टिप्पणी करे

दंश : उनीसवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

और सच होने के कारण शायद कुछ कड़वी भी.

बड़ीम्मा ने जाने क्या देखा था मुझमें, मैं कभी समझ नही पाया. संभवतः वह मुझे चेतावनी देना चाहतीं कि जिस दुनिया में अकेला घिसटने का प्रयास कर रहा हूं, वह एकदम आसान नहीं है. उसमें घिसटने के लिए भी कौशल की जरूरत पड़ती है. यह सब सिखाया था उन्होंने एक कहानी के रूप में. वह किसी और की नहीं कोंसा की ही कहानी थी, जो उन्होंने अगली ही बैठक में मुझे सुना दी थी. बेहद दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी….मैं सुनकर हैरान रह गया था कि अठारहबीस वर्ष की वह दुबलीपतली लड़की ने होश संभालाने से अब तक कितना सहा है कि इस छोटीसी उम्र में….अगर इसे खेलनेखाने की उम्र कहा जाए तो भी गलत नहीं है कि वह दो बच्चों की मां बन चुकी है. हालांकि एक भी बार वह अभागी मातृत्व सुख नहीं पा सकी. एक बार बच्चा मरा हुआ जन्मा. दूसरी बार बेचारी खुद भी मरतेमरते बची….जाने कितनी बार कितनेकितने लोगों ने उसे छला….दुत्कारा….ठोकरें दीं….बुराभला कहा.

दुःख की शुरुआत तो तभी हो चुकी थी जब वह मां की कोख में आई थी. पिता तो बचपन से कोढ़ी थे ही. विवाह नहीं हुआ तो अपने ही जैसी एक लड़की को इस उम्मीद के साथ जीवनसाथी मान लिया कि जिंदगी के दुःख एकदूसरे के आंसू पोंछते हुए बिता देंगे. गांव वाले तो उनके पिता को पहले ही नापसंद करते थे. विवाह के बाद उनके मुंह और चढ़ने लगे. कोंसा पेट में आई तो मुश्किलें और भी बढ़ गईं. गर्भ जब सात महीने का ही था तो गर्भ में बच्चा हट जाने से कोंसा की मां को जोर का दर्द हुआ. वह जोरजोर से चीखने लगी. लेकिन गांव वाले दूर से ही कानों में उंगली डाले सुनते रहे. कोई उनकी मदद को न आया. कोंसा के पिता दाई को बुलाने गए तो उसने भी छूत के डर से हाथ लगाने से इंकार कर दिया.

पिछला कोई अनुभव तो था, बेचारे अकेले की जूझते रहे. आखिर धरती मां ने सहारा दिया. ईश्वर ने हाथ थामा. सुबह होतेहोते एक सतमासी बच्ची ने जन्म लिया. गोरीचिट्टी, सोने की तरह दिपदिपाती हुई. मां और बाप दोनों ने उसको मिलकर नाम दियाकोंसा!

मातापिता जो भी अपनी संतान के लिए कामना करते हैं, वह सब कोंसा को मिला. रूपलावण्य और वुद्धिवैभव भी. थोड़े ही दिनों के बाद कोंसा के पिता को गांव छोड़ना पड़ा. मन मारकर अपनी बच्ची के साथ वे गांव छोड़कर एक कस्बे में जा बसे. वहां बहुत कम उम्र में ही कोंसा ने पढ़ना शुरू कर दिया. कोंसा शुरू से ही बहुत मेधावी थी. गणित में तो उसे कमाल हासिल था. बड़ेबड़े समीकरण वह चुटकियों में हल कर देती. बीजगणित की अनेक जटिल प्रमेय उसे जुबानी याद थीं. आठवीं परीक्षा में गणित में शतप्रतिशत अंक लाकर उसने सभी को चैंका दिया था.

यह लड़की मांबाप का नाम अवश्य रोशन करेगी. कोंसा को लेकर चारों तरफ यही चर्चा होने लगी. लेकिन जिंदगी उतनी आसान नहीं थी. कोंसा के मातापिता को कोई नौकरी तो देता नहीं था. उन्होंने छोटीसी दुकान खोलकर जिंदगी से जूझना चाहा. वहां भी नाकाम ही रहे. ग्राहक आए ही नहीं. पढ़ाई में तेज होने के कारण कोंसा को छात्रवृत्ति मिल चुकी थी. स्कूल वालों ने इसी शर्त पर उसको हाॅस्टल में जगह दी थी कि वह पढ़ाई पूरी होने तक वह अपने घर नहीं जाएगी. नासमझ लोग थे, कोढ़ को छूत का रोग मानकर व्यवहार कर रहे थे. अध्यापक और साथ के विद्यार्थी कोंसा को चिढ़ाते. कोई उसके साथ बातचीत करने, खाना खाने को तैयार न होता था. उसी हालत में कोंसा ने दसवीं की परीक्षाएं दीं और एक बार फिर अपना और स्कूल का नाम रोशन किया. इस बार पूरे प्रदेश में अव्वल आई थी.

कोंसा के मांबाप जैसेतैसे अपना पेट भर रहे थे. उन्हें यही प्रसन्नता थी कि उनकी बेटी उनका नाम कमा रही है. कोंसा की सफलता की खबर उसके गांव भी पहंुची थी. इस बीच वहां एक स्कूल भी खुल चुका था. गांव से स्कूल से कोंसा के लिए बुलावा आया. फीस माफी और रहनसहन का खर्च उठाने के लिए भी स्कूल ने हामी भरी थी. यह न्योंता लेकर आने वाले खुद उस काॅलेज के प्रिंसीपल साहब थे.

बेटी, उस गांव में तुम्हारा जन्म हुआ है, इसलिए हमारा अधिकार तुमपर इस स्कूल वालों से अधिक है. इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम गांव के स्कूल में पढ़कर उसका नाम पूरे देश में रोशन करो.’ प्रिंसीपल साहब ने अपने पास बिठाकर कोंसा से कहा था. उस क्षण कोंसा की खुशी उसकी आंखों से छलक रही थी.

मैं भी यही चाहती हूं, सर! गांव में हमारा घर है. मैं आज ही जाकर पिताजी से बातें करूंगी. उन्हें गांव चलने के लिए तैयार कर लूंगी.’ अपनी खुशी पर काबू पाते हुए कोंसा ने जैसेतैसे कहा.

पर बेटी, मैं तो तुम्हारे चलने की बात कर रहा था.’

मैं समझी नहीं सर!’

मुझे तो कोई परेशानी नहीं है बेटी. लेकिन गांववालों को तो जानती ही हो, वे अनपढ़ और गंवार ठहरे. अगर उन्हें थोड़ी भी समझ होती तो उन्हें गांव से निकालते ही क्यों?’

आप उन्हें समझा सकते हैं कि कोढ़ छूत का रोग नहीं है…..’ कोंसा ने कहा.

वे कहां मानेंगे. और फिर तुम तो जानती हो बेटी, स्कूलकाॅलेज बिना चंदे के तो चलते नहीं हैं. वह स्कूल भी उन्हीं की जमीन पर बना है. गांव वाले नाराज हुए तो…!’

मैं वहां अकेली नहीं जा सकती.’ कोंसा ने निर्णय सुनाते देर न की.

तुम यहां भी तो अकेली रहकर पढ़ रही हो.’ प्रिंसीपल ने तर्क दिया. कोंसा नहीं मानी. वैसे भी गांव में इंटर तक का ही स्कूल था. दो साल बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसको गांव जाना ही था. उसके बाद इंटर की परीक्षाएं हुईं. लोगों को कोंसा से जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ. एक बार फिर उसने अपने आप को प्रदेशभर में अव्वल सिद्ध कर दिया.

इस बीच मांबाप से दूर रहते हुए कोंसा को पांच साल से अधिक हो चुके थे. इन पांच वर्षों का एकएक पल उसने उनकी याद में बिताया था. इसीलिए जैसे ही उसको अपने परीक्षाफल की सूचना मिली, वह अपनी खुशी पर काबू न रख सकी. उत्साह में स्कूल को सूचना दिए बिना ही वह मातापिता से मिलने के लिए निकल पड़ी. कोंसा ने अपनी अप्रत्याशित आसमान छूती कामयाबी के कारण उस स्कूल में ही अपने कई दुश्मन बना लिए थे. गरीब और कोढ़ से ग्रस्त मातापिता की बेटी प्रदेश में अव्वल आए, यह उन लोगों को कतई स्वीकार नहीं था. वे अवसर की तलाश में थे. स्कूल से अनुमति लिए बिना मातापिता से मिलकर कोंसा ने उन्हें यह बहाना दे दिया. कोंसा के लौटते ही उसके विरुद्ध अनुशासन भंग की कार्रवाही की गई.

जिस कौंसा के कारण स्कूल का नाम जिलेभर में चमका था, उसको स्कूल के बाहर करते समय स्कूल ने समय नहीं लगाया. उसकी मां इस आघात को सह न सकी और इस घटना के पांचछह दिन बाद ही इस दुनिया से प्रस्थान कर गई. पढ़लिखकर अच्छी जिंदगी जीने के कोंसा के अरमान धरे के धरे रह गए.

उस समय वह अपनी आयु का अठारहवां साल पार कर रही थी. दुनियादारी से अलग प्रकृति अपना दायित्व बाखूबी निभा रही थी. कोंसा की देह से यौवन के अंकुर फूटने लगे थे. उसकी देह हमेशा ताजे कमलसी खिली रहती. देहगंध संयमी से संयमी युवाओं को पागल बना देती. उसकी आंखों में हजारहजार सपने थे. पर राहें उबड़खाबड़, पथरीली, उजाड़ और अंधकारभरी थीं. मां की मौत के बाद पिता तो जैसे टूट से गए थे. मासूम कोंसा पर उन्हें संभालने की जिम्मेदारी भी आ गई.

आगे हुआ वही जिसका अंदेशा था. जिस बात का डर हर जवान लड़की के मातापिता की नींद उड़ाए रखता है. एक दिन जब कौंसा किसी काम से लौट रही थी, गांव के कुछ लड़के उसके साथ छेड़छाड़ करने लगे. फिर बड़े भी उनमें आकर मिल गए. उसके बाद तो यह रोजाना का काम हो गया. कोंसा घर से बाहर निकलने से कतराती. रोती, डर लगता था उसे. पर उसका बस नहीं चलता था.

विपदाएं अगर किसी और रूप में, किसी और ढंग से पेश आतीं तो उनका सामना किया जाता. कोंसा उनसे भी जूझ लेती. हारजीत की परवाह किए बिना ही दुनियाभर से टकरा जाती. परंतु गली चलते छेड़छाड़….लोगों के चारित्रिक के पतन का यह आखिरी गर्त था. और कौंसा के पिता के लिए हौलनाक स्थिति. वह तो यह सोच भी नहीं पा रही कि क्या किया जाए. कैसे मुक्ति पाई जाए उन भेड़ियों से. बीमार पिता के साथ कैसे सामना करे उन दुष्टों का. रोजगार न मिलने के कारण वहां भुखमरी जैसी हालत पहले से ही थी. मजबूर होकर उन्होंने कस्बे को भी छोड़ने का निर्णय ले लिया. वैसे भी कच्ची दीवारों और छत की जगह ऊपर पड़े जर्जर छप्पर वाले किराये के मकान के अतिरिक्त वहां था भी क्या, जिसे घर कहा जा सके. जिसके लिए उस कस्बे में बसे रहने का लोभ पाला जाए.

अपने पिता को लेकर कोंसा सहारनपुर आ गई. एक छोटी फैक्ट्री में काम भी मिल गया. कुछ दिन जिंदगी सामान्य ढंग से बीती. मगर हिंस्र भेड़ियों की संख्या वहां भी बेशुमार थी. उन्हें जैसे ही पता चला कि कोंसा के पिता बीमार हैं, कोढ़ से ग्रस्त, पीठ पीछे किसी का सहारा नहीं, तो वे गिद्ध की तरह उसके चारों ओर मंडराने लगे. लालची लोगों की लपलपाती जहरीली जिव्हाएं उसकी देह पर जहर टपकाने लगीं. जहर बुझी नजरें तनमन बींधने लगीं. नई जगह, बिना किसी जानपहचान, जैसेतैसे एक काॅलिज प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में दाखिला मिला. एक मिशनरी काॅलेज में. बीए की प्रथम वर्ष की परीक्षा में अधिकतम अंक पाकर कोंसा ने एक बार फिर सभी को हतप्रभ कर दिया. जो लोग उसके प्रवेश पर आनाकानी कर रहे थे, वे अब उसपर गर्व करने लगे.

कोंसा दिन में काम करती. शाम को पढ़ाई करती. सेवासुश्रुषा से उसके पिता की हालत सुधरने लगी थी. लेकिन वह सुख भी ज्यादा दिन संभव न हुआ. मनचले लोगों की मनमानियां बढ़ती ही जा रही थीं. कोंसा को पता भी न चला और उसको लेकर मनचले लोगों के दो गुट बन गए. एक दिन उनमें आपस में ही घमासान हो गया. कोंसा को मालूम तब पड़ा जब पुलिस उस घटना की जांच के लिए उसको पुलिस स्टेशन बुलाकर ले गई. थाने जाने के बाद कोंसा और उसके पिता बेहद घबरा गए. सहारनपुर में उनका न तो स्थायी रोजगार था, न पक्का ठिकाना. एक दिन दोनों ने सहारनपुर छोड़कर राजधानी की राह पकड़ी.

कौंसा ने वहां नर्सिंग की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया. पर पिता की चिंता दूसरी थी. उन्होंने वही किया जो पिता के नाते उनका धर्म था. ढूंढने पर एक लड़का मिल भी गया. वह एक फैक्ट्री में काम करता था. कोंसा के मना करने के बावजूद पिता ने उसी के साथ उसका विवाह कर दिया गया.

कोंसा का विवाह तय करते समय उसके पिता ने न जाने क्याक्या सोचा था. न जाने कितने स्वप्न सजाए थे. उन्हें ऐसा करने का अधिकार भी था. कोंसा के अपने सपने, कुछ न कुछ अपनी कामनाएं भी रही होंगी. जिनमें एक कोशिश जिंदगी के एक और रूप को देखने और समझने की रही होगी. नादान लड़की! जिंदगी को कितनी आसान समझती थी.

कैसी विडंबना है, जो लड़की अंकगणित के सवाल चुटकियों में हल कर लेती थी. बीजगणित की जटिलतम प्रमेय जिसे जुबानी याद थीं. वह विवाह की मामूली गुत्थी को समझ न सकी. न जान सकी कि लड़की के लिए विवाह का अभिप्राय अपनी हैसियत को पुरुष के अस्तित्व में विलीन कर देना है. खपा देना है दूसरे की इच्छाओंमहत्त्वाकांक्षाओं के बीच. विवाह पक्का करते समय उसके उसके पिता ने कहा था कि वह अपनी जिंदगी तो जी चुका….कि ब्याह के बाद कौंसा का जीवन संवर जाएगा….कि जो दुःख उसकी बेटी अब तक झेलती आई है उनसे उसको मुक्ति मिलेगी. परंतु कितना गलत था वह. खुद भुलावे में था कि कोंसा को भुलावा देना चाहता था. कि बेटी के हाथ पीले करते समय एक मासूम पिता की वह कोरी खामाख्याली थी. कौन जानता था कि असलियत को. इस बात को कि नियति द्वारा असली परीक्षा तो अब ली जानी है.

कोंसा जवानी की पहली दलहीज पर थी. उसका रूप कंचनसा दिपदिपाता था. कोई भी पुरुष उस रूपदुलारी को पाकर धन्य ही होता. किंतु उसका पति न जाने किस कुंठा और भय का सामना कर रहा था. कि डरा हुआ था अपने आप से. कि दुल्हन बनी कोंसा के रूप ने उसको चोंधिया दिया था. हर लिया था उसकी बुद्धिविवेक को. पहली ही रात न जाने कब उसके दिमाग में यह डर समा गया कि पिता का कोढ़ उसकी बेटी में; और बेटी के जरिये उसकी देह में भी समा सकता है. इसलिए पहली ही रात कोंसा से अघोषित दूरी बना ली थी उसने.

हालांकि आने वाली रातों में उद्दाम वासना इस दूरी को मटियामेट कर चुकी थी. वह फैक्ट्री से नशे की हालत में लोटता. कोंसा के हाथ का बना खाना भी उसके गले न उतरता था. इसलिए रास्ते में ही खापीकर लौटता. कोंसा खाना लिए उसकी प्रतीक्षा में होती. उसकी भूख की परवाह किए बिना ही वह अपनी देह की भूख मिटाने पर जुट जाता. कोंसा अपनी किस्मत को कोसती. उसकी देह को रौंदते हुए उसने उसे कम आयु में ही मां बना दिया. परंतु मातृत्व सुख से वंचित रही वह अभागी. एक के बाद एक, दो बच्चे हुए….दोनों ही मृत. उनका इल्जाम भी कौंसा के ही सिर गया. यह कहा गया कि देह में छिपा कोढ़ बच्चे में जान भरने ही नहीं देता.

कोंसा का अपने ऊपर से विश्वास उठने लगा. पति जब उसपर कोढ़ी होने का इल्जाम लगाता तो उसे जाने क्यों उसकी बात पर विश्वास होने लगता. दिन में जब वह घर पर अकेली होती तो अपने सारे कपड़े उतार डालती. फिर देर तक अपनी नंगी देह के एकएक स्थान को टोहती. कहीं कोई दाग तो नहीं. मामूली फुंसी भी उसके दिल की धड़कनों को बढ़ा देती. उस समय उसका अपना ही विश्वास डोलने लगता. बारबार देखने पर भी विश्वास न होता. नतीजा यह होता कि भारी तनाव में उसकी सांसे चलने लगतीं. कलेजा उछलकर बाहर आने को होता.

पति तो अपना सारा वेतन शराब और होटल पर उड़ा देता था. घर चलाने के लिए कोंसा को खुद ही काम करना पड़ता. भूख और तनाव से उसकी देह की कांति धुलने लगी थी. चेहरा पीला पड़ने लगा था. दिमाग कुछ भी सोचने, फैसला करने में असमर्थ था. एक दिन शाम को जब वह घर लौटी तो झोपड़ी के दरवाजे अपने लिए बंद पाए. भीतर वह आदमी जिसे वह अभी तक पति मानती आई थी, किसी दूसरी औरत के साथ था. छाती पर दुःख की शिला उठाए उसने ससुराल की देहरी लांघ दी.

पिता के पास लौटी तो पत्थर की शिला बनकर, मूकअबोल और निःसंवेद. सुखदुख, हंसनेरोने का असर ही नहीं. बिस्तर पर पड़ा बीमार पिता बिन कहे ही बेटी के मन की व्यथा समझ गया. तीन महीने का गर्भ था उसे. दो वर्ष में तीसरी बार ऐसा हुआ था. कोंसा उसे मिटा देना चाहती थी. ताकि अतीत का कोई चिह्न बाकी न रहे. पर बीमार पिता का कहा मान उसने समझौता करना ही ठीक समझा—‘कि जिसका अंश कोख में है वह तो कभी समझ न सका. संभव है कोख से जन्मा जीव जिंदगी के अभावों को पाट दे. दुखों के आगे बाड़ बनकर खड़ा हो जाए.’

बड़ीम्मा जैसे अदृश्य पट पर लिखी इबादत को बांच रही थीं. वे चुप हुईं तो मेरी जिज्ञासा एकएक भड़क गई—

वह बच्चा कहां है? अब तो बहुत बड़ा हो गया होगा.’ मैंने पूछा.

कैसा बच्चा?’ बड़ीम्मा के मुंह से हायसी निकली. इतनी गहरी कि सारा वातावरण दुःख से सराबोर हो गया. बड़ीम्मा जैसे जल्दी से जल्दी उस दबाव से बाहर आ जाना चाहती थीं. इसलिए कुछ ही क्षणों के बाद अपनी उसी रौ में, उन्होंने फिर कहना शुरू कर दिया—

मासूम हिरनी यही सोचकर जंगलजंगल भागती रहती है कि जंगली जानवरों से दूर चली जाएगी. वहां अपनी सामान्य जिंदगी जिएगी. अपने बच्चों के साथ चैन से रहेगी. लेकिन जंगल में चलने वाला ताकत का कानून, परिस्थतियों की मनमानी उसके हर ख्वाब को नोंच डालती है. वह बेचारी यह भूल जाती है कि खूंखार जानवरों से दुनिया का कोई कोना खाली नहीं है. भेष बदलकर वे हर जगह, हर बस्ती, हर महफिल में मौजूद रहते हैं. मौके की ताक में. दाव लगते ही निर्भय होकर वार करते है.

कोंसा ने अलग जिंदगी जीने का फैसला किया. मगर इस बार भी उसका रूप उसके लिए छलावा साबित हुआ. वहां आए डेढ़दो महीने ही हुए थे कि उसकी भनक उसी बस्ती में रहने वाले पूरन को लग गई. चालाक और र्काइंया पूरन मजमा लगाकर, झूठ बोलकर लोगों को तरहतरह से मूर्ख बनाने में माहिर था. झुग्गी में अकेला रहता. शराब और जुए की लत थी. इसी से उसकी घरवाली उसे छोड़ कर चली गई थी. कई गंदी आदतें थीं. वह आतेजाते कोंसा को ताका करता था. एक दिन कोंसा के पैर में मोच आ गई. उस दिन शाम को वह मददगार बनकर पहुंच गया. उस समय कोंसा दर्द से बिलबिला रही थी. उसका बूढ़ा बीमार पिता मददगार तो था नहीं. पूरन ने ही उसे डाॅक्टर को दिखा आने का झांसा दिया.

वही रिक्शा में डालकर कोंसा को डाॅक्टर तक ले गया था. डाॅक्टर को उसने राम जाने कौनसी पट्टी पढ़ाई और उस कसाई डाक्टर ने भी मासूम कोंसा पर दया करने, अपना धर्म निभाने की बजाए पापी पूरन का ही साथ दिया. घर पहुंचते ही वह मासूम दर्द से बिलबिलाने लगी, इतनी बुरी हालत थी कि देखनेसुनने वाले का भी कलेजा फट जाए. सब के साथ मैं भी गई थी कोंसा से मिलने….उसकी खबरसुध लेने के लिए. मगर मैं तो उसकी हालत देखकर ही घबरा गई थी, अबोध जान और इतना भारी कष्ट, भगवान किसी दुश्मन को भी न दे. इतना दुःख कि पत्थर का कलेजा भी फट जाए….मां, हे राम!!

हरामी पूरन ने अपने स्वारथ के खातिर भारी जुल्म किया था उस बच्ची पर. चार माह का गर्भ खून के साथ बह गया. जिस डाॅक्टर ने पाप में हिस्सेदारी निभाई— राम करे, उसके कीड़े पडं़े. उसे जिंदगी में कभी सुखचैन नसीब न हो. उस दिन बड़ी मुश्किल से बच पाई थी, कोंसा. उस दिन को आज भी याद करूं दिल बैठने लगता है.’

और पूरन को किसी ने कुछ नहीं कहा?’

कोई क्या कहता भला….फिर पूरन कोई अकेला तो नहीं था. कोंसा जैसी मासूम लड़कियां जिस ओर भी जाएं, वहीं अनगिनत पूरन मिल जाते हैं. किसकिस से लड़ें वे बेचारी….’ बड़ीम्मा ने आहत स्वर में कहा. फिर चुप्पी साध गई. वह चुप्पी मुझे भी आहत कर रह थी. पर बड़ीम्मा से आगे कुछ भी पूछने का साहस न हुआ.

दुःख तो मैंने भी बहुत सहा था. मां तो गृहस्थी को सुखदुःख की सार कहती आई थी. हर दुःख को शांत भाव से सह जाना उसका स्वभाव बन चुका था, मानो पत्थर की शिला, निद्र्वंद्वनिःस्पंद हो सबसे! लेकिन उस दिन बड़ीम्मा के मुंह से कोंसा के बारे में जो सुना वह दुःख और दुर्भाग्य की पराकाष्ठा थी. सीमा थी व्यक्ति के संयम और नियति के न्याय की.

मां के मरने के समय भी मैं रोया नहीं था. भागदौड़ के बीच पिता ने उसका अवसर ही नहीं दिया था. उसके बाद तो आंसू जैसे सूख से गए. आंखें सहारा का जंगल बन गईं. लेकिन उस दिन आंखें सचमुच नम थीं. कई दिनों के बाद आंसुओं से मुलाकात हुई थी. मन भीगभीगसा गया. आंसुओं की कारीगरी उसी दिन महसूस हुई. बड़ीम्मा का एहसान जताता हुआ मैं उनके पास से उठा. उन्होंने जिंदगी के एक और रूप से परिचित कराया था. वहां से लौटते हुए मुझे लग रहा था कि अब मैं कोंसा को अच्छी तरह समझ सकंूगा. क्या सचमुच? मन में इसे लेकर एक संदेह भी था.

कभीकभी हम अपनी सीमाओं से बड़े दावे कर जाते हैं.

कभीकभी जिंदगी खुद एक दाव बन जाती है.

बड़ीम्मा ने कहानी पूरी की तो रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी. शेष रात भी आंखों में बीती, बीतनी ही थी. मैं करवट बदलता रहा. आंखें नींद की आतुर प्रतीक्षा में जलती रहीं. पर नींद पलकों तक फटकी नहीं. उसी दिन जीवन की तलख हकीकत से अंदाज हुआ. लगा कि दुख और पीड़ाएं केवल मेरी ही सहचर नहीं. ना मेरा गम दुनिया के हर रंजोगम से बड़ा और खास है. बल्कि मेरे भीतर तो महज खालीपन है. मैंने तो सिर्फ मां को खोया है, परिवार से बिछुड़ा हूं. जिंदगी में सिर्फ अभाव सहे हैं. इस दुनिया में बहुत जिंदगियां हैं जिनकी एकएक सांस बोझ है. हर कदम कांटोंभरा सफर है. हर दिन बरबादियों की बारात सजाता है.

मैं तो महज अकेला था. अपने सिवा कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी. अपनी भी क्या जिम्मेदारी, कोई सपना, कोई लक्ष्य तक नहीं था, जो तनाव का कारण बने. मगर कोंसा! अगर मैं उसकी जगह पर होता….मेरा पिता यदि कोढ़ या वैसी ही खतरनाक बीमारी का शिकार होता….ऊपर से अबोध बेला. हरिया और कल्लू भी मेरे साथ होते तो क्या मैं सबकी जिंदगी का बोझ उठा पाता? कहते हंै कि वक्त सबसे बड़ा शिक्षक होता है. वह खुद सिखा देता है, पर हमेशा हर बार तो ऐसा नहीं होता. वक्त कभीकभी खुद हार जाता है. फिर सीखने वाले की काबलियत भी तो महत्त्व रखती है.

मैंने तो सिर्फ मां को खोया था, हालांकि ऐसी स्थितियों की तुलना नहीं की जा सकती. वैसा करना भी पाप है. पर कोंसा तो कच्ची आयु में ही बहुत कुछ खो चुकी थी. तीन मासूम जानें जिन्हें इस दुनिया में आंखें खोलनी थीं. कुछ सपने देखने थे….सपनों को हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष करना….हारजीत के बीच झूलना था. वे दुनिया में आने से पहले ही कुम्हला गए….डाली से नोंच लिए गए. तब क्या बीती होगी कोंसा पर. उस बेचारी को तो रोने का अवसर भी शायद ही मिल पाया हो. अपने आंसू पोंछ तुरंत जुट गई होगी कबाड़ बीनने पर. बीमार पिता का दवा और भूख का इंतजाम जो करना था.

कोंसा के बारे में सोचना पीड़ा के गहरे समंदर में गोते लगाने जैसा था. मैंने उसे अपने दिमाग से झटक देना चाहा पर यह नामुमकिन सिद्ध हुआ. इससे भी ज्यादा दुख मुझे यह सुनकर हुआ था कि पूरन अब भी उसी बस्ती में मंडराता रहता है. एक दिन बड़ीम्मा ने मुझे दिखाया भी था. कालीस्याह सरकंडेसी पतली देह….घनी मूंछे….मेंहदी रंगे लालभूरे बाल और आंखों पर चढ़ा मोटा काला चश्मा. कुल मिलाकर आभाहीन व्यक्तित्व! जिसमें कोई खासियत नहीं. अवस्था चालीस से ऊपर. कोंसा उससे कम से कम बीस साल छोटी. अपनी कमी को पाटने के लिए वह चमकदार सूट पहनता. जूते पाॅलिश से चमचमाते रहते. बालों में खूब तेल मलता. तेज परफ्यूम का इस्तेमाल करता, जिससे उसकी संपन्नता का एहसास हो. किंतु ये बनावटी उपाय उसके व्यक्तित्व को उभारने के बजाय भोंडा और निस्तेज बना देते थे. चालाक खूब था. सिर्फ चेहरे को देखकर उसके मन पर पुती कालिख को पहचान पाना नामुमकिन ही था.

