टिप्पणी करे

दंश : 15वीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास


सत्ता की प्रामाणिकता कोई अमूर्तन स्थिति नहीं है. वह सर्वानुकूल स्थितियों का श्रेष्ठतम चयन है.

सबकुछ वक्त के हवाले कर देना. जितना यह सोचना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, असंभवसा काम है. आदमी के भीतर छिपा हुआ डर, आगत की चिंता और भविष्य की अनिश्चितता के चलते यह संभव भी कहां हो पाता है. मगर इससे ज्यादा एक टूटे और हताश आदमी के हाथ में होता भी क्या है कि जितना हो सके वह वर्तमान को अतीत का धरातल उपलब्ध कराते हुए उसको भविष्य से जोड़े रखे. लेकिन मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब आदमी का अतीत ही भरोसेमंद न हो. उसमें कुछ भी ऐसा न हो जिसकी मजबूती पर भविष्य की इमारत, भले ही वह तात्कालिक रूप से हवाई महल बनकर क्यों न हो, खड़ी की जा सके. ऐसे में दुनिया से निराश, छटपटाता हुआ आदमी तिनके को भी सहारा मानकर चलता है. यह जानते हुए भी कि तिनके को हवा के झोंके के साथ, जिधर भी वह ले जाए, बह जाना है. शायद तिनके का नाकुछ वजूद और भविष्य के प्रति अनिश्चितता ही उसे उससे बांधे रहती है.

हम तीनों भी जीवन की अनिश्चितता के शिकार थे.

आगेआगे कौंसा थी. पीठ पर कबाड़ का बोझा लादे हुए. उसके पीछे सलीम. बैसाखियांे के सहारे एकएक पटरी पर संभलकर पांव बढ़ाता हुआ, सबसे पीछे मैं. जिसका अतीत कहीं पीछे छूट चुका था और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित था. हम तीनों पटरीपटरी आगे बढ़ रहे थे. अभी तक मैं केवल प्लेटफार्म या उसके आसपास ही घूमता रहा था. जिस ओर हम बढ़ रहे थे वह अनजानी दिशा थी. चारों ओर निर्जनता का आलम, रहस्यमय वातावरण.

करीब एक फर्लांग आगे रास्ता पटरियों के दोनों ओर फटता था. बायीं ओर लकड़ी के फट्टे खड़े करके रेलवे की जमीन पर नाजायज कब्जा जमाया हुआ था. कौंसा उसी ओर मुड़ गई. सलीम पटरियों के पास खड़ा रहा. उसके साथ मैं भी. लगभग दस मिनट बाद वह लौटी तो हथेली पर सिक्के चमक रहे थे.

हराम का पिल्ला बेईमान. मेहनत का मोल देना तो उसने कभी सीखा ही नहीं.’

क्यों….जमीलू ने आज फिर चूना लगा दिया?’ सलीम ने हंसते हुए सवाल किया.

यह तो उसका रोज का काम है. हाथ में सबीह और सामने कुरआन रखकर भी बेईमानी करता है. कम से कम बीस का माल रहा होगा, पर दिए सिर्फ बारह….’ कौंसा के चेहरे पर नाराजगी की अनेक पर्तें चढ़ी हुई थीं. किंतु मुझसे नजर मिलते ही उसका गुस्सा ठंडा पड़ने लगा. फिर हथेली पर रखे सिक्कों में से कुछ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कौंसा ने कहा—‘रख ले, कुछ खा लेना!’

कौंसा का यह व्यवहार मुझे अच्छा लगा. मुझे पैसों की जरूरत भी थी. मैं उस समय अनाथ जैसा ही था. पर उस तरह रुपया लेने का मेरा मन न हुआ. वैसे भी कौंसा की मदद के लिए कबाड़ जमा करते समय उसकी कीमत वसूलने जैसा कोई विचार मेरे मन में नहीं उठा था. यहां तक कि उस समय यह एहसास नहीं था कि मैं उसकी मदद कर रहा हूं. कौंसा की बड़ीबड़ी आंखों में अद्भुत आकर्षण था. वही मुझे उसकी ओर खींच ले गया था.

रख ले. तेरी मेहनत के हैं, एहसान नहीं कर रही?’ कौंसा आग्रह करने लगी.

मुझे शांतनिश्चल खड़ा देख सलीम ने पैसे झटकने का प्रयास किया. जो सिर्फ एक खेल जैसा ही था. पर सावधान कौंसा ने फौरन मुट्ठी भींच ली. और तब मुझे एहसास हुआ कि उसे छल पाना आसान नहीं है. मेरी ओर से कोई उत्सुकता न देख कौंसा ने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए.

ये दो रुपये मेरे पास तेरी अमानत हैं. जब कभी जरूरत हो ले लेना.’ वह सुनकर मुझे और भी अच्छा लगा.

चलतेचलते वे दोनों दायीं ओर मुड़े तो मैं भी उनके पीछे चलता गया. रेलगाड़ी की पटरियों और पत्थरों के बीच होकर वे दोनों तेजतेज चल रहे थे. मुझे उनका साथ देने में कठिनाई हो रही थी. वे दोनों जिस स्थान पर रुके वहां एक बड़ा कारखाना था. वहां रेलगाड़ी के डिब्बों की मरम्मत होती थी. बराबर में ही एक शेेड पड़ा था. मालगोदाम से सटा हुआ. कभी वहां चहलपहल रहती होगी. मगर अब वह स्थान उपेक्षितसा जान पड़ता था. पश्चिम दिशा में नया रेलवे यार्ड बन जाने के बाद उसका महत्त्व कम हो चुका था.

प्लेटफार्म और उस यार्ड के बीच में करीब सत्तर मीटर का फासला था. उसकी चारदीवारी के साथसाथ रेलवे की दीवार थी. संभवतः कस्बे के आवारा पशुओं के आगमन को रोकने के लिए बनाई गई. पर जैसा कि अक्सर होता है. चारपांच वर्ष में ही दीवार गिरने लगी. उसकी ईंटें झुग्गियों के साथसाथ कई बड़े घरों में भी यत्रतत्र बिछाई जा चुकी थीं. जिन दिनों दीवार बनी थी, उन दिनों उसकी ऊंचाई अवश्य ही छह फुट रही होगी. पर अब डेढ़दो फुट और कहींकहीं तो बिल्कुल ही गायब थी. पुराना यार्ड अब शहर के भिखारियों, बेघर लोगों, आवारा पशुओं, मजदूरों और कुलियों का ठिकाना था. जिनकी दुनिया बाकी लोगों से अलग थी. वहां कुछ भी पर्दे में नहीं था. अंधेरे की आहट उन्हें एक स्थान पर खींच लाती थी. खानाखिलाना, लड़ाईझगड़ा, रूठनामनाना, सब चलता. संबंध वैधअवैध की सीमा से परे रहकर साधे जाते. देर रात आंख लगते ही चारों ओर अदृश्य दीवारंे खड़ी होने और बाकी दुनिया से कट जाने की अनुभूति होने लगती थी.

दिनभर वह जगह ऊंघती हुईसी रहती. इक्कादुक्का आदमी या जानवरों के साथ! शाम होते ही वहां के बांशिदे लौटने लगते थे. पुराने संदूकों, कनस्तरों, बोरियों और गठरियों में बंद अकेली गृहस्थियां जमीन पर बिछने लगतीं. बिखरी हुई ईंटें चूल्हे के अनुशासन में बंध जातीं. यहांवहां से जमा किया गया कबाड़, लकड़ियां, गत्ते, कागज ईंधन का धर्म निभाकर अग्नि प्रज्ज्वलित करते. पतीलियों, डेगचियों, भगोनों में पानी खदबदाने लगता. खानाबदोश और आजाद जिंदगी खाना बनाने में भी आजादी बरतती. चूल्हे की आग पर बारीबारी से भोजन पकाने का काम चलता. कई बार सब्जी इकट्ठी बना ली जाती और रोटियां सब अपनीअपनी सेंक लेते. शायद खुद को व्यस्त रखने का यह भी एक बहाना था. अथवा शायद इसी बहाने वे अपने पुराने जीवन से, जो पीछे छूट चुका था या जिसे वे जानबूझकर छोड़ आए थे, उससे जुड़े रहना चाहते थे.

सलीम चलतेचलते वहां के जीवन के बारे में परिचय दे रहा था. हालांकि झुग्गियों का जीवन भी लगभग खानाबदोश ही था. वहां रहने वाले सपने खूब देखते. गांव में बड़े घर, जमीन, बच्चे की ऊंची पढ़ाई या बेटी के किसी अच्छे खानदान में विवाह के. उनकी रात सपने देखते और दिन उन सपनों के लिए पसीना बहाते हुए बीतता. शाम होतेहोते जब सपनों की अर्थी उठने का समय आ जाता तो वे उस गम को भुलाने की नाकाम कोशिश के बीच उनमें से अधिकांश के पांव शराब की दुकान की ओर मुड़ जाते.

जिन्हें यह नसीब नहीं होता था, वे बुझेबुझे घर लौटते. उनकी हताशा पत्नी और बच्चों पर कहर बनकर टूटती. इसके बाबजूद सिर पर छत होने का एहसास उन्हें नएनए सपने देखने की प्रेरणा देता था. सपनों को छू लेने की हसरत में वे लोग जरूरत पड़ने पर बिना हिचक कर्ज लेते. मूल से ज्यादा उसपर मोटा ब्याज चुकाते. ब्याज चुकातेचुकाते चेहरे की झुर्रियां बढ़ती जातीं. आखिर में असली सपना कहीं पीछे छूट जाता. जिंदगी सिर्फ कर्जमुक्ति की आस बनकर रह जाती.

मुक्त आसमान के नीचे क्या सपने भी मुक्त उड़ान भरते होंगे? यदि हां, तो उन सपनों का आसमान कैसा होगा? क्या ये लोग भी दुनिया में वापस लौटने, घर बसाने या बसीबसाई गृहस्थी में लौट जाने का सपना देखते होंगे? अपने चारों और यत्रतत्र पसरे बेघर बाशिंदों की ओर देखते हुए मैंने अपने आप से प्रश्न किया. किंतु देर तक सोचने के बावजूद मैं किसी निष्कर्ष पर न पहुंच सका. इस बारे में कौंसा और सलीम से बात करने का विचार भी बना. फिर यह सोचकर कि उनके साथ थोड़ी देर का संबंध था, वे न जाने क्या सोचें, कैसा व्यवहार करें, मैं चुप्पी साधे रहा. एक कारण यह भी था कि बापू की लौटने की याद अब भी, धुंधली ही सही, पर बाकी थी. वह जातेजाते किसी से भी न उलझने का निर्देश देकर गया था. पुलिस के डर से बापू के साथ भाग रहा मैं, ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता था, जिससे बापू के लिए कोई समस्या खड़ी हो. साफ है कि बापूधाम में अब तक बिताए गए दिन ही मेरे जीवन की सर्वोत्तम निधि थे. वही मुझे अपनी ओर खींच रहे थे.

नाकुछ अतीत की स्मृतियां भी मारक होती हैं. मैं इसका साक्षात अनुभव कर रहा था.

इंसान को जो पसंद है, आवश्यक नहीं कि नियति को भी वही स्वीकार्य हो. कम से कम मेरे साथ तो ऐसा नहीं था. वह अपनी मनमानी का परिचय देती हुई, मुझे किसी अनजान डगर की ओर खींचे लिए जा रही थी.

उस खानाबदोश जीवन को लेकर मेरे मन में भारी जिज्ञासा थी. या कहो कि गहरा कौतूहल ही मुझे उसको समझने की प्रेरणा दे रहा था. अपने प्रयास में मैं कितना सफल था, यह बता पाना तो कठिन है. किंतु उस स्थान के कुछ बिंब मेरे मानस पर स्थायीरूप से अंकित हो चुके थे. उनमें से कुछ को नियति ने जैसे बिसरा दिया था. कुछ के प्रति उसका व्यवहार बचकाना था, जबकि कुछ पर नियति मुझसे भी अधिक निर्मम और कठोर थी.

इस बीच कौंसा जा चुकी थी. विदा लेने से पहले हम तीनों रेलवे स्टेशन से लगे बाजार में दवाएं लेेने गए थे. पूछने पर कौंसा की बजाए सलीम ने ही बताया था कि वे दवाइयां उसके पिता के लिए हैं.

क्या बीमारी है उन्हें?’ मेरी सहज जिज्ञासा ने प्रश्न किया.

कोढ़?’ कौंसा का संक्षिप्तसा उत्तर था.

कोढ़!’ सुनते ही मैं कांप गया. इस बीमारी का उस समय मैंने केवल नाम सुना था. उसी के साथ ढेर सारा आतंक भी इस बीमारी के नाम से दिलोदिमाग पर छाया रहता था. यह सोचकर कि सलीम मजाक तो नहीं कर रहा, मैंने कौंसा की ओर देखा. वह अपनी गर्दन झुकाए चलती रही थी.

इसके मां और बाप दोनों को यह रोग था. पिता के शरीर में तो उनकी जवानी के दिनों से ही इस रोग के लक्षण फूटने लगे थे. इसी गम में उनके मातापिता असमय ही भगवान को प्यारे हो गए. भाईबहनों ने उनसे किनारा कर लिया. तब दुनिया, समाज और अपने अकेलेपन से जूझते हुए कौंसा के पिता एक लड़की को ब्याह लाए…..’ सलीम ने कौंसा की करुणकथा आरंभ की तो लगा कि समय जैसे ठहरसा गया है. सबकुछ भुलाकर मैं सुनने लगा. उस समय सलीम के मुंह से जिंदगी का जो नया पाठ सीखने को मिला, उसका ज्ञान किसी के बताए या पुस्तक द्वारा संभव न था. वह केवल जीवन की पाठशाला में ही सीखा जा सकता था. सलीम कहे जा रहा था—

कोढ़ के बारे में समाज में फैली अफवाहों से कोई मांबाप अपनी अच्छीभली लड़की को उनसे ब्याहने के लिए शायद ही तैयार होते. जिस लड़की को वह ब्याहकर लाए थे, वह खुद भी इसी रोग की शिकार थी और अकेली दुनिया की समस्त लाछंनाओं को सहती हुई जी रही थी. उसी की कोख से कौंसा का जन्म हुआ. वे अपनी छोटीसी गृहस्थी में मग्न रहने लगे. लेकिन….’

लेकिन क्या?’ मेरी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी.

कौंसा के पिता जब तक अकेले और दुखी रहते आ रहे थे, तब तक तो गांववाले चुप थे. लेकिन उनका मामूली सुख भी गांव वालों से देखा न गया. उन्होंने कौंसा के पिता को तरहतरह से परेशान करना आरंभ कर दिया. उन्हें गांव छोड़कर चले जाने का आदेश ….जिंदा जला देने की धमकियां तक दी गईं. लेकिन कौंसा की मां बड़ी दबंग थी. वह अकेली पूरे गांव के आगे डटी रही. कौंसा जब गर्भ में थी तो दोनों के मन में अपनी संतान को लेकर तरहतरह की आशंकाएं थीं, जो उसके जन्म के साथ ही निर्मूल सिद्ध हो गईं. उसके जन्म के समय दोनों की खुशी देखने लायक थी. लेकिन एक डर उसके पैदा होते ही उनके दिलोदिमाग पर सवार हो गया….दोनों रातदिन इसी चिंता में रहते कि कहीं उनकी बेटी को भी वह बीमारी न लग जाए….अपने सगेसंबंधियों से उसे पालने की अनुरोध किया. परंतु कोई आगे नहीं आया.

बेटी की फिक्र में कौंसा की मां बीमार रहने लगी और एक दिन असमय ही चल बसी. उसके बाद तो गांव वाले उसके बापू के सिर पर ही सवार हो गए. एक दिन जब दुकान पर कुछ खरीदने गई तो दुकानदार ने दुकान की सीढ़ियां चढ़ने से भी मना कर दिया. उसकी देखादेखी बाकी गांव वालों का दिमाग भी फिर गया. वे एकएक कर कौंसा और उसके बापू को सताने लगे. वह मेहनतमजदूरी करके पेट भरते थे. लोगों ने उन्हें अपने घर काम देना भी बंद कर दिया. एक दिन वे बाहर गांव से मजदूरी करके लौट रहे थे कि कुछ लोगों ने आकर रास्ता रोक लिया.

तुम्हें गांव के भीतर आने की इजाजत नहीं है.’

क्यों? गांव में मेरा घर है, वहां जाने से मुझे कौन रोक सकता है.’ स्वभाव के विपरीत कौंसा के पिता ने जोर देकर कहा.

पंचायत ने फैसला किया है कि तुम्हें तुम्हारी झोपड़ी से दुगुनी जमीन गांव से बाहर दे दी जाए और उसे बनाने के लिए जरूरी सामान भी. गांव वालों ने मिलकर पहले ही उसका प्रबंध कर दिया है. वहां टीले के उस ओर जंगल में तुम जमीन घेर सकते हो. बांस और रस्सियां भी तुम्हें मिल जाएंगी. इसके अलावा झोपड़ी बनाने के लिए मदद चाहिए तो गांववाले उसमें भी तुम्हारी मदद करेंगे. लेकिन आज के बाद रहना तुम्हें गांव से बाहर ही होगा.’

कौंसा के पिता ने अपने गुस्से को मारकर यह सब सुना. जानते थे कि गांववालों से अकेले जूझना उनके सामथ्र्य के बाहर है. उसे भी अपने भाग्य का लेखा मानकर वे गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर रहने लगे. लेकिन समस्या जस की तस ही रही. आसपास के इलाके में कोई भी उन्हें काम देने को तैयार न था. भूखों मरने की नौबत तक आ गई. आखिर मन मारकर उन्होंने गांव छोड़ने का निर्णय ले लिया. अगली ही सुबह वह अपनी बेटी को लेकर रेलगाड़ी में सवार हो गए. भटकतेभटकते दोनों यहां तक पहुंच गए.

कौंसा के बारे में यह सब सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ था. उससे पहले मैं अपने ही दुख को जमाने का सबसे बड़ा दुःख मानता हुआ आया था. अब मुझे लग रहा था कि केवल वही दुनिया का सबसे बड़ा दुख नहीं है. दुनिया में उससे भी बड़े गम छिपे हुए हैं. कौंसा के बारे में अभी और भी जानना बाकी था. मैं जानना चाहता भी था. तब तक हम यार्ड के बहुत करीब आ चुके थे. वहां के बाशिंदे अपने ठिकाने पर लौटने लगे थे. बड़ी संख्या भिखारियों और खानाबदोशों की ही थी.

उस दिन कौंसा की कहानी आगे न बढ़ सकी. उस रात मैंने प्लेटफार्म पर बिताने की कोशिश की तो कौंसा और सलीम अड़ गए. सलीम जिद करके मुझे अपने साथ लिवा ले गया. जहां जिंदगी के नएनए पाठ खुले हुए थे. जिन्हें एक ही दिन में समझना असंभव था. जो भी हो मेरे लिए वह अपने अनुभवों को समृद्ध करने का अच्छा अवसर था. मैं उस अवसर का पूरी तरह लाभ उठा पाया या नहीं, कह नहीं सकता. लेकिन उस जीवन की छाप मेरे मानस पर सदा के लिए अंकित हो चुकी थी.

जो छवियां हमें प्रभावित करती हैं, हमारा जीवन उनसे नियंत्रित भी होता है. यह सच भले ही हो, मगर उन दिनों कहां समझ पाया था.

समय के साथसाथ प्रवाहमान मनुष्य आवश्यक नहीं कि उसको समझता भी हो.

भीख मांग कर लौटते भिखारी अपने साथ लकड़ी, कोयला, प्याज, सब्जियां, सूखी लकड़ी, पत्ते, गत्ते, कागज आदि भी बटोर लाते थे. कभीकभी भीख में मिलने वाली चीजों का वर्गीकरण भी दाता के व्यवसाय के अनुसार कर लिया जाता था. लकड़ी की टाल पर भिखारी पहंुचता तो उसकी उम्मीद नकदी के बजाए लकड़ी, कोयला आदि से होती. सभी के अपनेअपने ठिकाने और समूह थे. घरघर घूमकर मांगने वाले भिखारी सुबहसुबह बस्ती का तरफ रुख कर लेते. वहां भीख में नकदी मिले तो ठीक. वरना आटादालचावलरोटी जो भी मिले, सब झोले के हवाले होता जाता था. शाम के समय आटा और सूखी रोटियां दुकानदार को बेचकर उनकी नकदी बना ली जाती. उससे फारिग होकर वे सब्जी मंडी का रुख करते. वहां से तरहतरह की सब्जियां जुटाते हुए निकलते. मंडी में ही लकड़ियों के फट्टे, गत्ते, फूंस आदि का जुगाड़ भी हो जाता. जो जलावन का काम देता था. कुछ भिखारिन औरतें जलावन के लिए रेल गोदाम से कोयला चुराने का काम करती थीं. लेकिन पुरुष भिखारी घर लौटने के बाद आराम करना ही पसंद करते.

उस समय वहां मौजूद भिखारियों की संख्या अठारहबीस थी. जो धीरेधीरे बढ़ती ही जा रही थी. धंधे से लौटने के बाद सभी ‘दुनियादारी’ में तल्लीन थे. स्त्रीपुरुष, बूढ़े और बच्चे सभी. तीनचार चूल्हे एक साथ जल रहे थे. जिनका धुंआ आसमान तक को काला कर रहा था. उनमें एक चूल्हा सबसे बड़ा, भट्टीनुमा था. एक भारीभरकम बुढ़िया उसके सामने जमी हुई थी. दोचार भिखारी उसके बराबर मौजूद थे. भारी शरीर के कारण पांव सिकोड़कर बैठना उसके लिए बहुत ही मुश्किल जो था. इस कारण उसने अपना दायां पांव फैलाया हुआ था. उसके सन से भी ज्यादा सफेद बुरी तरह बाल उलझे हुए थे, बुढ़िया को शायद ही उन्हें सुलझाने का होश रहता हो. अस्सी को पार कर चुकी बुढ़िया के लिए अपनी भारीभरकम देह को हिलानाडुलाना आसान नहीं था. इसलिए बराबर में बैठे एक कमजोर से भिखारी की जिम्मेदारी चूल्हे की आग जलाये रखने की होती. और वह अपनी गंदीली देह को खुजाने से बचा समय, पूरी ईमानदारी के साथ चूल्हे की आग को गर्माए रखने में खर्च कर रहा था.

कस्बे के कोलाहल से दूर एकांतसे दिखने वाले उस स्थल पर अपनी ही तरह की चहलपहल थी—

बड़ीम्मा! इमली लाया हूं. तुझे खटाई खाने का बहुत शौक है ना.’ दूर बैठे एक भिखारी ने अपने झोले को टटोलकर उसमें से पुड़िया निकाली. उसे बुढ़िया की ओर बढ़ाते हुए वह फिस्सफिस्स हंसा. मुंह मंे बचे दोतीन गंदेले दांतों ने आरपार जाती उसकी हंसी को बेआवाज और बदबूदार बना दिया था. सबको लगा कि बड़ीम्मा नाराज होगी. पर वह गंभीर हो गई—

इस उमर में खटाई खिलाता है, बेईमान! जब उसके दिन थे तो तू भी मुंह छिपाए पड़ा रहता था.’

