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निर्मैल्य

गंगा स्नान के बाद साधु बाहर निकला तो कुत्ता उसके पीछे-पीछे चल दिया. दोनों काफी दूर निकल गए.
‘वे प्राणी भी कितने अभागे हैं, जो गंगा तट पर आकर बगैर नहाए रह जाते हैं.’ कुत्ते को सुनाते हुए साधु ने अपनी श्रेष्ठता का दंभ भरा. उसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई—
‘वे लोग और भी अभागे हैं, जो पाप धोने के लिए गंगा में उतरते हैं और बाहर निकलते ही दुबारा पाप में लिप्त हो जाते हैं.’
कुत्ते का उत्तर सुनकर साधु भड़क उठा—
‘क्षुद्र प्राणी, तू भला क्या जानेगा. मेरा तो रोम-रोम, बल्कि पूरा जीवन ही पवित्र है. इसमें पाप के लिए स्थान कहां! मेरी साधना के प्रताप से तो अन्य प्राणी भी मेरे संपर्क में आकर पापमुक्त हो जाते हैं.’
‘सिर से पांव तक कीचड़ में लिप्त रहने वाला केंचुआ भी यही समझता है.’
कुत्ते के कटाक्ष पर साधु आग-बबूला होकर चिमट से उसको मारने दौड़ा. कुत्ता हंस पड़ा— ‘अरे…रे, आप तो नाराज हो गए धर्माधिराज! मैंने तो बस यूं ही पूछ लिया था. आखिर जो निष्पाप और पवित्र हो वह हर पखवाड़े गंगा में पाप धोने क्यों जाएगा?’
इस बार साधु से रहा न गया. उसने चिमटा उठाया और कुत्ते का निशाना बांधकर दे मारा. कुत्ता चतुराई से झुक गया. चिमटा सामने से आ रहे फकीर के जा लगा. माथे से निकलती खून की धार को रोकने का प्रयास करता हुआ फकीर वहीं जमीन पर पसर गया.
‘मूर्ख, तेरी वजह से एक भले आदमी को चोट खानी पड़ी है.’ साधु गरजा. कुत्ता पहले ही खुद को अपराधी मान चुका था. उसकी गर्दन झुक गई—
‘मैं अपने अपराध के लिए दंड सहने को तैयार हूं.’ कहते हुए कुत्ते ने खुद को साधु और फकीर के आगे समर्पित कर दिया. फकीर उठकर कुत्ते के पास आया. उसकी पीठ पर हाथ फिराता, प्यार लुटाता हुआ बोला—
‘बेटा, तू निःकलुश और निष्पाप है. पापी तो वे हैं जो अपना अपराध दूसरों के सिर मंडकर भी ऎंठे फिरते हैं. गंगाजल की शीतलता जब इनका क्रोध ही ठंडा न कर सकी तो मन में छिपे मैल को कैसे धो सकती है. यही लोग धर्म और धाराओं को अपवित्र करते हैं.’
साधु की गर्दन लटक गई.
ओमप्रकाश कश्यप

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