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दंश — पांचवी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

गरीब लोगों का तो वक्त भी सगा नहीं होता, बाबू. वह बदलता है, ताकि हम जैसे बेसहारा लोगों पर नई-नई विपत्तियां ला सके. उन्हें कठघरे में खड़ा कर सके.

सब्जी मंडी बसी तो सब्जी से लदे बड़े-बड़े ट्रक वहां आने लगे. काम बढ़ा तो पल्लेदारों की जरूरत बढ़ी. रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ. बापूधाम के सैकड़ों मर्द-औरत मंडी में काम करने लगे. बापू भी उन्हीं में से एक था. मगर पल्लेदारी के काम से उसकी कमाई कम, गंवाई अधिक थी. तो भी वह उससे खुश था. मुझे तो याद नहीं आता कि उसने अपने काम-धंधे को लेकर कभी कोई शिकायत की हो. खाली हाथ घर लौटने पर भी मुंह चिढ़ाया हो.

कठिन मेहनत, झूठ, चालाकी, बेईमानी, धक्का-मुक्की, गाली-गलौच और भागम-भाग से वह दिन-भर में जितना कमाता, उसे सूरज ढलने से पहले शराब की दुकान पर न्योछावर कर आता था. घर की सुध ठन-ठन गोपाल बन जाने के बाद ही आती. अंधेरा होने पर घर लौटता तो मुंह लटकाकर, मुंह से भद्दी-भद्दी गालियां निकालता, नशे से लड़खड़ाता हुआ.

बापू जैसा भी रहा हो, मां के गुस्से का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी. खाली जेब देखकर मां उसपर नाराज ना हो, इसलिए उसके हाथ पर रखने के लिए बापू को अक्सर कुछ उधार लेना पड़ता. फिर अगले दिन के चार-पांच घंटे उस उधार को चुकाने के नाम हो जाते. बापू के दिए पांच-दस रुपयों से घर कैसे चलता. इस कारण भरपाई के लिए मां को भी काम करना पड़ता.

कभी-कभी, खासकर बरसात के दिनों में मंडी में ट्रकों का आना घट जाता. इससे काम का टोटा पड़ने लगता. बापू को दूसरा कोई काम तो आता नहीं था. मां गृहस्थी से समय निकाल कर इधर-उधर से कुछ कमाकर लाती, कबाड़ बीनती. फिर भी कभी-कभी ऐसा हो ही जाता था कि अंगीठी बिना दहके रह जाती. कभी शाम को खाना खाते समय हम सबकी आंखों से आंसू बहने लगते. छोटी बहन, भाई सब सिसकारी भरने लग जाते.

उस दिन घर में प्रायः तरीदार सब्जी बनी होती. नमक-मिर्च और पानी के तरल घोल जैसी. दाल के गिनती के दाने. उनकी भरपाई मिर्चों से की जाती. खाते ही हम सबका गला जलने लगता. चेहरा लाल-भभूका. छोटे-भाई बहन पानी-पानी चिल्लाने लगते. मां उसके लिए पहले ही तैयार होती. तत्काल पानी से भरी कटोरियां आगे सरका दी जातीं.
गट…गट….गट….गट….!

इतना पानी भीतर जाता कि पेट फूलने लगता. खाने की गुंजाइश ही न रहती. घूंट-घूंट कर पानी पीते हुए सब अपने-अपने ठिकाने पर जाकर लेट जाते. मैं मां की चालाकी को समझता था. गर्दन झुकाए हुए वह सबको खाली पेट उठते हुए देखती. दुःखी होती. उस समय उस पर क्या बीतती होगी, मैं नहीं बता सकता. इसे मैं मां की मजबूरी समझकर चुपचाप उठ जाता. पेट-दर्द या भूख नहीं है, का बहाना करते हुए. उस समय मां मेरी ओर ऐसे देखती जैसे वह घोर अपराधी हो.
शराबी के रूप में कुख्यात होने के कारण दुकानदार बापू को दूसरे पल्लेदारों से कम पसंद करते थे. ठलवार के दिनों में उसकी मुश्किलें और भी बढ़ जातीं. उन दिनों पेट और शराब की भूख मिटाने के लिए वह छोटी-मोटी चोरियां करने लगता. झूठ तो वह पानी की तरह बोलता. पैसा कमाने के लिए पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, ईमान-धरम देखना उसे बुरा लगता था.

रोटी के जुगाड़ में बापू कभी-कभी जेबतराशी पर भी उतर आता. यह बात अलग है कि इस काम में वह पूरी तरह अनाड़ी था. उसको विश्वास था कि जेबतराशी का काम उसे पूरी तरह फल ही नहीं सकता. उस्ताद का शाप जो सिर पर है. बात आपको अविश्वसनीय लगेगी. पर बापू इसे पूरी तरह सच मानता था. इसलिए जेबतराशी के समय उसका हाथ कांपने, कलेजा धक-धक करने लगता था.

नशे की हालत में बापू ने एक बार रहस्य खोला था. यह कि उसने एक बार भूल से अपने उस्ताद ही की जेब पर हाथ डाल दिया था. हालांकि यह पाप गलतफहमी के कारण हुआ था. उस्ताद उस समय खुद ड्यूटी पर थे. सूट-बूट में लैस, पढ़े-लिखे साहब जैसे. बहुत दिनों से वे एक सेठ का पीछा कर रहे थे, जो थोक में खरीददारी करने शहर आता था. अनाड़ीपना था उसका. जिससे आसामी को पहचानने में गलती कर बैठा. जबकि उस्ताद की पहली सीख ही यह थी कि हाथ डालने से पहले अच्छी तरह शिकार का हुलिया परखो. हजार बार सोचो. बातचीत और चाल-ढाल से यदि कोई जाना-पहचाना-सा नजर आए तो इरादा बदल दो. माल साफ करने से जरूरी है, बच निकलना. पहले बचाव के बारे में सोचो. पकड़ में आया जेबतराश खुद तो मुश्किल में पड़ता ही है, अपने उस्ताद की बदनामी की वजह भी बनता है.

उस दिन शराब की तलब और नादानी में बापू ने उस्ताद की सलाह भी बिसरा दी थी. उस्ताद तो उस्ताद ठहरा. उसने फौरन बापू का हाथ थाम लिया. अपना आदमी समझकर बापू को ज्यादा मारा-पीटा तो नहीं. हां शाप देने की पुरातन परंपरा की नकल करते हुए उसने गुस्से से इतना जरूर कहा थाµ

‘उस्ताद की सलाह और उसके बड़प्पन का ख्याल न करते हुए तूने जो गुस्ताखी की है, वह अक्षम्य है. इसलिए मैं कहे देता हूं कि तू अपनी जिंदगी में कभी कामयाब जेबतराश नहीं बन पाएगा.’
कलयुग के परशुराम द्वारा अपने कर्ण को दिया गया शाप था यह.

**

बापू मन से तो पहले ही कमजोर था. उस्ताद के बोलों ने उसे जकड़-सा लिया. कील की तरह यह शाप उसके दिलों-दिमाग में गढ़ गया. इस घटना के बाद बापू जब भी किसी जेब पर अपनी उंगलियों का कमाल पेश करने की कोशिश करता, मन में समाया हुआ दर्द उसकी शिराओं को लस्त-पस्त कर देता. उसके बाद तो वह संभलने की चाहे जितनी कोशिश करे, उंगलियां थरथरा ही जाती थीं. इस कारण वह अनेक बार भीड़ के हाथों पिट भी चुका था.

बस कडंक्टर और सिपाहियों से उसकी अच्छी पटती थी. जेबतराशी भी दरअसल मिला-जुला धंधा होता है. उसमें जेबतराश की उंगलियों का कमाल होता है. पुलिस का आशीर्वाद और कडंक्टर की मदद उसको कामयाब बनाते हैं. समझौते के अनुसार हर जेबतराश को भीड़ की मार से सुरक्षित बचा लाना उन्हीं की जिम्मेदारी होती है. जिसे वे अपनी पूरी ईमानदारी से निभाते थे. बापू को भी इस समझौते का लाभ मिलता था.

कभी-कभी भीड़ बेकाबू होकर अच्छी-खासी धुनाई भी कर देती. जिससे बापू को हफ्तों तक चारपाई पकड़नी पड़ जाती. मगर उस धंधे में यह भी एक संभावना, बापू यह जानता था. इसलिए पुलिस की मार-पीट का उसपर कोई असर ही नहीं होता था. मां यदि बापू को समझाने का प्रयास करती तो मां की नादानी मानकर वह उसपर हंसता. यदि मां फिर भी न माने तो नाराज हो जाता था—

‘अब रहने भी दे….बहुत ज्यादा लाड़-प्यार के पीछे छिपे तेरे मतलबी स्वभाव को मैं खूब जानता हूं.’

‘आप किसी खतरे में न पड़े, मैंने तो इसीलिए कहा था.’

‘ठीक है, सुन लिया. अब मुंह बंद कर ले.’

बापू मां को बुरी तरह धमका देता. कुछ देर बाद उसको लगता कि कुछ ज्यादती हुई है. तब वह नरम पड़कर मां को समझाते हुए कहता—‘बावरी, रिस्क कहां नहीं है. सड़क पर चलते-चलते आदमी बस के नीचे आ जाता है. बिजली के खंबे से तार टूटकर गिर सकता है. कोई दुश्मन गोली से उड़ा सकता है. वक्त का क्या भरोसा, हैजा-हार्ट अटैक वगैरह कभी भी, कुछ भी हो सकता है. कुछ न होने तक कुछ न कुछ करते रहने का नाम ही जिंदगी है, समझी!’

इस पर मां नासमझ की तरह चुप्पी साध लेती.

हवालात से बापू की दोस्ती थी. जेलों से प्यार. इन्हें वह अपना असली घर कहता. पुलिस को अपना मित्रा-सखा मानता. उसके और भीड़ के हाथों सरेआम पिटना उसकी आदत में शामिल हो चुका था. इसके लिए वह तैयार भी रहता. इस मामले में उसका उस्ताद ही उसका आदर्श था. उसी का हवाला देते हुए वह अक्सर कहा करता था—

‘एक बार पुलिस का डंडा देह को भा जाए तो आदमी बेखौफ हो जाता है. उसे दुनिया का हर काम भला लगने लगता है.’

बापू जीवन कि प्रत्येक क्षेत्र में फिसड्डी रहा. उसकी बदकिस्मती रही कि वह असल जिंदगी में न तो लगकर मेहनत-मजदूरी कर पाया. न किसी और काम में हाथ मांज सका. तो भी जिंदगी में उसका संघर्ष हमेशा चलता रहा. कामयाबी के लिए वह कदम-कदम जूझता रहा. इन धंधों का रोमांच अक्सर बापू को अपनी ओर खींचता. परंतु अपनी जिद और ताउम्र कोशिश के बाद भी वह एक नाकामयाब इंसान ही बन पाया. कामयाबी उससे हमेशा चार कदम आगे चलती रही. असफलताएं उसका मुंह चिढ़ाती रहीं. उस्ताद के शाप को वह ताउम्र अपने कंधों पर ढोता, रात-दिन पछताता रहा.

एक-दो घटनाएं अपवाद कही जा सकती हैं. जब उसने लंबा हाथ मारा था. मगर तब तक बस चालकों, कडंक्टरों और पुलिस की देनदारी इतनी बढ़ चुकी थी कि सारी कमाई पिछले कर्ज चुकाने में ही निकल गई. बापू को खाली हाथ रह जाना पड़ा. उसका दावा है कि उस्ताद की मेहरबानी से उस बार उसने इतना बड़ा हाथ मारा था, जितना कि बाकी जेबतराश पूरी जिंदगी में नहीं कर पाते. तरसते ही रहते हैं. अगर सिर पर बेइंतिहा कर्ज न होता और खबर मिलते ही सारे कर्जदार एक साथ वसूली को न आ धमकते तो आज वह भी शाही जिंदगी के मजे लूट रहा होता. बापूधाम की ओर तो वह पांव भी न धरता.

‘तो और कहां जाता?’ उस समय बापू से अगर कोई यह सवाल कर बैठता तो मुझे पूरा विश्वास है कि उसकी जुबान उसका साथ छोड़ जाती. दरअसल बापू जानता था कि उसका वजूद ही बापूधाम से जुड़ा हुआ है. जेल-हवालात को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं आता कि वह कभी भी शहर छोड़कर गया हो; या किसी दूसरे शहर का नाम भी अपनी जुबान पर लाया हो.

यह तो तय है कि बापू की आयु बापूधाम की आयु से अधिक थी. दूसरे बहुत से लोगों की तरह वह भी से बाहर से आया था. लेकिन कहां से यह उसने न तो कभी बताया था, न हमने जानने की कोशिश ही की थी. और तो और मां ने भी अपने पिछले जीवन को लेकर रहस्य बनाया हुआ था.

बापू कई बार जेलयात्रा कर चुका था. हवालात जाने की तो गिनती ही न थी. मां उसे खूब समझाती. पर बेकार….नाकामयाब रह जाती वह. कमाल का जिद्दी था बापू. जब भी पुलिस या भीड़ से मार खाकर घर लौटता तो मां शिकायत करती. बाज आने को कहती. खुशामद करती, रूठती और मनाती भी. बापू कुछ देर तक तो चुप्पी साधे रहता. बात जब उसकी सहनसीमा से बाहर हो जाती तो भड़क उठता—

‘चुप रह! तू ठहरी औरतजात. कमजोर दिल की. अरी भगवान, पिटना तो हम मरदों के लिए फायदेमंद रहता है. देह की मालिश हो जाती है….उसपर पुलिस के हाथों मार खाना तो और भी शुभ. न जाने कितने नेता पुलिस की मार खाने के बाद ही दुनिया में सन्नाम हुए हैं. गांधी, नेहरू, पटेल….!’

सुनकर मां निस्पंद-सी खड़ी रहती….पाथरशिला-सी अबोल. न ‘हूं’ कहती थी न ‘हां’. सिर्फ दुख को अपने भीतर समेटने के लिए अपने आप से लड़ती. इस कशमकश में आंखें अगर नम हो जातीं तो उन्हें तुरंत पोंछ लेती. जहां आंसुओं का मोल न हो, वहां उन्हें दिखाने से क्या लाभ. मां शायद यही सोचती थी.

मां की चुप्पी बापू पर बिल्कुल उल्टा डालती. जोश में भरकर वह आगे कहता—

‘बस बहुत हो चुका भगवान! दिन-भर का थका-मांदा घर लौटा हूं. कुछ सेवादारी कर. पांव दबा और  नहीं तो सिर की मालिश ही कर दे.’ कहकर वह बेशर्म की तरह हंस देता. फिर चारपाई पर पसर जाता. मां वहां से उठकर अपने काम में लग जाती. तब बापू हममें से किसी एक को पांव दबाने का हुक्म सुनाता. दूसरा उसकी देह की मालिश करने लगता. चार साल का छुटकी उसके सिरहाने बैठकर अपने मासूम हाथों से उसका माथा सहलाने लगती. उस समय शराब का तेज भभका उसकी सांसों से छूट रहा होता. पर हम सभी को उसे सहने का अभ्यास हो चला था.

**

बापू अनपढ़ जरूर था, नादान नहीं. दिमाग उसका हवा से भी तेज दौड़ता. फर्क इतना-भर था कि वह अपनी जल्दबाजी और उतावलेपन में हमेशा मार खा जाता. बस्ती में सभी के साथ उसका उठना-बैठना था. शायद इसीलिए छुटभैये नेता उसको महत्त्व देने लगे थे. वह बड़ी आसानी से दूसरों की बातों में आ जाता. इस कमजोरी को वे जानते थे. बापू बिना कुछ लिए महीनों तक उनके लिए काम कर सकता था. किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम पर बापू की सक्रियता देखते ही बनती. उस दौरान बापूधाम में उसके सिर पर सबसे ज्यादा जिम्मेदारियां होतीं. बेगार की तरह. जिनमें से अधिकांश को वह स्वयं ही अपने ऊपर ले लेता था.

बापू की अस्थिरता उसपर भारी पड़ती थी. उसके बारे में यह अनुमान लगा पाना कठिन था कि कब क्या कर बैठे. सुबह काम पर जाने से पहले मां से कहकर जाता कि मसाला पीसकर रखे, शाम को मछली-भात बनाया जाएगा. हम प्रसन्नमन शाम होने का इंतजार करने लगते. बापू देर रात गए खाली हाथ घर लौटता, बताता कि आज किस्मत अच्छी नहीं थी. जुए में हाथ उल्टा पड़ गया. कभी जल्दी लौटने को कहकर जाता. पर खबर आती कि ‘फलां को पुलिस ले गई है….’ पूरी रात बिताकर सुबह घर लौटता.

मां बापू के हवालात में बंद होने की सूचना से उद्वेलित तो होती. मगर रोजमर्रा की सी बात होने के कारण वह जल्दी ही संभल भी जाती थी. ऐसी दर्दनाक स्थितियों से गुजरना वह अपनी नियति मान चुकी थी. बापू हवालात में घंटा-दो घंटा या अधिक से अधिक एक रात गुजारता. सुबह का सूरज निकलने से पहले ही उसको छोड़ दिया जाता. तब वह छाती फुलाए घर लौटता. ऐंठता हुआ-सा, जैसे किसी मैराथन में फतह पाकर लौटा हो. जिस रात बापू हवालात में होता, घर की एकमात्र चारपाई पर सोने के लिए हम भाई-बहनों में रार ठन जाती. मां के फैसले के बाद जिसे भी मौका मिलता वह चारपाई पर सोने के अपने शाही शौक को पूरा कर लेता था.

चारपाई उतनी ही पुरानी थी, जितनी बापूधाम बस्ती. या फिर मां और बापू की गृहस्थी. उसकी हालत भी बापूधाम जैसी जर्जर और उजाड़ बनी हुई थी. बाकी रातों में जब बापू घर होता, हम सभी बच्चे मां के साथ जमीन पर सोते थे. का॓करोचों और झींगुरों के बीच.

मां अक्सर औंधे मुंह सोती. हमारे लिए मां का औंधे मुंह सोना वर्षों तक रहस्य ही बना रहा. कई बार यह घिनौना ख्याल भी आया भी कि मां नीचे मुंह करके छिपकर कुछ खाती रहती है. कई बार सोचा कि इससे शायद मां को पीठ-दर्द से आराम मिलता हो. आज ऐसे ओछे विचारों के बारे में सोचकर ही मन आत्मग्लानि से भर उठता है. मगर मां को लेकर मैं ऐसा सोचता था, बल्कि वर्षों तक ऐसे ही सोचता रहा— ऐसी गंदी मानसिकता थी मेरी, यह भी एक सचाई है.

एक रात मेरी नींद अनायास ही टूट गई. उस दिन मां के औंधे मुंह सोने का रहस्य खुला. मां पीठ के बल लेटी सिसक रही थी. उसका चेहरा आंसुओं से तर था. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी. आसपास की झुग्गियों से खर्राटों की आवाजें आ रही थीं. मां से उसकी हिचकियों की वजह जान सकूं, उस समय मुझमें यह साहस नही था. जब कुछ और न सूझा तो मैं उससे सटकर लेट गया. मां संभवतः मेरी मनःस्थिति को समझ चुकी थी. या फिर यह दो आत्माओं के मूक संवाद, अपनेपन के एहसास का परिणाम रहा हो. उसने मुझे अपनी छाती से कसकर भींच लिया था.

मां की सिसकियों को कारण आगे भी न तो मैंने कभी पूछा, न उसने कभी बताया. कारण साफ था. जिंदगी में यदि दो-चार गम हों तो उनका हिसाब रखा जाए. दर्द मामूली हो तो आदमी उसके इलाज के बारे सोचे. मगर जब गम बेशुमार हों. जीने का अर्थ ही चुपचाप आंसू पीना हो. अपना पहाड़-सा दर्द सीने पर लिए जब अकेले ही अकेले घुटना हो, तो दर्द और सिसकियों से समझौता ही करना पड़ता है. उनका कारण नहीं खोजा जाता.
क्यों, मैंने ठीक कहा न बाबू!

मां आंसुओं से गठबंधन कर चुकी थी. मैं वैसा करने की कोशिश कर रहा था.

साधारण स्त्री की तरह ही मां अपने पति यानी मेरे बापू से पूरा प्यार करती थी. जहां तक बन पड़ता, उसकी देखभाल भी करती. साल के एक-चौथाई दिन वह किसी न किसी देवी-देवता के नाम पर उपवास रखती. मां के उपवास के बारे में हमें पता भी नहीं लग पाता था. अपने आप में मस्त थे हम. ऐसे में कौन उसका ध्यान रखता. न मां कभी अपने व्रत-उपवास का ढिंढोरा पीटती थी. परंतु साल में एक बार दूर से देखकर ही हम समझ जाते थे कि आज करवाचौथ का दिन—मां का उपवास है. सिर्फ करवाचौथ के दिन मां के उपवास का खुलासा हो पाता था.
उस दिन वह काम से नागा करती. सारे दिन घर ही रहती. चाहती तो यह थी कि बापू भी घर से न निकले. पर अपनी लापरवाहियों और दुर्व्यसनों में डूबा बापू ऐसे बंधनों को फिजूल मानता था. मां की खुशामद भी उस पर बेअसर रहती. किसी न किसी बहाने वह घर से निकल ही जाता था.

उस दिन दोपहर होने तक मां नहा-धो लेती. उसके बाद अपनी मांग में ढेर सारा गहरा लाल सिंदूर पूरती. माथे पर बड़ी-सी टिकुली लगाती. बालों को खुला रखती. मां के बालों की कोमलता और लंबाई हम उसी दिन देख पाते थे. हमीं क्यों उस दिन पूरी बस्ती मां के सादगी-भरे सौंदर्य से धन्य हो जाती थी.

बापू के लिए वह दिन बहुत गुमान-भरा होता. मां को बुरा लगेगा, इसकी परवाह किए बगैर वह उस दिन भी जमकर पीता. देर रात गए घर लौटता. मां उसके इंतजार में बैठी होती. कभी-कभी तो चंद्रमा निकल कर बुढ़ाने लगता. औरतें अघ्र्य चढ़ाकर सो चुकी होतीं. तो भी बापू के पांव घर में न पड़ते. रात जाने कितनी बीच चुकी होती. उस दिन मां बापू की चारपाई पर किसी को भी सोने न देती. हममें से जो जिद करता उसको खूब डांट पड़ती. अकेली उसके पाए से कमर टिकाकर बैठी रहती. मां को नींद आने लगती. तब कहीं जाकर बापू घर लौटता. मां कुछ कहे, उससे पहले ही अपने पतित्व पर गुमान करता हुआ वह कहता—

‘समझता हूं….भूखी है! सुबह से तेने कुछ भी नहीं खाया है. पर खुशी मना. सोने से पहले ही सही, मैं अपने घर तो लौट आया. वरना बहुत-से मर्द तो आज की रात भी अपनी ब्याहता के बजाय माशुका की बांहों में बिताते हैं.’

सुबह से भूखी-प्यासी, तिल-तिलकर बाट जोहती मां, बापू की रूखी-सूखी बातें सुनकर सिहर-सिहर जाती. फिर होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाने लगती. मानो कोई टोटका या मंत्र-जाप कर रही हो….कि मनौतियां मांग रही हो….प्रार्थना कर रही हो अपनी अपनी देवी मां से….मना रही हो रूठे हुए ईश्वर को कि उसकी गृहस्थी चाहे जैसी भी, जितने भी दुःख-अभावों से भरी है, सही-सलामत रहे. मां के दुख से बेपरवाह, मन ही मन ऐंठता हुआ बापू अपने बिस्तर की ओर बढ़ जाता था.

कभी-कभी ऐसा भी होता कि मां बापू का इंतजार कर रही होती. जबकि बापू पुलिस के हत्थे चढ़कर हवालात में ऊंघ रहा होता. करवाचौथ या कोई और व्रत हो तो बापू को हवालात से निकलने का खास बहाना मिल जाता. याद आते ही वह पुलिस को अपने पुराने संबंधों का हवाला देता. लेने-देने की बात आती तो भी पीछे नहीं रहता. नकद न हो तो उधार का वायदा कर छूट आता था.

नियमित रूप से पीना बापू की आदत बन चुकी थी. घर में वह तभी घुसता जब पांव लड़खड़ा रहे होते. अगर दिन में ठीक-ठाक कमाई हो जाती. जेब में, यदि नकद नारायणा हो….रकम अपनी या फिर उधार ही क्यों न हो, उस समय उसका उत्साह देखते ही बनता था. उस दिन नशे में होते हुए भी होशोहवास में होने का दिखावा करता. घर में घुसते ही अपने कूल्हे मटकाने लगता. जोश में भरकर वह कोई चालू फिल्मी गाता. हम सब बच्चे कौतूहल से उसे देखने लगते. फिर उसको घेरकर खड़े हो जाते थे. बापू को अपनी संतान से जरा भी प्यार, मोह-ममता नहीं थी. कम से कम हमें तो यही लगता था. जब वह बहुत प्रसन्न होता तो पचास पैसे या एक रुपये का सिक्का हमारी हथेलियों पर रख देता. उस समय सबकुछ भुलाकर बापू पर गुमान करते हुए हम बाहर की ओर भाग छूटते.

हमारे बाहर निकलते ही वह मां को बाहों में भर लेता था. फिर जोर से भींचता. मां कसमसाती….नाक से आती शराब की घिनघिनाती हवा उसे तड़फा देती. इसकी परवाह किए बिना बापू बड़ी बेशर्मी से कोई चालू शेर मां को सुनाने के लिए बोलता. परंतु मां की कसमसाहट जरा-भी कम होने का नाम न लेती थी. उसका नशा हमारी भूखी-प्यासी मां पर कितना कहर ढाता है, इसपर हमारा ध्यान ही नहीं जाता था. पैसे हथेली पर आते ही बापू की भंड़ैती हमें प्यारी लगने लगती. उसका हर दोष हमारी नजरों में बड़प्पन बन जाता. पर नशे में देर तक संभले रहना संभव न होता. अंततः मां ही उसका सहारा बनती. वह उसे जैसे-तैसे बिस्तर तक पहुंचा देती.

चारपाई पर पड़ने से पहले बापू खूब ऐक्टिंग करता. मां उसे देख-देखकर परेशान होती. खाना वह तभी खाता जब उसका नशा ढीला पड़ जाता. बापू को खिलाने के बाद मां उसके बचे हुए कौर निगलती. नशा यदि गहरा हो तो बापू की आंखें सुबह ही खुलतीं. इस कारण मां को भूखी ही सोना पड़ता था. उस रात वह बापू की जूठन भी मां के गले का कौर न बन पाती थी.

बापू की मनमानियां अनंत थीं. मगर मां की सहनशीलता भी अतुलनीय थी.

क्रमश:…

****

ओमप्रकाश कश्यप

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