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क्रीतदास

ईश्वर बदल चुका है. अब वह अपनी चिंता पहले से ज्यादा करता है. भक्त का मन देखने, उसकी भावना को सम्मान देने से अधिक वह चढ़ावे पर नजर रखता है. चढ़ावा अच्छा और भक्त की जेब भारी हो तो ईश्वर खुद चलकर भक्त के दरवाजे तक चला आता है.
‘ईश्वर मालदार के लिए उसके खूंटे पर बंधी गाय है.’ कुत्ता चलते-चलते निष्कर्ष पर पहुंचा. रास्ते में मंदिर पड़ा. रोज पुजारी मंदिर की जूठन उसके आगे डाल दिया करता था. इस लालच में वह भी उस ओर बरबस खिंचा चला आता था. मगर उस दिन प्रसाद को सूंघने तक का मन न हुआ. जैसे ही वह आगे बढ़ा, पीछे से पुजारी चीखा—
‘मूर्ख, भगवान के प्रसाद को छोड़कर जा रहा है.’
‘आज मन नहीं है.’ कुत्ते ने बिना मुडे़ कहा.
‘जानता नहीं कि प्रसाद को छोड़कर जाना पाप है.’
‘गाय को खिला दीजिएगा…बेमन से खाना भी पुण्य नहीं है.’ पुजारी कुत्ते को गालियां देने लगा. कुत्ता आगे बढ़ गया. सामने से ईश्वर आता हुआ दिखाई दिया. कुत्ते का उससे पहले कभी सामना नहीं हुआ था. इसलिए स्वभाव के अनुकूल वह उसपर भौंकने लगा.
‘पहचाना नहीं, मैं ईश्वर हूं…’
‘अच्छा, किस सेठ की ड्योढ़ी से आ रहे हैं?’ कुत्ते को मजाक सूझा.
‘सरपंच के बेटे का जन्म दिन था. वह मेरा बहुत बड़ा भक्त है.’
‘मैंने कल भी मंदिर से एक छाया को बाहर निकलते था?’
‘मैं ही था. कल एक सेठ की बेटी का विवाह था. यह मंदिर उसी ने बनवाया है. याद किया तो आशीर्वाद देने चला गया.’
‘और उससे पहले….?’
‘ध्यान नहीं है, शायद जमींदार की हवेली में…अरे हां, वहीं गया था, तुमने तो सुना होगा, उसकी पत्नी मेरी कितनी बड़ी पुजारिन है.’
‘उससे पहले किसी बड़े अधिकारी को आशीर्वाद देने गए होंगे?’
‘तुम्हें कैसे पता? उससे पहले मैं दरोगा के घर गया था. सभी जानते हैं, वह कितना बड़ा भक्त है. हर वर्ष भंडारे पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा देता है.’
‘पिछली बार किसी गरीब की झौपड़ी में कब गए थे, जरा याद करके बताइए?’ ईश्वर बगलें झांकने लगा. कुछ देर बाद बोला—
‘मेरे लिए अमीर-गरीब सब बराबर हैं. याद कर महाभारत में क्या लिखा है, मैंने दुर्योधन के महल में छप्पन भोग खाने के बजाय विदुर के घर अलोने साग को महत्त्व दिया था.’
‘ऐसे नाटक तो हिंदुस्तान के नेता रोज ही करते हैं. एक दिन गरीब के घर सो लेने, उसके घर का अलोना साग खा लेने से यदि लाखों-करोड़ों लोगों को, वर्षों तक बुद्धू बनाया जा सके तो कौन यह जादू नहीं करना चाहेगा!’
‘तुम मुझपर इल्जाम लगा रहे हो?’
‘इल्जाम नहीं प्रभो, हकीकत बयान कर रहा हूं. दरअसल आपकी स्थिति भी मुझसे भिन्न नहीं है, जिसके घर ज्यादा भरी थाली की उम्मीद हो, उस ओर हम दोनों ही खिंचे चले जाते हैं. दरअसल हम दोनों ही क्रीतदास हैं…क्रीतदास!’ कुत्ते ने कहा और ईश्वर को असमंजस की अवस्था में छोड़ आगे बढ़ गया. ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “क्रीतदास

  1. आप की यह श्रृंखला गज़ब चल रही है…

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