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दंश : बाइसवीं किश्त

दंश % बाइसवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

मैं जानता हूं बेटा कि तू मुझसे नाराज है. मेरे वर्ताब के लिए तू मुझे जी-जान से कोस रहा होगा. इसका तुझे पूरा हक है. पूरी तरह सच्चा है तेरा गुस्सा. तेरी नफरत, तेरी हर शिकायत और तेरा प्रत्येक इल्जाम मेरे सिर-माथे. तेरा कुसूरवार हूं मैं. आज से नहीं जन्म से ही. मैंने सिर्फ गुनाह बख्शे. खुशी की जगह गम, सुख के स्थान पर दुःख की सौगातें बांटीं. मेरी लापरवाहियों ने तुम्हारे बचपन की रातों को अमावस बना दिया. आंखों से सपने छीनकर उनमें आंसू भर दिए. विवाह, औरत का संग-साथ आदमी को संपूर्ण बनाता है. गृहस्थी का धर्म निभाए बिना आदमी की मुक्ति नहीं. राधा के बिना कृष्ण, राम सीता बिना अधूरे हैं. शिव की महानता भी इसलिए है कि वे अर्धनारीश्वर हैं. अंग भस्म के साथ उन्होंने नारीत्व को भी अपने भीतर समेटा हुआ है.
मैंने विवाह किया. अग्नि को साक्षी मानकर तेरी मां के साथ सात फेरे लिए. पर सच्चा गृहस्थ बनना, गृहस्थी का धर्म निभाना मुझे कहां आया! मैं न ढंग का पति बन सका न पिता. एक कमजोर इंसान के लिए यह संभव भी कहां है कि वह अपने कर्तव्य को निभा सके. नीति-अनीति को समझते हुए पाप की राह से खुद को बचा सके. महापातकी हूं मैं. खुद को तेरा और तेरे सभी भाई-बहनों का अपराधी मानता हूं. सबसे अधिक तेरी मां का. वह बेचारी तो मेरे मान-सम्मान के लिए तिल-तिल कर गलती रही. मैं तो इस लायक भी नहीं कि अपनी गलतियों के लिए तुम सब से माफी मांग सकूं. फिर दो-एक गलतियां हों तो ठीक. अपराध कोई दो-चार हों तो देखा भी जाए. यहां तो भूलों और चूकों का अंतहीन सिलसिला है. ऐसे में मुंह पर उजरापन आए भी तो कैसे?
‘यह तन गठरी पाप की….’ दास कबीरा यही तो कहा करते थे. परंतु वे ठहरे पाक-साफ इंसान. पाप-पुण्य की पहंुच से बहुत ऊपर. खुद ही तारनहार. यह शब्द तो उनके दिमाग में मुझ जैसी पापात्माओं को देखकर ही आया होगा. कबीर बाबा भी मुझ जैसी पापात्माओं को कहां समझ पाए होंगे. कहां समझ पाए होंगे कि कोई आदमी अपनी इंसानियत से कितना नीचे गिर सकता है. समझ पाते तो कुछ और ही उपमा देते. तब अपनी ही उक्ति उन्हें हल्की लगने लगती.
मैं आखिर हूं भी क्या? पति के रूप में हत्यारा. पिता के रूप में निर्मोही….गैर जिम्मेदार….बेरहम….स्वार्थी….नापाक….नाकाबिल. आदमी के नाम पर धोखेबाज, भगोड़ा और चालबाज. इंसानियत के नाम पर कलंक. मेरा केवल चेहरा ही नहीं, रोम-रोम पाप-पंक में लिसड़ा हुआ है. जिस औरत के साथ मैंने गठबंधन किया….जन्म-जन्मांतर तक जिसका साथ निभाने की कसमें खाईं….जिसने मेरे सुखों की खातिर दुख को ताजिंदगी अपनी किस्मत बनाए रखा….जो मेरे चेहरे पर मुस्कराहट देखकर हंसी, मेरी आंखों में आंसू देखकर जिसकी आंखें सावन-भांदो बनकर बरस पड़ीं….और तो और मेरे सिर आई हर आफत को जिसने अपने ऊपर लेकर मेरी रक्षा की….मेरे पापों की खातिर जिसको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा….उसके अनंत उपकारों से तो मैं सात जन्मों तक भी उऋण नहीं हो सकता.
पिता बनकर जो बिरवे मैंने रोपे थे, असमय ही उन्हें उनकी जड़ों से उखाड़कर तपती हुई धूप में झुलसने के लिए छोड़ दिया. अपनी ही फसल मैंने पकने से पहले उजाड़ डाली. मैं इंसान के रूप मंे भेड़िया….आदमी के चोले में हैवान….निर्लज्ज आत्मा….पाप-पंक में आकंठ डूबा अधम कीट. मानुस देह पाकर भी मनुष्यता से कोसों दूर….मैं खुद को इंसान कहूं भी तो कैसे! अपने एक-एक पाप के लिए मैं हजार बार पछताऊं….लाख बार शर्मिंदगी जाहिर करूं….तो क्या इससे मेरे पाप धुल सकते हैं? हरगिज नहीं! बिल्कुल भी नहीं! कुछ भी करूं पर मन को शांति नहीं मिलती. ऐसे में किस मुंह से आज मैं अपने मन की गांठ को खोलूं. कैसे बताऊं कि मैं परिस्थितियों के हाथ का एक महज एक खिलौना बना रहा. वक्त हमेशा ही मुझसे खेलता रहा. अगर मैं ऐसा कहूं भी तो क्या कोई मुझपर विश्वास करेगा? और करे भी क्यों? जिदंगी में मैंने इतना झूठ बोला है कि अब तो खुद ही ऐतबार नहीं होता कि मैं सच कह रहा हूं या झूठ. ऐसे में खुद को खुद पर, दूसरों को मुझपर भरोसा जमे भी तो कैसे!
बेटा तू सुन तो रहा है ना? पर अच्छा ही है जो तू मेरी बातों को ना सुने. सुनकर भी अनसुना कर दे. मैं नहीं चाहता कि तू खून के रिश्ते के नाम पर मेरे दुख का भागीदार बने. मेरे दिल में वर्षों से समाया हुआ दर्द तेरी आंखों को बहने पर मजबूर कर दे. मैं यह गुस्ताखी भी नहीं करूंगा कि तुझसे रहम की फरियाद करूं. पर इतना जरूर चाहता हूं कि आज इस समय….इस समय जब मैं पहली बार अपनी बीती को समेटने की हिम्मत जुटा पाया हूं….कम से कम थोड़ी-सी देर के लिए तू मुझपर भरोसा करे. मेरी पिछली कमजोरियों को नजरंदाज कर मेरे दिल में सालों से जमे दर्द को चीन्हने की कोशिश करे. एक बार….केवल एक ही बार मुझे यह एहसास हो जाने दे कि तू मेरी बातों को गंभीरता से सुन रहा है. उसके बाद तेरे जो जी में कहना….जैसा भी मन भाए करना.
मैं ठहरा ठेठ गंवार आदमी. चौथी कक्षा तक जैसे-तैसे स्कूल जा पाया था. गांव की पाठशाला में बाकी विद्यार्थियों से दूर बैठ, जमीन पर कील-कांटे बनाते हुए कुछ अक्षरों को चीन्हना सीखा. पाठशाला में अध्यापक साल में केवल दो बार छबीस जनवरी और पंद्रह अगस्त को दर्शन देते थे. इसलिए कि इन दो दिनों में या तो डिप्टी साहब के मुआयना करने की संभावना होती या फिर सरकार की और से अच्छे कलेवा का इंतजाम होता. बाकी दिनों में वे अपने घरों में आराम फरमाते या फिर रिश्तेदारी में विचरते. विद्यार्थी खेतों और जंगलों में घूमते, चिड़ियों पर गुलेल साधते, तालाब से मछलियां पकड़ने का खेल खेलते थे.
पढ़ाई के दौरान हमें मास्टरजी के जानवरों के लिए सानी करनी पड़ती. उन्हें पानी पिलाने के लिए तालाब तक ले जाना पड़ता. उनके घर के लिए बाजार से सब्जी या राशन आदि का इंतजाम करना भी हमारी ही जिम्मेदारी में शामिल था. हम खुशी-खुशी गुरुजी का आदेश मानते. इसलिए कि ये काम हमें अपने-से लगते थे. उनमें हमारे हुनर की अच्छी परीक्षा हो जाती थी. गांव में हमारे मां-बाप, बंधु-बांधव यही सब तो किया करते थे. मास्टरजी पढ़ाई के दौरान हमें रह-रह कर यही समझाते कि हमें आगे भी यही करना है. भविष्य की कोई योजना न होने के कारण पढ़ाई हमारे दिलों में आतंक पैदा करती….पाठशाला में पांव धरते ही उसका डर हमारे दिलो-दिमाग पर सवार हो जाता था.
और मैं क्या कहूं….कैसे कहूं? याद रखना….स्मृति को कहानी में ढाल देना मुझे आता भी तो नहीं. जो हैं सब बिखरी-बिखरी-सी बातें हैं. मेरे साथ जो बीता….जिस नंगी हकीकत से मैं गुजरा. जीवन की घटनाओं को मैं आधा-अधूरा जैसा भी याद कर पाया, उस बेमजा अतीत को मैं अपनी कच्ची-पक्की भाषा में बयान करूंगा. जो परिस्थितियां मुझसे जोंक-सी चिपटी रहीं….मेरे सुकून और सुख को बूंद-बूंद पीती रहीं….आज मैं उनको जी खोलकर कहना चाहता हूं. डरता हूं कि कल शायद ही ऐसा अवसर हाथ लगे.
तुझे अनगिनत शिकायतें होंगी मुझसे….कि मैं क्यों तेरी निर्दोष मां को थाने में उन दरिंदों के आगे अकेला छोड़ आया था….कि क्यों मैंने तुझे धोखा दिया….कि क्यों मैंने तेरे भाई-बहनों को अनाथों के समान दर-दर की ठोकर खाने के लिए सड़क पर अकेला छोड़ दिया….जिंदगी-भर मैं क्यों तुम सबसे गैरों जैसा व्यवहार करता रहा. कभी अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझ पाया. भागता रहा उनसे. क्या मेरे पास बाप का दिल नहीं था? क्या मैं आदमी होकर भी पत्थर दिल था?
कोई संदेह ना रहे इसलिए बता दूं तुझे कि तुम सब मेरे ही वीर्य की पैदावार हो. लक्खी जैसी सती इस दुनिया में शायद ही कोई और हो. देवी-देवताओं के चरित्र में तो हजार-हजार खोट निकल सकते हैं. परंतु लक्खी के दामन पर दाग ढूंढ पाना नामुमकिन था. वह इतनी पाक-साफ, साफ-सफ्फाक औरत थी कि पाकीजगी भी उससे आंख मिलाने पर शरमाए….पानी भरे, सिर झुकाने लगे उसके आगे. औरत का धर्म क्या होता है, यह लक्खी से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता. औरत तो औरत, कोई देवी भी लक्खी जैसा त्याग नहीं कर सकती. हमेशा वह सहती ही रही—मेरी उपेक्षा, मेरी लापरवाही और मेरे सारे अवगुण! धरती के समान….मूक और निस्पंद! कभी शिकायत नहीं की. कुछ लोग तो इसे लक्खी की कमजोरी ही मानेंगे. उसकी सादगी और समर्पण की खिल्ली उड़ाएंगे. मूर्खता कहेंगे उसके सेवा और त्याग को. वे कुछ भी कहें. चाहे जो माने. ईमानदारी से कहूं तो लक्खी के चरित्तर के आगे मैं कुछ भी नहीं हूं. उसकी महानता के आगे मेरा पुरुषत्व घुटने टेकने लगता है.
एक बिंदु का भी अस्तित्व होता है….बौने इंसान की भी कुछ न कुछ लंबाई जरूर होती है. परंतु मैं तो उससे भी कहीं अधिक गया-गुजरा था. तुच्छता का यही एहसास मेरे मन के अंधकूप में कुंठा बनकर, जिंदगी-भर डेरा डाले रहा. उसके सामने पड़ते ही मैं जमीन में धंस-सा जाता था. आंख मिलते ही मुझे अपनी लघुता का आभास होने लगता. मेरी अनंत कमजोरियां सींग मार-मारकर मुझे बेहाल किए रहतीं. काश! वह साधारण औरत ही होती. बात-बात पर बुरा मानने वाली. अपने सुख के लिए झगड़ने वाली. काश! वह भी मेरी तरह कुछ स्वार्थी, थोड़ी-बहुत फरेबी होती. तो मैं शायद उससे निभा जाता. मैंने उसपर अनगिनत अत्याचार किए. मामूली खर्च के लिए उसको तंग रखा, ताकि वह आम औरत की तरह पेश आए. मुझसे लड़े-झगड़े. फरमाइश करे. रार-तकरार हो. जब मैं शराब पीने बैठूं तो बोतल को मेरे हाथ से छीनकर जमीन पर दे मारे. बस्ती की बाकी औरतों के समान मेरे साथ गाली-गुप्तार करे.
मैं जन्म-जात शराबी नहीं. सच कहूं, पहले शराब के नाम से ही मुझे नफरत थी. बोतल देखकर माथा चकराने लगता था. पहली रात जब मैं पीने बैठा तो मुझे उम्मीद थी कि घर लौटते ही सारे संयम-बंध तोड़कर वह मुझसे लड़ने लगेगी. नाराज होकर झुग्गी का दरवाजा बंद कर लेगी. काफी मिन्नत के बाद, आगे कभी शराब न पीने का कौल भरवाकर ही मुझे भी नहीं आने देगी. परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. कम से कम मुझे तो यही लगा था. सिर्फ उसकी आंखें पथरा-सी गई थीं. मुझे देखते ही एकाएक वह अपना हाथ मुंह पर ले गई थी. लेकिन अगले ही पल हाथ नीचे कर दिया. उसके चेहरे पर गहरा ठंडापन था. जिसको समझ पाना मुझ जैसे साधारण बुद्धिवाले आदमी के लिए तो असंभव ही था.
वह अपनी महानता से एक कदम भी नीचे नहीं उतरती थी. मुझमें न इतनी काबलियत थी, न इतना नैतिक बल कि ऊपर उठकर उसकी आंखों में आंखें डालकर बातें कर सकूं. मेरा छोटापन ही मेरे ओछेपन को उकसाता रहा. और सच कहूं तो जिस दिन मैंने उसे थाने में अकेली छोड़ा उस दिन मेरे मन में संतुष्टि का अजीब-सा भाव था. शायद मेरा ओछापन उससे बदला लेने पर उतारू हो. उस दिन मेरे हीनताबोध ने षड्यंत्र रचा, कुंठाओं ने मनमानी की. यह सोचकर कि लक्खी की महानता कुछ तो खंडित हो, वह गिरकर मेरी बराबरी तक आ जाए, मुझे मेरे छोटेपन के एहसास से मुक्ति मिल सके—मैं इंसानियत के पायदान से सहस्रों योजन नीचे जा गिरा. जीते जी लाश बन गया मैं, वह हरामजादी मरकर भी जीत गई. उसके बड़प्पन के आगे यह आसमान की ऊंचाई भी कम दिखती है. उसकी अच्छाइयां समंदर से भी विशाल हैं. सच में तो वह चांद-सितारों से भी ऊपर उठ चुकी है. जबकि मेरे पास पांव टिकाने लायक रसातल में भी जमीन नहीं है.
और एक बात बताऊं? मैंने कभी खुदपर भी इतना भरोसा नहीं किया जितना कि लक्खी पर किया था. वही मुझे धोखा दे गई. मुझे ही क्यों….उसने तो अपने मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ा. जानती थी कि मैं निकम्मा हूं, लापरवाह हूं. सिवाय बोझ बनने के कुछ कर ही नहीं सकता. तो भी वह सबकुछ छोड़कर इतनी जल्दी इस दुनिया से कूंच कर गई. संभलने का कोई मौका दिए बिना ही हाथ छुड़ा लिया उसने.
मां होने के बावजूद जब उसने ही अपनी संतान की फिक्र नहीं रही तो मैं क्यों करूं? करूं भी तो क्या वह सब कर पाऊंगा जो वह करती थी? क्या मैं उसके जितना रात-दिन खट पाऊंगा? नहीं ना….इसलिए मैं खुद को तुझसे….तेरे भाई-बहनों से दूर रखना चाहता था. परमात्मा है तू तो अपनी जिंदगी खुद संवारे. यही सोचकर मैं उस दिन चला गया था. संसार समर में तुझे अकेला छोड़कर. अपने परमात्मा को अकेला छोड़कर.
मैं तुझे अपने शहर में ही छोड़ना चाहता था. जानी-पहचानी सड़कों और गलियों के बीच. न जाने क्यों तेरे भीतर मुझे तेरी मां की छवि दिखाई देती थी. आज भी दिखाई पड़ती है. मुझे भरोसा था कि तू हर हाल में जी लेगा. जैसा मैं रख सकता हूं उससे अच्छी तरह रह लेगा. लक्खी का आशीर्वाद फलेगा तुझे. जिंदगी तुझे कभी धोखा नहीं देगी. तेरे साथ रहकर हरिया और कालू भी संभल जाएंगें. बापूधाम वाले गरीब सही, पर उनकी इंसानियत से मेरा वास्ता रहा है. अनाथ समझकर वे तुम्हें गले लगा ही लेंगे. कुछ हो ना हो तुम चारों मेरी अपशकुनी काया से तो दूर रहोगे—यही सोचकर मैं भागा था. मुंह मोड़ लिया था तुम सबसे.
