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दंश – तीसरी किश्त

धारावाहिक उपन्यास

आज बापूधाम को बसे वर्षों बीत चुके हैं. विधवा की मामूली झोंपड़ी से महानगर का सबसे बड़ा वोट उत्पादक क्षेत्र बनने की, बापूधाम की कथा बेहद रोमांचक है. मगर कितने लोग हैं जो इस हकीकत से परिचित हैं. सिवाय बस्ती के दो-चार बूढ़ों या सीलन और दीमक से नाममात्र को बचे थोड़े-से सरकारी रिकार्ड के.

बापूधाम नाम बस्ती के लिए बहुत ही शुभ सिद्ध हुआ था. नामकरण के बाद बस्ती ने जिस गति से तरक्की की थी, वह भी अपने आप में एक मिसाल है. बापूधाम शहर की प्रगति को मापने का पैमाना बन चुका था. आदर्श और सर्वमान्य पैमाना. जिसमें चूक की जरा भी संभावना नहीं थी.

बापूधाम में झुग्गियों की संख्या में जितनी वृद्धि होती, उतने ही वहां की गरीबी को चार चांद लग जाते थे. उसी अनुपात में बढ़ जाती थी महानगर की जनसंख्या. उससे भी चार गुना महानगर के अमीरों की अमीरी बढ़ जाती. इधर झुग्गियां बढ़तीं….उधर कोठियां. इधर नालियों में कीचड़, कीचड़ में गिजबाते कीड़ों की संख्या बढ़ती, उधर सड़क पर दौड़ती कारें, कारों की लंबाई, उनकी चमक बढ़ती चली जाती….कि जैसे होड़ लगी हो आपस में….झुग्गियों में रहनेवाले यदि सौ बढ़ते तो कोठियों की जनसंख्या केवल पांच ही बढ़ पाती. मगर उनकी अमीरी सौ गुनी आगे खिसक जाती थी.

ऐसा नहीं है कि बापूधाम के बसने का कभी विरोध नहीं हुआ. बल्कि हर मलिन बस्ती की तरह बापूधाम की जनता को भी शुरू में खूब कष्ट सहने पड़े थे. स्वच्छता और शुचिता की दुहाई देनेवाले लोग तो आज भी कम नहीं हैं. पर वे लोग जानते हैं कि उनके घरों को साफ-सुथरा रखने के लिए शहर में ऐसा ठिकाना जरूरी है, जहां उनके घरों-मकानों के साथ-साथ उनके दिलों और दिमागों की गंदगी को समेटा जा सके. बापूधाम जैसी बस्तियां इसी कारण महानगरों की जरूरत बन जाती हैं. जो काम गटर का करतीं हैं और नाम अपने नेता का. उनका धर्म होता है शेष महानगर को साफ-सुथरा रखना.

खैर, संकट के दिनों में भी उस युवा नेता ने, जब तक वह जिंदा रहा, बापूधाम की रक्षा ढाल बनकर की थी. जब-जब लोगों के भड़कावे पर पुलिस परेशान करना शुरू करती, तब-तब वह बीच में आ जाता था. जब तक जिया तब तक बापूधाम के निवासी उसके कृतज्ञ बने रहे. लेकिन यह कृतज्ञता उनके मतदान के निर्णय को प्रभावित नहीं कर पाती थी. अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए उस युवा नेता को भी बोतलों का सहारा लेना पड़ता था. ठीक ऐसे ही जैसे दूसरे उम्मीदवार करते थे. बल्कि हकीकत तो यह है कि इस नजराने की शुरुआत भी उसी ने की थी.

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मेरे जन्म की कथा तो और भी विचित्र है, बाबू!

बापू अनपढ़ भले ही हो, पर नालायक नहीं था. कमी सिर्फ इतनी थी कि उसका दिमाग केवल शराब के मामले में तेज चल पाता था. घर चलाने को मां थी ही. बाकी काम भी जैसे-तैसे सध जाते. जो छूट जाते उनका अफसोस घर के बाकी सदस्यों को हो तो हो, बापू कतई परवाह नहीं करता था. बोतलों का हिसाब रखने में बापू से कभी भूल नहीं होती थी. बल्कि दुनिया-भर का एक यही काम था, जिसे वह पूरी ईमानदारी और प्रवीणता के साथ निपटाता. छोटे-मोटे विवादों को छोड़कर बापू की कोई आलोचना भी नहीं होती थी. अपने इसी हुनर के कारण वह बस्ती के अधिकांश घरों में पहचाना जाता. यही उसकी एकमात्र योग्यता थी. शायद यही उसके जीने का मकसद भी.

चुनाव की घोषणा होते ही बापू की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं. हर पार्टी, हर नेता की ओर से उसे ससम्मान बुलावा आता. बल्कि उसे बुलाने और अपने पक्ष में रखने के लिए नेताओं और पार्टियों में होड़ मच जाती थी.

उन दिनों बापू के पास खूब बोतलें आतीं. वोटों की खेती जमकर लहलहाए, इसके लिए हर नेता शराब की नहरें बहाने को तैयार रहता. शराब की इतनी पेटियां आतीं कि झुग्गी में उन्हें रखने के लिए जगह कम पड़ जाती. तब पड़ोस की कुछ झुग्गियां किराये पर लेनी पड़ जातीं. उनका नकद किराया न तो कोई मांगता था, न ही उसकी जरूरत पड़ती थी. हर रोज बढ़िया शराब पेट-भर पीने को मिलती रहे, झुग्गी-मालिक इसी में खुश रहता था. यदि कभी-कभार नकद किराया देना पड़े तो उसका बोझ उम्मीदवार मिलकर उठाते थे.

महानगर के सारे पुलिसकर्मी बापू को पहचाते थे. चुनाव के दिनों में तो पुलिस बापू की हर संभव मदद करती. बदले में एक-दो बोतल देकर बापू भी पुलिस को बहलाए रखता था. हर पुलिसिया बापू के साथ अदब से पेश आता. चुनाव की आहट के साथ ही सिपाहियों के लिए भेंट का कोटा अलग से तय कर दिया जाता. उसकी व्यवस्था भी नियमानुसार कर ली जाती थी. तमाम कवायद का लाभ मतदान के दिन देखने को मिलता. जब बापू और उसके आदमियों को ‘ठप्पा मारने’ के लिए ‘लाइन क्लीनर’ मिलती. कभी-कभी झगड़ा भी हो जाता. उस समय बापू जान पर खेलकर भी अपने उम्मीदवार का काम पूरा करता था.

उम्मीदवार को दिया गया वचन हमेशा निभाया जाता. कुछ सिपाही बापू के ‘एहसान’ का बदला बाद में चुकाते. वे उसके छोटे-मोटे अपराधों को नजरंदाज कर जाते थे. बापू शराब के बदले मिली छूट को सिपाहियों की दरियादिली मानता. हालांकि वह डरपोक भी कम न था. पुलिस का संरक्षण पाकर भी उसने शायद ही कभी बड़ा हाथ मारा हो. पुलिस के कहे-अनकहे को वह अच्छी तरह समझता था.
बापूधाम के निवासी गरीब भले हों, परंतु एहसानफरामोश वे हरगिज न थे. कर्ज लेते तो उसे चुकाना भी जानते थे. एहसान लेते तो उसका मोल देना भी उनके स्वभाव का हिस्सा था. अपने आचरण में बापूधामवासी पूरी तरह ईमानदार थे. यही उनकी खूबी थी. जिस शाम को चुनाव प्रचार संपन्न होता, उस रात बस्ती के सारे मर्द एक जगह जुटते. सभा होती. आपस में विचार-विमर्श और हंसी-दिल्लगी भी चलती रहती. उन सभाओं की अनौपचारिक अध्यक्षता प्रायः बापू ही करता था.

सभा में उम्मीदवारों द्वारा भिजवाई गई शराब और उसकी क्वालिटी पर भी चर्चा होती. प्रत्येक ब्रांड के स्वाद पर बस्ती के मतदाताओं की राय ली जाती. सभा में मौजूद लोग अपना-अपना मत देते—अनुभव सुनाते और निर्णय लेते थे. जिस ब्रांड के पक्ष में सबसे अधिक मत पड़ते. आम राय भी करीब-करीब उसी उम्मीदवार के पक्ष में बनती, जिसने वह ब्रांड भेंट किया होता. उस उम्मीदवार की प्रशंसा में हर कोई कसीदे पढ़ता. सभा की समाप्ति पर जोरदार दावत होती. बोतलें खुलतीं. उठते-उठते शराब के कई दौर चलते. इस अवसर पर सारा इंतजाम बापू की ओर से होता. नशे के कारण जब संभलना मुश्किल हो जाता, तभी अपने-अपने घर लौटने की बारी आती. ऐसी महफिलें देर रात तक जमतीं. शिकवे-शिकायत और यहां तक कि मारपीट के भी कई-कई दौर चलते. गाली-गलौच, हंगामे और नशे के साथ-साथ मस्ती बढ़ती ही जाती.

झुग्गियों में बंद औरतें दरवाजों की ओट से मर्दों के कारनामे देखतीं. कभी हंसती तो कभी उदास होतीं. कभी अपने-अपने मर्द पर गर्व करतीं तो कभी उसकी नासमझी पर छाती पीटने लगतीं. पत्नियों को घंटों इंतजार करवाने, तड़फाने के बाद पति लोग अपने-अपने घर में घुस जाते थे. भीतर जाते ही औरतें उन्हें सहारा देतीं. सहारा देने के लिए स्त्रियों का झुग्गी से बाहर आना निषिद्ध था. पतियों की मर्दानगी को ललकारने जैसा भीषण अपराध. जिसकी सजा हाथा-पाई से लेकर तलाक तक पहुंच जाती थी.

एकाध अपवाद को छोड़कर औरतें भी अपनी ‘सीमा’ में रहती थीं. उस समय तक सारा शहर ऊंघने लग जाता. दिन-भर वाहनों का बोझ उठाने से थकी हुई सड़कें, अंधेरे की मोटी चादर ओढ़कर, सोने की कोशिश करतीं. परंतु कई बार जल्दी पहुंचने के चक्कर में ट्रक ड्राइवर अपने वाहन को बापूधाम की ओर मोड़ देते थे. उसकी ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर ट्रक धड़धड़ाता हुआ गुजरता. मानो कोई आतंकवादी हो. दिन-भर के काम से थके लोगों की नींद उचट जाती. उन्हें अपनी निरीहता का, बलत्कृत होने जैसा एहसास होता.

ट्रक ड्राइवर को गालियां देना तो निभ जाता. इससे अधिक पंगा लेना उनके बूते से बाहर था. फिर ट्रक भी तो उन्हीं मालिकों के थे, जहां वे नौकरी करते थे. इसलिए करवट बदलकर लेट जाना मजबूरी थी. नींद मैं खलल न पड़े इसके लिए कुछ लोग दो पैग ज्यादा चढ़ा लेते. फिर सभाओं-महफिलों में इस चतुराई का बखान बढ़-चढ़कर किया करते थे.

नशा ज्यों-ज्यों गुलाबी होता, बस्ती के लोगों की कर्तव्यपरायणता जोर मारने लगती. गृहस्थ लोगों के लिए रात्रि का अंधेरा और एकांत, कुछ कर दिखाने का अवसर उपलब्ध कराते. सन्नाटा उनकी रगों को रूमानियत से भर देता. वे यह कसम खाकर कि बीते दिनों में जिसने उनके लिए ‘बढ़िया’ का इंतजाम किया था, जिससे कि उनकी आज की शाम रंगीन हुई है, उसके लिए एक नया और निष्ठावान मतदाता पैदा करना, उनका पुरुषोचित धर्म है, अपने कर्तव्य-पालन में तल्लीन हो जाते.

दिन-भर राजनीति और अपने पतियों के निठल्लेपन को कोसनेवाली पत्नियां अभिसार के कोमल पलों में पति के आगे तन-मन न्योछावर कर देतीं. वे लोकतंत्र को समृद्धि प्रदान करने वाले, पावन-पुनीत और आनंदक कार्य में पति को पूरा सहयोग प्रदान करतीं.

स्त्री और पुरुष के उस देहात्मिक सम्मिलन से बापूधाम में जीवन खूब समृद्ध होता. झुग्गियां किलकारियों से गूंजती ही रहतीं. आत्मसंतोष और धैर्यशीलता बापूधाम के निवासियों के चरित्र की प्रमुख विशेषताएं थीं. गुस्सा उन्हें बहुत कम, शायद ही कभी आता. गलियों से गुजरते समय कीचड़ उनके कदमों से लिपट जाता, वे उसे भी अपने साथ लेकर काम पर निकल जाते. बदबू आते-जाते उनके नथूनों में हलचल मचाती, वे मुंह से दो-चार भीषण किस्म की गालियां निकालकर अपना कलेजा ठंडा कर लेते. भूख और बेकारी सताने लगती, तो नियति से समझौता कर घर में बैठ जाते….बच्चों को मारने-पीटने लगते. बाहर अगर कोई बड़ी खटपट हो जाती तो पति लोग अपनी पत्नियों को पीटकर उसका आवेग उतार देते थे.

नियति का वरदान कि बापूधम की स्त्रियां एकदम ‘गाय’ थीं. गुस्सा आने पर मैके जाने की धमकी देने के अलावा उन्हें कुछ आता ही नहीं था. पुरुष जानते थे कि मैके से लौटना तय है. अतः स्त्रियों की यह धमकी कारगर नहीं हो पाती थी. जलकर मरने की धमकी तो कोई नादान स्त्री ही देती. वह भी अपनी धमकी पर अमल नहीं कर पाती थी. हालांकि स्टोव और मिट्टी का तेल बापूधाम की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा थे. स्टोव फटने की दुर्घटनाएं भी अक्सर हो रहतीं, जिन्हें किस्मत की दगाबाजी कहकर नजरंदाज कर दिया जाता था. पुलिस आकर सब मामला रफा-दफा कर जाती. बल्कि ऐसे मामलों में वही सबसे बड़ी मददगार सिद्ध होती थी.

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तो बापू ऐसी थी हमारी बस्ती जहां मेरा बचपन बीता.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानी बापू के नाम पर बसी वह बस्ती, देश के लोकतंत्र की आधारशिला थी. अगर मैं यह कहूं कि बापू के इस देश में लोकतंत्र का भविष्य, बापूधाम में जन्मे मतदाताओं के फैसलों या उनकी मूर्खताओं पर टिका हुआ था, तो यह भी गलत नहीं होगा. इस देश में महानगरों और

महानगरों में बापूधाम जैसी बस्तियों की भले ही कमी न हो, तो भी मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारी बस्ती जितने भरोसेमंद, भले और सस्ते, मात्र आश्वासनों के बदले अपनी नाक में खुशी-खुशी नकेल डलवा लेने वाले, भूखे पेट अपने नेता की जय-जयकार करने वाले मतदाता, इस देश में शायद ही किसी और बस्ती के हों.

मतदाताओं का प्रचुर उत्पादन बगैर गरीबी और शराब के संभव न था. गरीबी उन्हें सपने दिखाती. शराब वोटर-उत्पादन प्रक्रिया के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती. बापूधाम इन सब घटनाओं को पूरी आत्मीयता के साथ आत्मसात कर लेता था. चुनाव काल में हुए स्त्री-पुरुष संसर्ग से जो संतान जन्म लेती, उसका नामकरण अपने पसंदीदा नेता या उसकी पार्टी के नाम पर किया जाता.

आप मानें या न मानें, बापूधामवासियों को नामकरण का बहुत अच्छा अभ्यास था. जिनकी रुचि राजनीति में होती, वे अपनी संतान का नाम अपने पसंदीदा दल के नाम पर रख लेते थे. जिनके मुंह पर किसी खास ब्रांड का स्वाद चढ़ा होता, वे पसंदीदा ब्रांड को ही नामकरण का आधार बना लेते थे. मतदान हेतु किसी उम्मीदवार-विशेष के पक्ष में बनी तात्कालिक सहमति या असहमति का इस नामकरण संस्कार से कोई लेना-देना न था. हर व्यक्ति अपने पसंदीदा नेता, दल या ब्रांड के आधार पर अपने कुलोत्पन्न, भावी मतदाता का नामकरण करने को स्वतंत्र रहता था.

बापूधाम के लोग शराब पीकर भले ही वोट देते हों, परंतु वे कृतघ्न कदापि न थे. एहसान का बदला चुकाना उनका स्वभाव था. लोकतंत्र उनके हाथों में सर्वथा सुरक्षित है—यह सभी बुद्धिजीवियों का मानना था. उस रात के संसर्ग से उत्पन्न संतान, अगर वह लड़की हो तो उसका नाम सपइया, बसपइया, कांग्रेसो, भैपई या भजपई वगैरह रख लिया जाता. अगर लड़का हो तो भी कोई गम नहीं. उस अवस्था में इन्हीं नामों को संशोधित कर, तत्काल इनके पुर्लिंग शब्द गढ़ लिए जाते.

बस्तीवाले नए-नए नाम गढ़ने की कला में प्रवीण थे. बड़े होकर वे बच्चे भी अपने नामकरण-रहस्य का पूरा लाभ उठाते. तब उन्हें अपने नाम से साम्य रखनेवाली पार्टी के पिछलग्गुओं में बड़ी आसानी से स्थान मिल जाता था. आगे चलकर वही लोग सस्ते चुनाव-कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध मतदाता-वर्ग में गिने जाते. ताली बजाना आमतौर पर सभ्य लोगों का गुण होता है. परंतु बचपन से ही अभ्यास करने के कारण वे इस कला में भी निपुणता प्राप्त कर लेते थे. ऐसी स्थिति में दल-विशेष की ओर से जब भी कोई कार्यक्रम होता तो उन्हें तालियां बजाने के लिए साधिकार बुलवाया जाता.

चुनाव के दिनों में वही बैनर टांगने और पोस्टर चिपकाने का काम बिना किसी लालच, पूरी निष्ठा के साथ करते. सौभाग्यवश इनमें अगर कोई लड़का दबंग निकल आता तो उसके नेता की लाॅटरी खुल जाती. उस लड़के को बूथ लूटने जैसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी. एन्काउंटर की घड़ी आने तक वह पूरे जोशो-खरोश के साथ बूथ लूटने का काम करता, नेताओं के दूसरे काम साधता. अपने नेता के इशारे पर वे लड़के उसके प्रतिद्वंदी को डराने, धमकाने से लेकर ‘टपकाने’ तक का कार्य खुशी-खुशी कर देते थे. उनके लिए जरूरत पड़ने पर चरस और गांजा सप्लाई करते, झूठ बोलते, जेल-हवालात जाते. अपने घर-परिवार, बीबी-बच्चों यहां तक कि खुद को भी दाव पर लगाए रखते….

देश में आदमी की औसत जीविता भले की सत्तरवें वर्ष को छू रही हो. मगर राजनेताओं की मेहरबानी से बापूधाम में वह चालीस से ऊपर नही झांक पाई थी. बापूधामवासी इसी से प्रसन्न थे. भूख-बेकारी, हारी-बीमारी, नेता और पुलिस की मेहरबानी से जितना भी जीवन उन्हें मिलता, वे सहर्ष जी लेते. मरते समय भी उनकी जुबान पर अपने नेता का नाम रहता….दिल में उसके लिए देश की सबसे बड़ी कुर्सी की कामना.

बहरहाल, ऐसे दबंग लड़कों को तरक्की भी जल्दी मिलती. पार्टी हाईकमान की मेहरबानी से ऐसे काम के लड़कों को अविलंब पार्टी-संगठन से जोड़ लिया जाता. अगर इसके बाद भी उनका दबंगपना बना रहे तो गली-मुहल्ले की दादागिरी, लड़कियों को छेड़ने और पुलिस को धमकाने के अधिकार भी उन्हें बारी-बारी से प्राप्त हो जाते.

बापू इन सबका प्रेरक था. वह बिना किसी भेदभाव से हर नेता को ‘लड़के’ उपलब्ध कराता. यही कारण है कि सब बापू की इज्जत करते थे. तुम कहोगे कि पढ़ाई? रात-दिन अपने नेता की सेवा करने वाले बच्चे स्कूल कब जाते थे? बड़े नादान हो बाबू! पढ़ाई-लिखाई की जरूरत तो उन लोगों को पड़ती है, जिन्हें अपना भविष्य अनिश्चित जान पड़ता हो. बापूधाम में तो कुछ भी अनिश्चित नहीं था, भूख और बेकारी, गरीबी और लाचारी, नेता की गुलामी, पुलिस की लताड़, जिंदगी की ठोकरों से लेकर अंत में मौत की ताबेदारी तक….सभी कुछ एकदम सुनिश्चित था.

तो ऐसा था मेरा बापू और हमारा बापूधाम! जहां मैं जन्मा और पला-बढ़ा. जहां मैंने कदम-कदम चलना सीखा. जहां मुझे देवी जैसी मां मिली. जहां रहकर मैंने दुनिया को जाना-समझा. जहां बेशुमार ठोकरें मिलीं और जहां मेरी बरबादी की यह दर्दभरी दास्तान लिखी गई.

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मेरे जन्म की कथा बड़ी विचित्र है….!

अनहोनी जैसा था मेरा जन्म. हालांकि बापूधाम के लिए यह बहुत ही सामान्य घटना थी. चुनावों के आठ-नौ महीने बाद वहां ऐसी अनहोनियां अक्सर घटती रहती थीं. मां बताया करती थी कि बापू ने मुझे एक निर्दलीय उम्मीदवार परमात्माशरण से पूरे पांच सौ रुपये और ‘अंग्रेजी का अद्धा’ लेने के बाद पैदा किया था. उसकी शराब का स्वाद बापू के मुंह ऐसा चढ़ा कि वह महीनों तक केवल परमात्माशरण का नाम जपता रहा.

यद्यपि उन चुनावों में बापू ने अपना कीमती वोट, बस्ती में बनी आम सहमति के आधार पर, किसी और उम्मीदवार को दिया था. यह भी सच है कि चुनाव में परमात्माशरण की हार हुई थी. उसकी हार भी पहले से ही तय थी. परमात्माशरण के चुनाव हार जाने का बापू को जरा भी गम नहीं था.

जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं, अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और बापूधाम की परंपरा के अनुसार, वह अपनी संतान का नाम परमात्माशरण या उसके द्वारा भेजे गए ब्रांड के नाम के आधार पर रख सकता था. बापूधाम में कई लड़कों के नाम रमन्ना, विहस्कर, लड़कियों के ब्रांडो, रमाली, जिन्नी जैसे थे. परमात्माशरण द्वारा भिजवाए गए ब्रांड का स्वाद भी अनूठा था. बापू बात-बात पर उसका नाम लेता, उसके स्वाद की दुहाई देता था. उसकी चसक महीनों तक उसके दिलो-दिमाग पर सवार रही. बावजूद इसके वह मानता था कि ब्रांड से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है—परमात्माशरण! जिसने दरियादिली दिखाते हुए वह अद्भुत ब्रांड बस्तीवालों तक पहुंचाया है.

बापू ने कई दिनों तक इस मुद्दे पर सोचा. बापूधाम के गुणीजनों से सलाह-मशविरा किया. सभी का मत था कि यद्यपि ‘ब्रांड’ अनूठा है, महत्त्वपूर्ण है. लेकिन परमात्माशरण की कृपा उससे भी ऊपर है, क्योंकि उसी ने उस ब्रांड के दर्शन कराए हैं. अपने तर्क के समर्थन में गुणीजनों ने यह दोहा भी पढ़ा था—

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय.

दोहा सुनाने के साथ ही गुणीजनों ने उसकी व्याख्या भी कर दी थी—

‘परमात्माशरण गुरु है. वही ब्रांड ‘गोविंद’ से मिलवाने वाला है. इसीलिए बाबा कबीरदास जी के अनुसार परमात्माशरण का दर्जा उससे भी ऊपर है?

बापू तो परमात्माशरण की मेहरबानी से इतना अभिभूत था कि अगर उसका बस चलता तो परिवार के सारे सदस्यों के नाम परमात्माशरण के नाम के अनुसार बदल देता. मां के लिए तो उसने एक नया नाम सोच भी लिया था—परमी! या परमपियारी…! जो भी नाम मां को पसंद आए. बापू ने उदारता का प्रदर्शन करते हुए, इन दोनों नामों में से कोई एक नाम अपने लिए चुनने का प्रस्ताव मां के आगे भी रखा था. परंतु मां सुनते ही बिफर पड़ी थी.

मैंने मां को पहली बार इतने कोप में, बापू से झगड़ते हुए देखा था. जो हो मां के गुस्से को देख बापू को पूरे परिवार के नाम बदलने का इरादा छोड़ना ही पड़ा. अंततः बहुत सोच-विचार के पश्चात, बापू ने मुझे नाम दिया था—परमात्मा!

परमात्माशरण के प्रति अपनी पूरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाने लिए वह मुझे उसका पूरा नाम देना चाहता था. किंतु शराब से लड़खड़ाती हुई जुबान द्वारा, परमात्मा के साथ ‘शरण’ का उच्चारण करना लंबा और बहुत मुश्किल-भरा काम था. हालांकि बापू ने इसका अभ्यास करने की काफी कोशिश की थी.

बापू के संगी-साथियों ने बताया था कि एक बार निश्चित हो जाने के पश्चात वह कई दिनों तक ‘परमात्माशरण….परमात्मा..शरण’ रटने की कोशिश करता रहा था. परंतु शराब से ढीली पड़ी जुबान कभी परमात्मा सुरण कहती तो कभी परमात्मा हरण तक फिसल जाती. वह चाहे जैसा भी हो, था तो मेरा बाप ही. अपनी औलाद का नाम परमात्मा हरण या परमात्मासुरण कहने की बेशर्मी तो दिखा नहीं सकता था. यह तो परमात्माशरण के प्रति घोर कृतघ्नता होती. अंततः उसे परमात्मा सेन से ही संतोष करना पड़ा.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

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