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झूठ का सच

बाजार से गुजरते हुए कुत्ते की नजर दुकान में टंगे एक चित्र पर पड़ी तो गढ़ी की गढ़ी रह गई. उसके लिए उसकी कुतिया दुनिया की सबसे खूबसूरत मादा थी. सड़क पर चलते समय वह दोपाया मादाओं को रोज ही देखता. उनके पुते हुए चेहरे देख उसे हंसी आने लगती. निश्चय ही उनमें कुछ सुंदर भी रही होंगी. मगर पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था.

कुत्ते का मन चित्र में मौजूद स्त्री की ओर खिंचता चला गया. सिल्क की महंगी साड़ी, मंगलसूत्र, चेहरे पर दीप्ति. मनमोहिनी मुस्कान लिए वह ममतामयी मेज के चारों ओर बैठे अपने पति और बच्चों को खाना परोस रही थी. सामने थीं— तरह-तरह के व्यंजनों से भरी चमचमाती प्लेटें, फूली-फूली चपातियां. जीवन का सारा सौंदर्य मानो उस कमरे में समाया हुआ था.

‘वाह! यह सचमुच देवि अन्नपूर्णा है…’ कुत्ते के मुंह से बरबस निकला.

उस चित्र को वह घंटों तक एकटक निहार सकता था. तभी दुकानदार डंडा लेकर पहुंच गया. उसके बाद तो भूख उसे घंटों तक दौड़ाती रही. इस बस्ती से उस बस्ती, एक घर से दूसरे घर तक. लेकिन चित्र में मौजूद स्त्री का वह सुंदर, मुस्कुराता हुआ चेहरा उसके जहन में बना रहा.

कई घरों से दुत्कारे जाने के बाद किसी एक से एकाध टुकड़ा या रोटी मिलती. भूख को थोड़ा ढांढस बंधता. लेकिन दूसरा टुकड़ा जब तक हाथ लगता, आंतें पहले टुकड़े को पीसकर अवशिष्ट में बदल चुकी होतीं. भूख फिर से तांडव करने लगती. जीवन की इस विडंबना पर वह बार-बार अफसोस करता रहा. शहर के एक कोने में खर-पतवार की तरह उग रही बस्ती से गुजरते हुए एक स्त्री को सामान का थैला उठाकर तेज कदमों से गली से गुजरते देख, अचानक वह चौंका—

‘अरे, यह तो वही है.’ वह स्त्री के पीछे दौड़ने लगा. आमतौर पर उसके कदम घर की चौखट पर पहुंचकर थम जाया करते थे. मगर सम्मोहन में बंधा वह बैठक तक चला गया. वहां टंगे चित्र को देख उसका रहा-सहा संदेह भी जाता रहा. तभी दो छोटे-छोटे, दुबले, अधनंगे बच्चे स्त्री से चिपट गए. उन्हें संभालने की कोशिश करती अचानक वह पलटी तो कुत्ते को वहां देख हड़बड़ा उठी. उसके चेहरे पर थकान और पीड़ा के चिह्न थे. हैरान कुत्ता चित्र से उसकी तुलना करने लगा—

‘तुम वही हो न!’ कुत्ते ने चित्र की ओर इशारा किया.

‘गलत, वह मेरा झूठ है…’ कुत्ते को इतनी बारीक बात सुनने का अभ्यास न था—

‘क्या तुमने जानबूझकर वह चित्र खिंचवाया था, ताकि वर्तमान से आंखें चुरा सको?’

‘उन दिनों मैं मा॓डल थी. चित्र खिंचवाने के बदले मुझे ढेर सारे पैसे मिले थे.’

‘दिखाई तो नहीं देता…!’ कुत्ते ने उस छोटे, सीलन-भरे कमरे में नजर घुमाई. दीवारों का प्लास्टर उखड़ने लगा था. स्त्री पत्थर-शिला बनी रही—

‘यही हकीकत है. मा॓डलिंग की दुनिया में झूठ को सच दिखाना पड़ता है. इतनी कुशलता के साथ कि देखने वाले सौ फीसदी झूठ को एक सौ दस फीसदी सच मानने को बाध्य हो जाएं. फिर भी मेरे लिए वे हवा के पंखों पर सवार होकर उड़ने के दिन थे. यह जानने की समझ कहां थी कि झूठ की चमक-दमक के बीच जो रिश्ते बनते हैं, वे भी झूठे ही होते हैं…’

बड़ी-बड़ी बातें कुत्ते के सिर के ऊपर से गुजर जाती थीं. वह उन्हें समझने का प्रयास ही कर रहा था कि छोटा बच्चा रोने लगा. स्त्री उसको चुप कराने में जुटी तो कुत्ता वहां से खिसक लिया.

ओमप्रकाश कश्यप

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2 comments on “झूठ का सच

  1. कुछ अंतराल के बाद पढ़ा है…
    तब तक कुत्ते भाई ईश्वर को छोड़कर उसकी दुनिया में भभंड़ी मारने निकल आये..
    बेहतर….

  2. नकली सच का जमीनी सच.

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