6 टिप्पणियां

यदा-यदा हि…

‘यदा-यदा हि धर्मस्य….धरा पर जब-जब दुर्जन, दुराचारी बढ़ेंगे, भले लोग छले जाएंगे…मैं अवतार लेकर सज्जनों का उद्धार करने आऊंगा…’ ईश्वर ने गीता में कहा था, लिखा नहीं था. जिसने लिखा, उसने लिखने के बाद कभी उससे जिक्र तक नहीं किया. आरती, प्रसाद, भोग, घंटा-ध्वनि, पूजा-अर्चना, नाम-जप, जय-जयकार और अमरलोक-सुंदरी लक्ष्मी के संगवास में ईश्वर के दिन पलक झपकते हवा हो जाते.
एक दिन एक परेशानहाल भक्त ने ईश्वर को उसके ‘वचन’ की याद दिला दी. उस शाम पुजारी पहुंचा तो ईश्वर ने अपना गुस्सा जता दिया— ‘लोगों ने मेरे उपदेश की पुस्तक छाप डाली और तुमने मुझे बताया तक नहीं…!’
‘प्रभो, वह अनर्थ तो आपके चहेते वेदव्यास ने किया था. कहें तो उसे स्वर्ग से बुलवाने का इंतजाम करूं?’
‘क्या किसी युद्ध में हमने वचन दिया था कि जब-जब धरती पर दुराचार…?’
‘बिलकुल-बिलकुल…वह तो आपका लाजवाब उपदेश है, घर-घर में पढ़ा-सुना जाता है. मैंने तो उसकी कैसेट भी मंगवा रखी है…’ पुजारी जोश में बोलता चला गया, तभी वह संभला—
‘आज अचानक आपको गीता की याद कैसे आ गई?’
‘आज एक भक्त ने बताया कि धरती पर अत्याचार बहुत बढ़ चुके हैं. पुजारियों ने धर्म को धंधा बना लिया है. भोग के नाम मोटा चढ़ावा खुद हड़प लेते हैं. धर्म के नाम पर वे लोगों को लड़वाते हैं. कथावाचक खुद को भगवान घोषित कर हैं. उनके आश्रम काले धन को पचाने का ठिकाना बन चुके हैं…कोई किसी की सुनता तक नहीं है. मुझे लगता है कि मेरे अवतार लेने का यही उचित समय है…’
पुजारी की आंखें चमकीं, बुझीं फिर चमकने लगीं— ‘स्वामी, आपकी सेवा में कोई बाधा न आए, इसलिए मैंने आजन्म ब्रह्मचारी रहने का प्रण लिया था. आप कुछ दिन रुकें, तब तक मैं कोई गरीब ब्राह्मणी ढूंढे लेता हूं…’
‘इससे पहले मैंने ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर ही जन्म लिया है. इस बार मैं परंपरा को तोड़ना चाहता हूं,…मैंने फैसला किया है कि आज दिन में जो भक्त आया था….’
‘आप एक मलेच्छ के घर जन्म लेंगे?’ पुजारी को धक्का लगा.
‘वह भी तो हमारी ही सृष्टि का है. ईमानदार है, भला और मेहनती भी है, दूसरों पर हमेशा उपकार करता है….उसके घर जन्म लूंगा तो उसकी सातों बेटियां अच्छे घरों में ब्याह दी जाएंगी, जिनके दहेज के लिए वह रात-दिन परेशान रहता है…’
‘उसकी बेटियां तो ब्याह दी जाएंगी, मगर आपके सारे मंदिर सूने पड़ जाएंगे…कोई सच्चा भक्त उनकी ओर झांकेगा तक नहीं. यह तो एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे जैसा धंधा है. सोच लीजिए, आपको क्या चाहिए…अपना भविष्य या उस आदमी का कल्याण….’
‘तुम मुझे धमकी दे रहे हो?’
‘सिर्फ आईना दिखा रहा हूं…आप हमारे उपकार को पल-भर में भुला देना चाहते हैं.’
‘कैसा उपकार?’ ईश्वर की जुबान लड़खड़ाने लगी थी.
‘हजारों-लाखों वर्ष से आप स्वर्ग में हैं. इतने वर्षों में यहां आपका एक भी मंदिर बना. जबकि धरती पर लाखों मंदिर-मस्जिद और दूसरे किस्म के धर्मालय हैं. जानते हैं क्यों! इसलिए कि आदमी खुद कहीं नहीं जाता, उसको बुलाया जाता है. इसके बदले यदि पुजारी आपके चढ़ावे का कुछ हिस्सा अपने पास रख लेता है तो आपका क्या जाता है….पेट तो हमारे भी हैं.’
ईश्वर प्रतिक्रिया में कुछ कहे उससे पहले ही किबाड़ की ओट में खड़ी उसकी पत्नी ने हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया—
‘स्वामी! आप ये क्या उल्टा-सीधा सोचते रहते हैं. जरा सोचिए, आप तो अवतार लेकर धरती पर चले जाएंगे, पीछे मेरा क्या होगा…?’ ईश्वर-पत्नी ने होठों पर कंटीली मुस्कान, जो उसने नरकवास कर रही एक अभिनेत्री से कड़ी मेहनत के बाद सीखी थी, के साथ अपनी बाहें पति के गले में डाल दीं. अब ईश्वर को तो पिघलना ही था.
ओमप्रकाश कश्यप

Advertisement

6 comments on “यदा-यदा हि…

  1. Omprashji, Aapka lekhan Bhi nsi dhara aur dhar ka hai jo hamari hai…. Aage chalkar jis sabse taqatwar prani ko aapne nayak banaya hai use hamne sadi ka mahanayak kaha…kabhi samay nikalkar is taraf aayein
    http://

  2. मैं कई बार सोचता था की “Little knowledge is Dangerous” जैसे कहावत का क्या मर्म है. अरे आखिर कोई अल्प ज्ञान से ही तो धीरे-धीरे पूर्ण ज्ञान की तरफ बढ़ेगा. परन्तु अब, इस अत्यंत सारगर्भित कहावत का अर्थ पूरी तरह से समझ में आ गया. ये उन लोगों के लिए कहा गया है जो साहित्य अथवा अध्यात्म किसी का भी गहन अध्ययन नहीं करते, बस सरसरी निगाह से देख लिया, कुछ कहीं सुन लिया और उसको ही ज्ञान का गर्भ समझ लिया (कूप-मंडूक). दशावतार (The Ten Great Incarnations), में भगवन ने Evolution अर्थात क्रमिक विकास का रूप दिखलाया है, जो मत्स्य से शुरू होकर कल्कि तक जायेगा. और ये सत्य है की भगवान का होना ना होना इस Theory के लिए एक घटक नहीं है. आप भगवान को माने या ना माने, उनके अवतार (मत्स्य, वाराह, कुर्म, नरसिंह (Daredevils)) इत्यादि तो आपके सामने मौज़ूद हैं. (और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की मलेच्छ एक वंश है जो मध्य एशिया से आया था, गन्दगी से रहते थे मांस मदिरा का भक्षण करते थे, बर्बर थे..)

    • आपके ज्ञान को नमन करता हूं. पर हुजूर एक व्यंग्य में ही पिघल गए, जो विज्ञान सिखाने लगे. कुछ और आपके ज्ञान का प्रसाद मिले तो मेरा भी ‘क्ल्याण’ हो. वरना यह मंदबुद्धि यूं जी पाठकों का वक्त बरबाद करता रहेगा.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: