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दंश – दसवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

अगले ही पल दरोगा ने सिपाही को इशारा किया. लड़खड़ाते कदमों से वह हवालात की ओर बढ़ गया. चलतेचलते उसने जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला. हवालात का दरवाजा खुलते ही बापू फौरन बाहर आ गया. वह बहुत कमजोर दिख रहा था. मगर व्यवहार में लापरवाही अब भी बाकी थी. हवालात से निकलने के साथ ही उसने अपने हाथपैरों को झटका. शरीर को हिलाकर गर्मी लाने की कोशिश की. दीवान समेत वहां मौजूद सभी सिपाहियों को सलाम ठोका. दरोगा को सेल्यूट मारा. तभी उसकी नजर मां पर पड़ी.

मां की बदहाली से बेपरवाह वह हाथ नचाता हुआ बोला‘देखा, तू बेकार ही परेशान थी. मैं कहता था ना, यहां सभी अपने आदमी हैं.’

बापू की आवाज में खोखलापन था. लेकिन उसको अपने सामने देख मां की आंखों की चमक लौट आई थी. बापू का हाथ थामने के लिए उसने खड़ी होने का प्रयास किया. लेकिन कमजोर देह साथ न दे सकी.

अब यहां क्या कर रही है. घर चल. बहुत भूख लगी है.’ मां को सहारा देने के बजाय बापू हाथ नचाता हुआ बोला.

यह अभी नहीं जाएगी. तू अगर भूखा है तो रोटियां वहां मेज पर रखी हैं. उठा ले, खुद भी खा और अपने इस पिल्ले को भी खिला दे.’ दीवान गुर्राया.

इस बीच बापू वहां मौजूद हैवानों की आंखों से टपकती भूख को पढ़ चुका था. लेकिन उसकी प्रतिक्रिया हैरान कर देने वाली थी.

समझ गया साब!’ बापू ने रहस्यभरे स्वर में कहा. फिर वह दौड़ता हुआ दूसरे कमरे तक गया. लौटा तो हाथ में एक पैकट के अलावा अंटी में बोतल दबाए था. उसमें उन भेड़ियों के मुंह से बची शराब थी. बाहर आते ही उसने मेरा हाथ थाम लिया. उसने मां की ओर से मुंह फेरा हुआ था. मानो आंख मिलाने से भी डरता हो. वह मुझे बाहर की ओर खींचने लगा.

मैं मां को साथ लेकर चलना चाहता था. जबकि बापू बहुत हड़बड़ी मंे था. उसने झटका देकर मुझे बाहर की ओर खींचा. जैसे ही वह दरवाजे तक पहुंचा, मुझे मां की चीख सुनाई दी. दरोगा भूखे भेड़ियों की तरह मां पर झपटा था. दीवान और सिपाही मिलकर उसपर काबू गांठने में लगे थे. वह बुरी तरह छटपटा रही थी.

साली…! हमने तेरे यार को घंटों संभाल कर रखा….हड्डीपसली समेत वापस जाने दिया. तब भी नखरे करती है.’

दरोगा के बिषबुझे शब्द सुनकर मैं ठिठका. मेरी खुशी रंज में बदल चुकी थी. बल्कि रंज खुशी से कहीं ज्यादा था. मां दरोगा की पकड़ से बच निकलने का पूरा प्रयास कर रही थी. बारबार आजूमिन्नतें, खुशामद किए जा रही थी. हर बार वह इंसानियत, दया, धर्म, गरीबी, बेबसी का वास्ता देती. पर हैवानियत पर उतरा हुआ दरोगा मनमानी करने पर उतारू था. सहसा हम पर उसकी नजर पड़ी. दरवाजे पर हमें खड़ा देखकर वह चिढ़ गया. अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए उसने तड़ातड़ कई तमाचे मां के मुंह पर मारे. वह बेबसी से रोने लगी. मां के साथसाथ मैं भी रोने लगा. उस समय बापू पत्थर की माफिक प्रतिक्रियाविहीन हो गया था.

तू यहां खड़ाखड़ा क्या कर रहा है! चल भाग!’ एक सिपाही ने आकर बापू को ढकेला और जोर से दरवाजा बंद कर लिया. मां के रोने की आवाज मेरा कलेजा चीरने लगी.

साली चुप! मुंह बंद रख. ज्यादा चीखेगीचिल्लायेगी तो उम्रभर अपने रंडापे पर आंसू बहाने पड़ेंगे.’ दरोगा ने धमकाया.

साब चलाऊं गोली?’ एक सिपाही बोला, ‘कल के अखबारों को खबर मिल जाएगी. कह देंगे कि हवालात का दरवाजा तोड़कर भाग रहा था, हरामजादा. पुलिस के साथ झड़प में मारा गया. इस पर दरोगा समेत सभी खीखी कर हंसने लगे.

बापू के कान में ये शब्द पड़ चुके थे. मेरी कलाई थामकर वह पूरी ताकत से बाहर की ओर भागने लगा. बापू की ही क्या कहूं. खुद मैं भी उस समय डर गया था. मां का ख्याल थोड़ी देर के लिए दिमाग से उतर गया. अगले ही क्षण बापू के कदम से कदम मिलाकर मैं भी भाग छूटा.

वह पति जिसपर मां की सुरक्षा का दायित्व था, वह पुत्र जिसे उसने यह सोचकर जन्मा था कि जरूरत पड़ने पर काम आएगा, अपने स्वार्थ से बंधे उसे आततायियों के बीच अकेली छोड़कर भाग निकले थे. मैं मां के मुंह से ऐसी कई कहानियां सुन चुका था, जिनमें अपनों को संकट से बाहर निकालने के लिए लोग जान की बाजी लगा देते हैं. खुद शहीद होकर भी उन्हें सुरक्षित बचा ले जाते हैं.

ऐसे लोग क्या किस्सेकहानियों तक ही सीमित होते हैं.

*

जिंदगी किस्सेकहानियों से कहीं अधिक कुटिल है.

आज जब उस क्षण को याद करता हूं तो खुद से नफरत होने लगती है. बहुत घिन आती है अपने आपसे….अपने स्वार्थ और पलायन की भावना से. बापू को मैंने कभी पसंद नहीं किया. फिर भी, यदि बापू ने ऐसा किया तो उसका कारण था. हमेशा ही वह खुद के लिए जीता रहा. केवल अपनी खातिर सुख बटोरना उसकी जिंदगी का मकसद था. यह बात अलग है कि सुख बापू से लगातार दूर भागता रहा. उसको जिंदगी में कभी भी चैन न मिल सका. तो बापू ने जो भी किया वह उसके स्वभाव का हिस्सा था. उसकी अपनी प्रवृत्ति के सर्वथा अनुकूल. इससे ज्यादा उससे उम्मीद रखना भी बेकार था. लेकिन मैं जो हमेशा बापू को उसकी कायरता, स्वार्थपरता और ढीलेपन के लिए कोसता रहता था, इस घटना के बाद, स्वार्थ और लालच में बापू के बराबर हो गया था.

बेटा और पति….! मां को दोनों से ही धोखा मिला था.

मां थाने में अकेली रह गई थी. उसे भेड़ियों और गिद्धों के हवाले कर हम बाहर निकल आए. मां को निरुपाय अवस्था में देख गिद्ध उसपर चारों ओर से झपट रहे थे. भेड़िए उसकी बोटीबोटी नोंच डालना चाहते थे. उनकी आंखों में बहशत थी और था निरीह प्राणियों पर जुल्म ढाने का पैशाचिक जुनून. दूसरों को दुःखी होते देख अट्टहास करने वाली दानवी हवस. ताकत के मद में डूबकर कानून, नीति, न्याय, मानवीयता सभी कुछ हड़प जाने का उन्मादी आतंक!

बापू…. मां!’ दौड़ते हुए केवल ये दो ही शब्द मेरे मुंह से निकल पाए थे.

आ जाएगी, उसकी चिंता मत कर. भाग….और जोर से भाग.’ बापू ने मेरा हाथ खींचते हुए जोर का झटका दिया. मैं कुछ कह पाऊं उससे पहले ही उसने अपनी गति बढ़ा दी. मेरी सांस धोंकनीसी चल रही थी.

हम थाने से दूर आ चुके थे. चारों ओर घना सन्नाटा था. रहरहकर कुत्तों के भौंकने की आवाज सन्नाटे को भंग कर जाती थी. चारों ओर डर पसरा हुआ था. बापू मेरी कलाई सख्ती से थामे हुए था. भूखेप्यासे उसके शरीर में उस समय न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई थी. बापू का व्यवहार मुझे कतई पसंद न था. उस समय उससे मुझे उतनी ही नफरत हो रही थी, जितनी कि थाने में मौजूद बहशी सिपाहियों से. परंतु मां की तरह मैं भी बेबस था. एक बार मैंने रुकने की कोशिश की तो बापू का जोरदार तमाचा मेरे मुंह पर पड़ा. मैं लड़खड़ाकर गिरने को हुआ. मुझे संभलने का मौका दिए बगैर वह फिर खींचने लगा.

मां की ईश्वर में बड़ी आस्था थी. झुग्गी के दरवाजे के बराबर में थोड़ीसी जगह थी. वहां उसने तुलसी का पौधा रोपा हुआ था. जो थोड़े ही दिनों में काफी फैल चुका था. मां नियमित रूप से उसकी पूजा करती. सुबहशाम जल चढ़ाती. वह चाहती थी कि पूजा में हम बच्चे भी उसका साथ रहें. सच्चे मन से आरती गाएं. बापू से तो उसे कोई उम्मीद ही नहीं थी. हमें भी मां के कर्मकांड में कोई दिलचस्पी न थी. बल्कि उसे भजनपूजन में लगे देखकर हम उसकी खूब हंसी उड़ाते थे. मां का उपहास करने वालों की अगुआई भी प्रायः मैं ही करता था.

मां के नियमित पूजापाठ और कर्मकांड में हमारे लिए अगर कुछ महत्त्वपूर्ण था तो वह था पूजा के बाद बंटने वाला प्रसाद. जिसमें प्रायः गुड़ की डली ही हम बच्चों के हाथ लगती थी. उन दिनों वह भी हमें अमरफल के समान लगती. उसे पाने की ललक सदैव बनी रहती थी. प्रसाद को लेकर हमारे बीच छीनाझपटी भी हो जाती. अक्सर हम मां से कहते कि पूजापाठ और दूसरे कर्मकांडों को छोड़कर केवल प्रसाद बांटना ही जारी रखे. हमारी बातों में व्यंग्य और उपहास दोनों सम्मिलित होते. पर मां न जाने किस मिट्टी की बनी थी. हमारी आशाओं और कामनाओं के विपरीत उसकी पूजा की घड़ियां दिनोंदिन लंबी होती जा रही थीं. यह समझो कि मां के ईश्वर की हमारे घर के भीतर हिस्सेदारी बढ़ती ही जा रही थी.

मां का ईश्वर! जिसे मां, जैसा कि हमारा मानना था, अपने बच्चों से भी अधिक चाहती थी. जो मां के अनुसार सर्वशक्तिमान, दयालु और सर्वव्यापी था. जिसमें अंतहीन बल था, कि दूर से ही आततायी को मजा चखा सकता था. जो इतना दयालु भी था कि संकट के समय अपने भक्तों की मदद के लिए नंगे पांव दौड़ पड़ता. अपने भक्तों को कष्ट में देखना जिसके लिए संभव न था. वही ईश्वर मां को उन नरपिशाचों की मंडली में फंसा देखकर निष्क्रिय और निश्चिंत रहा. मां के कलेजे से उठने वाली मर्मांतक हूक से सुनकर भी उसका कलेजा न पसीजा. जबकि उसे मां के साथसाथ हमारे प्रति भी अनुग्रहशील होना चाहिए था. इसलिए कि कर्मकांड के नाम पर मां ने जो समय ईश्वर को समर्पित किया था, उसमें हम सबका हिस्सा था.

ईश्वर की यह उदासीनता उसके अस्तित्व के आगे सवाल खड़ा करती थी. तो भी हमेशा ईश्वर का उपहास उड़ाने वाला मैं, उस समय ईश्वर की ही शरणागत था. बापू के साथसाथ दौड़ते हुए मैं मां की रक्षा के लिए ईश्वर से ही फरियाद कर रहा था. गिड़गिड़ा रहा था. टेर रहा था कि वह मां की सुने. उसे हैवानों से बचाए. भूखे भेड़ियों के चंगुल से उसकी रक्षा करे.

चौबीस घंटे से मैंने भी कुछ नहीं खाया था. रात जागते हुए और दिन भागदौड़ में बीता था. इस कारण बापू के समान तेज दौड़ पाना मेरे लिए बहुत कठिन था. कम से कम उस समय तो यह मेरे सामथ्र्य से बाहर ही था. इस कारण बापू के साथ दौड़तेदौड़ते मैं उसके हाथ में झूल जाता था. मगर उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी. बापू की इकहरी काया में छिपी ताकत का अंदाजा मुझे पहली बार हो रहा था.

थाना बहुत पीछे छूट चुका था. अभी तक बापू ने पीछे झांकने की कोशिश तक न की थी. बापू मां को इस तरह भुला देगा, उसे संकट में छोड़कर भाग आएगा….पलट कर देखेगा भी नहींµ इसका मुझे पहले अंदाजा न था. इसलिए बापू के साथ रहकर भी मैं उसके प्रति अपनेपन के एहसास से कापफी दूर था. अगर उस समय बापू की पकड़ से छूट जाता तो मैं सीधे मां के पास लौटने का प्रयास करता. यदि पुलिस के डर से यह संभव न होता तो झुग्गी में पहुंचकर अपने मासूम भाईबहनों की सुध लेता. और यदि यह भी मुमकिन न होता तो कोई अनजाना रास्ता पकड़ लेता. बापू के साथ तो हरगिज न जाता.

हम दोनों थाने से चारपांच सौ मीटर ही आगे आए होंगे कि एक जोरदार पटाखासा सुनाई दिया. सन्नाटे में उसकी आवाज बड़ी डरावनी लगी. जिसे सुनकर पेड़ों पर सोये पक्षी फड़फड़ाकर उड़ने लगे. आवाज थाने के भीतर से ही आई थी.

आवाज सुनते ही बापू के कदम जहां के तहां स्थिर हो गए. किंतु इससे पहले कि मैं उस आवाज के बारे में कोई सवाल करूं, बापू मेरा हाथ पकड़कर दुगुनी गति से भागने लगा तेजतेज….और तेज! जैसे कि सैकड़ों भूत हमारे पीछे लगे हों या मौत हमें घेरने चली आ रही हो.

रात भांयभांय कर रही थी. सड़क पर इक्कादुक्का लोग थे. वे भी किसी अनजान डर से प्रेरित होकर घर की ओर भाग रहे थे. बदहवास से….उनका आचरण मशीनी था. मेरे दिमाग में हजारोंहजार झंझावात थे. मन अंतहीन तनावों, सवालों और मुश्किलों से आपूरित था. किंतु जिस वेग से बापू मुझे खींच रहा था, उसमें कुछ भी कह पाना संभव ही नहीं था.

बापू बदहवासी की हालत में था. आपाधापी में पांव किधर पड़ रहे हैं, इसका उसको बोध ही न था. वह थाने से दूर….बहुत दूर निकल जाना चाहता था. जल्दी से जल्दी. एकएक पल उसके लिए कीमती था. उसके साथ दौड़ते हुए मैं कई बार गिरा. मेरे घुटने छिल चुके थे. टांगों में दर्द हो रहा था. सांसों पर नियंत्रण रख पाना कठिन था. मगर बापू पर स्वार्थ सवार था. दूसरे की परेशानियों से उसे कोई मतलब ही नहीं था. मां और मेरे छोटेछोटे भाईबहनों को भी उसने भुला दिया था. उनके बारे में एक सवाल भी उसने नहीं किया था. उसे फिक्र थी तो बस अपनी जान की. अपनी आजादी की. डर था तो अपने ऊपर आए संकट का. बापू की कलाइयों में कैद मैं, उसके साथ भागते रहने को मजबूर था.

बहुत बाद में सुना कि आदमी मूलतः स्वार्थी होता है. वह स्वार्थी ही बने रहना चाहता है. सारे नीतिविधान, कायदे कानून वह अपने स्वार्थ की रक्षा के लिए बुनताबनाता है. पूरी दुनिया के केंद्र में वह खुद होता है और वहीं बने रहना चाहता है. बाकी दुनिया के बारे में सोचता है कि वह उसी की परिक्रमा कर रही है. स्वार्थलालसा में दूसरों को भुला देना चाहता है. परमार्थी वह अपने हितों की रक्षा के लिए बनता है. जब तक अपेक्षाकृत बड़े और स्थायी स्वार्थ की लालसा और उसको पाने का भरोसा उसको न होµ वह अपने तात्कालिक, छोटेछोटे स्वार्थों को नहीं छोड़ता.

इस सचाई के साथ जोड़कर देखता हूं तो बापू की कमजोरियों से ध्यान हट जाता है. जो भी हो, यदि ऐसा है तो बापू दुनिया का साधारणतम इंसान था. जिसमें अच्छाई खोजना मूर्खता ही कही जाएगी.

ओमप्रकाश कश्यप

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