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दंश: बीसवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

बौराया हुआ आदमी खेद प्रकट करते समय भी पचास बार सोचता है.

उस घटना का मेरे मन पर गहरा प्रभाव पड़ा था. एकदम अमिट….अभूतपूर्व और अनोखा! मेरा मन वहां के माहौल के प्रति वितृष्णा भरा था. जिस बड़ीम्मा को देखकर मुझे अपनी मां याद आने लगती, उससे भी मुझे सैकड़ों शिकायतें थीं. जिनका कोई सिर था न पैर. वे शिकायतें कितनी वाजिब थीं, बता नहीं सकता. कई बार तो शिकायतें क्या हैं, यह बता पाना भी कठिन था. लेकिन उनका स्मरण होते ही आज भी दिलोदिमाग भन्ना जाते हैं. दिल में समाई नफरत सिर उठाने लगती है. परंतु वहां नहीं तो और कहां? किसके पास, किस गांव शहर में डेरा डाला जाए कि किसी का डर ही रहे. जहां ऐसे लोग ही न हों. अपनी तरह से मजे की जिंदगी जी जाए, पर कैसे? उन दिनों यह मुश्किल सवाल मेरे सामने था.

उस कस्बे में आए धीरेधीरे महीना बीत चुका था. बापू के आने की उम्मीद टूटती जा रही थी. और सच कहूं तो उस अप्रिय संसार में रहता हुआ मैं बापू और बापूधाम दोनों ही को भूलता जा रहा था. हां कभीकभी जब मां की याद आती तो दिल बेचैन हो उठता. मन निराशा के गर्त में गोते खाने लगता. हैरानी की बात, उसी समय जीवन में आस्था के प्रतीक जैसी कोई न कोई घटना अकस्मात घटती और पूरे नैराश्यबोध को मटियामेट कर जाती. मन फिर नए संकल्प सजाने लगता था. कुछ ऐसा नया घट जाता जो जीवन के ठंडाते सपनों को, नई आंच दे जाता. मुरझा चुकी उमंगे फिर ताजादम हो जातीं. अंधेरे के बीच रोशनी की एकाध किरण फूटती को कई दिनों के सफर का हौसला बंध जाता. समय को मैं हमेशा कोसता आया था. मगर उस समय वही मेरी बांह थामे हुए था. वही मुझे जिंदगी की पगडंडियों पर आगे लिए जा रहा था.

मां के साथसाथ भाईबहनों की याद भी मुझको आती. उस समय उदासी घेर लेती. गर्दन झटकाकर मैं ऐसे बोझिल सवालों से खुद को बचा तो जाता. किंतु बाहरी मदद के बिना, अकेले ही खुद से, अपनी आत्मा से भागने की कोशिश में उस समय मुझको कितनी वेदना झेलनी पड़ती थी, यह बता पाना संभव नहीं है. और तब पलायन के समय खुद को झूठी तसल्ली देने के लिए मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात आती थी कि, ‘जब उनके जन्मदाता को ही उनकी फिक्र नहीं है, तो मुझे क्यों हो?’

यह जिम्मेदारी से पलायन का ओछा तर्क था. स्वार्थभावना से प्रेरित. सच कहूं तो पुलिस का आतंक इतने दिनों बाद भी मेरे दिलोदिमाग पर बुरी तरह से छाया हुआ था. शहर पहुंचकर बापू की खोज करने, भाईबहनों के साथ रहने, उन्हें अपने साथ रखने की बात तो दूर, अपने शहर और बस्ती का नाम बताने पर भी मेरी रूह कांप जाती थी. यही कारण है कि मैंने नाम के सिवाय, अपने बारे में किसी को कुछ भी नहीं बताया था. इसके बावजूद यदि वहां कभी उस शहर का जिक्र छिड़ जाता, तो मैं खुद को लोगों की निगाहों से छिपाने लगता था.

उस जगह से ऊबकर मैंने वहां से दूर चले जाने का फैसला भी किया था. इसी रौ में एक बार रेलगाड़ी में सवार हो गया. एक्सप्रैस गाड़ी एक बार चली तो बिना रुके घंटों चलती रही. लेकिन हर पल मेरी धड़कनें बढ़ती गईं. प्लेटफार्म छोड़ते ही मुझे यह डर सताने लगा था कि पीछे यदि बापू वहां पहुंचा तो क्या सोचेगा. रेलगाड़ी की गति कम होते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. मन में डरावने विचार आने लगते. स्टेशन पर टहलते टीटी और पुलिस को देखते ही मेरी रूह कांपने लगती.

जैसेतैसे वक्त बीता. सुबह ट्रेन जब रुकी तो मैं उतर गया. न जाने कौनसा शहर था. उसके बारे में जानने की जरूरत भी मुझको महसूस नहीं हुई. नई स्थान पर अपने लिए नया ठिकाना खोजने की बात तो दूर, प्लेटफार्म से बाहर जाने की हिम्मत तक न पड़ी. डरताडराता मैं रात होने की प्रतीक्षा करता रहा. मौका मिलते ही मैं एक खचाखच भरे डिब्बे में सवार हो गया. सुबह आंखें खुलीं तो मैं उसी प्लेटफार्म पर था, जहां बापू मुझे छोड़कर गया था. पूरा सफर मन ही मन यह प्रार्थना करते हुए बीता था कि मेरे वापस पहुंचने से पहले ही बापू वहां न लौट आए.

चैबीस घंटे से ज्यादा बीत चुके थे. सलीम को मैंने प्लेटफार्म पर ही पाया. मुझे लगा कि वह मेरा ही इंतजार करने के लिए वहां आया हुआ है. और बात भी सत्य थी. सलीम ने ही बताया कि सुबह से खुद बड़ीम्मा चार बार प्लेटफार्म पर आ चुकी हैं. ना जाने क्यों….एक दम आश्चर्यजनक रूप से मेरे दिमाग में यह विचार आया था. हालांकि मेरे विचारों में उसके लिए कोई सुनिश्चित व्यवस्था नहीं थी. और वह विचार यह था कि मैं पूंछू कि क्या कोंसा भी मुझे देखने आई थी? हालांकि यह एक मूर्खतापूर्ण विचार था. लेकिन मां के जाने के बाद यह पहली बार हुआ था, जब किसी ने मेरी परवाह की थी.

सलीम ने जब कोंसा के न आने के बारे में बताया तो मुझे ठेस पहुंची थी. भूल गया कि कोंसा के पिता गंभीर रूप से बीमार हैं….कि उस रात कोंसा का हालचाल पूछने के लिए बड़ीम्मा के पास जाकर भी मैं वापस लौट आया था. उसके बाद कभी उसके दुःख को समझने की गंभीर कोशिश भी नहीं की. अपने ग्लानिबोध से उबरने के लिए मैंने यह सोचकर खुद को समझाना चाहा कि कोंसा अकेली लड़की है, ऊपर से बीमार पिता की जिम्मेदारी भी उस पर है. मैं तो यह मान ही लेता, बल्कि मान भी चुका था. परंतु तभी सलीम का आक्रोश फूट पड़ा. मुझे हैरानी में डालने के लिए उसके पास बहुत कुछ था.

नाम मत ले उसका…!’

क्या तुम दोनों के बीच कोई झगड़ा हुआ है?’ मैंने चैंककर पूछा. उस समय मैंने महसूस किया कि इस बात को लेकर मेरे मन में किसी प्रकार का भी दुःख नहीं था.

पागल हो गई है वो….पछताएगी एक दिन, बहुत पछताएगी!’ सलीम ने नाराजगी दिखाई. कोंसा को लेकर उसके गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था.

हो सकता कुछ काम लग गया हो. भगवान ने छोटीसी उम्र में ही उसको इतने दुःख दिए हैं कि बेचारी रातदिन परेशान रहती है.’ मैंने सलीम को तसल्ली बंधाने का नाटक किया. जिसकी प्रतिक्रिया से मैं पूरी तरह अनजान था.

वह कतई बेचारी नहीं है. बहुत ही मतलबी और चालाक है. मैं उसे अच्छी तरह समझ चुका हूं. अच्छा होगा कि तू भी जल्दी से जल्दी मान ले कि वह एक धोखेबाज लड़की है. झूठ बोलना, दूसरों के साथ छल करना उसका स्वभाव है.’

आखिर बात क्या है?’

बात क्या होती….धोखा हमारी आंखों ने खाया है. और तो और बड़ीम्मा जैसी वुजुर्ग औरत भी उसकी हकीकत को पहचान न सकी….!’ गुस्से के कारण सलीम इससे ज्यादा न कह सका. मैं सलीम के चेहरे की ओर देखने लगा. उसके चेहरे पर नएनए भाव घुमड़ रहे थे. मानों विचारों के बीच बाहर आने के लिए अफरातफरी मची हो. मैं आगे और कुछ पूछ पाऊं, उससे पहले ही सलीम बोल पड़ा.

कल तक जिस पूरन के कारण कोंसा को भारी कष्ट का सामना करना पड़ा था. जिसके कारण वह पूरे मुहल्ले में बदनाम था, बस्ती वालों ने जिसके कारण पूरन की बुराई मोल ली थी. आजकल वह बेशर्म उसी के साथ प्यार की पींगे बढ़ा रही है….कौन नहीं समझता की इस समय उसकी नीयत पूरन की दौलत पर है.’

मैंने चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई समझी. हालांकि भीतर ही भीतर मैं भी बेचैन हो रहा था. जिस दिन से पूरन ने अस्पताल में जाकर उसके पिता की देखभाल की थी, उसी दिन से कोंसा के ख्यालात उसके बारे में बदले थे. वह कोंसा के घर आनेजाने लगा था. उसके पिता के पास देरदेर तक बैठाबतियाता रहता था. अर्से से लोगों की सोहबत को तरस रहे बूढ़े को यह अच्छा लगना ही था. पूरन के आनेजाने से वह काफी खुश नजर आने लगा था. हालांकि सभी मान रहे थे कि यह पूरन का काईयांपन हैं.

वह धीरेधीरे कोंसा और उसके बूढ़े पिता पर डोर डाल रहा है. परंतु वे सभी जिंदगी को सहज भाव से लेने वाले लोग थे. इसीलिए मामूली सी टीकाटिप्पणी के बाद सभी ने उसे नजरंदाज करना शुरु कर दिया. वैसे भी जिंदगी की रोजरोज की जद्दोजहद में फंसे लोगों को फुर्सत ही कहां थी कि वे ऐसे मुद्दों को तूल दे सकें. उनमें से कई तो विद्रोही किस्म के थे. जिन्हें जिंदगी का अनुशासन समझ ही नहीं आता था. ना ही शुचिता और पवित्रता की बातें. न समाज के बंधन, उसकी मर्यादाएं और उसके बाकी रागरंग. तभी तो उन्होंने आम जीवनशैली को ठुकराकर खानाबदोश जिंदगी का हाथ थामा था.

मैं केवल एक रात उन लोगों से दूर रहा था. परंतु ऐसा लग रहा था मानो वर्षों बाद अपनों के बीच लौटा हूं. इसलिए जल्दी से जल्दी पूरे स्टेशन को देख लेना चाहता था. इच्छा थी कुछ लोगों से मिल लेने की. सबसे अधिक उत्सुकता बड़ीम्मा से मिलने की थी. रेलगाड़ी में जब तक था, तब तक कोंसा भी दिलोदिमाग पर छायी हुई थी. परंतु सलीम से मुलाकात के बाद उससे मिलने की सारी उत्सुकता समाप्त हो गई. मैं मालिक को बताए बिना पूरे दिन बाहर रहा था. उसकी नाराजगी का भी डर था. अत सलीम से विदा लेकर सबसे पहले उसी से मिलने के लिए चल दिया.

उन लोगों के पास रहकर मैंने महसूस किया कि यायावर लोगों की जिंदगी दिनों में बंटी होती है. उनके जीवन का प्रत्येक दिन स्वतंत्र होता है. जबकि आम जिंदगी में वर्तमान, भविष्य की भूमिका लिखता है. इसीलिए वहां समाज होता है, जो लीक तोड़ने वालों की आलोचना करता है.

ऊपर आसमान में धीरेधीरे ऊपर चढ़ता सूरज जिदंगी की ओर लौटने का संकेत दे रहा था.

मैं यायावर जिंदगी जीकर भी नियमों से आबद्ध रहना चाहता था.

यह कोई आसान काम नहीं था. समाज व्यक्ति को मर्यादित रहना सिखाता है. उसके सभी सदस्य एक जैसे नियमअनुशासन से बंधे होते हैं. ऐसे लोगों के बीच नियमों का पालन करना भी आसान होता है. लेकिन जहां कोई समाज ही न हो. हर रोज नए लोगों से मिलना, व्यवहार करना हो, वहां किसी व्यक्ति को एक ढर्रे पर चलने की सीख देना, उससे ऐसी कामना करना, उसको लांछित करने जैसा है.

मैं अजनबियों के बीच रहकर भी अकेला नहीं था. परिवार से दूर रहकर भी अपनों के बीच था. अंतर सिर्फ इतना है कि पहले रक्तसंबंधियों के बीच रहता था. अब मेरे आसपास कई अजनबी थे. अपरिचय का एहसास था, लेकिन उससे परायापन गायब था. बापू को गए दो महीने से ऊपर हो चुके थे. उसका कोई संदेश तक नहीं था. धीरेधीरे मैं उससे दूर रहने का अभ्यस्त होने लगा था. मां की याद अब भी आती थी. लेकिन अंतराल के साथ. सच कहूं तो अब उसके बिना रहने की आदत बनती जा रही थी.

सलीम से मुलाकात तो रोज होती थी. कभी प्लेटफार्म पर. कभी यार्ड में. लेकिन मैं उसके हवामहल में कम ही जाता था. बड़ीम्मा के पास जाना छोड़ दिया था. लेकिन ऐसा कम ही होता था, जब वह खुद चलकर मिलने न आती हों. मुझे फुर्सत में देखतीं तो पास बैठकर बतियाने लगतीं. भीड़ देखतीं तो दूर रहकर ग्राहकों के छंटने का इंतजार करतीं. फिर जरा भी उछीड़ देखकर करीब आकर सलाह देने लगती थीं

देख ये चांटपकौड़ी, कभीकभार खाई जाए तभी ठीक रहती है. नहीं तो पेट को जकड़कर बैठ जाती है.’ बड़ीम्मा का मतलब समझे बिना मैं उनकी देखने लगता. तब वह मेरी आंखों में आंखें गढ़ाकर कहतीं—

तेरा पीला पड़ता चेहरा बता रहा है कि तू खानेपीने के मामले में बहुत लापरवाह है. तेरी मां होती तो उसका कान पकड़कर समझाती कि बच्चे को अपने पास बिठाकर, अपने सामने खिलाना चाहिए. न तो सूखी रोटी भली है, न ज्यादा चिकनाई. यहां से काम निपटाकर मेरे पास आ जाया कर. तू उन निकम्मों के साथ नहीं खाना चाहता न, न सही. मैं तेरे लिए अलग से रोटियां डाल दिया करूंगी.’

बड़ीम्मा की बात पर मैंने चुप्पी साध ली थी. उन्होंने गलत भी नहीं कहा था. माल बिकते ही मालिक तो नामा समेटकर घर की राह लेता. मेरा काम था, बर्तनों को साफ कर दुकान को अगले दिन समय पर खोलने के लिए अच्छी तरह से तैयार कर देना. उस समय तक रात के कम से कम दस बच जाते थे. थकान से मेरा शरीर पूरी तरह टूटने लगता था. ज्यादातर ढाबे उस समय बंद होने की कगार पर होते. रात को बंद करने के बाद पकौड़ियों का काफी चूरा थाल में बचा रह जाता था. मैं रोटी के बजाय उसी को चबाकर पेट भर लेता. रात बिताने का इंतजाम हो जाता. लेकिन दिनभर का जमा चूरा पेट के लिए अच्छा नहीं था. परिणाम यह हुआ कि मेरा पेट खराब रहने लगा. इसका स्वास्थ्य पर असर पड़ना ही था. बड़ीम्मा की अनुभवी आंखें मेरी कमजोरी को ताड़ चुकी थीं. परंतु जाने क्यों जब भी वे कोई सलाह देतीं, मेरा मन विद्रोह कर उठता था.

इस बीच पूरन को भी देखा था. यार्ड में और रेलवे फाटक के पास खड़े बरगद के पेड़ के नीचे मजमा लगाते हुए भी. उसे देखकर वितृष्णा ही जागी थी मन में. आयु में वह कोंसा दुगुना था. पतलीइकहरी काया. आंखों पर काला चश्मा और बालों में भरा घना चिकनापन उसको शौकीन मिजाज सिद्ध करते थे. उसकी घनी भंवे और छोटीछोटी आंखों से धूर्तता टपकती थी. मुझे देखकर वह दूर से ही मुस्कान बिखेरने लगता. लेकिन उसकी मुस्कान में रूखापन देख, मन उससे दूर चले जाने को करता था. मैं तो उससे बात भी नहीं करना चाहता था. पर वही न जाने क्यों राह चलतों से भी बातचीत करने की उत्सुकता दिखाता रहता था.

क्या हाल है मास्टर! तेरा बापू लौटा?’ वह जब भी सामने से गुजरता, लगभग एक ही सवाल करता. पहले तो बापू का नाम उसके होठों पर आते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. डर से रोमरोम सिहर उठता था. इसलिए उसका जवाब देने के बजाय में उसके पास से चुपचाप गुजर जाना बेहतर समझता था—

यहां सिर्फ तू ही है, जो मेरी बात को इतना हल्केपन से लेता है.’ मैं यह समझने में नाकाम था कि वह मुझे इतनी एहमियत क्यों देता है. घर से अलग, लावारिस की तरह भटकते एक लड़के से उसका आखिर क्या मकसद सध सकता है? क्यों वह चाहता है कि मैं उसको गंभीरता से लूं? आखिर उसमें ऐसा है क्या! कोंसा ने अगर उसके साथ रहना मंजूर किया है तो यह उसकी विवशता है. मेरी तो कोई विवशता नहीं. मेरे प्रश्नों, संदेहों की शृंखला अंतहीन थी. मुझे चुप देख शायद उसका मनोबल बढ़ा.

इस प्लेटफार्म पर झूठे बर्तन साफ करने से आखिर जिंदगी तो कटनी नहीं…..’ उसने पासा फेंका. मैंने प्रश्नाकुल निगाह उसके चेहरे पर टिका दी.

मुझे अपने तमाशे के लिए एक लड़के की जरूरत है. तू चाहे तो साथ रह सकता है. जितना यह दुकानदार देता है, उससे दुगुना दूंगा. दिनभर का खानाखर्च ऊपर से. दिन में केवल पांचछह घंटे का काम करना, खाली समय में मेरी तरह मौजमस्ती.’

सलीम भी तो है…..’

वो लंगड़ा….शैतान की औलाद. वो तेरा दोस्त जरूर है, परंतु सच कहूं, मुझे वह जरा भी पसंद नहीं. मैं चाहता हूं कि तू भी उससे सावधान रहा कर. मुसलमान बच्चा है, वक्त आने पर पीठ में छुरा भोंके बिना थोड़े ही रहेगा.’

मुसलमान बच्चा! मेरे लिए यह नया संबोधन था. बापूधाम बस्ती में हिंदू भी थे और मुसलमान भी. पर उनमें भेद कर पाना कठिन था. सब मिलजुलकर रहते थे. जब बस्ती बसनी आरंभ हुई थी तो सबसे पहले हिंदुओं को अपने भगवान की याद आई थी. उन दिनों बापूधाम में केवल पंद्रहबीस झुग्गियां थीं. मर्द तो सुबहसवेरे काम पर निकल जाते थे. रह जाती थीं औरतें. घर के अभावों से जूझने के लिए. उन्हें एक सहारे की तलाश थी, जो उनके नाम पर अभावों से जूझ सके. जिसके बहाने वे खुशनुमा सपने देख सकें. जिसके वरदान से उनकी झुग्गी मोतीमाणिकों से भर जाए. घर में दूधदही की नदियां बहने लगें.

सपनों के अलावा इसकी सिद्धि भगवान के वरदान पर ही संभव थी. भगवान को कैद करके रखने के लिए मंदिर जरूरी था. मर्दों को सिवाय शराब के किसी और नशे पर भरोसा ही नहीं था. इसलिए उन्हें भगवान की मक्खनबाजी के लिए दूसरे मुहल्ले में जाना पड़ता था. इससे आनेजाने में समय तो लगता ही था. संभावना थी कि भगवान अगर दलिद्दर मेटेंगे तो पहले अपने मुहल्ले के. चूंकि उनके लगातार व्रतउपवास का परिणाम शून्य ही निकल रहा था, सो सभी यह मानने लगे थे कि भगवान अभी अपनेपराये के भेद से ऊपर नहीं उठ पाए हैं. उस मुहल्ले में जब सड़क बनने लगी और बापूधाम को छोड़ दिया गया तो बस्ती की औरतों का धैर्य जवाब देने लगा और वे बस्ती की दुर्दशा के लिए अपने नास्तिक और निखट्टू मर्दों को कोसने लगीं.

