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दंश – ग्यारहवीं किश्त

दंश धारावाहिक उपन्यास

साधारण इंसान कहने से क्या बापू के पाप कम हो जाते हैं? यह कहकर क्या जिम्मेदारी से भागा जा सकता है? नहीं न!

बापू को इससे पहले भी मैं अपना सगा नहीं मानता था. इस घटना के बाद तो जैसे संबंध टूट की गया. घटना क्या, वह एक आंधी थी. जिसने हमारे परिवार को चिथड़ेचिथड़े कर अनजानी दिशाओं की ओर धकेल दिया था. हरेक को बिना उसकी मासूमियत का ख्याल किए बिना, दरदर भटकने….जमाने की ठोकरें खाने के लिए, जिंदगी के बीहड़ रास्तों पर छोड़ दिया था.

बापू से नफरत हो चली थी. उसका एक हिस्सा अभी तक मेरे मस्तिष्क में जमा है. आज मैं बापू को इस कारण याद नहीं कर रहा कि वह मेरा जन्मदाता था. या कि मां के गर्भ में रोपने के लिए बीजतत्व उसी ने प्रदान किया था. हो सकता है उस क्षण भी वह नशे की हालत में हो. और मां के गर्भ में भू्रण का पनपना वासनागत दुर्घटना के कुछ सामान्य क्षणों का परिणाम रहा हो. निश्चय ही नशे के वे क्षण भी पिता के लिए उन्माद भरे रहे होंगे….परंतु मां के लिए तो वह हर रोज गुजरने वाली त्रासदी ही होगी….उन्हीं त्रासदीभरे क्षणों में मैं दुर्घटनावश मां के भ्रूण में आ गिरा होऊंगा. बिना किसी की कामना, बगैर किसी की वांछा के.

त्रासदी जो मेरे बीजारोपण के क्षणों में थी….रही होगी, बढ़तेबढ़ते वह वट वृक्ष बन चुकी थी. ऐसी त्रासदी को भुला देना ही अच्छा. अगर भुला सकें तो. परंतु कुछ बेशर्म त्रासदियां स्मृति में चिपकी रह जाती हैं. लाख छुड़ाओ पर वे कभी पीछा नहीं छोड़तीं. उन्हें जानबूझकर सहेजने का तो कोई कारण हो नहीं सकता. तो भी बापू मेरी स्मृति में सुरक्षित है. इसलिए कि जिन घटनाओं ने मेरे जीवन को भटकाव और पतन की दिशा दिखाई, उनके पीछे बापू, मेरे जन्मदाता की करतूतों का असर बहुत ही ज्यादा रहा है.

उस रात हम घर न पहुंच सके. बापू मुझे लेकर प्लेटफार्म पर जा पहुंचा. कुछ देर वह यात्रियों की भीड़ में खोया रहा. लेकिन वहां सिपाहियों को घूमते देखकर घबरा गया. फिर बचतेबचाते उस हिस्से की ओर निकल गया जिधर बहुत अंधेरा था. प्लेटफार्म के उस खाली हिस्से का उपयेाग दिनभर मजदूरी करने वाले, रिक्शाचालक, कुली, भिखारी और गेरुए वस्त्रधारी, जीवन से पलायन की घोषणा कर चुके लोग ही करते थे. ऐसे लोगों के बीच खुद को कुछ घंटे छिपाए रहना मुश्किल नहीं था. इतने घंटों के दौरान वह गहरी चुप्पी साधे रहा था. मैं उससे जब भी कोई सवाल करता, वह टाल जाता. ज्यादा कुरेदने पर बुरी तरह डपट देता था. परंतु इतनी सावधानी से कि कोई देखसमझ न ले.

डर अभी तक मेरे दिलोदिमाग पर सवार था. हिंस्र भेड़ियों के समान झपटते हुए दरोगा और दीवान, उनके साथी हवलदार और सिपाही….उन सबके चंगुल में छटपटाती मेरी गरीब, मासूम, कमजोर और उत्पीड़ित मां! बारबार वही दृश्य मेरे दिमाग में घूम जाता. विवश होकर मैं आंखें बंद कर लेता. शायद यह सोचकर कि वे मेरी विस्मृति का हिस्सा बन जाएं. लेकिन बीती घटनाएं मेरे मन में कील की तरह बहुत गहरी धंसी हुई थीं. उन्हें भूल पाना नामुमकिन जैसा था.

रात बढ़ने के साथसाथ एकएक कर सभी सोते चले गए. पर बापू की आंखों से नींद कोसों दूर थी. कुछ देर तक वह एक बैंच का सहारा लेकर बैठा रहा. फिर वहां से हटकर टिन शेड की ओर बढ़ गया. जो गोदाम के आगे बना था, सीमेंट, चूना, बदरपुर जैसी चीजों से अटा हुआ. प्लेटफार्म के आसपास विचरने वाले आवारा पशु और कुत्ते वहीं आराम फरमाते थे. रेलवे अधिकारियों की नजर उस ओर प्रायः कम ही जाती थी. वह सुरक्षित ठिकाना था. पर वहां बैठने या लेटने लायक जगह का अभाव था. बापू शायद ऐसा ही ठिकाना चाहता था. कुछ देर तक वह वहीं पर बैठा रहा.

मुहल्ले में अनजान आदमियों के प्रवेश पर कुत्ते अक्सर भौंका करते थे. प्लेटफार्म पर लेटे हुए कुत्ते तो वैसे भी खतरनाक दिखते थे. उनको देखकर मुझे भय लग रहा था. मगर उन कुत्तों पर हमारे पहुंचने की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. जमीन पर गर्दन टिकाए वे चुपचाप लेटे रहे. मानो हमारी नियति की समानता को समझ चुके हो….कि हम सबकी त्राण एक ही हो….कि वे भी हमारे दुख में साझीदार हों. वहां मच्छरों की भरमार थी. उनकी चिंता किए बिना बापू काफी देर तक वहां बैठा रहा. अचानक वह खड़ा हो गया. यह सोचकर कि उसे अकेला देखकर लोगों को शक भी हो सकता है.

थोड़ी दूर एक चबूतरा बना था. शायद गार्डों और मजदूरों के आराम करने के लिए बनवाया गया हो. वहां कुछ साधु जमा थे. एक साधु कहानी सुना रहा था. आठदस लोग उसके इर्दगिर्द बैठे हुए थे. कुछ नींद का आनंद ले रहे थे. हवा में चरस और गाजें की तीखी गंध मौजूद थी. बापू मुझे लेकर उसी मंडली में शामिल हो गया. वहां मौजूद लोगों में से कुछ ने हम दोनों की ओर देखा. इतनी रात गए अपरिचित लोगों को अपने बीच पाकर उनका चैंकना स्वाभाविक ही था. उसके बाद वे फिर किस्से में लीन हो गए.

कहानियां सुनना मुझे भी बहुत भाता था. मतंग चाचा को अनेक कहानियां याद थीं. अच्छीअच्छी! राजारानी, जादूटोने, यहां तक कि गरीबगुरबों और हंसीमजाक वाली भी. उनका कहानी कहने का अंदाज भी बहुत लुभावना होता था. कई किस्से तो बहुत ही लंबे और मजेदार थे. कईकई रातों तक चलने वाले और रोचक इतने कि उन्हें सुनने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती. उनके प्रायः सभी किस्से मैं सुन चुका था. फिर भी मतंग चाचा के पास फुर्सत होती तो मैं किस्सों की ही फरमाइश करता. वे शुरू में तो कुछ आनाकानी करते. पर एक बार जब शुरू हो जाते तो उनकी जुबान से बस सरस्वती की साधना ही होती थी.

कहानियां तो मां को भी खूब याद थीं. पर सभी छोटीछोटी. शायद जानबूझकर ही वह हमें छोटी कहानियां सुनाती हो. थकी हुई देह और नींद से बोझिल आंखों के साथ लंबी कहानियां सुनाना मां के लिए आसान भी नहीं था. यह हम भी अच्छी तरह जानते थे. संभव है कि वह हमें बच्चे समझकर छोटी कहानियां सुनाती हो, ताकि हम जल्दी से जल्दी सो जाएं. हमें कहानी से ज्यादा आनंद मां की आवाज सुनने में आता था. वह बोलना प्रारंभ करती तो कानों में मिश्रीसी घुल जाती. अगली सुबह तक उसकी मिठास मानस पर अपना असर डाले रहती थी. इसलिए मां जो भी कहानी सुनाना चाहती हम चुपचाप सुनते.

उस समय मैं बेहद थका हुआ था. बापू की आवाज भी डूबीडूबीसी थी….दुःख और तनाव….थकान और चिंताओं से भरी हुई. मैं कहानी का आनंद न ले सका. वह हमारे सिर के ऊपर से होकर गुजरती रही. आराम के बाद देह को सकून मिला तो पेट का खालीपन चुभने लगा. मगर भूख, चिंता, तनाव की मिलीजुली टीस इतनी अधिक थी कि नींद आंखों से दूर रहकर कुलांचे मारती रही.

पूरी रात प्लेटपफार्म के आसपास भटकते हुए बीती….निठल्ले साधुओं और भिखारियों, किस्मकिस्म के टपोरियों की बेमजा कहानी सुनते, ऊंघते और खाली पेट की जलन सहते हुए. इधरउधर भोंडे अंदाज में सोए भिखारियों को देखते. अधनंगे बदन में सोए औरत और मर्द दोनों. रात में कभी किसी भिखारी की नींद उचट जाती और खांसने लगता. इसपर पास सोए भिखारी उसको डांटने लगते. वह कुनमुनाकर सोने का नाटक करने लगता. रात के दो बजे एकाएक हंगामा हो गया. उससे कुछ ही देर पहले साधु ने अपना किस्सा पूरा किया था. उसके बाद सभी साधु सोने के लिए अपनाअपना ठिकाना ढूंढने लगे. उस समय बापू और मैं चबूतरे के एक किनारे पर उकडूं लेटे हुए थे. ज्यादातर भिखारियों ने उस चबूतरे को अपना ठिकाना बनाया हुआ था.

पहचाने जाने के डर से ही बापू ने सोने के लिए भीड़ वाला ठिकाना चुना था. वह जानता था कि जब तक पक्का भरोसा न हो, रात को पुलिस भी सोते हुए साधुओं के पास जाने से बचेगी. हमें लेटे हुए कुछ ही मिनट बीते होंगे कि गोदाम की छत से उतरे पुराने टिन को बिस्तर बनाकर लेटा हुआ एक भिखारी उठकर बैठ गया और जोरजोर से आल्हा गाने लगा. उसके गाने में लय थी और पूरी कथात्मकता. मानो पूरे कथानक को रट रखा हो. उसके गाने का ढंग निराला था. गला भी खास बुरा न था. दिन के समय उसके गायन का आनंद लेने के लिए लोगों का जमघट वहां जुट जाता. परंतु इतनी रात गए भला किसके आने की उम्मीद की जा सकती थी. थकेमांदे लोग जो मच्छरों और झींगुरों की आवाज के बीच नींद के दरवाजे पर दस्तक देने को थे, बेचैन होकर करवट बदलने लगे.

महाराज सो जाइए. सुबह आपसे भजन सुनेंगे.’ नींद में खलल पड़ते देख किसी ने आवाज दी.

जाने दीजिए आपकी ये हसरत कभी पूरी होने वाली नहीं है.’ उस साधु के बराबर बैठी औरत हंसकर बोली. वह उस भिखारी को संभवतः जानती थी,

इन महाराज को उसी समय भैरवी सूझती है, जब पूरी दुनिया नींद में होती है….गाइये महाराज! देखिए आपकी आवाज सुनकर मच्छर भी मदहोश होने लगे हैं.’ औरत की आवाज ने और भी खलल डालने का काम किया.

….चुप हो जा!’ एक साध्वी ने औरत को डपटा.

मैं तो हो गई, अब उसको कर लीजिए.’

आप भी सो जाइए महाराज! सुबह महफिल जमा लीजिएगा.’ भिखारी जो उनके वार्तालाप से बेफिक्र गाए जा रहा था, से उस साधु ने कहा.

दिन में तो ये वैसे भी बोलने वाले नहीं है.’

ऐसा क्या?’

ऐसा ही है. सुबह होते ही तो ये बेचारे गूंगे बन जाएंगे. फिर आल्हा कौन सुनाएगा.’

च्च्चच! यह तो बहुत गलत बात है चाचा. दिन में तो मूक बताकर लोगों का छलते हो और रात को गागाकर लोगों की नींद खराब करते हो.’

वह काम तो पेट के लिए करता हूं, भाई.’ भिखारी ने बिना झिझके बताया.

और अब?’

यह काम अपने मन के लिए कर रहा हूं.’ उस भिखारी ने तपाक से कहा. उसके साथ ही सभी निरुत्तर हो गए.

उस रात मेरे मासूम भाईबहनों पर क्या बीती होगी. मुझे अंदाजा नहीं. मतंग चाचा के रहते उनके पेट की भूख मिटने का भरोसा तो था. परंतु मासूम बच्चों के मांबाप से दूर रहने की तड़फ बहुत ज्यादा थी. बालक होकर भी अपने छोटे भाईबहनों की तड़फ का अंदाजा लगाने में मैं असफल ही रहा. पर पूरी रात मैं मां और भाईबहनों के बारे में सोचता रहा. दिमाग में हर पल बुरेबुरे ख्याल आते रहे. पूरी रात बापू चुप्पी साधे रहा. मैंने उसे कुरेदने का बहुत प्रयास किया. परंतु सब बेकार, निष्फल और अकारथ ही रहा. सुबह होतेहोते सब अपनेअपने स्थान पर लुढ़क गए. आवारा खर्राटे हवा में गूंजने लगे.

कुछेक रातें काली होती हैं. वह भी एक काली ही रात थी. मगर उस रात के रेलवे यार्ड में बिताए गए क्षण सचमुच अनमोल थे. उन पलों की उस समय मुझे जरूरत थी. अगर न मिलते तो संभवतः मैं पागल हो जाता.

सुबह हुई. दिन अगली परीक्षा की तैयारी करने लगा.

*

ठंडी हवा के स्पर्श के बीच, आंखों में भरी नींद अपने तीव्र झोंकों से लोगों को सपनों के हिंडोले में झुला रही थी. हम एकदम नंगी जमीन पर पड़े थे. ऐसे स्थान पर मुझे सोने का अभ्यास न था. पर नींद के जोरदार हमले के बीच मैं पूरी तरह अपनी सुधबुध बिसराकर सोया था.

सहसा बापू उठा. उसने आसमान की ओर देखा. रात लगभग बीत चुकी थी. हालांकि उजाला होने में अभी कुछ समय शेष था. आकाश में मौजूद तारे बारीबारी से डूबते जा रहे थे. प्लेटपफार्म और उसके आसपास चाय की गुमटी वाले दुकानदारों ने अपनी अंगीठियां सुलगा ली थीं. मगर देर तक जागने का अभ्यस्त महानगर अभी तक खर्राटे ले रहा था. आसमान के चेहरे पर गहन कालिमा थी. मानो बीती रात की घटनाओं का साक्षी बनकर वह स्वयं शर्मसार हो रहा हो.

मेरी आंखों में जलन थी. मां का चेहरा बारबार याद आ रहा था. हर पल मेरी बेचैनी बढ़ रही थी. सुबह की होन में एक झपकी ही ले पाया था. उसी दौरान एक छोटासा सपना आंखों की कोर में आ पसरा था. सपने में गिद्धों के झुंड में घिरी एक मरियलसी बकरी को तड़पफतेमिमियाते हुए देखा था. उसी का असर दिमाग पर बाकी था. बापू भी सो नहीं पाया था. वह संभवतः आने वाले दिन के लिए योजना बनाने में व्यस्त था. या फिर उसी बहाने खुद को अभ्यस्त रखने का प्रयास कर रहा था.

प्लेटफार्म पर यात्रियों का आनाजाना बढ़ा तो वह चैतन्य हो गया. मैं कुछ समझ पाऊं इससे पहले ही वह खड़ा हो गया. उसने मुझे हाथ पकड़कर खींचा और अंधेरे का पीछा करते हुए एक ओर बढ़ गया. मेरी देह अकड़ी हुई थी. चलने लायक ताकत बिल्कुल भी नहीं थी. पर बापू का साथ देना जरूरी था. दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था.

सड़क अभी तक सुनसान थी. हवा शांतसहमी. मानो किसी मासूम की मौत का मातम मना रही हो. बापू मेरा हाथ थामे चुपचाप आगे बढ़ रहा था. किधरकहांकिसलिए? जैसे कई प्रश्न, डर और कुशंकाएं मेरे मन में उठ रही थीं. पर बापू ने होठ सीं लिए थे. उसकी मोटी चुप्पी से मैं भी पूछने का साहस खो चुका था.

कुछ रास्तों से गुजरने के बाद लगा कि हम परिचित डगर पर हैं. बापूधाम अब ज्यादा दूर नहीं. हम अपने घर के करीब हैं. इस अनुभूति के साथ ही मन पर छाया बोझ हल्का पड़ने लगा. थकान उड़नछू गई. संभव है मां भी घर लौट आई हो. हमारे आने के बाद तरस खाकर उन्होंने मां को भी छोड़ दिया हो. वैसे भी चोरी का इल्जाम तो बापू पर था. मां तो निर्दोष ठहरी. पुलिस भी इस हकीकत को जानती है. फिर उसे ज्यादा देर क्यों रोकेगी. किस कानून के अंतर्गत रोके रहेगी.

लुटेपिटे अरमान आस के ईंटगारे से एकएक कर फिर जुड़ने का प्रयास कर रहे थ. मेरे छोटेछोटे भाइयों और बहन से मिलने की खुशी भी कम नहीं थी. लग रहा था कि रात बीतने के साथ ही मेरे दुखों का भी अंत हो चुका है. नई सुबह जीवन की खुशियों को ज्यांे की त्यों लौटाने आ रही है. मेरी उत्कंठा पलपल सवाई होती जा रही थी. घर जो मामूलीसी झोपड़ीभर था….जिसका छप्पर बरसात में चूता और आंधीतूफान में खड़खड़ाता था. सामान के नाम पर जिसमें केवल पांचदस बर्तन और मामूली कपड़े थे. चारपाई के नाम पर जहां टूटी झिगोंला खाट थी. वही घर….घर में मां की उपस्थिति की संभावना मेरी खुशी को चार चांद लगा देती थी.

बस्ती में सन्नाटा छाया हुआ था. गली में घुमते ही हवा कुछ सहमीसहमीसी लगी. कि जैसे कोई मातम मना रही हो. बापू सतर्क हो गया. उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया. सहसा गली में बूटों की आवाज गूंजने लगी. सिपाहियों को देखकर बापू घबराया. पुलिस को देखते ही डर मेरे दिलों, दिमाग पर छा चुका था. जान निकलने को थी. तभी वह पलटा और मेरी कलाई थाम कर उल्टे पांव भागने लगा. इस बार मैंने उसका साथ दिया. मां की याद थोड़ी देर के लिए छंटसी गई थी.

बस्ती के कोने पर पहुंचते ही उसने मेरा हाथ छोड़ दिया. मुझे सावधानी से आगे बढ़ने को कहकर वह एक झुग्गी में घुस गया. अकेले होते ही मैं घबरा उठा. बापू जो अभी तक मुझे दुश्मन जैसा लग रहा था, उसी के संरक्षण के लिए मैं आतुर हो उठा. धड़कते दिल और कांपते कदमों से मैं आगे बढ़ा. अंधेरा अब भी था. बस्ती के आसपास होता तो टोकने वाले पहचान जाते. अच्छा हुआ जो मैं सड़क पर था. वहां ऐसा खतरा कम ही था. सड़क पर दूधियों और डबल रोटी बेचने वालों का सिलसिला बढ़ चुका था.

मैं पचीसतीस कदम ही आगे बढ़ा था कि बापू को आते हुए देखा. वह परेशान था. चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. मैं कुछ पूंछू उससे पहले ही उसने मेरा हाथ थामा और विपरीत दिशा में बढ़ गया.

और तेज….कितना समझाकर आया था. फिर भी नहीं मानी. कमीनी मरतेमरते भी लफड़ा कर गई.’ जरूर कुछ अघटितअनहोना घटा है? बापू के कहने का संकेत तो यही था. मुझे विश्वास नहीं हुआ. गालीगलौच की भाषा में बात करना बापू की आदत थी….पर बापू की परेशानी देखकर मैं इतना जरूर समझ गया कि कुछ बुरा हुआ है.

मां! ठीक तो है ना बापू?’ मैंने हांफते हुए सवाल किया.

ठीक होती तो क्या इस तरह भागना पड़ता. हरामजादी खुद तो मरी….मुश्किल मेरे लिए छोड़ गई…..’

तो मां सचमुच ही….उन जालिमों ने मां को मार डाला? सुनते ही मुझे धक्का लगा. पैरों की सारी शक्ति जवाब दे गई. चारों ओर सूनापन छा गया. दुनिया खालीखाली नजर आने लगी. मन में समाया हुआ दुख दुगुना हो गया. जिंदगी हौलनाक दास्तांसी बन गई. लगा कि आसमान बस गिरने ही वाला है. हम किसी भी क्षण कुचल दिए जाएंगे. कोई नहीं बचेगा. मां के न रहने पर किसी के जीने से फायदा ही क्या हे.

पिछले दिन मैं लगातार भागदौड़ में था. भूखा और प्यासा भी. बापू की हालत मुझसे कहीं ज्यादा खराब थी. किंतु स्वार्थ स्वार्थ बहुत बड़ा छलावा होता है. प्राणों पर बन आए तो इंद्रियां अपनी संपूर्ण शक्ति पैरों को सौंपकर निष्क्रियसी हो जाती हैं. यही हाल उस समय मेरा था. यही बापू का. उसके पैरों में गजब की फुर्ती थी. मैं पूरी ताकत से उसका साथ दे रहा था. चलतेचलते यदि बिछड़ने लगता तो वह कमी को दौड़ लगाकर ढांप लेता. तब तक सड़क पर यातायात बढ़ चुका था. पर लोगों के चेहरे डर से पुते हुए थे. पूरा वातावरण सहमा हुआ नजर आ रहा था.

भागते हुए बापू ने बताया कि कल रात थाने में किसी ने दीवान की भी हत्या कर दी थी. फिसलती हुई गोली हवलदार और सिपाही के भी लगी थी. वे दोनों घायल हुए थे. उस समय वे अस्पताल में थे. मुझे मां के बारे में जानने की उत्सुकता थी.

मां को क्या हुआ बापू?’ मैंने दौड़ते हुए पूछा…. बहुचर्चित प्रश्न था जिसे मैं बीते रात से ही कई सवाल घुमा पिफराकर पूछता.

नाम मत उस कुतिया का.’ हरामखोर मर गई. पर मरतेमरते घर से बेघर कर गई.’

पिछले कुछ घंटों में अपने भाईबहन से विलग होने का एहसास मुझे सताने लगा. इस बीच जो डर मेरे दिलोदिमाग पर छाया हुआ था….जो आशंकाएं मेरे दिमाग में उथलपुथल मचाए हुए थीं. जो हौलनाक ख्याल दिमाग में दहशत बनकर समाए हुए थे. वे सब सच हो चुके थे. मां जिसे मैं देवी के समान मानता था. बिना धूपदीपनैवेद्य जिसकी पूजा करता था….जो मेरी जन्मदात्री, जीवनशक्ति, आदर्श, प्रेरणा, ममतामयी जननीµ सभी कुछ थी वह मुझे छोड़ कर जा चुकी थी. मेरा मन हो रहा था कि दहाड़ मारमार कर रोऊं.

मगर यह रोना भी इतना आसान मेहरबान कहां कि आदमी जब जहां दिल की भड़ास निकाल सके. मनुष्य हंस तो चाहे जहां सकता है. परंतु रोने के लिए उसे ऐसा स्थान चाहिए जो उसका अपना भले ही न हो. मगर अपनेपन की वह अनुभूति देता हो. जहां से पर दौड़ते भागते रोना तो असंभव ही था. आंसू मेरे भीतर सूखकर कलेजे में जलन पैदा कर रहे थे. दिल बैठा जा रहा था. मां के साथ जो गुजरी उसके बारे में बापू ही जानता था. मगर वह मुंह खोलने से घबरा रहा था. बापू की चुप्पी मेरे लिए घोर यंत्रणा की वाहक थी. उसकी निष्ठुरता मन में नैराश्यबोध बढ़ा रही थी.

असलियत मुझे थोड़े दिन बाद मालूम पड़ी. वह भी बापू नहीं और लोगों के मुंह से. और सच मानिए असलियत जानकर मां की मौत का दुःख कुछ हल्का ही हुआ था. सुनते ही दिल में गर्व की तरंगे उठने लगी थीं. जीवन में जब से होश संभाला तब से हम शोषित और उत्पीड़ित ही होते आए थे. शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब हमने पलटवार किया हो, या वैसा ख्याल भी दिमाग में आया हो. शाम को शराब के नशे में लौटता हुआ बापू बस्ती में किसी से झगड़ा कर आता अथवा किसी हरकत पर किसी औरत को नाराज कर बैठता था.

मैं यहां पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं बापू चरित्र का गिरा हुआ आदमी नहीं था. पर इसी बात को लेकर बस्ती के मर्दऔरत हमारी झुग्गी के आगे जमा हो जाते थे. गालीगुप्तार भी करते. उस समय मां बापू को संभालकर भीतर ले जाती और उसे लिटाकर बाहर आ जाती. फिर हाथ जोड़कर उन सबसे क्षमायाचना करने लगती थी. मां को हाथ जोड़कर औरतों से माफी मांगते देख मुझे बहुत बुरा लगता. आखिर बापू बस्ती में अकेला ही शराबी नहीं था. और भी बहुत थे. वे सब भी लोगों के गालीगलौच और बदतमीजी करते रहते. पर उनके दरवाजे पर कोई इस तरह शिकायत लेकर या लड़ने नहीं जाता था. फिर बापू के पीछे ही वे क्यों पड़े थे. क्या इसलिए कि बापू मुंहफट और लापरवाह होकर भी मूल रूप से अच्छा आदमी था. या मां जरूरत से ज्यादा भली थी. शायद मां को गिड़गिड़ाते देखने से उनका कोई अहम तुष्ट होता हो.

मैंने मां से कहा भी था कि वह ऐसे लोगों को खरीखरी सुनाकर भगा दिया करे. पर मां मेरी बात पर ध्यान नहीं देती थी. एक दिन जब इसी बात पर मैं मां से झगड़ भी पड़ा. तब उसने बड़े आहत मन से जवाब दिया था

परमात्मा! अपनी गलती मान लेने से कोई छोटा नहीं हो जाता?’

बापू अकेला ही तो शराब नहीं पीता. बस्ती के और लोग भी शराब पीते है. वे लोग भी बदतमीजी करते हैं. उनकी घरवालियों से तो कोई नहीं झगड़ने जाता.’

बेटा कहा उसी से जाता है, जहां कुछ उम्मीद हो. जरूर वे यही मानते हैं कि तेरे पिता अब भी पहले जितनी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं.’

तुम हमेशा बापू का ही पक्ष लेती हो! उनकी कमजोरियों पर बात भी नहीं करने देती.’ मैंने तल्ख होकर कहा था. उस समय बापू, अपने जन्मदाता की बुराई करने पर मां मुझे डांट भी सकती थी. लेकिन मां जैसे दूसरों की सुननेऔर सहने के लिए ही बनी थी

तू कुछ भी कह! पर मुझे नहीं लगता कि दूसरों की गलतियां गिनाने से अपनी कमजोरियों का असर कम हो जाता है.’ मां उसी तरह ठंडे स्वर में उतर देती. जैसे बस्ती वालों के साथसाथ खुद से भी माफी मांग रही हो. उस समय बापू घर पर ही था. ऐसे समय सहसा उग्र हो जाने वाला बापू उस समय चुप्पी साधे रहा. संभवतः मां की किसी बात ने उसके दिल को छुआ हो. कई दिनों तक वह बिना शराब पिए घर लौटा था. बिना भटके, ठीक समय पर वह घर के दरवाजे पर होता. अपना मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए. उस समय मां के चेहरे की चमक देखने लायक होता. थोड़े ही दिनांे में घर का पूरा माहौल बदलने लगा था. लेकिन मन का कच्चा बापू खुद पर अधिक दिनों तक अनुशासन न रख सका.

तो ऐसी थी मेरी मां जो किसी का भी प्रतिकार करना जानती ही न थी. मगर उस रात मां ने जो किसी वह अद्भुत था.

गरीब जब तक सिर झुकाए रहता है, दुनिया उसको नादाननासमझ कहती है.

*

गरीब सिर उठाते ही बागी कहलाने लगता है.

मेरी मां न तो गरीब थी न बागी. वह अपने लिए लड़ना जानती थी.

जिस समय नशे में धुत थानेदार और उसके मुंह लगे सिपाही, दीवान और हवलदार गिद्ध की तरह मां के शरीर के शरीर को नोच रहे थे….उसके कपड़े तारतार हो चुके थे और वह उन शैतानों से बारबार रहम की भीख मांग रही थी. जब मां की करुण पुकार थाने की ऊंची दीवारों से टकराटकरा कर वापस लौट रही थी. ‘परित्राणाय साधुनाम् विनाशायः च दुष्कृताम् की पवित्र भावना, जब ताकत और शराब के नशे के तले रौंदी जा चुकी थी और जबकि मनुष्यता के कुचले जाने, मातृत्व के उत्पीड़न का कुकृत्य चल रहा था. जिस समय वह ईश्वर जिसने कभी यह आश्वासन दिया था कि जबजब धर्म पर संकट छाएगा, सज्जन सताए जाएंगे, तबतब मैं धरती पर अवतार लेकर सबको मुक्ति प्रदान करूंगा, वही….जी हां वही, ईश्वर भक्तिमोद से फूलाअपने आप में मग्न, अपनी ही दुनिया से मुंह मोड़े हुए था. संभव है तब वह उपने उन भक्तों के कल्याण में लीन रहा हो जो धनवान हैं, मोटा चढ़ावा चढाते हैं, और सच में देखा जाए तो जिन्हें किसी बाहरी अनुकंपा की जरूरत ही नहीं है.

ऐसे ही स्वार्थी भक्तों के स्वार्थ में डूबा ईश्वर मेरी गरीब मां की हर फरियाद को अनसुनी करता गया जिस समय शराब के नशे में दरोगा समेत सभी पुलिसकर्मियों की मनुष्यता किसी गहरे….बहुत गहरे गड्ढे में दफन हो चुकी थीजब उसको लगने लगा था कि जिस ईश्वर पर वह विश्वास करती रही है, जिसके अनुकंपा प्राप्त करने के लिए वह बचपन से ही व्रतउपवास रखती आई है, वह पत्थर दिल रखता है….कि उसकी दया और ममता सब दिखावे की चीजें हैं….कि गरीब को अपनी लड़ाई हमेशा अपने दम पर लड़नी पड़ती है….कि उन भेड़ियों से करुणा और मानमर्यादा की भीख मांगना, इंसानियत की आस करना….उनके चारित्रिक बदलाव के बारे में सोचना, रहम के लिए रोनागिड़गिड़ाना कोरी मूर्खता….समय की बदबादी….कि एक गुनाह, बबूल के वृक्ष से सदाबहार आम की कामना करने जैसा है, तब उसने यह जता देना ही उचित समझा कि अब तक उसके बारे में जो सोचा जा रहा है वह गलत है….कि वह स्त्री अवश्य है. मगर अबला नहीं….वह मां बनकर जन्म दे सकती है….पाल सकती है, भार्या बनकर पुरुष का साथ से सकती है तो दुष्ट दलन के लिए जरूरत पड़ने पर काली का रूप भी धारण कर सकती है. वह बहन बनकर अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके लंबे जीवन तथा अपनी सुरक्षा हेतु मनोकामना कर सकती है, तो अमानुष बने हमलावर मनुष्य को दंडित करने के लिए हाथ में हथियार भी उठा सकती है.

जिस समय उन्मादित गिद्ध मां को हड़पने को आतुर थे….वह छटपटाई. सहसा उसकी नजर कोने में रखी दरोगा की कमीज पर पड़ी. उसकी जेब में रखा पिस्तौल साफ नजर आ रहा था. पिस्तौल को देखते ही मां सिंहनीसी बिफरी….कि जैसे दुर्गा का तेज, काली का शौर्य….सरस्वती का बुद्धिविवेक….उसकी देह में समा गया हो….जैसे दुनियाभर की सबलाओं ने क्षणभर के लिए अपनी समस्त शक्तियां उसे सौंप दी हों….कि उन अत्याचारियों को सबक सिखाने के लिए जैसे मौत खुद खांडा संभाले मां की मदद को आ पहुंची हो….

अपनी ओर लपकते भेड़ियों को मां ने जोर का धक्का दिया. अप्रत्याशित प्रत्याक्रमण से वे लड़खड़ाए, कापुरुष! गिरने से बालबाल बचे. इस बीच आगे बढ़कर मां ने वह पिस्तौल उठा लिया. क्षणविशेष में पिस्तौल का थोड़ा दबा….कुछ गोलियां एक साथ चलीं. दीवान और हवलदार की ठौर मृत्यु हो गई. एक गोली दरोगा की जांघ को छीलती हुई निकल गई. पिस्तौल में और गोलियां होती तो मां उस हैवान को ढेर ही कर देती. पर इतने पर ही वह डरपोक दरोगा बेहोश होकर जमीन चाटने लगा. कुछ पल के लिए अभी तक मर्दानगी का ढोंग करते आए नामर्द सिपाहियों की घिग्गी बंध गई. वे थरथर कांपने लगे. लेकिन जैसे ही पिस्तौल की गोलियां समाप्त हुईं, वे सब अकेलीअसहाय और निहत्थी मां पर एक साथ टूट पड़े. चैतरफा मार से वह वहीं ढेर हो गई. लाश सुबह जंगल में पाई गई. एकदम लावारिश….धूल और मिट्टी से सनी हुई.

बताते हैं कि मां के मुंह से निकलने वाला आखिरी शब्द ‘परमात्मा’ ही था. पता नहीं, अंतिम समय में वह मुझे याद कर रही थी या उस ईश्वर को जिसकी निष्ठुरता और उदासीनता उसको मरणासन्न पाकर भी नहीं पिघली थी. संभवतः अपने अंतिम समय में वह अपने परमात्मा और उसी बहाने मुझे भी याद कर रही थी. मैं तो भला क्या मदद करता. परंतु वह परमात्मा जिसको तमाम तरह के अभावों और कष्टभरे दिनों में भी मां ने हमेशा याद किया था. जिसकी पूरे श्रद्धाभाव से वह पूजा करती आई थी….जिसे वह अपना परमहितैषी, अन्नदाता, संरक्षक और सर्वेसर्वा मानती थी, वह भी मां की मदद को नहीं आया. थाने की दीवारंे मां की करुण पुकार सुनसुन कर भी ढही नहीं….धरती जिसे पाप की पराकाष्ठा को देखते ही रसातल में डूब जाना चाहिए थासहीसलामत बनी रही. सूरज जो धरती की ओट से उस दृश्य को देख रहा था….उसे अगले दिन मुंह छिपा लेना चाहिए था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. कुदरत अपना घिनौना खेल बेशर्मी से खेलती रही….धरती, मां की चीत्कारें सुनकर अपना मनमसोती रही….अंबर कानों में अंगुली डाले, अनजान बना रहा….सृष्टि ढही नहीं….प्रलय आई नहीं.

*

मुझे याद है, निष्ठुर बापू ने इसे मां के पूर्व जन्मों का कुफल बताया था. यह सुनकर मेरे दिल पर क्या बीती थी, कितनी पीड़ा हुई थी मुझे, उसको बता पाना तो असंभव ही है. उस समय सारे डरों, मर्यादाओं को बिसराकर मैं बापू पर बुरी तरह बिगड़ पड़ा था. मैंने बापू से कहा भी था कि मां अपने पूर्व जन्मों के पापों का कारण नहीं, बल्कि इसी जन्म के पुण्यों के कारण मारी गई है. उसकी घनी अच्छाइयां ही उसकी दुश्मन बनी हैं. उसकी जान बापू की लापरवाही और खुद उसकी अपनी भलमनसाहत ने ही ली है. मेरी गरीब मां इस स्वार्थी, छलकपट से भरी दुनिया में भी नीतिवान और सच्चरित्र बनी रहना चाहती थी. यही उसका अपराध था. इसी के कारण उसे यह दुनिया असमय ही छोड़नी पड़ी है. मुझे तो लगता है कि मां का बापू के साथ गठबंधन ही, उसके किसी अज्ञात दुष्कर्म की परिणति था.

मां की मौत भी सामान्य मौत कहां है! वह ऐसी मौत नहीं मरी जिसके लिए रोया जाए, आंसू बहाए जाएं. मां तो शहीद हुई थी. उसने संकट में भी धीरज बनाए रखा. आततायियों के आगे समर्पण करने के बजाय बहादुरी के साथ उनका सामना किया. उन अत्याचारियों को ठिकाने लगाने का काम किया, जिन्होंने मां जैसी न जाने कितनी स्त्रियों का जीवन बरबाद किया था, जीवित रहते तो और न जाने कितनी मासूम स्त्रियां उनकी हवस का शिकार बनतीं. मां ने इस धरती से पाप मिटाने का काम किया. वह कार्य किया जिनके लिए देवियों की पूजा की जाती है. पर मां कोई देवी नहीं साधारण स्त्री ही थी. मैं चाहूंगा कि उसको साधारण स्त्री का ही मान दिया जाए. देवत्व भी एक प्रकार का भ्रम या फिर एक नशा है, यदि ऐसा न होता तो मां का ईश्वर उसकी मदद के लिए दौड़ा चला आता. मैं मां की मौत को लेकर कभी दुःखी नहीं हुआ. मगर मातृस्नेह का अभाव मुझे सदैव खलता रहा है.

इस घटना को लेकर समाचारपत्रों में जो छपा वह सचाई के ठीक उलट था. प्रकाशित समाचारों के अनुसार‘चार बदमाश एक स्त्री के साथ छेड़खानी कर रहे थे. तभी दरोगा जी दीवान और दो हवलदारों के साथ उधर से गुजरे. चारों ही बहादुर, अपनी ड्यूटी को समझने वाले कर्मठ पुलिस कर्मचारी थे. एक मजबूरलाचार, गरीब, अकेली और असहाय स्त्री पर अत्याचार होते वे देख न पाए. अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए चारों कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों ने बदमाशों को ललकारा. तभी अंधेरे में छिपे बैठे सातआठ बदमाश और निकल आए. उन्होंने आते ही गोली चला दी. अचानक हुए हमले में दीवान और हवलदार तो वहीं ढेर हो गए. लेकिन दरोगा और हवलदार ने उनका जमकर सामना किया. आमनेसामने की उस लड़ाई में खूब गोलियां चलीं. उनकी बहादुरी देखकर बदमाशों के पांव उखड़ गए. तभी एक गोली दरोगा के पैर में आकर लगी, जिससे हवलदार उन्हें संभालने में लग गया. इस बीच बदमाशों को उस औरत पर हमला करने का अवसर मिल गया. गुस्से में उन्होंने पहले तो औरत को खूब पीटा फिर गोली मार कर हत्या कर दी. फिर वे जंगल की ओर भाग निकले. उनमें से कई घायल भी हुए थे. गोली लगने के बावजूद दरोगा ने हवलदार को लेकर बदमाशों का दूर तक पीछा किया. लेकिन बदमाश कई थे और वे सिर्फ दो. घायल दरोगा के पैर से काफी खून निकल चुका था. हारकर उन्हें वापस लौटना पड़ा.’

इस मनगढ़ंत समाचार को अलगअलग समाचारपत्रों ने भिन्नभिन्न तरीके से छापा था. साथ में पुलिस की ओर से की गई हवाई घोषणा को भी सम्मानजनक स्थान दिया गया. अस्पताल में इलाज करा रहे घायल दरोगा ने भी यह दावा किया था कि पुलिस बदमाशों की तलाश में है. जगहजगह छापे मारे गए है. कुछ सुराग भी मिले हैं. बदमाश जल्दी ही पुलिस की गिरफ्त में होंगे.

पुलिस द्वारा गढ़ी हुई इस कहानी में कई लोच थे. यह कि दीवान और हवलदार को जिस क्षेत्र में ड्यूटी पर दिखाया गया था. वह उनके थानाक्षेत्र से बाहर था. जिस स्थान से मां की लाश बरामद की गई, वहां गोलियां चलने का कोई सबूत नहीं मिला था. पुलिस इस बात का भी कोई जवाब नहीं दे सकी थी कि मृतका की लाश उसके परिजनों को सौंपने के बजाय आननफानन में क्यों जला दी गई. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को क्यों दबा दिया गया. एक गरीबलाचार और अधेड़ औरत से बदमाश क्या पाना चाहते थे? दीवान और हवलदार की लाशों से निकली गोलियां दरोगा के रिवाल्वर से क्यों मेल खाती थीं?

इन सबूतों के आधार पर पुलिस के झूठ को बहुत आसानी से पकड़ा जा सकता था. उसे कठघरे में खड़ा करते हुए मुकदमा चलाया जा सकता था. लेकिन उसके लिए कानून की शरण में जाने, पुलिस द्वारा गढ़ी गई कहानी को चुनौती देने की आवश्यकता थी. यह काम केवल बापू ही कर सकता था. हत्यारे दरोगा और उसके साथी पुलिसकर्मियों में से अनेक को वह पहचानता था. अगर वह कानून की मदद मांगता तो देरसवेर न्याय मिलने की आस भी रहती थी. लेकिन वह तो खुद अपनी जान बचाकर भाग रहा था. मां के हत्यारों के विरुद्ध कार्रवाही करने के बजाए वह उसी को दोषी ठहरा रहा था.

मां को अपने जीवन में केवल छल मिला. पति से भी और ईश्वर से भी.

ओमप्रकाश कश्यप

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