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दंश – आठवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

शायद गलत कहा मैंने. गलतफहमियां पूरे-पूरे परिवार निगल जाती हैं, संभलने का कोई मौका दिए बिना.

चोर के पकड़े जाने का समाचार अखबार में छपा. दरोगा के फोटो के साथ. खबर मिलते ही बड़ा दरोगा थाने आ धमका. बापू का अंगूठा लगा बयान पढ़कर उसने नए दरोगा की पीठ थपथपाई….ऊपर से शाबासी दिलवाने….तरक्की की बात चलाने का भी आश्वासन दिया. दरोगा कामयाबी के सातवें आसमान पर था. शांत मन से उसने वह सुना जो बड़े दरोगा ने कहा था. लेकिन अपनी खुशी प्रकट किए बिना आगे की योजना बनाने लगा. उसकी महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी थीं. उनके लिए ऐसे कई कांड करने जरूरी थे. अब उसे नए शिकार की योजना बनानी थी. थाने के सभी सिपाही खुश थे. थोड़ा-बहुत ईनाम-शबासी उन्हें भी मिलने की उम्मीद थी. अपने कारनामे की महत्ता दर्शाने के लिए सब बढ़-चढ़कर बयान कर रहे थे. कई जुबानों की सवारी गांठता हुआ झूठ धीरे-धीरे सच में बदलता जा रहा था.

उस दिन पूरे शहर में पुलिस कारनामा चर्चा में बना रहा. माल की बरामदगी अब भी नहीं हुई थी. उसकी किसी को चिंता भी नहीं थी. खुद दुकानदार ही माल की बरामदगी से बचना चाहता था. बताते हैं कि उसे बीमा कंपनी से मोटी रकम मिलने वाली थी. दुकान में रखी गई घड़ियां उधार आई थीं. सबकुछ चोरी होने की हवा उड़ाकर सप्लायर का रुपया भी रोका जा सकता था. डबल फायदा था, जो माल बरामद होने के बाद खटाई में पड़ सकता था. पुलिस साथ दे इसके लिए दुकानदार बीमा की रकम में से कमीशन देने को भी तैयार था. दरोगा के दोनों हाथों में लड्डू थे.

सारी बातें हमारे कानों तक छन-छन कर पहुंच रही थीं. हर बार मां के कलेजे पर छुरी-सी चलती. हर खबर के साथ वह बुरी तरह छटपटा उठती….पल-पल उसके दिल में शूल-सा गढ़ता जा रहा था. हर तड़फ के बाद वह बापू को छुड़ा लाने के लिए नए सिरे से भाग-दौड़ करने लगती. यह बात अलग है कि हर बार निराशा ही उसके हाथ लगती थी. उम्मीद की किरन नजर तो आती, मगर प्रयास शुरू करते ही अंधेरे में गुम हो जाती. इसी के साथ उसके भीतर की टूटन कुछ और बढ़ जाती. घर से बाहर निकलते ही ऐसे अपशकुन घटते कि मां का सारा जोश ठंडा पड़ने लगता था.

चौथे दिन, बापू को छुड़ाने के लिए मां थाने भी पहुंची थी. उस समय सूरज सिर के ठीक ऊपर था. वहां जाकर वह बापू से भी मिली. तब बापू ने उल्टे मां को धमकाकर उसी समय घर लौट जाने को कहा. बड़ों के मामले में न पड़ने की हिदायत भी दी. बापू की बातें सुनकर मां एक बार तो सन्न रह गई थी. उसको ऐसी उम्मीद हरगिज न थी. परंतु इसे बापू की निराशा का परिणाम समझकर मां ने उसे भुला दिया.

पिछले छतीस घंटों में वह नए दरोगा की क्रूरता के अनेक किस्से सुन चुकी थी. उसका नाम सुनते ही मां का बदन भय से सिहरने लगता था. नया दरोगा मां को यमराज का सहोदर लगता. भारी-भरकम डील डौल, उभरे हुए पेट और स्याह काले रंग के कारण वह था भी वही. त्रासदी यह है कि उस समय वही थाने का इंचार्ज था. उसी की देखरेख में बापू बंद था. इस कारण मां उस देवता के आगे अनगिनत बार रो और गिड़गिड़ा चुकी थी.

मां बहुत डरी हुई थी. वह बापू को पल-भर भी थाने में रहने न देना चाहती थी. पर बेचारी बेबस थी. बापू को हवालात में रहते हुए दो रातें बीत चुकी थीं. दरोगा ने जानबूझकर बापू को अदालत ले जाने से रोका था. न जाने कौन-सी नई साजिश उसके दिमाग में चल रही थी. अपने कौन से नए स्वार्थ की पूर्ति चाहता था. उस दिन छुट्टी का दिन होने के कारण अदालतें बंद थीं. ऐसी हालत में जमानत केवल थाने में संभव थी. चारों ओर से निराश हो चुकी मां को केवल दरोगा की दरियादिली का ही सहारा था. जो उसमें सिरे से गायब थी.

बापू को छुड़ाने की कोशिश में मां थाने के छोटे-बड़े हरेक कर्मचारी के आगे रोई-गिड़गिड़ाई. आंचल पसार-पसार कर बापू को रिहा कर देने की फरियाद की. उसे बेकसूर बताते हुए बार-बार उन भेड़ियों के आगे अरदास की. दरोगा से लेकर सिपाहियों तक के पैरों में लेटी. दया-धर्म और अपनी बदहाली का वास्ता देकर रहम की भीख मांगी. मगर नया दरोगा न पसीजा. हवलदार को भी दया न आई. हर बार वह एक ही बात कहता—
‘जुर्म का इकबाल कर चुका है, तेरा खसम. मामला अदालत में जाएगा. मैं कुछ भी नहीं कर सकता.’
‘साब, यहां-वहां से जूते-चप्पल जैसी मामूली चीजें चुराने वाला मेरा आदमी इतनी बड़ी चोरी हरगिज नहीं सकता?’
‘चुप रह….मैं जानता हूं कि तुझ जैसी छिनाल का मर्द क्या नहीं कर सकता.’ दरोगा दुत्कारे उससे पहले ही सिपाही बोल पड़ा.
‘हुजूर! साली नौटंकी कर रही है. खसम जब हर रोज माल लाता होगा तो चुपचाप सहेज लेती होती. अबकी बार धरा गया है तो हरामजादी यहां रो-झींक रही है.’ दूसरा सिपाही बोला.
‘इन लोगों की आदत ही ऐसी होती है. हराम के माल पर मजे उड़ाएंगे. पकड़े जाएंगे तो इनकी लुगाइयां निकल आएंगी, पतिव्रत धर्म निभाने.’
उस समय जिसे देखो वही मां पर फब्तियां कस रहा था.
‘इस बार धरा गया है तो आगे-पीछे की सब निकाल दूंगा….मेरे इलाके में हाथ डालकर इसने अच्छा नहीं किया.’ दरोगा अंगूठा लगवाते समय बापू के सामने कहे गए अपने ही शब्द भूल चुका था.

एक तरह से वह अपनी मंशा जता चुका था. मां की उम्मीदें टूटती जा रही थीं. पिछला दिन उसने परेशानी में बिताया था. सिवाय पानी के पेट में कुछ न गया था. वह भी जब रोते-पीटते बेहोश-सी होने लगती तो मैं पिला देता था. पूरा दिन भागम-भाग में बीता था. ऊपर से खाली पेट मां के होंठ पपड़ा गए थे. तो भी मां को अपनी भूख प्यास की फिक्र न थी. मैं मां के साथ था. उसकी बदहाली देखकर मेरा मन बुरी तरह से रो रहा था. मां जितना सहनशील भी मैं नहीं था. भूख मेरी भी अंतड़ियों को धीरे-धीरे कतर रही थी. परंतु ज्यों ही मां के चेहरे पर नजर आती, मेरी भूख-प्यास सब हवा हो जाती थी.

उस दिन का बीतना तपते बीहड़, रेगिस्तान में नाउम्मीदियों के साथ भूख-प्यासे रहकर लक्ष्यविहीन सफर करने जैसा था. पल-पल घिसटते हुए शाम हो गई. मां की हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी. मेरी कुछ समझ में न आता था कि क्या करूं. बापू को तो हम ऐसे हालात में देखते आए थे. इसलिए उसकी मुझे खास चिंता नहीं थी. कोशिश थी कि मां किसी प्रकार घर लौटने के लिए राजी हो जाए. परंतु मां कहां मानने वाली थी!

रात का आगमन मुझे अक्सर अच्छा लगता था. इसीलिए कि वह मां के लिए आराम के क्षण लेकर आती थी. दिन-भर की भाग-दौड़, खींचातानी से लस्त-पस्त मां खुद को धरती मां की बाहों में सौंप देती. वही अपनी करुणा के परस से मां को सुकून देती. हमारे लिए भी मां का सानिध्य पाने का यही अवसर होता. बापू घर होता तो वह अपनी टूटी-झिंगली खाट पर लेटते ही खर्राटे भरने लगता था. हम मां के साथ देर तब बात करते रहते. हालांकि मां की थकान से भारी आंखों को नींद कुछ ज्यादा ही परेशान करती थी. तो भी हमारी खुशी के लिए वह नींद और थकान दोनों से जूझती. कभी-कभी हमारे बार-बार अनुरोध पर छोटी-मोटी कहानी भी सुना देती थी. हमें सुला देने के बाद ही वह नींद की ओर प्रयाण करती थी.
*

थाने की वह रात मां की जिंदगी की सबसे निर्मम और कठोर रात थी. निष्ठुर और भयावह भी. उसके संयम की कसौटी….डरावनी, वीभत्स, निर्दयी और राक्षसी निशा! ईश्वर पर मैंने कभी भरोसा नहीं किया. लेकिन यदि वह कहीं है और उसमें लोगों के लिए कुछ करने का सामथ्र्य है, यदि वह सचमुच कुछ अच्छा करना चाहता है, तो मैं उससे हर बार एक ही प्रार्थना करूंगा कि वह दुश्मन को भी ऐसी बेदिल-बेरहम-बेमुरव्वत रात न दे. उस पिशाचिनी रात में जो घटा उसने मेरे मन पर सवार अनगिनत रातों के अनगिनत अहसानों को भुला दिया.

रात्रि नौ बजे के बाद का समय सिपाहियों के लिए दिन-भर की कमाई के बंटवारे और मौज-मस्ती का होता. उगाही के लिए गए सिपाही घर लौटने से पहले मूड फ्रेश करने के बहाने थाने लौट आते. दूसरी पाली के सिपाही ड्यूटी पूरी होने पर अपना हिस्सा ले जल्दी-जल्दी घर जाने को होते. एकदम अफरा-तफरी का-सा माहौल होता. इसी समय नए शिकार फंसाए जाते. कमाई पर नजर रखने के लिए दरोगा थाने में ही पड़ाव डाले रहता. यही समय होता जब थाने में असली समाजवाद नजर आता. ऊंच-नीच का भेद….पद और प्रतिष्ठा, अफसरशाही की नाज-नखरों के साथ इंसानियत और नैतिकताएं भी दम तोड़ लेतीं. थाना बहुत बड़े हम्माम में बदल जाता. जिसमें एकाध खब्ती के सिवाय बाकी सब नंगे नजर आते. जो नंगा होने से इंकार करता उसको नंगा करने के तमाम प्रयास किए जाते. फिर भी नहीं मानता तो उसको ‘बिरादरी बाहर’ कर दिया जाता. उन लोगों को ऐसे स्थान पर तैनात किया जाता, जिससे वे थाने के ‘जीवंत’ माहौल में व्यवधान न डाल सकें.

उस रात थाने की घड़ी ने जैसे ही नौ बजाए, नया दरोगा अपनी कुल असलियत पर आ गया. कमीज उतारकर उसने एक सिपाही की ओर उछाल दी. पंेट के बटन खोलकर शरीर को ढीला किया. मुंह लगे दीवान ने भी वर्दी से छुटकारा पाकर लुंगी लपेट ली. अपनी जिम्मेदारी समझकर सिपाही सेवा जुटाने में लग गए. कुछ गिलास और बर्फ वगैरह के इंतजाम के लिए भाग-दौड़ करने लगे. डेगची तो घंटा-भर पहले ही चढ़ चुकी थी….उसमें कुछ खदक रहा था. एक सिपाही की जिम्मेदारी चूल्हे में उपले सरकाते रहने की थी. जिससे साहब को गरम माल परोसा जा सके. पेंट को घुटनों तक चढ़ाकर वह अपनी ड्यूटी को अंजाम दे रहा था.

महफिल की रंगीनियत बनाए रखने के लिए उस समय थाने में वह सब कुछ था, जो ऐसे अवसरों के लिए जरूरी माना जाता है. फिर भी नया दरोगा बेचैन था. कोई कमी थी जो उसे बार-बार खटक रही थी. कुछ था जिसकी उसे तलाश थी. मन में छिपी अकुलाहट उसके हाव-भाव में उतर आई थी. बार-बार वह गर्दन घुमाकर इधर-उधर देखता. हवालात के सींखचों से गुजरती हुई उसकी उदास निगाह कुछ देर वहां ठिठकती. फिर गहरी निराशा लिए आगे बढ़ जाती. जनाना हवालात में वीरानी देखकर उसका दुख सवाया हो जाता—मन झुंझलाहट से भर जाता था. जुबान कड़बी होकर गालियां निकालने लगती.

दीवान की हालत भी कुछ ऐसी ही थी. उसके अपने मन का चैन दरोगा को दुखी देखकर गायब था. वह उसको खुश देखना चाहता था. किसी भी तरह. इसके लिए वह एक के बाद एक मजेदार चुटकुले सुनाए जा रहा था. जो ऐसे अवसरों के लिए खासतौर पर याद रखे जाते थे. बीच-बीच में उसके मुंह से निकलती वयस्क किस्म की गालियां, शोरबे के साथ शराब के घूंट का काम देती थीं. उसे गहरा अपफसोस था कि थाना आज तर माल के बिना सूना पड़ा है.

कानूनन महिला अपराधियों को रात के वक्त थाने में रखने की इजाजत नहीं थी. पर ऐसे कानून वह हमेशा अपने ‘चूतड़ के नीचे’ दबाकर रखता. अपनी झुंझलाहट में दीवान दरोगा को छोड़कर बाकी सभी सिपाहियों और पुलिसवालों की मां-बहनों-बेटियों के साथ बालिग संबंधों का बखान कर रहा था. ऐसे संबंध जो केवल नशे की हालत में ही क्षम्य थे. नया दरोगा भी उसके सुर में सुर मिला रहा था. उसे उस बात का भारी रंज था कि इलाके के एसपी की मां…. है, तभी उस ‘सुअरजाद’ ने उसे इसे सूखे इलाके में ला पटका है. सुअरजाद नई गाली थी, जिसे दरोगा ने मुंह लगे दीवान के मुंह से सुना था. दीवान ने संभवतः वह स्वयं ईजाद की थी.

दीवान उस समय लुंगी में था. किंतु था लुंगी से बाहर. बार-बार वह अपने साथियों से रिवाल्वर मांग रहा था ताकि उस मादर…. एसपी के सीने में तड़ातड़ गोलियां उतार सके. खुंटी पर टंगी दरोगा की रिवाल्वर उसकी नजर में आ ही नहीं रही थी. सिपाही परेशान थे. अपनी किस्मत को रो रहे थे. नए दरोगा ने आने के साथ ही इलाके में उनकी ‘इज्जत’ बना दी थी. इसलिए साहब को खुश करने के लिए उन्होंने ‘फस्सक्लास डिनर’ का इंतजाम किया था. पर साहब उस ओर से मुंह फेरे हुए था. वह करवट बदलकर बार-बार अपनी असंतुष्टि दर्शा रहा था. अपनी-अपनी तरह वे दरोगा को समझाने का प्रयास भी कर रहे थे. मगर एक के बाद एक, सारी तरकीबें फेल हो रही थीं.

‘पिछला थाना इससे बहुत अच्छा था. रेडलाइट एरिया में….क्या जोरदार आमदनी थी. ऊपर से जिस मादर….को फोन करता वही भागी चली आती थी.’ नया दरोगा बड़बड़ाया. मीट मदिरा की गरमी अपना असर दिखाने लगी. आंखों में नशे के डोरे गहरे लाल होते जा रहे थे.

‘किसकी याद दिला दी, जनाब! तीन साल मैंने भी उसी थाने में बिताए थे. उन दिनों वहां कमलाबाई के बड़े चर्चे थे. उसकी पतली कमर, कमसिन जवानी….और गले में तो जालिम के इतना नशा था कि बस पूछो मत. ऊपर से क्या नांचती थी….हर ठुमके पर कलेजा निकल-निकल पड़ता था. वाह! क्या मजे के दिन थे साब!’ नशे से झूमता हुआ दीवान, दरोगा के सुर में सुर मिलाता हुआ बोला. दरोगा से संभल पाना कठिन हो गया. आवेश में वह पछाड़ खाने लगा—

‘हाय! किस जालिम अदा का नाम ले लिया तूने. औरत क्या….छलकती हुई दारू थी. कई बार उसको नाचते हुए देख चुका हूं….मानो आंधी-तूफान में पिपलिया डोल रही हो, ऐसे नाचती थी जालिम. आवाज मीठी और इतनी पैनी थी कि दिल को छीलती चली जाती. मुझे तो इतना चाहती थी कि पूछो मत. जैसे ही खबर करो….सबकुछ छोड़-छाड़कर चली आती थी. उसके तपते होठों की गर्मी ऐसी थी कि पत्थर को भी पिघलाकर रख दें.’
‘एकदम सही फरमाया आपने….!’
‘साब! आजकल उस इलाके में केसरबाई का नाम चलता है. वो भी गजब की डांसर है हुजूर! आंखें शराब से भी नशीली.’ एक कांस्टेबल ने शायरी के अंदाज में कहा.
‘तुझे कैसे मालूम?’
‘अपने एससी साहब उसके खास मुरीद हैं. कभी-कभी बंगले पर ही बुलवा लेते हैं. वहीं पर उसकी एक झलक देखी है, साहब.’
‘चुप बे….हरामखोर!’ दीवान जानता था कि नए दरोगा को एसपी पसंद नहीं है. इसलिए कांस्टेबल को फौरन डपट दिया. फिर गिलास उठाकर कलेजा तर करने के बाद बोला—
‘दूसरे की सेज का बखान सुनने से अपुन की नसें ढीली नहीं होतीं. तू खुद क्या कर सकता है, यह बोल?’
कांस्टेबल बगले झांकने लगा. तब नए दरोगा ने कहा—‘जाने दे यार! जिस केसरबाई का यह नाम ले रहा है, उसे मैं अच्छी तरह से जानता हूं. चार महीने पहले तक वह मेरे एक फोन पर उड़ी चली आती थी. पूरी-पूरी रात उसको बगल में लेकर सोया हूं. आजकल तो तुम जैसे निकम्मों के बीच फंसा हूं जो पुलिस की वर्दी के नाम पर बट्टा लगा रहे हैं. साले….मच्छर की औलाद….नामर्द….शिखंडी!’
बात चुनौती वाली थी. कम से कम वहां मौजूद एक सिपाही को तो यही लगा. पृथ्वी वीरों से खाली नहीं है. कुछ बहादुर तो थाने में ही विद्यमान हैं. बस वे ज्यादा बड़-बड़ नहीं करते. लेकिन एक इशारे पर मुंह मांगी चीज हाजिर करने का हौसला रखते हैंµ कुछ ऐसे ही अटल विश्वास के साथ वह उठकर खड़ा हो गया. उस समय मंडली में सबसे पीछे बैठा था वह. नशे से लड़खड़ाते….दूसरों को हटाकर रास्ता बनाते, गिरते-पड़ते….उनके हाथ-पैरों को कुचलते हुए वह दरोगा के आगे पहुंचा और छाती ठोकते हुए बजरंगी अंदाज में बोला—

‘आप बस आदेश दें सिरीमान! घंटे-भर में छिनाल केसरबाई को उसके पलंग समेत न उठा लाऊं तो कहना.’
उसके जोश पर इक्का-दुक्का तालियां बजीं. कुछ ने दरोगा से आजमा लेने को कहा. कुछ को लगा कि इस बंडलबाज की बातों में साब को नहीं आना चाहिए. पर दरोगा की व्याकुलता सवाई हो गई. उसे रोकते हुए बोला—
‘रहने दे….तू कुछ नहीं कर पाएगा. इस समय वह हरामजादा एसपी खुद केसरबाई की बगल में पड़ा होगा. पहले तो वह उसको कोठी में बुलवाता था. पर जब से अखबारों में चर्चा चली तब से वह सादा कपड़ों में खुद उसके कोठे पर पहुंच जाता है.’

दरोगा के मुंह से आह निकली. वहां मौजूद सारे पुलिसिए उसके गम से गमगीन हो गए. दारू का नशा, मीट की गर्मी, पुलिस की नौकरी का गुरूर, थोड़ी देर के लिए सब ठंडे पड़ गए. मगर अनुभवी दीवान दूसरों से जल्दी ही संभल गया. बहुत दिनों से वह तरक्की के ख्वाब देख रहा था. वह स्वयं को एन्काउंटर विशेषज्ञ मानता था. पिछले दरोगा से कई बार कहा था कि साथ दे. दो-तीन आदमी टपका देने से महानगर हल्का नहीं हो जाएगा. मगर वह डरपोक था. नए दरोगा ने उम्मीद बढ़ाई है.

‘आप मायूस न हों साहब! मुझ पर भरोसा रखें. यहां भी एक से एक खूबसूरत हसीनाएं हैं. जिनके आगे केसरबाई कुछ भी नहीं है. कल से वे आपकी सेवा में हाजिर हो जाया करेंगी. अभी तो आप अंगूर की बेटी से काम चलाएं. देखिए अगला जाम कितनी बेसब्री से आपके होठों तक जाने का इंतजार कर रहा है. इसके पहलू में दुनिया के हर रंजो-गम का इलाज है.’

नए दरोगा ने गिलास थाम लिया. तनाव अब भी उसके चेहरे पर था. उबरने के लिए उसने शराब का हल्का-सा घूंट भरा. फिर मीट का टुकड़ा उठाकर मुंह में डालकर घुमाया. चेहरे पर संतुष्टि देख हवलदार और सिपाहियों को तसल्ली हुई. उसकी देखा-देखी बाकी भी पीने-खाने लगे. एक बोतल झटके में खत्म हो गई….दूसरी खुली तो पहले राउंड में वह भी आधी से ज्यादा खाली. तीसरी खुलने की प्रतीक्षा में आ गई.

थाना मधुशाला में बदल चुका था. ऐसे में उचित तो यही होता कि बापू को उसके हाल पर छोड़कर मां वापस लौट जाती. मैं तो कब से इसके लिए कोशिश कर रहा था. पर वह भारी ऊहापोह से गुजर रही थी. उम्मीदें दम तोड़ चुकी थीं, मगर बापू के हवालात में रहते थाने से बाहर भी उसे कुछ नहीं सूझ रहा था. उधर थाने के भीतर से आती आवाजें सुनकर उसके मन का डर भी आसमान चढ़ रहा था. जिसे मैं उसके चेहरे पर शनै-शनै उभरती पीड़ा, घटती-बढ़ती बेचैनी और घनघोर उदासी के रूप में देख रहा था.
*

मां का पूरा दिन भागम-भाग में बीता था. कमजोरी से उसका सिर चकरा रहा था. और ज्यादा देर ऐसी हालत में रहने से उसकी हालत बिगड़ सकती हैµइसलिए मैंने मौका देखकर उससे एक बार फिर घर चलने की प्रार्थना की. परंतु वह थाने की दीवार से चिपकी रही. उसकी वीरान दृष्टि विराट शून्य में ठहरी हुई थीं….फटी-फटी आंखों से न जाने क्या निहार रही थी वह. मैं उसके मन का अंदाजा लगा सकता था. हालांकि उसके मन की थाह लेने….उसकी पीड़ा को महसूस करने की शक्ति मुझमें बिल्कुल नहीं थी. इसीलिए मैंने उसे झिझोंड़ा. घर चलने का आग्रह फिर दोहराया. परंतु उसने कोई उत्तर न दिया. उसका चेहरा सूखा और पपड़ाया हुआ था. बाल अस्त-व्यस्त….आंखों में बसी थी, गहरी-घनघोर उदासी और मर्मांतक पीड़ा.

अपने आप में वह इतनी डूबी हुई थी कि भीतर से आने वाली तेज आवाजें, फूहड़ टिप्पणियां, गाली-गलौंच भी उसे विचलित नहीं कर पा रही थीं. खुद की भूख-प्यास का भी उस पर असर नहीं था. उसे अगर चिंता थी तो बापू की. पुलिसवाले कई बार उसे दुत्कार चुके थे. अपमान और जलालत की तो कोई सीमा ही नहीं थी. लेकिन मां उन सबसे बेअसर थी. उसके प्राण, इज्जत, मान-मर्यादा, यहां तक कि सारी अनुभूतियां भी बापू में समाई हुई थीं.

उधर रात जैसे-जैसे गहरा रही थी, बापू की रिहाई की उम्मीद भी टूटती जा रही थी. घर पर तीन भाई-बहन और भी थे. जब भी मुझे उनका ध्यान आता, मन घबराने लगता था. आवाज भरभराने लगती थी. अपने मासूम बच्चों की याद आने पर मां के दिल पर क्या गुजरती होगी….क्या वह एक पल के लिए भी उन्हें भुला पाई होगी? यदि नहीं तो अपने भूखे-प्यासे बच्चों को लावारिस की तरह घर छोड़ आने पर वह कितनी तड़फ रही होगी, इसका अनुमान लगाने के लिए मेरे पास कोई रास्ता न था. यह कैसी अनहोनी है कि पति के लिए एक मां अपने बच्चों को भुलाए बैठी थी. और जिस आदमी के लिए वह इस अंतहीन तनाव से गुजर रही थी….जीवित होकर भी लाश जैसी बनी थी….जिसके लिए उसे अपने प्राणों तक की भी परवाह नहीं थी, वह हालात से बेखबर, हवालात में मच्छरों से जूझता हुआ, लगभग निश्चिंत होकर सोने का प्रयास कर रहा था.

मैं भूख से बेहाल था. कई बार अंतड़ियां इस तरह ऐंठने लगतीं कि प्राण गले तक आ जाते. आंखों के आगे लाल-नीले तारे झिलमिलाने लगते. थाने में पड़े रहना, सिपाहियों के पांव पड़ना, रोना-गिड़गिड़ाना, आरजू-मिन्नतें करनाµयह सब मुझको बेकार लग रहा था. पागलपन से भरा….औचित्यविहीन कर्म जैसा. तो भी मां को थाने में अकेली छोड़कर आना मेरे लिए संभव न था. हां, कभी-कभी अपनी झुंझलाहट उतारने के लिए मैं मां पर बिगड़ भी पड़ता था. और मां, वह मेरी झिड़कियों को भी उसी तरह चुपचाप सह लेती थी….जैसे कि वह बापू की लापरवाहियों को सहती आई थी और अब पड़ोसियों के लांछनों ….पुलिस की झिड़कियों को सहे जा रही थी.

बापू को हवालात में बंद हुए चौबीस घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका था. लेकिन बापूधाम से कोई हमारी सुध लेने नहीं आया था. सिवाय मतंग चाचा और पड़ोस की दो-चार औरतों के. जिन आदमियों के साथ बापू का रोज का उठना-बैठना था….खाना और पीना-पिलाना था, उन पर उनकी पत्नियों ने सख्त पाबंदी लगा दी थी. पुलिस ने जिस तरह निर्दोष बापू को दबोच लिया है, वैसे ही कहीं उन्हें भी….चोर का साथी मानकर बंद न कर लिया जाए. यह बात उन्हें डराने के लिए पर्याप्त थी. यही सोचकर मर्द भी मदद के लिए घर से बाहर निकलने से कतरा रहे थे. उनकी औरतें एक तरह से उन्हीं की इच्छा का पालन कर रही थीं. जो दो-चार औरतें आई थीं वे मां के पास बैठकर, कुछ देर के लिए तसल्ली देकर वापस लौट चुकी थीं. शायद उन्हें उनके पतियों ने ही पठाया हो. औरतजात को हवालात में बंद करने की संभावना कम जो थी.

मतंग चाचा फकीरी करते थे. हवालात-थाने का उन्हें क्या डर! पर उनकी सुनता भी कौन. काफी देर तक तो गेट पर खड़ा चैकीदारी ही उन्हें दुत्कारता रहा. भीतर आए तो थानेदार ने बापू से मिलने ही नहीं दिया. मां उनसे पर्दा करती थी. संकट के समय भी संस्कार आड़े आए. निराशा से भरे वे दूर से ही मां को तसल्ली देकर लौट गए. शाम को दुबारा वही खाना लेकर पहुंचे. यह भी खबर दी थी कि उन्होंने तीनों बच्चों को खिला-पिलाकर सुला दिया है. चिंता न करें. वे मां और मुझे वापस चलने को भी कर रहे थे.
मैं चाहता था कि मां मतंग चाचा की बात मान ले. किंतु उनके बार-बार अनुरोध कहने पर भी मां घर जाने को तैयार न हुई. मुझे वह जरूर वापस भेज देना चाहती थी. लेकिन मैं किसी भी हालत में मां को अकेली छोड़कर जाने को तैयार न था. आखिरकार मतंग चाचा अकेले ही लौट गए. उनके जाने के बाद मैंने मां से खाना खाने को कहा. पर उसने कौर तक न निगला. मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी. जैसे-तैसे एक रोटी मैंने निगली. बाकी को वहीं दीवार के सहारे रख दिया.

ओमप्रकाश कश्यप

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