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दंश : 16वीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

 

समस्याएं चुनौती ही नहीं बनतीं, आदमी को जीना भी सिखाती हैं.

कई दिनों की अतृप्त आत्मा….गर्मागरम भोजन. बड़ीम्मा का स्नेहसत्कार. भटकाव के बाद कुछ देर का आराम. जिंदगी बहुरंगी होती है. पर उस क्षण दुनिया की सभी रंगीनियां उस भोजन में विराजमान थीं. शायद इसलिए कि कई दिन के अंधकार के बाद मुझे वे रंग देखने को मिले थे. अपने छोटे से जीवन में मैंने अनेक सपने देखे थे….उनमें से कितने फले—बता नहीं सकता. पर वह शायद ऐसा सपना था जो सबसे जल्दी तथा उम्मीद से बहुत पहले फला था. भूख जो कुछ देर पहले तक मरखनी भैंस की तरह वार पर वार किए जा रही थी, अब वह गोद में बैठी पालतू मैनासी सम्मोहक बन चुकी थी. लेकिन खाना खाते समय वह भूख भी मेरी लाडली थी. बड़ीम्मा के ममत्व को पूरी तरह आत्मसात् करने के लिए ऐसी ही मरखनी भूख कारगर थी.

अपनी सुरसासम भूख को शांत करने के लिए उस दिन मैंने कितना भोजन उदरस्थ किया था, यह बता नहीं सकता. पेट भरते ही मेरी दुनिया फिर मेरे भीतर समा गई. मां के न होने के एहसास को लेकर बाकी सब बातें धीरेधीरे स्मृति से लुप्त हाने लगीं. वहां से उठा तो देह में समाई थकान नींद बनकर आंखों में उतरने लगी. बाकी भिखारी उठकर अपनेअपने ठिकाने पर पहुंच चुके थे तथा वक्त बिताने के लिए बतकही, गीतभजन, किस्सा, कहानी, नोंकझोंक तथा गालीगलौंच में हिस्सेदारी कर रहे थे. इधरउधर कुछ आदमी नींद में बेसुध पड़े थे. उनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की थी, जिन्हें सुबह मुंहअंधेरे काम पर निकलना पड़ता था. उनमें से दोचार रिक्शा चालक भी थे. खानाबदोश जिंदगी जीने वाले. दिन के समय वे किराये पर लेकर रिक्शा खींचते. पसीना बहाते. थकान और टूटन के बाद नींद अच्छी आए इसके लिए शाम को किसी न किसी नशे की शरणागत होते. नशा उनका शौक बन चुका था, जिसे वे मजबूरी का नाम देकर निभाते चले आ रहे थे.

सलीम मुझे लेकर यार्ड के उत्तरी कोने की ओर बढ़ गया. उस दिशा में हवा अच्छी आ रही थी. फर्श भी साफसुथरा था. मैं नंगी जमीन पर लेट गया. ऊपर सितारे बारात सजाए हुए थे. लेटते समय मन शांत था. बापू आएगा या नहीं, इससे कम से कम उस समय मैं निश्चिंत था. सलीम बातें बना रहा था. जिनका कोई सिर था न पैर. मैं उसके बारे में जानना चाहता था. कहीं वह भी मेरी तरह ही तो….काश! ऐसा न हो. क्योंकि जिन हादसों से मेरा जीवन गुजरा था, मैं नहीं चाहता था कि उनसे किसी दुश्मन का भी सामना हो. सलीम का तो हरगिज नहीं. इसलिए कि उसी ने संकट के समय बांह थामकर मुझे सहारा दिया था. मुझे फिर जिंदगी से जोड़ा था.

कौंसा कैसी लगी तुझे?’ अनायास, सलीम ने ऐसा सवाल किया जिसकी मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी. झुग्गियों में बच्चे हालांकि उम्र से पहले ही जवान हो जाते हैं. परंतु मां के अनुशासन और घर की तंग हालत ने मुझे कभी भी अपने पंख फैलाने और उड़ने का मौका नहीं दिया था. हालांकि इससे पहले तक मुझे भरोसा तक नहीं था. जो हो सलीम के उस सवाल का कोई ढंग का जवाब मुझसे न बन पाया. जैसेतैसे सिर्फ ‘अच्छी है’ कहकर, चुप्पी साध ली. हालांकि कौंसा ने मेरे मन पर जो प्रभाव छोड़ा था, वह उससे पहले तक कोई लड़की नहीं छोड़ पाई थी.

सिर्फ अच्छी नहीं….बहुत ज्यादा अच्छी है वह, क्यों?’ सलीम लगभग गुणगान करने लगा था, ‘बेचारी ने बहुत ज्यादा कष्ट उठाए हैं.’

हूं.’ मैंने कहा. फिर सहसा कौंसा का ध्यान हो आया. कंधे पर भारीभरकम बोझा लटकाए….कबाड़ बीनने वाली वह लड़की. उसकी बड़ीबड़ी आंखें और चेहरे पर छायी मासूमियत किसी को भी अपना बना सकती थी. हालांकि रूपसौंदर्य की कोई समझ न थी. लेकिन कौंसा के बारे में जब से सुना कि वह अपने पिता की सेवा में रातदिन भागदौड़ करती है, वह मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगने लगी थी. सलीम न जाने आगे क्याक्या कहता चला गया. लेकिन मेरा ध्यान कौंसा की ओर लगा तो फिर वही देर तक दिलोदिमाग पर छायी रही.

उसी समय रेलगाड़ी की सीटी ने आसमान गुंजा दिया.

रात की आखिरी गाड़ी भी आ गई. क्या बापू आया होगा?’ मैंने अपने आप से प्रश्न किया. अगले ही पल निराशा जोर पकड़ने लगी—

बापू को आना होता तो जाता ही क्यों?’ मन में सवाल उभर आया. जिसमें दम था. बापू जानबूझकर मुझे छोड़कर गया है. जीवन में वह हमेशा अपनी जिम्मेदारियों से भागता रहा है. उसमें इतना धैर्य ही नहीं कि जिम्मेदारियों को लेकर कोई फैसला कर सके. उनके निस्तारण के लिए कोई योजना बना सके. इसलिए हमेशा उनसे भागता रहता है. ऐसा आदमी अपनी ही नजर का सामना कर पाने में असमर्थ रहता है. इसलिए वह दूसरों के साथसाथ खुद से भी भागता रहता है.

बापू नहीं आया तो मैं क्या करूंगा? कहां रहूंगा?’ एक शाश्वत प्रश्न मेरे सामने खड़ा हो गया.

सिवाय मजदूरी के और भला क्या कर सकता हूं मैं?’ खुद से सवाल किया मैंने.

इतनी कम उम्र में भला मजदूरी पर भी कौन रखेगा?’ दूसरे कोने से आवाज आई.

फिर कबाड़ी का काम?’

चलेगा, वह बिना हींगफिटकरी के शुरू हो सकता है. पर वैसा करने से कौंसा को घाटा होगा. इस रेलवे स्टेशन पर इतना कबाड़ तो है नहीं कि एक साथ दोदो का गुजारा हो सके.’

रेलवे स्टेशन ही क्यों, पूरा कस्बा पड़ा है….’

कस्बे में और कबाड़ी भी तो होंगे. एक अजनबी को भला वे क्यों जमीन देने लगे.’

तो क्या बूट पालिश करनी चाहिए?’

उसके लिए भी कम से कम पचाससाठ रुपयों की जरूरत पड़ेगी. इतने रुपये भला कहां से आएंगे.’ मैं भविष्य को लेकर चिंतित था. उबरने का एक ही रास्ता था. किसी भी भांति कमाई का जरिया हो जाए. सहसा निगाह भिखारियों पर पड़ी जो चरस और गाजे के नशे में धुत्त थे. अपने आप में मग्न. दुनियासमाज की चिंताओं से मुक्त. उसी के साथ मन आया कि क्यों न मैं भी भीख मांगने लगूं. ज्यादा नहीं बस दोचार दिनों की बात है. बापू के लौट आने के बाद तो….’ और तब सहसा लगा कि मुंह पर किसी ने तमाचा दे मारा हो.

पुरु, सुना है कि तू भीख का अन्न खाएगा? बहुत ही शर्म की बात है. इससे तो अच्छा है कि तू मर गया होता. मैं भी तसल्ली कर लेती.’

मां के ये शब्द वर्षों से मेरा पीछा करते हुए आ रहे थे. वही तमाचा बनकर एकाएक मेरे मुंह पर पड़े थे. मुझे याद है कि जिस दिन मां ने ये कड़बे बोल कहे थे, उस दिन कुछ देर पहले ही मैं मतंग चाचा की झोपड़ी में चला गया था. अकेले रहते थे वह. आगे नाथ न पीछे पगहा, जैसी हालत थी उनकी. कुछ दिन नगर निगम में नौकरी कर चुके थे. मगर अपने आप में रमे रहने की आदत के कारण नौकरी उन्हें भारी पड़ने लगी. यूं तो विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे. लेकिन वे सब गांव में रहते थे. जब नौकरी पर थे तो पत्नी को बिना नागा मनीआर्डर से रुपये भेज देते थे. बच्चे बड़े हुए तो दो तिहाई वेतन गांव भेजने लगे. परिणाम यह हुआ कि बच्चे पढ़लिखकर अपने धंधे पर जा लगे. गांव की परपंरा के अनुसार मतंग चाचा ने बच्चों का विवाह भी कम उम्र में कर उस दायित्व से भी मुक्ति पा ली. अब पत्नी अपने परिवार और बच्चों में मग्न है, और मतंग चाचा भीख के सहारे अपना पेट भरते हैं, हर महीने रकम बचाकर गांव भेजते रहते हैं. गांव में सभी जानते हैं कि वे अब भी कहीं पर नौकरी करते हैं.

हैरानी की बात है कि मतंग चाचा भीख मांगने को कभी अच्छा काम नहीं माना. अपनी गंदी आदत के लिए वे आलस और जीभ के चटोरेपन को जिम्मेदार मानते हैं. मां ने ही बताया था, बच्चों के विवाह के बाद उन्होंने घर से संबंध लगभग तोड़ ही लिया. गांव को मनीआर्डर भेजना भी बंद कर दिया. अपनी नौकरी के मामले में भी वे बहुत लापरवाह हो गए थे. नौकरी पर जाने के बजाय कईकई दिन तक घर पर पड़े रहना. सरकार तो उनसे तंग आई ही, वे स्वयं भी दूसरों की बात सुनकर तंग आ चुके थे.

गांव में भरापूरा घर था, इसलिए नौकरी पर रहते हुए शहर में घर बनाने का विचार कभी बना नहीं. बाद में आलस बढ़ा तो कटौती के बाद मिले वेतन से घर का किराया निकालना भी कठिन हो गया. उन्हीं दिनों बापूधाम विकसित होने लगा था. उन्होंने किराये का घर छोड़ वहीं अपनी झुग्गी डाल ली. यहां आकर उनका आलस बढ़ता ही गया. आखिर नौकरी छोड़ दी. मतंग चाचा को जैसे सुकून ही मिला. नौकरी छोड़ते समय जो रुपया मिला था, वह कुछ ही महीनों में चटोरी जीभ की भेंट चढ़ गया. कुछ इधरउधर के काम किये….परंतु मन को शांति न मिली. जिम्मेदारी से बचना चहते थे. लापरवाही, आलस और बेरोजगारी ने असर दिखाया. आखिर बीमार पड़ गए. देखभाल के अभाव में रोग बढ़ता ही गया.

एक दिन बेहोशी की हालत में किसी ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया. वहां कई दिन लावारिस की तरह पड़े रहे. निकले तो काफी कमजोर थे. चलनाफिरना भी मुश्किल. उस समय पेट की भूख मिटाने के लिए कटोरा हाथ में लिया था. फिर तो उसका चस्का पड़ गया. दिल के भले थे और मददगार भी. स्वार्थ से बहुत दूर. लेकिन मां उनके आलसी स्वभाव और लापरवाही के कारण उनसे हमेशा नफरत करती रही. बाद में जब उन्होंने पेट भरने के लिए भीख मांगने लगे तो मां की नफरत और भी सवाई हो गई.

एक शाम का किस्सा और याद आ रहा है. मां शाम के भोजन के लिए दाल बीन रही थी. पतीली अंगीठी पर खदबदा रही थी. जिसमें पानी उबल रहा था. दाल को देख बापू ने मुंह बिचकाया. मां समझ गई. ऐसा अक्सर हो जाता था. बापू की जब भी अच्छी कमाई हो जाती या कहीं से पीने को एकाध पव्वा हाथ लग जाता तो उसके रंगढंग निराले ही होते थे. आते ही उसने मुझे आवाज दी. मतंग चाचा की झुग्गी से मनभावन गंध आ रही थी.

सुन रे…. तुझे मतंग चाचा बुला रहे हैं!’ आयु में लगभग डेढ़ गुने होने के कारण बापू भी उन्हें चाचा ही कहता था.

बापू मतंग चाचा के घर होकर आया था. मैं वहां पहुंचा तो एक कटोरी में मछली की तरकारी लिए वह मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे. मैं खुशीखुशी कटोरा उठा लाया. बापू ने मछली के दो टुकड़े और थोड़ी तरी मेरी कटोरी में उंडेल दी. मेरे छोटेभाई बहन भी तब तक वहां पहुंच चुके थे और वे उम्मीदभरी निगाह से हम दोनों की ओर देख रहे थे. बापू ने बेला को बुलाया भी. पर न जानेे किस डर से वह दूर खड़ी देखती रही. मैं तरकारी चखने ही जा रहा था कि तभी पैरों की धमक से ध्यान बंटा. हाथ हवा में ही झूलता रह गया. मैं कुछ समझ पाऊं उससे पहले ही मां का तमाचा मेरे गाल पर था. लालपीले तारे मेरी आंखों में झिलमिलाने लगे.

हरामखोर! अभी से दूसरों के अन्न पर जिएगा तो आगे क्या करेगा.’ मां ने गुस्से में कहा था. मैंने देखा—वह गुस्से से थरथरा रही थी. सब्जी तो वह नाली में फेंक ही चुकी थी. मुझे मां पर गुस्सा आया. पर गाल सहलाता हुआ मैं वहां से चला गया.

वही तमाचा आज फिर मेरे गालों पर पड़ा था. मां हालांकि अब इस दुनिया में नहीं रही. पर उसका एहसास अपना कर्तव्य निभा रहा था. उसी क्षण मैंने फैसला किया कि भीख मांगने जैसे काम के बारे में सोचूंगा भी नहीं. कुछ दिन बापू की प्रतीक्षा करूंगा. यदि वह नहीं आया तो कोई छोटामोटा काम कर लूंगा. कौंसा के अलावा कई और बच्चों को भी मैं प्लेटफार्म पर काम करते हुए देख चुका था. छोटेछोटे पांचछह साल के….ढोलक और मंजीरा लेकर प्लेटफार्म पर कलाबाजियां खाते, दुकान पर बर्तन रगड़ते हुए….अपना और अपने परिवार का पेट भरने वाले गरीबमासूम बच्चे. इससे मेरा हौसला बढ़ा था. मैं अकेला रहने की ठान चुका था.

इसके बाद गहरी नींद तो आनी ही थी.

गहरी नींद स्वर्ग की सैरगाह तक ले जाती है.

अगली सुबह आंखें खुलीं तो बड़ीम्मा को खुद पर झुका हुआ पाया. आंखें भी अपने आप कहां खुली थीं. लगा था जैसे कोई मेरे बालों को हौलेहौले सहला रहा हो. और लगा कि सपनों में देवमाता आकर मुझे दिन सुधरने का वरदान दे रही है. यह भी लगा कि लोरियों की तरह शहद से मीठे शब्द मेरे कानों में घुलते आ रहे हैं. बापू ने कभी मुझे अपनेपन से बेटा नहीं कहा था. मां मेरे बहाने अपने भगवान को ही टेरती रहती थी. उसके लिए मैं महज ‘परमात्मा’ था. हां, कभीकभी जब मैं उसकी गोद में लेटा होता तो वह मीठी आवाज में गुनगुनाने लगती थी. उसकी आवाज में इतनी मिठास होती कि मैं अपनी सुधबुध खो बैठता था.

बड़ीम्मा की आवाज कुछ मोटी, शरीर भारीभरकम था. पर उसमें वात्सल्य का प्राचुर्य है—ऐसा मुझे अनुभव हुआ था. पिछले कई दिनों से मैं उसी अनुभूति के लिए तड़फ रहा था. इसलिए उसे सुनतेमहसूसते हुए मुझे प्रफुल्लित होना ही था. अपना वजन संभाल न पाने के कारण बड़ीम्मा चबूतरे का सहारा लिए खड़ी थीं. झुर्रियों से भरपूर उसका चेहरा मद्धिम रोशनी में कुछ डरावना लग रहा था. पर आंखों में भरा वात्सल्य मन की आश्वस्ति के लिए पर्याप्त था. मैं फौरन बैठ गया. मैंने बगल में टटोलकर देखा. सलीम वहां नहीं था. यार्ड में भी इक्कादुक्का लोग ही बाकी थे. सभी अपनेअपने धंधे पर जा चुके थे. पांचछह गेरुए वस्त्रधारियों को छोड़कर, जिनका धंधा धर्म की दलाली पर टिका था.

उनकी मंडली बाकी भिखारियों से अलग थी. उन्होंने अपना भोजन अलग पकाया था. उनकी रसोई से मीट पकाए जाने की आवाज देर तक आती रही थी. खाना खाने के बाद उन्होंने चरस और गांजा का दम लगाया था. उसके बाद जहां जी आया, पड़ रहे. दूसरे भिखारियों की तरह. अब धंधे पर जाने से पहले उसके उपयुक्त वस्त्राभरण भी आवश्यकता को देखते हुए वे सभी बनसंवर रहे थे. शृंगार किया जा रहा था. बड़ीम्मा के चूल्हे की राख का उपयोग बर्तन मलने और शरीर पर भस्म की तरह रगड़ने के लिए किया जा रहा था. माथे पर पीली और मुल्तानी मिट्टी का लेप चढ़ाकर चोले को वानप्रस्थी रूप दिया जा रहा था.

नींद तो अच्छी आई ना बेटा?’ बड़ीम्मा के सवाल ने मेरा ध्यान भंग किया.

जी.’ मैंने कहा.

एक बात पूंछू बेटा? अगर तू सच कहने का वचन दे तो?’ बड़ीम्मा का सवाल उसे कुछ गलत लगा. पर मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना ही अपनी निगाह बड़ीम्मा के चेहरे पर टिकाए रखी—

बेटा, तू कहीं घर से भागकर तो नहीं आया?’ एकदम अलगअप्रत्याशित आपमानिक और उचितसा सवाल किया बड़ीम्मा ने. मैं झुंझला पड़ा. परंतु मन में कहीं बड़ीम्मा के मातृत्व के प्रति सम्मान का भाव भी था. अतएव जी में यह भी आया कि बीते दिन जिन झंझावातों से मुझे गुजरना पड़ा उनके बारे में बड़ीम्मा को राईरत्ती बता दूं? फिर लगा कि बापू की आने तक ऐसा करना सरासर गलत होगा. चुप्पी साध लेना बड़ीम्मा की सहृदयता का अपमान. इसलिए सच का सहारा लेते हुए मैंने इंकार में गर्दन हिला दी.

फिर ठीक है….’ बड़ीम्मा की आवाज में प्यार और भी घुलमिल गया. मानो बिना कहे ही मेरे कष्टों को जान चुकी हो. बोली, ‘सब ठीक हो जाएगा. उठकर हाथमुंह धोले, मैं चाय बनाती हूं. जब तक मैं हूं, किसी भी बात की फिक्र मत करना. भले ही मेरा शरीर छीज चुका है. चौकाचूल्हा पूरी तरह संवरता नहीं. पर तू रहा तो मदद ही करेगा. मुझे भी सहारा मिल जाएगा. यहां के लोगों की बातांे पर भी मत जाना. वे भले मुंहफट और कंगाल हों. पर दिल के भले और पाकसाफ हैं. तेरे लिए प्यार और रोटी की यहां कोई कमी नहीं होगी.’

इतना बड़ा आश्वासन एक मां ही अपने बेटे को दे सकती थी. मुझे लगा कि बड़ीम्मा की मूरत मेरे मन में बसी मां की छवि का स्थान लेती जा रही है. यह विचार अच्छा था, अन्य परिस्थितियों में मैं इसका स्वागत ही करता. लेकिन उस समय ऐसे विचार से ही मैं चौंक गया. वस्तुतः यह अधिकार मैं किसी को भी नहीं दे सकता था. मां का चेहरा मेरी आंखों में था. बड़ीम्मा शायद कुछ और भी पूछना चाहती थीं. लेकिन अपने सवाल को कुछ समय के लिए टालकर चूल्हे की ओर बढ़ गई.

उस दिन मुझे यह भी पता चला कि भिखारियों के लिए शाम का भोजन ही खास होता है. दिन के भोजन का उनका कोई ठिकाना नहीं होता. जहां जब जैसा और जितना मिला—भूख के आगे चारा डाल दिया. भोजन एक तरह से भूख को बस बहलानाभर होता है. शाम का खाना होता है जीवन को उत्सवमय जीना. मैं ना तो खुद को बहलाना चाहता था. ना उधार की रंगीनियों के सहारे जीना. बापू के आने की क्षीणसी आस अब भी बाकी थी. इसलिए हाथमुंह धोने के बहाने वहां से प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया. उस समय तक सूरज नहीं निकला था. यह देखकर मैं हैरान रह गया कि कौंसा मुझसे पहले ही प्लेटफार्म पर पहुंच चुकी थी तथा पटरियों पर झुकी हुई कचरा बीन रही थी.

मेरे पास कोई दूसरा काम तो था नहीं. बस मामूलीसी आस थी बापू के लौट आने की. इंतजार के लिए प्लेटफार्म पर टिके रहना जरूरी था. इसलिए मैं भी कौंसा के पीछे पटरियों पर पहुंचकर कचरा बटोरने लगा. कौंसा की निगाह मुझ पर पड़ी तो वह ठिठक गई.

आज लगता है तू कुछ जल्दी आ गई है?’ मैंने उसे उलझाने की कोशिश की. और सचमुच वह चुप हो गई.

हां!’ कुछ देर तक सोचने के बाद उसने जवाब दिया, ‘आज बापू को लेकर डाॅक्टर के पास जाना है. मैंने सोचा कि उससे पहले ही आज का काम निपटा लूं.’

क्या कोई और नहीं है तेरे घर में?’ मैंने प्रश्न झाड़ा, हालांकि इस बात पर सलीम मुझे सबकुछ बता चुका था. परंतु कौंसा से बातचीत का कोई नया बहाना मैं एकाएक नहीं सोच पाया था. मेरे प्रश्न पर कौंसा ने मेरी ओर देखा. उसकी आंखों में दुःख का समंदर हिलोरता नजर आया. लेकिन मन की हूक होठों की सीमा में कैद होकर रह गई. और वह बिना कुछ बोले चुपचाप कबाड़ चुनने लगी. मैं भी पटरियों पर झुक गया—

अगर तू मेरी मदद करने के लिए ही यह सब कर रहा है तो समझ ले कि मुझे तेरा अहसान बिलकुल नहीं चाहिए.’ कौसा ने कहा. तब तक मैं उसके प्रश्न के लिए खुद को तैयार कर चुका था. इसमें भी उपकार जैसी भावना न होकर सरासर मेरा स्वार्थ था—

मैं किसी पर भला क्या अहसान कर सकता हूं. समझ ले कि यह सब अपनी जरूरत के लिए कर रहा हूं. बदले आज अगर तू मुझे कुछ पैसे देगी तो मैं मना नहीं करूंगा.’

तो तू क्या समझता है कि जरा से काम के लिए मैं आज भी तुझे उतने ही रुपये दूंगी—आखिर इस काम में बचता ही क्या है. फिर तू मेरे इलाके में कबाड़ बीनेगा तो नुकसान भी मुझे ही उठाना पड़ेगा. इसलिए आज मैं तुझे एक रुपया से ज्यादा नहीं देने वाली. और कल के पैसे भी आज नहीं मिलेंगे, समझा.’ कौंसा सीधे मोलभाव पर उतर आई थी. शायद वह मुझे चिढ़ाना चाहती हो. उसके कहे पर मैंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. इस पर वही थोड़ी देर बाद बोली—

आजकल के डाक्टरों का भरोसा नहीं. वे पूरे कसाई होते हैं—कसाई. मरीज को मूंडने को हमेशा तैयार. वे न दिन देखते हैं न रात, अमीर देखते हैं न गरीब.’ कौंसा के स्वर में पीड़ा थी. उसके शब्दों में छिपा आक्रोश मेरे दिल में उतर गया था. लगा कि सोलहसतरह वर्ष की उम्र में ही कौंसा के चेहरे पर पसर आई प्रौढ़ता अनायास नहीं है. उसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है. उस रहस्य तक पहुंचने की जिज्ञासा मेरे मन में उमड़ने लगी. मगर प्रकट में वैसी कोई जिज्ञासा मैंने नहीं दिखाई. इतना मैं समझ चुका था कि वह एक स्वाभिमानी लड़की है. किसी अपरिचित के आगे अपनी जिंदगी की पर्तें एकाएक हटाने से रही. क्या सलीम को यह सब मालूम होगा. शायद हो भी. मगर उसके व्यवहार से तो यह जाहिर नहीं होता. हालांकि वह खुद को कौंसा के जितना निकट समझता है, उतना शायद है नहीं. कम से कम कौंसा तो मन से उसके इतने करीब है नहीं.