निकम्मा आदमी, फैसला लेगा तो मूर्खता झलकेगी. कदम आगे बढ़ाएगा तो दुर्भाग्य धर दबोचेगा. जीत की उम्मीद बांधेगा तो मात मिलेगी. हंसने का प्रयास किया तो आंसुओं की नदियां बहा ले जाएंगीं….मुझ जैसों की यही नियति है.
मैं नियति के हाथों में खिलौना बना. वह मुझे हमेशा खेल खेलती रही. पल-प्रतिपल करती रही छल.
लक्खी को जो भुगतना पड़ा….जैसी निर्मम और भयानक मौत उसको मिली, क्या वह उसकी कर्म-रेख थी? या उसकी अच्छाइयों का दंड? या उसके बड़प्पन की सजा? क्या उसके तप से इंद्रासन और वैकुंठ को खतरा पैदा हो गया था? या लक्खी का सत देखकर देवताओं को अपनी गद्दी छिन जाने का डर सताने लगा था? तभी वे रूप बदलकर उस दिन थाने में उतर आए थे. राक्षसों की भांति, अकेली और निहत्थी औरत को दबोचने, उसका तप भंग करने के लिए. कुछ महापातकी देवताओं का तो यह स्वभाव भी रहा है, कि जो भी उनकी सत्ता को चुनौती दे, उनके सिंहासन की ओर नजर घुमाए, उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचकार बरबाद कर दो. अगर यह सच है तो क्यों कोई भला बनना चाहेगा? क्यों चाहेगा इतना ऊंचा उठना कि देवताओं का कोप सहना पड़े.
एक बात तो समझ में आती है कि यह दुनिया असाधारण को झेल नहीं पाती. फिर वह अच्छाई हो अथवा बुराई. जब भी कोई ऐसा करता है तो उसको कांटों-भरी राह पर चलना ही पड़ता है. दुनिया का कोप-ताप सब सहना पड़ता है.
उस दिन तुझे धोखा देकर मैं रेलगाड़ी में सवार हो गया था. किंतु मन बहुत बेचैन था. तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. कभी मन होता कि अच्छा किया. घर-गृहस्थी के बोझ से मुक्ति मिली. आगे से आजाद जिंदगी जियूंगा. जी-भर खाऊंगा-पीयूंगा. मनचाहा पहनूंगा. फिर लगता कि जैसे घोर पाप हुआ है. चार-चार बच्चे हैं. जिन्हें मैं अनाथ की तरह रोने-भटकने के लिए छोड़ आया हूं, वे किसके सहारे जियेंगे. मुझे तुरंत उनके पास लौट जाना चाहिए. परमात्मा बड़ा हो चुका है. मां की सोहबत में रहकर मुसीबतों से जूझना भी सीख चुका है. किसी कारखाने में लग गया तो चार-पांच सौ का जुगाड़ आसानी से हो जाएगा. लक्खी का सपना सच होगा.
कुछ देर के लिए उम्मीद जुड़ती. लेकिन अगले ही पल मन अपने आप डगमगाने लगता. सारे संकल्प धरे के धरे रह जाते. कुछ ही पल पहले बनाई गई योजनाएं सांसों के प्रवाह के साथ बह जातीं. अपने ऊपर तो मुझे कभी विश्वास रहा नहीं. इस कारण कभी कोई काम टिककर कर ही नहीं पाया. नेताओं से जुड़ा…उनके लिए रात-दिन काम किया. उनके स्याह-सफेद में हिस्सेदारी की. सभी कुछ किया उनके लिए. मगर जब अपने ऊपर संकट आया तो उनसे कोई मदद न ले सका.
शहर लौटा तो मन में यही जद्दोजहद चल रही थी. बच्चों की खबर-सुध लेने के लिए बापूधाम पहुंचा तो वह पुलिस की छावनी बना हुआ था. वर्षों से पुलिस के साथ रहा था. इस कारण उसकी रग-रग को पहचानता था. बस्ती में घुसने से पहले ही भरोसे के आदमी को भेजकर बापूधाम का जायजा लिया. फिर वहां से लौट आया. खतरा सिर पर सवार देख, बच्चों को वक्त के हवाले कर, इस उम्मीद के साथ कि कोई न कोई तो उन्हें पाल ही लेगा, वहां से भाग छूटा. वैसे भी दरोगा और हवलदार की मौत से झल्लाई पुलिस मुझे आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी. जेल मेरा नसीब बन चुकी थी.
पापात्माएं पुण्य कर्म के अवसरों को पहचान नहीं पातीं. जो पहचान लेती हैं उनमें इतना धैर्य नहीं होता कि अच्छाई के रास्ते पर चल सकें. इसलिए वे बार-बार पाप-कर्म की ओर झुकती चली जाती हैं. मैं तो पापी था. गैरजिम्मेदार और भगोड़ा भी. किंतु पुलिस उसने तो सारी की सारी कहानी ही बदल दी थी. सारे इतिहास क्या ऐसे ही गढ़े जाते रहे हैं. सचाई के नाम पर झूठ के पुलिंदे. इंसानियत की कब्रगाह! नेकदिलों के मकबरे!
पहली कहानी में था कि कुछ बदमाश जो कि एक स्त्री पर झपट रहे थे, पुलिस द्वारा चुनौती दिए जाने पर उन्होंने गोली चला दी. बदले में पुलिस को भी गोली चार्ज करना पड़ा. मुकाबले में दरोगा और हवलदार शहीद हो गए. बदमाश भागने में कामयाब रहे. जाते-जाते पहचान लिए जाने के डर से उस औरत को भी मार गए. नई कहानी में जोड़ दिया गया था कि औरत के साथ उसका पति भी था. बदमाशों से मिला हुआ. यानी वारदात के लूट की नहीं थी. उसकी शुरुआत पति-पत्नी के झगडे़ से हुई थीं पति जो बदचलन, आवारा, शराबी, जुआरी और अय्याश आदमी है. उसी ने हत्यारों के साथ मिलकर अपनी पत्नी को मारने की साजिश रची थी. वह निकम्मा आदमी शराब के लिए रुपयों की खातिर अपनी घरवाली को हर रोज पीटता था. घटना की रात भी दोनों के बीच बहुत जोर का झगड़ा हुआ था. पति ने अपनी घरवाली की अक्ल ठिकाने लगा देने की धमकी दी थी. शायद वही उन बदमाशों को बुलाकर लाया था.
घड़ियों की दुकान में चोरी का मामला दबा दिया गया था. उसे चोरी के खुल जाने का खतरा जो था.
पुलिस का दावा था कि उसने केस हल कर लिया है. असली मुजरिम फरार भले हो जाए, पुलिस की पकड़ से बच नहीं सकता. जल्द ही वह जेल की सलाखों के पीछे होगा. पुलिस की गढ़ी कहानी को समाचारपत्रों ने भी सही मान लिया था. कैसे नहीं मानते? दिन-भर काॅफी हाऊसों में गप्प हांकने वाले पत्रकारों को बोतल के साथ खबरों का पुलिंदा भी तो थाने से प्राप्त होता रहा है. उस समय उन्हें बस बोतल की फिक्र होती है. उसके साथ-साथ खबरें सच हों या झूठ, सब निभा ली जाती हैं. सो पुलिस का सफेद झूठ पत्रकारों द्वारा सच में बदल दिया गया. आगे कानून भी वही मानेगा जो पुलिस, अखबार या पुलिस के द्वारा खड़े किए गए गवाहों के जरिए सामने आएगा.
आत्मविश्वास की कमी तो मुझमें शुरू से ही थी. इस कहानी से मेरा रहा-सहा विश्वास भी जाता रहा. अपनी चिंता तो मुझे नहीं थी. मैं तो जैसा सलाखों के इस पार ठहरा, वैसा ही उस पार. जिंदगी कठपुतली जो ठहरी. लोगों ने जैसा नचाया मैं नाचा. पर लक्खी की और ज्यादा बदनामी न हो, लोग उंगली न उठाएं उसपर, इस कारण मैं चुप्पी साधे रहा. भागता रहा अपराधी बनकर. हां, यह कुछ भी नहीं मेरे मन का पाप, डर ही था मेरा.
एक बार मैंने समर्पण का फैसला भी किया. मन में ठानकर थाने तक गया भी था. लेकिन मुझ जैसा कमजोर आदमी अपने किसी फैसले पर टिक नहीं पाता. उस दिन थाने के सामने पहुंचते ही मेरे दिल मंे प्राणों का मोह उतर आया था. उस रात की दरोगा और हवलदार की दरिंदगी मेरे दिलो-दिमाग पर छा गई. मुझे यह भी याद था कि वे दोनों हैवान अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके जुल्म की दास्तां कभी की खत्म हो चुकी है. बहादुर लक्खी उन्हें नर्क का रास्ता दिखा चुकी है. पर पुलिस में उन जैसे दरोगा और हवलदारों की कोई कमी नहीं. इसी डर ने मेरे पांव जकड़ लिए थे. थाने के करीब पहंुचते-पहंुचते मेरी सांस धौंकनी-सी चलने लगी. मैं घबराकर उल्टे पांव वापस लौट आया था.
जिस दिन मैं तुझे रेलवे स्टेशन पर अकेला छोड़कर भागा, उस दिन मन में बड़ी कसक थी. पर कहीं न कहीं यह भरोसा भी था कि रुकी हुई जिंदगी एक दिन अपनी राह पकड़ ही लेगी. लक्खी की कमी तो खलेगी, मगर बेला जो बिल्कुल अपनी मां पर गई है, उसकी याद दिलाती रहेगी. अपनी मां की निशानी बनकर वह मेरे पास रहेगी. परंतु मनभाता हो कहां पाता है! खासकर मुझ जैसे कमजोर आदमी के लिए तो मनचाहा होना महज एक सपना होता है. इसलिए तो गरीब आदमी सपनों से डरता है. सुख के मीठे सपने देखता है तो जिंदगी की कड़वी हकीकत उसका मुंह चिढ़ाने लगती है. वह उन्हें अशुभ मानकर भुला देना चाहता है.
कमजोरी वक्त के हाथों मिली पहली पराजय है, गरीबी विष-बुझा डंक.
और अमीरी?
अमीरी, नाइंसानों पर कुदरत की मेहरबानी का नतीजा, इंसानी लूट और अन्याय को मिली शाबाशी है….!
काका मेरा पिता, मेरा जन्मदाता, यही तो कहा करता था. बेचारा, अपनी पूरी जिंदगी नियम-धर्म की बात करता रहा. ढर्रे से बंधी हुई जिंदगी थी उसकी. जरा भी टस से मस नहीं. यह मत करो….वह मत करो….यह पाप है….वह शास्त्र-विरुद्व….परंपरा के विपरीत है. वह इंसानियत को शोभा नहीं देता, यह मनुष्यता के नाम पर धोखा है. काका हमेशा ही डर दिखाता रहता था. उसके लिए पूरी जिंदगी जैसे एक शाश्वत निषेध थी. दुनिया में आकर भी वह इससे बचा रहना चाहता था. काजर की कोठरी से बेदाग निकलने की ठाने हुए था. कबीर के शब्द उसकी जुबान पर हमेशा सवारी गांठते रहते थे. सातों दिन, आठों याम, सुबह-शाम—
झीनी-झीनी बीनी चदरिया
काहे का ताना, काहे का बाना, कौन जतन से बीनी चदरिया
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया
आखिरी बंद गाते-गाते काका के चेहरे पर आत्मविश्वास झलकने लगता था. आंखों की चमक बढ़ जाती. अनपढ़ और गंवार काका को सुख से जैसे डर लगता था. मन का सुख देने वाली हर चीज उसके लिए पाप की खान थी. त्याग उसके लिए सहज था, इसीलिए पुण्य भी था. जीवन में और भी पुण्य थे, जिनका पंडितजन समर्थन करें. जिनको वे मना करें वह पाप. हालांकि उसका सदा ही यह मानना रहा कि पाप-पुण्य के भेद करने लायक समझ उसमें न तो है, न ही कभी हो सकती है. इसके लिए वह भरसक कोशिश जरूर करता रहता था. दक्षिणा चुकाने की हैसियत न थी. इसीलिए पंडितजनों की बेगार कर उन्हें खुश रखने का प्रयास करता. जिंदगी इसी तरह गुजर रही थी.
अजीब था काका भी. मुखिया मजूरी मार लेता तो वह खुद को कोसने लगता. कोई गुस्से में दो-हाथ धर देता तो उसे उसमें पिछले जन्म के पाप नजर आने लगते. अक्सर रातों को भूखा सोकर बिताता. इस उम्मीद में कि यह भी एक साधना है. परमात्मा खुश होगा. मां हालांकि एम मजबूत औरत थी. कम मजूरी लेकर काका घर लौटता तो वह बहुत दुखी होती. पर काका की आदतों और गांव की मर्यादा के नाम पर लादे गए बंधनों के कारण कुछ कह नहीं पाती थी.
काका का बचपन उन दिनों बीता था जब देश गुलाम था. आजादी की लड़ाई चल रही थी. संघर्ष करते हुए जेल जाना जब फैशन की बात हो चली थी. दूसरों की देखा-देखी काका कहने लगा था कि जेल की सलाखें आदमी को अपने भीतर झांकने का अवसर प्रदान करती हैं. उसके आत्मज्ञान को बढ़ाती हैं. उसकी कुछ बातें बहुत निराली हुआ करती थीं. जैसे कि बेगार को वह पुण्य कमाना कहा करता था. बेगार का आदेश अगर पंडितजनों की ओर से आ जाए तो वह कृतकृत्य हो जाता था—
‘मुल्क आजाद हो चुका है. कम से कम अब तो इन पुरानी बातों को छोड़ दो. दुनिया कहां से कहां जा चुकी है.’ काका की बातें सुनकर हम उसकी हंसी उड़ाते. उसको पागल और सनकी बूढ़ा कहते और मजे लेने के लिए कभी-कभी उसको छेड़ दिया करते थे.
‘मुल्क आजाद होने से क्या लोग अपनी मां को मां कहना छोड़ देंगे?’ काका का तर्क हमेशा उल्टा ही होता था.
‘फिर भी बेगार क्यों की जाए? आखिर हम भी इंसान हैं.’
‘पंछी तो कौआ भी कहलाता है और हंस भी….’
‘उन सब की अपनी जिंदगी है. कौआ या हंस एक-दूसरे की जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करते. न हंस खुद को कौआ से श्रेष्ठ बताता है. न उसके हिस्से का समेटता है, न अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए उससे बेगार लेता है.’
‘उनमें इतना दिमाग ही कहां होता है.’ काका से तर्क करना बहुत कठिन हो जाता था. अपने आगे वह किसी की सुनता ही नहीं था.
‘आजकल मजदूर भी अपनी मेहनत का पूरा दाम मांगते हैं. ऐसे में हम ही बेगार क्यों करें?’
‘बेगार कैसी बेटा! यह तो एक प्रकार का लेन-देन ही है. इस जन्म देकर उस जन्म लेने वाली बात. गरीब आदमी की तो यह मजबूरी है कि वह बेगार करे.’ कहते-कहते काका गंभीर हो जाता था.
‘देश आजाद हो चुका है. नया कानून किसी को भी बेगार करने या कराने की अनुमति नहीं देता.’
‘इस देश-दुनिया से परे भी एक दुनिया है.’ काका एकदम दार्शनिक बन जाता था, ‘उस दुनिया में जाने के लिए धन-दौलत काम नहीं आती. आदमी के पुण्य ही काम आते हैं. गरीब आदमी दान-पुण्य तो कर नहीं सकता. इसलिए उसके बस में केवल इतना होता है कि वह दूसरों की सेवा-टहल के बहाने ही कुछ नेकधर्मी जमा कर ले. भगवान राम और केवट का किस्सा तो सुना है ना? सरयु पार करने के बाद जब भगवान राम केवट को उतराई देने लगे तो केवट ने कहा था’—
इस किस्से को काका न जाने कितनी बार….कितने तरीके से, और कितने संदर्भों के साथ सुना चुका था. गांव के अधिकांश लोगों की तरह काका की भी पुनर्जन्म में पूरी आस्था थी. इस जन्म की गरीबी और बदहाली के लिए वह अपने पिछले जन्म के पापों को जिम्मेदार मानता. दुख और तकलीफ में उसके मुंह से अक्सर निकल ही जाता था—
‘इसमें किसी दूसरे का क्या कुसूर! पिछले जन्म में मैंने जो बोया था, वही तो काट रहा हूं.’
अगले जन्म की बेहतरी की खातिर काका जमकर बेगार करता. गांव के ठाकुरों की गालियां सहता. जिसका सीधा नुकसान हमारे परिवार को उठाना पड़ता. काका के नाम पर पांच-छह बीघा जमीन थी. उसमें से भी आध्ी से ज्यादा दबंगों ने कब्जा रखी थी. अम्मा स्वाभिमानी औरत थी. सारे दुःख और अभाव चुपचाप सह लेती. कभी मदद के लिए किसी अमीर की देहरी नहीं चढ़ी. लेकिन गांव के माहौल में उसका स्वाभिमान किसी काम का न था. वह काका से जमीन वापस लेने के लिए अदालत और पुलिस की गदद लेने को कहती. इसपर काका जवाब देता था— ‘जाने दे, भगवान सब देख रहा है. देर-सबेर हमें न्याय जरूर मिलेगा.’
‘जब तक तुम हाथ पर हाथ रखे बैठे रहोगे, भगवान भी क्या कर पाएगा.’
‘जो जैसा करेगा वैसा ही भुगतेगा. इसीलिए तू किसी बात की फिक्र मत किया कर. फिर मोटा-झोटा जैसा भी बन पड़े, तुझे खाने को ला ही देता हूं. इसके अलावा तू और क्या चाहती है?’
यह सब कहने की बात थी. वरना काका खाने-पीने का इंतजाम भी कहां कर पाता था. अम्मा और बुआ दोनों मजदूरी करतीं. वही हम सबका पेट भरने के लिए कमाकर लाती थीं. काका को दिन-भर में जितनी रोटियों की दरकार होती, उतनी वह बेगार के बहाने कमा ही लेता था. और मौका मिले तो जेब खर्च के लिए दो-चार रुपये भी जुटा लेता था. वह इस बात को बड़ी शान के साथ कहता था कि वह उन मर्दों में से नहीं है, जो अपना पेट भरने के लिए औरत की कमाई पर निर्भर रहते हैं.
गांव के पंडितजनों की सलाह पर काका को पूरा भरोसा करता था. वह मानता था कि ईश्वर के भक्त को माया के फेर मे नहीं पड़ना चहिए. सबकुछ प्रभु के हवाले कर भजन-पूजन करना ही आदमी को मुक्ति दिला सकता है. पर उन्हीं पंडितजनांे के सर्वाधिक प्रिय भक्त माने जाने वाले दबंग ठाकुर लोग ही काका की जमीन हड़पने के लिए जिम्मेदार थे. वही औनी-पौनी दर पर उधार देकर काका को फंसाए रहते. उनकी बड़ी-बड़ी शानदार हवेलियां, भरे हुए खेत खलिहान, चेहरे पर आई संपन्नता की चमक से काका को कतई ईष्र्या नहीं होती थी. न उनके साथ वह अपनी तुलना करता था. बल्कि उनके सामने काका की गर्दन श्रद्धा से झुक जाती थी. उनकी संपन्नता और अतुल्य वैभव को वह उनके पूर्वजन्म के पुण्यों की कमाई मानता. काका की निगाह में हर अमीर आदमी महात्मा था और हर अभावग्रस्त, संकट में फंसा आदमी, पापयोनि का जीव.
गांव में न तो जमीन खोने वाले लोगों की कमी थी, न उसे हड़पने वालों की. पंडितजनों की प्रेरणा तथा उनके स्नेह की छत्रछाया में यह क्रम लगातार चलता रहता था. इसके बावजूद गांव में तनाव के अवसर बहुत कम आते थे. उत्पीड़न के शिकार रहे लोगों को तनावमुक्त करने के लिए अनेक उपाय किए गए थे. कभी उन्हें महान सांस्कृतिक परंपरा का संवाहक बताकर बरगलाया जाता तो कभी परलोक के भ्रम में उनके साथ छल किया जाता.
पीढ़ियों से यही होता आ रहा था. दो-चार पीढ़ी आगे भी बदलाव की कोई संभावना नहीं थी.
कुछ लोग फिर भी परिवर्तन की उम्मीद बांधे हुए थे.
बात काका की चल रही है, तो दो-चार बातें और भी हो जाएं. मेरा भी जी हल्का हो जाएगा. दुनिया की नजर में काका एक भला इंसान था. बिना ना-नुकर किए दूसरों की बेगार करना, निरपराध होकर भी सिर झुकाकर दूसरों की बातें सुनना, मार खाकर चुपचाप चले आना, पुरखों की जमीन दबा लेने पर उफ् तक न कहना, उन लोगों की निगाह में भलमनसाहत की निशानी थी. इसी कारण पंडितजन उसके साथ दो-चार मीठे बोल बोल लेते. छठे-छमाहे हाल-चाल पूछकर आशीर्वाद भी दे डालते. काका इसी से खुश था. बहुत खुश!
सच कहूं तो वह बेहद डरपोक इंसान था. कुछ और कड़वा कहूं तो वह कायर भी था. पुलिस का नाम सुनते ही उसकी घिग्गी बंध जाती. उसकी इस कमजोरी से गांव के पंडितजन भी परिचित थे. तब दखनपल्ली के सबसे बड़ा जमींदार गजरतन सिंह कैसे अजाना रह सकता था. गांव की सबसे ज्यादा जमीन भी तो उसी के पास थी. उसी के खेतों में काका काम किया करता था. लोकनिंदा से बचने के लिए जमींदार छठे-छमाहे काका की झोली में कुछ दाने डाल देता था. जिन्हें वह बिना किसी हील-हुज्जत के घर ले आता. महीनों की मेहनत के बदले उन दानों को पाकर काका पर क्या गुजर रही है, यह जान पाना कठिन था. उस समय काका का पथराया चेहरा कुछ भी समझने का अवसर नहीं देता था. उन दानों को चुपचाप दालान में पटककर वह तेज कदमों से बाहर निकल जाता था.
उस समय उसकी अम्मा से बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी. अम्मा को भी इतनी फुर्सत कहां थी कि इस बारे में काका से बात कर सके. अगर वह कुछ कहे भी तो काका पर उसका असर कहां पड़ता था? घर का असली खर्च तो बुआ की कमाई से चल जाता था. वह भट्टे पर ईंट पाथने का काम करती थी. भट्टा भी गजरतन सिंह का ही था. उसकी सारी देखरेख विट्ठल के हाथों में थी.
काका जितना सहनशील था, बुआ उतनी ही उग्र. जुबान पर आई बात को रोक पाना उसके लिए असंभव था. उसकी जुबान का सामना कर पाना बड़े जिगर वाले का काम था. बुआ की शादी ठीक समय पर हुई थी. किंतु जब पांच-छह साल बाद भी बुआ के कोई संतान न हुई तो सास-ससुर की ओर से ताने और उलहाने मिलने लगे. बुआ से यह सब सहन नहीं हुआ. एक दिन सबकुछ छोड़कर वह अपने मैके लौट आई. घर का एक बड़ा कमरा बुआ के हवाले कर दिया गया. जिसमें वह अपनी जिंदगी के बाकी दिन काटने के लिए रहने लगी. मां का वे अपनी बड़ी बहन जितना सम्मान करती थीं. मुझे याद नहीं पड़ता कि ननद भौजाई में कभी खटपट हुई हो.
विट्ठल के भट्टे पर और भी कई औरतें काम करती थीं. अपने उग्र स्वभाव और हाजिरजवाबी के कारण बुआ अघोषित रूप से उन सभी की नेता बन गई. मजदूर औरतों की कोई भी समस्या होती तो वे तुरंत हस्तक्षेप करती. मामला यदि भट्टे से संबंधित हो तो वे सीधे विट्ठल से जा उलझतीं थी.
‘तू क्यों आई है यहां? जिसको शिकायत है उसके मुंह पर क्या ताला लटका हुआ है?’ बुआ का दूसरों की हिमायत में उतर आना विट्ठल का बहुत अखरता.
‘मेरे आने से ही आपका कौन-सा मान घट गया भैया. फिर इमरती इस गांव की बहू है और मैं बेटी. वह आपके सामने मुंह खोलकर कुछ कहे तो क्या आपकी शान में यह ठीक रहेगा?’ एक मजदूर औरत द्वारा भैया का संबोधन विट्ठल को अच्छा न लगता. लेकिन गांव की परंपरा ही कुछ ऐसी थी. इसलिए भीतर ही भीतर तिलमिलाने के बावजूद वह कुछ कह नहीं पाता था.
‘आखिर एक न एक दिन तो तू ससुराल जाएगी ही. तब तो उसको सामने आना ही पड़ेगा.’ विट्ठल तर्क देता.
‘तब की तब देखी जाएगी, भैया. कुछ दिन तो उसको अपनी शर्म निभा लेने दो.’
‘तू कहना चाहती है कि मेरे मुंशी ने बेईमानी की है?’
‘मैं ही क्यों? सभी का यही मानना है. आपका मंुशी सभी से कम रुपये देकर ज्यादा पर अंगूठा लगवाना चाहता है.’
‘उनसे कहो कि वे ऐसे बेईमान मुंशी के नीचे काम न करें. काम-धंधे के लिए कोई और ठिकाना ढूंढ लें.’
‘सीधे-सीधे कहिए भैया कि आप उन्हें काम से निकालना चाहते हैं?’
‘मैं तो उनकी शिकायत दूर करना चाहता हूं.’
‘तब तो मुंशी को समझाएं….यह आपका फर्ज है?’
‘मुझे अधिक से अधिक लाभ पहुंचाना भी उसी का फर्ज है. जिस काम को वह मेरे लाभ के लिए करता है, उसके लिए मैं उसको मना कैसे कर सकता हूं.’ कहकर वह बेशर्म हसीं हंसा. बुआ सुनकर तिलमिला गई.
काका बताया करता था कि उन दिनों वह जवान था. बुद्धि भी इतनी न थी कि दुनियादारी को समझ सके. इसमें वह अपना कसूर कम ही मानता था. उसके अनुसार जवानी स्वयं एक बीमारी है. जो कमअक्ली और उतावलेपन को अपने आजू-बाजू रखती है. उस दिन जैसे ही पता चला कि विट्ठल ने उसकी बहन का मजाक उड़ाया है, वह फौरन उसके पास जा धमका था. गुस्से से तमतमाया हुआ चेहरा लेकर. विट्ठल उससे कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ा था—
‘मजदूर को उसकी पूरी मजदूरी तो मिलनी ही चाहिए, ठाकुर!’
‘ठीक है पर तुझे क्या? तू उनका नेता बनकर आया है?’
‘जेठी बता रही थी कि तुम मजदूर औरतों से अंगूठा पांच सौ पर लगवाते हो और देते हो केवल दाई सौ रुपया.’ काका कहता था कि गुस्सा उसको उन दिनों भी कम ही आजा था. लेकिन जब आता तो वह आगा-पीछा सब भुला देता था.
‘कहा न कि तू अपना काम देख.’ विट्ठल ने घुड़का. वह हमेशा गुमान से तना रहता था. इसका कारण भी था. अभी तक सारे मजदूर उसी मनमानियों को चुपचाप सहते आए थे. उसे तनिक भी उम्मीद न थी कि कोई मजदूर उसके आगे इस प्रकार अड़ सकता है.
‘अपना काम ही देख रहा हूं.’ काका सचमुच अड़ गया था—‘यह सरासर बेईमानी है.’
घमंड से चूर विट्ठल काका पर हाथ छोड़ने को आगे बढ़ा. परंतु वह सावधान था. उसने झट से विट्ठल का हाथ थाम लिया. वहां और भी लोग जमा थे. जिनमें अधिकांश मजदूर औरतें थीं. काका का गुस्सा देखकर विट्ठल की हिम्मत ही पड़ी. वह गुस्से से गाली निकालने लगा. बाद में वह पूरी मजदूरी देने को भी तैयार हो गया. इस घटना के पश्चात काका कुछ दिनों तक मजदूर बस्ती का हीरो बना रहा. परंतु उसकी खुशी कुछ ही दिनों की मेहमान रही. एक दिन चोरी का आरोप लगाकर विट्ठल ने बुआ और उन सब औरतों को काम से हटा दिया जो उस दिन बुआ के साथ थीं. उन दिनों काका भी विट्ठल के खेतों में बेगार करता था.
उस घटना के कुछ ही दिनों बाद भट्टे के बाहर लगे भूसे के ढेर में आग लग गई. विट्ठल ने उस दुर्घटना की सारी जिम्मेदारी बापू के ऊपर डाल दी. पुलिस आई. तब तक बुआ को इस साजिश की खबर मिल चुकी थी. वह तिलमिलाती हुई वहां पहुंची और चिल्ला-चिल्लाकर सारी हकीकत बयान करने लगी.
‘यह औरत कौन है?’ थानेदार ने बुआ की ओर देखकर सवाल किया.
‘इसी गांव की बेटी है हुजूर?’ जमींदार की ओर से उसके मुंशी ने जवाब दिया था.
‘इसका ब्याह नहीं हुआ.’
‘सबकुछ हुआ था हुजूर. लेकिन आदमी से निभी नहीं.’
‘तो सीधे-सीधे बता न कि छोड़कर चली आई. तभी तो इतनी गर्मी है. क्यों ठाकुर क्या तुम्हारे आदमियों में एक मर्द भी ऐसा नहीं है जो इसकी गर्मी उतार सके?’ थानेदार की बात पर वहां मौजूद सभी लोग खी-खी कर हंसने लगे थे.
‘आप तो जानते हैं कि अपने ठाकुर साहब बहुत भले आदमी हैं. मुंह से तू कहना तो ये जानते ही नहीं. फिर इस छिनाल से कैसे पार पा सकते हैं. इसीलिए तो आपको बुलाया गया है हुजूर!’
‘इससे तो आपके ये मुंशी जी ही निपट सकते हैं, क्यों मुंशी जी?’
‘बुढ़ापे के कारण मजबूर हूं जनाब! नहीं तो क्या इतनी नौबत आने देता.’
‘हूं! तब तो हमें ही कुछ करना पड़ेगा, क्यों ठाकुर साहब?’
‘यही आस लेकर तो आपकी शरण में आया हूं.’
‘ध्यान रहे, रुकी हुई औरत आदमी को बूंद-बूंद निचोड़ लेती है.’
‘आपकी तंदरुस्ती को बनाए रखने की जिम्मेदारी मेरी है, हुजूर.’
‘अगर ऐसा है तो आप इसे हमारी कोठी तक पहुंचाने का इंतजाम कर दें. बाकी निश्चिंत हो जाएं. मैं सब संभाल लूंगा.’
‘सो तो हो जाएगा साहब. परंतु जरा संभल के. हमारे मालिक साहब अगला चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं.’ मुंशी कान में फुसफुसाया.
‘तब तो और भी अच्छा है. उसके बाद भी यदि चबड़-चबड़ करे तो कह देना कि विपक्षी उम्मीदवार की साजिश पर, नीच जात की औरत ठाकुरों को बदनाम करने का नाटक रच रही है. एक अच्छी-खासी ब्याहता स्त्री के होते भला कोई ठाकुर अछूत औरत के पास क्यों जाएगा. लोग मान जांएगे.’
‘हुजूर अछूतों के सारे वोट कट जाएंगे.’
‘इस गांव में अछूत वोट हैं ही कितने. मामला अगर ज्यादा आगे बढ़ा तो ठाकुरों के सारे वोट तुम्हारी ओर चले आएंगे.’
‘समझ गया सिरीमान!’ मुंशी ने गर्दन हिलाई. वह विट्ठल का मुंह लगा नौकर था. गांव की जाति परंपरा के लिहाज से उसकी जाति भी अछूतों की श्रेणी में आती थी. लेकिन विट्ठल के साथ रहकर अपनों को बिल्कुल भूल चुका था.
कुछ दिनों के बाद बुआ ने काम पर जाना बंद कर दिया. अम्मा ने उसको बहुत समझाया. लेकिन उसका मौन भंग न हुआ. एक दिन किसी को कुछ भी बताए बिना वह घर से गायब हो गई. काका ने बहुत खोजा. तलाश में आदमी इधर-उधर दौड़ाए. अम्मा ने रो-रोकर आंखें सुजा लीं. परंतु बुआ के बारे में कोई खबर न मिल सकी. आठ-दस दिन के बाद काका को किसी ने बताया कि नदी से किसी औरत के कपड़े बरामद हुए हैं, जो बुआ के कपड़ों से मिलते-जुलते हैं. काका की इतनी भी हिम्मत न हुई कि उन कपड़ों को जाकर देख सके.
उस दिन के बाद काका बुझा-बुझा-सा रहने लगा. शापग्रस्त आदमी जैसी उसकी हालत हो गई. बुआ के घर छोड़ते ही सारी जिम्मेदारी अम्मा के कंधों पर आ गई. अम्मा मजदूरी करने लगी. किंतु विट्ठल के यहां पर काम पर जाना नहीं चाहती थी. उसके डर से गांव के बाकी किसान उसको काम पर रखने से कतराते थे. काका भी बेगार करना बंद कर चुका था. निदान अम्मा और काका दोनों काम की खोज में आस-पास के गांवोें मेें जाने लगे. वहां उन्हें मजदूरी तो मिलती, किंतु ढेर सारा समय आने-जाने में ही निकल जाता था. घर लौटते समय बहुत देर हो जाती. पहंुचते-पहंुचते दोनों थक जाते. काका तो आते ही चारपाई थाम लेता था. मां को घर का चूल्हा-चैका सभी कुछ सहेजना पड़ता. इसके बावजूद उनके चेहरों पर शिकन न थी.
दोनों के लिए जिंदगी का हर दिन एक अभियान था. हर लम्हा एक चुनौती.
सबल कहानियां गढ़ता है. निर्बल स्वयं एक कहानी बन जाता है.
दखनपल्ली से छह किलोमीटर दूर पश्चिम में बसा था—बेगमपुर! इलाके के लोगों में इतिहास चेतना के अभाव में यह बता पाना तो बहुत कठिन था कि वहां पर किस बादशाह की बेगमें रहती थीं. या उस गांव का किस बेगम से कैसा संबंध रहा था. गांव की भौगोलिक स्थिति बताती है कि किसी जमाने में वह अवश्य ही खास स्थान रहा होगा. उन दिनों वहां के निवासी बहुत गरीब थे. उन्हें देखकर साफ पता चल जाता था कि इलाके का विकास शताब्दियों से ठहरा हुआ है. बढ़ी हुई जनसंख्या ने उसकी हालत को और भी दयनीय बनाया था.
बेगमपुर गांव का खास इलाका था, बेगम चैराहा. गांव की तकदीर से उलट. जहां गांव में सुबह-शाम सन्नाटा पसरा रहता. वहीं बेगमपुर चैराहे पर जिंदगी हर पल नई करवट लेती. गांव की तीन-चैथाई आबादी बेगमपुर चैराहे पर बनी छोटी-छोटी दुकानों और गुमटियों में बसी हुई थी. आधे से अधिक लोग वहां रोजगार के बहाने से आते रहते थे.
पचीस-तीस वर्ष पहले तक उस चैराहे पर केवल एक झोपड़ी हुआ करती थी. आगे चलकर वहां पर कुछ गुमटियां बनने लगीं. सबसे पहले पान-बीड़ी-तमाखू और खोमचा लगाने वाले छोटे दुकानदार आए. फिर नाई की दुकान और चाय के खोखे बनने लगे. यह सब बहुत आहिस्ता-आहिस्ता हुआ. समय के साथ बेगमपुर गांव इलाके में उभरने लगा. आबादी और क्षेत्रफल में अधिक होने के बावजूद दखनपल्ली बेगमपुर के मुकाबले पिछड़ता गया. वस्तुतः जिस स्थान पर पहले-पहल झोंपड़ी डालकर बसावट की शुरुआत की गई थी, वहां से आस-पास के अनेक गांवों को रास्ता गुजरता था. लोगों के आने-जाने से वहां भीड़ बनने लगी. अवसर देखकर छोटे दुकानदार बेगमपुर मोड़ पर अपना धंधा जमाने लगे. तथापि बेगमपुर की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव वहां शराब का कारखाना लगने के बाद ही आया. उस कारखाने में घटी एक दुर्घटना ने उस मामूली से कस्बे को दुनिया-भर में चर्चित कर दिया.
कारखाना शुरू हुए तब तक दो साल से ज्यादा हो चुके थे. एक बार कारखाने के बायलर का वाल्व अचानक खराब हो गया. जिससे भाप की सप्लाई अवरुद्ध हो गई. दबाव बढ़ने से पाइप फट गया. वहां पर काम कर रहे दर्जन-भर से ज्यादा कर्मचारी बुरी तरह झुलस गए. सात की ठौर मृत्यु हो गई. दुर्घटना कारखाने के इंजीनियर की लापरवाही से हुई थी, जो मालिक का भतीजा था. दुर्घटना के बाद खूब बावेला मचा. आनन-फानन में मजदूर संगठन खड़ा हो गया. दोषी इंजीनियर को बर्खास्त करने की मांग की जाने लगी.
कर्मचारियों को एकजुट होते देख मालिकों में हड़कंप मच गया. उन्होंने संगठन में फूट डालने का भरसक प्रयास किया. परिणामस्वरूप संगठन में ऐसे लोग घुसा दिए गए जो मालिक के समर्थक थे. इससे वह दो-फाड़ हो गया. दोनों दलों में दंगा-फसाद की स्थिति उत्पन्न हो गई. परिणाम यह हुआ कि कारखाना महीनों तक बंद रखना पड़ा. बाद में पीड़ित कर्मचारियों के आश्रितों को मुआवजा मिलने के बाद ही दुबारा काम शुरू हो सका.
इस पराजय ने मालिकों को सतर्क कर दिया. उन्होंने सावधानी अपनाते हुए स्थायी कर्मचारियों की भर्ती पर रोक लगा दी. इससे कारखाने में ठेका प्रथा की शुरुआत हुई. उन दिनांे तक गजरतन सिंह की हैसियत केवल इलाके के जमींदार के रूप में थी. उन्हें यह डर सदैव लगा रहता था कि आजादी के बाद भूपरिसीमन कानून लागू होते ही उनकी सत्ता जाती रहेगी. जमीन छिन जाने के डर से उसने उसका बड़ा हिस्सा अपने खानदान के लोगों के नाम करा दिया था. साथ ही अपनी आर्थिक स्थिति को बनाए रखने के लिए इधर-उधर भी हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए थे.
शराब के कारखाने में ठेकेदारी शुरू होना उसके लिए अच्छा अवसर बना. उसने ठेकेदारी के लिए खुद को आगे कर दिया. कारखाने वालों को उसके जैसे ही दबंग आदमी की जरूरत थी. गजमिंदर सिंह की सामाजिक हैसियत के आगे किसी और को ठेका मिलना भी नहीं था. इससे कारखाने को इलाके में ही अपना एक मजबूत समर्थक मिल गया.
दखनपल्ली और आस-पास के गांवों में गजरतन सिंह का प्रभाव था. बताते हैं कि उसके परदादा हरदन सिंह बिठूर रियासत की फौज में ओहदेदार हुआ करते थे. झांसी के राजा की मौत के बाद जब उत्तराधिकार का संघर्ष चला तो बिठूर की महारानी ने भी झांसी पर अपना दावा पेश कर दिया. परंतु महत्त्वाकांक्षी रानी लक्ष्मीबाई ने उसके दावे को नकार दिया. वह स्वयं उन दिनों अंग्रेजों से झांसी की स्वायत्तता के लिए जूझ रही थीं. इससे क्षुब्ध होकर बिठूर की महारानी ने झांसी पर हमला कर दिया. झांसी की आर्थिक स्थिति उन दिनों कमजोर थी. अंग्रेजों से लगातार जूझने के कारण उसका खजाना लगभग खाली हो चुका था. तो भी बहादुर रानी ने बिठूर की फौज का डटकर मुकाबला किया. रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में बिठूर की सेना को गहरी शिकस्त मिली. उसकी सेना इधर-उधर छितरा गई.
एक स्त्री के हाथों मिली पराजय को गजरतन सिंह के परदादा झेल न पाए. लौटने पर बदनामी होगी, यह सोचकर उन्होंने प्रजा से मुंह छिपा लेना ही ठीक समझा. उन दिनों तक दखनपल्ली के चारों ओर जंगल ही जंगल था. जमीन उपजाऊ थी. अपने साथी सैनिकों के साथ रिसालदार हरदन सिंह ने वहीं डेरा डाल लिया. थोड़ा वक्त बिताने के लिहाज से सैनिकों ने खाली पड़ी जमीन को तैयार करना शुरू कर दिया. वर्षों से खाली पड़ी जमीन पर बीज पड़े तो वह भरभरा कर फसल उगलने लगी. यह देख सैनिकों का मन भी भर गया. उनमें से कई युद्ध की भागमभाग से ऊब चुके थे. उन सैनिकों को वह इलाका बहुत ही शांत लगा.
परिणाम यह हुआ कि कुछ महीनों के लिए डाला गया अस्थायी पड़ाव, पक्का ठिकाना बन गया. धीरे-धीरे रिसालदार हरदन सिंह का कुनबा बढ़ा. सैनिकों की भी गृहस्थियां जमने लगीं. उन्होंने आस-पास के जंगल पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया. वक्त के साथ-साथ वहां पर नई जमींदारी पनपने लगी. उसके लिए हरदन सिंह को इलाके के पुराने जमींदारों से भी लड़ाई झेलनी पड़ी. अपनी जमींदारी बचाने के लिए उन्होंने वह भी किया.