भगवान भी कई तरह के थे. तरहतरह से खुश होने वाले. किसी को मोतीचूर के लड्डू भाते थे तो किसी को आकधतूरा. किसी को खीर का चढ़ावा पसंद था तो किसी को हलुआपूरी के भोग में मजा आता था. उन सभी की पत्नियां भी थीं. आम औरतों की तरह अपनेअपने पति के निखट्टूपन को कोसने, बातबातपर लड़नेझगड़नेवालीं. दूसरों के पतियों की जी खोल कर प्रशंसा करने वालीं. ऐसे में बस्ती के मर्दों के सामने एक संकट यह भी था कि अपने नाकुछ संसाधनों से किस देवता को बापूधाम में सबसे पहले आसन दिया. अगर इससे दूसरा देवता बुरा मान गया तो. फिर देवियों को क्या एकाएक छोड़ा जा सकता है. बातबात पर दूसरे की आसनी को खींचने वाली देवियां क्या आसानी से समझौता कर लेंगी.

भारी असमंजस के बीच आगे आया, एक हनुमान भक्त. एक लाल पत्थर की शिला पर ढेर सारा गेरू पोतकर उसने उसको तेल से नहलाया. झुग्गियों से कोई पचास कदम दूर एक बबूल का पेड़ था. न जाने कैसे शहर के कचरे से बचा हुआ. महानगर से आनी वाली गाड़ियां कचरा भरकर लातीं और बबूल के चारों ओर डालकर चली जाती थीं. हनुमानभक्त ने गेरू से रंगी शिला बबूल के तने से टिका दी. उसी दिन बापूधाम का पहला मंदिर तैयार हो गया. बाद में बबूल के इर्दगिर्द महादेव, गणेश, विष्णु, रामलक्ष्मण और कृष्णमुरानी की मूर्तियां ऋद्धालुओं के प्रयास से जमा होती रहीं. अब इतने सारे देवता बिना देवियों के तो रह नहीं सकते थे. इसलिए दुर्गा, काली, चामुण्डा आदि देवियों को रिझाने के लिए भी उनके नाम के पत्थर बबूल के नीचे टिका दिए गए. नाक पर कपड़ा रख कचरे से बीच से गुजरते हुए ऋद्धालु औरतें वहां बिना नागा पूजाअर्चना के लिए आने लगीं.

उस समय तक बस्ती के मुसलमान परिवार चुप थे. लेकिन बापूधाम में जब देवताओं की आमद हुई तो उन्हें भी अपना पैगंबर याद आने लगे. सो बहुदेवीदेवता मंदिर के पिछबाड़े कबाड़ को हटाकर थोड़ी जगह साफ की गई. उसी के चारों ओर चार बल्लियों खड़ीकर और उससे पुराने कपड़ों को बांधकर ओट का इंतजाम किया गया. कुछ दिनों बाद वही जगह मस्जिद कहलाने लगी. बस्ती के मुसलमान वहां बैठकर नमाज पढ़ने लगे. मंदिर में हिंदू लोग पूजा करने आते, मस्जिद में मुसलमान नमाज पढ़ते. अपनीअपनी ऋद्धा का परिचय देकर सब अपने धंधे पर रवाना हो जाते. बाहर आते ही हिंदू हिंदूपन को छोड़ देते. मुसलमानों से मुसलमानियत पीछे रह जाती. बच जाती सिर्फ इंसानियत. संयोग कुछ ऐसा हुआ कि महानगर में किसी हवेली का मलवा उसी मैदान में लाया गया. उसमें बड़ेबड़े पत्थरों और ईंटों के टुकड़े थे. उन्हें देख हिंदुमुसलमान दोनों की आंखों में चमक आ गई.

अपनेअपने धर्म को पीछे छोड़कर दोनों ही वर्गों के कारीगर आगे आए. उन्होंने उस मलवे को छांटनातराशना आरंभ कर दिया. कुछ दिनों की मेहनत के बाद ही मंदिर और मस्जिद खड़े हो गए. बराबरबराबर. बिना किसी रागद्वेष के. मानो वक्त बिताने के लिए बतिया रहे हों परस्पर! कर रहे हों मानमनौव्वल एकदूसरे की. बापूधाम में रहते हुए कभी हिंदुमुसलमान नाम होठों पर नहीं आए.

सोच क्या रहा है, मेरी मान आज ही उस चांटपकौड़ी वाले को मना करके चला आ. कुछ कहे तो मुझसे कहना. प्लेटफार्म में तैनात सारे सिपाही मेरी अंटी में हैं. जरा से इशारे पर उसके थालपरात को धूल चटा देंगे.’ उस समय पूरन नहीं उसका घमंड बोल रहा था. उसकी बातों से मुझे बापू की याद आ गई. कभी वह भी पुलिस को लेकर इसी प्रकार के दावे किया करता था. अब उसी से अपनी जान बचाकर घूम रहा है. एक गलतफहमी के कारण हमारा पूरा परिवार तबाह हो गया.

मुझे क्या करना होगा?’

करूंगा तो मैं, तुझे तो तमाशा जमाने में मेरी मदद करनी होगी.’

तुम्हारा मतलब है, जमूरे का काम?’

हां, सोच ले. काम सीख गया तो अपना तमाशा भी जमा सकता है. तब याद करेगा कि कोई पूरन उस्ताद भी था.’

लोगों को मूरख बनाकर पैसा ऐंठने का काम मुझे पसंद नहीं है.’ मैंने कह दिया. हालांकि मुझे लगा कि ऐसा कहकर मैंने गलत किया है. पूरन मेरी बात पर नाराज हो जाएगा. किंतु वह मुस्कुराभर दिया, बोला—

कच्ची उम्र है….अभी तू जानता ही कितना है, पर एक बाद पूरन उस्ताद की भी गांठ बांध ले. दुनिया एक नींबू की तरह है, जितना दबोचोगे, उतना ही रस देगी.’

कहकर वह आगे बढ़ गया. उसकी बात मेरी समझ से बाहर थी. फिर भी मुझे उसने प्रभावित किया था. पहली बार मुझे लगा कि लोग पूरन की नाहक आलोचना करते हैं. इतने सारे लोगों के बीच सिर्फ एक वही है जो अपनी मेहनत का खाता है. माना कि वह झूठ बहुत बोलता है. उसके धंधे की नींव ही झूठ और फरेब पर टिकी है. मगर इस तरह के तो बहुत से काम हैं जिनकी नींब झूठ और फरेब पर रखी जाती है. अकेला पूरन ही क्यों. यार्ड में रहने वाले भिखारी भी तो किसी न किसी प्रकार से झूठ और प्रपंच का नाटक रचते हैं. वे भी तो लोगों की भावनाओं के साथ छल करते हुए उनको भटकाने में कामयाब रहते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि पूरन अपने झूठ के दम पर हर रोज पांचसात सौ कमा लेता है. हो सकता है कुछ भिखारियों की रोज इतनी लाटरी लग जाती हो. लेकिन अधिकांश भिखारियों को तो उसका एकचैथाई भी नसीब नहीं होता. वह अकेला है जो झुग्गी में रहकर भी इस बस्ती के लोगों से संपर्क बनाए हुए हुए है. करीबकरीब रोज आता जाता है. इसके बावजूद यहां के लोग उसकी आलोचना करते हैं. कहीं इसका कारण ईष्र्या तो नहीं? मैं सचमुच कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था.

मैंने इस बारे में बड़ीम्मा से बात करने का निर्णय किया. मैंने यह भी अनुभव किया कि पूरन के प्रति ईष्र्याद्वैष की पर्तें मेरे मानस में वर्फसी पिघल रही हैं. जड़ और अस्थिर दिखने वाली मान्यताएं अपना स्थान बदल रही हैं.

ठीक है साब, सोचकर बताऊंगा.’ मैंने कहा. और आगे बढ़ गया.

जरा सुन तो?’ पीछे से पूरन की आवाज आई. मैं ठिठक गया. पूरन पलटकर मेरे करीब आया, और बोला, ‘मैं अपनी झुग्गी को पक्का बनवा रहा हूं. मिस्त्री काम कर रहे हैं. उसके ऊपर एक कमरा कोंसा और उसके बीमार पिता के लिए बनवाऊंगा. कोंसा अगर मिले तू उसे यह सब जरूर बताना.’ कुछ देर पहले पूरन के प्रति मेरे मन में जो भी अच्छे विचार आए थे, उसके आखिरी वाक्य ने उन सभी का प्रभाव धो दिया. मुझे लगा कि एक चालबाज शिकारी बड़ी चतुराई से अपना जाल बुनता जा रहा है.

क्या वह अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा. मेरे में ऐसी कई आशंकाएं थीं. लेकिन उस समय मैं इन सभी प्रश्नों से भाग जाना चाहता था.

क्या इस दुनिया से भाग जाना इतना ही आसान है?’

उसी समय दुकानदार की आवाज कानों में पड़ी. मैं पूरन से विदा लेकर भाग छूटा. गाड़ी आने को थी. प्लेटफार्म पर अच्छीखासी भीड़ थी. खोमचे पर भी काफी ग्राहक जमा थे. मैं आते ही अपने काम पर जुट गया. ट्रैन के जाने के बाद भीड़ भी छंट गई. अगली गाड़ी काफी देर बाद थी. इसलिए प्लेटफार्म लगभग खाली हो गया था. मुझे कुछ राहत अनुभव हुई. दुकानदार बीड़ी सुलगाकर पीने लगा. मैं प्लेटफार्म पर चहलकदमी करने लगा. तभी मेरी निगाह यार्ड की ओर बढ़ती कोंसा पर पड़ी. वह कबाड़ बीनकर निकल चुकी थी. उसके पीछे एक व्यक्ति को देखकर मैं जाने क्यों घबरासा गया. वह पूरन ही था.

मैंने अपने कदम उसी ओर बढ़ा दिए. पूरन को अपने पीछे आते देख कोंसा ने पीठ पर रखा झोला जमीन पर पटक दिया और एक पटरी पर बैठ गई. पूरन भी उसके सामने बैठ गया— ‘अच्छी तरह सोच ले कौंसा. तेरी हालत पर तरस खाकर ही मैंने अपने दिल की बात कही है. वरना तू तो जानती है कि मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है. रोज के पांचसात सौ तो आसानी से कमा लेता हूं. मेरे साथ रहकर तुझे कोई दुःख पहुंचे तो फिर तेरा जो जी चाहे करना.’

उसकी बात का जवाब दिए कौंसा अपने काम में लगी रही. इस पर शायद वह झुंझला गया था. तेजी से मुड़ा. मुझ पर नजर पड़ी तो उसे कुछ और याद आ गया. और फिर जैसे कौंसा को सुना रहा हो. तेजी से बोला—

उस्ताद ने मुझसे पहले ही कह दिया था कि दुनिया मुझे कभी समझ नहीं पाएगी. भलाई के बदले बुराई ही मिलेगी. अपना कलेजा भी चा॓क कर डालूं फिर भी लोग मेरे ऊपर भरोसा नहीं करेंगे. परंतु इस दिल का क्या करूं. इसे तो दूसरों का भला करने की लत सवार रहती है. जो कमाता हूं उसको दूसरों पर लुटा देता हूं. सोचता था कि घर में तुम्हारे जैसी कोई समझदार औरत आ गई तो सब संभाल लेगी. मैं जो कमाऊंगा उसको लाकर देता रहूंगा. वैसे अब भी मेरे पास इतना कुछ है कि जिंदगी भर कुछ न भी करूं तो भी मजे से रह सकता हूं.’

कई लोगों से सुन चुकी हूं….आपको किसी चीज की कमी नहीं. अनेक लड़कियां आपसे ब्याह रचाने को तैयार हो जाएंगी.’ आखिर कोंसा ने अपनी चुप्पी तोड़ी.

किसी चीज की कमी न होना भी समस्या है. कई लड़कियां हैं जो मेरे साथ घर बसाने को तैयार हैं. वे सभी लालची हैं. तेरे अलावा मैं किसी और पर भरोसा भी तो नहीं कर सकता.’ पूरन ने ऐसे कहा मानो कोई अपने सगे से बात कर रहा हो.

मैं विवाह न करने का निर्णय ले चुकी हूं.’

मास्टरजी ने बताया था कि तुम अभी भी जिद्दी हो. लेकिन वे तो दावा कर रहे थे कि तुम्हें इस विवाह के लिए तैयार कर लेंगे?’ न जाने क्यों पूरन कोंसा के पिता को मास्टरजी कहने लगा था. वही जाने उनके प्रति सम्मान जताने के लिए. कि कोंसा को प्रभावित करने के लिए.

मुझसे पिताजी ने अभी कोई बात नहीं की है.’ कोंसा लगता है कि उससे तंग आ चुकी थी. मैं हैरान था. कोंसा का व्यवहार उसके ठीक विपरीत था, जैसा कि सलीम ने मुझे बताया था. पूरन से मैं कुछ ही देर पहले मिला था. उस समय उसने मुझे प्रभावित किया था. परंतु अब वही मुझे खलनायक लग रहा था. उसी समय कोंसा की नजर मुझपर पड़ गई. मुझे देखते ही उसका चेहरा फक पड़ गया. मानो किसी ने रंगे हाथों पकड़ लिया हो. वह कुछ कहे, उससे पहले ही मैं मुड़ा और तेजी से लौट पड़ा.

बड़ीम्मा से मिले बिना मुझे कई दिन हो चुके थे. कई दिनों से खापीकर प्लेटफार्म पर ही सो जाने का क्रम चल रहा था. परंतु उस दिन पूरन का प्रस्ताव और सलीम की कहीं गई बातें ही दिमाग में गूंजती रहीं. देर तक विचार करने के बाद भी जब मैं कोई निर्णय न ले सका तो बड़ीम्मा से मिलने का निर्णय कर लिया. रात को काम निपटाते ही मैं बड़ीम्मा से मिलने चल दिया. वे अपना काम समेटकर सोने की तैयारी कर रही थीं. पूरन से हुई मुलाकात के बारे में मैंने उन्हें बताया. सुनते ही वे गुस्से से उबल पड़ी, मुंह से पांचसात गालियां देने के बाद उन्होंने कहा—

तू जहां है, वहीं ठीक है. उस हरामजादे की बातों में आने की जरूरत नहीं है. अगली बार मिलेगा तो मैं उसकी खबर लूंगी. नालायक बालक को फुसलाता है.’

बड़ीम्मा के स्वर में नफरत थी और गुस्सा भी. उसके बाद पूरन के बारे में कोई भी प्रश्न करने की मेरी हिम्मत न पड़ी. उसी दिन मैंने तय कर लिया कि पूरन से दूर ही रहूंगा. ना ही किसी लालच में आऊंगा. बड़ीम्मा के पास से लौटते समय मेरे दिमाग में अनेक प्रश्न थे. उनमें से एक सवाल मुझे परेशान कर रहा था कि पूरन यदि इतना ही खराब है तो बड़ीम्मा कोंसा को उससे दूर रहने की सलाह क्यों नहीं देतीं. आखिर क्या बात है जो वे पूरन से इतनी नफरत करती हैं.

प्रश्न अनगिनत थे, जिनके उत्तर नदारद थे.

जिंदगी अनुत्तरित प्रश्नों का सिलसिला ही तो है.

सुबह आंखें खुली तो हल्कासा शोर मचा हुआ था. पटरियों के उस छोर पर कस्बे की सड़क जहां मिलती थी, एक टेंपो खड़ा था. दोचार सड़कछाप आदमी लोगों को लोगों को जल्दीजल्दी टेंपो पर चढ़ा रहे थे. दिहाड़ी पर काम करने वाले खानाबदोश मजदूर, मंडी में काम करने वाले पल्लेदार, कुली, मर्दऔरत, भूखेबेकार सभी को ऊपर चढ़ने का न्योंता दिया जा रहा था. औरतें चीखचिल्ला रही थीं. कुछ अपने रोते शिशुओं को चुप कराने की कोशिश में लगी थीं. बच्चों के संभालने के चक्कर में खुद को संभाल पाना मुश्किल लग रहा था. एक आदमी कागजकलम संभाले टेंपों पर सवार होने वालों की गिनती करने में लगा था.

उस्ताद, ये तो केवल अड़तालीस हैं.’ गिनती करने वाला चिल्लाया.

पिछले टेंपो में कितने चढ़ाए थे.’

अस्सी से दो ऊपर.’ जवाब मिला.

उसमें यदि अस्सी गए हैं तो इसमें अड़तालीस कैसे चल पाएंगे. कम से कम सत्तर तो हों.’

वो टेंपो तो झुग्गियों में लगा था. वहां से अस्सी क्या सौ भी जुटाए जा सकते हैं. लेकिन प्लेटफार्म पर कोई बस्ती तो है नहीं. यहां सवारियों को छोड़ बाकी तो गिनेचुने लोग हैं. उनमें से करीबकरीब सभी को हम चढ़ा चुके हैं.’

कुछ भी हो, सत्तर तो करने ही होंगे. नेताजी की रैली नाकाम नहीं होनी चाहिए.’ एक लंबे खद्दरधारी ने कहा.

हां, तू तो यह कहेगा ही….नगरपरिषद के चुनाव में टिकट मिलने का आश्वासन जो मिल चुका है.’ कापीकलम संभाले खड़ा लड़का होठों ही होठों में बुदबुदाया. फिर उसे सुनाते हुए चिल्लाया— ‘तो क्या करें, कहां से लाएं आदमी….ये नेता लोग रैली का ऐलान तो कर देते हैं, बाद में ‘आदमी लाओआदमी लाओ’ कहकर गांड हमारी फाड़ते रहते हैं.’

एक काम कर….गाड़ी को यार्ड के दक्षिण दिशा में मोड़ दे. वहां भिखारी पड़े होंगे. बीसपचीस का जुगाड़ तो हो ही जाएगा.’ कार्यकर्ता की गाली को नजरंदाज करते हुए खद्दरधारी ने सलाह दी.

पर उस्ताद, भिखारियों को रैली में ले जाने पर तो पाबंदी है….नेताजी को मालूम पड़ गया तो नाराज हो जाएंगे.’

रैली में वे अपना कटोरा लेकर थोड़े ही जाएंगे….’

नेताजी का कहना है कि भिखारियों को कस्बे के अधिकांश लोग पहचानते हैं. किसी अखबार वाले की नजर उनपर पड़ गई तो अपना ही तमाशा हो जाएगा.’

वो मैं देख लूंगा….तू वही कर जो कहा गया है.’ कहकर उसने ड्राइवर को संकेत किया. ड्राइवर ने टेंपो स्टार्ट कर दिया. उसके साथ ही औरतोंबच्चों की किलकारियां हवा में गूंजी. कुछ बच्चे टेंपो के पीछे दौड़े. प्लेटफार्म की दीवार के सहारेसहारे चलता हुआ टेंपो दक्षिणी यार्ड की ओर आ गया. उस समय आठ बजने को थे. सभी भिखारी अपनेअपने धंधे पर निकलने की तैयारी करने में लगे थे. टेंपो के रुकते ही खद्दरधारी कूदकर नीचे आ गया और तेज कदमों से भिखारियों के बीच जाकर खड़ा हो गया—

भरपेट खाना और पचास रुपये मिलेंगे….जल्दी से टेंपो में सवार हो जाओ.’ वह चिल्लाया. उसी के साथ ही बाकी कार्यकर्ता भी भिखारियों के बीच जाकर रैली में चलने का आग्रह करने लगे. लेकिन एक भी भिखारी आगे नहीं आया.

सुना नहीं तुमने….भरपेट खाना और ऊपर से पचास रुपये भी….कुर्सी पर बैठने को भी मिलेगा. कम से कम एक दिन के लिए इज्जत की जिंदगी. अब देर किस बात की….जल्दी करो.’

भिखारी टोला में फुसफुसाहट चल रही थी. भिखारियों के बीच दोफाड़ हो चुके थे. एक पक्ष जाना चाहता था. दूसरा उसे घाटे का सौदा समझकर जाने से इंकार कर रहा था. सहसा फतयाब अली सूरदास के पास पहुंचा बोला—

तुम्हें रैली के लिए बुला रहे हैं बाबा….चलो टेंपो तक छोड़ आऊं.’

पचास रुपये में रैली में जाए मेरी जूती. इतने रुपये तो मैं घंटेभर में कम लेता हूं.’

भरपेट भात भी है बाबा.’

तो तू चला जा ना….आज मेरा तो मछली खाने का मन है.’

इस बीच एक कार्यकर्ता यार्ड के पीछे बनी झुग्गियों की ओर गया और वहां से पंद्रहसोलह आदमियों को लिवा लाया. उसके साथ आए आदमी टेंपो पर सवार होने के बजाय खद्दरधारी के सामने जाकर खड़े हो गए. जो कार्यकर्ता उन्हें लिवाकर लाया था, वह खद्दरधारी को पास जाकर बोला—‘भइयाजी! पूरे सतरह आदमी हैं, परंतु इन सालों के दिमाग सातवें आसमान पर हैं. कह रहे हैं कि दिहाड़ी का रेट सवा सौ रुपये है. उससे कम नहीं लेगें.’

सवा सौ….और वहां इनमें से जो हरेक सेरसेर भर पूरियां खा जाएगा. उसका क्या होगा.’ खद्दरधारी ने गुस्से से कहा, ‘सालों को पंख लगे हैं. घर में चाहे टांग फैलाकर पड़े रहें. पर जरासा कहीं साथ चलने को कह दो इन सबके नखरे हो जाएंगे….क्यों? पचास से दस बेसी मिलें क्या तब भी मंजूर नहीं.’

नहीं मालिक! रैली का मामला है. भीड़ तो भीड़ ठहरी. किसी मामले पर बात बिगड़ गई तो पुलिस लाठीचार्ज भी कर सकती है. प्रति आदमी सवा सौ रुपये से एक भी कम नहीं चलेगा.’

कोई और वक्त होता तो इस बेअदबी पर सवा सौ रुपये के बजाय इतने ही जूते लगाता. पर अब तो अपनी गर्ज है. ठीक है, सौ रुपये और खानाखर्च पर बात पक्की हुई.’ उसी समय अपनी बैशाखी द्वारा भीड़ को चीरता हुआ सलीम आगे आया. बहुत ही हड़बड़ी में. मानो तेजतेज चलकर आया हो. उसको देखकर मैं चैंक पड़ा. सलीम ने मुझे देख लिया था. आगे पहुंचकर वह सीधे कापीकलम थामे व्यक्ति के पास जाकर बोला—

सौ रुपये की दिहाड़ी पर दो नाम अपने भी चढ़ा लें, श्रीमान!’ उसके बाद वह मेरी ओर मुड़कर बोला—

वहां खड़ाखड़ा सोच क्या रहा है. जल्दी से टेंपो में बैठ. शाम होने से पहले वापस लौट आएंगे.’

पीछे हट….लंगड़े और अपाहिजों को गिनती में नहीं लिया जा सकता?’ भीड़ जुटाने आए कार्यकर्ताओं ने उसे डपट दिया.

क्यों, लंगड़े और अपाहिजों का क्या दिल नहीं होता….या उनके वोट का वजन तुम्हारे किसी वोट से हल्का पड़ जाता है?’ सलीम ने दिल चिढ़ाने वाला प्रश्न किया.

अरे रोक मत! आने दे. आदमी वैसे ही कम हैं, ऐसे में जो साथ चलने को तैयार है, उसको मना मत कर. आखिर ये भी भारतदेश की संतान हैं?’ खद्दरधारी ने जोर देकर कहा. उसके शब्दों में व्यंग्य था. मैं तब तक सलीम के पास पहुंच चुका था. आश्वस्ति मिलने के साथ ही सलीम ने मेरा हाथ थामकर टेंपो पर बिठा लिया. हमारे बैठते ही तीनचार भिखारिन औरतें साथ चलने को तैयार हो गईं.

रैली में चलने को लेकर भिखारियों के दो वर्ग बन चुके थे. उनमें से एक साफ मना कर चुका था. दूसरा रैली में चलने को तैयार था. मना करने वालों में वही भिखारी थे जिनको दिन में सौ रुपये से ज्यादा की भीख मिलती थी. ऐसे लोग रैली के कारण अपना नुकसान नहीं करना चाहते थे—

सोच क्या रहे हो बाबा. हां कह दो.’ बूढ़ा फतयाब अली सूरदास के पास पहुंचकर बोला.

थू….’ सूरदास ने जमीन पर थूका, ‘अंधा भले ही सही, सौ रुपये में अपना पूरा दिन बरबाद कर दूं, इतना मूरख नहीं हूं.’

या अल्लाह! तू इतना लालची होगा, मैंने यह सोचा तक नहीं था.’ फतयाब अली ने उलाहनासा दिया, ‘पर मैं जानता हूं कि तू रैली में क्यों नहीं जानना चाहता.’

अच्छा, भला बता तो, क्यों नहीं जानना चाहता हूं मैं?’

जाने दे, तुझे अच्छा नहीं लगेगा.’

तुझे जो भी कहना है, साफसाफ कह.’

तो सुन, एक परिचित स्थान पर खडे़ रहकर अंधे का नाटक करना आसान है, लेकिन अपरिचित स्थान और अनजाने माहौल के बीच तेरे नाटक से पर्दा गिर भी सकता है…..’ अंधे सूरदास की पूरी देह कांपने लगी. बिना कुछ कहे वह आगे बढ़ गया. बूढ़ा फतयाब हंसता हुआ उसके पीछे हो लिया. कुछ दूर जाते ही सूरदास पलटा और फतयाब को सुनाते हुए बोला—

सिर्फ अपना ही नहीं, तुम सब लोगों का खयाल है मुझे, इसीलिए रैली में नहीं जाना चाहता. हम भिखारी हैं, मांग कर खाते हैं, दूसरे के रहम का खाते हैं, इस सबके लिए नाटक भी करते हैं. लेकिन यह सब हम अपने पेट के लिए करते हैं. पेट की भूख से बड़ा नाटक करना हम भिखारियों का काम भी नहीं है. लेकिन रैली में जाकर किसी के समर्थन का नाटक करना, उन लोगों को धोखा देना है, जिनके रहमोकरम पर हम पलते हैं, जिनका दिया हम खाते हैं. अच्छा बता तो हमें भीख कौन देता हैं, अमीर या गरीब?’

गरीब, अमीर लोग तो मुंह बिचकाकर आगे बढ़ जाते हैं.’ फतयाब अली ने कहा, ‘कभीकभी तो उपदेश भी देने लगते हो….हट्टेकट्टे हो, काम क्यों नहीं करते….मुफ्त के खाने की आदत पड़ी है, हरामी जो ठहरे….वगैरहवगैरह.’

ठीक कहा तूने….गरीब जनता ही हमारी असली अन्नदाता है, जिसे ये नेता लोग मूर्ख बनाते रहते हैं. सौ रुपये के लिए अपने अन्नदाता को छलने में इन नेताओं का साथ तू भले ही दे, मैं तो हरगिज नहीं दूंगा.’

सूरदास के मुंह ये यह सुनकर मैं दंग रह गया. मेरी निगाह में भिखारी की हैसियत अभी तक केवल अपने भोजन के लिए जमीन पर रेंगने वाले कीड़े के समान थी. वह एक हाड़मांस के इंसान की तरह सोच भी सकता है, यह मैं पहली बार देख रहा था.

तभी खद्दरधारी कार्यकर्ता ने पासा फेंका. अपनी निगाह में एक नायाब चाल. भिखारियों के बीच जाकर उसने कहा—

नेताजी ने आते समय मुझसे कहा था कि जो भी भिखारी रैली को सफल बनाने में आगे आएगा, उसके लिए वे सरकार से घर बनवाकर देने में मदद करेंगे. अगर वे जीतकर मंत्री बने तो भिखारियों को बसाने की योजना पर तेजी से काम किया जाएगा.’ पासा उल्टा पड़ा. दोतीन भिखारी जो कार्यकर्ताओं के प्रभाव में आकर टेंपो पर सवार हो चुके थे, वे नीचे उतरने लगे.

क्या हुआ?’ चैंककर पूछा कार्यकर्ता ने.

अगर घरगृहस्थी का झंझट ही पालना होता तो उसको छोड़कर ही क्यों आते!’ उस दिन ज्ञात हुआ कि भिखारियों में जन्मजात बहुत ही कम थे. बड़ी संख्या ऐसे भिखारियों की थी, जो अपने परिजनों की उपेक्षा या पारिवारिक कलह के कारण घर छोड़कर आए थे और जिन्हें अपमान सहने की आदत पड़ चुकी थी. ऐसे लोग वापस लौटने के लिए कदापि तैयार नहीं थे.

उसी समय एक कार्यकर्ता अपने साथ दसबारह आदमियों को लेकर लौटा. आते ही बोला—

ये सब रात को रिक्शा खींचने वाले लोग हैं. सौ रुपये दिहाड़ी पर इस शर्त पर आने को तैयार हुए हैं कि तीन घंटे के बाद इन्हें छोड़ दिया जाएगा.’

तीन घंटे भी बहुत हैं. नेताजी एक बार भरे हुए टेंपो को देख लें, बस! उसके बाद कौन किधर जाता है, इससे अपने को मतलब नहीं है.’ तुरंत वह मुड़ा और तेज आवाज में बोला—

अस्सी से ऊपर लोग हैं. काम हो गया समझो. ड्राइवर टेंपो को आगे लो.’ अचानक उसका ध्यान टेंपो पर सलीम पर गया. सहसा उसकी आंखों में कुछ कोंधा—

इस लंगड़े को नीचे उतारो.’ इस पर सभी हतप्रभ रह गए. मेरी समझ में भी कुछ नहीं आया. खुद खद्दरधारी के साथी उसकी ओर देखने लगे.

यह बहुत ही चालाक है. पिछली बार गया हमारे साथ था. हमने तो वायदे के हिसाब से इन्हें नेताजी के सामने टेंपो से उतारकर, तुरंत रुपये थमा दिए थे. यह पट्ठा दिहाड़ी लेने के बाद वहीं जेब से पालिश की डिब्बी और ब्रुश निकालकर जूता पालिश करने लगा. उसी हालत में यह मंच तक पहुंच गया. अचानक नेताजी की नजर इसपर पड़ गई. बाद में न जाने कैसे कमबख्त अखबार वालों को भी इसकी भनक लग गई. उसके बाद तो नेताजी के साथ अपनी भी खूब भद्द पिटी थी.’

सलीम को उतार दिया गया. मैं टेंपो पर ही था. सौ रुपये मिलने की खुशी मेरे लिए कम न थी. लेकिन एक अपरिचित स्थान पर सलीम के बिना जाने का साहस भी मुझमें नहीं था. मैं कुछ निर्णय ले पाऊं उससे पहले ही एक झटके के साथ टेंपो आगे बढ़ने लगा. खद्दरधारी और उसके साथी कार्यकर्ता अलग कार में सवार होकर आगे बढ़ गए. बचे हुए कुछ ड्राइवर के पास बैठ गए, कुछ ने पीछे रहकर नारेबाजी का मोर्चा संभाल लिया. टेंपो अपनी गति बढ़ा रहा था. उसी क्षण जो हुआ वह भी दंग कर देने वाला था. मैंने देखा कि अपनी बैशाखियों के सहारे ही सलीम तेजी से भागा. मुझे लगा कि वह संभल नहीं पाएगा. कमाल की फुर्ती का प्रदर्शन करने हुए उसने टेंपो का पिछला डंडा पकड़ लिया. बढ़ते वेग के सहारे एक बार तो उसका शरीर हवा में झूल गया. सवारियों को लगा कि वह बस गिरा. लेकिन उसने खुद को संभाल लिया. और बैशाखियां अंदर फंेक टेंपो में भीतर चला आया.

