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कवियित्री

कुत्ता कवियों और साहित्यकारों से बहुत प्रभावित था. हालांकि कविता उसके लिए दूर की कौड़ी थी. किंतु कवि की तान पर जब वह सैकड़ों व्यक्तियों को एक साथ अपनी गर्दन हिलाते देखता तो समझ जाता कि बहुत ऊंची बात कही गई है. उस दिन एक घर के सामने से गुजरते हुए कुत्ते को जब पता चला कि वहां एक कवियित्री रहती है, तो वह अपनी किस्मत पर इतराने लगा. उसके बाद तो उस घर के सामने से प्रतिदिन गुजरना कुत्ते का नैमत्तिक कर्म बन गया. फुर्सत मिले तो एक से ज्यादा चक्कर भी लगा लेता. जिस दिन उधर न जा पाता, उस रात वह ढंग से सो भी न पाता था. खाना-पीना भूल जाता. हर पल खोया-खोया-सा रहता.
कवियित्री से मिलने रोज कई-कई लोग आते. बड़ी-बड़ी बातें करते. कुत्ता मनुष्य को उसके चेहरे से पहचान लेता था. जाने क्यों कवियित्री के घर आने वाले लोग उसे नापसंद थे. मगर यह सोचकर कि वे कवियित्री से मिलने आते हैं, वह भी उनका सम्मान करती हैं, कुत्ता मेहमानों को देखते ही पूंछ हिलाने लगता था. उन्हीं के माध्यम से कुत्ते को मालूम हुआ कि उसके पास अकूत संपत्ति है. कवियित्री और उसके पति को मोटी सरकारी पेंशन मिलती है. चार बेटे हैं, चारों ही अमेरिका में लाखों डा॓लर कमाते हैं. कवियित्री को कविता के क्षेत्र में जस प्राप्त है, ये बातें कुत्ते को उसके मेहमानों से ही पता चली थीं. उन मेहमानों की बातें अजीब-सी होतीं. कवियित्री की उम्र का सम्मान करते हुए वे उन्हें ‘माताजी’ कहते. आते ही उसके कदमों में झुक जाते थे.
‘माताजी देश में कई-कई राष्ट्रकवि हैं, मगर राष्ट्र-कवियित्री एक भी नहीं, कैसी विडंबना है!’
‘इसलिए मैंने माताजी की देशप्रेम की सारी की सारी कविताएं एक साथ छापने का फैसला किया है. एक बार पुस्तक बाहर आ जाए, फिर देखता हूं, सरकार कैसे मना कर पाती है.’ दूसरा कहता.
‘मुझे तो इनकी कविताओं में मीरा और महादेवी की आहट सुनाई देती है. हमारी संस्था तो शताब्दी का मीरा पुरस्कार माताजी को देने का निर्णय भी कर चुकी है.’
‘ठीक है, आप तैयारी कीजिए. तब तक माताजी का अभिनंदन ग्रंथ भी छपकर आ जाएगा. उसका विमोचन भव्य समारोह में होगा.’ तीसरा व्यक्ति बहती गंगा में हाथ धोने का प्रयास करता. उनकी बातों पर विश्वास करते हुए कवियित्री खजाना खोल देती. चाटुकारों की तसल्ली करने के बावजूद इसके कवियित्री का अकूत खजाना वैसा ही बना रहा. उतनी ही बनी रहती उसके पास आने वालों की संख्या.
एक दिन कुत्ता अपने ठिकाने पर पहुंचा तो उसका मूड उखड़ा हुआ था. परेशान देख कुतिया उसके पास सिमटकर बैठ गई, बोली— ‘तुममें यही तो कमी है, जरा-सी बात भी दिल से लगा लेते हो…’
‘क्यों क्या हुआ?’ कुत्ते ने प्रतिप्रश्न किया.
‘मुंह तुम्हारा लटका हुआ है और पूछते मुझसे हो, लगता है आज ‘माताजी’ के दर्शन नहीं हुए?’