अपुन को तो गृहस्थी का झंझट कभी जमा ही नहीं बड़ीम्मा. ढर्रे की जिंदगी से यह फाकामस्तीभरा जीवन कहीं अच्छा है.’ चिलम की आग को पलटते हुए वह बोला.

अच्छाअच्छा. बातें मत बना. झोले में दोचार प्याज हों तो ले आ.’

आज तो सिर्फ हरी मिर्च हैं बड़ीम्मा….प्याज की कीमत तो आसमान छू रही है. दुकानदार उन्हें गिन्नियों की तरह संभाल कर रखते हैं.’ उसी भिखारी ने कहा. फिर बराबर में लेटे एक युवा भिखारी की ओर मुड़कर बोला—‘मुंह दबाये सुन क्या रहा है, हरामखोर. बड़ीम्मा को फटाफट दोचार प्याज दे आ.’

मेरे पास फालतू नहीं है.’ स्मैक के नशे में उनींदी आंखों को झपकाते हुए वह बोला.

ये बात है तो कल ही सही. जिस दुकानदार की नजर बचाकर तू झोलीभर प्याज चुरा लाया है, मैं उसको अच्छी तरह जानता हूं.’

जैसे मैं कुछ जानता ही नहीं.’ दूसरा भिखारी जोश में आ गया. उस दिन ढेर सारा लहसुन देकर तूने जो बड़ीम्मा की शाबाशी लूटी थी….’

मैं जो भी किया सबके लिए किया….क्यों बड़ीम्मा?’

बसबसबहुत हुआ. कल से सारा तामझाम तुम लोग खुद ही संभालना. बुढ़ापे में मुझसे उंगलियां नहीं जलाई जातीं. मुंहझौंसे काम तो कुछ करेंगे नहीं. बस पड़ेपड़े आपस में मुंह जोरी करते रहेंगे.’ बड़ीम्मा की धमकी ने जादू का काम किया. युवा भिखारी ने अपनी झोली दूसरे भिखारी के आगे पटक दी— ‘ले जितनी जरूरत है, निकाल ले. खबरदार अगर एक भी फालतू ली तो.’

जब तू है तो मुझे अलग से लेने की क्या जरूरत है, बेटे.’ बूढ़ा भिखारी दुबारा फसकतीसी हंसी हंसा. फिर तीनचार प्याज निकालकर बड़ीम्मा को सौंपते हुए बोला—

ले बड़ीम्मा….याद रखना ये गुलशेर की ओर से हैं. इसी बात पर आज उसे दो रोटियां ज्यादा खिला देना.’

कैसा जमाना आ गया है. एक वक्त था जब चालीस बीघा खेत में दूरदूर तक प्याज के ढेर नजर आते थे. गांव के करियाकुम्हार जो भी मांगने आ जाते, घर के खर्च के लिए झोली भर कर प्याज ले जाते थे. उन दिनों प्याज जैसी चीज का मोल ही क्या था. याद नहीं कि कभी किसी ने बाजार से खरीदी हो. लेकिन बुरा हो ऊपर वाले का. जिसने ऐसी औलाद दी कि सबकुछ बरबाद कर दिया.’ सिर पर टोपी पहने एक, स्लीपर का तकिया लगाए एक भिखारी ने कहा. उसकी आवाज में दर्द था. देखने से लगता ही नहीं था कि वह भीख मांगता होगा.

कुछ दिनों के बाद जब बड़ीम्मा के पास उठनेबैठने लगा तो उन्होंने बताया कि कभी वह आदमी हरगुलाब चैधरी के नाम से तीन सौ बीघा खेत का मालिक था. उसके पांच बेटे थे, जिन्हें वह गर्व से अपने पांच पांडव कहता. हरगुलाब चैधरी की ईश्वर में घनी आस्था थी. अपने खेतों के बीचोंबीच उसने एक मंदिर का निर्माण कराया था. प्रत्येक वर्ष बैशाख के महीने में जब खेत खाली हो जाते तो उस मंदिर के प्रांगण में वह एक मेले का आयोजन करता था. तीन दिनों तक चलने वाले मेले के समापन पर एक जोरदार भंडारा होता, जिसका पूरा खर्च हरगुलाब चैधरी ही उठाता था. लोग उसकी धार्मिक निष्ठा की दुहाई देते. उसके भाग्य को सराहते.

किस्मत की मार! हरगुलाब चौधरी की पत्नी पांचवे बेटे को जन्म देते समय स्वर्ग सिधार गई. उस समय उसकी उम्र चालीस के करीब थी. लोगों ने दूसरे विवाह का सुझाव दिया. लेकिन अपने पांच बेटों पर गर्व करने वाले हरगुलाब चैधरी ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया. वक्त की मार, उसके पांचों बेटे एक से बढ़कर एक आवारा और बदमाश निकल आए. उनका काम था, लोगों की बहनबेटियों को छेड़ना और उनके साथ बदसलूकी करना. अपनी ताकत के नशे में चूर होकर, लोगों के साथ गुंडों की तरह मारपीट करना. नतीजा यह हुआ कि उनके दुश्मन बढ़ते ही गए. ताकत के गुमान में उन्होंने अपने पीछे कई मुकदमे लगा लिए. उन्हीं में फंसकर एकएककर उसके चार बेटे तो जेल चले गए. पांचवे को किसी ने गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया.

वक्त से हार खाया हरगुलाब चौधरी बेटों को छुड़ाने के लिए अदालतों के चक्कर काटता रहा. तीन सौ बीघा जमीन कब दूसरों के नाम हो गई, पता ही नहीं चला. अब तीन बेटे जेल में हैं. चैथा बताते हैं कि पागल होने के बाद आजकल किसी पागलखाने में है. रहा हरगुलाब चौधरी, उसको अपना पेट भरने के लिए दूसरों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है. किसी जमाने में सुबहशाम मंदिर जाने वाले हरगुलाब चौधरी का ईश्वर से विश्वास पूरी तरह उठ चुका है. यहां तक कि ईश्वर का नाम बीच में आते ही अक्सर वह कह उठता है—बुरा हो ईश्वर का. अपनी इस आदत के कारण वह कई बार भीड़ के हाथों पिट भी चुका है.’

इनमें से हर एक की ऐसी ही कहानी होगी. दुनिया से अलग. सामान्य जिंदगियों से हटकर….

बड़ीम्मा….बहुत जोर की भूख लगी है. खाना बनने में और कितनी देर लगेगी?’ कुछ दूरी पर रेलवे के स्लीपरों के ढेर पर अपनी बैशाखियों को तकिये की तरह सिर के नीचे लगाए लेटे एक अधेड़ भिखारी ने चिल्लाकर पूछा.

चुप रह हरामखोर! जब से आया है तभी से भूखभूख चिल्ला रहा है. तेरा पेट है कि भट्टी.’

गाली मत दे बुढ़िया.’ लंगड़ा भिखारी तेश में आ गया—‘तू हमारे ऊपर कोई एहसान नहीं करती, उल्टे हमारी ही कमाई खाती है.’

चल हट मुस्टंडे. बड़ा आया कमाई वाला. अगर इतना ही गुरूर है तो उस नटिनी के साथ घर क्यों नहीं बसा लेता. तुझे गर्मागरम बनाकर खिलाएगी और पांव भी दबाएगी.’ बड़ीम्मा ने दुत्कारा, उलाहना भी दिया. लंगड़े ने गर्दन झुका ली.

अम्मा, तेरी तो उम्र बीत गई….पांव कब्र में लटके हुए हैं. बुढ़ापे में किसी के इश्क के देखकर क्यों जलती है.’ बूढ़ा फतयाब अली चिल्लाया. उसने मंडी में वर्षों तक पल्लेदारी की थी, दो वर्ष पहले बोरी ले जाते हुए पैर फिसल गया. उससे टखना उखड़ गया. घर में बेटा और बहू थीं. जब तक कमाता था, तब तक तो ठीकठाक रहा. अपाहिज हुआ तो बेटाबहू दोनों आंखें दिखाने लगे. कुछ महीनों तो वह बेशर्मी से उनके साथ पड़ा रहा. गालियां सुनता—तानेउलाहने सहता हुआ. पानी जब सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो घरबार छोड़कर बेसहारा लोगों के बीच आकर रहने लगा. उसी दिन से बहुत खुश नजर आता है. बातबात में मजाक, छेड़खानी. बड़ीम्मा के साथ उसकी नोंकझोंक तो चलती ही रहती है.

अच्छा तू भी इसकी हिमायत को आ गया नकटे. अगर ऐसा ही आशिक था तो उस जमादारन को गले क्यों नहीं लगा लेता हरामखोर.’

यार्ड में रहने वाले भिखारियों में औरत और मर्दों की संख्या करीबकरीब बराबर थी. सबका नाम किसी न किसी भिखारीभिखारिन के साथ जुड़ा हुआ था. इस मामले में उम्र महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन भिखारीटोले में उम्र का कोई असर न था. असल बात उस किसी भी संबंध द्वारा भीख की रकम में होने वाली बढ़त से थी. कभी अस्सी वर्ष की भिखारिन अंधी होने का नाटक करती हुई बीस वर्ष के भिखारी के कंधे पर हाथ रखकर भीख मांगने निकल पड़ती. कभी अठारह की युवा भिखारिन सत्तरअस्सी वर्ष के बूढ़े को साथ लेकर निकल पड़ती. लोग जिस संबंध पर पिघलकर ज्यादा भीख दें, वही कामयाब मान लिया जाता. बात चाहे कुछ भी न हो. पर उसके बहाने तानेउलाहनेमुंहजोरी आदि चलती ही रहती थी.

बड़ीम्मा की बात सुनकर बूढ़े फतयाब अली ने दुखी होने का नाटक किया. दिल पर बहुत गहरी चोट पहुंची हो….तिलमिला उठा हो जैसे.

होश की बात कर बड़ीम्मा. दबे जख्म को कुरेदने से भला क्या हासिल होगा?’ टूटे दिल आशिक की तरह फतयाब अली के मुंह से लंबी कराह निकली. जिसे सुनकर वहां मौजूद सभी हंसने लगे. अंजोर में बड़ीम्मा का झुर्राया हुआ चेहरा भी खिल उठा. उसी बीच बड़ीम्मा ने पतीले का ढक्कन हटाकर उसमें से एक कतरा निकालकर जांचा. संतुष्ट होकर चूल्हे के सामने बैठे भिखारी को इशारा किया. कुछ क्षणों के लिए जांघ खुजलाना स्थगित कर उसने अंगोछा संभाला. मुंह पौंछा और कंडी आगे खिसका दी. आग का भभका तेजी से ऊपर उठा. लपटें चेहरे की ओर लपकीं.

संभल कर पिल्ले. झुलस गया तो तेरी सपेरन मेरी जान को रोया करेगी.’ बड़ीम्मा ने चेताया. वह खुद को दक्षिणी भारत का पिल्लैइ ब्राह्मण बताता था. किसी को उसकी बात पर भरोसा न था. सब उसे पिल्ला या पिल्ले ही कहते थे. वह भी बुरा नहीं मानता था. पहले वह अकेला ही भीख मांगता था. लेकिन कुछ महीने से एक सपेरे के साथ उसका जमूरा बनकर चिपका हुआ था. सपेरे को लेकर उसके जानने वालों में यह धारणा थी कि वह नामर्द है. सपेरन ने ही पिलैई को साथ रखने पर जोर दिया है. हालांकि यह बात लोगों की समझ से परे थी कि कमजोर और दमे के मरीज पिलैई को कोई औरत भला क्यों अपने पास फटकने देगी. लेकिन पिलैई से बातचीत के समय सभी किसी न किसी रूप में सपेरन का हवाला देकर बात करते थे. और जब से पिलैई ने भीख मांगना छोड़कर सपेरे के साथ चलना प्रारंभ किया तो उनके मजाक को नया आधार मिल गया था. जब भी सपेरन के साथ संबंधों का जिक्र होता, पिलैई के पिचकेले चेहरे पर चमक लौट आती थी.

वह एक ब्राह्मण का औरसपुत्र चाहती है….!’ भारीभरकम कदकाठी वाली सपेरन के साथ अपने संबंध के औचित्य पर प्रश्न उठाए जाने पर पिलैई कहता. इस बात पर भिखारी टोले में हंसी की इतनी ऊंची लहर उठती थी कि पिलैई से आगे जवाब देना मुश्किल हो जाता था. उसको मुंह छिपाकर कहीं और ही जाना पड़ता था.

बड़ीम्मा ने तवा चढ़ाया तो सब अपनेअपने बर्तन संभालने लगे. इस बीच एक अंधे भिखारी ने लंबी तान छेड़ दी—

हो….जगत मुसापिफर खाना, लगा है आनाजाना

चंदा डूबे सूरज निकले— सूरज डूबे हो जाए शाम

ओ बंधु रे….किसका यहां ठिकाना

लगा है ……………………आनाजाना.

भजन आगे बढे़ उससे पहले ही लंगड़े भिखारी ने सूरदास को टोक दिया—‘चुप रहो महाराज! क्यों अपना गला खराब करते हो. रेल का डिब्बा नहीं है कि चैपाई सुनकर लोग अपना बटुआ खोलने लगेंगे.’

मैं तो अभ्यास कर रहा हूं. लोग आजकल बहुत तेज हो गए हैं. सवारियां निकालंेगी तो महज चव्वनी….वह भी डरतेडरते कि कहीं रुपया या अठन्नी न चली जाए. मगर भिखारी से उम्मीद रखेंगी कि वह सुर से जरा भी बाहर न जाए. जरासा बाहर हुआ नहीं कि चवन्नी वापस बटुए में….इसीलिए गले को बराबर साधना पड़ता है.’ अंधे ने अपनी मजबूरी बताई.

तो धीरेधीरे साधो ना बाबा. क्यों हमारा नशा खराब कर रहे हो….जानते नहीं कितनी महंगी हो गई है.’ स्मैक के नशे में डूबे युवा भिखारी ने कहा. इस पर सूरदास चिढ़ गया—‘अरे! तो तू बोला नशैड़ी. कितनी बार समझाया है कि भगवान की शरण में जा. सच्ची प्रीत का नशाचख. फिर देख वह तेरे अफीम और गांजे के नशे से कितना गुणकारी है. प्रेमदीवानी मीरा, कृष्ण के रंग में रंगकर अपनी सुधबुध खो बैठी थी. उसके बाद तो हलाहल प्याला भी उसके लिए अमृत बन गया….’

बसबस बाबा अब ये तान यहीं छोड़ो और कटोरा संभाल लो.’

आज मुझे भूख नहीं है.’ सूरदास ने निर्लिप्त भाव से कहा.

भूख कहां से होगी….मंगलवार जो है. सुबह से शाम तक हनुमान जी के नाम का चढ़ावा चढ़ता रहता है. भक्त का कल्याण हो न हो पर पत्थर के हनुमान हम भिखारियों का कल्याण तो कर ही देते हैं.’ बूढ़ा फतयाब अली फिस्सफिस्स हंसता हुआ बोला.

चुप बे साले मलेच्छ! दिनभर खाता हनुमान का है और गुन गाने के लिए रोज शाम जाता मस्जिद में है….रामराम.’ एक भिखारी जिसने माथे पर ऊंचासा तिलक लगाया हुआ था. और देर से अफीम के नशे में था. होश में आते ही बातचीत में हिस्सा लेते हुए बोला.

अपुन की समझ में तो भिखारी का अपना कोई धर्म, कोई सोच नहीं होता. फिर चाहे अल्लाह हो या राम, भिखारी जिसका खाता है, सच्चे मन से उसी की गाता है.’ फतयाब अली ने कांटे की बात कही. इसपर कम उम्र का भिखारी उछल पड़ा.

वाह क्या बात कही है आपने. अपनी आस्था तो केवल पेट में है. हमारे लिए जो रोटी दे वही सबसे बड़ा भगवान. पर आप बताइए….महात्मा सूरदास तो कृष्ण जी के पक्के भक्त थे. पर यह देगची साला पाला बदलकर हनुमानजी के खेमे में क्यों आ गया?’ देगची अधेड़ उम्र का भिखारी था. शायद कोई बीमारी रही हो, इस कारण उसको भूख बहुत लगती थी. इसलिए आसपास के भिखारियों ने उसका नाम देगची रख छोड़ा था. देगची अपनी भूख से सचमुच परेशान रहता. हनुमान मंदिर पर सुबह से शाम तक दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता था. भूख लगने पर वहां खाने की कोई कमी न थी, इसलिए उसने अपने ठिकाने के रूप में हनुमान मंदिर को चुना था.

यह कटाक्ष कचोटने वाला साबित हुआ. सूरदास कोई उत्तर दे उससे पहले ही एक ओर से वार किया गया—

कहीं ऐसा तो नहीं कि हनुमान जी के डर से आपने अपना खेमा बदल लिया हो….वो कहावत है ना कि जहां देखूं तवापरात….वहीं मनाऊं सारी रात.’

राम और कृष्ण….एक ही हैं. जगतपालक विष्णु जी के अवतार….’ सूरदास ने कहा. यह बचाव कीसी मुद्रा थी. उसके बाद वह अपना टाटकमंडल समेटकर वहां से जाने लगा तो जवानसे दिखने वाले भिखारी ने फिर तंज कस दिया—

महाराज कहां चले….इन मलेच्छों को जाने दीजिए. मैं सुनूंगा आपके भजन….मजे से गाइए.’ उस आवाज में निहित व्यंग्य साफ झलक रहा था.

अजी, जाने भी दीजिए….उस ओर लेटी अंतीबाई बाबा के इंतजार में करवट बदल रही होगी….क्यों बाबा?’ फतयाब अली ने गहरा मजाक किया. सूरदास कई बार अंतीबाई के कंधे का सहारा लेकर भीख मांगते हुए बाजार से गुजरता था. दोनों भीड़ में ऐसे दर्शाते थे जैसे पतिपत्नी हों. भीख में जमा रकम का दो हिस्सा वह अपने लिए रखता और एक हिस्सा अंतीबाई को देता था. अंतीबाई को यह सौदा भी मंजूर था. क्योंकि इससे वह खुद गले फाड़ने से बच जाती थी. बाजार से गुजरते समय सूरदास का पूरा ध्यान कटोरे पर रहता था. ‘टन्न’ की आवाज गूंजते ही वह सिक्के को जेब के हवाले कर लेता था. आवाज से ही वह यह भी पहचान लेता था कि गिरने वाले सिक्के का मूल्य क्या है. रुपया या अठन्नी. पर अंतीबाई भी कम न थी. ‘धंधे’ के लिए जाते समय वह एक बटुए में छोेटे सिक्के छिपाए रहती थी. सूरदास उठाए उससे पहले ही वह रुपये को अठन्नी और अठन्नी को चवन्नी में बदल देती थी. सूरदास आवाज के हिसाब से हाथ आगे बढ़ाता. और जब छोटा सिक्का हाथ लगता तो चैंक जाता था. शुरूशुरू में उसने टोका भी था—

आवाज तो नए रुपये जैसी थी?’

तो क्या मैंने चबाकर अठन्नी में बदल दिया.’

नाराज क्यों होती है. मैं तो बस कह रहा था.’

कह रहा था कि मुझपर खयानत का इल्जाम लगा रहा था.’ अंतीबाई झूठमूठ गुस्सा दिखाती. आंखें होती तो सूरदास उसकी असलियत को परख पाता. कई बार वह भीख का रुपया हाथ में लेकर अपनी गांठ करती और सूरदास को सुनाने के लिए ठीक उसकी समय चवन्नी या अठन्नी कटोरे में टपका देती. सूरदास भी कम न था. ग्राहक के पैरों की आहट और सिक्के के गिरने की आवाज के बीच के समयांतराल को पकड़ लेता—

दाता तो कभी का जा चुका…..’

बहुत दावे के साथ कह रहा है….मैं तो सोच रही थी कि तू अंधा है?’

आंखें ही अगर साथ देती तो बात ही क्या थी. मैंने तो आहट पहचानकर कहा है.’

तेरा मतलब है, कि यह अठन्नी मैंने टपकाई है….. अगर तू यही सोचता है तो हमारा साथ निभ लिया. कल से तू अपने रास्ते मैं अपने रास्ते चलूंगी.’ अंतीबाई गुस्से का प्रदर्शन करती.

नाराज क्यों होती है भागवान! धंधे का वक्त है. अच्छा दाईं ओर घूम जा. कल मंगल का दिन है. आज ठेके पर बड़ी भीड़ होगी. घरसंसार से डरे हुए लोग मुट्ठी जल्दी ढीली करते हैं.

सब लालची ठहरे सूरदास! किसी को इस जन्म का लालच है, तो किसी को उस जन्म का.’ अंतीबाई की ऐसी गोलमोलसी बातें ही सूरदास का जी मोह लेती थीं. उसी का फायदा वह उठाती. कभीकभी कोई दयालु ग्राहक कागज के नोट भी कटोरी में डाल देता. ऐसे समय वह जेब से फुर्ती से सिक्का निकालकर कटोरे में ऊपर से डाल देती. रुपया उसकी अंटी में चला जाता.

ऐसा कुछ दिनों तक चला. जैसेजैसे अंतीबाई का लालच बढ़ता गया, सूरदास की कमाई लगातार घटती चली गई. आखिर उसको अंतीबाई से किनारा करना ही पड़ा. बाद में उसने पूरे पचास रुपये खर्च करके एक उस्ताद से तंबूरा बजाना सीखा. आजकल उसी के सहारे उसका धंधा चलता है. आमदनी भी ठीकठाक हो जाती है. अंतीबाई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे बारीबारी से जाकर, वहीं अपना ‘धंधा’ और अपनी अकेली जान का पेट भरने के साथसाथ इतना और जोड़ लेती कि साल में बेटी को एक दो जोड़ी कपड़े और नातिन को नएनए खिलौने दिलवा सके. इस सबके बावजूद सूरदास के दिल में अंतीबाई के लिए खास जगह है. अंतीबाई भी सूरदास को बहुत मानती है. वह दिल ही दिल में चाहती है कि सूरदास उसके कंधे की टेक लेकर ही ‘धंधा’ करे. दोनों के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं. इसीलिए उनके ऊपर छींटाकशी होना आम बात है.

यह छींटाकशी ही उनकी बिखर चुकी दुनिया को परस्पर करीब ले आती है.

बाकी दुनिया की उन्हें अब परवाह ही क्या थी.

सभी जानते हैं कि ये बातेंबहसें गैरजरूरी हैं. पर यदि ये न हो तो वक्त बिताने के लिए क्या करें. बूढ़ी बड़ीम्मा एक साथ तो सबको खिला नहीं सकती. इसलिए अपनी बारी आने तक वक्त को हंसतेबोलते बिताना उन लोगों की मजबूरी है. उस समय भी सूरदास के साथ हंसीमजाक के बीच कई भिखारियों का भोजन पूरा हो चुका था. फिर भी कुछ बाकी थे. सीली लकड़ियों के कारण आग परेशान कर रही थी. इसीलिए अनावश्यक देर भी हो रही थी. जिससे भूखे भिखारियों में बेचैनी फैल रही थी. बेचैनी मिटाने के लिए बेसिरपैर के सवालजवाब शुरू हो चुके थे. इस बीच युवा भिखारी खाना खाने के लिए बैठ गया. खातेखाते वह फतयाब अली को संबोधित करता हुआ बोला—

‘‘एक बात बताऊं चाचा. आज रेल में चर्चा हो रही थी कि देश का अगला प्रधानमंत्री गरीब घराने से होगा. पर कौन बनेगा इस सवाल पर सभी कतरा रहे थे. मैं उस समय लंगड़े के भेष में था. घुटने पर मोटी पट्टी बंधी थी. मैं जवाब सुनना चाहता था. परंतु न जाने क्या बात थी कि सभी बोलने से कतरा रहे थे.’

फिर….’ एक ने टोका.

क्या मतलब?’ दूसरे ने भी उत्सुकता दिखाई.

फिर….मैंने उनकी मुश्किल आसान कर दी.’

कैसे?’

मुझे थोड़ा मजाक सूझा था. मैंने चिल्लाकर कहा—‘मैं’! इस पर सभी सवारियां हंसने लगीं. कुछ देर बाद एक ने पूछा—

कैसे?’ इस पर मैंने हाथ में थमाया हुआ कटोरा ऊपर उठा दिया और कहा— ‘पहले मैं इस कटोरे को लेकर आप सब यानी वोटरों के पास जाऊंगा. आपसे वोट मांगूगा. मैं जीतूंगा भी जरूर. जानते हो क्यों? इसीलिए कि मैं अव्वल दर्जे का मंगता हूं —सवारियां और भी जोर से हंसने लगी. मुझको भी खूब मजा आया. एक सवारी से न रहा गया….’

चुनाव जीत गया तो करेगा क्या?’ उसने पूछा था.

तब मैं इसी कटोरे को लेकर विदेश यात्राएं करूंगा. छोटेबड़े हर देश में जाऊंगा. और वहां से कामयाब होकर लौटूंगा. इसीलिए कि मैं अव्वल दर्जे का मंगता हूं. मुझसे अच्छा और कोई मंगता हो ही नहीं सकता.’

तू मंगता है, नेता नहीं!’ एक और सवारी बीच में कूद पड़ी थी.

मेरी समझ से नेता और मंगता में बहुत ज्यादा फर्क होता नहीं, क्यों?’ बगैर झिझके मैंने कहा. आप भले ही मेरी बात पर विश्वास न करें. मगर उन सवारियों ने माना था. इसलिए मुझे उस दिन बाकी दिनों से ज्यादा भीख मिली थी.’’

युवा भिखारी का किस्सा सुन सभी हंसने लगे. उसी समय एक और बुढ़िया पीछे से उठी और लंगड़ाती हुई बड़ीम्मा के पास पहुंच गई. उसकी दोनों टांगें ठीकठाक थीं. लेकिन भीख मांगते समय वह प्रायः एक टांग का ही इस्तेमाल करती थी. चाल में कोई खोट को पकड़ न ले, इसलिए बाकी समय भी लंगड़ाकर चलने का अभ्यास करती रहती थी. बड़ीम्मा के पास पहुंचकर वह हाथ नचाकर बोली—

निकम्मी….रांड! मैं भूख से मरी जा रही हूं. बोल तुझे खाऊं?’

जरूर खा….पर ध्यान रहे, सूखी हड्डियां तेरे गले में फंस गईं तो जान बाहर आते देर न लगेगी. ऊपर जाकर मुझे दोष मत देना.’ बड़ीम्मा ने जवाब दिया.

हाय रांड! अपनों को तो खा गई. अब मुझे भी मार डालना चाहती है. तेरे शरीर में कीड़े पडें़. तुझे हैजा हो जाए…..’ बुढ़िया जोरजोर से चीखने लगी. उसकी आवाज सुनकर दोचार भिखारी उनके पास सिमट आए. उनमें से कुछ उस बुढ़िया को समझाने लगे. कुछ को बड़ीम्मा में ही दोष नजर आने लगा. बड़ीम्मा के आलोचकों में अधिकांश औरतें थीं, उनमें से भी अधिक संख्या ऐसी स्त्रियों की थी जो किसी समय अपने भरे पूरे परिवार के बीच रहती थीं. जिनमें सुबहशाम दर्जनों लोगों का खाना बनता था. वे औरतें बड़ीम्मा की रसोई में मीनमेख निकालना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थीं. ऐसी ही औरतों में से एक थी अलीजन. वह खुद को किसी नवाब खानदान के वारिस बख्दखां की ब्याहता बताती थी. आशिकमिजाज बख्दखां ने चार शादियां की थीं. उन सबके छब्बीस बेटेबेटियां हुईं. बख्दखां के गुजर जाने के बाद उसके बेटों में अनबन हुई. बेटेबहुएं हवेली पर कब्जा जमाकर बैठ गए. बख्दखां की चारों पत्नियां दानेदाने को तरसने लगीं. आखिर जब कोई और रास्ता बाकी न रहा तो भीख मांगने लगीं. बेटेबहुओं को इससे अपनी इज्जत में बट्टा लगता दिखाई दिया. इसलिए उन्होंने दबाव डालकर शहर छोड़ने को विवश कर दिया. चारों में से अलीजन इस कस्बे में आ गई.

नवाबियत अभी भी उसके स्वभाव का हिस्सा थी. वह हाथ फैलाए चुपचाप आगे बढ़ती जाती. लोग दया करके जो हथेली पर रख देते उसे स्वीकार लेती. खानेपीने की शौकीन अलीजन रसोई बनने में देर होते ही उखड़ जाती थी—

अगर तुझसे चैका नहीं संभलता तो हिरस क्यों करती है? छोड़ दे सबकुछ. मैं हूं करने के लिए. सब संभाल लूंगी. तू आराम से किसी मंदिर की पैड़ियों पर बैठकर कटोरा हिलाती रहना.’

बड़ीम्मा ऐसी भूल कभी मत करना….कम से कम हमारी खातिर.’ फतयाब अली दूर से ही चिल्लाया, ‘ये अगर खाना बनाएगी तो हम सभी को भूखा रह जाना पड़ेगा. रोटी सेकतेसेकते पहली रोटी से खाना शुरू करेगी और अंत तक निगलती चली जाएगी.’

बुढ़िया थोड़ी देर के लिए हिचकी. जैसे किसी ने चोरी पकड़ ली हो. लेकिन अगले ही क्षण संभल गई, बोली—‘मेरी ही पेट समंदर है तो अच्छा है कि सेरभर आटा और दाल जो मैं इसे रोज देती हूं, उसे खुद ही पका लिया करूं. चार ईंट खड़ी करके चूल्हा बनाने में देर ही कितनी लगती है.’

बड़ी बी! कल से तुम अपना चूल्हा अलग रखना, मैं भी उसमें शामिल हो जाऊंगा.’ जवान भिखारी चिल्लाया.

क्यों मरे! उस नटनी ने क्या लात मार दी है जो मुझ बुढ़िया के साथ शामिल होने जा रहा है, सूअर के टने.’ इस बार बुढ़िया ने गाली के साथ कहा तो पूरा भिखारी टोला हंसी बिखेरने लगा. बड़ीम्मा भी उसके साथ हंसी में सम्मिलित हो गई. इसपर वह चिढ़ गई. बूढ़ी त्यौरियों में ताव आ गया. बड़ीम्मा के सिर पर खड़ी होकर वह चिल्लाई—

बेशर्म ….रांड! एक तो समय पर खाना नहीं बनाती, ऊपर से खीखी हंसती है. ठीक है….कल से तेरी छुट्टी. कहीं भी जा.’

इस बीच दो जने खाना खाकर उठे तो बड़ीम्मा को अवसर मिला—‘अच्छाअच्छा! कल जो होगा देखा जाएगा. अभी तो तू अपनी भूख का इंतजाम कर.’ बड़ीबी तो इसी इंतजार में थीं. बड़ीम्मा ना कहती तो भी वह जबरदस्ती बैठ जाती. दोतीन रोटियां खाने के बाद भूख में थोड़ी राहत मिली तो बड़ीबी का मिजाज एकदम बदल गया.