मेरा अनुमान सच ही निकला. सलीम को कौंसा के बारे में महज इतनी ही जानकारी थी कि वह अल्मोड़ा के किसी गांव में रहती थी. गरीब मातापिता की इकलौती संतान. पिता को कोढ़ की बीमारी है और उसी का इलाज कराने वह शहर तक आई है. गांव से शहर तक चंद वर्षों की छोटीसी यह यात्रा, कितने उतारचढ़ाव, ठोकरें, दुखकष्टपीड़ासंत्रासउत्पीड़न, अवसादविषाद और झंझावात लिए है, इसे बस वही जानती है. दूसरा कोई नहीं. पहेली यह भी है कि शहर आने के बाद आज तक क्यों वह अपने पिता को अस्पताल नहीं ले गई. जाने क्यों उन्हें घर ही में बंद रखती है. यहां तक कि एक बार अस्पताल के कर्मचारी उसके बापू को इलाज के लिए ले जाने आए थे, तब भी उसने भेजने से इंकार कर दिया था.

कौंसा ने ऐसा क्यों किया, यह एक पहेली थी. सभी जानते हैं कि कौंसा की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि पिता का ढंग से इलाज करा सके. फिर भी उन्हें अस्पताल ले जाने से रोके रखना समझ से बाहर था. मैंने तय किया कि अगली मुलाकात में कौंसा से यह प्रश्न अवश्य ही करूंगा. क्या वह उसका जवाब देगी? इस प्रश्न के आगे मैं निरुत्तर था.

अनेक प्रश्न हैं, जिनका हम उत्तर खोजना चाहते हैं, उनमें से कुछ खास प्रश्न ही ऐसे होते हैं, जो हमारी अकुलाहट में ढल जाते हैं. कौंसा से मेरा कोई संबंध नहीं था. लेकिन अब वह मेरी अकुलाहट का कारण बन चुकी थी.

कहीं उसकी कहानी भी मेरी कहानी जैसी त्रासद तो नहीं!

यही मेरी अकुलाहट का कारण था.

मुझे बापू से बिछुड़े एक सप्ताह से ऊपर हो चुका था. उसके लौटने की उम्मीद अब भी थी. हालांकि वह क्षीण होती जा रही थी. एक बार मेरे दिमाग में आया भी कि वापस बापूधम लौटकर कल्लू, बेला और हरिया के बारे में पता करूं. जाने वे किस हाल में हैं. बापू ने उनकी सुध ली भी होगी या नहीं! किंतु बस्ती में उस रात घूमते सिपाहियों के बूटों की धमक अब भी मेरे दिलोदिमाग पर चस्पां थी. इस डर से वहां लौटने की तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. इस बीच प्लेटफार्म पर मुझे इधरउधर घूमते देखकर एक दुकानदार की निगाह मुझ पर पड़ गई. दोनों वक्त रोटी और प्रतिदिन पांच रुपये नकद के हिसाब से उसने मुझे नौकरी पर रख लिया. काम था झूठे बर्तन साफ करना….ग्राहकों द्वारा इधरउधर फेंके गए दोने उठाकर टोकरी में डालना, जो मुझे जरा भी पसंद नहीं था. लेकिन मजबूरी ही थी, कोई और काम न होने के कारण उससे लगे रहना. मैं नए काम की तलाश में भी था. सलीम ने इसमें मेरी मदद करने का आश्वासन दिया था.

मैंने बड़ीम्मा के पास जाना कम कर दिया था. पर बड़ीम्मा ने न जाने क्या देखा था मुझमें. डंडे के सहारे खरामाखरामा प्लेटफार्म पर मेरी खोजखबर लेने वह सुबहशाम दोनों वक्त आ जाती थीं. साथ चलकर खाना खाने को कहतीं. मैं प्रायः टाल जाता. एक दिन मालूम पड़ा कि बड़ीम्मा कौंसा पर भी मेहरबान हैं. इसीलिए रोज बचा हुआ खाना लेकर वह उसकी झुग्गी में पहुंच जाती हैं. वहां घंटों उसके पिता से बतियाती रहती हैं. तभी लौटती हैं जब शाम को चूल्हा जलाने का समय हो जाता है. बड़ीम्मा का रोटी लेकर आना कौंसा को पसंद नहीं. पर वह इंकार नहीं कर पाई. छूत के डर से उसके पिता से आकर मिलने वाले लोगांे की संख्या शून्य थी. वे बहुत अकेलापन अनुभव करते थे. कौंसा सोचती, बड़ा कलेजा है बड़ीम्मा का.

जब से बड़ीम्मा का आना शुरू हुआ था तब से उसके बापू चिड़चिड़ापन भी घटता जा रहा था. यही नहीं इलाज के लिए जब तब कुछ न कुछ रुपये भी बड़ीम्मा देती रहती थीं. शायद अकेली बड़ीम्मा ही थीं जो कौंसा के संघर्ष, दुख और तखलीफ के बारे में जानती थीं. जब भी उसका जिक्र होता—दोनों हाथों से अपने कान पकड़कर कहतीं—‘रामराम! जरासी उम्र में ही इस बच्ची ने कितना सहा है….लोगों ने कितना सताया है….इसकी जगह अगर मैं होती तो शायद अपने ही हाथों जान दे देती.’

पहली बार जिस दिन बड़ीम्मा के मुंह से यह सब सुना तभी से कौंसा के बारे में सबकुछ जान लेने की मेरी इच्छा बलवती हो चुकी थी. पर न जाने ऐसा क्या था उसकी कहानी में. मैं ही क्या बड़ों के सामने भी कौंसा को लेकर बड़ीम्मा गंभीर हो जाती थीं. कौंसा के बारे में उन्होंने किसी को शायद ही कुछ बताया हो. ऐसे में एक ग्यारहबारह वर्ष के बालक के आगे वे अपना मुंह खोलेंगी, जिसको वे अच्छी तरह जानती भी न हों, यह असंभव जैसा था. खुद मैंने भी अपनी कहानी उन्हें कहां बताई थी. मैं उनके साथ अजनबी की तरह ही तो रह रहा था….जिसकी अपनी दुनिया, रहस्यमय अतीत, दुख, पीड़ा, संघर्ष और व्यथाओं का संसार था.

हैरानी की बात है कि सलीम या बड़ीम्मा किसी ने भी मेरी रामकहानी सुनने की इच्छा व्यक्त नहीं की थी. जैसे कि सब जानते हों. जानते हों कि यहां आने वाले किसी भी प्राणी की सामान्य कहानी हो ही नहीं सकती. कदाचित सभी विशिष्ट कहानी को सुनने के लिए विशिष्ट अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं. यूं भी वहां रहने वाले हर प्राणी की जिंदगी में कुछ न कुछ खास रहा होगा. जिससे उन्होंने सामान्य रास्ते से हटकर भटकावभरा या कि यायावरी पंथ चुना हो. गोया वहां मौजूद हर व्यक्ति का जीवन एक रहस्यमय संसार था, जिसमें अनपेक्षित, अपरिचित तथा अविश्वसनीय व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था. वैसी हालत में यह उम्मीद रखना कि बड़ीम्मा कौंसा के जीवनरहस्य को मेरे सामने उजागर कर देंगी, व्यर्थ ही था.

खुद बड़ीम्मा की कहानी भी कौतूहल जगाती थी. अपनी लंबी उम्र में वे कब फुटपाथी जिंदगी का हिस्सा बनीं….क्यों बनीं, यह एक रहस्य ही था. संभव है कि वे कौंसा को अपने बारे में सबकुछ बता चुकी हों, और उनके जीवन के बारे में जानती हो. लेकिन बाकी के लिए तो उन दोनों की दुनिया रहस्यमय ही थी. पर एक दिन बातोंबातों में मेरे मुंह से बापूधम का जिक्र हो ही गया. सुनते ही बड़ीम्मा चैक पड़ी थीं.

अरे, वहां तो एक लंबा, कालासा….झुकी हुई कमर वाला एक भिखारी भी रहता था….जाने क्या नाम था उसकामतंग!’

आप जानती हैं उन्हें?’ बड़ीम्मा के मुंह से मतंग चाचा का नाम सुनते ही मेरा चेहरा खिल उठा था. पर अगले ही क्षण मैं अतिरिक्त रूप से सावधान हो गया. मतंग चाचा के जरिये कहीं बड़ीम्मा मेरी कहानी भी न जान चुकी हों—यही डर सताने लगा. लेकिन यह सोचकर मुझे आश्वस्ति हुई कि बड़ीम्मा कहीं आतीजाती नहीं. और इतने दिनों तक मतंग चाचा को मैंने वहां आतेजाते देखा भी नहीं था. यदि वे मतंग चाचा को जानती हैं तो संभव है कि बापू से भी परिचित हो. इस विचार के साथ ही मेरा मन अनजानी आशंकाओं से भर गया. इसी के साथ बड़ीम्मा के बारे में जानने की इच्छा भी जोर मारने लगी. अतः मैंने अपनी प्रश्नाकुल दृष्टि उनके चेहरे पर टिका दी.

बहुत चटोरी जुबान है उसकी. अच्छा खाने का शौकीन ठहरा. पर दूसरे भिखारियों की तरह वह शराब को हाथ नहीं लगाता था. न किसी और तरह का नशे का आदी था. सूफियाना मिजाज था उसका. हर समय न जाने कहां खोया रहता. जब मैं उसके चटोरेपन पर आक्षेप करती तो वह हंसकर कहा करता था—‘तुम ठीक कहती हो बड़ीम्मा! इसी कमबख्त जुबान ने सरकारी नौकरी छीन ली. घरपरिवार से अलग किया. अपनों की नफरत मिली. मानसम्मान, धर्मईमान सब कुछ गंवाया…..’

बड़ीम्मा, क्या आप मतंग चाचा के घरपरिवार के बारे में जानती हैं?’ मैंने पूछा था.

बहुत थोड़ा! बस इतना ही जितना कि उसने बताया था. ऊपर से जितना भला बनता है, उतना वह है नहीं. कहता था कि उसका एक भरापूरा परिवार है. बेटे और बहुएं हैं. खानेपीने का शौकीन ठहरा. हमेशा अकेला रहा, अपनी मर्जी का खाया पिया. दूसरे की दखलंदाजी तो उसको जरा भी पसंद नहीं. यहां कुछ दिन रहा. मेरे बनाए खाने की बहुत तारीफ करता था. लेकिन यहां के जमघट से उकताकर एक दिन बिना बताए चला गया.’

मतंग चाचा अपनी आयु अस्सी वर्ष बताते थे. बड़ीम्मा ने जो बताया उसके अनुसार तो वे पिछले पचीसतीस वर्षों से भीख मांगते आ रहे हैं. बड़ीम्मा ने मतंग चाचा के बारे में जो बताया उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था, जो मुझको मालूम न हो. मुझे यह जानकर तसल्ली हुई कि उन्होंने बापू के बारे में बड़ीम्मा को कुछ नहीं बताया था. सहसा मुझे याद आया कि भागते समय बापू मेरे छोटे भाईबहनों को मतंग चाचा के पास ही छोड़कर आया था. जाने उनकी क्या हालत हो.

मतंग चाचा आपसे कब मिले थे बड़ीम्मा?’ मैंने प्रश्न किया.

कई साल हो गए, बुढ़ापे में समय कैसे गुजर जाता है, याद ही नहीं रहता. इतना जरूर याद है कि वह दिल का भला है. खानेपीने का शौकीन है, पर अपनी जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं रहा. जो किया मन का किया, गलती की तो पछताया भी. जातेजाते उसने जो कहा था, वह भी कभी नहीं भूलता. मुझे आज भी उसके शब्द अच्छी तरह से याद हैं. उसने कहा था—घर छोड़ने वाला खुद से भी भागता रहता है, बड़ीम्मा! वह पिछले जीवन की हरेक घटना, स्थान तथा व्यक्ति से दूर चले जाना चाहता है. यहां तक कि उनकी छाया भी अपने पास फटकने नहीं देना चाहता.’

उसकी बातों में मलंग कीसी सचाई थी. यहां के भिखारियों को देखकर एक दिन उसने एक किस्सा भी सुनाया बताया था, ‘बड़ीम्मा! जितने भी लोग यहां जमा हैं….ये सभी दूरदूर से आए हुए हैं. रेलगाड़ी में भीख मांगते हुए ये खासतौर पर सावधान रहते हैं कि कोई परिचित, गांवजुहार का मानस नजर न आ जाएं. यहीं एक भिखारी आया जो अपना नाम परसा बताता था. बहुत अच्छा गला पाया था. रेलगाड़ी में चलते हुए भीख मांगता था. पुलिस और रेलवे के कर्मचारियांे तक से पूरी सेटिंग थी. हर सप्ताह नियमित रूप से चढ़ावा भेजता था.

एक दिन वह रेलगाड़ी में सिर पर हिमाचली टोपी ओढ़े व्यक्ति को देख गाना ही भूल गया था. वह आदमी अपने आप में मग्न, बराबर में ही बैठी सवारी से बात कर रहा था. उनकी बातों से जब उसको मालूम पड़ा कि वह उसी के जिले का है तो घबरा गया. बचतेबचाते वह दरवाजे तक पहुंचा और सवारियों के बीच खुद को छिपाने की कोशिश करने लगा. सहसा वह आदमी उठा और दरवाजे की ओर बढ़ने लगा. परसा को लगा कि वह पहचान लिया गया है. और अब पूछताछ करने के लिए उसी के पास आ रहा है. बस उसने आव देखा ना ताव, तत्काल चलती रेलगाड़ी से छलांग लगा दी. अगले दिन समाचारपत्रों एक भिखारी द्वारा आत्महत्या शीर्षक से उसकी खबर छपी.’

बड़ीम्मा चुप हुई तो उसकी आंखें सुदूर अतीत में न जाने कहां टिकी हुई थीं. जैसे वह धुंधली आंखों से पटरियों पर छितरी परसा की लाश को देख रही हो.

बड़ीम्मा, क्या सिर्फ झूठी इज्जत की खातिर ही ये खुद को छिपाए रहते हैं.’

मैं क्या बता सकती हूं बेटा. सिवाय इसके कि जो लोग घरसंसार छोड़ आने का दावा करते हैं, वे इस दुनिया में सबसे ज्यादा झूठे, धोखेबाज और मक्कार होते हैं. और तो और उनकी अपनी ही नजर में उनका झूठ कहीं नहीं टिक पाता. यही कारण है कि वे हमेशा बेचैन बने रहते हैं. अपनी बेचैनी को कुछ नासमझ गांजे और चरस के नशे से मिटाना चाहते हैं, तो कुछ जुआ खेलकर या फूहड़ ढंग से गाबजाकर. मतंग जैसे भिखारी जीभ के लिए अच्छेचटपटे भोजन का इंतजाम करके केवल अपना शौक ही पूरा नहीं कर रहे होते….खुद को सजा भी दे रहे होते हैं. यही कारण है कि उन्हें कभी शांति नहीं मिलती. भागते रहते हैं, इस दुनिया से और उससे भी अधिक अपने आप से.’

मतंग चाचा का नाम दुबारा आते ही मैं सतर्क हो गया. जानबूझकर मैं उनके किस्से से बचना चाहता था. डर था कि मतंग चाचा के वर्तमान का जिक्र बापूधाम की तंग गलियों से गुजरता हुआ मुझ तक भी पहुंच सकता है.

बड़ीम्मा मैं अब चलूं…? लाला मेरा इंतजार कर रहा होगा.’ मैंने कहा. लाला मैं उस चाट वाले को कहता था, जिसके यहां पिछले कुछ दिनों से नौकरी करने लगा था.

क्यों रे! चार ही दिनों में क्या नौकरी वाला बन गया है तू!’ बड़ीम्मा ने उलाहना दिया. फिर प्यार से मेरी पीठ हाथ फिराती हुई बोली—‘अच्छा है, ऐसे ही मेहनत करता रह. मेहनत की रोटी का स्वाद ही अलग होता है बेटा. ऐसी रोटी जो दूसरे की कमाई की हो, पेट का बोझ भले ही बन जाए, उससे तृप्ति नहीं कभी मिल पाती. तभी तो तू देखता है कि यहां शाम को आते ही लोग कुत्ते की तरह रोटी पर कैसे टूट जाते हैं. तूने देखा ही होगा, क्या फर्क है इनमें और जानवरों में. दूसरों की क्या कहूं, मैं खुद भी तो उन्हीं में से एक हूं. पर तू इससे बचकर रहना.’

