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आक्रोश

शाम का समय. कुत्ता घूमता हुआ बस्ती के बाहर आया और रास्ते में एक झोपड़ी को देख ठिठक गया. झांककर देखा तो भीतर, हाथ में झाड़ू लिए एक बुढ़िया गुस्से से लाल-पीली हो रही थी—
‘आ, तू भी आ मुंह झौंसे, तुझे भी देखूं!’ बुढ़िया कुत्ते को देखते ही बरस पड़ी.
कुत्ता पीछे हटा, पर जिज्ञासा बनी रही. कुछ क्षण पश्चात दरवाजा ठेलकर फिर भीतर झांकने लगा—
‘बहुत गुस्से में है माई, किसी से लड़ रही थी?’ कुत्ता ने विनम्र रहने का भरसक प्रयास किया.
‘क्यों, तुझे क्या?’
‘गुस्सा थूक दे माई. किसी ने तुझे सताया हो तो बता, मैं अपने पैने दांतों से उसको नंगा करके भरी भीड़ में खींचता हुआ ले जाऊंगा.’ सहानुभूति ने रंग जमाया. बुढ़िया नरम पड़ने लगी—
‘दुनिया से तो निपट लूं, लेकिन जब ऊपरवाला ही दगा करने लगे कहां जाऊं!’
‘ऊपरवाला! क्या तुम ईश्वर के बारे में कह रही हो?’
‘हां, मरा वही आया था, पर मैंने झाड़ू मारकर भगा दिया.’ ‘भगा दिया…ईश्वर को भगा दिया?’ कुत्ते को लगा कि बुढ़िया का दिमाग फिर गया है.
‘बचपन से ही उसे पूजती हुई आ रही हूं. पहले उसको भोग लगाती, बाद में मुंह जूठा करती. जब जवान हुई तो सुंदर-संपन्न वर के लिए पूजती रही. ससुराल आई तो यहां ऐसा कुछ भी नहीं था. फिर भी घर की खुशहाली, पति और बच्चों के सुख-शांति के लिए पूजा-पाठ करती रही. मगर गरीबी की किच-किच से कभी बाहर न आ सकी. ऊपर से भरी जवानी में वैधव्य ओढ़ लिया. उसको किस्मत का लेखा मानकर सहने की कोशिश कर ही रही थी कि पिछले वर्ष एक दुर्घटना में बेटा-बहू भी साथ छोड़कर चलते बने. मेरा ईश्वर से विश्वास उठने लगा. फिर भी मन के किसी कोने में आस बनी रही कि उसके घर में देर है, अंधेर नहीं…भगवान ने जो मेरे लिए नहीं किया, वह मेरे पोते के लिए जरूर करेगा. मेरी पूजा अकारथ नहीं जाएगी. लेकिन आज….!’
‘आज क्या हुआ माई?’
‘‘मैं आंखों की अंधी, अकेली…दाने-दाने को मोहताज. चार साल के बच्चे को लेकर जैसे-तैसे दिन काट रही हूं. ले-देकर जमीन का एक टुकड़ा है. उस पर भी जमींदार दांत गढ़ाए बैठा है. मैं न्याय के लिए ईश्वर के आगे डकरा रही थी, आज वह आया भी तो कहने लगा कि जमींदार के जुर्मों का हिसाब तो उसके अगले जन्म में ही संभव है.’
‘तब तक हम दोनों क्या करें?’ मैंने पूछा था.
‘सब्र कर माई, पाप का घड़ा भरते-भरते ही भरता है.’ वह बोला.
‘मेरी सारी जिंदगी सब्र करते ही बीती है, तुझे अब भी पाप का घड़ा भरने का इंतजार है…अगर कुछ कर नहीं सकता तो मुझे ही उठा ले?’ मुझे गुस्सा आने लगा था. पर वह बोला—
‘समय से पहले तो मौत भी मेरे हाथ नहीं है.’
तू ही बता, इससे ज्यादा मैं कितना सहती—
‘मुंहझौंसे, न्याय तेरे हाथ में नहीं है, किसी की जिंदगी बचाना तेरे हाथ में नहीं है. और यदि मौत भी तेरे हाथ में नहीं है तो जिंदगी-भर बैठे-बैठे खाता क्यों रहा. शुरू में ही मना कर देता तो मैं कोई दूसरा रास्ता खोज लेती.’ और उसके बाद तो मैं उसपर झाड़ू लेकर पिल पड़ी. आखिर उसे मुंह छिपाकर भागना पड़ा.’’
बुढ़िया की बात सुनकर कुत्ता पहले तो हंसा, मगर अगले ही पल गंभीर हो गया. तभी बुढ़िया का पोता उछलता-खेलता बाहर से आया. कुत्ते को राहत-सी मिली, बच्चे को मन ही मन आशीस देता हुआ वह आगे बढ़ गया.
ओमप्रकाश कश्यप

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