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अपराधबोध

सड़कछाप कुत्ता मजदूरों, कबाड़ बीनने वाले बच्चों, भिखारियों और फटेहाल आदमियों पर ही क्यों भौंकता है, कोई यह जाने न जाने, कुत्ते को अच्छी तरह मालूम था. पिछली बार वह एक धनी मालिक के बंगले पर रहता था. उसके पास बेशुमार दौलत थी. बड़े-बड़े आदमियों का वहां आना-जाना था. पर न जाने क्यों वह डरता बहुत था. बंगले के चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ लगवाई हुई थी. रात होते ही उनमें करंट छोड़ दिया जाता. कई चौकीदार थे, जिन्हें वह थोड़े-थोड़े दिन बाद बदलता रहता. दरवाजे पर आए हर व्यक्ति को वह संदेह की निगाह से देखता. उसे हमेशा यही लगता कि हर किसी की निगाह उसकी संपत्ति पर है. गरीब, फटेहाल मजदूरों और कबाड़ियों पर दया करने के बजाय वह उनसे बुरी तरह चिढ़ता. पालतू कुत्तों को आदेश था कि ऐसे किसी भी आदमी को दरवाजे के सामने टिकने न दें.
एक दिन न जाने क्या हुआ कि पुलिस के दो जवान धड़धड़ाते हुए बंगले में घुसे और अमीर मालिक को हथकड़ी डालकर ले गए. बंगले पर मोटा सरकारी ताला डाल दिया गया. कुत्ता ‘बेरोजगार’ होकर सड़क पर आ गया. मगर पुराने मालिक ने जो सिखाया था उसका असर बना रहा. गरीब, लाचार, फटेहाल आदमी को संदेह की निगाह से देखना, देखते ही उसपर टूट पड़ना उसका स्वभाव बन गया. मानो वे उसके प्रतिद्विंद्वी हों.
उस दिन कुत्ता सवेरे-सवेरे भोजन की तलाश में गांव की गलियों में घूम रहा था. एक लड़की को कबाड़ के ढेर पर झुके देख उसका माथा ठनका. जवानी की दहलीज पर खड़ी वह लड़की कबाड़ से काम की चीजें छांट रही थी. पीठ पर लटके टाट के थैले की तनियां उसने अपने माथे पर फंसा रखीं थीं. कपड़े जगह-जगह से फटे थे. उनको सीं-गांठकर देह ढकने लायक बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन जगह-जगह लगी थेगड़ियां भी पुरानी होकर गल-फट चुकी थीं. मानो जवान शरीर को ढकने में नाकाम होने पर खुद शर्मिंदा हो रही हों. कुत्ता उसको देख भौंकने लगा. लड़की ने उसकी ओर ध्यान न देकर काम में लगी रही—
‘शायद मुहल्ले में नई-नई आई है. पर मेरी उपेक्षा करके यहां कोई भी टिक नहीं सकता.’ सोचते हुए कुत्ता लड़की के एकदम सामने आकर और जोर से भौंकने लगा. लड़की अपने काम में जुटी रही.
‘कहीं बहरी तो नहीं,’ कुत्ता लड़की के और करीब चला गया. इस बार लड़की ने उसकी ओर देखा. उसकी आंखों में करुणा थी. कुत्ते को इसमें अपनी विजय का एहसास हुआ. वह अपने दांत लड़की के शरीर के एकदम करीब ले गया. मानो काट ही खाने वाला हो. सहसा लड़की का आक्रोश भड़का. वह सीधी हुई. दोनों हाथ माथे की ओर ले जाकर थोड़ी-सी पीछे की ओर घूमी और झोला उतारकर कुत्ते के सामने पटक दिया. फिर अब तक जमा की गई एक-एक वस्तु को फेंकने लगी—
‘तेरे ऊपर मुहल्ले की चौकीदारी का भार है न! तो यह देख, देख…मैंने इस मुहल्ले से क्या-क्या चोरी किया है. यह देख रद्दी कागज, प्लास्टिक के टुकड़े, नेपकिन, लोहे की जंग लगी तार, डिब्बे, कांच की शीशियां, ढक्कन, गला हुआ गत्ता, फटी हुई टोकरी, टाट, पुराने-चिथड़े कपड़े. यह देख, इसका तो मैं नाम भी नहीं जानती, देख इन्हें, और ले जाकर अपने मालिकों को सौंप दे. वे तेरी पीठ थपथपाएंगे. अच्छा-अच्छा खाने को देंगे. नहीं रुक, पकड़ मुझे और अपने नुकीले दांतों से फाड़ डाल मेरी देह को.’ लड़की फट पड़ी और जोर-जोर से रोने लगी. सामने कबाड़ का थैला खुला पड़ा था. कुत्ते ने खुद को इतना लज्जित, इतना मर्माहत इससे पहले कभी महसूस नहीं किया था. ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “अपराधबोध

  1. स्वतंत्रा दिवस जी हार्दिक शुभकामनाएँ

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