Archive | अगस्त 2009

You are browsing the site archives by date.

लानत की बात

लू के गर्म थपेड़ों से कुत्ता पूरी दोपहरी कदंब के नीचे ऊंघता रहा. दिन ढले सूरज का कोप शांत हुआ, हवा पर नर्मी चढ़ने लगी तो भूख भी करवट बदलने लगी. उठकर चलने लगा तो कानों में आवाज पड़ी. कदंब उससे कह रहा था— ‘मित्र, तुम भी दूसरों की तरह स्वार्थी ही निकले….’ कुत्ते को […]

Advertisement

Rate this:

जीवनमंत्र

नांद जैसा फूला हुआ पेट, कमान जैसी तनीं, उभरी-नुकीली हड्डियों का बोझ ढोती गाय चलते-चलते हांफने लगी तो आराम के लिए नीम के नीचे पसर गई. नीम का वह वृक्ष रेलवे की पटरियों के करीब होने के कारण उपेक्षित और तिरष्कृत था. यात्रियों द्वारा फेंका गया कचरा खाली डिब्बे, प्लास्टिक की बोतलें, कागज के कप-प्लेट, […]

Rate this:

देवता

बीच रास्ते में बने उस धर्मालय की भौगोलिक स्थिति बड़ी विकट थी. रास्ता पहले ही संकरा और भीड़-भाड़ वाला था. धर्मालय से आगे सड़क और भी संकरी हो जाती. तीव्र गति से दौड़ रहे वाहनों के ब्रैक वहां पहुंचकर चरमराने लगते. दिन में वाहनों की भीड़ और भी बढ़ जाती. इतनी कि उसे पार करना […]

Rate this:

ईश्वर

भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ बनाए गए मंदिर पर पुजारी का कब कब्जा हो गया, यह ईश्वर को भी पता न चला. ‘तुम्हें सिर्फ भक्तों को देखकर मुस्कराते रहना है.’ पुजारी ने आदेश सुनाया. ईश्वर तिलमिलाया. उसके लिए यह पहला अनुभव था— ‘बदले में मैं भी कुछ अपेक्षा रख सकता हूं?’ ‘तुम्हें […]

Rate this:

जीवन निरंतरता में है

पिल्ला का मन शहर से ऊबा तो कुत्ता उसे जंगल घुमाने के लिए निकल पड़ा. नन्हे पिल्ले की उम्र बस कुछ ही महीने थी, जंगल में पहुंचते ही उसका मन नाचने लगा. रास्ते में वृक्षों-लताओं से खेलता, उन्हें आश्चर्य से देखता, छूकर महसूस करता हुआ पिल्ला आगे बढ़ता गया. उसी समय एक हिरन उसके बराबर […]

Rate this:

मान-मर्दन

कुत्ते को शोर-शरावा नापसंद था. लेकिन बरात देखना, उसके पीछे-पीछे चलना उसे खूब भाता. जब वह दूल्हे के आगे-आगे लोगों को नाच के नाम पर उछल-कूद मचाते देखता, तो आपा बिसरा देता. नाचने वालों में बेजान-फीके चेहरे भी होते और खाए-अघाए भी. मगर खाए-अघाए लोग कुछ ज्यादा ही नफासत से नाचते. उनकी स्त्रियां कमर लचकाने […]

Rate this:

शबरी-धर्म

माघ-पौष की दांत किटकिटाती रात में भी लोग अखंड मानस-पाठ के लिए जागते रहे. सुबह की किरणों के साथ पाठ भी अपने समापन की ओर बढ़ रहा था. गृहस्वामी समेत सभी को उसे निर्विघ्न संपन्न होते देख खुशी थी. कुछ लोग सुबह होने वाले भोज की तैयारी में जुटे थे. उसके लिए कढ़ाई बीती शाम […]

Rate this:

कर्मकांडी

पंडितजी पड़ोस के गांव से कर्मकांड निपटाकर लौट रहे थे. सिर पर बड़ी-सी पगड़ी थी. माथे पर भव्य तिलक. गले में माला. फूला हुआ पेट और चेहरे पर तृप्ति का आनंद. कुत्ता भी पेट-भर जाने के बाद घूमने के लिए जंगल की ओर निकला था. बस्ती से बाहर दोनों परस्पर टकरा गए. कुत्ता अपने आप […]

Rate this:

अवसादग्रस्त ईश्वर

कुत्ते का मन बस्ती से ऊबा तो वह जंगल की ओर निकल गया. चलते-चलते जंगल भी आधा पार हो गया. वहां कल-कल बहती नदी को देख उसका मन हहराने लगा. किनारों पर बिखरी अद्भुत छटा ने मन मोह लिया. उसी समय दो हिरन-छौनों को भयभीत अवस्था में नदी-तट से जंगल की ओर दौड़ लगाते देख […]

Rate this: