टिप्पणी करे

दंश : 14वीं किश्त

उच्छिष्ट

अगले दिन सूरज की किरणों ने मेरे बदन के छुआ, तब आंखें खुलीं. बीती रात नींद बहुत देर से आई थी. मां, बापू, बेला, हरिया, कालू, मतंग चाचा, पुलिस, थाने और न जाने किसकिस के बारे में क्याक्या सोचता रहा था मैं. प्लेटफार्म के कई बार निरुद्देश्य घूमा भी. पहली बार डरतेडरते, बाद में भय भी जाता रहा. फिर तो प्लेटफार्म के कई चक्कर इस तरह लगाए जैसे अपनी बस्ती की गलियों में चक्कर काट रहा होऊं. लेकिन बापूधाम जैसी निश्चिंतता और मस्ती कहां से लाता. सो पूरी रात शंकाकुशंकाओं के साथसाथ मैं खुद से भी जूझता रहा था. मेरे अपने ही मन के दो फाड़ हो चुके थे. एक कहता बापू लौट आएगा. दूसरा उसका निषेध कर मुझे अपने भविष्य का डर दिखाने लगता. और जब दूसरा हावी हो जाता तो मेरी कंपकंपी छूटने लगती थी.

दो बजे तक इसी तरह मैं खुद से संघर्ष करता रहा. कई बार मन हुआ कि जोर से रोने लगूं. बुक्का फाड़कर, चीखचीख कर लोगों को बताऊं कि मैं निर्दोष हूं. मेरा बापू है जो पुलिस से डरकर महानगर छोड़कर भागना पड़ा है. बिना किसी अपराध के पुलिस हमारे पीछे लगी है. मेरी मां निर्दोष थी, जिसको अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा. लेकिन इनमें से एक भी काम के लिए मैं अपनी हिम्मत न बटोर सका. मेरी मां हम भाईबहनों से दुनिया से बचकर चलने, किसी से न उलझने की हर घड़ी सलाह देती रहती थी. यदि कोई दूसरा बिना किसी बात के हमसे उलझ पड़ता तो भी वह हमीं को बरजती थी और न्याय के लिए संघर्ष करने के बजाय झगड़ालू लोगों से बचकर चलने को कहती थी. संभवतः उसी का असर रहा कि हमारे भीतर प्रतिवाद करने का सामथ्र्य कभी पनप ही न सका.

दिन में बापू के साथ खाना खाया था. जाते समय एक रुपया वह मुझे देकर गया था. वही मेरी एकमात्र पूंजी थी. इसलिए मैं उसे खर्च नहीं करना चाहता था. कम से कम बापू के आने तक बचाए रखने का मन था. लेकिन रात दस बजे के बाद भूख से मेरी हालत खराब होने लगी. मजबूर होकर मैं एक रुपया लेकर प्लेटफार्म पर ठेली वाले के पास पहुंच गया. जो दिनभर गर्मागर्म पकौड़ियां तलकर मुझे ललचाता रहा था.

ठेली वाला मेरी मनःस्थिति को समझ गया. वह जाने की जल्दी में था. सो पकौड़ियों का थाल एक दोने में झाड़ दिया. चूरा वगैरह मिलाकर उस दोने में इतना कुछ आ गया कि मेरे लिए एक साथ खा पाना संभव न था. कुछ साबुत पकौड़ियां सुबह के लिए बचाकर मैंने बाकी सब धीरेधीरे चबा लीं. उसके बाद पानी पीकर चबूतरे तक लौटा तो आंखें अलसाने लगी थीं. मैं सबकुछ भुलाने की कोशिश करता हुआ, वहीं लेट गया. यह सोचकर कि बीती रात की तरह बापू उसी स्थान पर मेरे साथ है….मेरी मदद को एकदम तैयार. खुशनुमा अनुभवों को बटोरने की यह कोशिश दरअसल खुद को भरमाए रखने की नीति का एक हिस्सा था. शायद उसी भ्रम का कमाल, कि देर तक चलने से हुई थकान….कि भरे हुए पेट का नशा….कि निद्रा देवी का आशीर्वाद….कि जीवन के उस पार जाकर भी मां का वात्सल्यभरा स्पर्श….तीन बजतेबजते नींद आ ही गई थी.

सहसा मुझे बापू की याद आई. वह मुंह अंधेरे लौटने को कह गया था. अब तक तो लौट आना चाहिए था. प्लेटफार्म आज कुछ सुनसान था. उठकर मैंने प्लेटफार्म का एक चक्कर लगाया. बापू के साथसाथ मेरी निगाहें कालू, बेला और हरिया को भी ढूंढती रहीं. किसी भी छोटी बच्ची या बच्चे पर नजर पड़ते ही मैं चैंक पड़ता. परंतु जब उसमें अपरिचितता का एहसास जागता तो मन दुःखी हो उठता था.

बापू का इंतजार करना अब बेकार है. वह मुझसे पीछा छुड़ाना चाहता था. कल्लू, बेला और हरिया को लिवाकर लाना तो एक बहाना था वे अनाथालय में मजे से हैं. बापू भी जहां होगा, निश्चिंत होगा.’

हो सकता है बापू पुलिस के हत्थे चढ़ गया हो?’

या फिर उन तीनों को अनाथालय से लाने में देर हो गई हो. बापू ने बताया था कि अनाथालय में बच्चे खुश रहते हैं. इसलिए वे आने से इंकार कर रहे हों और बापू को उन्हें समझाने के कारण देर लग रही हो.’

रेलगाड़ियां हमेशा तो चलती नहीं. दो गाड़ियों के बीच कभीकभी घंटों का अंतर होता है. हो सकता है पहली गाड़ी बापू से किसी कारण छूट गई हो.’

बापू ने कभी अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझा. अपने किसी वायदे पर वह खरा नहीं उतरा, उसकी प्रतीक्षा करना खुद को धोखा देना है….’

आशानिराशा से भरे अनगिनत विचार मेरे दिमाग में आ रहे थे. आसमान में सूरज धधकने लगा था. पेड़ की पत्तियों से बचतीबचाती धूप मेरे सिर पर बरस रही थीं. मैंने उठकर हाथमुंह धोया. कुल्ला किया. भूख अपना मंतर फैरने लगी तो रात की बची पकौड़ियों को खाने का मन हुआ. जिससे कम से कम दोपहर तक तसल्ली मिले. पर चबूतरे पर लौटते ही दिल को धक्कासा लगा. मैंने उठते ही कागज की पुड़िया, जिसमें पकौड़ियां बचाकर रखी थीं, एक पिल्ले की नजर चढ़ चुकी थी. मौका मिलते ही वह उसे ले भागा. उस ओर से निराश होकर मैं प्लेटफार्म के दूसरी ओर बने देवस्थान की ओर उतरने लगा. सहसा मैं चैंक पड़ा. सामने से आते हुए एक लंगड़े पर मेरी नजर पड़ी. इसी के साथ बीती रात की घटना मेरे दिमाग में कौंध गई. वह अकेला नहीं था. इस बार एक लड़की भी उसके साथ थी. पीठ पर बड़ासा खाली बोरा लादे हुए. शरीर पर कुर्ती की जगह गंदामोटा लबादा पहने. लड़की का रंग गोरा था. नहाधोकर निकलती तो बड़ी खूबसूरत नजर आती. परंतु उस समय उसके बाल बिखरे हुए थे. मुंह लगता था कि महीनों से नहीं धोया. कपड़े चीकट सने और पैबंदयुक्त थे. उम्र लड़के से कम ही थी. दोनों बतिया रहे थे. बातोंबातों में लड़की हंस पड़ती तो उसके दूधिया दांत मुक्तामाल की तरह झिलमिलाने लगते थे.

मन में न जाने कैसा संकोच व्याप्त था. मैं उन दोनों से बचकर निकल जाना चाहता था. पर लड़का मेरी ओर बढ़ने लगा. लड़की का भी हंसनाखिलखिलाना रुक गया. वह चुपचाप लड़के के पीछेपीछे मेरी ओर बढ़ने लगी. हालांकि इसकी आंखों से मुझे लगा कि चुप होना, गंभीर मुद्रा अपनाना उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं है. और इस नाटक के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. लड़का ठीक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया. अपनी आंखें उसने मेरी आंखों में गढ़ा दी—

तुम्हारे घर वाले कहां हैं?’

शहर गए हैं?’

तुम्हें अकेला छोड़कर, मांबापू दोनों?’

सिर्फ बापू!’

और मां?’

मैंने गर्दन झुका ली, मेरे मौन ने अनकहा भी कह डाला.

मेरा नाम सलीम है….सलीम लाठीवाला! पूरे प्लेटफार्म पर किसी से भी पूछ लो ….बता देगा.’ लाठी वाला! मैंने चैंककर उसकी पोलियो खाई टांग और बैसाखियों को देखा. शायद मेरा आशय वह समझ गया—

यही है मेरी लाठी….’ बायें हाथ से अपनी बैशाखी को हवा में लहराता हुआ वह बोला— ‘कभी कोई मुश्किल हो तो बताना. प्लेटफार्म के इलाके पर अपुन का ही हुक्म चलता है. क्यों मेरी मधुबाला?’ मुस्कराकर वह लड़की की ओर मुड़ा. लड़की ने उसकी ओर घूंसा तान लिया. मैंने देखा कि लड़की हंसी को दबाने का प्रयास कर रही थी. लेकिन सलीम के हंसने पर कोई पाबंदी न थी. हंसतेहंसते ही वह बोला—

इसका असली नाम कौंसा है. पर उस नाम को यह मुझसे दूर ही रखती है. जानती है कि सलीम के साथ तो उसकी अनारकली यानी मधुबाला ही जम सकती है.’

मैंने लड़की की ओर दुबारा देखा. इस बार नजर गढ़ाकर. उसकी बड़ीबड़ी आंखें फिल्मी हीरोइन की याद दिलाती थीं. फिल्मों के बारे में मुझे अधिक कुछ मालूम नहीं था. टेलीविजन पर जरूर कुछ देखा था. फिल्म जैसा ही कुछ और. पर अभ्यास न होने के कारण कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. बापूधम की झुग्गियों में कई के पास टेलीविजन सेट थे. छोटे और श्यामश्वेत पर्दे वाले. दोचार बड़े भी जरूर रहे होंगे. पर वे सभी…. कमसेकम हमें तो यही बताया गया था कि, सैकिंड हैंड खरीदे गए हैं. जो हो, उन पर दिखने वाले चलतेफिरते चित्रों और भारीभरकम आवाज का अपना ही जादू था.

कुछ महीनों बाद बस्ती में एक रंगीन टेलीविजन भी आया था….नयानकोर, लगने वाला. लाने वाला नगर निगम में मिस्त्री का काम करता था. बस्ती वाले कुछ और न सोचें इसीलिए उसने घोषणा कर दी थी कि टेलीविजन दहेज में देने के लिए लाया गया है. बेटी जवान थी. इस कारण उसकी बात पर भरोसा किया जा सकता था. इस सबके बावजूद बापूधाम में महीनों तक इस बात पर चर्चा होती रही कि वह मिस्त्री नगर निगम में काम करते हुए रिश्वत के रूप में मोटी रकम ऐंठता है. दावा करने वाले तो यहां तक थे कि घर लौटते समय उसकी दोनों जेबें नोटों से भरी होती हैं. इसीलिए आॅफिस से छुटकारा मिलते ही किसी से दुआसलाम किए बगैर वह सबसे पहले घर में जाता. वहां जेबें खाली करने के बाद ही लोगों से मिलताजुलता है. खैर, असलियत जो हो, मां कभी ऐसी बातों में नहीं पड़ती थी. मां की देखादेखी हमें भी इससे कोई मतलब नहीं था.

बस्ती में सभी बच्चों ने अपनाअपना ठिकाना तय कर रखा था. जहां वे अपने मनपसंद कार्यक्रम देखने के बहाने पहुंच जाया करते थे. टेलीविजन देखना मुझे भी बहुत भाता था. पर मां की ओर से सख्त पाबंदी थी. वह खुद भी कभी नहीं जाती थी. और तो और रामायण और महाभारत के प्रदर्शन के दिनों में जब जनजीवन ठहरसा जाता था, बच्चेबूढ़े टेलीविजन से चिपके होते थे, मां झुग्गी से बाहर नहीं निकलती थी. ऐसे में सिनेमा हा॓ल में फिल्म देखना तो बहुत दूर की बात थी.

मुझे याद है. बापू जिद करके हम सबको एक बार सिनेमा घर तक ले गया था. मां को उसने धर्मिक फिल्म बताकर बड़ी मिन्नत के बाद तैयार किया था. पर असल में वह बापू की चाल थी. हम बच्चे तो उस दिन बेहद प्रसन्न थे. जैसे वर्षों पुरानी मुराद फली हो, पर जैसे ही फिल्म शुरू हुईसारा भेद खुल गया. वह एक आम मसाला फिल्म थी. मां तो देखते ही भड़क उठी थी. उसके बाद वह एक पल भी वहां नहीं रुकी. बापू और हमने उसे मनाने की भरसक कोशिश की थी. पर वह नहीं मानी. विवश होकर हमें भी बाहर आना पड़ा. बापू को अपने पचास रुपये बेकार जाने का मलाल था, हमें हाथ से फिल्म निकल जाने का. मां इस बात पर दुखी हो रही थी कि उसने बापू की बात पर भरोसा करके गलती की है. इसी देर में तो चार घरों का चौकाबासन निपटा आती.

उसके बाद फिर कभी सिनेमाघर जाने का अवसर नहीं मिला. सिर्फ दीवारों पर लगे रंगीन पोस्टर देखकर ही मन को बहला लेता था. उन्हीं चित्रों में एक हीरोइन की बड़ीबड़ी आंखें मुझे बहुत पसंद थीं. नाम तो उसका आज भी मुझे मालूम नहीं है. पर इस लड़की की आंखें उसी से मिलतीजुलती हैं. सुंदरता में भी यह उस हीरोइन से उन्नीस नहीं ठहरती. ढंग से पहनाओढ़ाकर तो सौंदर्य में यह किसी को भी मात दे सकती है. पता नहीं यह मेरी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखती उम्र का प्रभाव था अथवा कुछ और, लड़की के चेहरे पर जैसे ही मेरी नजर पड़ी, उसका बिंब स्थायी रूप से मेने मानस पर छप चुका था. दिमाग में न जाने कैसेकैसे खयाल आ रहे थे.

….ऐसे घूरघूर कर क्या देख रहा है?’ सलीम ने टोका तो मेरा ध्यान टूटा. सकपका कर मैंने अपनी गर्दन नीची कर ली. चेहरा शर्म से पसीजने लगा….

ऐसीवैसी मत समझना मेरी मधुबाला को.’ सलीम बोला, पूरे जोश और विश्वास के साथ—‘बारहवीं पास है….पूरे जिले में अव्वल आई थी.’

जिलेभर में अव्वल! दुख और तनाव के बावजूद मैं मन ही मन हंसने लगा. लड़की की पीठ पर पड़ा कबाड़ी झोला फिर से मेरी नजरों में उतर आया. मुझे लगा कि सलीम मज़ाक कर रहा है लड़की को चिढ़ाने के लिए. पर वह तो चिढी नहीं. उसी तरह मूक और प्रतिक्रियाविहीन खड़ी रही. धीरगंभीर पत्थर की मूरत की मार्फत. तो क्या सलीम इस लड़की के बहाने उस पर धौंस जमाना चाहता है. तो मैं इतनी जल्दी बहकावे में आने वाला नहीं हूं. आखिर मैं एक महानगर में रहकर आया हूं. मामूली से कस्बे का अपंग लड़का मुझे मूर्ख नहीं बना सकता. मैं सलीम की बात की तस्दीक लड़की से करना चाहता था. लेकिन तब तक वे दोनों आगे बढ़ चुके थे. मैं फिर अकेला रह गया. अंधेरे में लकीर खींचने की कोशिश करता हुआ.

प्लेटफार्म पर घंटे की आवाज गूंजी तो मेरा ध्यान भंग हुआ. शहर से चौथी गाड़ी आने वाली थी. तीन गाड़ियों को बापू ने छोड़ दिया था. शायद चौथी से आने वाला हो मैं प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया, गाड़ी आकर लगी. गिनीचुनी सवारियां उतरीं, बापू इस बार भी नहीं था निराश होकर मैं बैंच पर बैठ गया.

भूख फिर सताने लगी थी. प्लेटफार्म पर दोचार भिखारियों को देखकर पेट की भूख मिटाने का सबसे आसान तरीका नजर आया लगा कि उसके लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने में भी बुराई नहीं. तभी मां का चेहरा आंखों में आ गया. उन आंखों से इस बार अंगारे बरस रहे थे. मैं समझ गया, मां मुझसे दूर नहीं गई. इस तरह सोचना भी उसको पसंद नहीं. मैंने मां से वहीं बैठेबैठे माफी मांग ली. उसके बाद लगा कि मां का कोप धीरेधीरे कम होता जा रहा है.

सहसा मेरी नजर सामने पटरियों पर पड़ी. वही लड़की पटरियों के बीच से कागज खाली कप, प्लास्टिक की बोतलें आदि बीन रही थी. उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुचिया रही थीं. कमर पर पड़ा बोरा लगातार फूलता जा रहा था. सुबह जो चेहरा ताजे गुलाब की तरह खिलाखिला नजर आ रहा था वह धूप में तपकर तांबई हो चुका था. पुलिसवाले, खोमचेठेलीवाले उसपर जब तब फब्तियां कस देते. जिन्हें वह कभी मुस्कराकर, तो कभी चुप्पी से सह लेती थी. मुझे बापू का इंतजार था. पलपल बिताना कठिन हो रहा था. अचानक मुझे सूझा. मैं पटरियों पर उतर गया और झूठे कप, कागज, पन्नियां बटोरकर एक जगह जमा करने लगा. इसपर वह लड़की मेरी ओर घूरने लगी. पर बोली कुछ नहीं.

क्यों यही काम मिला है करने को?’ उसकी आवाज में गुस्सा साफ झलक रहा था.

क्यों, तुझे क्या?’

यह काम अच्छा नहीं है?’ उसके शब्दों में पीड़ा अंतर्निहित थी.

तू भी तो कर रही है?’

इससे तू बीमार भी हो सकता है.’ मेरी बात सुने बिना लड़की ने कहा.

क्या तुझे गंदगी नहीं लगती?’

इसकी आदत पड़ चुकी है.’ संक्षिप्तसा जवाब दिया लड़की ने.

मुझे सिर्फ वक्त बिताना था. लड़की से भले ही वह जो हो, मुझे कोई सहानुभूति नहीं थी. किंतु वक्त बिताने के लिए ही मैं उसकी मदद करना चाह रहा था. इसलिए उसके साथ बहस करने का कोई लाभ नहीं था. मेरी मदद से उसका थैला जल्दी ही फूल गया. उसने बोरे को दबाकर देखा. इससे ज्यादा कबाड़ भरने की उसमें गुंजाइश ही नहीं थी.

सूरज आसमान की सीढ़ियां उतरने लगा था. गर्मी बढ़ चुकी थी. प्लेटफार्म पर भीड़भाड़ कम थी. इक्कादुक्का यात्री बैंचों पर बैठे ऊंघ रहे थे. मैं ऊपर चढ़कर नल पर हाथमुंह धोने लगा. लड़की पटरीपटरी चलती हुई दूर निकल गई और फिर जहां प्लेटफार्म समाप्त होता था, वहीं बने कूड़ाघर के बराबर उसने अपना बोरा टेक दिया. कमर सीधी के लिए अंगड़ाई ली. माथे पर हाथ रखकर ऊपर आसमान की ओर ताका. जैसे शिकायत कर रही हो सूरज से….कि दे रही हो चुनौती. उसके बाद उसने माथे पर आई पसीने की बूंदों को पोंछा और भरी धूप में कूड़ाघर की दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गई. उसका तेज धूप में इस तरह बैठना मुझे हैरान कर गया. मैं धीरेधीरे उसी ओर बढ़ निकला. तभी उधर से सलीम भी आता नजर आया. शायद कौंसा पर उसकी नजर नहीं पड़ी थी. इसीलिए मेरी ओर मुड़कर बोला—

, तुमने कौंसा को देखा है?’

कुछ कहने के बजाय मैंने कौंसा की ओर हाथ से संकेत कर दिया. वह उसी दिशा में मुड़ गया. कुछ दूर चलने के बाद वह मुड़ा, बोला—‘सुबह से तूने कुछ खाया भी है या नहीं?’

मैंने चुप्पी साध ली. मुंह से झूठ उगलते न बचा. तब उसने अपने पीछे आने का इशारा किया. मैं चुपचाप आगे बढ़ने लगा.

आज बहुत जल्दी काम निपटा लिया.’ कौंसा के निकट पहुंचकर सलीम बोला. इस बीच उसने प्लेटफार्म की ओर मुड़कर देखा. इससे उसकी हैरानी और भी बढ़ गई—

प्लेटफार्म पर तो उछीड़सी है. सभी कुछ सामान्य ही है. सवारियां भी रोज जितनी ही हैं?

हां, आज मुझे दो हाथ और मिल गए. मुझसे भी ज्यादा मेहनती और फुर्तीले.’ मेरी ओर देखते हुए कौंसा ने मुंह खोला. अपनी ही तारीफ सुनकर बहुत अच्छा लगा मुझे. मां मेरे काम से प्रसन्न होकर अक्सर सराहना कर देती थी. बापू से तो किसी प्रकार की उम्मीद ही न थी. इसलिए मंै स्वयं को मां के निकट अनुभव करता था. पहली बार किसी अपरिचित के मुंह से अपनी प्रशंसा सुनकर मुझे अच्छा लगा था. कई दिनों के बाद फिर वही अनुभूति हुई थी. और बिसरा देने के बजाय मैं उसे पूरी तन्मयता से भोगना चाहता था. फिर भी ऊपर से पूरी तरह सामान्य बना मैं उनके पीछे चलता रहा.

कुछ देर तक सलीम चुप्पी साधे रहा, फिर कहा—

कोई और कौंसा की मदद के लिए आगे आए तो मुझे अच्छा नहीं लगता. पर तू…’

क्यांे….तुझे इससे क्या?’ कौंसा बीच में ही कूद पड़ी.

पहले मेरी बात तो सुन ले….जब देखो तब लड़ने को तैयार रहती है. न दिन देखती है न समय….’ सलीम ने कौंसा से कहा. फिर मेरी ओर मुड़कर बोला—

तू भी अपनी ही तरह का लगता है….फुटपाथ का आदमी, क्यों?’

फुटपाथ का आदमी! यह नया संबोधन था. इसके पूरे मायने भी मुझे मालूम न थे. फिर भी सलीम द्वारा फुटपाथ का आदमी कहा जाना मुझे अच्छा नहीं लगा था. मैंने उसका कोई विरोध भी नहीं किया. शायद यह सोचकर कि जब तक बापू वापस नहीं लौट आता, मुझे सहारे की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में कोई तो हो उस कस्बे में. सिवाय सलीम के किसी और से बोलचाल तक नहीं थी. ना ही किसी का मैं नाम जानता था. ऐसे में किसी और से उम्मीद रखना….किसी और के आगे सहारे के लिए जाना, नामुमकिन जैसा था. जानपहचान सलीम से भी कुछ ही घंटों की थी. लेकिन हर बार वही पहल करता आ रहा था. उसकी सहानुभूति भी संदेह से परे दिखती थी. फिर भी वह मुझे फुटपाथ का आदमी कहे, यह अपमानजनक लगता था. मुझसे भी ज्यादा इसमें मां का अपमान निहित था. जिसने रातदिन एक करके हमारे सिर की छत को बचाए रखा था.

इसलिए कोई और अवसर होता तो मैं सलीम को उसकी बात का उपयुक्त जवाब देता. परंतु उस समय बात को पी जाने में ही भलाई समझी. शाम की गाड़ी थोड़ी ही देर पहले निकली थी. उसमें भी बापू के आने से मैं निराश था. परंतु अब पहले जितनी बेचैनी न थी. बापू शायद मुझे वक्त के हाथों में सौंपकर गया था. यही सोचकर मैंने खुद को समय के हाथों में सौंप दिया था. वक्त के धारे—जब चाहे जिस ओर धक्का दें, चाहे जिधर भी ले जाएं, मुझे कोई अफसोस नहीं था.

अफसोस नहीं था, कह देने से न तो एहसास घटते हैं, न उनकी पालकी उठाने वाले वक्त की रफ्तार थमती है.

अफसोस नहीं था, कह देने से भी ‘अफसोस’ की सत्ता को प्रामाणिकता मिलती है.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

Advertisement

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: