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दंश : तेरहवीं किश्त

दुनिया में वही सिकंदर है जो जीवन के प्रत्येक संघर्ष में नए उत्साह के साथ उतरता है. उसे पराजय भी जीत का सा आनंद देती है.

सुख हो कि दुख…. धूप हो कि छांव…. दिन हो रात, समय की यात्रा कभी नहीं रुकती. अनवरत चलती ही जाती है. किस दिशा मेंकौन जाने? हालांकि दुनिया में कुछ गर्वीले ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने समय की धड़कनों को पहचानने, उसके पार जाने का दावा किया. पर उनका घमंड बहुत दूर तक उनका साथ नहीं दे सका. हारकर बैठना पड़ा उन्हें. कुछ मनीषियों के साथ जिन्होंने समय की महानता को पहचाना….उसे मान दिया….उसके आगे विनत रहे….और धीरजपूर्वक आगे बढ़ते गए, समय ने भी दोस्ती गांठीं और निभाई. समय के आशीर्वाद से ऐसे लोग दूरदृष्टा कहलाए….पूजे भी गए. जबकि घमंडियों का सिर समय ने हमेशा ही नीचा किया….उन्हें कहीं का न छोड़ा.

बाकी रात जैसेतैसे बीती. आखिरी घंटों में बहुत गहरी नींद आई थी मुझे. आंखें खुलीं मन पूरी तरह शांत था, दिमाग हल्काफुल्का. बीती रातों का झंझावात समय के पर्दे में खिसक चुका था. पर देह दर्द से बुरी तरह टीस रही थी. उधर भूख से खाली अंतड़ियां कुलबुलाने लगी थीं. मैंने बापू की ओर देखा. वह जामुन से पीठ टिकाए बैठा था. कुछ सोचता हुआसा. सूरज निकल आया था. प्लेटफार्म अपनी दिनचर्या पाने का प्रयास कर रहा था.

सहसा बापू ने सुदूर आकाश में टिकी निगाह को हटाया. वह उठकर खड़ा हो गया. जैसे बड़ी देर से उसको मेरे जागने की प्रतीक्षा हो. बोला—‘मैं यहां के दो बहुत बड़े आदमियों को जानता हूं….तू इंतजार करना उनसे मिलकर मैं अभी लौटा. पुलिस से जरा सावधान रहना और हां, किसी से उलझना भी मत.’

मैं घबराया. बीती रात की घटना मेरे दिमाग में कौंध गई, जब बापू मुझसे नजर बचाकर रेलगाड़ी पर सवार हो गया था. बापू बढ़ा तो मैं भी उसके पीछे हो लिया—बापू ने मेरी आशंका को ताड़ लिया. पलटकर बोला

घबरा मत! मैं लौटकर जरूर आऊंगा. जिन लोगों के पास मैं जा रहा हूं वे बहुत बड़े लोग हैं….मैं उनके पास तुझे नहीं ले जा सकता.’ हजारहजार आशंकाएं, सैकड़ों डर मेरे दिलोदिमाग को जकड़ने लगे. उस समय बापू का साथ मुझे घर का एहसास दे सकता था. अकेले होने का मतलब था….घर और अपनों से पूरी तरह दूर हो जाना. जिसका मुझे अभ्यास न था.

प्लेटफार्म पर यात्रियों का आना बढ़ चुका था. शहर में कामकाज के लिए जाने वाले सैकड़ों यात्री उस प्लेटफार्म से सवार होते थे. एक बापू था जो शहर छोड़कर काम की तलाश में उस कस्बे में भटकना चाहता था. सभीकुछ उल्टापुल्टा चल रहा था. बापू पुलिस से डर रहा था. उसका डर सच्चा भी था.

जो हो. मुझे अपनी आशंका के साथ रहकर, बापू पर भरोसा करना ही था. मैं सुन चुका था. बीती रात बापू ने ही जिक्र किया था कि चंबल ठाकुर और पुरुषोत्तम बाबू उसी कस्बे के हैं. दोनों ही राजनीतिक जीव थे. चंबल ठाकुर दस वर्ष पहले क्षेत्रीय सांसद रह चुके थे. बीते दस वर्षों में तीन चुनाव वे हार चुके हैं. पुरुषोत्तम बाबू में कम नहीं थे. वे चार बार विधायकी के टिकट पर लड़ चुके हैं. चारों ही बार उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था. चंबल ठाकुर जहां अपने जीवन में दर्जनों पार्टियां बदल चुके थे. इसके लिए राजनीतिक क्षेत्रा में खासे बदनाम भी थे. वहीं पुरुषोत्तम बापू पिछले चालीस वर्ष से एक ही पार्टी से चिपके हुए थे. इसका उन्हें फायदा भी मिला था. उनकी पार्टी उन दिनों दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ कर सत्ता में थी. जिससे पुरुषोत्तम बाबू को एक सरकारी निगम का सर्वेसर्वा बना दिया गया था. चंबल ठाकुर सत्ता से वर्षों से बाहर थे. मगर एक बार की संासदी में ही उन्होंने जमीनजायदाद और दौलत जमा करने के साथसाथ अच्छे खासे संबंध भी बना लिए थे. उन्हीं रसूखों के आधार पर उनका धंधा अच्छा चल रहा था. उनकी असली कमाई ठेके दिलवाने और ट्रांसफरपोस्टिंग द्वारा थी. इसके अलावा शराब के कई ठेके उनके नाम थे. उसी कमाई के बूते पर चुनावों में उतरते और हंसतेहंसते कई लाख उसमें स्वाहा कर देते थे.

बापू दोनों के ही चुनावों में उनकी मदद कर चुका था. यही नहीं, शहर में उन दोनों का जो भी कार्यक्रम होता, वह बढ़चढ़कर उसमंे हिस्सा लेता था. काम चाहे दीवारों पर पोस्टर चिपकाने का हो या चादर बिछाने का. बापू को किसी से भी गुरेज नहीं था. इधर अनुभव बढ़ने के साथ बापू को कई कार्यक्रमों का पूरा इंतजाम भी सौंप दिया गया था. जिनका वह बड़ी शान से बखान किया करता था.

बापू को पूरा भरोसा था कि इस संकटकाल में वे दोनों उसे अवश्य सहारा देंगे. शहर छोड़कर इस कस्बे तक आने का उसका यही मकसद भी था. उनसे मिलने जाते समय वह निश्चिंत नजर आ रहा था. किंतु बापू की निश्चिंतता मुझे आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त न थी. इसलिए उसके जाते ही मेरे दिल की धड़कनें बुरी तरह से बढ़ चुकी थीं. तरहतरह के खयाल दिल को सताने के लिए आ रहे थे. करीब तीन घंटे बाद बापू वापस आता हुआ दिखाई दिया तो मेरे मन को शांतिसी मिली. उसका चेहरा बता रहा था कि वह अपने मकसद में नाकाम रहा था. चलतेचलते वह हाथपांव झटक रहा था. मानो इसी तरह दिमाग पर जमा बोझ को भी उतार कर फेंक देना चाहता हो.

हरामी…. धोखेबाज…. मतलबी कहीं के! मौका मिलते ही आंखें दिखाने लगे….कायर!’ बापू के कुछ शब्द मेरे कानों में पड़े. मैं दौड़कर उसके पास पहुंचा. पर उसकी मनःस्थिति भांप कुछ दूरी पर ही ठिठक गया. और तब मैंने जाना. चंबल ठाकुर और पुरुषोत्तम बाबू के साथसाथ बापू मां को भी गालियां दे रहा था. मुझे उसकी परेशानी का अंदाजा था. मगर मां को इस तरह गालियां देना मुझे जमा नहीं. बापू की हालत बिल्कुल पागलों जैसी थी. मैंने उस ओर से उदासीन होने की कोशिश की. लेकिन हताश बापू जब सारा गुस्सा मां पर ही उतारने लगा तो मुझसे सहा न गया.

इसमें मां की क्या गलती है बापू?’ मैंने उसके बराबर मैं आते हुए धीरे से कहा कि कोई कहीं सुन न ले.

वही हरामजादी तो इस झगड़े की जड़ है. बहुत सतीसावित्राी बनती थी.’ बापू का आक्रोश फूट पड़ा. मैं चुप ही रहा. बापू बड़बड़ाए जा रहा था—

अगर वह नखरे न दिखाती तो क्या बिगड़ जाता उसका. न खुद जान से जाती, ना ही हमें बेघर होकर दरदर भटकना पड़ता.’

मां तो आपको छुड़वाने ही गई थी….कमीने दरोगा और सिपाहियों ने ही….’ बीती रात की घटनाएं याद आते ही मेरा दिमाग गुस्से से तमतमा उठा. बात अधूरी रह गई. पर बापू पर जैसे उसका कोई असर पड़ा ही नहीं. वह अपनी धुन में मां को दोषी ठहराए जा रहा था—

मूर्ख थी वह! क्या जरूरत थी थाने पहुंचने की….वहां मर्दमानुस जाते हैं. भले घर की औरतों को तो वहां जाना ही नहीं चाहिए.’

वह तो तुम्हें छुड़वाने के लिए गई थी.’

जब पुलिस वाले सुन ही नहीं रहे थे तो वापस लौट आती. या मान लेती उसकी बात. वहां धरना देने की क्या जरूरत थी. मैं कोई पहली बार तो बंद नहीं हुआ था. फिर हवालात ही था. जेल तो नहीं. जेल चला भी जाता तो सालछह महीने में वापस लौट पाता. मुझे पुलिस पर भरोसा था, आज भी है. जरूर कोई उल्टीसीधी बात हुई होगी जो उसने मुझे इतनी देर तक हवालात में बंद रखा. ऐसा किसके साथ नहीं हो जाता. अच्छेखासे दोस्तों में….कभीकभी भाइयों के बीच भी गलतफहमी हो जाती है….’

बापू पुलिस की बढ़ाई करने लगा. सुनकर मुझे उससे नफरत होने लगी थी.

नए दरोगा के बारे में मां को जो बताया गया, उसी से वह डर गई थी.’ मैंने डरतेडरते कहा. पर बापू न जाने किस दुनिया का जीव था. कोई भी अच्छी बात उसे बुरी लगती थी….न जाने किस भ्रम का उसपर कितना गहरा प्रभाव था. पुलिस के हाथों धोखा खाकर, मां की बलि चढ़ाकर भी उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था. मैं उसे बताना चाहता था कि मां ने अपनी जान देकर भी उसकी रक्षा की है. वरना इस समय वह जेल में होता. पुलिस उसको गोली से भी उड़ा सकती थी. जैसा कि हवलदार ने कहा था. इनमें से कुछ भी असंभव नहीं था. परंतु मैंने बीती बातों को याद दिलाने के बजाय आगे के बारे में सोचने का फैसला किया. बापू को जिनसे उम्मीद थी उनके दरवाजे से वह निराश होकर लौट आया था.

बापू अब हम कहां जाएंगे?’ मैंने सवाल किया.

अभी तो मुझे शहर लौटना होगा. तेरी मां….भले ही नासमझी दिखाकर….उसने खुद ही अपनी मौत को बुलावा दिया हो. पर थी तो मेरी पत्नी ही. चैदह वर्ष मैंने उसके साथ बिताए हैं. सो उसका पति होने का धर्म मुझे निभाना ही पड़ेगा….’

मुझे यानी फिर अकेले. मैं जान गया कि बापू किसी भी तरह मुझसे अलग हो जाना चाहता है. किंतु शहर जाकर वह करेगा क्या? यह मेरी समझ से बाहर था. फिर भी मुझे तसल्ली हुई कि उसे मां का ख्याल है. उसके प्रति अपने धर्म को समझता है. पर मुझे उसपर जरा भी भरोसा नहीं था. मां की मौत के बाद यह विश्वास और भी टूटा था. वह आगे कौनसा रंग बदलता है यही जानने के लिए मैं टकटकी बांधे उसके चेहरे की ओर देखने लगा—

मैं पुलिस की रगरग पहचानता हूं. जिस जंगल में उसने तेरी मां की चिता सजाई थी, उसकी जानकारी भी मुझे है. उसके फूल चुनने के लिए मुझे वहां जाना ही पड़ेगा. उन्हें गंगा में बहाने के बाद ही उसको मुक्ति मिल पाएगी.’

बापू फिर जाने की बात कह रहा था. मैं समझ नहीं पाया कि उसकी बात का क्या उत्तर दूं. इस बात पर संतोष प्रकट करूं कि दिवंगत मां के प्रति उसकी जो जिम्मेदारियां हैं, उन्हंे वह निभाना चाहता है या इस बात पर दुख जताऊं कि बापू दुबारा मुझे छोड़कर जाना चाहता है….उसी शहर में लौटना चाहता है जहां की पुलिस हमारे पीछे पड़ी है. अगर वहां पर बापू को कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? कल्लू और बेला का क्या होगा जो पिछले चार दिनों से मतंग काका की कुटिया में अनाथों की तरह रह रहे हैं. आशंकाएं अनेक थीं, जिनमें से एक का भी जवाब मेरे पास नहीं था.

वहां जाकर हम कल्लू और बेला से भी मिल आएंगे.’ मैंने बापू का मन लेने के लिए कहा.

अभी पुलिस की कार्यवाही ठंडी नहीं पड़ी है. वह आठनौ साल के लड़के के साथ आदमी की तलाश कर रही होगी. तुझे साथ ले जाने में खतरा ज्यादा है. इसलिए मैं वहां अकेला ही जाऊंगा. आज शाम को ही. रातरात में काम निपटाकर मुंहअंधेरे इसी प्लेटफार्म पर लौट आऊंगा. यहीं से हम दोनों हरिद्वार चलेंगे. तेरी मां की राख गंगा जी के हवाले करने के बाद ही मैं आगे की सोचूंगा. तू घबराना मत. सब ठीक हो जायेगा. मैं सब ठीक कर लूंगा.’

बापू ने मुझे विश्वास दिलाने का भरसक प्रयत्न किया. परंतु मेरी शंका बनी रही. लौटते समय बापू के हाथ में एक लिफाफा था, मेरी नजर उसी पर टिकी हुई थीं. मेरी हालत देख बापू मुस्कुरा दिया. लिफाफा में चने और मुरमुरे थे. उसने थोड़े से मुरमुरे अपनी हथेली पर उंडेलकर, लिफाफा मेरी ओर बढ़ा दिया. देखते ही मेेरे मुंह में पानी आ गया. सुप्त पड़ी अंतड़ियां यकायक जाग र्गइं और उनमें छिपी भूख कुलबुलाने लगी.

लिफाफा लेते समय वे सब बातें एक साथ साफ हो गईं जो कुछ देर पहले तक मेरे दिमाग को मथ रही थीं, जिनमें बापू के प्रति घोर नफरत और वितृष्णा का भाव था. अब मैं था….मेरी भूख थी….और वह लिफाफा, उसमें भरे चनेमुरमुरे. उसी दिन मुझे एहसास हुआ कि पेट में ऐसा कोई गुण नहीं है जो आदमी को जानवरों से अलग करता हो. मैं चाहता था कि जल्दी से जल्दी उन्हें उदरस्थ कर लूं. मेरी तरह बापू भी भूखा हो सकता है, इस ओर मेरा ध्यान ही नहीं था. बापू कुछ देर तक मेरी ओर देखता रहा.

बहुत भूख लगी है!’ बापू की बात का उत्तर दिए बिना मैं खाने में लगा रहा. इस बीच बापू धीरेधीरे प्लेटफार्म की ओर बढ़ने लगा. यह देखते ही मैं उठकर खड़ा हो गया.