उन कार्यकर्ताओं को देख मुझे एक बार फिर बापू की याद आ गई. ऐसे अवसरों पर उसका उत्साह और तत्परता देखते ही बनती थी. न जाने कितने लोगों के लिए कितनी बार उसने इस काम को अंजाम दिया था. बापू के आदमियों की एक विशेषता उसके भरोसेमंद होना था. बापू द्वारा जुटाए गई भीड़ उसकी मर्जी के बिना कहीं पांव तक न रखती थी. राजनीति में ऐसी प्रतिबद्ध भीड़ बहुत काम की मानी जाती है. इसलिए ऐसे अवसरों पर बापू की पूछ बनी रहती थी. इस समय वह होता तो….हो सकता है जहां भी हो वहां ऐसे ही काम में उलझाएं हुए हो खुद को. बापू को जानने वाले लोगों की संख्या तो हर जगह है. उसकी जरूरत भी लोगों को है, भले ही संकट के समय वे सामने आकर बापू की मदद न कर पाए हों. बापू कहीं भी रहे, जाए, अपने स्वार्थ के लिए वे उसे खोज ही लेंगे, ऐसा मुझे भरोसा था.

एक नया सूत्र हाथ लगा था बापू के बारे जानकारी लेने का. शायद रैलियों में आनेजाने के बहाने आतेजाते लोग उसकी कुछ सूचना मुझ तक पहुंचा दें. मैंने उसी समय निर्णय लिया कि आगे से रैलियों में जाता रहूंगा. उस समय एक और अनुभूति मस्तिष्क में जन्म ले रही थी कि अपना पेट भरने लायक मैं खुद भी कमा सकता हूं. और संभव हुआ तो अपने भाईबहनों को भी साथ रख सकता हूं.

बापू का इंतजार तो नहीं घटा नहीं, उसको पा लेने का भरोसा जरूर बढ़ा था.

घटनाबढ़ना ही जिंदगी का नियम है.

उस शाम देर रात तक यात्रियों का शहर से लौटना चलता रहा. वहां उतरने से पहले ही खानाखर्च के नाम पर सलीम और मुझे सौसौ रुपये मिल चुके थे. सलीम को रुपये देते समय कार्यकर्ताओं ने कुछ आनाकानी की थी. बाद में उन्होंने बात खुलने के डर से रुपये थमा देने में ही अपनी भलाई समझी. अपने जीवन में पहली बार मैंने अपनी हथेली पर सौ रुपये का चमचमाता हुआ नोट देखा था. रुपये लेने के साथ ही सलीम ने मेरी बांह थामी और वापस मुड़ लिया.

उनके नेता ने हमारा थोबड़ा देख दिया, सौ रुपये में इतना काफी है. आ वापस चलते हैं.’ मैं सौ रुपये के लालच में उनके साथ चला तो गया था, लेकिन दुकानदार के नाराज होने का डर मेरे दिमाग में हलचल मचाए हुए था. वापस लौटने के लिए मुझे भी एक बहाने की तलाश थी. वैसे भी बापू के द्वारा मैं यह जान चुका था कि रैली के लिए भीड़ ले जाते समय सारा जोरदबाव रैली शुरू होने तक होता था. उसके बाद सभी को लगता कि काम पूरा हो चुका है. धीरेधीरे लोग वापस लौटने लगते. रुपयों का भुगतान रैली शुरू होने के बाद ही कर दिया जाता. ताकि दोनों पक्षों को तसल्ली रहे. नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए अक्सर लोगों की जरूरत पड़ती थी, विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भी इस तरह भुगतान करना आवश्यक था.

रैली में गए लोगों के सामने न तो ठेकेदार को खोजने की बाध्यता रहती, न शाम तक टिके रहने की. ठेकेदार और नेता भी नहीं चाहते थे कि भुगतान के बहाने जुटाए गए समर्थक उनके पास आएं. इससे बात पर्दे से बाहर जाने की आशंका रहती. हालांकि हकीकत से सभी परिचित थे. महज आंखों का पर्दा था. इसी को लोकनीति के नाम पर चलाए जाने पर आमसहमति बनी हुई थी. मंच पर अपने विरोधी की इज्जत तारतार करने वाले धुरंधर नेता भी इस बात पर कभी टिप्पणी नहीं करते थे कि वह अपनी सभाओं के लिए समर्थक कैसे और कहां से जुटाता है.

हम्माम की राजदारी हर नेता ईमानदारी से निभाता था.

उस दिन प्लेटफार्म पर भीड़ रहने से दुकानदारी भी चलती रही. करीब बारह बजे भीड़ थमी तो दुकान बढ़ाने का मौका मिला. ठीकठाक बिक्री होने से दुकानदार भी खुश था. इसीलिए दुकान बंद करते समय उसने मुझे पांच रुपये अलग से दिए थे. जल्दीजल्दी काम समेटकर मैं वहां से हटा. लौटने के बाद सलीम से बात न हो सकती थी. मेरे पास एक सौ पांच रुपये की रकम थी. इतने सारे रुपयों का क्या किया जाए, कैसे सहेजा जाए यह भी समस्या ही थी. सलाह के लिए मैं बड़ीम्मा से मिलने के लिए चल दिया. किंतु वे सो चुकी थीं. बुढ़ापे के कारण उन्हें नींद वैसे ही कम आती थी, इसलिए मुझे उनको जगाने की हिम्मत ही न पड़ी. वहां से मैं सलीम के ठिकाने की ओर बढ़ गया. हैरानी की बात थी कि इतनी रात गए भी सलीम अपने ‘हवा महल’ से बाहर था.

हवामहल से वापस प्लेटफार्म तक पहुंचने में एक बज चुका था. इसीलिए मैं अपने ठिकाने पर जाकर लेट गया. लेटते ही आंखें भारी होने लगी. थकावट के कारण नींद गहरी आई थी. पर इतनी भी नहीं कि सपनों के आने पर बंदिश हो. वैसे भी जब से घर छूटा था….भागदौड़ और बरबादी का जीवन शुरू हुआ, हर रात एक न एक सपना मेरी आंखों में दस्तक देने लगता था. डरावना और भयावह. जिसमें भविष्य के प्रति अस्थिरता का भाव रहता. ऐसे सपनों को भला कौन याद रखना चाहता. लेकिन उन सपनों की प्रभावोत्पादकता इतनी अधिक होती थी कि उनको भुला पाना असंभव ही था.

उस रात भी मैंने खुद को भीड़ में घिरे पाया था. अकेला, छटपटाता हुआ. प्लेटफार्म पर भगदड़ मची थी. लोग एक दिशा की ओर भाग रहे थे. मैं भी उनके पीछेपीछे चलने लगा. भीड़ से ही पता चला कि कोई रेल के नीचे आकर कुचल गया है. सबके साथसाथ चलता हुआ मैं भी उसी स्थान पर पहुंच गया. लाश बुरी तरह कुचली हुई थी. धड़ बीचोबीच करकर दो हिस्सों में बंट गया था. पर सिर पर टोप और चमचमाते जूतों, कदकाठी और रंग से लाश की शिनाख्त करना आसान था. वह लाश पूरन की है, कहते हुए उसको जानने वाले कई लोग अफसोस जता रहे थे. कुछ भीतर ही भीतर खुश भी थे.

मैं दोनों स्थितियों के बीच झूल ही रहा था कि तभी अगली टेªन के आने की सूचना से भगदड़ मच गई. अनमन्यस्क स्थिति में मैं वहीं खड़ा रहा. लोग चिल्लाचिल्लाकर मुझे पटरी से हट जाने को कह रहे थे. उनकी आवाजें मेरे कान से टकरा कर भी बेअसर सिद्ध हो रही थी. अचानक पूरा प्लेटफार्म चीख से भर गया. मैंने खुद को पटरियों पर गिरा पाया. आंखें खुलीं तो मेरी हैरानी की सीमा न थी. मैंने देखा सफेद साड़ी में कोई स्त्री मेरे ऊपर झुकी हुई है. जैसे ही मैंने अपनी आंखें खोलीं, वह खुशी से चीखने लगी. अचानक वह पलटी और पूरू के शव पर गिर पड़ी. फिर दहाड़े मारमार कर रोने लगी. हाथ में पहनी हुई हरी चूड़ियां उसने पटरियों पर देकर तोड़ दीं. चूड़ियों की खनक के साथ ही मेरी चीख निकल गई. तभी मेरी आंखें खुल गई.

उस समय मेरी पूरी देह पसीनापसीना थी. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. सांसें थमतीसी लग रही थीं. मैं उठकर बैठ गया. इससे भी बेचैनी से राहत न मिली तो उठकर टहलने लगा. ड्यूटी कांस्टेबिल अंगद सिंह ने मुझे हड़काया भी. उसकी परवाह किए बिना ही मैं उस दिशा में बढ़ गया जिधर कोंसा की झुग्गी थी. अपने ही पैरों की गति….दिल में बसे दर्द….रास्ते पर बिछे अंधकार, रेलगाड़ी की आवाज के साथ छाती कूटती रात की व्यथा का मुझे अंदाजा न था. रास्ते में घूमने वाले आवारा कुत्तों ने मेरी राह रोकने का प्रयास किया. जवाब में झुग्गियों से आने वाले खंखारने की आवाज की उपेक्षा करता हुआ में आगे बढ़ता गया.

कोंसा की झुग्गी के आगे शांति पसरी देख मुझे तसल्ली हुई. अंदर वह अपने पिता के साथसो रही होगी, इस विचार से मुझे राहत मिली. तब जाकर विश्वास हुआ कि कुछ क्षणों पहले तक आंखों के रास्ते से जो गुजरा वह महज सपना था. लौटकर सोने की बहुत कोशिश की. पर नींद आंखों को अंगूठा दिखाकर भागती रही. करवट बदलतेबदलते मुझे अपने ही ऊपर तरस आने लगा. अपना पुराना बसाबसाया घर, मां बापू, तीनों भाईबहन मतंग चाचा और अड़ोसीपड़ोसी सब, बारीबारी से विचारों में दस्तक देने लगे.

अपनी हालत के बारे में सोच दिल गमज़दा हो गया. लगा कि मां के कारण ही यह दिन देखने को मिला है. हमारे घर की बरबादी के लिए अकेला बापू ही दोषी नहीं. मां भी बराबर की शरीक हैं. बापू तो जैसा था सबके सामने था, शीशे की तरह पारदर्शी. और वह वही बने रहना चाहता था. परंतु मां अपने हालात से असंतुष्ट थी. उनसे वह आजन्म विद्रोह करती रही. बापू अपने आप में संतुष्ट और सिमटा हुआ जीव था. मां चाहती थी कि वह उड़ना सीखे, जिससे वह उन सपनों को विस्तार दे सके जो उसने अपनी गृहस्थी को लेकर सजाए थे. वह बापू से जो अपेक्षाएं रखती थीं, उस तक पहुंचना बापू के लिए संभव भी नहीं था.

मां से मुझे यह भी शिकायत थी कि उसके अतिशय लगाव ने मुझे अपने हमउम्र बच्चों से तीनचार वर्ष पीछे ठेल दिया था. बस्ती में अधिकांश बच्चे बचपन से ही किसी न किसी धंधे में लग जाते. दोचार साल का अनुभव उन्हें इस योग्य बना देता कि दुनिया की हर खरीखोटी नजर को पहचान सकें. माना कि उनकी जिंदगी कीड़ेमकोड़ों की जिंदगी होती थी. उनकी जीवनयात्रा जहां से आरंभ होती, वहीं पर दम तोड़ लेती थी. उनके सपने छोटे और बचकाने होते. वे उगते ही दम तोड़ लेते थे. लेकिन उनमें अपने ही समय को जी लेने की जीवटता भरी होती थी.

मां चाहती थी कि हम अपने समय के पार उड़ना सीखें. बड़े सपने देखें. ऊंची उड़ान भरें. इसलिए वह हमें अपने हमउम्र बच्चों के करीब फटकने तक नही देती थी. वह चाहती थी कि हम पढ़ेलिखें. बड़े आदमी बनें. मगर बापूधाम में कोई स्कूल नहीं था. ढाई किलोमीटर आगे एक सरकारी स्कूल में मां ने मेरा दाखिला भी कराया था. मैं वहां जाता भी, परंतु बापू का कोई सहयोग न होने के कारण कभी फीस का टोटा पड़ जाता. कभी काॅपीपुस्तकें वक्त पर नहीं मिल पाती थीं. इसके लिए मां बापू से नाराज होती—लड़तीझगड़ती, यहां तक कि घर में अनशन तक कर देती थी. मां की जिद देखकर बापू उसे तसल्ली देता. हमारी सभी जरूरतों को एक झटके में पूरा कर देने का वचन देकर वह घर से निकलता. परंतु शाम होते ही उसका हर वायदा टांयटांय फिस्स होकर रह जाता था.

अपनी मामूलीसी कमाई द्वारा मां हमारी जितनी जरूरतें पूरी कर सकती थी, करती. उनके प्रयासों की सीमा थी. दूसरी ओर हम पढ़ें या न पढ़ें, बापू को इससे कोई मतलब न था. उसने खुद पल्लेदारी की थी. सपना था कि बेटों को मंडी में ढंग का ठीया मिल जाए. भले ही वहां झल्ली रखकर सब्जी बेचने जैसा रोजगार क्यों न हो. इससे कम से कम उसके बच्चों को भटकना नहीं पड़ेगा. मंडी में इस तरह के ठीयों की कमी भी नहीं थी.

नेताओं के साथ अपने संपर्क तथा मंडी में वर्षों तक काम करने के बाद बापू ने दुकानदारों से अपने संपर्क भी बना लिए थे. उनमें से कई दुकानदारों ने बापू की हालत देखकर उसे अपने थले पर स्थायी रूप से धंधे में उतरने की सलाह दी थी. मगर एक जगह टिककर काम करना बापू की आदत का हिस्सा न था. मां भी चाहती थी कि घरघर जाकर बर्तन धोनेमांजने से अच्छा है कि वह स्वयं मंडी में कोई काम करने लगे. जिससे नकद आमदनी हो. लेकिन घर की औरत मंडी में बैठकर ‘धंधा’ करे, यह बापू को गवारा न था. किंतु जब उससे घरघर जाकर बर्तन मांजने के बारे में कहा गया, तो वह चुप्पी साध गया था.

शिक्षा को लेकर बापू की लापरवाही हमें अच्छी लगती थी. इसका कारण भी था. बापूधामवासियों का शिक्षा से मानो बैर था. बस्ती में हमारी उम्र के लड़के या तो किसी कामधंधे से जुड़े थे अथवा उनका सारा दिन गलियों में मटरगश्ती करते हुए बीतता था. ऐसे में स्कूल जाना हमें अनुचित दबाव लगता. यहां आने के बाद जब कोंसा की कहानी सुनी तो शिक्षा को लेकर बापू की बातें दिमाग में एकाएक उतर आई थीं. जिलेभर में अव्वल आने पर भी उसको क्या मिला! वही कबाड़भरी जिंदगी! पूरन जैसे शातिर दिमाग लोग. कदमकदम पर उसके साथ छल हुआ. शिक्षा उसका कौनसा काम साध सकी. उल्टे शिक्षा ने उसको कमजोर बनाया. तभी तो तेज दिमाग होने के बावजूद वह पूरन जैसे लोगों की चालों का जवाब उन्हीं की भाषा नहीं दे पाती. माना कि सभी के साथ ऐसा नहीं होता.

जब मैं प्लेटफार्म पर लोगों को पेंटसूट पहने, गले में टाई बांधे, गिटपिटगिटपिट अंग्रेजी में बड़ीबड़ी बातें करते सुनता तो लगता कि वे सब पढ़लिखकर ही वहां तक पहुंचे हैं. पर मुझे मालूम है उनमें से एक भी बापूधाम का नहीं है. बापूधाम का बच्चे सपने में रिक्शा चलाते….चांट का ठेला लगाते या मंडी में पल्लेदारी करते हैं. कुछ को कभीकभार सपने में चाय या हलवाई की दुकान दिख जाती तो वह कई दिनों तक उसको सहेजता रहता. बापूधाम में रहकर बड़े सपने देखपाना संभव भी नहीं था. सब बापूधाम के वोटर पैदा करने के धर्म को निभा रहे थे. शिक्षा की देवी, भले ही कितनी महान हो, वह बापूधाम जैसी बस्तियों से मंुह मोड़े रहती है.

इस हकीकत को बापूधाम के बच्चेबूढ़े सभी जानते हैं. संभव है मां भी जानती हो. इसके बावजूद मां का हम पर पढ़नेलिखने के लिए दबाव डालना, भविष्य को लेकर बड़ेबड़े सपने देखना. वक्त के विरुद्ध जाना अपनी ही नियति से जोर आजमाइश करना था. एक बेहद गैरजरूरीकृऔरकृव्यर्थसी कोशिश. धरती पर, धरती पर ही क्यों उसके भी गर्त में रहकर चांद को मुट्ठी में भर लेने का सपना यह नादानी नहीं तो क्या थी. तो क्या मां अपनी ही नादानीकृके कारण मारी गई.

मच्छरों की भिनभिनाहट के बीच समय आहिस्ताआहिस्ता बीत रहा था. रात प्लेटफार्म पर बालू की तरह बिखरी पड़ी थी. उसमें से नींद खोजने की कोशिश में रेतकणों का आंखों में जाना स्वाभाविक था. वही रेतकण आंखों में घुसकर जलन पैदा कर रहे थे, उधर थका हुआ दिमाग पर कटे पक्षी की भांति छटपटा रहा था. उड़ने की लालसा तीव्र, मगर बेबस और लाचार. ऊपर से अकेलापन. बापूधाम की झुग्गी में सिर्फ हमारा परिवार नहीं, बल्कि हमारी पूरी दुनिया निवास करती थी. वहीं तक हमारा समाज था. वहां भी हमारी दुनिया केवल मां के इर्दगिर्द सिमटी रहती थी. मां झुग्गी में होती तो वह दुनिया हकीकत में बदल जाती. वह बाहर के काम पर होती तो हमारी दुनिया कल्पना में, मां का इंतजार करते हुए बीतती थी.

पता नहीं यह उनींदेपन का असर था या अपनी बेबसीअकेलेपन का एहसास या कुछ और. कि जिस मां को मैं अभी तक सम्मान के साथ देखता रहा. जिसके ममत्व की शीतलस्निग्ध छाया में जिंदगी का अब तक का बीहड़ सफर पार किया था, जिसने अपने जीतेजी परिवार को बांधे रखा. बापू की लापरवाहियों के चलते बिखरने नहीं दिया, उसी मां के प्रति आज मेरे मन में न जाने कैसेकैसे विचार आ रहे थे. जब कभी मुझे अपने विचारों की बदचलनी का एहसास होता तो मैं सिर झटककर उन्हें बाहर करने की कोशिश करता. प्लेटफार्म पर कुछ देर के लिए टहलने लगता, करवट बदलकर वक्त की किसी ओर नब्ज को थामने का प्रयास करता. मगर न जाने कौनसा अभिशाप उस दिन मेरा पीछा कर रहा था….न जाने दिमाग की कौनसी नस बलवाई अंदाज में अब तक बनाए गए बिंबों को तहसनहस करने पर उतारू थी….उपद्रवी मन न जाने क्यों अपने ही भीतर रखी उन प्रतिभाओं को चूरचूर कर देना चाहता था, जिनकी वह अभी तक पूजा करता आया था.

मां को परिवार से ज्यादा अपनी इज्जत और पवित्रता प्यारी थी. इसलिए थाने में उस दिन परिवार के बजाय उसने उसी का ध्यान किया. उसको मालूम होना चाहिए था कि हमें उसकी जरूरत दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा थी. हमारे समर्थ होने तक उसे हमारे साथ रहना चाहिए था. जिस इज्जत के नाम पर उसने अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया, उसका बापूधाम में भला कोई मोल था? वहां रहने वाली बहुतसी औरतों के लिए इज्जत रोज का पहनावा थी. दिनभर जिंदगी का बोझ ढोतेढोते यदि कहीं दाग लग गया तो सुबह तक अपने आंसुआंे से धोपोंछकर दुबारा चमका लेती थीं. कुछ औरतें घरपरिवार का पेट भरने के वास्ते ही रोज अपनी इज्जत नीलाम किया करतीं.

गंदा नाला जिसके सहारे बापूधाम बसा था, पूरे शहर की गंदगी को ढोता था. इधर कुछ वर्षों से गंदा नाला नजर नहीं आता था. वह बापूधाम की आत्मा में, वहां के लोगों की जिंदगी में गुम हो चुका था. शहर की गंदगी अब भी आती थी. बल्कि आदमी जितना सभ्य हो रहा था, उतना ही अपनी गंदगी को ढांपें रखने में हुनरमंद भी. बड़ी चतुराई से शहर की संभ्रांत बस्तियां अपनी गंदगी बापूधाम की ओर ढकेल देती थीं. उनमें सिर्फ घर का कूड़ाकबाड़ ही नहीं और भी बहुत कुछ होता था. उनके तन और मन के विकार. जननेंद्रियों के रास्ते निकली पशुताएं वगैरहवगैरह.

मां ने बापूधाम में रहकर भी उसका चलन नहीं सीखा. शायद इसी का उसे दंड मिला था.

उफ! मैं भी क्या सोचने लगा. क्यों ऐसे ऊलजुलूल विचारों को मैंने अपने दिमाग में आने दिया. मां ने जो किया वह एक बहादुर स्त्री ही कर सकती थी. तभी तो बस्ती की औरतें उसकी इज्जत करती थीं. थाने में इज्जत लुटाकर अगर बच भी जाती तो क्या होता? जिस बापू पर मां की रक्षा का दायित्व था, वह तो जानवर की तरह अपनी जान बचाकर भाग आया था. मां अगर जीवित भी रहती तो क्या बापू का उसके प्रति वही व्यवहार होता जो पहले था. क्या वह पछताता? पर अपनी किसी बात पर सोचविचार करना अपने ही मन को खंगालना, नीरक्षीर विवेचन करना क्या बापू के बस में था, जो आदमी जिंदगी से हमेशा पलायन करता रहा हो, उसमें इतना सामथ्र्य कहां था कि कुछ देर ठहरकर अपने किएधरे का विवेचन कर सके.

पर मां का जैसा पवित्र मन था उसके रहते क्या वह जी पाती. अपनी ही नजर में गिर नहीं जाती. बस्ती की स्त्रियां क्या उसकी खिल्ली नहीं उड़ातीं. मां ने आत्महत्या नहीं की, पुलिसिये दरिंदों को सबक सिखाया था. भूखे भेड़ियों की गर्दन मरोड़ी थी. वह शेरनी से भी ज्यादा बहादुर थी. वह पूजनीय है, आगे भी पूजनीय रहेगी. फिर मरते तो सभी हैं. हो सकता है किसी दिन भूख से लड़तेलड़ते ही मर जाती. जो बीमारियां हाथधोकर उसके पीछे पड़ी थीं, वही उसकी जान ले लेतीं. रास्ते में आतेआते एक्सीडेंट भी हो सकता था. तब क्या होता? मां उस दिन यदि मरती नहीं, किसी कारण अपाहिज ही हो जाती, तब क्या होता. क्या बापू उसको सहारा देता? या हम उसका सहारा बन जाते? जब से मैंने होश संभाला है, मां को शायद ही कभी भरपेट खाते हुए देखा हो. हम सबके उचिष्ट पर टिकी थी उसकी जिंदगी. जूठन पर पलने वाली जिंदगी यूं ही बिखर जाती तो उन दरिंदों को सबक कौन सिखाता? अपनी कुर्बानी देकर मां ने सैंकड़ों स्त्रियों को उन दरिंदों से बचाया है.

यहां जो बूढ़े, अपाहिज दिनभर भीख मांगकर गुजारा करते हैं, उन्होंने अपना घरबार यूं ही नहीं छोड़ा होगा. सिर्फ जीभ का चस्का ही नहीं जिसने इन्हें घर छोड़ने, भीख मांगने को मजबूर किया होगा. आज यदि ये चटपटा खाते हैं, नएनए जीभ के शौक पूरे करते हैं तो सिर्फ इसलिए नहीं कि यही इनकी मंजिल थी. बल्कि इसके पीछे कहीं न कहीं प्रतिशोध की भावना भी रहती है. प्रतिशोध उन अपनों के प्रति जिन्होंने इन्हें अपना नहीं समझा. जिनकी सेहतगंदी और खुशियों के लिए ये जिंदगीभर संघर्ष करते रहे, अपना पेट काटकाटकर उनके सपनों को रंगीन बनाने का प्रयास किया, उन्होंने बुढ़ापे में आते ही इनसे किनारा कर लिया. जीभ का चस्का अच्छाअच्छा खाने की ललक, भद्दे मजाक, भौंडा व्यवहार इनका अपनी उसी जिंदगी से प्रतिशोध है, जो इन्होंने परिवार को सजानेसंवारने के नाम पर जाया की थी.

बापू जिदंगी से हमेशा भागता रहा और मां उससे कदमकदम जूझती रही. यही अंतर है दोनों में. इसलिए बापू इस संसार में होकर भी मेरे लिए कुछ नहीं है और मां इस दुनिया से परे जाकर भी मेरे करीब, मेरी चेतना का अटूट हिस्सा है. उसने जो किया, मुझे उसपर गर्व है. ऐसे अवसर पर दुनिया की हर स्त्री को वही करना चाहिए था, जो उस दिन मां ने किया था.

बीते दिनों एक के बाद एक, कई आघात सहे थे मैंने. पर उस दिन लगा कि जैसे दिमाग की नसें चटक गई हों. जिनसे रक्त नहीं, विचारों की सहòधाराएं फूट रही थीं. क्षणभर के लिए एक विचार आता. मन उसमें भीगता, कुछ देर उसके साथसाथ बहता. थोड़ी देर बाद एक और लहर आती और मन को दूसरी दिशा में बहा ले जाती. वहां फिर सन्नाटा बोलने लगता. स्मृतियां किसी और चेतना का हिस्सा लगने लगतीं.

मुझे याद है—बाहर का खानेपीने पर मां कई बार टोकती थी. मतंग चाचा जिन्हें मैंने शुरू से अकेले ही देखा था, लौटते समय हम बच्चों के लिए टाफियां, चने, मुरमुरे वगैरह ले आते थे. उसे बच्चों में बांटते समय थोड़ीबहुत मेरी जेब में भी डाल देते थे. पर मां को उन सब चीजों से भीख की गंध आती थी. उसके सामने उन्हें खाने का मेरा साहस न होता. मैं उन्हें जतन से दबाए उस समय तक प्रतीक्षा करता रहता, जब रात हो और मां थककर गहरी नींद में सो जाए.

मां के सोने के साथ ही मैं चुपके से जेब में हाथ डालता. पर थकान के बावजूद मां कभी बेसुध होकर नहीं सोती थी. जैसे कि सुख की तरह नींद भी उससे बचीबची रहती हो. मुंह के चलने की आहट से मां की नींद चटकने लगती. वह बेचैन होकर करवट बदलती. और मैं तब सहम जाता. लगता जैसे कोई चोरी कर रहा होऊं. झुग्गी की छत में बने सुराखों से झांकते हुए तारे मुझे अपनी ओर घूरते हुए लगते, डराते मुझे. लगता कि वे तारे न होकर मां की असंख्य आंखंे हैं. और वह टुकड़ाभर आकाश जो मुझे अपनासा लगता था, रात के डरावने सन्नाटे के साथ शामिल होकर मुझे डराने लगता. झींगुरों और तिलचट्टों की पैनी आवाज किसी अशुभ के आगमन का संदेश देती हुई लगती.

उस समय आसपास की झुग्गियों से आने वाले खर्राटों की आवाज तिलचट्टों की ‘चिटचिटकिटकिट’ को डराने की कोशिश करतीं. मगर नाकामयाब रहतीं. और कोई सहारा न देख, मैं भयभीत हो मां से चिपट जाता. मां चाहे जितनी गहरी नींद में हो. मुझे अपनी छाती से चिपटा लेती थी. उसी के साथ सारे डर गायब हो जाते. चिंताएं सिमटसी जातीं. मां की धड़कन मेरे लिए लोरी का काम करतीं. लगता की धरती पर मां और ऊपर टुकड़ाभर आसमान मेरा भी है. इसी एहसास के साथ नींद आंखों में दस्तक देने लगती.

वे दिन. वह झींगरों की डरावनी ‘किटकिटचिटचिट’, रातों का डर, झुग्गी की छत के सुराखों से झांकता हुआ टुकड़ाभर आसमान—लोरियों की मिठास लिए मां के सीने की धड़कनें मेरे अतीत की पुण्य धरोहर हैं. वही मेरी अपनी हैं, जिन्हें मैं किसी के साथ भी बांट नहीं सकता. मां की छाती से चिपटकर जो रातें मैंने बिताईं मेरे लिए वे अनूठी और अनमोल हैं. मैं उन रातों, उन दिनों, रतजगों और उनकी स्मृति का बेहद अहसानमंद हूं. नींद ने कई बार मुझे कालीकुलिश उलझनों, जटिल झंझावातों से मुक्ति दिलाई है. अगर यह न होतीं तो वक्त कभी का मुझे पागल बना देता. मैं हिम्मत हारकर शायद आत्महत्या भी कर लेता. कोंसा जितना साहस, विषम परिस्थितियों से जूझने की उसके बराबर हिम्मत मुझमें नहीं है.

चाहे जैसा भी हो, मैं अपने जन्मदाता बापू के एहसान से मुक्त नहीं हो सकता. उसका खून मेरी रगों में प्राणतत्व बनकर बहता है. बावजूद इसके मुझे बराबर यह लगता है बापू के खून में मिलकर उसकी कमजोरियां भी मेरी देह में समा चुकी हैं. उसकी तरह मैं भी किसी बात पर दृढ़ नहीं हो पाता. मां जब तक जीवित थी, हम सबको संभालती रही. आज उसकी यादें मुझे संबल देती हैं. मैं अपनी कमजोरी आपके सामने रख पाया हूं तो इसलिए कि वे रातें मेरी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुकी हैं. कई बार भयानक तनावों के बीच इसी स्मृति ने मुझे नींद का अनमोल उपहार दिया है. ये मेरी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुकी हैं. जिनके बाहर मेरी कोई हैसियत नहीं. कोई सपना कोई उम्मीद नहीं. कल क्या हो, नहीं जानता. पर वह जैसा भी होगा. उसे वैसा बनाने में इन यादों की बहुत बड़ी भूमिका होगी. पर क्या इनमें इतनी ताकत है कि मेरे अतीत को पुनर्जीवित कर सकें….शायद नहीं!

मुट्ठी से फिसला वक्त कभी लौटकर नहीं आता. सिर्फ अपनी स्मृतियां छोड़ जाता है. हम उन स्मृतियों से खेलते रहते हैं. कभी वे स्मृतियां हमसे खेलखेलने लगती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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