तब तक अंग्रेज हिंदुस्तान पर छा चुके थे. चतुराई से काम लेते हुए हरदन सिंह ने एक अंग्रेज अधिकारी से दोस्ती गांठ ली. उसके बाद तो विरोध ठंडा पड़ता गया. उनकी जमींदारी दिनोंदिन पनपने लगी. अठारह सौ सत्तावन का सैनिक विद्रोह भले ही ठंडा पड़ चुका हो, लेकिन दिल्ली की सत्ता को चुनौती देने वाले स्वाधीनताप्रेमी अब भी कम नहीं थे. अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ने के लिए वे लोग लगातार जूझ रहे थे. हरदन सिंह अंग्रेजों का साथ निभाते हुए विद्रोहियों की सूचना अंग्रेजों तक पहंुचाने लगे. इस कारण अंग्रेजों से उनकी निकटता बढ़ती चली गई. इससे उनका प्रभाव भी बढ़ने लगा.
अंग्रेजों की चाटुकारिता के लिए लोग उनके मुंह पर भले ही कुछ न कहते हों मगर पीठ पीछे उनकी आलोचना करने वालों की कमी न थी. इलाके-भर के लोग उनका नाम आते ही थू-थू करने लगते. जो विद्रोही सैनिक अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए मारे गए वे भी उसी समाज के सपूत थे. पराजित होने के बावजूद लोगों के मन में उनके प्रति श्रद्धाभाव था. उस श्रद्धाभाव को व्यक्त करते हुए लोकगीत रचे जाने लगे. उनमें हरदन सिंह की अंग्रेज चाटुकारिता के लिए निंदा होती. अंग्रेजों की सरपरस्ती के बावजूद हरदन सिंह विराट जनसमुदाय से टकराने की स्थिति में न थे. देह में दबे पांव प्रवेश करते बुढ़ापे के साथ उन्हें यह एहसास भी होने लगा था कि अंगे्रजों का साथ देकर उन्होंने गलती की थी. पछतावा देह में असाध्य बीमारी बनकर घुस गया. जो भी हो, जब वे मरे तो रायबहादुर का खिताब उनके नाम पर था.
हरदन सिंह के बाद जमींदारी की बागडोर उनके बेटे नवरतन सिंह ने संभाली. तब तक देश में आजादी का आंदोलन जोर पकड़ हो चुका था. अपनी लंबी-चैड़ी जमींदारी को बचाने के लिए नवरतन सिंह ने कांग्रेसी नेताओं के साथ संबंध गांठना शुरू कर दिया. भूदान आंदोलन में अपनी सौ एकड़ जमीन दान करके उन्होंने खूब शाबाशी बटोरी. सभी जानते थे कि वह जमीन दलदली और गैरकानूनी ढंग से कब्जाई हुई है. सालों से उसपर कोई फसल नहीं ली गई थी.
एक हजार एकड़ जमीन से ज्यादा के मालिक नवरतन सिंह के लिए वह दान कुछ भी नहीं था. फिर भी उसके बाद वे राजनीति में भी जम गए. इससे उनके पिता ने अंगे्रजों का साथ देकर जो बदनामी बटोरी थी, उसका दाग फीका पड़ने लगा. आगे चलकर वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़े. किंतु तब तक दमे की बीमारी ने उन्हें तोड़कर रख दिया था. दौड़-धूप करना कठिन हो चुका था. बीमारी ने उन्हें ज्यादा दिन जीने की इजाजत भी नहीं दी. और अपनी सारी विरासत अपने बेटे सुखरतन सिंह के कंधें पर डालकर वे इस दुनिया सेे कूंच कर गए.
सुखरतन सिंह वणिक बुद्धि के निकले. उन्होंने बेगमपुर की भौगोलिक स्थिति को परखा और चैराहे से करीब आधे मील की दूरी पर, सड़क किनारे बंजर पड़ी सौ एकड़ जमीन को औने-पोने दामों में खरीद लिया. इस घटना के करीब पांच वर्ष बाद ही लंदन की एक बड़ी शराब उत्पादक कंपनी की नजर उस इलाके पर पड़ी. कंपनी वहां पर शराब का कारखाना लगाना चाहती थी. आसपास ईख की खेती और सस्ती मजदूरों के लिए वह इलाका कारखाने के मालिकों को भा गया.
जमीन के लिए सुखरतन सिंह से बात की गई. वे शराब के कारखाने में अपनी हिस्सेदारी चाहते थे. साथ ही स्थानीय राजनीति में जमे रहना भी उनकी महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा था. इस कारण उनके हितेषियों ने शराब कारखाने से दूर रहने की सलाह दी, जिसे उन्होंने मान लिया. बदले में कंपनी की ओर से उन्हें व्यापार जमाने में मदद देने का भरोसा जताया गया.
अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने जमीन का सौदा विल्मोर के नाम कर दिया. हालांकि इसके लिए भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा. इससे पहले उनके परिवार में जमीन बेचने की कोई मिसाल नहीं थी. इस काम को निकृष्ट समझा जाता था. जमीन बेचने पर लोगों ने मान लिया कि उनके खानदान के उतार के दिन शुरू हो चुके हैं.
लालच में आकर सुखरतन सिंह ने सौदा तो कर लिया था, मगर उन्हें भी यह लग रहा था कि उन्होंने खानदान की इज्जत को बट्टा लगाने का काम किया है. इसी पीड़ा ने उनको शराब के पास ला पटका. एक दिन भारी नशे की हालत में जब वे रथ पर सवार होकर बाहर से लौट रहे थे, बैल अचानक बिदक गए. लीक छोड़कर वे खेतांे की ओर भाग लिए. सुखरतन सिंह ने रथ से छलांग लगा दी. किंतु नशे के कारण खुद पर काबू नहीं रख पाए और रथ का पिछला पहिया उनकी छाती से गुजर गया. महीनों तक वे बिस्तर पर रहकर इलाज कराते रहे. आखिरी वक्त करीब आ चुका था, इस कारण सारे तामझाम बेकार पड़ते गए.
गांव वालों ने उस दुर्घटना को अपने उसी सोच की परिणति माना, जिसकी आशंका उन्हें बहुत पहले से थी. बाद में गजरतन सिंह ने विरासत संभाली. तब तक उस खानदान का मान-सम्मान अपने ढलान पर पहंुच चुका था. हैसियत बनाए रखने के नाम पर चोरी-छिपे जमीन-जायदाद बेचने का सिलसिला बढ़ता ही गया. पीढ़ी दर पीढ़ी बंटते हुए जमीन घटती भी जा रही थी. कुछ जमीन को नए कानून का सहारा लेकर किसान कब्जा चुके थे. परिवार की डोर इन दिनों ब्रजरतन सिंह के हाथों में थी, जिन्हें लोग प्यार से विट्ठल कहते थे.
ब्रजरतन सिंह उर्फ विट्ठल नए जोश और होश के साथ जमींदारी के रुतबे को फिर वापस लौटाने की कोशिशों में था. ज्यादा कमाई के लिए वह नए क्षेत्रों में भी पांव पसार रहा था. विल्मोर को अपने विस्तार के लिए ईंटों की जरूरत होगी, यह सोचकर उसने भट्टा लगाने की पहल की. फिर ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय शुरू किया. एक जमींदार का बेटा ट्रांसपोर्ट का काम करेगा….ईंटें पथवाएगा—यह कहते हुए लोगों ने शुरू में उसकी खूब आलोचना की. दूरदर्शी विट्ठल ने उन सब को नजरंदाज कर दिया. जिन दिनों उसने विल्मोर में ठेकेदारी की शुरुआत की, उस समय तक वक्त काफी आगे बढ़ चुका था. कभी आलोचना करने वाले लोग इस बार उसकी उद्यमशीलता का गुणगान कर रहे थे.
यह तो तस्वीर का एक पहलू ठहरा. दूसरा पहलू यह था कि विट्ठल की तमाम मेहनत और लगन के बावजूद जमींदारी हाथ से जाने का वक्त आ चुका था. हालांकि दूसरे धंधों के जम जाने के कारण हाथों में नकदी का आना-जाना बढ़ा था. ठेकेदारी के बाद से शराब के कारखाने से मुफ्त में मिलने वाली शराब का कोटा बढ़ा था. मगर निरी शराब से दौलत का नशा कहां थमने वाला था. इस कारण दुर्गुणों की कतार में रंडीबाजी और जुआ भी शामिल हो गए. उन्हें संभालने के लिए चापलूसों और चुगलखोरों का एक दल उसके इर्दगिर्द जमने लगा. इस तरह पहले दौलत बढ़ी, फिर उसका गुमान, उसके बाद गुमान का सामान भी बढ़ने लगा.
आतंक सिर्फ ताकत का नहीं पूंजी का भी होता है, अपने विरोधियों को ठंडा करके विल्मोर यह सिद्ध कर चुकी थी. विट्ठल उसे दोहरा रहा था.
क्रमश:…
ओमप्रकाश कश्यप

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