1 टिप्पणी

दंश—धारावाहिक उपन्यास

दूसरी किश्त

नमस्ते, बाबू साहेब!

हुजूर! मैं परमात्मा सेन उर्फ परमात्मा शरण वल्द घुरिया, उर्फ घनश्याम आपको अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूं—सुनिएगा न!

सिरीमान! कहानी शुरू करूं उससे पहले आपसे एक गुजारिश है. जरा धीरज बनाए रखिएगा. क्योंकि बात जरा लंबी है. हां, यदि बोर होने लगेंतो शरमाइएगा मत. हाथ उठा देना. मैं चुप हो जाऊंगा. पर मुझे विश्वास है कि आप बोर नहीं होंगे. क्योंकि आगे जो मैं बताने जा रहा हूं वह मेरे घर का मामला है. दुख, तखलीफों और संघर्ष में आकंठ डूबा हुआ. दूसरे की असफलता की कहानी रुचिकर तो होती ही है. उसमें ईर्ष्या के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती.

मैं वायदा करता हूं कि आगे जो भी कहूंगा, बिल्कुल सच कहूंगा. वे बातें बिलकुल साफ-साफ कहूंगा जो मुकम्मल हैं, जो मेरे साथ घटीं. वे नहीं जो घटते-घटते रह गईं.

बाबू साहेब! मेरे ‘मैं’ की कहानी जो असल में एक अ-कहानी ही है, भारत के एक महानगर के बड़े वोट-उत्पादक क्षेत्र से प्रारंभ होती है. आप हैरान हैं यह सुनकर? लगता है मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ आपको. या फिर कड़वी सचाई ने आपके होश फाख्ता कर दिए हैं. हो तो यह भी सकता है कि आप अभी बात की तह तक पहुंच ही नहीं पाए हों. अथवा यह भी कि आप जानबूझकर अनजान बनने का नाटक कर रहे हों.

जो हो….अपनी आप जानें. मैंने तो जो जिया, जैसा भोगा वही कहूंगा, एकदम साफ-साफ!

तो यह कहानी एक महानगर की है. महानगर जो अपनी भीड़ के लिए जाने जाते हैं. और भीड़ से ही विस्तार पाते हैं. उस भीड़ में मेरे जैसे और भी कई ‘मैं’ हो सकते हैं. यह कहानी किसी और के ‘मैं’ की भी हो सकती है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कहानी मेरे ‘मैं’ की है या किसी और के ‘मैं’ की. इस महानगर की है या उस महानगर की.

हर महानगर एक तालाब होता है. दिखावे के लिए उसमें दस-पांच कमल खिले होते हैं. सतह से ऊपर…महानगर के मुखौटे के माफिक. प्रत्येक महानगरवासी उन्हीं को अपनी हकीकत मानता है. हर जगह उसी का प्रदर्शन करता रहता है. मगर पानी की सतह के नीचे, घने दलदल में, बेशुमार कीड़े गिजबिजाते रहते हैं. और यह तो हम सभी जानते हैं कि झांड़-झंखाड़ के बीच, बदबूदार कीचड़ में रेंगते, गिजबिजाते और गिरते-पड़ते कीड़ों की भीड़ में कोई भी ‘मैं’ विशिष्ट नहीं होता. इसलिए कोई भी कहानी निरपेक्ष नहीं होती. ना ही सर्वथा अनोखी.

चूंकि इस कहानी को मैं सुना रहा हूं. इसलिए मान लीजिए कि यह कहानी मेरे ही ‘मैं’ की है. वह कहानी किसी भी ‘मैं’ की हो सकती है. इसलिए मैंने इसे अ-कहानी माना है.

महानगरों को अगर भारत की प्रगति का प्रतीक माना जाए तो वहां की प्रगति का ग्राफ दर्शाती हैं—बेशुमार झुग्गियां. जितनी अधिक झुग्गियां उतनी ही अधिक गरीबी. जितनी अधिक गरीबी…चंद लोगों के पास उतनी ही ज्यादा अमीरी. जितनी ज्यादा झुग्गियां, उतना ही बड़ा महानगर. जितना बड़ा महानगर, उतना ही उसका महत्त्व.

महानगरों की रौनक में झुग्गियां उतनी ही जरूरी होती हैं जितनी कि फैशन परेडों में परंपरागत भारतीय परिधान. देश की किस्मत बदलने निकले सुरसामुखी नेताओं के लिए ये झुग्गियां ही सौभाग्य के द्वार खोलती हैं. ये अगर मेहरबान हों तो गली-गली चप्पलें चटकानेवाला शोहदा, कुबेर के खजाने पर बैठ, देश का भाग्य-विधाता बन जाता है. एक हिस्ट्रीशीटर को आममाफी मिल जाती है. अनपढ़, गंवार, कूंपमंडूक और निर्बुद्धि आदमी देश का कर्णधार, नीति-निर्माता मंत्री और राष्ट्राध्यक्ष बन जाता है. बूढ़ा होते-होते वह विदेशी बैकों में पांच-सात खाते खुलवा लेता है. बीमार होकर इलाज के बहाने विदेश यात्राएं करता है. उसका इलाज कराते-कराते देश बीमार पड़ने लगता है. मरने से पहले वह अपने कुंटुबियों के नाम तीन-चार महानगरों जितनी संपत्ति छोड़ जाता है.

और देश! वह तो गरीब की गाय ठहरा. पक्ष और विपक्ष जिसे बारी-बारी दुहते हैं. दुहते ही रहते हैं.

झुग्गियों को महानगर की जनसंख्या-वृद्धि के सामूहिक कुटीर उद्योग भी माना जा सकता है. इन्हीं के दम पर सरकारें बनती हैं. इन्हीं के दम पर सत्तापक्ष देश की संपत्ति की लूट-खसोट करता है—विपक्ष सत्ता में आने के सपने पालता है. यहीं बूथ कैप्चरिंग के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार किए जाते हैं. सरकार अपनी योजनाएं इन्हीं को ध्यान में रखकर बनाती है…विदेशों से मोटा कर्ज लेकर बड़े-बड़े वायदे करती है. मगर झुग्गियों तक आते-आते योजना-राशि चुकने लगती है. समा जाती है बेईमान दलालों, घूसखोर अफसरों और लंबोदरी नेताओं के पेट में. विवश होकर सरकार को अगले चुनावों तक केवल आश्वासन से काम चलाना पड़ता है. आश्वासन लोकतंत्र की प्राण-वायु हैं. ये मंत्री और कुर्सी के बीच फेवीकोल से भी मजबूत जोड़ बनाते हैं. जिंदगी में आश्वासन, हवा, पानी और बिजली जैसे ही जरूरी हैं.

झुग्गियों में तो बिना आश्वासन के बात बन ही नहीं सकती. भूख, गरीबी, महंगाई, नोंक-झोंक और बेकारी की चैमुखी मार से जब जनता का दम घुटने लगता है तो चतुर मंत्री आश्वासन की प्राणवायु छोड़कर उन्हें नई आशाएं प्रदान करता है. जिन नेताओं के पास आश्वासनों का अक्षय भंडार हो, वे संसद की मारपीट में भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं. जीते जी महानता के तंबू में रहते हैं, मरने के बाद अमर कहे जाते हैं.

बाबू साहेब! ऐसे ही एक महानगर में एक मलीनतम बस्ती थी—बापूधाम! मैं वहीं पर पैदा हुआ था या यह कहो कि पैदा किया गया था.

बापूधाम की बसावट कब शुरू हुई, इसके बारे में तो बापू को भी ठीक-ठीक जानकारी नहीं थी. लेकिन बस्ती के बुजुर्ग बताया करते थे कि जब से हमारे शहर को महानगर बनने का शौक चर्राया, तभी से इस बस्ती के दिन बहुरे थे. इससे पहले वहां गंदा नाला बहता था. जिसमें शहर-भर का गंदा पानी आता था. शहर ज्यों-ज्यों तरक्की कर रहा था, त्यों-त्यों उस नाले की गहराई और चौड़ाई भी बढ़ती जा रही थी. साथ-साथ बढ़ रहा था नाले का पानी…पानी में कीचड़…कीचड़ में गिजबिजाते हुए कीड़ों की संख्या…बदबू का अनुपात. नेताओं के झूठ और अनाचार…अधिकारियों के निकम्मेपन और भ्रष्टचार जैसा.

बात उन दिनों की है जब उस शहर ने महानगर बनने का ख्वाब देखना शुरू ही किया था. बताते हैं कि उन दिनों एक किस्मत की मारी, बेचारी, विधवा स्त्री अपने पेट में पल रहे पाप को मिटाने के लिए, खुद भी मिटने का संकल्प लेकर गंदे नाले के पास पहुंची थी. उससे पहले भी कई प्राणी, जिंदगी से निराश हो, मुक्ति-कामना के साथ वहां पहुंच चुके थे. महानगर के उच्छिष्ट की भांति, गंदा नाला उन्हें भी अपने भीतर समा लेता था.

विधि का विधान, नाले के निकट पहुंचते-पहुंचते उस स्त्री के मन में प्राणों का मोह उभर आया. ममता दुनियावी संघर्षों और लांछनाओं पर भारी पड़ने लगी. वात्सल्य-भरी छातियों में दूध उतरने लगा. मरने का इरादा छोड़ स्त्री ने इधर-उधर से कबाड़ जुटाया. कुछ बांस-बल्लियों, टाट-पन्नियों का जुगाड़ किया. चार-पांच दिन लगे थे झॊंपड़ी बनाने में. उसी में वह रहने लगी. मृत्यु पर जीवन की विजय हुई. जिंदगी रफ्ता-रफ्ता राह पकड़ने लगी. लोगों का स्वभाव! कुछ दिनों तक तो उस औरत के बारे में टीका-टिप्पणी होती रही. धीरे-धीरे बात आई-गई हो गई. लोगों ने गंदे नाले, उसमें बहने वाले उच्छिष्टों, कीड़ों, जानलेवा बदबू और वहां भटकने वाले आवारा-फालतू बेहया जानवरों के साथ-साथ उस विधवा-मां को भी स्वीकार कर लिया.

समय ने करवट ली. विधवा स्त्री की झोंपड़ी किलकारियों से भर गई. उसके बाद तो उस स्थान की भाग्य-रेखा ही बदल गई. कालांतर में गंदा नाला समाज के बहिष्कृत और संतप्त लोगों की शरणस्थली बनने लगा. न केवल मनुष्य, बल्कि समाज द्वारा ठुकराए हुए जानवर भी जैसे कुत्ता, सूअर, बूढ़ी गाय, टूटी टांगवाला मरियल-सा गधा, मरणासन्न सांड, बिल्लियां, यहां तक कि एक सींगवाला बैल भी वहां पहुंच गया.

धीरे-धीरे गंदा नाला महानगर में अपनी पहचान बनाने लगा. एक उत्साही पत्रकार ने उसपर एक लेख लिखकर नाम कमाया, तो एक जनवादी बनने चले कवि ने लंबी, भाव-प्रवण कविता मंच पर इतनी बार सुनाई कि बाकी कवि अगले वर्ष उसका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करने के बारे में सोचने लगे.

कहते हैं कि इत्र और इश्क छिपाए नहीं छिपते. उस मिट्टी में छिपी गंदे नाले की गंध से कुछ सभ्य किस्म के लोग वहां जाने से भले ही बचते रहे हों. मगर उसमें फूलता-फलता वोट-बैंक नेताओं का मन ललचाने के लिए पर्याप्त था. और फिर जैसा कि स्वाभाविक ही था, एक युवा नेता की नजर उसपर गढ़ गई. नेता बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी था. उस उर्वर भूमि में उसने अपने सपनों की फसल को खूब लहलहाते हुए देखा. उसके बाद तो उसकी आंखों में शुभ सपनों की कतार जैसी लग गई. धीरे-धीरे प्रदेश के मंत्री की कुर्सी भी उसके सपनों में आने लगी. कई बार उसने खुद को संसद भवन में अपनी भारीकम तोंद को खुजाते हुए देखा. आगे कदम बढ़ाने के इतनी उम्मीद पर्याप्त थी.

और फिर एक दिन उस क्रांतिकारी नेता ने क्रांति का आवाह्न किया. सभी को हैरान करते हुए उसने उस बस्ती को गोद लेने की घोषणा कर दी. बाद में संपर्क काम आए. चाटुकारिता ने गुल खिलाया. बस्ती दिनों-दिन फैलती चली गई. पूरे महानगर के मजदूर बेलदार, जेबकतरे, नशैड़ी, रिक्शा-ठेलेवाले…धंधा करने वाली गरीब औरतें, फकीर, जोगी, नट, कलंदर, जुलाहे, मोची, यहां तक कि चोर-उच्चके और उठाईगीरे भी वहां जाकर बसने लगे. कीचड़ से उठने वाले बुलबुलों-सी वह बस्ती भी फलने-फूलने लगी.

युवा नेता की मेहनत रंग ला रही थी. उस समय तक उस दिनों-दिन फूलती-फैलती बस्ती का नामकरण संस्कार भी नहीं हो पाया था. अपनी सुविधा के लिए लोग कुछ भी पुकार लेते थे. हालांकि गंदा नाला अब कहीं नजर नहीं आता था. शहर का गंदा पानी सीवर में ढकेल दिए जाने के बाद से वह मामूली बरसाती नाली जैसा ही दिखता था. झुग्गियों की महा-भीड़ में वह नाली भी गुमशुदा थी. जैसे कि शिवालिकों में गंगा. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि गंदा नाला कहीं गायब नहीं हुआ था. बल्कि वहां के निवासियों की आत्मा में रच-बस गया था. उतर गया था उनके मानस में. तथाकथित सभ्य और बड़े लोगों को तो उस बस्ती में रहनेवालों की देह से भी गंदे नाले की गंध आती. इस कारण जब तक कोई मतलब न हो, वे उनसे दूर-दूर ही रहते थे.

युवा और महत्त्वाकांक्षी नेता की निगाह अभी भी अपने भविष्य पर टिकी थी. अब उसकी चिंता बस्ती का नामकरण करने की थी.

‘नेहरूपुरी कैसा रहेगा?’ उसने अपने आप से पूछा था.

‘नेहरू का जमाना तो कभी का लद चुका.’ मन के किसी कोने ने चेताया.

‘राजीव गांधी नगर…आजकल उनकी पत्नी सरकार की सर्वेसर्वा है. बेटा राहुल प्रधानमंत्री की कुर्सी से बस चार कदम दूर हैं. नगर निगमवाले बस्ती की ओर झांकेंगे भी नहीं.’

‘आजकल सरकारें पांच साल से ज्यादा टिकती ही कहां हैं. दूसरी पार्टी के सत्ता में आते ही संभालना मुश्किल हो जाएगा.’ बुद्धि ने तर्क किया.

‘मानने दो, आजकल कांग्रेस से अच्छी पट रही है. जितना वे बुरा मानेंगे उतना ही इधर वाले खुश हो जाएंगे.’

‘इन दिनों अच्छी पट रही है. किंतु हमेशा यही स्थिति रहेगी, इसकी क्या गारंटी है? खासकर चुनावों में. इधर नहीं तो उधर से ही सही, टिकट पक्का करना है तो कांग्रेस-भाजपा का मोह छोड़ना ही होगा.’

नेता के साथ कशमकश की यह स्थिति कई दिनों तक बनी रही. वह बस्ती को सुंदर और टिकाऊ नाम देना चाहता था. इस बीच उसकी पत्नी ने ‘निर्मला कुटीर’ नाम सुझाया. निर्मला उसका अपना नाम था. वह चाहती थी कि पति अपने पति-धर्म का निर्वाह करे. मगर युवा नेता को सस्ती किस्म की भावुकता नापसंद थी. हालांकि वह जानता था कि हर कामयाब नेता राजनीति का पहला शिकार अपने परिवार को ही बनाता है. इसमें भी उसकी अर्धांगिनी का नंबर सबसे पहले आता है. बाद में भले ही पीढ़ियों तक उन सबका उद्धार करता रहे. इसलिए पत्नी की नाराजगी से घबराए बिना उसने नाम खोजने का काम जारी रखा.

कुदरत की मेहरबानियों का कोई अंत नहीं! युवा नेता के मुंह से ठीक यही शब्द निकले थे जब सौभाग्य के प्रतीक-सा एक नाम अचानक उसके दिमाग में आ कौंधा था—बापूधाम! वह उछल पड़ा था. अपने भीतर उसको बापू का तेज छलछलाता, उछलता, कूदता-सा महसूस हुआ. लगा था कि इस नाम में ‘महान’ बनाने के सारे तत्व मौजूद हैं. नाम नहीं पारस पत्थर है, जिससे भी जुड़ेगा, उसको कंचन कर देगा. भूख, गरीबी, बेकारी, महामारी और सैकड़ों किस्म की व्याधियों के तले दिन-रात पिसने वाले वहां के बाशिंदों को भी बस्ती का नया नाम बहुत पसंद आया. भीड़ का धर्म निभाते हुए वे युवा नेता की जय-जयकार करने लगे. उसे अपने कंधों पर उठाकर नाचने लगे.

नेता को अपने सपने करीब नजर आने लगे…!

देखते ही देखते उस बस्ती में एक मसीहा उतरने लगा. नेता की पत्नी जिद्दी थी. वह घर छोड़कर जाने की धमकी दे चुकी थी. परंतु पति को मिलते सम्मान ने उसकी जिद भी ढीली कर दी. कुछ वर्षों तक वह नेता बापूधाम के वोटों का इकलौता अधिकारी बना रहा. उन्हीं के दम पर वह पार्षद का चुनाव लड़ा और विजयी हुआ. आगे उसकी योजना विधानसभा और संसद तक जाने की थी कि एक कार दुर्घटना ने उसकी लंबी दिखने वाली उड़ान को विराम दे दिया.

बापूधाम…!

मैं उसी बापूधाम में पैदा हुआ था, बाबू!

मेरा बापू कोई नेता नहीं था. किसी पार्टी के साथ उसका कोई संबंध भी नहीं था. इसके बावजूद चुनाव के दिनों में उसके रंग-ढंग पूरी तरह बदल जाते थे. उन दिनों हमारी झुग्गी अचानक खास बन जाती. बापू को पूछने वाले लोगों की भीड़ दरवाजे पर लगी रहती. इससे खुश होकर बापू, सावन के गधे-सा फूला-फूला फिरता. शहंशाह की तरह लोगों को आदेश देता, बात-बात पर उन्हें गरियाता और जरूरत पड़ने पर प्यार लुटाने का नाटक भी करता था.

अपने ही बापू की तुलना गधे के साथ करना बदतमीजी है. मगर मैंने सच कहने का वचन दिया है. अपनी भावनाएं वे जिस भी रूप में मेरे मन में उठी हैं—आपसे छिपा नहीं सकता. इस गुस्ताखी के लिए कृपया मुझे क्षमा करें. दरअसल जिंदगी मेरे बापू के लिए बोझ थी. अगर मां बापू की जिंदगी में नहीं आती तो वह कभी का इस बोझ से छुटकारा पा चुका होता. हालांकि मां का आना भी बापू के लिए खास उत्साह न जगा सका. अपनी बे-ख्वाब जिंदगी को वह बोझ की तरह ढोए जा रहा था. इस तथ्य को वह स्वयं भी जानता था और वे लोग भी, जिनके लिए वह उस बोझ को उठाए हुए था.

बाकी दिनों में बापू को गरियाने वाले लोग, चुनावों में उसे अपना नेता मान लेते थे. वे अपनी छोटी-छोटी समस्याएं लेकर उसके सामने इस प्रकार आते, मानो उसके हाथ में जादू की छड़ी हो, अथवा वह कोई मंत्री या सांसद हो. बापू भी पल्लेदारी और चोरी के अपने रोजमर्रा के धंधे को थोड़े दिनों के लिए छोड़कर सिर पर टोपी सजा, मौसमी नेता बन जाता. देश की राजनीति और शराब को एक समझनेवाले लोग उन दिनों उसके आगे-पीछे घूमते, सलाम बजाते थे.

किसी खास विचारधारा, सिद्धांत या वाद से बापू को कोई मतलब न था. न वह इनमें से किसी का अर्थ ही समझता था. पर वह अकेला आदमी था जो खद्दर पहनकर भी सच बोलने की हिम्मत रखता था और बोलता भी था. नशा ठीक-ठाक हो तो मां सरस्वती उसके कंठ में विराजमान हो जातीं. उस हालत में वह बोतल को नचा-नचाकर कहता था—

‘संविधान-फंविदान को गोली मारो दद्दा! असल ताकत तो इसमें भरी है. यही ससुरी वोटर को खींचकर ‘बुलेट बाॅक्स’ तक ले जाती है. अगर ये लालपानी ना मिले तो देश-भर के बुलेट बा॓क्सों पर कुत्ते लोटते हुए नजर आएं.’

बैलेट बा॓क्स को बापू हमेशा ‘बुलेट बा॓क्स’ ही कहता. उसके लिए भाषणबाजी, नेता द्वारा किया गया काम, कस्मे-वायदे एकदम बकबास और फिजूल थे…चुनावों में कामयाबी दिलाती है—शराब की तीखी गंध, उसकी मात्रा और उसकी दमदार क्वालिटी, ऐसा वह मानता था.

सिर्फ उन्हीं दिनों वह मुंह पर आई बात साफ-साफ कहता. बाकी दिनों में वह चुप्पा किस्म का इंसान था और जरूरत पड़ने पर ही बोलता. राजनीति में जाने के लिए अनेक कारण होते हैं. और होने भी चाहिए. कुछ लोग जानबूझकर बेईमानी का रास्ता चुनते हैं. सजा से बचने की कोशिश उन्हें राजनीति से जोड़ देती. कुछ के लिए जेलें वरदान बन जाती हैं. कुछ गुंडागर्दी, दहशत और दमन का रास्ता चुनकर देश की गर्दन पर सवार हो जाते हैं और बड़ी बेशर्मी से सवारी गांठने लगते हैं.

इन सबसे अलग कारण था बापू का. शराब की लत उसे नेताओं के करीब ले आती थी. उसको भरोसा था कि उसकी अक्ल केवल नशे की हालत में ही काम कर पाती है. हर पैग के साथ दिमाग की सक्रियता को जोड़ने के लिए एक तुकबंदी उसने गढ़ी हुई थी—

एक पैग में थोड़ा-थोड़ा

दूसरे पैग में अरबी घोड़ा

तीसरे पैग में उड़नखटोला

चौथे पैग में राम निहोरा

व्यवहार में यह तुकबंदी अर्थहीन ही थी. जिसपर अमल कर पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव जैसा था. उस समय वह पैगों की गिनती समेत दुनिया-जहान को पूरी तरह भुला देता. उठता तो झूमते हुए. जब बोतल खाली हो चुकी होती. अपनी ही बात पर अमल न कर पाने का बापू को अफसोस जरूर होता. मगर उसके लिए खुद को दोषी कभी नहीं मानता था. इस बारे में यदि कोई उसे छेड़ता तो उसके सब्र का बांध यकायक टूट जाता—

‘हरामखोर-साले-शराब में भी मिलावट करते हैं. भगवान करे उनके बदन में भी वही कीड़े पड़ें जो शीरा को शराब में बदलने का काम करते हैं.’

‘कक्का, उस शराब को पिएगा कौन?’ कोई शरारती उकसावे का काम करता.

‘वे कीड़े ही पिएंगे और मरेंगे, हरामखोर….सूअर!’ हिकारत-भरा जवाब मिलता. आश्चर्य की बात! बापूधाम के अधिकांश मतदाताओं पर बापू का प्रभाव था. देश में राजनीति रोज-रोज करवटें बदलती. कभी वह धर्म की नाव पर सवार होती—कभी जाति की. कभी महंगाई मुद्दा बनती, कभी प्रांतीयता सिर उठाने लगती. दिमागदार लोग कभी आतंकवाद पर चिंता व्यक्त करते, कभी विदेशनीति की खामियों पर. कभी बढ़ती जनसंख्या की पर अपनी चिंता और ज्ञान बघारने लगते. देश की राजनीति में प्रतिदिन नया मसला जन्म ले रहा होता. लेकिन हमारा बापूधाम इन सब परिवर्तनों से अलग और अछूता था.

एक तरह से यह भी बापू का ही कमाल था. राजनीति करने का बापू का अंदाज एकदम निराला था. यूं तो चुनाव के दिनों में बाकी नेताओं की देखा-देखी वह भी खद्दर पहनता. लेकिन असली काम शराब की बोतलों से साधता था. चुनाव का मौसम शुरू होते ही हमारी झुग्गी शराब की पेटियों से भर जाती. बस्ती में मतदाताओं के बीच शराब बांटने की जिम्मेदारी बापू की ही होती. वह अनपढ़-गंवार जरूर था. लेकिन हिसाब का पक्का—कभी भूल नहीं करता था. इस बात को पूरा बापूधाम मानता. इसी कारण चुनाव के दिनों में ही बापू की इज्जत भी होती थी.

मतदान होने के पखवाड़े पहले से ही बस्ती में उत्सवी माहौल बन जाता. प्रत्येक झुग्गी में मतदाताओं की संख्या के हिसाब से बोतलें बांटी जातीं. लेकिन यह मानते हुए कि आज के गैर वोटर भविष्य के पक्के मतदाता हैं, उनको वोटरों से आधी शराब देने का नियम था. यह नियम भी बापू का ही बनाया हुआ था. जिसे बस्तीवालों के साथ-साथ उनके वोटों के खरीददार, चाटुकार नेता सभी मानते थे.

स्त्रियां प्रायः शराब नहीं पीती थीं. मगर बोतलों के बंटवारे के समय अपना हिस्सा मांगने में वे कभी चूकती नहीं थीं. पत्नी के हिस्से की शराब भी पति को पीने को मिलती. इसलिए इन दिनों उजाड़ मान ली गई गृहस्थियों में भी प्यार उमड़ने लगता. एक पत्नी के रहते दूसरे विवाह पर कानून कुछ भी सोचता हो, बापूधाम में दो पत्नीधारी पति को एक पत्नीधारी पति से अधिक शराब मिलती. इस कारण लोग दबे मुंह उन स्त्रियों के नाम भी गिनाने लगते थे, जिनसे उनके दबे-छिपे संबंध हों. मगर बापू को धोखा दे पाना आसान नहीं था. जब तक उन दबे-छिपे संबंधों से वोट बढ़ने की पक्की संभावना न हो, वह उनकी बातों में नहीं आता था.

मामला भले ही शराब बांटने का हो. सामाजिक सरोकारों और शुचिता का भी ध्यान रखा जाता. नियमानुसार बिना विवाह के साथ रह रहे स्त्री-पुरुष को, स्त्री का हिस्सा नहीं मिलता था. परंतु लिखित आचारसंहिता के अभाव और वोट की संभावना को देखते हुए बापू नियम में ढील दे देता था. अगर वह इंकार करे तो वे स्त्रियां स्वयं बापू के पास आकर बहस करने लगती थीं. बापू की कमजोरी थी कि वह बहस से घबराता. अतः वोट की संभावना ना हो, तो भी वह स्त्रियों की बात मान लेता था.

मुफ्त में मिली शराब गंगाजल के समान पवित्र मानी जाती. ऐसी अवस्था में बापू को पुजारी का दर्जा मिलना ही था. बापू के लिए वे दिन बड़ी मौज के होते—वह और उसके साथी तरह-तरह के ब्रांड का ‘मजा’ लेते. मतपेटियां खुलने तक बापू नशे में ‘टुल्ल’ रहता. बाहर रहना, बाहर खाना…बाहर ही पीना-सोना. घर को तो वह करीब-करीब भूल ही जाता था.

शराब का दौर सुबह से ही शुरू हो जाता. सुबह के नाश्ते के साथ शाम का कार्यक्रम भी बन जाता. जो उम्मीदवार अच्छी किस्म की शराब बांटता, वही अच्छा माना जाता. शराब के स्वाद के आधार पर बापूधाम के लोग अलग-अलग पार्टी में बंट जाते. जिस उम्मीदवार द्वारा भिजवाई गई शराब का स्वाद जीभ को भा जाता, अगले दिन उसी के पोस्टरों से झुग्गियां पाट दी जातीं. घर-घर उसी का झंडा हवा में फहराने लगता. कुछ ऐसे भी थे जिन्हें शराब की गंध से ही परहेज था. पर ऐसे लोगों की संख्या बस्ती में बहुत ही कम थी. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता. इस उपेक्षा पर वे लोग बदले हुए वक्त को कोसते. मनुष्य के गिरते आचरण और मर्यादाओं की दुहाई देते. फिर ठंडे पड़ जाते. निर्णायक स्थिति में न होना और निर्णायक स्थिति तक पहुंचने के लिए चमत्कार की उम्मीद बांधे रहना, ऐसे लोगों की आदत में शुमार था.

बस्ती में बोलबाला उन्हीं का था जो बोतलों से ‘दिल का’ नाता रखते. ऐसे लोगों को बोतल के साथ-साथ यदि नकद-नारायण भी हाथ लग जाएं तो मानो कमाल हो जाता. लड़खड़ाती जुबान, पिलपिले चेहरे, खोखले-कफ-भरे सीनों और डगमगाते हुए कदमों से अपने चहेते उम्मीदवार की जीत का नारा लगाते हुए लोग, टोलियां बनाकर बाहर निकल पड़ते. विभिन्न चुनावी दल नए-नए मुद्दे लाते. कभी परिवर्तन तो कभी विकास के नारे लगाते. जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता की लहरें बापूधाम में भी खूब उठतीं. मगर धीरे-धीरे सब अपने आप दबती चली जाती थीं.

बापूधाम में सर्वाधिक कारगर मुद्दा थी— शराब! वही हर बार सबसे सशक्त मुद्दा बनती. शराब सस्ती हो या महंगी, देशी हो या विदेशी, सबके कद्रदान उस बस्ती में थे. वे उसे अपना ही लेते थे. मगर चुनाव के मैदान में वही उम्मीदवार टिकता, जो सबसे महंगी शराब बंटवाता.

गांधी जी भले ही शराब को पाप और पतन की निशानी कहते रहे हों. भले ही उन्होंने मदिरापान का आजन्म विरोध किया हो. परंतु उन्हीं के नाम पर बसे बापूधाम में शराब के बड़े-बड़े विशेषज्ञ बसते थे. वे बोतल का रंग देखकर ही उसके स्वाद का अंदाजा कर लेते. यह ठीक ऐसा ही है जैसे उस युवा महत्त्वाकांक्षी और तेजी से उभरते हुए नेता ने, जो बापूधाम के बसने के पश्चात कुछ ही अर्से में देश की राजनीति में ‘खासमखास’ बन चुका था, अल्पकाल में ही सरकारी सौदों में कमीशन के अवसरों की पहचान करने में प्रवीणता प्राप्त कर ली थी.

बापूधाम के मतदाताओं की यही समझ वहां की राजनीति का भविष्य तय करती थी. इसी पर टिका था—महानगर के दर्जनों नेताओं का भविष्य, घूसखोर अफसरों के घर की शांति. बापूधाम में ‘अंग्रेजी’ का क्रेज ‘देसी’ से कहीं ज्यादा था. देशी की चार बोतलों के बदले अंग्रेजी का अद्धा भी उन्हें मंजूर था. अंग्रेजी वाले उम्मीदवार को वरीयता भी दी जाती थी.

बापूधाम में हरेक नेता का भविष्य उसके द्वारा भिजवाई गई बोतलों से तय होता था. जिस उम्मीदवार की भिजवाई गई शराब का स्वाद बस्तीवालों को नापसंद रहता, चुनावों में उसकी लुटिया डूबनी तय होती. जिस प्रत्याशी की शराब वहां के बाशिंदों की जीभ को भा जाती, उसकी जीत के लिए दुआएं की जातीं. उसके साथ चलनेवाला नालायक किस्म का नेता भी बापूधाम पहुंचकर अतिविशिष्ट बन जाता था. ऐसे उम्मीदवार को लोग सिर-माथे लेते थे. आदमी तो आदमी, बस्ती की औरतें भी उसकी प्रशंसा में कसीदे गढ़तीं. पूरी बस्ती में उसकी ‘वाह-वाह’ होती रहती. युवा लड़कियां ऐसे उम्मीदवार का नाम सुनते ही शरमा जाती थीं. तो बाबू! ऐसे थी बस्ती और वहां के लोग—जहां मैं जन्मा था…. क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “दंश—धारावाहिक उपन्यास

  1. यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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