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अमृत-भोज

सूरज सिर पर उतर आया था. एक के बाद एक कई घरों में झांकने के बावजूद कुत्ते को निराश लौटना पड़ा था. उसे अपने जीवन से घृणा होने लगी. किंतु रोटी जीवन की सबसे बड़ी अनिवार्यता, उसकी चाहत में घर-घर जाना, दर-दर भटकना, लोगों की लात-बात, मार-दुत्कार सहना मजबूरी.
‘यदि इसी तरह कुछ देर और भटकता रहा तो मूर्छित होकर गिर जाऊंगा…आदमी में लाख बुराइयां सही. वह झूठ बोलता है, आपस में लड़ता-झगड़ता, स्वार्थ के लिए अपनों का गला भी काटता है, लेकिन भूखे के लिए भोजन, प्यासे के लिए पानी का इंतजाम भी खूब करता है…इसीलिए तो वह आदमी है.’ कुत्ता बड़बड़ाए जा रहा था.
‘श्रम-साध्य फल की मिठास मनभावन होती है.’ कुछ देर बाद एक घर से आती सुस्वादु भोजन की गंध को महसूस करते हुए कुत्ते ने खुद से कहा. दरवाजा खुला था. वह अंदर घुसता चला गया. आंगन के उस पार एक भारी-भरकम स्त्री भोजन कर रही थी. वह उससे सुरक्षित दूरी बनाकर खड़ा हो गया. तभी स्त्री को डकार आई. थाली में भोजन अब भी बाकी था. कुत्ते की उम्मीद जोर मारने लगी.
‘लगता है, घर में बिलकुल अकेली हो?’ आत्मीयता दर्शाने के लिए कुत्ते ने बात बढ़ाई.
‘क्यों लूटना चाहता है?’ फटे बांस-सी आवाज आई, ‘बूढ़ा भीतर लेटा है.’
‘तुम्हारे पति?’
‘कमाने निकला है, शाम तक गंवाकर लौट आएगा.’ आवाज में रूखापन था. उसी समय भीतर से खांसने की आवाज आई. स्त्री का चेहरा तमतमा गया. वह उठी और थाली में बचा भोजन कुत्ते के आगे लाकर उलट दिया.
‘दिन-भर चारपाई तोड़ेंगे, फिर भी शाम तक चार-चार बार भोजन चाहिए…राम जाने पेट है कि कुंआ….’ स्त्री गुस्से से बड़बड़ा रही थी. सामने पड़े भोजन को देख कुत्ते की भूख भड़क उठी. वह झुका. सहसा उसे लगा कि घर के भीतर कोई भूख से कराह रहा है. इस सोच से उसकी भूख मर गई. मुंह फेर, भारी कदमों से वह बाहर निकल आया.
‘भोजन का सम्मान करना जीवन की सबसे बड़ी नैतिकता है, मैंने भारी गलती की है.’ बाहर आकर कुत्ता पछताने लगा. मगर दुबारा भीतर जाने का उसका मन न हुआ. भूख के समाधान के लिए कुछ दरवाजे और झांकने के बाद वह एक घर के आगे रुका. बंद दरवाजे के सामने खड़े होते ही उसने भांप लिया कि भीतर कुंदी वगैरह नहीं है. भीतर जाना सुरक्षित होगा या नहीं. वह सोचने लगा. कई बार कुत्ते को भरमाने के लिए लोग दरवाजे के पीछे डंडा लेकर छिप जाते हैं. जैसे ही कुत्ता दिखे, वे उसकी पीठ पर जमकर प्रहार करते हैं, ताकि आगे उसकी उस घर की ओर झांकने तक की हिम्मत न पड़े. एक-दो बार वह खुद भी धोखा खा चुका था.
कुत्ता ऊहापोह से गुजर ही रहा था कि दरवाजा खुला, एक स्त्री बाहर निकली. उसके हाथों में कुछ रोटियां थीं. कुत्ते ने सूंघकर पूछा—‘क्या अभी तक ताजा भोजन नहीं बना?’
‘भोजन तो तैयार है, लेकिन परिवार की रीति के अनुसार उसपर सबसे पहला अधिकार मेरे सास-ससुर का है. उसके बाद बच्चे खाएंगे. बच्चों के बाद हम पति-पत्नी…जब तक बच्चों का पेट न भर जाए, तब तक मैं सिवाय अतिथि के किसी को नहीं खिला सकती.’ स्त्री की बातें कुत्ते को बहुत अच्छी लगीं.
‘तुम्हारे सास-ससुर बहुत विलंब से भोजन करते हैं?’ उसने डरते-डरते पूछा. मगर स्त्री विनम्र बनी रही, बोली—
‘अक्सर वे इस समय तक भोजन कर चुके होते हैं. मगर आज एक पड़ोसी के अचानक बीमार पड़ जाने पर वे यह कहकर उसका हाल-चाल लेने चले गए कि खाना लौटने के बाद ही खाएंगे.’
‘और बच्चे?’
‘वे भीतर अपने पिता के साथ पढ़ रहे हैं.’ कुत्ते को स्त्री की बातों में सचाई की महक उठती दिखाई दी. उसकी आत्मा तृप्त हो गईं. बासी रोटियां देखकर मन में जो अपमान कुछ पल पहले जगा था, वह तिरोहित होने लगा. वह उन्हें बड़े चाव से खाने लगा. जीवन में पहली बार उसको अमृत-भोज के स्वाद की अनुभूति हुई.
ओमप्रकाश कश्यप

3 comments on “अमृत-भोज

  1. अति सुन्दर। यह कहानी आपकी है या कोई लोक कथा है?

    • कहानी आपको अच्छी लगी मेरा परिश्रम सार्थक हुआ. मैंने इस प्रकार की कोई लोककथा नहीं सुनी. प्रतिक्रिया के लिए आभार….
      ओमप्रकाश कश्यप

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