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पाखंड

पार्क के करीब से गुजरता हुआ कुत्ता ठिठक गया. वहां बच्चे खेल रहे थे. अपने आप में मग्न, दुनिया-जहान की चिंताओं से दूर. सोने-सलोने. उन्हें देखकर कुत्ते को अपने पिल्लों की याद आने लगी. अब तो वे बड़े होकर स्वतंत्ररूप से अपना भोजन जुटा लेते है. मगर जब छोटे थे तो उन्हें साथ लेकर चलना पड़ता था. कभी बच्चों की मां उनके साथ होती. कभी वह खुद. एकाध दिन ऐसा भी होता जब वे दोनों ही पिल्लों के अगल-बगल होकर चलते. पिल्ले सड़क पर उछलते-कूदते, धमा-चौकड़ी मचाते, भांति-भांति की शरारत करते. कुत्ता-कुतिया उन्हें समझाते. शांत होकर मंजिल की ओर बढ़ने के लिए कहते. पिल्लों पर थोड़ी देर के लिए असर होता, फिर भूलकर अपने आनंद में डूब जाते. कुत्ते को कभी-कभी गुस्सा आता. लेकिन अच्छा भी बहुत लगता. स्वर्ग के बारे में उसने आदमी के मुंह से सुना था. अपने परिवार के साथ निर्द्वंद्व विचरते समय उसे लगता मानो स्वर्ग जमीन पर उतर आया हो.
‘बचपन कुदरत का सबसे हसीन तोहफा है.’ कुत्ते के मुंह ये सहसा निकला. उसी समय एक साधु वहां से गुजरा. पार्क में बच्चों को खेलते हुए देख उसका माथा सिकुड़ गया. कुत्ते को विचित्र-सा लगा.
‘क्या हुआ महाराज?’ उसने पूछा. साधु बच्चों की ओर देखते हुए कहने लगा—
‘कितने नादान हैं, जीवन के वास्तविक आनंद और सचाई से अनभिज्ञ. काश! ये जानते होते कि सच्चा सुख क्या है. जीवन तो कागज की पुड़िया है, एक न एक दिन इसे भवसागर में विलीन हो जाना है. जिस दिन ये इस असलियत को समझेंगे, पछताएंगे कि उन्होंने बचपन खेल-कूद में गंवा दिया. प्रभु-भक्ति पर ध्यान ही नहीं दिया…भक्त प्रहलाद, बालक ध्रुव…’
‘निश्चिंतता तो बचपन का प्रमुख लक्षण है. बालक ध्रुव और भक्त प्रहलाद भी तो खेलते-कूदते ही होंगे. इस उम्र में पूजा-पाठ के नाम पर वक्त गंवाना क्या प्रकृति-विरुद्ध आचरण नहीं है?’
कुत्ते का बात काटना साधु को पसंद न आया. हाथ में लगे दंड पर पकड़ बढ़ाते हुए वह गुर्राया—
‘चल हट, मुझे शिक्षा देता है, मुझे साधारण साधु मत समझ लेना…’
‘मैं, रोटी की तलाश में सुबह से शाम तक भटकने वाला अदना-सा प्राणी, भला आपको शिक्षा कैसे दे सकता हूं.’ कुत्ता विनम्र बना रहा. साधु कुछ शांत हुआ तो उसने उसको फिर टोक दिया—
‘महाराज, भक्त प्रहलाद, बालक ध्रुव की भांति आप तो बचपन में ही घर से निकल पड़े होंगे?’
‘कहां, मुझे जीवन का मर्म मुझे बहुत देर से समझ आया. पढ़ा-लिखा, बड़ा हुआ तो माता-पिता ने विवाह कर दिया. उसके बाद बच्चे हुए, बच्चों के विवाह आदि संस्कार किए. फिर बच्चों के भी बच्चे हुए. एक दिन जब मेरी पत्नी चल बसी तब मुझे समझ आया कि इस संसार में कुछ भी सत्य नहीं है, जीवन पानी का बुलबुला है. और मैं परमसत्य की खोज में घर से निकल पड़ा…’
‘इस समय कहां से पधार रहे हैं?’
‘आज इलाके की जमींदार वीरेश्वर प्रसाद के पोते का जन्मदिन है, इसी उपलक्ष्य में उन्होंने भोज के लिए निमंत्रण भिजवाया था. वाह, क्या भोज था. स्वर्ग का सुख भी उसके आगे फीका है, मेरी तो आत्मा तृप्त हो गई.’
‘आजकल ठिकाना कहां है?’
‘भगवान जगन्नारायण के मंदिर का नाम तो सुना ही होगा, बहुत भव्य मंदिर है. कई सौ बीघा जमीन उसके नाम पर है. दिन-भर भक्तों का तांता लगा रहता है. आजकल वहीं रहता हूं. मेरे गांव से बस कोस-भर की दूरी है. बेटे-पोते आते ही रहते हैं. जब मन हो, मैं भी उनसे मिलने चला जाता हूं.’
उसी समय बच्चे किसी बात पर शोर मचाने लगे तो साधु से न रहा गया, बोला—
‘देखो, कितने मूर्ख हैं, भ्रम को खुशी समझकर पगला रहे हैं.’ इस बार कुत्ते से रहा न गया. साधु को आड़े हाथ लेते हुए बोला—
‘महाराज, पगला तो आप गए हैं. आपने अपना भरपूर जीवन जिया. आज भी जुबान की चसक और वैभव ने आप का पीछा नहीं छोड़ा है. ढोंग और पाखंड के सिवाय आप कुछ जानते नहीं. फिर भी दूसरों के लिए उपदेश छांटते रहते हैं. काश, आप जीवन के असली मर्म को समझ पाते.’
बात का असर हुआ. साधु का दंड उसके हाथ से गिर पड़ा. गर्दन जमीन में समाने लगी. मगर उसकी हालत देखने के लिए कुत्ता वहां रुका नहीं…उसने एक भरपूर निगाह पार्क में खेलते हुए बच्चों पर डाली और अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ा.
ओमप्रकाश कश्यप

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