मैं वहां से चला आया. पर बड़ीम्मा की बातें अभी तक मेरे कानों में गूंज रही थीं. उस दिन मैने जाना कि बात यदि अनुभवों से पगी हो, तो वह सच्ची और ज्यादा असरदार होती है.

और सच होने के कारण शायद कुछ कड़वी भी.

बड़ीम्मा ने जाने क्या देखा था मुझमें, मैं कभी समझ नही पाया. संभवतः वह मुझे चेतावनी देना चाहतीं कि जिस दुनिया में अकेला घिसटने का प्रयास कर रहा हूं, वह एकदम आसान नहीं है. उसमें घिसटने के लिए भी कौशल की जरूरत पड़ती है. यह सब सिखाया था उन्होंने एक कहानी के रूप में. वह किसी और की नहीं कोंसा की ही कहानी थी, जो उन्होंने अगली ही बैठक में मुझे सुना दी थी. बेहद दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी….मैं सुनकर हैरान रह गया था कि अठारहबीस वर्ष की वह दुबलीपतली लड़की ने होश संभालाने से अब तक कितना सहा है कि इस छोटीसी उम्र में….अगर इसे खेलनेखाने की उम्र कहा जाए तो भी गलत नहीं है कि वह दो बच्चों की मां बन चुकी है. हालांकि एक भी बार वह अभागी मातृत्व सुख नहीं पा सकी. एक बार बच्चा मरा हुआ जन्मा. दूसरी बार बेचारी खुद भी मरतेमरते बची….जाने कितनी बार कितनेकितने लोगों ने उसे छला….दुत्कारा….ठोकरें दीं….बुराभला कहा.

दुःख की शुरुआत तो तभी हो चुकी थी जब वह मां की कोख में आई थी. पिता तो बचपन से कोढ़ी थे ही. विवाह नहीं हुआ तो अपने ही जैसी एक लड़की को इस उम्मीद के साथ जीवनसाथी मान लिया कि जिंदगी के दुःख एकदूसरे के आंसू पोंछते हुए बिता देंगे. गांव वाले तो उनके पिता को पहले ही नापसंद करते थे. विवाह के बाद उनके मुंह और चढ़ने लगे. कोंसा पेट में आई तो मुश्किलें और भी बढ़ गईं. गर्भ जब सात महीने का ही था तो गर्भ में बच्चा हट जाने से कोंसा की मां को जोर का दर्द हुआ. वह जोरजोर से चीखने लगी. लेकिन गांव वाले दूर से ही कानों में उंगली डाले सुनते रहे. कोई उनकी मदद को न आया. कोंसा के पिता दाई को बुलाने गए तो उसने भी छूत के डर से हाथ लगाने से इंकार कर दिया.

पिछला कोई अनुभव तो था, बेचारे अकेले की जूझते रहे. आखिर धरती मां ने सहारा दिया. ईश्वर ने हाथ थामा. सुबह होतेहोते एक सतमासी बच्ची ने जन्म लिया. गोरीचिट्टी, सोने की तरह दिपदिपाती हुई. मां और बाप दोनों ने उसको मिलकर नाम दिया—कोंसा!

मातापिता जो भी अपनी संतान के लिए कामना करते हैं, वह सब कोंसा को मिला. रूपलावण्य और वुद्धिवैभव भी. थोड़े ही दिनों के बाद कोंसा के पिता को गांव छोड़ना पड़ा. मन मारकर अपनी बच्ची के साथ वे गांव छोड़कर एक कस्बे में जा बसे. वहां बहुत कम उम्र में ही कोंसा ने पढ़ना शुरू कर दिया. कोंसा शुरू से ही बहुत मेधावी थी. गणित में तो उसे कमाल हासिल था. बड़ेबड़े समीकरण वह चुटकियों में हल कर देती. बीजगणित की अनेक जटिल प्रमेय उसे जुबानी याद थीं. आठवीं परीक्षा में गणित में शतप्रतिशत अंक लाकर उसने सभी को चैंका दिया था.

यह लड़की मांबाप का नाम अवश्य रोशन करेगी. कोंसा को लेकर चारों तरफ यही चर्चा होने लगी. लेकिन जिंदगी उतनी आसान नहीं थी. कोंसा के मातापिता को कोई नौकरी तो देता नहीं था. उन्होंने छोटीसी दुकान खोलकर जिंदगी से जूझना चाहा. वहां भी नाकाम ही रहे. ग्राहक आए ही नहीं. पढ़ाई में तेज होने के कारण कोंसा को छात्रवृत्ति मिल चुकी थी. स्कूल वालों ने इसी शर्त पर उसको हास्टल में जगह दी थी कि वह पढ़ाई पूरी होने तक वह अपने घर नहीं जाएगी. नासमझ लोग थे, कोढ़ को छूत का रोग मानकर व्यवहार कर रहे थे. अध्यापक और साथ के विद्यार्थी कोंसा को चिढ़ाते. कोई उसके साथ बातचीत करने, खाना खाने को तैयार न होता था. उसी हालत में कोंसा ने दसवीं की परीक्षाएं दीं और एक बार फिर अपना और स्कूल का नाम रोशन किया. इस बार पूरे प्रदेश में अव्वल आई थी.

कोंसा के मांबाप जैसेतैसे अपना पेट भर रहे थे. उन्हें यही प्रसन्नता थी कि उनकी बेटी उनका नाम कमा रही है. कोंसा की सफलता की खबर उसके गांव भी पहुंची थी. इस बीच वहां एक स्कूल भी खुल चुका था. गांव से स्कूल से कोंसा के लिए बुलावा आया. फीस माफी और रहनसहन का खर्च उठाने के लिए भी स्कूल ने हामी भरी थी. यह न्योंता लेकर आने वाले खुद उस कालेज के प्रिंसीपल साहब थे.

बेटी, उस गांव में तुम्हारा जन्म हुआ है, इसलिए हमारा अधिकार तुमपर इस स्कूल वालों से अधिक है. इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम गांव के स्कूल में पढ़कर उसका नाम पूरे देश में रोशन करो.’ प्रिंसीपल साहब ने अपने पास बिठाकर कोंसा से कहा था. उस क्षण कोंसा की खुशी उसकी आंखों से छलक रही थी.

मैं भी यही चाहती हूं, सर! गांव में हमारा घर है. मैं आज ही जाकर पिताजी से बातें करूंगी. उन्हें गांव चलने के लिए तैयार कर लूंगी.’ अपनी खुशी पर काबू पाते हुए कोंसा ने जैसेतैसे कहा.

पर बेटी, मैं तो तुम्हारे चलने की बात कर रहा था.’

मैं समझी नहीं सर!’

मुझे तो कोई परेशानी नहीं है बेटी. लेकिन गांववालों को तो जानती ही हो, वे अनपढ़ और गंवार ठहरे. अगर उन्हें थोड़ी भी समझ होती तो उन्हें गांव से निकालते ही क्यों?’

आप उन्हें समझा सकते हैं कि कोढ़ छूत का रोग नहीं है…..’ कोंसा ने कहा.

वे कहां मानेंगे. और फिर तुम तो जानती हो बेटी, स्कूलकालेज बिना चंदे के तो चलते नहीं हैं. वह स्कूल भी उन्हीं की जमीन पर बना है. गांव वाले नाराज हुए तो…!’

मैं वहां अकेली नहीं जा सकती.’ कोंसा ने निर्णय सुनाते देर न की.

तुम यहां भी तो अकेली रहकर पढ़ रही हो.’ प्रिंसीपल ने तर्क दिया. कोंसा नहीं मानी. वैसे भी गांव में इंटर तक का ही स्कूल था. दो साल बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसको गांव जाना ही था. उसके बाद इंटर की परीक्षाएं हुईं. लोगों को कोंसा से जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ. एक बार फिर उसने अपने आप को प्रदेशभर में अव्वल सिद्ध कर दिया.

इस बीच मांबाप से दूर रहते हुए कोंसा को पांच साल से अधिक हो चुके थे. इन पांच वर्षों का एकएक पल उसने उनकी याद में बिताया था. इसीलिए जैसे ही उसको अपने परीक्षाफल की सूचना मिली, वह अपनी खुशी पर काबू न रख सकी. उत्साह में स्कूल को सूचना दिए बिना ही वह मातापिता से मिलने के लिए निकल पड़ी. कोंसा ने अपनी अप्रत्याशित आसमान छूती कामयाबी के कारण उस स्कूल में ही अपने कई दुश्मन बना लिए थे. गरीब और कोढ़ से ग्रस्त मातापिता की बेटी प्रदेश में अव्वल आए, यह उन लोगों को कतई स्वीकार नहीं था. वे अवसर की तलाश में थे. स्कूल से अनुमति लिए बिना मातापिता से मिलकर कोंसा ने उन्हें यह बहाना दे दिया. कोंसा के लौटते ही उसके विरुद्ध अनुशासन भंग की कार्रवाही की गई.

जिस कौंसा के कारण स्कूल का नाम जिलेभर में चमका था, उसको स्कूल के बाहर करते समय स्कूल ने समय नहीं लगाया. उसकी मां इस आघात को सह न सकी और इस घटना के पांचछह दिन बाद ही इस दुनिया से प्रस्थान कर गई. पढ़लिखकर अच्छी जिंदगी जीने के कोंसा के अरमान धरे के धरे रह गए.

उस समय वह अपनी आयु का अठारहवां साल पार कर रही थी. दुनियादारी से अलग प्रकृति अपना दायित्व बाखूबी निभा रही थी. कोंसा की देह से यौवन के अंकुर फूटने लगे थे. उसकी देह हमेशा ताजे कमलसी खिली रहती. देहगंध संयमी से संयमी युवाओं को पागल बना देती. उसकी आंखों में हजारहजार सपने थे. पर राहें उबड़खाबड़, पथरीली, उजाड़ और अंधकारभरी थीं. मां की मौत के बाद पिता तो जैसे टूट से गए थे. मासूम कोंसा पर उन्हें संभालने की जिम्मेदारी भी आ गई.

आगे हुआ वही जिसका अंदेशा था. जिस बात का डर हर जवान लड़की के मातापिता की नींद उड़ाए रखता है. एक दिन जब कौंसा किसी काम से लौट रही थी, गांव के कुछ लड़के उसके साथ छेड़छाड़ करने लगे. फिर बड़े भी उनमें आकर मिल गए. उसके बाद तो यह रोजाना का काम हो गया. कोंसा घर से बाहर निकलने से कतराती. रोती, डर लगता था उसे. पर उसका बस नहीं चलता था.

विपदाएं अगर किसी और रूप में, किसी और ढंग से पेश आतीं तो उनका सामना किया जाता. कोंसा उनसे भी जूझ लेती. हारजीत की परवाह किए बिना ही दुनियाभर से टकरा जाती. परंतु गली चलते छेड़छाड़….लोगों के चारित्रिक के पतन का यह आखिरी गर्त था. और कौंसा के पिता के लिए हौलनाक स्थिति. वह तो यह सोच भी नहीं पा रही कि क्या किया जाए. कैसे मुक्ति पाई जाए उन भेड़ियों से. बीमार पिता के साथ कैसे सामना करे उन दुष्टों का. रोजगार न मिलने के कारण वहां भुखमरी जैसी हालत पहले से ही थी. मजबूर होकर उन्होंने कस्बे को भी छोड़ने का निर्णय ले लिया. वैसे भी कच्ची दीवारों और छत की जगह ऊपर पड़े जर्जर छप्पर वाले किराये के मकान के अतिरिक्त वहां था भी क्या, जिसे घर कहा जा सके. जिसके लिए उस कस्बे में बसे रहने का लोभ पाला जाए.

अपने पिता को लेकर कोंसा सहारनपुर आ गई. एक छोटी फैक्ट्री में काम भी मिल गया. कुछ दिन जिंदगी सामान्य ढंग से बीती. मगर हिंò भेड़ियों की संख्या वहां भी बेशुमार थी. उन्हें जैसे ही पता चला कि कोंसा के पिता बीमार हैं, कोढ़ से ग्रस्त, पीठ पीछे किसी का सहारा नहीं, तो वे गिद्ध की तरह उसके चारों ओर मंडराने लगे. लालची लोगों की लपलपाती जहरीली जिव्हाएं उसकी देह पर जहर टपकाने लगीं. जहर बुझी नजरें तनमन बींधने लगीं. नई जगह, बिना किसी जानपहचान, जैसेतैसे एक कालिज प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में दाखिला मिला. एक मिशनरी कालेज में. बीए की प्रथम वर्ष की परीक्षा में अधिकतम अंक पाकर कोंसा ने एक बार फिर सभी को हतप्रभ कर दिया. जो लोग उसके प्रवेश पर आनाकानी कर रहे थे, वे अब उसपर गर्व करने लगे.

कोंसा दिन में काम करती. शाम को पढ़ाई करती. सेवासुश्रुषा से उसके पिता की हालत सुधरने लगी थी. लेकिन वह सुख भी ज्यादा दिन संभव न हुआ. मनचले लोगों की मनमानियां बढ़ती ही जा रही थीं. कोंसा को पता भी न चला और उसको लेकर मनचले लोगों के दो गुट बन गए. एक दिन उनमें आपस में ही घमासान हो गया. कोंसा को मालूम तब पड़ा जब पुलिस उस घटना की जांच के लिए उसको पुलिस स्टेशन बुलाकर ले गई. थाने जाने के बाद कोंसा और उसके पिता बेहद घबरा गए. सहारनपुर में उनका न तो स्थायी रोजगार था, न पक्का ठिकाना. एक दिन दोनों ने सहारनपुर छोड़कर राजधानी की राह पकड़ी.

कौंसा ने वहां नर्सिंग की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया. पर पिता की चिंता दूसरी थी. उन्होंने वही किया जो पिता के नाते उनका धर्म था. ढूंढने पर एक लड़का मिल भी गया. वह एक फैक्ट्री में काम करता था. कोंसा के मना करने के बावजूद पिता ने उसी के साथ उसका विवाह कर दिया गया.

कोंसा का विवाह तय करते समय उसके पिता ने न जाने क्याक्या सोचा था. न जाने कितने स्वप्न सजाए थे. उन्हें ऐसा करने का अधिकार भी था. कोंसा के अपने सपने, कुछ न कुछ अपनी कामनाएं भी रही होंगी. जिनमें एक कोशिश जिंदगी के एक और रूप को देखने और समझने की रही होगी. नादान लड़की! जिंदगी को कितनी आसान समझती थी.

कैसी विडंबना है, जो लड़की अंकगणित के सवाल चुटकियों में हल कर लेती थी. बीजगणित की जटिलतम प्रमेय जिसे जुबानी याद थीं. वह विवाह की मामूली गुत्थी को समझ न सकी. न जान सकी कि लड़की के लिए विवाह का अभिप्राय अपनी हैसियत को पुरुष के अस्तित्व में विलीन कर देना है. खपा देना है दूसरे की इच्छाओंमहत्त्वाकांक्षाओं के बीच. विवाह पक्का करते समय उसके उसके पिता ने कहा था कि वह अपनी जिंदगी तो जी चुका….कि ब्याह के बाद कौंसा का जीवन संवर जाएगा….कि जो दुःख उसकी बेटी अब तक झेलती आई है उनसे उसको मुक्ति मिलेगी. परंतु कितना गलत था वह. खुद भुलावे में था कि कोंसा को भुलावा देना चाहता था. कि बेटी के हाथ पीले करते समय एक मासूम पिता की वह कोरी खामाख्याली थी. कौन जानता था कि असलियत को. इस बात को कि नियति द्वारा असली परीक्षा तो अब ली जानी है.

कोंसा जवानी की पहली दलहीज पर थी. उसका रूप कंचनसा दिपदिपाता था. कोई भी पुरुष उस रूपदुलारी को पाकर धन्य ही होता. किंतु उसका पति न जाने किस कुंठा और भय का सामना कर रहा था. कि डरा हुआ था अपने आप से. कि दुल्हन बनी कोंसा के रूप ने उसको चोंधिया दिया था. हर लिया था उसकी बुद्धिविवेक को. पहली ही रात न जाने कब उसके दिमाग में यह डर समा गया कि पिता का कोढ़ उसकी बेटी में; और बेटी के जरिये उसकी देह में भी समा सकता है. इसलिए पहली ही रात कोंसा से अघोषित दूरी बना ली थी उसने.

हालांकि आने वाली रातों में उद्दाम वासना इस दूरी को मटियामेट कर चुकी थी. वह फैक्ट्री से नशे की हालत में लोटता. कोंसा के हाथ का बना खाना भी उसके गले न उतरता था. इसलिए रास्ते में ही खापीकर लौटता. कोंसा खाना लिए उसकी प्रतीक्षा में होती. उसकी भूख की परवाह किए बिना ही वह अपनी देह की भूख मिटाने पर जुट जाता. कोंसा अपनी किस्मत को कोसती. उसकी देह को रौंदते हुए उसने उसे कम आयु में ही मां बना दिया. परंतु मातृत्व सुख से वंचित रही वह अभागी. एक के बाद एक, दो बच्चे हुए….दोनों ही मृत. उनका इल्जाम भी कौंसा के ही सिर गया. यह कहा गया कि देह में छिपा कोढ़ बच्चे में जान भरने ही नहीं देता.

कोंसा का अपने ऊपर से विश्वास उठने लगा. पति जब उसपर कोढ़ी होने का इल्जाम लगाता तो उसे जाने क्यों उसकी बात पर विश्वास होने लगता. दिन में जब वह घर पर अकेली होती तो अपने सारे कपड़े उतार डालती. फिर देर तक अपनी नंगी देह के एकएक स्थान को टोहती. कहीं कोई दाग तो नहीं. मामूली फुंसी भी उसके दिल की धड़कनों को बढ़ा देती. उस समय उसका अपना ही विश्वास डोलने लगता. बारबार देखने पर भी विश्वास न होता. नतीजा यह होता कि भारी तनाव में उसकी सांसे चलने लगतीं. कलेजा उछलकर बाहर आने को होता.

पति तो अपना सारा वेतन शराब और होटल पर उड़ा देता था. घर चलाने के लिए कोंसा को खुद ही काम करना पड़ता. भूख और तनाव से उसकी देह की कांति धुलने लगी थी. चेहरा पीला पड़ने लगा था. दिमाग कुछ भी सोचने, फैसला करने में असमर्थ था. एक दिन शाम को जब वह घर लौटी तो झोपड़ी के दरवाजे अपने लिए बंद पाए. भीतर वह आदमी जिसे वह अभी तक पति मानती आई थी, किसी दूसरी औरत के साथ था. छाती पर दुःख की शिला उठाए उसने ससुराल की देहरी लांघ दी.

पिता के पास लौटी तो पत्थर की शिला बनकर, मूकअबोल और निःसंवेद. सुखदुख, हंसनेरोने का असर ही नहीं. बिस्तर पर पड़ा बीमार पिता बिन कहे ही बेटी के मन की व्यथा समझ गया. तीन महीने का गर्भ था उसे. दो वर्ष में तीसरी बार ऐसा हुआ था. कोंसा उसे मिटा देना चाहती थी. ताकि अतीत का कोई चिह्न बाकी न रहे. पर बीमार पिता का कहा मान उसने समझौता करना ही ठीक समझा—‘कि जिसका अंश कोख में है वह तो कभी समझ न सका. संभव है कोख से जन्मा जीव जिंदगी के अभावों को पाट दे. दुखों के आगे बाड़ बनकर खड़ा हो जाए.’

बड़ीम्मा जैसे अदृश्य पट पर लिखी इबादत को बांच रही थीं. वे चुप हुईं तो मेरी जिज्ञासा एकएक भड़क गई—

वह बच्चा कहां है? अब तो बहुत बड़ा हो गया होगा.’ मैंने पूछा.

कैसा बच्चा?’ बड़ीम्मा के मुंह से हायसी निकली. इतनी गहरी कि सारा वातावरण दुःख से सराबोर हो गया. बड़ीम्मा जैसे जल्दी से जल्दी उस दबाव से बाहर आ जाना चाहती थीं. इसलिए कुछ ही क्षणों के बाद अपनी उसी रौ में, उन्होंने फिर कहना शुरू कर दिया—

मासूम हिरनी यही सोचकर जंगलजंगल भागती रहती है कि जंगली जानवरों से दूर चली जाएगी. वहां अपनी सामान्य जिंदगी जिएगी. अपने बच्चों के साथ चैन से रहेगी. लेकिन जंगल में चलने वाला ताकत का कानून, परिस्थतियों की मनमानी उसके हर ख्वाब को नोंच डालती है. वह बेचारी यह भूल जाती है कि खूंखार जानवरों से दुनिया का कोई कोना खाली नहीं है. भेष बदलकर वे हर जगह, हर बस्ती, हर महफिल में मौजूद रहते हैं. मौके की ताक में. दाव लगते ही निर्भय होकर वार करते है.

कोंसा ने अलग जिंदगी जीने का फैसला किया. मगर इस बार भी उसका रूप उसके लिए छलावा साबित हुआ. वहां आए डेढ़दो महीने ही हुए थे कि उसकी भनक उसी बस्ती में रहने वाले पूरन को लग गई. चालाक और र्काइंया पूरन मजमा लगाकर, झूठ बोलकर लोगों को तरहतरह से मूर्ख बनाने में माहिर था. झुग्गी में अकेला रहता. शराब और जुए की लत थी. इसी से उसकी घरवाली उसे छोड़ कर चली गई थी. कई गंदी आदतें थीं. वह आतेजाते कोंसा को ताका करता था. एक दिन कोंसा के पैर में मोच आ गई. उस दिन शाम को वह मददगार बनकर पहुंच गया. उस समय कोंसा दर्द से बिलबिला रही थी. उसका बूढ़ा बीमार पिता मददगार तो था नहीं. पूरन ने ही उसे डाॅक्टर को दिखा आने का झांसा दिया.

वही रिक्शा में डालकर कोंसा को डाक्टर तक ले गया था. डाक्टर को उसने राम जाने कौनसी पट्टी पढ़ाई और उस कसाई डाक्टर ने भी मासूम कोंसा पर दया करने, अपना धर्म निभाने की बजाए पापी पूरन का ही साथ दिया. घर पहुंचते ही वह मासूम दर्द से बिलबिलाने लगी, इतनी बुरी हालत थी कि देखनेसुनने वाले का भी कलेजा फट जाए. सब के साथ मैं भी गई थी कोंसा से मिलने….उसकी खबरसुध लेने के लिए. मगर मैं तो उसकी हालत देखकर ही घबरा गई थी, अबोध जान और इतना भारी कष्ट, भगवान किसी दुश्मन को भी न दे. इतना दुःख कि पत्थर का कलेजा भी फट जाए….मां, हे राम!!

हरामी पूरन ने अपने स्वारथ के खातिर भारी जुल्म किया था उस बच्ची पर. चार माह का गर्भ खून के साथ बह गया. जिस डाक्टर ने पाप में हिस्सेदारी निभाई— राम करे, उसके कीड़े पड़ें. उसे जिंदगी में कभी सुखचैन नसीब न हो. उस दिन बड़ी मुश्किल से बच पाई थी, कोंसा. उस दिन को आज भी याद करूं दिल बैठने लगता है.’

और पूरन को किसी ने कुछ नहीं कहा?’

कोई क्या कहता भला….फिर पूरन कोई अकेला तो नहीं था. कोंसा जैसी मासूम लड़कियां जिस ओर भी जाएं, वहीं अनगिनत पूरन मिल जाते हैं. किसकिस से लड़ें वे बेचारी….’ बड़ीम्मा ने आहत स्वर में कहा. फिर चुप्पी साध गई. वह चुप्पी मुझे भी आहत कर रह थी. पर बड़ीम्मा से आगे कुछ भी पूछने का साहस न हुआ.

दुःख तो मैंने भी बहुत सहा था. मां तो गृहस्थी को सुखदुःख की सार कहती आई थी. हर दुःख को शांत भाव से सह जाना उसका स्वभाव बन चुका था, मानो पत्थर की शिला, निद्वंद्वनिःस्पंद हो सबसे! लेकिन उस दिन बड़ीम्मा के मुंह से कोंसा के बारे में जो सुना वह दुःख और दुर्भाग्य की पराकाष्ठा थी. सीमा थी व्यक्ति के संयम और नियति के न्याय की.

मां के मरने के समय भी मैं रोया नहीं था. भागदौड़ के बीच पिता ने उसका अवसर ही नहीं दिया था. उसके बाद तो आंसू जैसे सूख से गए. आंखें सहारा का जंगल बन गईं. लेकिन उस दिन आंखें सचमुच नम थीं. कई दिनों के बाद आंसुओं से मुलाकात हुई थी. मन भीगभीगसा गया. आंसुओं की कारीगरी उसी दिन महसूस हुई. बड़ीम्मा का एहसान जताता हुआ मैं उनके पास से उठा. उन्होंने जिंदगी के एक और रूप से परिचित कराया था. वहां से लौटते हुए मुझे लग रहा था कि अब मैं कोंसा को अच्छी तरह समझ सकूंगा. क्या सचमुच? मन में इसे लेकर एक संदेह भी था.

कभीकभी हम अपनी सीमाओं से बड़े दावे कर जाते हैं.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

 



 

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