कुछ भी हो बड़ीम्मा! तूने अपने बाल धूप में सपफेद नहीं किए?’ बड़ीम्मा ने हंसकर बड़ीबी की ओर देखा—

चूल्हे की आग में तपे हैं. इससे ही इन पर सफेदी आई है—क्यों, यही कहना चाहती है ना तू?’

बिलकुल यही….तेरे हाथों में जादू है बड़ीम्मा. इसलिए मैं तेरा निकम्मापन भी सह लेती हैं. वरना तू तो जानती है कि मुझसे कुछ भी बर्दाश्त नहीं होता, आखिर नवाब खानदान की बहू ठहरी. गुस्सा जल्दी आ जाता है.’

बसबस, जो बुढ़ापे में किसी को सहारा न दे सके, ऐसी नवाबी पर खाक पड़े!’ बड़ीम्मा ने कहा तो बूढ़ी अलीजन न जाने किन स्मृतियों में खो गई. बड़ीम्मा ने यह देखा तो टोक दिया—‘आज वो लड़का नहीं दिखा….कहां रह गया?’

होगा उसी कबाड़न छोकरी के साथ, हरामी जो ठहरा. आज दोपहर उसके साथ एक छोकरा और भी था. हराम के टने जाने कहांकहां से आ जाते हैं.’

गाली क्यों देती हो बड़ीबी, होगा कोई नसीब का मारा.’ बड़ीम्मा बोली. फिर जैसे कुछ याद आ गया हो, ‘सुबह की खाए हुए है. आ जाता तो दो गर्मगर्म रोटी वह भी खा लेता.’

मैं यहां तुम्हारे पीछे हूं बड़ीम्मा! अगर भुक्कड़ बुड्ढ़ों का पेट भर गया हो तो मैं तुम्हारे पास आऊं?’ सलीम ने चिल्लाकर कहा.

, मुझे भुक्कड़ कहता है. बहुत बकबक करने लगा है तू छोकरा. देख लूंगी तुझे और तेरी हिमायती बड़ीम्मा को…..’ अलीजन ने गुस्से में कहा और पांव पटकती हुई एक ओर बढ़ गई. बड़ीम्मा ने हम दोनों की ओर देखा. लगा कि सलीम को देखकर उनकी आंखों में चमक लौट आ गई हो.

हम दोनों बड़ीम्मा के पीछे एक अंधेरे स्थान पर बैठक जमाए थे. सलीम जब से मिला था, बोले ही जा रहा था. यूं तो मेरे पास भी पूरी एक दास्तान थी, दुखदर्द से भरी हुई. उसे कहने के साथ मैं हल्का भी हो सकता था. मगर एक अजनबी के सामने अपनी जिंदगी को बेपर्दाकर, मैं नंगा नहीं होना चाहता था. दूसरे डर भी था. बापू शहर गया था. मैं कस्बे में एकदम अकेला था. ऐसे में सुरक्षा का तकाजा भी था कि मैं अपने बारे में कम से कम बोलूं. जितना हो सके चुप रहूं. वैसे भी दोस्तों के बीच भी में चुप्पा किस्म का लड़का था. या कहो कि परिस्थितियों ने मुझे चुप्पा किस्म का लड़का बना दिया था. उन हजारों लाखों लोगों की भांति जो दबाव में जीते हुए दब्बू बन जातेे हैं.

तो नतीजा यह निकला कि आदमी स्वभाव से दब्बू नहीं होता. जटिल परिस्थितियां उसकी हर उड़ान को बांधे रखती हैं.

संकट मन में जितना डर और परेशानी पैदा करता है….उतनी ही उन्हें सहने और उनसे बच निकलने का साहस भी पैदा कर देता है. मनुष्य का मस्तिष्क संकट के समय जितना सावधान और सक्रिय होता है, यदि हमेशा उतना ही सजग और सावधान रहे तो कोई संकट शायद कभी आए नहीं. लेकिन प्रारंभिक सफलता का उन्माद अच्छेअच्छों का दिमाग खराब कर देता है, जिससे आगे की सफलता भटकाव के बीच खो जाती है.

सलीम के साथ बातचीत करने के साथसाथ मैं निरंतर एक और संवाद से गुजर था. वह था—मेरा खुद से, अपने अंतर्मन के साथ अनवरत संवाद. उस संवाद में मैं था, मेरी मां थी, मेरे छोटेछोटे भाईबहन थे. हैरानी की बात है कि उनमें बापू के लिए कोई स्थान नहीं था. बापू को मैं अपने खयालों से दूर रखना चाहता था. एकदम परे. मेरे लिए यह वर्तमान के झंझावात को भुलाए रखने का एक और बहाना था.

अरे, मुझे कब तक इस भट्टी पर चढ़ाए रखेगा. इस बुढ़ापे में सुबहशाम चारचार घंटे चूल्हे पर चढ़े देख तुझे मुझपर जरा भी रहम नहीं आता.’ बड़ीम्मा ने शिकायतभरे स्वर में कहा. यह देख सलीम तेजी से बड़ीम्मा की ओर बढ़ने लगा. मेरे कदम अनायास शिथिल पड़ने लगे. अचानक सलीम पीछे की ओर मुड़ा—

अरे! तुमने भी तो कुछ नहीं खाया….’ सलीम का इस तरह पूछना मुझे अच्छा लगा. लेकिन संकोच ने मेरे मन और शरीर दोनों को कब्जा रखा था. मैं इंकार करने वाला ही था कि सलीम ने बताया—

बड़ीम्मा यार्ड में रहने वाले हर भिखारी, यतीम की बड़ी अम्मा है. जब तक सबको खिला न दें, तब तक उनके मुंह में कौर नहीं उतरता. आओ तुम्हें भी उनसे मिलवाए देता हूं.’ बात इस तरह कही गई थी कि मैं इंकार नहीं कर सका और सलीम के पीछेपीछे चल पड़ा.

इतनी देर तक कहां था तू? मैं तो चूल्हा बंद करने ही वाली थी. चल मुंहहाथ धोकर रोटी खा ले. उसके बाद मुझे भी आराम करना है. इस बुढ़ापे में ज्यादा देर बैठा भी तो नहीं जाता.’ सलीम को सामने देख बड़ीम्मा ने एक बार फिर शिकायत की. वह बिना कुछ कहे चुपचाप हाथमुंह धोने के लिए कनस्तर पर झुक गया. बड़ीम्मा के चैके से दूर धुंधलके में रखे उस कनस्तर में भरा पानी हाथमुंह धोने के काम आता था. मैंने भी उसका अनुसरण किया. उसके बाद सलीम बड़ीम्मा के सामने जाकर बैठ गया. मैं अभी झिझक रहा था. बड़ीम्मा ने उसे भोजन परोस दिया. तभी उनकी गर्दन उठी. इस बार निशाना मैं था—

और तू वहां खड़ाखड़ा क्या कर रहा है. तुझसे क्या अलग से कहना होगा. कह भी देती अगर मुझे तेरा नाम मालूम होता.’ बड़ीम्मा ने स्नेहपगे स्वर में कहा तो मैं एकदम हड़बड़ासा गया. मुझे अपनी मां की याद आ गई. पता नहीं यह बड़ीम्मा के स्नेहिल शब्दों का स्निग्ध आमंत्रण था अथवा भूख का उकसावा. सलीम की देखादेखी मैंने भी हाथमुंह धोए और जल्दीजल्दी उसी के पास जा बैठा. खाना खाते हुए एहसास हुआ कि मां की कोई उम्र, जाति या धर्म नहीं होता. न उसके लिए कोई अपना और पराया होता है.

एक मां को मैं खो चुका था. दूसरी मां मुझे भोजन खिला रही थी. प्यार से, देवी अन्नपूर्णा की तरह. कितनी देर मैं उसके स्नेहबंधन में रह सकूंगा—यह समस्या थी. डर था कि इस ममता का साया भी छूटा तो कहां जाऊंगा!

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: