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दंश —सातवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास

मां ने पूरी रात जैसे कांटों पर चलकर बिताई थी. दिन ऊबड़-खाबड़ पथरीले जंगल में नंगे पांव भटकने जैसा था. सुबह हुई. मगर हमारे लिए तो आने वाला दिन भी अंधेरा था. काला….गहरा….डरावना और घोर नाउम्मीदियों से भरा हुआ. जिसकी कोई मंजिल न थी. सिर्फ ठोकरें थीं और भटकाव. बेशुमार ठोकरें और अंतहीन भटकाव. दुःख हमारे कदमों से राक्षस की तरह चिपटा हुआ था. सुख था एक चतुर छलावा जो दूर से ही उम्मीद जगाकर गायब हो जाता. पीछे छोड़ जाता था भयावह सन्नाटा….सपाट मैदान-सा….दूर-दूर तक पसरा हुआ….और अस्सीम दुःख….अंतहीन पीड़ाएं….!

चूल्हा बीती शाम से ही ठंडा पड़ा था. बच्चे मतंग चाचा की झुग्गी में थे. कैसे थे, वहां उन्होंने कुछ खाया था या नहीं, यह देखने और जानने वाला कोई न था. मैंने तो रात की बची रोटियां पानी के साथ निगल ली थीं. परंतु मां पूरी तरह निराहार थी. बीते चौबीस घंटों से अन्न का एक भी दाना उसके मुंह में नहीं गया था. भूख-प्यास से उसके होंठ पपड़ाने लगे थे.

बापू की मुझे कोई चिंता न थी. परंतु मां की हालत देखकर मुझे घबराहट होने लगती थी. इसीलिए जब भी मां को निढाल अवस्था में देखता, पानी का गिलास लेकर मैं तुरंत उसके सामने पहुंच जाता. मेरा मन रखने के लिए वह गिलास से होठों को छुआती. फिर उसे एक ओर रखकर वीरान आंखों से मेरी ओर देखने लगती. मां को तसल्ली देने लायक मेरे पास न तो शब्द थे, न वैसी समझदारी. वह शायद मेरे असमंजस को समझती थी. इसीलिए मुझे छाती से भींच लेती थी. पिछले बीस घंटों से बस इसी तरह हम मां-बेटा एक-दूसरे को तसल्ली देने का निष्फल प्रयास कर रहे थे. बापू इस बार लंबा फंसा था. या कहो कि उसको लंबा फंसाया गया था. दुकानदारों के साथ समझौता हो जाने के बाद अपनी ताकत और कारगुजारी के प्रदर्शन का दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था—सिवाय इसके कि मामले को तत्काल हल होते दिखाया जाए. इसी के लिए बापू को बलि का बकरा बनाया गया था. यह तब था जब बापू पुलिस को अपना समझता था. शहर-भर के सिपाहियों के साथ अपनी दोस्ती का दम भरता था.
इसी दोस्ती के वास्ते न जाने कितनी बार पुलिस के काम साध चुका था. अपने परिवार के सुख को दाव पर लगाकर, अपनी जान पर खेलकर भी जिन पुलिस और नेताओं के काम साधता आया था, उनमें से उस समय एक भी उसके साथ नहीं था. बस्ती वाले भी समझ चुके थे कि उसको फंसाया गया है, फंसाने वाली स्वयं पुलिस है, इसलिए हमदर्दी दिखाने के लिए भी लोग कम ही आए थ. नामसमझी थी बापू की. भूल गया था वह कि दोस्ती और वफादारी बराबर वालों में ही निभती हैं. नादान था वह जो ऊंच-नीच का भेद भुला बैठा था.

पुलिस और दुकानदारों के आगे बापू की हैसियत ही क्या थी! और तो और, वह तो ठीक-ठाक चोर-उच्चका या अपराधी भी नहीं था. जिसे पुलिस अपनी नजर में रखे. कुछ उम्मीद बांधे. वह ठहरा सिर्फ एक मामूली चोर—नाकामयाब किस्म का जेबतराश! जोरदार सलाम ठोकने या बेगार करने के अलावा वह पुलिस को दे भी क्या सकता था. पुलिस को इन सबकी भी जरूरत थी. पर ऐसे लोग तो शहर में हजारों थे. गर्दन पकड़कर वह किसी से भी ये काम करा सकती थी. बड़ी आसानी से….और ज्यादा कुशलता के साथ!

नादान बापू खुद को न जाने क्या समझे हुए था. किंतु ऐसा था भी कौन जो उसे हकीकत से परचाता. सिवाय मां के, जिसकी बात को उसने कभी महत्त्व नहीं दिया. बाकी जो उसके दोस्त थे वे सब तो उकसाने का ही काम करते थे. उनका बिगड़ भी क्या रहा था. और बापू जब तक इस हकीकत को समझे-संभले, तब तक हमारी दुनिया ही उजड़ चुकी थी.
बापू तो पुलिस की दया के काबिल भी नहीं था. अगर वह कामयाब चोर होता तो सिपाही खुद उसे सलाम बजाया करते. मंजा हुआ जेबतराश होता तो रिरियाने के बजाय सिर उठाकर पुलिस से बात करता. अगर दोनों ही हुनर उसमें होते तो पुलिस उसे फंसाने की जगह बचाने के लिए तिकड़म लगाती. दरोगा कुर्सी छोड़कर खड़ा हो जाता. उल्टे सेल्यूट मारता. अगर कभी फंस जाता तो उसे बचाने के लिए पुलिस खुद सबूत जुटाया करती. मगर अफसोस, बापू में ऐसा एक भी गुण नहीं था. वह सिर्फ मामूली किस्म का चोर था—और कमजोर दिल का अतिसाधारण जेबतराश!

पुलिस को अपना समझता था, बापू. इसीलिए जो गुण उसमें थे, उनका उसने पुलिस के फायदे के लिए भरपूर इस्तेमाल किया. उस दिन राह चलते जब पुलिस ने बापू को कब्जे में लिया तो वह बड़े जोर से चीखने-चिल्लाने लगा था. पुलिस की कारगुजारी को रोशन करने के लिए. जिससे चोर के पकड़े जाने की खबर पूरे बाजार में फैल गई. दुकानदारों के चेहरे खुशी से चमक उठे. वे यह सोचकर निश्चिंत थे कि हफ्ते की रकम में मामूली-सी वृद्धि करके उन्होंने अपने व्यापारिक हित और सुख-चैन पक्के कर लिए हैं. चोर अगर इसी तरह छुट्टा घूमता रहता तो अगली बार न जाने कहां दबिश लगाता.
थाने में पुलिस के पास धड़ाधड़ फोन आ रहे थे. कोई माल की बरामदगी के बारे में जानना चाहता था, तो किसी का उद्देश्य केवल पुलिस की पीठ थपथपाना, बधाई देना-भर था. कुछ लोग सिर्फ चोर की कारगुजारी का ब्यौरा जानने के लिए उत्सुक थे. नया थानेदार खुशी-खुशी मूंछों पर ताव दे रहा था. हवलदार और सिपाही उसकी तारीफों के पुल बांध रहे थे. नए दरोगा द्वारा हफ्ते की रकम में वृद्धि करने का फायदा उन सभी को हुआ था.

पहले दुकानदार मामूली-सी रकम निकालने में भी चख-चख करते. बात करो तो मुंह सिकोड़ लेते थे. अब नजर पड़ते ही दुकानदार स्वागत में खड़ा हो जाता है. बिना इशारे रकम जेब में सरका दी जाती है. नोट भी पूरे होते. मजाल है कि अठन्नी-रुपया भी कम रह जाए. यानी मजा ही मजा! ऐसे मजे के लिए पुलिस दो-चार तो क्या अपने दर्जनों भक्तों को हवालात पहुंचा सकती थी.
पुलिस पर बापू को पूरा विश्वास था. वह मानता था कि पुलिस उसके साथ दोस्ताना मार-पीट करेगी. इसीलिए वह मजे-मजे में थाने पहुंच गया. जब उसे हवालात में बंद किया गया, तब भी उसके चेहरे पर शिकन तक न थी. उस समय वह कबीर का कोई कोई शबद गुनगुना रहा था. दो-तीन घंटे उसने शबद की मस्ती में ही गुजार दिए थे. काश! बापू उस जानलेवा गलतफहमी से बचा होता. पर वह कर भी क्या सकता था. बापू जैसे ‘जीव’ कर भी क्या पाते हैं. उसके साथ वही हुआ जैसा उस जैसों के साथ अक्सर होता रहता है. और जिसे वे अपना भाग्यलेखा मानकर सहते हुए चले जाते हैं. ‘शातिर चोर’ के दर्शन करने बाजार के कई दुकानदार आए थे. जिसके यहां चोरी हुई—वह भी पहुंचा था. बापू की दुर्बल, घुन लगी, बीमार-सी काया को देखकर दुकानदार उसके दुस्साहस पर दंग होते. लेकिन जाने से पहले दो-चार गालियां देना न भूलते थे. इसी बहाने वे पुलिस से मेल-मिलाप भी बढ़ाना चाहते थे. जिससे हफ्ता बढ़ाने के सवाल पर हुई कड़वी-खट्टी बातों को वह दिमाग से निकाल सके. ऐसे दुकानदार जेब में नजराना भी सहेजे रहते.

हैरानी की बात! माल की बरामदगी के बारे में उनमें से कोई नहीं पूछ रहा था. वह दुकानदार भी नहीं जिसके यहां चोरी हुई थी, वे लोग भी नहीं जो हफ्ते की रकम का भुगतान करने के बावजूद अच्छा-खासा नजराना लाए थे. वे सभी सचाई से परिचित थे. शायद सभी जान चुके थे कि पुलिस की बड़ाई करना और बापू को निरंतर गालियां देना उनकी नियति है. उनकी निगाह में बापू इसलिए चोर था क्योंकि पुलिस ऐसा कह रही थी. पुलिस अगर उन्हें ही चोर बताती तो भी वे विश्वास कर, मामले को ले-देकर निपटाने का प्रयास करते. इस तरह कम से कम कुछ मामलों में उनकी और बापू की हालत जैसी थी.
जाते-जाते वे बापू पर हंसते, गालियां देते. अपनी मस्ती में डूबा बापू उनकी गालियों को भी तारीफ की तरह लेता और हर बार बेशर्मी से हंस देता था. आप इसे बापू का चाहे पागलपन ही कहें, लेकिन बात सोलह आना सच है….हवालात पहुंचने के बाद उसका पुलिस के प्रति अपनापन बढ़ा ही था. उसी दोस्ताना भाव में डूबा हुआ वह कभी-कभी सिपाहियों को गालियां देने लगता. इस पर पहरेदार सिपाही बापू को डंडे से हूलता. बापू अगर उसके डंडे की जद में होता तो दो-चार रसीद भी कर देता. मगर बलिदान भावना के मारे बापू की नजर में ये सब छिनाल पुलिस के नखरे थे. जिन्हें सहने की उसे आदत थी.

बापू सोचे बैठा था कि ऊपर का दबाव कुछ ज्यादा ही है. कभी-कभी पुलिस भी मजबूर हो जाती है, नौकरी जो करनी है. खैर, कल नहीं आज आधी रात होते-होते नाटक पूरा हो जाएगा. मोटे-थुथुले-झूठे-बेईमान दुकानदार जिस समय अपनी बीरवानियों की बगल में लेटे, खर्राटे मार रहे होंगे, उसे भी छोड़ दिया जाएगा. नादान बापू, आधी रात तक उसकी मस्ती में रत्ती-भर भी कमी नहीं आई थी. मगर रात बीतने के साथ ही उसे पुलिस की दगाबाजी से कोफ्त होने लगी. तब उसने अपनी गालियों का रुख सीधे दरोगा की ओर कर दिया. ऐसे काबिल दरोगा का अपमान होते देख सिपाही बापू को मजा चखाना चाहते थे. परंतु दरोगा ने उन्हें रोक लिया.

आखिर गला फाड़-फाड़कर बापू स्वयं थक गया. जब पैरों पर खड़े रहने की शक्ति न रही तो फर्श पर गिरकर कराहने लगा. जान-पहचान का एक सिपाही बापू के लिए रोटियां लेकर आया था. बापू ने एक कौर तोड़कर मुंह में डाला. अचानक उसका इरादा बदल गया. रोटियां उसने हवालात के कोने में खिसका दीं. उन्हीं पर मुंह का कौर उगलकर न जाने क्या-क्या बड़बड़ाने लगा. जान-पहचान वाला सिपाही जानी-पहचानी गालियां उगलता हुआ वहां से चला गया. उसके जाते ही बापू और भी भड़क उठा. गालियों से उसने पूरा थाना सिर पर उठा लिया. लेकिन भूखी देह कब तक चीखती-चिल्लाती. आखिर चीखता-चीखता वह जमीन पर गिर पड़ा.

*

रात बीती. बापू ने अंगड़ाई लेते हुए अपनी आंखें खोलीं. जमीन पर सोने के कारण उसकी देह अकड़ चुकी थी. शराब का नशा तो बीती रात ही जवाब दे चुका था. उसके शरीर पर सुस्ती-सी छाई हुई थी. अंगड़ाई से उसकी पूरी देह चरमरा उठी थी. उस समय वह पुलिस के व्यवहार से क्षुब्ध अवश्य था. पर मन में कहीं अब भी यह बात पैठी हुई थी कि पुलिस अपनी है. जो हुआ वह किसी मजबूरी में हुआ. ऊपर के दबाव की वजह से हुआ. इसका पुलिस को भी अफसोस होगा. बापू को लग रहा था कि थोड़ी ही देर बाद दरोगा आकर कहेगा—
‘माफ करना घुरिया! बात यदि नौकरी पर न आ जाती तो मैं तुम्हें हरगिज बंद न रखता. तुम्हें तो परेशानी उठानी पड़ी इसका मुझे भारी अफसोस है.’

तब वह अपना बड़प्पन दिखाते हुए कहेगा—‘जाने दीजिए साहब! यारी-दोस्ती में तो यह चलता ही रहता है. आखिर अपने ही अपनों के काम आते हैं.’

यही सोचकर वह बार-बार दरवाजे की ओर देखता. हर आहट पर उसको लगता कि दरोगा अफसोस जताने आ रहा है. सोचता कि घर जाकर पूरे मुहल्ले को इस सचाई के बारे में बताएगा कि कैसे उसने दो रात हवालात में काटकर दरोगा की नौकरी की रक्षा की है. मामला ठंडा पड़ जाए. फिर यदि कोई कहेगा तो किसी पुलिसिये से तस्दीक भी करा देगा.
तभी सींखचों के उस पार आहट हुई. आस फलती देख बापू की आंखों में चमक लौट आई. देखा एक हवलदार और दो सिपाहियों को लेकर आ रहा था.

‘आखिर आ ही गए सुलहनामा करने, गिड़गिड़ाने….!’ बापू जोर से चिल्लाया. उसके चेहरे पर अचानक उल्लास झिलमिलाने लगा था.

‘चल फटाफट इस पर अंगूठा लगाकर सही कर दे.’ सींखचों के दूसरी ओर खड़े भेड़िये बापू की ओर गुर्रा रहे थे. एक ने ताला खोला. दरवाजा खुलते ही सब एक झटके में भीतर आ गए. बापू के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

‘यह क्या है?’

‘हराम के टने….दिखता नहीं तेरा बयान है.’ एक सिपाही बोला.
‘चुप बे! जानता नहीं घुरिया अपना आदमी है.’ हवलदार ने सिपाही को धमकाते हुए बापू की ओर अपनेपन के साथ देखा.

‘साहब! कोई लफड़ा तो नहीं है?’ बापू ने पूछा. उसके चेहरे पर खिसियानी हंसी थी. डर कहीं बहुत गहरे समाया हुआ था. जिसे वह अपनी हंसी की चमक के पीछे छिपाए रखना चाहता था.

‘लफड़ा है….तभी तो तेरा अंगूठा चाहिए.’
‘अपनों के लिए तो मेरी जान भी हाजिर है, हुजूर….मगर!’
‘अच्छा-अच्छा! देर मत कर.’ सिपाही हड़बड़ी में था.
‘आप अपने आदमी हैं. एकदम भरोसे के. आप कहें तो मैं ना कह भी नहीं सकता. पर इतना तो बता दीजिए कि इस पर लिखा क्या है?’

‘क्या करेगा जानकर….तू अपना काम कर. जल्दी से अंगूठा लगा, नहीं तो….’ इस बार दूसरा सिपाही पेंट से बाहर निकलने को हुआ.

बापू अंगूठा लगाने को तैयार था. परंतु सिपाही की जबरदस्ती देख वह भी उखड़ गया. ‘अपनों’ से ऐसे व्यवहार की उम्मीद जो नहीं थी.

‘यह कैसी जोर-जबरदस्ती है. पहले मुझे साफ-साफ बताओ…. क्या लिखा है इस पर?’ बापू अड़ गया.

‘इसमें बस इतना लिखा है कि तूने घड़ियों की दुकान में चोरी की बात कबूल कर ली है.’ हवलदार ने ठंडी आवाज में अपनी मंशा साफ की. उस समय उसके चेहरे पर न तो हिचक थी, न कोई शर्म-लिहाज. बापू का खून जमने लगा.
‘यह झूठ है….मैंने कुछ नहीं किया….. मैंने तो वह दुकान देखी तक नहीं है.’

‘हम जानते हैं भईया….खूब अच्छी तरह जानते हैं कि तेने कुछ नहीं किया. पर क्या करें. मजबूरी है. किसी न किसी से तो ‘हां’ करानी ही पड़ेगी.’ देर होते देख दरोगा खुद वहां पहुंच गया. थाने में मौजूद उस नादिरशाह को देखकर बापू ने जोरदार सलाम ठोका. फिर बोला—

‘मुझे ही क्यों फंसाया जा रहा है साहब?’ बापू गिड़गिड़ा रहा था.

‘असली चोर जब नदारद हो और ऊपर का दबाव बहुत ज्यादा तब पुलिस को अपने आदमियों की मदद लेनी ही पड़ती है. संकट की घड़ी में एकाएक हम और किसके पास जाएं….किससे मदद मांगें….तू ही बता. किसी अनजान आदमी को पकड़ लें जो यहां ‘हां’ कहकर जज के सामने मुकर जाए तब अदालत तो हमारी वर्दी ही उतार लेगी. क्यों है ना! इसलिए हमें भरोसे का आदमी ही चाहिए. एकदम तेरे जैसा.’ दरोगा के साथ खड़े हवलदार कहा.

‘सच कहता हूं घुरिया. मुझे तो इस थाने की सीमा में तुझसे ज्यादा भरोसे का और खास एक भी आदमी नहीं है.’ दरोगा ने जोड़ा.

बापू पिघलने लगा. मन में शहीदाना जोश अंगड़ाई लेने लगा. पर मौके की नजाकत को समझकर उसने अकड़ बनाए रखना जरूरी समझा—‘कुछ भी हो तुम सब की बातों में आकर मैं पुलिस की बला को अपने सर नहीं ले सकता.’

बापू का सारा अड़ियलपन अपने बलिदान का मोल जताने जैसा था. कम से कम वह तो ऐसा ही समझ रहा था. नादान-नासमझ जो ठहरा.

‘देख! तू हमें अच्छी तरह से जानता है. यह भी जानता है कि हम क्या कर सकते हैं….’ एक सिपाही पीछे से गुर्राया. लेकिन दरोगा ने उसे पीछे हटा दिया. जब सीधी उंगली पूरा काम करती हो तो तिरछी क्यों की जाए. वह इसी सिद्धांत का आदमी था. इसलिए बापू के अंतर्मन में झांकते हुए, उसके कंधे पर हाथ रख, उसके और करीब जाते हुए….आवाज में जैसे शहद घुला हो….कि जैसे विषधर रामनामी चादर ओढ़कर आगे आए ….भेड़िया बगुला भगत बन जाए. ज्यों बिच्छु काटना, सांप डंसना, पापी पाप करना छोड़ चुका हो, दरोगा का उस समय ऐसा ही आचरण था. अपने नुकीले नख-दंतों को आड़ में करते हुए दरोगा बोला—

‘मुझे बताया गया है कि तू पुराने दरोगा का भरोसेमंद रहा है. उसी भरोसे की आज मुझे दरकार है.’
बापू चुप. दरोगा के व्यवहार ने उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया था. साहब का मूड भांप कर हवलदार भी आगे आया और संगति देने लगा—

‘अब मान भी जा घनश्याम. उपर का दबाव बहुत ज्यादा है. वरना साहब तो देवता हैं. एक चींटी तक का दुख इनसे नहीं देखा जाता. फिर तू तो अपना एकदम खास आदमी ठहरा….बस कुछ दिनों की बात है, हम मुकदमा ही ऐसा लिखेंगे कि एक ही पेशी में बाहर आ जाएगा.’
बापू को पिघलते देख एक और सिपाही आगे आ गया—

‘बदन पर सरकारी वर्दी न होती तो तेरी जगह मैं अंगूठा लगा देता. फिर चाहे फांसी ही क्यों न हो जाती. मेरी बदकिस्मती है कि इस समय नौकरी में हूं और अपने गउ समान भले दरोगा साहब की मदद भी नहीं कर पा रहा हूं.’ बोलते समय सिपाही की आवाज भीग गई थी.

नादान बापू! पुलिस के नाटक को समझ ही नहीं पाया. उल्टे उनकी बातें सुनकर उसकी छाती फूल गई. एक भी पल गंवाए उसने इंक पेड पर अपना अंगूठा रखा….दरोगा को दिखाते हुए अच्छी तरह रगड़ा और पूरा जोर लगाकर कागज पर टीप दिया. फिर अपनी सींक-सी पतली, कमजोर, बलगम-भरी छाती को फुलाने की असफल कोशिश करते हुए बोला—

‘इतना कमजोर भी मत समझिए साब! घनश्याम जिसे अपना मानता है, उसपर जान लुटाने को हमेशा तैयार रहता है. आपकी खुशी की खातिर में साल-दो साल जेल में बिताने को भी तैयार हूं. पर अभी मेरी घरवाली की तबियत बहुत खराब चल रही है. कुछ दिन के लिए रिहा कर दें तो….जैसे ही कुछ संभलेगी, मैं खुद थाने पहुंचकर चोरी का इल्जाम अपने सिर पर ले लूंगा.’

‘फिकर मत कर! आज तूने पुलिस का साथ दिया है ना! हम भी अपना वायदा निभाएंगे. अदालत खुलते ही तेरी जमानत पक्की है. उसके बाद मजे से लुगाई की बगल में सोना.’ दरोगा ने खुशी-खुशी कहा. एक भोंडी हंसी हवा में गूंजी. बापू बजाय कुछ समझने के लिए उनके साथ हंसने लगा.

दरोगा के निकलते ही सिपाही हवालात को ताला ठोकने लगा. उसकी ओर से बेपरवाह बापू मस्त-कदमी कर रहा था. उस समय वह खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा था. चेहरे पर शहीदाना भाव थे. मन में कुछ कर गुजरने जैसा एहसास. हवालात की बंद, सीलन-भरी गंदी कोठरी में तो उसकी देह कैद थी. मन तो सातवें आसमान में उड़ रहा था.

गलतफहमियां जिंदगी निगल जाती हैं…क्रमश:!

****

ओमप्रकाश कश्यप

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