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दंश : धारावाहिक उपन्यास

धारावाहिक उपन्यास

[मित्रो! लंबे विराम के बाद संधान पर मैं फिर उपस्थित हूं. इस बार संभवत: लंबी मुलाकात के लिए. यह मुलाकात किश्तों में चलेगी. माध्यम होगा उपन्यास—दंश. यह मान लिया गया है कि इंटरनेट लंबी रचनाओं के लिए नहीं है. मेरा मानना है कि गंभीर पाठक रचना की लंबाई नहीं, उसकी गुणवत्ता पर निगाह रखते हैं. एक बार यदि कोई रचना पाठकों की पारखी निगाह को चढ़ जाए तो फिर उसको पाठकों की कमी नहीं रहती. इसी विश्वास के साथ मैं यह उपन्यास पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं. इस निवेदन के साथ कि यदि यह सचमुच पठनीय है, यदि इसमें जरा भी साहित्यिकता है तो कृपया मेरा उत्साहवर्धन करें. वरना कोई बाध्यता नहीं है. मुझे भी जब लगेगा कि पाठक बोर होने लगे हैं तो तत्काल विराम दे दूंगा…

आप सभी मित्रों के साथ सजग संवाद की अपेक्षा में उपन्यास दंश की पहली किश्त प्रस्तुत है. —ओमप्रकाश कश्यप]

पहली किश्त

उद्बोधन


क्या कहूं तुझे जिंदगी! स्वप्न या सच….पहेली या परिणति….अभिशाप या वरदान….मेहरबानी या मनमानी….खेल या खिलौना….बता तो? क्या कहूं? कौन-सा नाम दूं तुझे? नहीं, तू हमारे लिए सच नहीं है. तू सच होगी उनके लिए जो हर महफिल….हर मंडी में अपनी अस्मिता नीलाम किया करते हैं….जिनकी आत्मा मर चुकी है….जिनके लिए जिंदगी झूठ का कारोबार है. हमारे लिए तो तू उनींदी आंखों का ख्वाब है. निष्फल रह जाना जिसकी नियति है. तू परिणति होगी उनके लिए जो अपनी ताकत और दौलत के दम पर अपने प्रत्येक झूठ को सच में बदलने का निर्लज्ज प्रयास किया करते हैं….स्वार्थ जिन्हें उकसाता—अहं बरगलाता है. हमारे लिए तो तू सनातन अबूझ पहेली है, जिसे अंतिम सांस तक अनसुलझी ही रहना है.

जिंदगी, तू वरदान होगी उनके लिए जो निरीह आंखों से उनके सपने नोंच लेते हैं. फिर उनकी मासूमियत पर हंसते-हंसते उनका उपहास करते हैं. क्रूरता जिन्हें भाती….बेशर्मी जिन्हें लुभाती है. हम जैसों के लिए तो तू घोरतम अभिशाप है, जिसे जन्म-जन्मांतर तक हमें अपनी गर्दन पर ढोना है. तू वक्त की डरावनी किताब का ऐसा काला-कुलिश पन्ना है, जिसपर कोई कामयाब इबारत लिखी ही नहीं जा सकती. तू मेहरबानी होगी तो उनके लिए जो दूसरों की बरबादी की जमीन पर अपनी खुशियों की फसल उगाना चाहते हैं. जो जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर दंगे कराते हैं, भोले-मासूम लोगों को आपस में लड़वाते हैं और सैंकड़ों-हजारों लाशों से गुजरते हुए मसीहा बनने का नाटक करते हैं. नंगई जिनका स्वभाव है….लफंगई जिनका पेशा. हमारे लिए तो तू दर्द की मनमानी….वक्त के हाथों की दोधारी आरी है. जिसे हर पल, हर घड़ी आते-जाते हमारी सांस, हमारी आस और हमारे विश्वास को रेशा-रेशा कतरना है.

हां, तू खेल होगी, पर सिर्फ उन्हीं के लिए जो अपने चेहरों पर सैकड़ों किस्म के मुखौटे लगाए रहते हैं, जो अपनी असलियत को अपनी परछाईं से भी छिपाकर रखते हैं. फरेब जिनका ईमान है, गद्दारी जिनकी शान. हमारे लिए तो तू स्वार्थी, उदंड, निष्ठुर और निर्मम हाथों का बेजान खिलौना है. उससे जब तक उनकी खुशी हो खेलें, ऊब जाएं तो चिंदी-चिंदी करके फेंक दें. उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. क्योंकि तू उनपर मेहरबान है. हमारा तो कोई मन नहीं, मान नहीं. आन नहीं, शान नहीं. इज्जत नहीं, अस्मत नहीं. वे हमें ठुकराते हैं—तू उन्मुक्त अट्टहास करने लगती है. मिटाना उनकी आदत है, मिटना हमारी नियति. हमें मिटाने वालों पर तू मेहरबान रहती है….उनके लिए तू अपने वरदानों का खजाना खोल देती है. ऐसे में तुझे कैसे कहें अपना…क्यों करें प्यार, क्यों जिएं….क्यों तेरे बोझ को उठाएं. जिससे मान नहीं….उसपर गुमान क्यों करें….कैसे करें….कब तक करें?

ओ, वक्त विदूषक की प्रेमिका…!

संघर्षमयी छलना…!

परिस्थितियों की मनमानी…!

नियति की निर्ममता…!

कमबख्त हाथों की कुटिलता…!

दुर्भाग्य की काली-स्याह-प्रच्छन्न रेखा…!

इसके अतिरिक्त क्या कहूं तुझे,

बता तो…कौन-सा नाम दूं तुझे?

तेरा कहना मानकर आंखें जब सपना देखने को तैयार हो जाती हैं, तो तू उनकी पलकों से नींद नोंच लेती है. सपनों को सच में बदलना तो दूर, तू उनके रोजमर्रा के यथार्थ को भी छलावा बना देती है. तू हमको बताती है कि सभी अपने हैं, उनपर विश्वास करो. परंतु तेरी बातों में फंसकर जब कोई भला आदमी दुनिया पर भरोसा करने लगता है तो तू उसे नादान कहकर हंसती है. वह छलता चला जाता है. कदम-दर-कदम! सांसें रीत जाती हैं. पर तेरी छलना से मुक्ति नहीं मिलती. मरीचिका की तरह तू उसे दौड़ाती और तड़फाती है….तेरी निर्ममता का अंत नहीं….लोगों को बरबाद होते देख तू हंसती, उत्सव मनाती है.

तू कहती है कि प्यार दुनिया की सबसे हसीन दौलत है. परंतु जब कोई मासूम दिल प्यार के गीत गुनगुनाने लगता है तो तू एक झटके में उसके टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहती है—कर ही देती है. तू भरोसा दिलाती है—आगे बढ़ो, सफलता तुम्हारे कदम चूमने को तैयार है. तेरा कहना मान जब कोई सीधा-सरल मनुष्य अपने कदम आगे बढ़ाता है तो तू मरीचिका बनकर उसको दौड़ती है. इतनी जोर से कि वह हांफने लगता है. उसकी हालत पर तू निष्ठुर अट्टहास करती है. उसकी बेबसी तेरे कलेजे को ठंडक पहुंचाती है. छटपटाहट से तुझे अत्यधिक सुकून मिलता है. निराशा में डूबे और टूटे हुए इंसान से तू बड़ी-बड़ी बातें करती है. तू उनसे कहती है कि हंसो! क्योंकि हंसी कुदरत की अनमोल धरोहर है. वरदान है, नियति का और तुम हंसने के ही लिए बने हो. और तेरा कहा मानकर आदमी जब अपने दुख-दर्द को भुलाकर हंसने की कोशिश करता है तो तू उदासी बनकर उसकी आंखों से छलक पड़ती है—

ओ! निर्लज्ज आंखों में छिपी क्रूरता…!

निष्ठुर अधरों की कुटिल हंसी…!

छलनामय जीवन की चिर विडंबना…!

परिस्थितियों की नागपाश…!

छली विषकन्या…!

जरा सोच! इतनी निष्ठुरता क्यों? ऐसी निर्लज्जता कब तक? इससे पहले कि इंसानियत से लोगों का विश्वास उठ जाए….भोली-निर्दोष आंखों का समंदर रोते-रोते रीत जाए. लोग परस्पर विश्वास करना ही छोड़ दें….प्यासे दिल प्यार करना भूल जाएं. हसरतें वीरान रेगिस्तान में बदल जाएं. बचपन सपने देखना छोड़ दे, जवानी अपनी मस्ती भुला बैठे….इससे पहले कि एहसास की अर्थी सजे….संवेदनाएं तड़प-तड़पकर दम तोड़ लें. मेरा कहना मान….तू अपना आचरण बदल ले, जिंदगी!

रहम कर, खुद को बदल ले जिंदगी!

इस कहानी में मैं हूं—मगर यह कहानी केवल मेरी नहीं है! यह उस जिंदगी की कहानी है जिसने मुझे सांसें दीं, पर कभी अपना नहीं समझा.

जिसने मुझे ठुकराया….लांछनाएं और प्रताड़नाएं दीं. जो बार-बार छलती रही….अपनी ही सांसों का गला घोंटने की कोशिश लगातार करती रही.

यह कहानी है—जिंदगी की जिंदगी से जद्दोजहद की. जिंदगी को ठुकराकर उससे प्यार करने, लगातार हारने और जीत के लिए बार-बार संघर्ष करने की.

इस कहानी में ‘मैं’ जिंदगी को समझने के लिए जिंदगी से लगातार खेलता रहा. जिंदगी को जीने की चाहत में उससे दूर और दूर भागता रहा. अब मैं आपको अपनी उसी बेरहम जिंदगी के करीब ले जाऊंगा. आगे सिर्फ आप रहें और मेरी नाबाद-नामुराद जिंदगी. साथ में वे कथापात्र भी जिन्होंने मेरी इस कहानी को….मेरी जिंदगी, उसके हर रंग को मुक्कमल बनाया है. बेशुमार दर्द दिया तो हंसते-हंसते दर्द को पीते रहने की बेशुमार हसरतें भी.

मैं फिर दोहराता हूं कि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है. अकेली जिंदगी की कोई कहानी नहीं होती. अकेली जिंदगी से कोई कहानी नहीं बनती. हां, जिंदगी के अकेलेपन की हजारों-हजार कहानियां हो सकती हैं. जिंदगी के अकेलेपन से हजारों-हजार कहानियां निकल भी सकती हैं—जैसी कि यह है. मैं तो इस कहानी का नायक भी नहीं हूं. नायक है मेरी कठपुतली जिंदगी. जिसकी डोर हमेशा अदृश्य हाथों में रही. पर यह कोई विषाद गीत नहीं—केवल एक कहानी है. दुनिया की अनगिनत दर्दनाक कहानियों में से एक…उनसे कुछ अलग, कुछ-कुछ मिलती-जुलती-सी.

बस! अब आगे आप रहें और मेरी, इस मैं विहीन जिंदगी की टूटी-फूटी दास्तां.  क्रमश:…

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “दंश : धारावाहिक उपन्यास

  1. अच्छा लग रहा है ये अंश आगली कडी का इन्तज़ार रहेगा धन्यवाद्

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