घबरा मत! तुझे बिना बताए मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं.’ मैं कुछ और कहूं, उससे पहले ही वह प्लेटफार्म पर भीड़भाड़ वाले क्षेत्रा की ओर बढ़ गया.

पश्चिम दिशा में बड़ासा मैदान था, जिसमें बड़ेबड़े गड्ढे थे. प्लेटफार्म के भराव के कारण शायद वह गड्ढ़ा बना था. जिसमें बरसात का पानी अभी तक जमा था. उससे आगे खुला मैदान था. प्लेटफार्म पर रहने वाले कुली, मजदूर, फेरीवाले और चलतेफिरते यात्री उस मैदान का उपयोग दिशाफारिग के लिए करते. मैदान में यहांवहां खड़े बबूल के पेड़ ओट का काम करते. गड्ढों में भरा पानी धोने के काम आता. मैदान के एक छोर पर जामुन का पेड़ था. उसके नीचे रंगी हुई चार ईंटें रखकर उसे देवस्थान घोषित करने की सूझ शायद किसी साधू की रही हो, जो प्लेटफार्म की भीड़भाड़ से अलग रात बिताना चाहता हो. बाद में जामुन के नीचे चबूतरा भी बना दिया गया था. ईंटों के ऊपर लाल रंग का पुराना झंडा टंगा था. चबूतरे के चारों ओर बाड़ रखकर उसे शेष मैदान से काटने की कोशिश की गई थी. हालांकि उसमें कामयाबी नहीं मिल पाई थी. दिशामैदान के लिए निकले लोगांे के लिए वह बाड़ भी ओट का काम करती थी. कोई डर उन्हें उसकी ओट में निवृत्ति प्राप्त करने से नहीं रोक पाता था.

मुरमुरे चबाने के बाद मेरा ध्यान उस मैदान की ओर गया. गड्ढों में भरे….और उनके चारों ओर उकडूंसी बैठी मूर्तियों को देख याद आया कि बीते चैबीस घंटे से हम दोनों में से कोई भी दिशामैदान नहीं जा पाया है. पेट में कुछ होता तो शायद उसकी जरूरत भी पड़ती. पर अब, दूसरों की देखादेखी आंतों में भरी हवा ही जोर मारने लगी थी….मैं मैदान की ओर बढ़ गया. पीछेपीछे बापू भी चला आया.

बापू ने शाम को शहर जाने के लिए कहा था. हमारे पास पूरा दिन था बिताने को. एकडेढ़ घंटा हमने जामुन के नीचे चबूतरे पर लेटकर बिताया. करीब नौ बजे बापू उठ बैठा. उसने जेब को टटोला. किंतु निराशा ही हाथ लगी. कुछ सोचते हुए वह उठा और दोपहर तक लौटने को कहकर दुबारा कस्बे की ओर बढ़ गया. लौटा तो दोपहर ढलने लगी थी. उसके हाथों में एक दोना था, जिसमें आलू की तरकारी थी. साथ में कुछ पूरियां भी. आते ही उसने पूरियां खोलकर मेरे आगे रख दीं और मुझे भी खाने के लिए कहा. खातेखाते बताने लगा—

यहां की मंडी छोटी है. शहर जैसी मारामारी नहीं हैं. किस्मत से एक सेठ का मजदूर बीमार था. मुझे चार घंटे का काम मिल गया. लौट रहा था तो मंदिर के आगे भंडारा देखकर जी खुश हो गया. मैंने वहां भरपेट भोजन किया. लौटते समय तेरे लिए भी पूरियां बंधवा लीं. अच्छा हुआ जो खाने के पैसे भी बच गए.’

ऐसे कठिन समय में जबकि एकएक पैसे की जरूरत हो, उसका महत्त्व अपने आप समझ में आने लगता है. पूरियां चबाते समय मैंने थोड़े अभिमान के साथ बापू को देखा. वह भी मेरी ओर देखकर मुस्कराया. मुझे लगा कि वह बदल रहा है. मेरे मन में उसे लेकर जो मैल जमा था, वह हौलेहौले घुलने लगा. बापू ढेर सारी पूरियां उठा लाया था. उसने चार दिनों में हमें पहली बार भरपेट भोजन मिला था. खाने के बाद मैंने डकार ली. दौड़कर प्लेटफार्म पर गया. वहां लगे नल से पानी पिया. मिट्टी के कुल्हड़ में कुछ बापू के लिए भरा और वापस लौट आया. बापू तब तक चबूतरे पर लेट चुका था. उसके खर्राटे बता रहे थे कि नींद गहरी है. मैंने कुल्लड़ बापू के सिरहाने रख दिया और उसके बराबर में लेट गया.

नींद ने बड़ा कोई देवता नहीं, चौबीस घंटे में कम से कम एक बार प्यार से पीठ सहलाने के लिए हाजिर हो जाता है. बापू उसकी मेहरबानी पर था और मुझे वह अपने आगोश में समेटने के लिए तत्पर था.

काश! समय भी हमारे परिवार पर इतना ही मेहरबान होता.

शाम को बापू के जगाने पर ही मैंने अपनी आंखें खोलीं. वह शहर जाने को तैयार था. मुझे बतानेभर के लिए ही वह रुका हुआ था. बापू के इरादे ने मेरी चिंता को एकाएक बढ़ा दिया. उसने शायद मेरे मन की बात ताड़ ली थी. अतः अपनेपन के साथ मुझे अपनी बांहों में भरते हुए बोला—

मैं मानता हूं कि मैं बहुत अच्छा आदमी नहीं हूं. खोजने पर शायद ही कोई अच्छाई मुझमें मिले. जिंदगीभर गलतियां ही गलतियां करता रहा. तुम्हें और तुम्हारी मां को मैं कोई सुख नहीं दे पाया. वह अभागी रातदिन गृहस्थी संभालने के लिए खटती रही और मैं हमेशा उसे दुख पहुंचाता रहा. मेरी किए की सजा ही उस बेचारी को मिली है. मैं पापी हूं, मुझे अपनी गलतियों का एहसास है. मैं प्रायश्चित करना चाहता हूं. लेकिन इसके लिए मुझे लौटना ही पड़ेगा. सिर्फ एक रात की बात है. सारा काम चुपचाप समेटकर मैं सुबह तक लौट आऊंगा. आने के बाद हम दोनों हरिद्वार चलेंगे.’

मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था. वह कहे जा रहा था—

हो सका तो लौटते हुए कल्लू, बेला और हरिया को भी लिवा लाऊंगा. हम सब साथ ही रहेंगे. इसी कस्बे के एक मैदान में कुछ झुग्गियां पड़ी हुई हैं. थोड़ीसी जगह मुझको मिल ही जाएगी. फिर हम कभी अलग नहीं होंगे.’ बापू सपने दिखाने लगा था.

तुम तो कह रहे थे कि वे तीनों अनाथालय में मजे में हैं?’

मेरे रहते वे भला अनाथालय में क्यों रहें.’ बापू ने झट जवाब दिया. मुझे अच्छा लगा. दिल में गर्वानुभूति की लहरें उठने लगीं. उनकी ऊर्जा ने मेरे चेहरे को चमक से भर दिया है. बापू को इससे बल मिला.

भगवान ने चाहा तो आगे से हम पांचों एक साथ ही रहेंगे.’ बापू ने दोहराया. मुझे जाने क्यों लगा कि इस बार उसकी आवाज में दम है. आत्मविश्वास बढ़ने के संकेत जैसा. लेकिन भगवान का नाम बीच में आते ही मेरा दिल बैठने लगा था. सारी गर्वानुभूति मन की अतल गहराइयों में डूबने लगी. मां की याद भी आई मुझे. जो बिना उसका नाम लिए अन्नजल ग्रहण नहीं करती थी. बापू तब ईश्वर के नाम से ही दूर भागता था. अब मां के जाने के बाद….

क्या सचमुच यह बापू का प्रायश्चितबोध था, जिससे वह मां की अनुपस्थिति में उसी के आराध्यदेव की शरणागत हो जाना चाहता था. उतनी ही निष्ठा और समर्पणभावना के साथ या हमें घर का एहसास दिलाने के लिए उन सभी कर्मकांडों को अपना लेना चाहता था जो मां के साथ जुड़े थे या जिनके रूप में मां की यादें हमारे साथ थीं. कि एक पराजित मनुष्य का पलायन! मैंने इन सब बातों पर खूब सोचा. मगर कोई फैसला न कर पाया. तभी बापू उठकर खड़ा हो गया—

अच्छा अब मैं निकलता हूं….तू घबराना मत. हिम्मत से काम लेना. आदमी अपने हौसले के साथ कहीं भी अकेला रह सकता है. साथ मैं दिमाग से भी काम ले तो कामयाबी सदैव उसके कदम चूमती है.’

कैसी विडंबना थी. जिंदगी में पूरी तरह असफल रहा आदमी मुझे सफलता के गुर सिखा रहा था. जिदंगी में कदमकदम भटकाव और ठोकरें खाने वाला मनुष्य मुझे रास्ता चलने का पाठ पढ़ाना चाहता था. किसने दिया था उसे यह हक? क्या समाज ने? इसीलिए कि वह मेरा पिता—मेरा जन्मदाता था! या उसके भीतर मौजूद शिक्षक ही मुझे चेताना चाहता था? वही शिक्षक जिसकी बातों पर स्वयं उसने कभी ध्यान नहीं दिया था. अथवा भविष्य को लेकर हताशा और अविश्वास ने बापू को वह सब उपदेश देने के लिए उकसाया था? अथवा उसके एक और धोखे की भूमिकामात्रा था.

मैं कुछ कहूं, इसकी परवाह किए बिना वह आगे बढ़ गया. रेलगाड़ी ने चलने की सीटी दी. धीरेधीरे वह खिसकने लगी. बापू ने एक पल ठिठककर मेरी ओर देखा. तसल्ली देने के लिए जैसे कुछ बाकी रह गया हो—‘मेरा इंतजार करना, मैं जरूर आऊंगा….!’ उसकी तसल्ली के लिए मैंने अपनी सहमति दिखाई. हालांकि भीतरहीभीतर दुख, अविश्वास, आशंका, डर जैसे भाव मुझे डरा रहे थे.

इसके बाद बापू दौड़ने लगा. फिर उछलकर उसने रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे का डंडा पकड़ लिया. मैं बढ़ती धड़कनों के साथ खिसकती हुई गाड़ी को देखने लगा. उसके ओझल होते ही मुझे लगा कि जैसे विराट शून्य मेरे चारों ओर पसर गया हो. उस समय तक रात का पहला पहर ही शुरू हुआ था. स्टेशन पर चहलपहल थी. मगर मेरे कान उस ओर से संवेदनशून्य हो चुके थे. ऊपर आकाश में तारे अपनाअपना तूमरा लिए रतजगे की खातिर जमा थे. मेरी आंखों में गहरा अंधकार छाया था. मां तो दुनिया से उठ ही चुकी थी. बाकी छोटासा परिवार पूरी तरह बिखर चुका था. मिलने की उम्मीद बापू के अगले कदम पर निर्भर थी. मन के सूनेपन को भरने के लिए ढेर सारी यादें थीं. मगर उन यादों की तपिश मेरे सुखचैन को हरने के लिए पर्याप्त थी.

मालूम नहीं कितनी देर में अपने भय, आशंका, सूनेपन और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में वहां अविचल खड़ा रहा. कितनी देर और उसी अवस्था में रहता, यह बता पाना भी मुश्किल है. उस क्षण जो घटा तब भले ही कुछ विचित्रा लगा हो. पर मुझे दुनिया में वापस लाने, तेजी से मर रहे एहसास लौटाने के लिए जरूरी था.

मैं प्लेटफार्म और मैदान के बीच स्थित कच्चे ढलान पर खड़ा था. धूल से भरी संकरीसी पगडंडी पर जिसका उपयोग मैदान में जानेआने के लिए किया जाता था. वह नगर और कस्बे की चहलपहल से परे एक सुनसान स्थल था. वहां की नीरवता प्रायः रेलगाड़ी के गुजरने के साथ ही भंग होती थी. तभी मुझे धक्का लगा. मैं खुद को संभाल न सका और औंधे मुंह जमीन पर जा गिरा. चेहरा धूल से लिथड़ गया. उसी समय हंसनेखिलखिलाने की कुछ आवाजें मेरे कानों में पड़ीं. मैं धक्का देने वालों को पहचानकर कुछ कहूं, उससे पहले ही एक गरजतीसी आवाज ने मुझे चैंका दिया—

सूअर के बच्चो. मान जाओ, वरना एकएक को ऐसा मजा चखाऊंगा कि….’

मैं भीतर से टूटा हुआ था. इसलिए यह देखकर भी कि मुझे गिराने वाले छोटेछोटे बच्चे हैं, गरीब और आवारा से नजर आने वाले, मैंने कुछ नहीं कहा. सिर्फ उठकर मिट्टी झाड़ने लगा. तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैं चैंक पड़ा—

कहीं लगी तो नहीं?’ और इसी के साथ, मैं कोई जवाब दूं उससे पहले ही, उसने अपने गुस्से का प्रदर्शन करते हुए एक ढेला शरारती लड़कों की ओर उछाला. वे लड़के डरकर भागने लगे. मैंने पलटकर देखा, वैशाखियों पर झुका एक लड़का खड़ा हुआ था. उम्र में मुझसे पांचछह साल बड़ा होगा. बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले बाल और ऊंचा माथा. पैरों को छोड़ दें तो वह एक सुदर्शन राजकुमार नजर आता था. उसके होठों पर मुस्कान थी. आमंत्रित करती हुई.

अकेले हो?’ मेरे कंधे पर लगी मिट्टी को हटाते हुए उसने पूछा.

नहीं.’ मैंने झूठ कहा. इस पर उसने इधरउधर देखा.

तब बाकी लोग कहां हैं?’ उसने पूछा. मैंने उसका कोई जवाब नहीं दिया. चुपचाप प्लेटफार्म की ओर बढ़ने लगा. इसपर वह रास्ते से हट गया.

यह दुनिया कमजोरों के लिए नहीं बनी है. शरम करोगे तो भूखे मर जाओगे. जितना सहोगे, यह उतना ही अत्याचार करेगी.’ उसने पीछे से आवाज दी. यह बिल्कुल नया सबक था. अभी तक मां का धरतीसा धैर्य और बापू का दब्बूपना मुझे कुछ और ही सिखाते आए थे. पहली बार मुझे नया पाठ मिला. सिखाने वाला एक बालक था. वह भी लंगड़ा. मन हुआ कि रुककर उससे कुछ बातें करूं. लेकिन तभी ख्याल आया कि मैं उससे अकेला होने से इंकार कर चुका हूं. और मेरा झूठ इतनी जल्दी खुल जाए, यह सहने का हौसला मुझमें नहीं था.

प्लेटफार्म पर पहुंचकर मैंने देखा. वह लड़का शरारती बच्चों को अपने पास बुलाकर धमका रहा था. मैं कुछ देर तक वहां खड़ा रहा. फिर दूसरे प्लेटफार्म की ओर चल दिया. जहां मैंने बापू के साथ पिछली रात बिताई थी. आगे सुबह होने तक मुझको वहीं ठहरना था. जिंदगी का अगला कदम बापू के लौटने के बाद ही उठना था.

बापू लौटेगा? यह सबसे बड़ा अनिश्चय था. देर हो जाए तो निश्चय भी अनिश्चय को आमंत्रित करने लगता है.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

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