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आलोचना-पसंद

अपने-अपने सफर पर जाते पादरी, मौलवी और पुजारी को एक तिराहे ने आपस में मिला दिया. आपसी संवाद की संभावना न होने के कारण तीनों बचकर निकल जाना चाहते थे. मगर रास्ता कौन दे! जान-बूझकर आड़ा हो जाने की हेठी कौन कराए—यानी बात फंस गई. त्रिभुज के तीन कोनों की तरह तीनों एक जगह खड़े के खड़े रह गए.
मुंह में राम-राम बगल में छुरी, तीनों ने यह कहावत अपने-अपने मजहब के अनुसार सुनी थी. राम जाने तीनों उस समय सचमुच मुस्कराए या मुस्कराने का सिर्फ नाटक ही किया. उस समय कुत्ता चौराहे पर ऊंघ रहा था. सामने बोर्ड पर लिखा था, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. वह पीछे हटता चला गया.
‘ईश्वर महान है!’ पुजारी ने वार्ता का शंखनाद किया.
‘बिलकुल सही फरमाया, श्रीमान! तभी तो बाइबिल में उसे परमपिता कहा गया है.’ पुजारी ने तत्काल जोड़ दिया. ‘परमात्मा दयालु भी है.’ ‘वाल्लाह! क्या बात कही, एकदम दुरस्त. कुरआन शरीफ में यही तो लिखा है. इस्लाम खुद इंसानियत पर अल्लाह का करम है.’ इस बार मौलवी आगे आ गया.
पुजारी सोच में पड़ गया. दोनों ने अपने-अपने आराध्य का नाम लिया था. उसके सामने समस्या थी कि अनगिनत देवी-देवताओं में से वह किसका नाम ले! हजारों धर्मग्रंथों में से किसे खास ठहराए.
‘परमात्मा बहुत शक्तिशाली है.’ काफी सोचकर पुजारी ने कहा. उसके सभी देवी-देवताओं के हाथों में हथियार थे. पुजारी को उम्मीद थी कि इस तर्क से वह अपने विरोधियों को चुप कर सकता है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
‘तभी तो वह इतनी बड़ी कायनात को संभाले रहता है. चांद-तारे सब खुदा के इशारे पर नाचते हैं.’ देर तक ऐसे ही बातचीत होती रही. एक भी बार पुजारी उनसे अपने मन की बात न कहलवा सका.
‘परमात्मा को अपनी आलोचना पसंद है. वह परमविवेकवान है. ’ पुजारी झुंझलाकर बोला. इस बार मौलवी और पादरी दोनों चुप पड़ गए. बिना प्रतिक्रिया दिए दोनों एक ओर हट गए. पुजारी जीत का एहसास लिए आगे बढ़ गया. लेकिन थोड़ी दूर जाते ही उसका मन पछतावे से भर गया. लगा कि उससे कुछ गलती हुई है. पुजारी की आखिरी बात पर कुत्ते का मन ताली बजाने को हुआ था. लेकिन उसको दुःखी देख कुत्ते की बुद्धि भी चकराने लगी.
उस घटना को अर्सा बीत चुका है. पुजारी जोर-जोर से आरती गाता है. पूरी ताकत समेटकर मंदिर के घंटे को बजाता है. ताकि दिमाग की नसें सुन्न हो जाएं. ताकि उस दिन जो शब्द जोश में उसके मुंह से निकले थे, वे फिर कभी याद न आएं. कुछ ऐसा ही या शायद कुछ अलग तरीके से उसके विरोधी भी करते हैं. जो परमविवेकवान है, वह अपनी आलोचना से क्यों घबराएगा—यह सोचकर कुत्ता धर्माचार्यों के अवसाद पर हैरान हो जाता है.
ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “आलोचना-पसंद

  1. कुत्ता धर्माचार्यों के अवसाद पर हैरान हो जाता है.

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