बड़ीम्मा ने जिस दिन पूरन के बारे में बताया मैं उसी समय उसके ठिकाने की खोज में जुट गया था. पिटने के बावजूद उसने बस्ती से नाता नहीं तोड़ा था. न वहां आनाजाना ही छोड़ सका था. कोंसा उससे बचती….देखते ही भय से कांप उठती. जैसे बाज के सामने पड़ते ही चिड़िया की रूह कांप जाती है, वही हाल कोंसा का होता. काम वह साल में कईकई बार बदलता. कभी जादूमंतर, कभी मजमेबाजी, तो कभी कोई और हुनरपेशी. पैसा कमाने के उसको अनेक हथकंडे आते, एक से बढ़कर एक. इसलिए यह धारणा भी बनती जा रही थी कि उसे काला जादू सिद्ध है. जिससे वह कुछ भी कर सकता है. इसलिए साधारण लोग उससे बचकर रहते. धर्मभीरू औरतें अपने बच्चों पर उसका साया तक न पड़ने देतीं. लेकिन यदि किसी कारण बच्चा ही बीमार पड़ जाए तो गंडेताबीज के लिए पूरन के पास दौड़ी चली जातीं. उन औरतांे से घंटों बतियाता रहता. फूहड़ हंसीमजाक करता. उसके बाद कुछ उल्टासीधा बुदबुदाकर एक ताबीज थमा देता. मजमा लगाता तो भी दर्शकों की कमी न होती. उसकी बातों का जादू उन्हें बस में किए रहता. अपना उल्लु सीधा करने के लिए वह कोई भी हथकंडा अपना सकता था. उसका मुख्य था काम था, लोगों को अपने वाग्जाल में फंसाकर नकली पत्थर बेचना. जिससे उसको खूब कमाई होती थी. और जैसी कमाई होती वैसी लुटाता भी था.

बात में से बात निकालना और बातोंबातों में सामने वाले के दिल में उतर जाना, फिर अपना उल्लू साध लेना, उसकी खासियत थी. दूसरों को धोखा खाते देख उसको प्रसन्नता होती थी. इसलिए वह हरदम दूसरों को छलनेभटकाने का प्रयास करता रहता था. लोग भी आसानी से उसके झांसे में आ जाते. कोंसा को ही लो. नादान लड़की. जमाने की ठोकरें खाकर भी संभलना नहीं सीख सकी. पूरन की बातों में फंसकर उस पर न जाने कैसे विश्वास कर बैठी. उसकी नादानी मेरे मन को दुःख पहुंचा रही थी.

मुझे एक ऐसे मित्र की खोज थी, जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूं. हालांकि सलीम से अच्छी निभ रही थी. कहने को हम दोनों दोस्त भी थे. साथसाथ रहते और खातेपीते भी थे. लेेकिन सलीम की एक कमजोरी मुझे नापसंद थी. हरेक बात को हंसी में उड़ा देेने की आदत. वह किसी बात को गंभीरता से लेता ही नहीं था. हो सकता है यह उसकी अपंगता के कारण जन्मी कुंठा हो. जिसके कारण वह अपनी देह से, जमाने से दूर भागता रहता था. सच कहूं तो उस समय मुझे मां की जरूरत थी. बचपन में न जाने कितने तनावों, समस्याओं से हमारा वास्ता पड़ा था. मां जरूरतभर बोलती. लेकिन उस समय उसका एकएक शब्द बड़ेबड़े ग्रंथों पर भारी पड़ता. मां से बात करने के बाद मेरे मन के सारे संशय मिट जाते थे.

अब संशय विराट हैं, मगर समाधान एक भी नहीं. और दुनिया वैसी की वैसी ही है. बेदिल और बेरहम!

अविश्वास की कमी चिंता को जन्म देती है. चिंता भविष्य के डर का उपाय कर लेना चाहती है. अविश्वास और डर से घिरा आदमी भविष्य की चिंता में सबकुछ जल्दी से जल्दी हड़प लेना चाहता है. वह नैतिकताओं की परिभााषा अपनी तरह से करता है. सिद्धांतों को परखने की कसौटी उसकी अपनी होती है. जो कमजोर दिल के होते हैं वे चालाकी की शरण में चले जाते हैं. जबकि मजबूत दिल के लोग दुनिया में संघर्ष का रास्ता अपनाते है. संघर्ष की असफलता और हड़बड़ी उन्हें अपराध की दुनिया में भी ढकेल सकती है. कामयाबी का कोई एक मूल मंत्र नहीं. नाकामी की तरह उसकी भी अनंत राहें होती हैं.

बताया गया था कि पूरन की कमाई की कोई सीमा नहीं है….कि जुए के दाव में हजारों जीत लेता है. सैकड़ों रुपये रोज पत्थर बेचकर कमा लेता है. गंडाताबीज से भी इतना कमा ही लेता है कि अकेली जिंदगी मजे से जी सके. मगर रहता वह झुग्गियों में ही था. आमदनी का बड़ा हिस्सा उसकी शौकीन मिजाजी की भंेट चढ़ जाता. पुलिस भी उससे जबतब कुछ न कुछ ऐंठती ही रहती.

बड़ीम्मा ने इशारेइशारे में ही यह भी बताया था कि उसका विवाह हो चुका है. उसकी पत्नी भी है. बड़ीम्मा ने जो कहा उन दिनों उसको समझने की मेरी उम्र थी, नहीं कह सकता. फिर भी उसकी बात सुनकर मैं चैंक पड़ा था. इस बात पर नहीं कि पूरन का विवाह हो चुका था और इस तरह वह कोंसा को धोखा दे रहा था. बल्कि इस बात पर एक औरत कैसे इतनी आसानी से पूरन की लापरवाहियों को सहे जा रही थी. क्यों उसको नहीं समझाती, रोक लेती बदफैलियों से.

पूरन की पत्नी, क्या वह भी कोंसा की तरह नादान है?’ बड़ीम्मा से मैंने पूछा था.

वह अलग झुग्गी डालकर रहती है. दोनों के बीच अबोला ठना रहता है. पूरन कहता है कि वह उसका खर्च उठाता है. लेकिन उस जैसा आदमी किसी जिम्मेदारी को ढंग से निभा ले जाए, इसपर भरोसा नहीं किया जा सकता.’ बड़ीम्मा ने बताया था.

इसके बाद उन्होंने जो कहा वह और भी हैरान करने वाला था. उससे मुझे पूरन और उसके बहाने समाज को समझने में आसानी हुई थी. पूरन कमजोर और आत्मविश्वास से गयाबीता इंसान है. ऐसे लोग जिम्मेदार नहीं हो पाते. हमेशा भागते रहते हैं. समाज से—और अपने आप से भी.

उस रात मैंने दो फैसले किए थे. आप इसे भावुक मनःस्थिति की उड़ान भी कह सकते हैं. पहला यह कि अपना आत्मविश्वास बनाए रखने की हर संभव कोशिश करूंगा. यह बहुत बड़ी बात थी. मेरा दूसरा निर्णय था—किसी भी तरह कोंसा की पूरन से रक्षा करूंगा. जाहिर है कि मेरा दूसरा फैसला यथार्थ से परे और भावुकता से लबरेज था. इसीलिए कि जिस पूरन से मैं टकराने का प्रण करने चला था वह मुझसे हर मामले में बड़ा था. उल्टेसीधे तरीकों से वह मोटी कमाई करता था. पुलिस कोर्टकचहरी की जानकारी भी रखता था. जबकि मैं तिनके की तरह इधरउधर डोल रहा था. बिना किसी साधन और सहारे के. जिसे उसी का जन्मदाता अकेला छोड़ गया हो….मां की लाश लावारिस की तरह फूंक दी गई हो. जिसके तीन मासूम, छोटेछोटे भाईबहन न जाने किन हालात में हैं. और जिसमें इतना साहस तक नहीं है कि अपने उन मासूूम भाईबहनों की सुध ले सके. ऐसे में किसी भी सपने या संकल्प का मोल ही क्या था. आज इस बात को कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि उस रात किया गया एक भी फैसला कार्यान्वित न हो सका. ना कभी उसके बारे में सोच पाया. ना उन फैसलों को भूलने का कभी मलाल रहा.

जिंदगी जिस रफ्तार से बहती आई थी, उसी रफ्तार से बेआवाज बहती रही.

जिंदगी का बेआवाज होना बेआबरू होने जैसा है.

यार्ड से बीसपचीस कदम पश्चिम में….पटरियों से पांचछह मीटर दूर रेलगाड़ी का एक डिब्बा वर्षों से पड़ा था. कबाड़ की तरह. मौसम की हारमार सहता हुआ. उसके पहिए कईकई इंच जमीन में गहरे धंसे हुए थे. दरवाजेखिड़कियां वर्षों पहले गायब हो चुकी थीं. बच्चे उसपर ढेले फेंकते. खेलखेल में निशाना साधते. आड़ीतिरछी लकीरें खींचकर अपनी कल्पनाओं को आयाम देते. बड़े ईंट या कोयले से फूहड़ नारे लिखकर अपनी दमित वासनाओं को आराम पहुंचाते. कुत्ते उसे देखते ही अपनी टांग उठा लेते थे. उसके भीतर मकड़ी, मच्छर और तिलचिट्टों की बड़ी कालोनियां थीं. हवा उसमें सहमकर प्रवेश करती. धूप डरकर दरवाजे पर ही रुक जाती थी.

उपेक्षित पड़े उसी डिब्बे को सलीम ने अपना ठिकाना बनाया हुआ था. धूपवर्षा हो या भीषण ठंड. वही डिब्बा उसका आश्रयस्थल बनता. बड़ीम्मा प्रायः खुली जगह में सोना पसंद करतीं. लेकिन मौसम यदि खराब हो तो सलीम के साथसाथ बड़ीम्मा भी उसके ‘हवामहल’ में विश्राम कर लिया करती थीं. हवामहल उस डिब्बे का ही नाम था. सलीम का दिया हुआ. मौसम की मार से बचने के लिए कभीकभी दूसरे भिखारी भी वहां चले आते थे. लेकिन चाहे कुछ भी हो, सलीम उन्हें अपने डिब्बे में सोने की इजाजत नहीं देता था. रात बितानी हो तो सुबह होने तक जागना ही पड़ेगा, रातबिरात हवामहल में सिर छिपाने आए व्यक्ति के सामने सलीम की शर्त होती. वे सभी खानाबदोश लोग थे. अपना कहने लायक उनके पास कुछ भी नहीं था. लेकिन एक व्यावहारिक समझौता अव्यक्त रूप से सभी के बीच चलता था. उसके अनुसार किसी ठिकाने पर जो पहले आकर कब्जा जमा ले, उसको जब तक वह छोड़कर न जाए, उसी का माना जाता था. इस अधिकारिता की रक्षा की जाती थी. रेल के उस डिब्बे को पहलेपहल सलीम ने अपने ठिकाने के रूप में चुना था. इसलिए उसके बारे में उसी की मर्जी चलती थी. बड़ीम्मा को छोड़कर उसकी मर्जी के बिना कोई उस डिब्बे में प्रवेश नहीं करता था. पहली बार सलीम ही मुझे अपने हवामहल तक लिवा कर ले गया था.

कैसा लगा?’ डिब्बे में चहलकदमी करते हुए, अपने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाकर उसने मुझसे पूछा था. कुछकुछ गुमान से. जैसे किसी किले को दिखाने ले आया हो. मुझे उसके इस व्यवहार पर हैरानी हुई. भीतर ही भीतर मैं उसपर हंसा भी था. फिर लगा कि उसके व्यवहार में कुछ भी अनूठा या चैंकानेवाला नहीं है. बड़ीम्मा बता चुकी थी कि वह सलीम को वर्षों से अकेला, वहीं देखती आ रही है. परिवार का सुख, अपनेपन का एहसास जिसने कभी जाना नहीं, मां के प्यार से वंचित रहा हो, उससे ऐसे ही व्यवहार की आशा की जा सकती है. मुझे बड़ीम्मा की कही और बातें तो याद रही नहीं. सिवाय मां के प्यार के छिन जाने की. यहां आकर मेरी और सलीम की कहानी एक हो जाती थी.

मुझे याद है—हमारी छोटीसी झुग्गी का वह आलीशान घर. जिसकी दीवारों से हर पल मिट्टी झड़ती रहती थी. जिसे साफ रखने के लिए मां को दिन में चारचार बार पौंछा लगाना पड़ता था. दर्जनों बार वह बिखरी वस्तुओं को सहेजकर उनके सही स्थान पर पहंुचाती. वहां जो अपनापन….पवित्रता की जो गहन अनुभूति विद्यमान थी, वह लोहे के इस कवचनुमा घर….यहां तक कि यार्ड की भारीभरकम बिल्डिंग से भी कोसों दूर थी. हालांकि वहां बड़ीम्मा भी थीं जो मां की तरह ही हम सबको खाना परोसती, खिलातीं और हरेक को प्यार भी करती थीं. जिनके आगे बूढे़कमजोर भिखारी और बेघर लोग बच्चों की तरह झगड़ते, जिद करते थे. तो भी वहां उस स्थान पर मुझे एकांत और एकात्मता की कमी महसूस होती थी. जो हमारी झुग्गी ने अनायास मौजूद रहती थी.

तू पहली बार मेरे घर आया है, सो मेहमान हुआ. बोल क्या खाएगा?’ सलीम ने अपनी बैशाखी को एक ओर खड़ा करके एक डिब्बा खोला. उसमें से बिस्कुट का चमकीलासा पैकेट निकला—‘ले खा?’

उसने डिब्बा मेरी ओर को बढ़ाया. झूठ क्यों कहूं, बिस्कुट का पैकेट देखकर मेरा मन ललचाने लगा था. पर मैंने केवल एक बिस्कुट उठाया.

शरमाता क्यों है….अपना ही माल समझकर खा, और आ जाएगा?’ वह बोला. मुझे अच्छा लगा. मैंने एक बिस्कुट और उठा लिया. उसके बाद भी सलीम ने आग्रह किया. लेकिन मेरी हिम्मत न पड़ी.

शरमाता है….मैं कभी नहीं शरमाता. खासकर यदि दुश्मन की जेब हल्की हो रही हो तो मैं खर्च करवाने से बिल्कुल नहीं हिचकता….’

दुश्मन.’ सुनकर चैंका. सलीम कुछ ज्यादा ही बोलता था. जल्दबाजी में जुबान का इधर से उधर हो जाना, तारतम्य टूट जाना बहुत मामूलीसी बात थी.

हां दुश्मन, तू अभी नहीं समझेगा.’ उसने बात को रहस्यमय बनाते हुए कहा. मैं चुपचाप उसके मुंह की ओर देखने लगा. कुछ देर बाद उसने स्वयं कहना शुरू कर दिया—‘साला, पूरन आजकल मेरे पीछे कुछ ज्यादा ही लगा है. जानता है कि मैं कोंसा के साथ रहता हूं. इसीलिए अक्सर मिलने के लिए आ जाता है. आते समय बिस्कुट, चाॅकलेट, फल वगैरह कुछ न कुछ लेकर ही आता है. इस उम्मीद में कि मैं उसके लिए कोंसा से बात चलाऊं.’

और तुम उसकी लाई हुई चीजें मेहमानों के लिए रख लेते हो?’

सारी की सारी नहीं. उनमें से कुछ कोंसा को भी दे देता हूं.’ सलीम ने लापरवाही के साथ कहा, ‘आखिर वह उसी के लिए तो लाता है.’

छिः!’ मेरे मुंह से अकस्मात निकला. मुझे सलीम से नफरत होने लगी थी, ‘यह सब कोंसा को मालूम है?’

नहीं, कोंसा को सच बताकर क्या अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारनी है? मैं तो उस दिन के इंतजार में हूं जब वह मेरे हवामहल में मलिकाए सलीम की तरह आकर रहने लगेगी.’ हालांकि इससे पहले भी सलीम इशारेइशारे में यह बात मुझे बता चुका था. मगर आज उसने अपने दिल की बात मुझसे साफसाफ कही थी.

यह बात कोंसा से कहो? शायद मान जाए.’ यह एकदम बेमेल जोड़ी होगी. मैंने मन ही मन सोचा. कोंसा सुंदरता के मामले में अब भी हजारों में एक है. जबकि सलीम अपाहिज. अगर ठीकठाक घर में होती….ढंग का खानापीना मिलता तो रूप और निखर कर आता. तब वह राजकुमारी की तरह नजर आती. उस समय सलीम या पूरन जैसे लोग उसका नाम लेने से भी घबराते. मगर परिस्थितियों से मार खाई, टूटी हुई कोंसा के लिए अपना घर बसाने के बारे मे सोचना भी गुनाह था. शादी करके भी उसे धोखा ही मिला था. इसलिए उसका ध्यान तो उस ओर शायद ही जाता हो. परंतु पूरन और सलीम जैसे लोग उसे लेकर सपने जरूर देखने लगते थे. उस समय भी सलीम की आंखों में संभवतः वही सपना झिलमिला रहा था. अतः सलीम ने जो उत्तर दिया उसमें पूरी आशावादिता छिपी थी

जब तक उसका बूढ़ा बाप उसके साथ है, तब तक अपना घर बसाने के बारे में वह शायद ही सोचे. इस बात की मुझे भी परवाह नहीं है. मैं और यह हवामहल उसका तो जिंदगीभर इंतजार कर सकते हैं.’

शाम करीब थी. दोपहरी में ग्राहकों की संख्या घट जाती. इस कारण मेरा मालिक दो घंटे आराम कर लिया करता था. शाम पांच बजे से रात के ग्यारह बजे के बीच ग्राहकों का दबाव बना रहता. उस समय मेरा वहां पहुंचना जरूरी था. मैं चलने को हुआ तो सलीम ने टोक दिया—

ठहर, मैं भी चलता हूं.’ वह बाहर आया तो मैंने पूछा—

कल कोंसा दिखाई नहीं दी उसी तबियत तो ठीक है?’

कोंसा तो ठीक है. पर उसका बूढ़ा बाप….परसों शाम उसको दिल का दौरा पड़ा था . बेटी को लेकर नाहक चिंता में लगा रहता है. कोंसा उस समय काम पर थी. लौटी तो पता चला कि बूढ़ा बाप अस्पताल में है. ले जाने वाले का नाम सुना तो और भी घबरा गई. जानते हो वह कौन था. वही पूरन जिसका वह नाम भी नहीं सुनना चाहती. उसके बूढ़े बाप को पूरन न केवल अस्पताल लेकर गया, बल्कि अपने पैसों से भर्ती कराकर उसका इलाज भी कराया. सुना है अब बूढे की हालत में सुधार है.’ सलीम कहे जा रहा था. उसके स्वर में न तो अपनापन था, न किसी प्रकार की संवेदना जिसकी ऐसे अवसरों पर अपेक्षा की जाती है.

मैं इन दिनों अपने काम में लगा रहता था. शाम होते ही दुकान पर ग्राहकों की भीड़ टूटने लगती. झूठे दोने उठाने, पौंछा लगाने, पानी भरने और बरतन साफ करने से फुर्सत ही नहीं मिलती थी. मालिक को खुश रखने के लिए मैं भागभाग कर काम निपटाता था. ग्यारह बजे जब भीड़ छंटती तब कहीं जाकर फुर्सत मिलती. तब तक थकान से देह टूटना शुरू कर देती थी. आंखें नींद से मुंदने लगतीं. बचाकुचा खाकर मैं प्लेटफार्म पर सो लेता. पानी के नल के नीचे एक चबूतरा रेलवे ने यात्रियों की सुविधा के लिए बनवाया था. जिसपर चढ़कर यात्रीगण पानी पी सकें. नल किनारे की ओर था….और नयानया बना था. प्लेटफार्म पर रहने वाले बेघर लोगों को उसका चबूतरा पसंद आया.

एक दिन सबने मिलकर रेलवे के प्लंबर की खातिरदारी की. अद्धा चढ़ाया. उसी शाम मौका देखकर प्लंबर ने पाईप के भीतर कुछ फंसा दिया. जिससे नल में पानी आना रुक गया. और यात्रियों का उधर आना भी. चबूतरा वहां के बेघर बाशिंदों के सोनेबैठने के काम आने लगा. मैं वहीं सो जाता था. बीती रात भी थकान के कारण गहरी नींद आई थी. वैसे भी कोंसा और सलीम को छोड़कर और किसी का भी साथ मुझे पसंद नहीं था. शुरू के दिनों में मुझे बड़ीम्मा से बड़ा लगाव रहा था. तब भी था. मगर उनके पास हमेशा ऐसे लोगों का जमघट रहता था जिनके साथ बैठते हुए भी मुझे घिन आती थी.

इस समय कोंसा कहां है?’ मैंने चलतेचलते सवाल किया.

अस्पताल में….अपने पिता के पास.’ सलीम ने बताया. मैं कोंसा से मिलना चाहता था. मगर बाद में सलीम ने ही बताया कि अगली सुबह उन्हें अस्पताल से रिहा कर दिया जाएगा. तब मैंने सुबह तक प्रतीक्षा करने का फैसला कर लिया. वैसे भी शाम के पांच बज चुके थे. मुझे काम पर लौटना था. उस समय मालिक अस्पताल जाने के लिए छुट्टी दे, यह संभव ही नहीं था.

रात गहराने तक, जब तक यात्रियों का आनाजाना रहा, मैं अपने काम पर डटा रहा. माल जल्दी ही निकल जाने से मालिक खुश था. इसीलिए उसने बरतन साफ करने का आदेश दे दिया. मैंने जल्दी जल्दी काम समेटना शुरू किया. फिर भी आधा घंटा और गुजर गया. उस दिन माल बाकी न बचने के कारण मालिक ने मुझे पांच रुपये का नोट देकर कुछ भी खाने को दिया. मैंने खुशीखुशी नोट अंटी में खोंस लिया. मन में कोंसा और उसके पिता का हाल जानने की लगन थी. उस समय रात के बारह बज चुके थे. बड़ीम्मा जाग रही होंगी. यह सोचकर मैं सीधा उन्हीं के पास चल दिया. यह तय करके कि बड़ीम्मा कहेंगी तो भी कुछ नहीं खाऊंगा. वहां पहुंचा तो खाना समाप्त हो चुका था. हमेशा की तरह उन खानाबदोशों की बतकही चल रही थी. बड़ीम्मा भी उसी में तल्लीन थी. सो मेरी और उनका ध्यान ही नहीं गया. रामबसिया अपने पार्टनर फत्ते से भीख का हिस्सा बांटने पर उलझ रहा था.

सिर्फ एकचैथाई….रामबसिया, तू तो बड़ा स्वार्थी है रे!’ फत्ते की शिकायत की. फिर बड़ीम्मा की ओर मुड़कर उनसे अपनी सिफारिश की आस में बोला, ‘बड़ीम्मा चुप क्यों हो. इसे समझाओ ना!’ लेकिन बड़ीम्मा उसके पक्ष में कुछ कहें उससे पहले ही लंगड़ा रामबसिया बोल पड़ा—

रुपये में चार आना तो दे दिया. और कितना दूं बड़ीम्मा! कमाई में आधा हिस्सा तो मेरी आधी टांग का है. बाकी आधा मेरा और फत्ते का, क्यों?’ कहते हुए वह अपनी आधी टांग को हवा में लहराने लगा. फत्ते के चेहरे पर असंतोष था. परंतु वह कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था. वह भिखारिन गुलबानो का बेटा था और मां का दबाव पड़ने पर इस ध्ंाधे में नयानया आया था. इससे पहले वह एक होटल पर मेज साफ करने का काम करता था. वहां एक दिन मालिक ने किसी बात पर धमका दिया. गुलबानो को पता चला तो अगले ही दिन बेटे की नौकरी छुड़वा दी.

भाड़ में जाए ऐसी नौकरी. सुबह से शाम तक मेरा लाल झूठे बर्तन धोए….मेज साफ करे, ऊपर से मार भी खाए.’ नौकरी छूटने पर फत्ते कुछ दिनों तक आवारागर्दी करता रहा. उसको खाली देख रामबसिया नेे अपने साथ लग जाने को कहा. गुलबानो तो यही चाहती थी. उसको उम्मीद थी कि रामबसिया बराबर न सही, कुछ कम देगा. परंतु उसने जब एकचैथाई माल ही आगे रखा तो वह बिदक गई. डंडा लेकर रामबसिया को मारने के दौड़ी. अगर दूसरे भिखारी उसकी मदद को न आ जाते तो उसको शायद दूसरी टांग से भी हाथ धेना पड़ जाता.

हराम के पिल्ले….टूटी टांग का भी हिस्सा चाहिए तुझे. भूल गया जब तू चेचक से अधमरा हो चुका था. तेरे बदन पर मक्खियां भिनभिनाती रहती थीं. उस समय अगर मैं तेरी देखभाल न करती आज तू लंगड़ा ही नहीं काना भी होता….. और राह चलते लोग तुझपर थूकते भी.’

तब तो और भी ज्यादा कमाई होती अम्मा….तूने मेरी कम से कम पचास रुपये रोज का नुकसान किया है.’ रामबसिया फत्ते से कई वर्ष बड़ा था. लेकिन जब से गुलबानो ने चेचक से उसकी जान बचाई थी, तब से वह उसको अम्मा कहता था.

हरामखोर कीड़े पड़ें तेरे बदन में…..’ गुलबानो गुस्से में बड़बड़ाई. फिर फत्ते की ओर मुड़कर उसे दुतकारते हुए बोली— ‘हराम के टने. एक बात अच्छी तरह से जान ले कि तू जिस बाप की औलाद है, उसके आगे टोले के सारे भिखारी पानी भरते थे. वह अपाहिज के ऐसेऐसे स्वांग भरता था कि राह चलती औरतें देखते ही हायहाय करने लगती थीं.’ गुलबानो न झूठ नहीं कहा था. फत्ते का बाप गुलाम अहमद भिखारियों मे सबसे बड़ा कलावंत था. भिखारी टोले के कितने ही भिखारियों को उसने धंधे के गुर सिखाए थे. उसी के कारण आज भी टोले मे गुलबानो की इज्जत है.

गुलबानो के मुंह से गाली सुनकर वहां मौजूद भिखारी हंसने लगे थे. इसपर वह और भी बिगड़ गई—‘कब से कहती आ रही हूं, इधरउधर की छोड़, कमाई पर ध्यान दे. चार दिन मेरे साथ. उसके बाद तू इस लगट्टे से ज्यादा न कमाने लगे तो मैं भी अपने खसम की सगी नहीं.’ गुलबानो तैश में थी. लेकिन वहां मौजूद लोगों को तो इसी में मजा आ रहा था.

ऐसा कौनसा जादू है, गुलाबनी!’ बड़ीम्मा ने हंसते हुए कहा. गुलाबनो चुप हो गई. वह बड़ीम्मा की इज्जत करती थी. गुलाबनो का मानना था कि दुनिया दिखावा पसंद करती है. किसी अंधे पर भी लोग उस समय तक विश्वास नहीं करते जब तक कि उसको ठोकर खाकर गिरते हुए देख न लें. यदि दीदावर इंसान भी आंखों पर काला चश्मा और हाथों में छड़ी लेकर निकले तो हाथ उसका पकड़कर घर तक छोड़कर आने वाले लोग मिल ही जाते हैं. बेटे के सुरक्षित भविष्य के लिए गुलाबनो चाहती थी कि वह जल्दी से जल्दी एक टांग पर चलने की आदत डाल लेे.

क्यों?’ फत्ते ने सवाल किया. हालांकि वह मां की मंशा को समझ चुका था. किंतु उसको विश्वास नहीं था कि मां होकर भी वह उसको ऐसी सलाह दे सकती है.

फत्ते के सवाल का सीधेसीधे जवाब देने के बजाए गुलबानो ने कहा था, ‘एक डाॅक्टर मेरी जानपहचान का है. हर महीने वह टांग पर प्लाॅस्टर चढ़ा दिया करेगा. पांचछह महीने में टांग मुड़कर सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन जायेगी. आदमी का काम तो एक टांग से ही काम सध जाता है. फिर दूसरी की जरूरत ही क्या है.’

मां की बात सुनकर फत्ते पर क्या गुजरी, यह बता पाना तो मुश्किल है. लेकिन मैं अवश्य कांप गया था. उस दिन भिखारी टोले की जिंदगी का एक और सच….स्वार्थ का एक और घिनौना रूप….लालच की एक और मिसाल मेरे सामने उजागर हुई. महानगरीय जीवन और समाज की तलख सचाई रूह को कंपा देने वाली थी. यकीन मानिए उस क्षण मैं वहां आने का अपना मकसद, यहां तक अपने आप को भी बिसरा चुका था. जब तक उनका तमाशा चला, मैं खड़ाखड़ा देखता रहा.

आगे वक्त कैसे खिसका, नहीं जानता. कितना खिसका….इसका भी अंदाज नहीं. मुझे तो यह भी याद नहीं है कि कब थकान और नींद की बेड़ियों ने देह को कब्जाना प्रारंभ किया, पैरों ने अपना धर्म निभाते हुए उस संकटकाल में मेरी मदद की. जिस समय मैं लगभग संज्ञाशून्य था, वे आपदधर्म का पालन करते हुए बिना किसी आदेश के वापस लौटने लगे. उस समय संभवतः बड़ीम्मा का ध्यान मेरी ओर गया था. उन्होंने आवाज भी दी थी. लेकिन मैं न जाने कौनसी दुनिया में था. मैं मंत्रसिद्धसा लगातार आगे बढ़ता गया….बस बढ़ता ही गया. शायद इस प्रण के साथ कि आगे कोई वास्ता उन लोगों से मैं न रखूंगा.

चारों ओर से हारा हुआ आदमी अपने मन की कहां कर पाता है! हवा में किए गए ऐसे प्रण कब हवा हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता.

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

 

 

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: