव पंडित से मिलने के लिए चल दिया—

‘आइए, कैसे आना हुआ जनाब! हमें ही इजाजत दे देते, दौड़े चले आते.’

‘आप से मिलने की उत्कंठा में ही यह उतावली हो गई. क्या करूं!’ कहते हुए हेमांग ने नौकर को इशारा किया. वह शराब की पेटियां उतरवाने लगा.

‘यह सब किसलिए?’

‘अब आप राजधानी में रहते हैं, विल्मोर की खुशबू तो चख ही नहीं पाते होंगे. इसलिए मैंने सोचा कि….’

‘विल्मोर की गंध तो हमारे रोम-रोम में समाई हुई है. कुछ न पिएं, न चखें तो भी उसका एहसास हर पल बना रहता है.’

‘यह तो आपका बड़प्पन है. फिर भी हमने सोचा कि कुछ नए टेस्ट आपको भी चखा दिए जाएं.’

‘सिर्फ मुझे?’

‘हां, क्योंकि संभव है कुछ दिनों के बाद हमें अपना उत्पादन रोक देना पड़े.’

‘भला क्यों, ऐसी क्या बात है?’

‘हालात ही ऐसे बनते जा रहे हैं…..’ हेमांग ने अवसर अनुकूल देख अपनी बात रख दी.

‘बस इतनी-सी बात! मैं विधानसभा में मसला उठाने का प्रयास करूंगा….!’ महादेव पंडित ने आश्वासन दिया. उसी के प्रयासों से अगले सत्र में विधानसभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया गया. जिसके पास होते ही शीरे के प्रदेश से बाहर ले जाने पर पाबंदी लगा दी गई.

राजनीति के द्वारा दखल बढ़ाते हुए कंपनी ने शीरे के दामों को नियंत्रित करने में सफलता तो पा ली थी, मगर जब माल ही कम हो तो क्या करें. इसलिए यह लगने लगा था कि उत्पादन के स्तर को बराबर बनाए रखने के लिए शीरे के अतिरिक्त स्रोत भी तलाशने होंगे.

विल्मोर मूल रूप से अमेरिकी कंपनी थी. हिंदुस्तान आने से पहले उसकी पहचान शीतल पेय उत्पादक के रूप में थी. हालांकि उसनेे अन्य देशों में भी शराब बनाने की शुरुआत की थी, किंतु शराब की क्वालिटी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न होने के कारण हर बार उसका लाइसंेस निरस्त कर दिया जाता. पश्चिमी देशों में विल्मोर एक बदनाम कंपनी थी. शराब उत्पादक कंपनी के रूप में उसका नाम काली सूची में दर्ज किया हुआ था. किंतु शीतल पेय उत्पादक के रूप में वह दुनिया की बड़ी कंपनियों में आती थी. चीनी उत्पादन से उसका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था. इसलिए भारत आकर जब उसने चीनी मिल के लिए लाइसंेस की मांग की तो जानकारों का माथा ठनका. लेकिन विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की नीयत से उसको न केवल चीनी मिल लगाने, बल्कि शराब उत्पादन जैसे नए क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति आसानी से मिलती गई.

कंपनी का सीधा-सा गणित था. सिर्फ मुनाफे के लिए काम करना. चीनी कारखाने के नाम पर कंपनी भारत में बहुत आसानी से उस इलाके में पैर जमाने में कामयाब हो गई थी, जहां गन्ने की खेती बहुतायत में थी. दूसरे चीनी के कारखाने के नाम पर जमीन नाकुछ दामों में उपलब्ध करा दी गई थी. सरकारी नीतियों के अंतर्गत करों में भी छूट का लाभ भी उसको मिलने लगा. चीनी का कारखाना बन ही रहा था कि कंपनी ने शराब के लाइसंेस के लिए आवेदन कर दिया. तर्क यह दिया गया कि कंपनी अपने सहउत्पाद शीरे का उपयोग दवा कंपनियों के लिए एल्कोहल बनाने के लिए करना चाहती है. परंतु यह लाइसेंस पाने की साजिश ही निकली.

पहली ही खेप में कंपनी से विदेशी किस्म की शराब की पेटियां बाजार र्मे आइं तो लोग चैंके. छिटपुट विरोधी स्वर भी उभरे. परंतु वे ना के बराबर थे. कारण यह था कि पहले ही दिन कंपनी की ओर से देश-भर के समाचारपत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिए गए थे. जिससे सारे अखबार उसके एहसान तले दबे से जा रहे थे. धीरे-धीरे चीनी उत्पादन बंद होता गया. विल्मोर को उसकी चिंता भी नहीं थी. शराब से होने वाली आय के मुकाबले कारखाना बंद होने से हुआ घाटा कुछ भी नहीं था.

इधर शराब के दूसरे कारखाने पर काम चल रहा था, उधर हेमांग बनर्जी कंपनी की चीनी उत्पादक इकाई को दुबारा आरंभ करने की योजना बना रहा था. इस बार वह चीनी कारखाने को पूरे जोर-शोर से चलाने के लिए प्रतिबद्ध था. असल में पिछले कुछ वर्षों से देश में उपभोक्ता क्रांति का आगमन हुआ था. सेवा क्षेत्रों में विस्तार के साथ लोगों की आय तेजी से बढ़ी थी. समाज में एक वर्ग तेजी से बढ़ता जो खाने-पीने को ही जीवन का उद्देश्य मानता था. विल्मोर की नई नीति उसी नवधनाढ्य वर्ग को ध्यान में रखकर उच्च गुणवत्ता युक्त चीनी की सप्लाई करना था. हालांकि उच्च गुणवत्ता से यहां आशय केवल आकर्षक पैकिंग तथा विज्ञापनों द्वारा उपभोक्ता के मानस में अपने ब्रांड की छवि स्थापित कर देने तक सीमित था.

चीनी उत्पादन को केंद्र में लाने का कूटनीतिक लक्ष्य भी था. करीब साल-भर पहले विल्मोर ने ‘न्यू जेनरेशन’ के नाम से शराब की महंगी किस्म बाजार में उतारी थी. कंपनी उस ब्रांड को हिंदुस्तान के तेजी से उभरते युवा वर्ग में लोकप्रिय बनाना चाहती थी. प्रचार माध्यमों में विज्ञापन की अनुमति न होने के कारण कंपनी ढंग से उसका विज्ञापन नहीं कर पा रही थी. हेमांग बनर्जी सस्ते एवं देश-भर में पहंुच रखने वाले सरकारी प्रचारतंत्र का लाभ चीनी के बहाने उठाना चाहता था. इसके लिए उसने एक विज्ञापन भी तैयार कराया था. चीनी की बिक्री के प्रोत्साहन के नाम पर बनाए गए विज्ञापन के अंत में बड़ी चतुराई से चीनी के पैकेट को हटा दिया जाता. अगले ही क्षण गिलास में रंगीन पेय जैसा कुछ दिखाई पड़ता. साथ में ही कैप्शन आता—

‘जो समय के साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, वे न्यू जेनरेशन के साथ हैं.’

इसी तरह के दूसरे विज्ञापन का कैप्शन था—‘इसे कहते हैं जिंदादिली….इसके बिना जिंदगी अधूरी है.’

विज्ञापन के द्वारा दर्शकों तक वही संदेश पहुंचता जो कंपनी पहंुचाना चाहती थी. परिणामस्वरूप भारतीय युवा वर्ग में ‘न्यू जेनरेशन’ की खपत लगातार बढ़ रही थी. इसके साथ-साथ कंपनी का छोटे-छोटे पैकटों में चीनी बेचने का प्रयोग कामयाब रहा था. उसका सालाना मुनाफा तेजी से बढ़ रहा था. इधर हेमांग बनर्जी की निगाह भविष्य पर टिकी थी. वह सोच रहे थे कि कंपनी को अवाध चलाने के लिए गन्ने की आमद बहुत जरूरी है. इस कारण गन्ने की आवश्यकता भी बढ़ी थी.

कुछ वर्षों से किसानों में दाल, सब्जी, तिलहन, गेहूं आदि उगाने का चलन बढ़ा था. इनसे उन्हें नकद आय हो जाती. संकर गन्ने के उपयोग से धरती का जल-स्तर नीचे जाने से भी किसान उससे बचने लगे थे. विल्मोर के सामने बड़ी चुनौती कच्चे माल की आवक को बनाए रखने की भी थी. हेमांग बनर्जी जानता था कि कंपनी प्रबंधन किसी भी रूप में नुकसान को आसानी से नहीं पचा सकेगा. दूसरे लगातार सफलता के बावजूद कंपनी में उससे ईष्र्या करने वाले भी कम नही थे. उसकी राई-सी चूक को वे प्रबंधन की नजरांे में पहाड़ जितना बनाकर प्रस्तुत कर सकते थे. उनसे सावधान रहना भी जरूरी था.

उस दिन उसने विट्ठल को बातचीत के बुलवाया था. बातचीत वह अकेले और खुशनुमा माहौल में करना चाहता था. इसलिए उसने एक होटल को चुना था. किंतु बेगमपुर में ढंग का एक भी होटल नहीं था. इसलिए शहर के बड़े होटल से बातचीत की गई. उसने कंपनी के गेस्ट हाउस को ही आलीशान होटल के रूप में सजा दिया गया. विट्ठल उस इंतजाम को बस देखता रह गया. पिता के राज में उसमें शराब पीने की हिम्मत नहीं थी. अब कोई रोक-टोक करने वाला नहीं था. दावत के दौरान विट्ठल पीने बैठा तो जल्दी ही झूमने लगा—

‘आज की शाम जिंदगी में हमेशा याद रहेगी….सर!’ विट्ठल हेमांग को हमेशा ‘सर’ कहा करता था.

‘हम तो चाहते हैं कि आपकी हर शाम यादगार बने.’ हेमांग ने चतुराई का प्रदर्शन किया, ‘यह सब आप ही की बदौलत है. इसके लिए पूरी कंपनी आपकी एहसानमंद है. कल ही अमेरिका से पत्र आया था, जिसमें कंपनी के वरिष्ठ प्रबंध निदेशक विलियम स्टीवेंसन ने कंपनी की तरक्की में आपके योगदान की बहुत प्रशंसा की है.’

‘सच!’ सुनते ही उछल पड़ा था वह. अमेरिका से तारीफ मिलना उसकी निगाह में बहुत बड़ी उपलब्धि थी.

‘आपने भी तो हमारे इलाके में खुशहाली लाने का काम किया है. खैर, मेरे लायक कुछ और सेवा हो तो बताइए?’ हेमांग बनर्जी का उकसावा काम आया. नशे की झोंक में विट्ठल वैसे भी आपे से बाहर हो रहा था.

‘खबर है कि इस साल मानसून बहुत अच्छा रहेगा.’

‘यह खबर भी क्या अमेरिका से आई है?’

‘बिलकुल, वहां के वैज्ञानिकों के लिए यह पता करना बहुत मामूली बात है.’

‘आप सेवा बताइए?’ विट्ठल गुमान से ऐंठ-सा गया.

‘इसीलिए तो आपको याद किया है. कुछ ऐसा करो कि आने वाले मौसम में खेतों में गन्ना ही गन्ना दिखाई पड़े.’

‘ऐसा कैसे हो सकता है. अकेले गन्ने से तो पेट भरता नहीं है. किसानों को तो गेहंू, दाल, तिलहन वगैरह सभी कुछ चाहिए.’

‘ज्यादा बारिश में वे दाल तो वैसे भी नहीं बोने वाले. रहा गेहूं का सवाल सो कंपनी के पास एक प्रस्ताव है.’

‘फरमाइए?’

‘जो किसान अपने खेतों में गन्ना बोएंगे, उनकी गेहूं की जरूरत पूरी करने की जिम्मेदारी विल्मोर की होगी. कंपनी बाहर से बड़ी मात्रा में गेहूं आयात करने की योजना बना रही है. सरकारी अनुमति मिल चुकी है. इससे बाजार में गेहूं के दाम ज्यादा नहीं उठने वाले. ऐसे में जो किसान हमारे लिए गन्ना उपजाएंगे, उनके लिए कंपनी बाजार से बहुत कम कीमत पर गेहूं उपलब्ध कराते रहेंगे.’

‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ विट्ठल ने हेमांग की ओर देखा. झूमते हुए, जैसे कि नशे में हो. फिर थोड़ा मुस्कराता हुआ बोला—‘कंपनी के हाथों में क्या जादू की छड़ी है?’

‘यह प्रस्ताव मेरा नहीं है. सीधे अमेरिका से आया है. कंपनी के मालिकान ने हिंदुस्तान को उन देशों में रखा है, जिनका वे बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं. वे यहां एक गोदाम बनाने जा रहे हैं. वहां से उन किसानों को जो कंपनी के कहने पर अपनी जमीन से गन्ना उगाएंगे, बाजार की कीमत पर जरूरत के लायक अनाज हमेशा उपलब्ध कराया जाता रहेगा.’

‘कंपनी इतना गेहूं लाएगी कहां से?’

‘बाहर के देशों से. जिन देशों में गेहूं अधिक उगाया जाता है, वहीं से.’

‘फिर तो किसानों को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए.’

‘कंपनी किसी तरह की शिकायत चाहती ही नहीं. बल्कि हम तो किसानों की मदद करना चाहते हंै. कंपनी चाहती है कि आप हमेशा कि तरह इस बार भी उसकी मदद करें. अगले दो-तीन महीनों में….पूरी उम्मीद है कि यहां पर गोदाम बनने लगेगा.’

‘इतनी जल्दी?’ विट्ठल चैंक पड़ा.

‘आप तो जानते ही हैं कि कंपनी अपना हर काम समय पर निपटाती है. उस गोदाम के लिए अभी जगह का इंतजाम करना है. जैसे ही उसका पक्का हो जाएगा, हम मुख्यमंत्री जी से उसके निर्माण का पत्थर रखने के लिए समय मांग लेंगे.’

‘मुख्यमंत्री जी से?’

‘जी हां! आखिर जनता के भले का काम हो रहा है. इसका कुछ श्रेय तो सरकार को भी मिलना ही चाहिए.’ हेमांग ने हल्की-सी चुटकी ली.

‘मुख्यमंत्री जी बेगमपुर आएंगे?’

‘बात उनके कान में डाल दी गई है. वे तैयार हैं.’

विट्ठल की बांछें खिल गईं. बहुत दिनों से वह अवसर की तलाश में था. राजनीति में आने के साथ ही उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अत्यधिक बढ़ चुकी थीं. हालांकि वह राज्यसभा का सदस्य था. लेकिन राज्य के मंत्री और मुख्यमंत्री का रुतबा उसको आकर्षित करता था. राज्यसत्ता से जुड़ने का मोह उसमें अब भी था. प्रदेश में विपक्षी दल की सरकार थी. इसके बावजूद उसने मुख्यमंत्री से मिलने का कई बार प्रयास किया था. लेकिन अनुभव की कमी और ठोस जनाधार के अभाव में मुख्यमंत्री के दरबार में उसकी पैठ नहीं हो पाई थी. उसे लगा कि अनाज गोदाम के बहाने वह मुख्यमंत्री के करीब आ सकता है.

‘जगह की चिंता तो आप छोड़ ही दें. उसका इंतजाम हो जाएगा.’

‘आपका सहयोग ही तो हमें आगे बढ़ने का हौसला देता है.’ हेमांग ने जाल कसा. उसकी तरकीब काम कर रही थी. हालांकि विल्मोर के पास गोदाम के लिए जगह की कमी न थी. पुराने कारखाने के पास काफी लंबा-चैड़ा मैदान पड़ा था. मगर हेमांग की मंशा थी कि गोदाम नए कारखाने के बराबर में बने. वह शहर से आने वाले रास्ते के करीब पड़ता था. उस कारखाने के पास विट्ठल की कुछ जमीन अब भी बाकी थी. वह उसपर जल्दी से कब्जा जमा लेना चाहता था. बाजार में जमीन के भाव तेजी से बढ़ते जा रहे थे. वह चाहता था कि कारखाने के पास अधिक से अधिक जमीन हो, ताकि भविष्य में कारखाने केे विस्तार के लिए भी जमीन की कमी न रहे.

शहरीकरण के साथ देश का निर्माण उद्योग भी तरक्की कर रहा था. भविष्य को ध्यान में रखते हुए हेमांग ने एक निर्माण कंपनी का गठन किया था. उसके माध्यम से वह आवास निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करने की योजना बना चुका था. विट्ठल की जमीन आवासीय काॅलोनी के निर्माण के लिए भी उपयुक्त थी. वह विट्ठल को एक मोहरे के रूप में उपयोग करना चाहता था. ताकि उसकी देखादेखी दूसरे किसान भी अपनी जमीन का सौदा करने को आगे आएं.

चतुर शिकारी की तरह हेमांग अपना जाल तैयार कर चुका था.

विट्ठल तो कभी का फंस चुका था. इस बार इलाके के किसानों को जाल में फंसाने की योजना थी.

विट्ठल पर हेमांग की बातों का असर हुआ था. अगले दिन उसका पड़ोस के गांव में एक कार्यक्रम था. वह जानबूझकर तय समय से एक घंटा लेट पहुंचा. उस समय तक लोग जमा हो चुके थे. मंच पर जब उसके बोलने का नंबर आया तो उसने उसने विल्मोर के पक्ष में हवा बनाते हुए कहना शुरू कर दिया—

‘भाइयो! विल्मोर के आने के बाद इलाके का जो विकास हुआ है वह किसी से भी छिपा नहीं है. मगर अब भी हमारी अनेक समस्याएं हैं. प्रदेश सरकार उन समस्याओं की ओर से उदासीन है. हर बार वह धन की कमी का बहाना बनाकर टाल जाती है. ऐसे में सिवाय कंपनी के हम किसी और की ओर देख ही नहीं सकते. कंपनी हमारे हितों के लिए बराबर काम करती रहे, हमारे क्षेत्र का विकास इसी तरह होता रहे, इसके लिए जरूरी है कि हम भी कंपनी के हितों का पूरा-पूरा खयाल रखें.

कुछ सालों से हमने अपने खेतों में गन्ने की बुबाई करना कम कर दिया है. जबकि कंपनी उसकी भरपूर कीमत देने को तैयार है. इसलिए हमारा धर्म है कि अपने क्षेत्र के विकास के लिए, अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए हम कंपनी को गन्ने की कमी महसूस न होने दें. याद रहे कि कंपनी हमारे ही विकास के लिए अमेरिका से यहां तक हजारों मील चलकर आई है. हमारा फर्ज है कि हम भी उसके लिए कुछ करें. तभी हम आगे बढ़ सकते हैं.

यदि कंपनी को नुकसान हुआ तो वह अपना कारखाना कहीं दूसरी जगह ले जाएगी. जिससे गांव की तरक्की का रास्ता बंद हो जाएगा. इसलिए आज ही से हम सब को प्रण करना होगा कि कंपनी को गन्ने की कमी हरगिज नहीं होने देंगे. मेरा निवेदन है कि क्षेत्र के किसान गन्ने की खेती पर ध्यान दें.’

‘ठाकुर साहब! आप तो जमींदार हैं. आपके पास तो बहुत-सी जमीन है….पर हमारे पास तो गुजारे लायक ही धरती है. उसी से गेहूं भी उगाना पड़ता है. उसी में दाल और तिलहन भी. फिर हम सारी जमीन पर केवल गन्ना कैसे उगा सकते हैं?’

‘इसको बारे में कंपनी के अधिकारियों से मेरी बात हो चुकी है. मेरी सलाह पर उन्होंने इस समस्या का समाधान भी खोज लिया है. विल्मोर गांव में अनाज का बहुत बड़ा गोदाम बनाने जा रही है. उस गोदाम से उन सभी किसानों को बहुत सस्ते दाम पर गेहूं मिलेगा जो कंपनी को गन्ना सप्लाई करेंगे.’

‘कंपनी हमेशा ही अपने वायदे पर खरी उतरे यह जरूरी तो नहीं है?’ किसी ने शंका व्यक्त की. उसकी बात में दम था. इस कारण कई और भी आवाजें उसके साथ मिल गईं.

‘कंपनी ऐसा ही करेगी. मुझपर विश्वास करें.’

‘सैकड़ों साल पहले ऐसी ही एक कंपनी हिंदुस्तान में व्यापार करने के लिए आई थी. ईस्ट इंडिया कंपनी नाम था उसका. उसने भी इसी तरह के वायदे किए थे. मगर सब जानते हैं कि हुआ क्या. व्यापार के बहाने आई वह कंपनी दो सौ वर्षों तक इस देश पर राज्य करती रही. यहां के लोगों को आपस में ही लड़ाती रही. उस कंपनी को जगह देने का परिणाम इस देश को बंटवारे के रूप में झेलना पड़ा. फिर विल्मोर के बारे में ही यह बात इतने दावे के साथ कैसे कही जा सकती है, वह सिर्फ हमारा भला चाहेगी. वह हजारों मील दूर से आई है तो सबसे पहले अपना मुनाफा देखेगी.’ उस आदमी ने दावा किया. सभा में खुसर-पुसर होने लगी.

विट्ठल को लगा कि वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएगा. किंतु तभी एक आदमी ने उठकर उसकी मुश्किल आसान कर दी. यह बात विट्ठल भी नहीं जानता था कि वह आदमी, बल्कि हेमांग बनर्जी के खरीदे हुए उस जैसे कई आदमी, उसकी मदद के लिए सभा में मौजूद थे.

‘अगर हम आपका कहना मानकर गन्ना बोएं भी तो उसके लिए बीज कहां से आएगा? क्योंकि कंपनी ने जो बीज पहले लाकर दिया था, आगे से उसे तो हम बोने वाले नहीं हैं.’

‘बीज के लिए आपकी मर्जी है. जैसा भी बीज आप अपने लिए सही समझे. कंपनी बीज के लिए सभी किसानों को बिना ब्याज के कर्ज देने को तैयार है. बीज आप अपनी मर्जी से कहीं से भी खरीद सकते हैं. इसके लिए मैं कंपनी को राजी कर लूंगा.’ विट्ठल ने आश्वासन दिया. गरीब किसानों के लिए फसल के दिनों में बीज मिलना भी समस्या थी.

विट्ठल के आखिरी प्रस्ताव में जादुई असर था. किसान जोश में आकर चिल्लाने लगे. जो चिल्ला नहीं सकते थे, उन्होंने जमीन पर लाठी फटकाकर अपनी खुशी प्रकट कीं औरतों ने भी किलकारियां मारकर मैंदान गंुजाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उसी समय सोची-समझी नीति के तहत हेमांग भी उधर पहंुच गया. विट्ठल के कहने पर उसको भी मंच पर बुला लिया गया. फिर बोलने की दावत भी दी गई. हेमांग ने चंद शब्दों में ही अपनी बात को समाप्त करते हुए कहा—

‘मैं कोई नेता नहीं, कंपनी का मामूली-सा मुलाजिम हूं. मुझे जो कहना था वह नेताजी पहले ही कह चुके हैं. मैं इतना जरूर कहना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं. अभी तक हम अपनी इच्छाओं को मारकर जीते आए हैं. परिणाम यह हुआ कि सुख हमेशा ही भागता रहा. विल्मोर की कोशिश होगी कि लोग अपनी इच्छाओं को पूरी तरह जी सकें. उनका सम्मान कर उनको पूरा होते हुए देख सकें. उनका पूरा आनंद ले सकें. किसी की कोई भी इच्छा अधूरी न रहे. इच्छाएं अजर-अमर हैं. अनंत हैं. तो हमारी भी कोशिश होगी कि हम अनंतकाल तक आप लोगों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए सभी जरूरी प्रयास करते रहें.’

हेमांग ने जो भी कहा वह बहुतों की समझ से बाहर था. जिनकी समझ में आया वे बहुत कम थे. उनके माथे पर चिंता की लकीरें गाढ़ी होने लगीं थीं. ऐसे लोग बहुत कम थे. और ऐसी स्थिति में तो वे हरगिज न थे कि विरोध में खड़े हो सकें. वे अपने माथे पर हाथ मारकर सिर्फ अपने दुःख और क्षोभ को दर्शा सकते थे. वही वे कर रहे थे.

कुछ दिनों के लिए ही सही मगर उस दिन की सभा ने लोगों के मन में विल्मोर के प्रति जमा नफरत को कम करने का प्रयास किया था. वहां से किसान जब घर लौटे तो गन्ना बोने का निर्णय ले चुके थे.

इस फैसले के पीछे विट्ठल के भाषण का नहीं, किसानों की मजबूरी का हाथ था.

गरीबी और मजबूरी में सिर्फ शब्दों का ही फर्क है.

किसानों पर हेमांग और विट्ठल का जादू चला. बैशाख उतरते ही खेतों में गन्ने की बुवाई होने लगी. जोश में आकर कई किसानों ने चारे और दलहन की फसलों पर पाटा फिरवा दिया. सिर्फ इसलिए कि खेतों को गन्ने से लवरेज किया जा सके. कंपनी को गन्ने की कमी महसूस न हो. किसानों को ललचाए रखने के हिए हेमांग ने गोदाम का शिलान्यास करा दिया था. प्रदेश के मुख्यमंत्री खुद उद्घाटन करने आए. ऐसा पहली बार हुआ. पहली बार गांव वालों ने हेलीका॓प्टर देखा. हेलीकाॅप्टर का हवा में लहराना फिर चक्कर लगाकर मैदान में उतरना, फिर घूं-घूं करते हुए उड़कर नीले आसमान में बादलों की करवट हो जाना, गांव में कई दिनों तक किवदंती बना रहा.

विट्ठल को लगा कि जो काम उसके बाप-दादा नहीं कर पाए, वह उसने कर दिखाया. इस उत्साह में उसने सड़क किनारे पड़ी सात एकड़ जमीन कंपनी के नाम कर दी. गोदाम बनने लगा. किसानों को बताया गया कि उनके दुःख के दिन बीते समझो. विल्मोर उनके जीवन में वरदान बनकर अवतरित हुई है. आगे से उन्हें उनकी फसल का पूरा दाम मिलेगा. उधार नहीं. एकदम नकद. इधर गन्ना तुलवाया. उधर दाम हाथों में. गांव में छोटे-बड़े सबने मान लिया कि इलाके के दिन फिरने वाले हैं. अनाज के लिए गोदाम है ही. जिन लोगों के मन में कंपनी की नीयत को लेकर संदेह था. लोगों का जोश और जुनून देखकर वे चुप्पी साधे रहे. किसी ने मुंह खोलने की कोशिश की तो उसको लोगों ने चुप करा दिया. नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई उनकी आवाज.

हेमांग की नजर देश के दिनोदिन फैलते उपभोक्ता बाजार पर थी. उसने मालिकों को जिले की तीन ठप्प पड़ी चीनी मिलों को खरीदने के लिए राजी कर लिया. उन चीनी मिलों पर किसानों का करोड़ों रुपया बकाया था. किसान संगठन बकाया पर ब्याज की मांग कर रहे थे, जो मूल राशि से भी दुगुना था. हेमांग ने बहुत चतुराई से किसान नेताओं को पटा लिया. इस कारण तीनों सौदे बहुत ही सस्ते पट गए. खरीदने के बाद सरकार के हस्तक्षेप से उसनेे किसान संगठनों को बिना ब्याज के रकम का भुगतान करने के लिए तैयार कर दिया. सभी ने उनकी व्यावसायिक बुद्धि का लोहा. कंपनी के मालिकों ने उनके वेतन को एक झटके में डेढ़ गुना कर दिया. साथ ही सुविधाएं भी बढ़ा दीं.

हेमांग ने जब चीनी मिलों को खरीदने का प्रस्ताव मालिकों के सामने रखा था, तब उसके आलोचकों ने उसपर खूब छींटाकशी की थी. मालिकों को भड़काया भी था. लेकिन हेमांग की दूरदर्शिता को देखते हुए निदेशक मंडल ने मिलों के सौदे के लिए अपनी सहमति दे दी थी. हेमांग ने किसानों को बिना ब्याज भुगतान की अनुमति मिलते ही तीनों सौदे बहुत फायदेमंद सिद्ध हुए. तीनों मिल बहुत ही मौके पर स्थित थीं. इससे उसके आलोचकों के मुंह बंद हो गए.

हेमांग ने तीनों मिलों की मरम्मत कराकर उन्हें ‘न्यू जेनरेशन’ ब्रांड की चीनी के उत्पादन में लगा दिया. वहां पर अत्याधुनिक पैकिंग मशीनें काम करने लगीं. बहुत महंगी, जिन्हें सीधे स्वीडन से आयात किया गया था. भारत में वे मशीने पहली बार आयात की गई थीं. चीनी पैकेजिंग के काम में इतना निवेश विस्मयकारी था. विट्ठल तो सुनकर ही चैंक पड़ा था.

‘यहां के लोग महंगी पैकेटबंद चीनी खरीदेंगे? जब उन्हीं काफी कम मूल्य पर खुली चीनी उपलब्ध हो.’ विट्ठल की हैरानी हेमांग के सामने मुखर हो उठी.

‘बिलकुल, क्योंकि हर समाज में एक वर्ग ऐसा होता है, जिसके लिए उपभोग जरूरत न होकर प्रतिष्ठा की बात होती है. पहले इस कोटि में राजा-महाराजा और सामंतवर्ग आता था. आजकल नए-नए जन्मे पूंजीपति और नौकरशाह लोग हैं, जिनके पास थोडे़ समय में बेशुमार पूंजी का आगमन हुआ है.’

‘पर ऐसे लोग हैं ही कितने, वे हमारे उत्पादन को खपा पाएंगे?’

‘क्यों नहीं.’ हेमांग का स्वर आत्मविश्वास से भरा था, ‘किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में उसके मध्यवर्ग का बहुत योगदान होता है. कहना चाहिए कि मध्यवर्ग ही वहां की अर्थव्यवस्था को दिशा देता है. इस वर्ग की खास प्रवृत्ति यह होती है कि यह अपने से बड़े वर्गों का अंधानुसरण करता है. उच्चवर्ग में जो उत्पाद प्रचलित हैं, वह धीरे-धीरे मध्यवर्ग की जरूरत बनने लगते हैं. इसलिए ‘न्यू जेनरेशन’ की खपत को लेकर मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं.’

विट्ठल की ठस बुद्धि में हेमांग की बात आई या नहीं, कौन जाने. पर वह चुप्पी साधे रहा. इलाके की तीन बड़ी चीनी मिलों पर विल्मोर का कब्जा हो जाने से क्षेत्रीय खुदरा बाजार में उसकी स्थिति महत्त्वपूर्ण हो गई. विल्मोर अपनी चीनी का बड़ा हिस्सा खुले में बेचती थी. सिर्फ एक हिस्सा पैकेटबंद चीनी के रूप में बेचा जाता था. उसी से विल्मोर का नाम जुड़ा था. कंपनी की पैकेटबंद चीनी के ग्राहकों में उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग के उपभोक्ता सम्मिलित थे.

इस कोई चाहे षड्यंत्र का नाम दे, परंतु हेमांग के लिए यह उसकी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा था. उस साल जैसे ही बरसात का मौसम गुजरा, कंपनी ने बाजार में खुली चीनी की आपूर्ति पर रोक लगा दी. इससे बाजार में चीनी की कीमतें बढ़ने लगीं. यह कदम त्योहारों से ऐन पहले उठाया गया था. उस साल गन्ने की भरपूर फसल हुई थी. लेकिन अधिकांश गन्ना अभी तक खेतों में ही था. चीनी के मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि से जनाक्रोश उमड़ना स्वाभाविक ही था. सरकार भी इसके लिए तैयार नहीं थी. उसने चीनी मिलों पर अपना शिकंजा कसना प्रारंभ कर दिया.

सरकार की परवाह किए बिना हेमांग ने सारी चीनी पैकेटबंद रूप में बाजार में उतार दी. साथ ही जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए ‘त्योहारों पर विशेष छूट’ के बहाने से अपनी चीनी के दाम भी घटा दिए. परिणाम यह हुआ कि विल्मोर की छवि में जहां तेजी से सुधार हुआ, वहीं देशी मिलों की छवि पूरी तरह बिगड़ने लगी. अखबारों ने उन्हें अकुशल, पिछड़ी तकनीक से युक्त, नाकारा आदि और न जाने क्या-क्या कहा. उधर विल्मोर की पैकेटबंद चीनी आम उपभोक्ताओं में भी प्रचलित हो गई.

यूं तो घोषित रूप से ऐसा कुछ भी नहीं था. मगर विल्मोर आने वाले किसानों, मजदूरों को शराब की पेटी की पेटी रियायती दामों पर बेच दी जाती थीं. पर्व-उत्सव, शादी-विवाह, मेलों-हाटों के अवसर पर विल्मोर की शराब को परोसा जाना फैशन में शुमार होने लगा. लोग उसी में अपनी शान मानने लगे. अभी तक खुलेआम शराब का सेवन बदनामी का सबब बन जाता था. लेकिन विज्ञापन एवं शराब की खुली आपूर्ति से धारणाएं बदल रही थीं.

हेमांग आदमी की स्वाभाविक हिचक को दूर करना चाहता था. भारतीय होने के कारण वह यहां के लोगों की मानसिकता से अच्छी तरह परिचित भी था. इसलिए उसने ‘फुर्सत’ नाम से शराब का एक सस्ता ब्रांड बाजार में उतार दिया. उस ब्रांड को बाजार में लाने से पहले ही यह धारणा लोगों के दिलो-दिमाग में बिठा दी गई थी कि ‘फुर्सत’ ब्रांड घर-दोस्तों, पार्टी-महफिल, दुकानों आदि पर कहीं भी पिया जा सकता है. प्रचार के लिए उसकी पेटियां इलाके के जाने-माने लोगों के घरों में मुफ्त में पहुंचाई जाने लगीं.

बेगमपुर के आसपास का इलाका संपन्न किसानों का था. गांव में कई चैपालें थीं. जिनपर बैठकर गपियाना, हुक्का गुड़गुड़ाना शान समझा जाता था. वहीं पर किस्से-कहानियों, राग-रागनियों के कार्यक्रमों की रात-दिन धूम मची रहती. बूढ़े बात-बात पर मूंछे ऐंठते. जवान ताल ठोंकते. बच्चे धमा-चैकड़ी मचाते थे. घरों, छज्जों, गलियारों से गुजरने वाली बूढ़ी और जवान औरतें घूंघट की ओट से मर्दों को मस्ती काटते हुए देखतीं. रिश्ता इक्कीस बैठता तो कभी-कभार टोका-टाकी भी कर देती थीं. वरना चुपचाप अपने रास्तें हो लेतीं. लड़के हमेशा ही लापरवाह और मस्ती में चूर नजर आते. लड़कियां जिम्मेदारी के बोझ से दबी हुईं. शालीनता की पुतली बनी वे वे निस्संवेग ऐसे पांव धरतीं, मानो चलती-फिरती बेजान मूर्तियां हों.

बेगमपुर में किसान संपन्न थे. पर जो किसान नहीं थे, वे.

हर गांव की भांति उनकी विल्मोर में भी दुर्दशा थी. काम के नाम पर बेगार. रोजी-रोटी के नाम पर भुखमरी. सम्मान के नाम पर नाहक मारपीट से उनका रोज का वास्ता था. कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर ऐसे लोगों का शोषण बिलकुल आम बात थी. गांव की जनसंख्या का तीन-चैथाई ऐसे ही विपन्न, साधनविहीन लोग थे. इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद बेगमपुर में ऐसे लोगों की कोई पूछ ही नहीं थी. मानो उन विपन्न और साधनविहीन लोगों का अस्तित्व ही न हो.

विल्मोर और उस जैसी दूसरी कंपनियों के इलाके में आने से ऐसे लोगों में आस बंधी थी. यह सोचकर कि अब उनके भी दिन बहुरेंगे. कि मेहनत के बदले बराबर मजदूरी मिलेगी. बेगार से पीछा छूट जाएगा. इससे पहले तो कोई रास्ता ही था. इसलिए जमींदारों, सामंतों के अनगिनत अत्याचार मूक रहकर सहे. पीढ़ी-दर-पीढ़ी चुपचाप सहते गए. राजशाही ने उपेक्षित रखा. सामंतवाद ने दुत्कारा. अब पूंजीवाद से उन्हें उम्मीद थी. समानता और न्यायपूर्ण व्यवहार की.

कुछ दिन ठीक-ठाक भी गुजरे. नई व्यवस्था में पेशे की आजादी थी. अपनी योग्यता के अनुसार मनमर्जी का काम किया जा सकता था. सो लुहार, बढ़ई, मोची, जुलाए, रंगरेज गांव में उचित मजदूरी न मिलती देख दूसरे धंधे अपनाने लगे. खेतों में काम न मिलता देख मजदूर कारखानों में नौकरी करने लगे. आमदनी बढ़ने लगी. लेकिन सुख का संग-साथ लंबा नहीं खिंच सका. पूंजीवाद ने अपने रंग दिखाए. विल्मोर में ठेकेदारी की शुरुआत हुई तो एक बार फिर आजादी जाती रही. मजदूरी में भी तेजी से गिरावट हुई. पूंजीवाद के साथ देखे गए सपने धराशायी होने लगे.

सपने सजने से पहले ही बिखरने की शुरुआत हो चुकी थी.

सृष्टि का परिचयपत्र होता है परिवर्तन.

हालात तेजी से बदल रहे थे. बेगमपुर जैसा मामूली कस्बा शहरी जीवन की विडंबनाओं का शिकार होने लगा. परिणामस्वरूप आपसी विश्वास का स्थान संदेह ने ले लिया. जिन चैपालों पर छाछ की हांडी की हांडी खप जाया करती थीं, हुक्का गुड़गुड़ाना मर्यादा और शान समझा जाता था, वहां पर शराब की बोतलें और पन्नियां खुलने लगीं. औरतें चैपाल के आगे से गुजरने से घबरातीं. लड़कियां घर से निकलतीं तो सहमी हुई और डरी-डरी. जाने कब कोई शराबी बीच रास्ते आकर टोक दे.

शराबी पहले मुंह छिपाकर घर के किसी कोने में पड़े रहते थे. अब वे पूरी ऐंठ के साथ मूंछ मरोड़ते हुए बाहर आने लगे. जो कमजोरी और बदनीयती के पहचान थे, वही अवगुण नई सभ्यता की पहचान बनने लगे. सब कुछ बदल रहा था. किंतु इस बदलाव के पीछे किसी को भी विश्वास नहीं था कि यही रास्ता सही है. बदले हालात में सभी मुंह छिपाकर रहने में समझदारी मानने लगे थे.

किसानों की कमाई विल्मोर के खजाने भरने लगी.

मजदूर अपनी दिहाड़ी घर पहुंचने से पहले ही शराब के ठेके को भेंट कर चुके होेते. मजदूरों में बेलदार, गांव-देहात के मामूली दस्तकार, कारीगर, तथा किसान शामिल थे. विल्मोर का जादू सबके सिर चढ़कर बोल रहा था. जिन रास्तों की पहचान कभी पीपल या बरगद के पेड़ से होती थी, अब वे ठेके और मीटशाॅप से निकटता के आधार पर पहचाने जाने लगे. खुद को समझदार मानने वाले लोग सभ्यता और संस्कृति के नाम का रोना रोते. मानवमूल्यों में निरंतर आ रही गिरावट पर शोक व्यक्त करते. परंतु शाम को अपने-अपने आंसू विल्मोर की मदिरा से धोकर प्रसन्नमन घर लौट जाते थे.

रिसालदार हरदन सिंह के साथ आए सैनिकों की एक टुकड़ी पास के गांव जामनटोला में जा बसी थी. वह गांव जिस स्थान पर बसा है, वहां पहले कभी जामुन का एक पेड़ हुआ करता था. खेती की शुरुआत करते समय कुछ सैनिकों ने अपना बसेरा जामुन के पेड़ के नीचे किया था. धीरे-धीरे एक बस्ती पेड़ के आसपास बसने लगी. जामनटोला और दखनपल्ली के लोगों के बीच पुराना जुड़ाव काम आया. कई वर्ष तक उनकी पहचान भी संयुक्त ही रही. परंतु प्रकृति का भेद दोनों गांवों के बीच कुछ इस प्रकार देखने को मिला कि दखनपल्ली के लोगों ने अपनी मेहनत से अपेक्षाकृत अधिक भूमि जुटा ली. नदी के पाट बीच में आ जाने के कारण जामनटोला के निवासी पीछे रह गए.

इस अंतर के बावजूद दोनों गांवों के बीच भावनात्मक संबंध ज्यों की त्यों बने रहे. दोनों गांवों की सीमाएं परस्पर मिलती थीं. लड़के-लड़कियों को आपस में भाई-बहन मानने का रिवाज था. इस कारण उनमें विवाह संबंध निषिद्ध था. हालांकि इस सालों पुरानी परंपरा को चुनौती देते हुए कई प्रेमी जोड़े अपनी जान की कुर्बानी दे चुके थे. मगर चवालीसी की पंचायत की ताकत अब भी बनी हुई थी तथा आपसी व्यवहार तथा सरोकार में उसका फैसला अंतिम माना जाता था. दोनों गांवों के परस्पर मेल-जोल और संयुक्त ताकत का ही प्रभाव था कि आसपास के चवालीस गांवों की चैधराहट दखनपल्ली की देहरी के भीतर ही बनी रही.

गजरतन सिंह लकवाग्रस्त होकर चारपाई पकड़े हुए थे. किंतु चवालीसी के गांवों में उनकी हैसियत आज भी प्रधान के रूप में थी. विट्ठल ने अपनी चतुराई से भले ही अपने व्यापार को कितना फैला लिया हो. राजनीति संबंध बनाकर राज्यसभा की सदस्यता भी हथिया ली हो. लेकिन सामाजिक रूप में वह इतना मान-सम्मान हासिल नहीं कर पाया था कि उसको पंचायत में मसले सुलझाने जैसी जिम्मेदारी सांैपी जा सके. पुराने लोग तो आज भी यही मान रहे थे कि विट्ठल पर लगाम कसने की जरूरत है. विल्मोर के आने के बाद लोगों के आपसी व्यवहार में जो जो बदलाव आया है उसको देखकर वे बहुत ही आहत थे और इस सबके लिए विट्ठल को भी बराबर का दोषी मानते थे.

उनकी विश्वास में पूरा दम था. वे मानते थे कि पिछले कुछ सालों में इंसानी रिश्तों की मर्यादा बहुत ही घटी है. राह चलती बहन-बेटियों के साथ छेड़खानी करना आम बात होती जा रही है. गांव के बूढ़े तो इसी बात पर बदले जमाने को कोस रहे थे कि पहले जो औरतें घर की देहरी नहीं लांघती थीं, वे अब सरेआम मुंह उघाड़कर निकलने लगी हैं. पर्दा करने की कहो तो खिल्ली उड़ाती हैं.

इस मसले पर विचार करने के लिए चवालीसी की बैठक बुलाने की मांग वर्षों से की जा रही थी. विट्ठल हर बार उसे दबाता आ रहा था. इस बारे में उसका अपना सोच कुछ नहीं था. हेमांग को बदली स्थितियां अपने अनुकूल लगती थीं, इस कारण वह किसी भी प्रकार के अंकुश के विरुद्ध था. समाज का युवावर्ग उनके साथ था, उन्हें सफलता भी मिल रही थी. इससे गांव के वे वुजुर्ग बहुत हताश थे जो मान रहे थे कि नया जमाना लोगों को बिगाड़ रहा है.

समाज की तमाम परंपराओं और संस्कारों का बोझ ढोने वाली औरतों के बीच भी बदले हुए समय को लेकर हताशा व्याप्त थी. कहीं-कहीं खलबली भी मची हुई थी. विल्मोर में आ रहे बदलाव से सबसे अधिक मुश्किलें भी उन्हीं को उठानी पड़ रही थीं. घरों के उजड़ने, छेड़छाड़, बलात्कार, हिंसा आदि की शिकार भी औरतें ही थीं. उनका दर्द था कि उनके पति अपने दिन-भर की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा शराब के ठिकानों पर छोड़ आते हैं.

उन्हीं परेशानहाल औरतों ने मिलकर एक दिन हेमांग का घेराव किया. औरतें शराब के ठेके को बंद करने की मांग कर रही थीं. उस समय भी पर्दे के पीछे से उनके घेराब को नाकाम करने वाला विट्ठल ही था. उसको पहले ही भनक लग चुकी थी. इसलिए उसने समय रहते हुए शराब के ठेकों पर अपने आदमी बिठा दिए थे. वही लोग विल्मोर और हेमांग के समर्थन में नारे लगाते हुए बाहर निकल आए. उनमें से कई की पत्नियां भी आंदोलन कर रही औरतों के बीच थीं. सबने अपनी-अपनी स्त्री की बांहें थामकर हेमांग को बाहर निकालने में मदद की. इसपर आपस में झगड़ा भी हुआ. किंतु बाद में पुलिस ने इसे गांव का आपसी मामला बताकर फाइल को दबा दिया.

हरदन सिंह के रिसाले में एक बहादुर सिपाही हुआ करता था—अंगद. कुंआरा और मस्त. लस्कर जब बसने के बारे में सोच रहा था तो मन का मौजी अंगद पूर्व की ओर निकल गया. उसने पुराने गांव रावी में अपना डेरा डाल लिया. जहां उसका गांव के मुखिया की लड़की से इश्क हो गया. संबंध आगे बढ़ा. एक दिन मुखिया की लड़की ने खुद को गर्भवती पाया. बात फैलकर बदनामी का सबब बने, उससे पहले ही मुखिया ने उन दोनों का विवाह कर देने में भलाई समझी. मुखिया के कोई लड़का नहीं था. इसलिए उसके आने वाली संतति उसकी लड़की की ही संतान थी. बाद में जब जामनटोला बसने लगा तो अंगद अपनी पत्नी को लेकर वहीं आ बसा. मुखिया के निधन के पश्चात पुरानी संपत्ति को बेचकर उसने जामनटोला में एक हवेली का निर्माण किया और मजे से दिन काटने लगा.

उसकी चैथी पीढ़ी में अपने दादा की कद-काठी, सूरत और सीरत लेकर जन्मा था— नमर्देश्वर! जिसे पढ़े-लिखे लोग प्यार से नमन कहकर बुलाते. गांव के बूढ़े-और बड़े नर्मदा. उसके परदादा अंगद को अपने ससुर की विरासत मिली थी. जिसे उसने बड़ी मेहनत और उद्धम से विस्तार दिया था. इतना कि उसकी चैथी पीढ़ी के नर्मदा के हिस्से में पैंसठ एकड़ उपजाऊ जमीन आती थी. गांव में पैदा होने, पलने और बड़े होने के बावजूद नर्मदा ने उच्च शिक्षा प्राप्त की. परंतु बाहर जाकर नौकरी करना उसको रुचा नहीं. गांव में रहकर ही उसने खेती को संभालने का काम किया. कई वर्षों तक वह अपने पसीने से धरती की छाती पर रेखाएं खींचता रहा. कुछ दिन बाद ही उसको लगने लगा कि यह भी उसकी तबियत के विरुद्ध है. अंत में उसने अपनी सारी जमीन पर बाग लगवा दिया. उसी से उसको गुजारे लायक आमदनी हो जाती थी.

नर्मदा ने विल्मोर को सुरसा की तरह आसपास के इलाके को अपने पंजों में जकड़ते और रह-रह कर उसकी मुश्किलें बढ़ाते हुए देखा था. उसके देखते-देखते विल्मोर के दो कारखाने खड़े हो चुके थे. चार चीनी मिलों पर उसका कब्जा था. स्थानीय प्रशासन और राजनीति पर उसका प्रभाव था. इसी का लाभ उठाते हुए कंपनी अपनी किसी भी योजना को निडर होकर लागू कर देती थी.

गन्ने की खेती को प्रोत्साहन के नाम पर नए बीज को किसानों के बीच ज्यादा उपज का लालच दिखाकर मुफ्त बांटा गया. अंगद का दिमाग तभी खटका था. बहुत जल्दी यह साफ हो गया कि नए बीज को कीड़ा बहुत जल्दी लगता था. इसीलिए उसकी देखभाल बहुत जरूरी थी. उससे बचाव के लिए ढेर सारा कीटनाशक चाहिए. साल में एकमात्र फसल. वह भी आधी-अधूरी, साथ में खर्चीली भी. किसान दुःखी होने लगे. लेकिन खेत घिर चुके थे. कई किसान महाजनों के कर्ज तले आ गए. जमीनें बिकने के कगार पर आ गईं.

कंपनी के गोदाम से अनाज उन्हीं किसानों को मिल रहा था, जो वहां गन्ना पहुंचाते थे. कुछ महीनों के बाद सस्ता अनाज मिलने की घोषणा लोगों के साथ छल साबित हुई थी. वह अनाज इतना गंदा होता था कि उसकी रोटियां लोगों के गले से जैसे-तैसे ही उतर पाती थीं. इसे गांव के लोगों में विरोध के स्वर उठने लगे थे. विरोधियों के हर समय साथ रहने वाला, उनके स्वर में स्वर मिलाकर आवाज उठाने वाला एक स्वर नर्मदा का भी था. जो कंपनी के विरोध में होने वाले हरेक धरना-प्रदर्शन में पहंुच जाता था.

विट्ठल को इस बारे में जानकारी थी. परंतु वह अपने पद और ताकत के गुमान से फूला हुआ, अक्सर उसकी उपेक्षा कर बैठता था. हेमांग को डर था कि छुटपुट की ये चिंगारियां कभी भी दावानल बन सकती हैं. इस कारण उसने विट्ठल से जितनी जल्दी हो सके समाधान खोजने को कहा था. तब विट्ठल ने नर्मदा को बुला भेजा. नर्मदा के आने पर उसने हालचाल पूछा—

‘हमारे और तुम्हारे खानदान के बीच तो पीढ़ियों से गाढ़ा संबंध रहा है. तुम्हारे परदादा बहुत बहादुर सिपाही थे. उनके कई किस्से मैं अपने दादा के मुंह से सुन चुका हूं. मैंने यह भी सुना है कि उन्होंने दो बार अपनी जान पर खेलकर अपने सेनापति यानी हमारे परदादा साहब की प्राणरक्षा की थी. तभी से मेरे मन में उनके प्रति बहुत सम्मान है. तुम तो पढ़े-लिखे हो. शहर जाकर अपने लिए अच्छी-सी नौकरी खोज सकते हो. कोई समस्या हो तो मैं भी हाजिर हूं.’

‘कुछ नहीं, मेरी इच्छाएं बहुत ही सीमित हैं.’ नर्मदा ने विनम्रतापूर्वक इंकार किया.

‘इच्छाओं को बांधकर रखोगे तो वे पिंजरे के पंछी की तरह फड़फड़ाती रहेंगी. खुला छोड़ देने पर वे नीले आसमान की बुलंदियों के भी पार जाने की कोशिश करेंगी. तभी तुम्हें पता चलेगा कि जीवन में कितना कुछ है, पाने के लिए.’

‘जी…’

‘विल्मोर तुम जैसे महत्त्वाकांक्षी युवाओं का बहुत सम्मान करती है.’

‘आपके मन में मैं अपने लिए जो प्यार देख रहा हूं, वह मेरे लिए कंपनी के सम्मान से ज्यादा कीमती है.’ नर्मदा ने विनम्रता का स्तर बनाए रखा. हालांकि विट्ठल की मंशा उससे छिपी नहीं थी. कुछ-कुछ अनुमान वह लगा चुका था.

‘फिर भी, कंपनी द्वारा इज्जत अफजाई अपनी जगह पर है. उसके दुनिया-भर में अनेक कारखाने हैं. एक नई बात की जानकारी मुझे मिली तो सीधे तुम्हारा नाम ही दिमाग में आया. पिछले दिनों हेमांग बाबू बता रहे थे कि उनके यहां मैनेजर का एक पद खाली पड़ा है. नौकर-चाकर, अच्छी तनख्वाह और गाड़ी, कंपनी ये सुविधाएं अपने सभी मैनेजरों को देती है. तुम्हारे लिए वह पद बहुत ही अच्छा रहेगा. तुम चाहो तो मैं कल ही हेमांग से बात कर उस पद को तुम्हारे लिए पक्का कर दूं. इसमें तुम्हारा और कंपनी दोनों का ही फायदा है.’

‘कंपनी के ऊपर आपका आशीर्वाद है. फिर उसे अच्छे मैनेजरों की कहां कमी. मुझसे भी अच्छे कई लड़के मिल जाएंगे.’ कुछ देर तक सोचने के बाद नर्मदा ने जवाब दिया था.

‘पर तुम्हारे होने यहां के किसानों को भी लाभ होगा.’

‘विल्मोर के यहां आने से जिसे फायदा पहुंचा है, वह सिर्फ विल्मोर है.’

‘क्या तुम उस बदलाव को नहीं देख रहे जो इन दिनों लोगों के जीवन में आया है?’

‘खूब देख रहा हूं. पहले जहां इक्का-दुक्का घरों में ट्रांजिस्टर और रेडियो हुआ करते थे, वहां अब घर-घर टेलीविजन आने लगे हैं. सड़कों पर वाहनों की भीड़-भाड़ है. चिट्ठी-पत्री को ठिकाने लगाने के लिए टेलीफोन आ गया है. पहले जहां कपड़े धोने का साबुन भी बामुश्किल मिलता था, वहां अब नहाने के खुशबूदार साबुन और शैंपू आने लगे हैं. जो बच्चे पहले गुड़ और खांड पाकर बहल जाते थे, वे अब पान मसाले और चा॓कलेट की मांग रखने लगे हैं. लोगों को अपनी चादर से ज्यादा पांव पसारने की आदत पड़ती जा रही है. कर्ज लेकर घी पीने की कहावत पिछले किसी भी समय के मुकाबले आज सच है.

‘सुख-सुविधाओं के पीछे भागते रहने का परिणाम यह हुआ है कि आदमी का आदमी से विश्वास टूटा है. इसके लिए ज्यादा दूर जाने की भी जरूरत नहीं है….चैपालों पर बैठे रहने वाले बड़े-बूढे़ प्यास लगने पर पहले चाहे जिसके घर से छाछ या पानी मंगा लेते थे. घर में कोई पहंुचाने वाला न हो तो जवान बहुएं, बिना किसी डर या झिझक के खुद लोटा लेकर उनके पास चली जाती थीं. आजकल अव्वल तो चैपालें ही नहीं रहीं. बूढ़े लोग घरों के कोनों में सिमटकर रह गए हैं. दूसरे आज यदि अपने ही घर का वुजर्ग यदि कुछ मांगे तो कोई उसको इज्जत नहीं देता. इस बदलाव के पीछे विल्मोर का क्या जरा भी हाथ नहीं है?’

‘लगता है तुम्हारे दिमाग में किसी ने तीखा जहर भरा हुआ है बेटे?’ विट्ठल ने कहा. आयु में नर्मदा उससे दस-बारह वर्ष छोटा था. विट्ठल को भरोसा था कि वह उसको जल्दी ही मना लेगा. परंतु जब नाकामी मिलने की उम्मीद हुई तो वह अपना धैर्य खोने लगा. तब राजनीति का उसका अनुभव काम आया. नर्मदा को फंसाने के लिए दूसरा पासा फेंकते हुए उसने कहा—

‘मैं तुम्हारे विचारों से सहमत भले ही न सही. मगर उनकी कद्र करता हूं. विल्मोर के साथ न सही, तुम चाहो तो मेरे साथ मिलकर काम कर सकते हो. आजकल मेरा काम भी बहुत अधिक बढ़ चुका है. तीन-तीन कंपनियों में ठेकेदारी, ऊपर से राजनीति की भाग-दौड़. गांव के दूसरे अनेक मसले, मुझे तुम जैसे अकलमंद, कर्मठ और भरोसे के कार्यकर्ता की ही दरकार है.’

‘माफ करें काकाजी. इन दिनों तो हम एक आंदोलन की भूमिका रच रहे हैं. जब तक उससे मुक्ति न मिल जाए, मैं आपका साथ नहीं दे सकता.’ नर्मदा ने दो टूक उत्तर दिया. राजनीति ने विट्ठल को मौका आने पर वार करना और बेमौके की बात को पी जाना सिखाया था. वह शांत रहा. परंतु अपने मन के क्षोभ को छिपा सकने में सफल न हो सका—

‘तुम्हें लगता है कि तुम्हारे साथ न रहने से कंपनी का कुछ नुकसान होगा?’

‘हरगिज नहीं! जिस कंपनी के दुनिया-भर में कई कारखाने हों….हर मुल्क में आप जैसे वफादार हों, उसे नुकसान हो कैसे सकता है.’

‘फिर इतनी नासमझी दिखाने की वजह?’

‘यह तो अपनी-अपनी तबीयत की बात है. आप जिसे नासमझी बता रहे हंै, फिलहाल तो वही मेरा जुनून है. मैं चाहता हंू कि अपने समाज और देश को प्यार करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी ही नासमझी दिखाता रहे.’

‘मैं तो तुम्हें समझाने आया था. अगर तुम्हें साधारण मनुष्यों की भांति इसी तरह जीना है, तो मैं कर भी क्या सकता हूं.’ विट्ठल ने कहा और मुंह बनाता हुआ वहां से प्रस्थान कर गया. नर्मदा कुछ देर तक खड़ा अपनी स्थिति पर विचार करता रहा. फिर वह भी लौट पड़ा.

विट्ठल ने भले ही हार न मानी हो, मगर प्रथम संवाद में जीत ने तो नर्मदा को ही वरा था.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

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