‘चुप, नाम मत ले उसका!’ कुत्ता भौंका, आवाज साफ नहीं थी, मगर आशय यही था. कुतिया चुप रही. जानती थी कि थोड़ी देर बाद खुद ही खुल जाएगा. बात तो वह पचा ही नहीं सकता. कुछ देर बाद कुत्ते ने सचमुच कहना आरंभ कर दिया—
‘झूठी, लालची, छली, संवेदना का नाटक करने वाली…’ कुत्ता बड़बड़ाने लगा—‘चारों बेटों को पैसा कमाने के लिए अमेरिका भेज दिया. सबसे छोटा तो जाना भी नहीं चाहता था. तब बुढ़िया ने यह कहकर कि इस देश में क्या रखा है, उसे भी अमेरिका में बसने को मजबूर दिया. पिता की मौत हुई तो एक भी बेटा घर नहीं. सबको फोन पर सूचना दे दी गई थी. मगर बेटे पिता की चिता को आग लगाएं या डा॓लर कमाएं. एक-एक कर चारों ने काम-धंधा छोड़कर आने से मना कर दिया. बुढ़िया ने सारे रिश्ते भी अमेरिका से ही किए थे, ताकि बहुएं भी कमाऊ मिलें. जो रिश्तेदार देश में हैं, उनसे बुढ़िया का कोई संबंध नहीं. चार-चार बेटों के रहते चिता को आग लगाने के लिए दूसरों का मुंह देखना पड़ा.’
‘यह बात तो तुम कई दिन पहले बता चुके हो.’
‘‘आज बूढ़े की तेरहवीं थीं. चारों बेटे इस बार भी नहीं आ सके. क्यों नहीं आ सके, यह सब छोड़कर बुढ़िया अपना ही गुणगान कर रही थी—‘पूरे छह महीने वे बिस्तर पर रहे. मुझसे तो हिला-डुला तक नहीं जाता. इसलिए पंद्रह हजार रुपये महीना की पगार पर ‘केयरटेकर’ रखा था. दवा-देखभाल सब वही करता था. डाक्टर का खर्च ऊपर से. न…न! रुपये-पैसे की कोई बात नहीं है. पर उनका दुःख मुझसे सहा नहीं जा रहा था. इसलिए उनकी मौत से एक ही दिन पहले मैंने भगवान से प्रार्थना की थी कि हे प्रभु, अब तो उठा ही लो, भगवान ने तुरंत मेरी सुन ली.’
‘मैं तो पहले ही कहता था, आप जैसी कवियित्री की संवेदना ही ईश्वर को पिघला सकती है.’ चाटुकार चेहरे कवियित्री के इर्द-गिर्द जमा होने लगे थे.
‘आप आधुनिक युग की मीरा-महादेवी हैं.’ इसी बीच किसी ने सवाल कर दिया—‘आपने अपने अच्छे-खासे पढ़े-लिखे चारों बेटे अमेरिका भेज दिए…इस देश में रहकर वे यहां के लोगों की सेवा करते…बाहर रहकर डा॓लर जमा करने में कैसी देश-भक्ति!’
‘देश-भक्ति कैसे नहीं है जी.’ माताजी के चाटुकार उससे भिड़ गए— ‘अमेरिका में रहकर इनके चारों बेटे देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा कमाने में लगे हैं. आपको मालूम है इस देश को डा॓लरों की कितनी जरूरत है! बिना डा॓लर के सरकार की सारी की सारी विकास योजनाएं धरी की धरी रह जाएं…इस बुढ़ापे में काया-कष्ट सहकर भी भी माताजी ने अपने चारों बेटों को अमेरिका में छोड़ रखा है, ताकि वे देश के लिए अधिक से अधिक डा॓लर जुटा सकें. यह क्या कम है!’
‘इससे आगे मैं कुछ सुन न सका…चुपचाप वहां से चला गया. जानता हूं कि मेरे आते ही बुढ़िया ने फिर अपने खजाने का मुंह खोल दिया होगा…’’
‘जाने दो जी, आदमी के रंग ही निराले हैं, तुम अपना जी मत खराब करो, आओ, आराम करते हैं.’ कहकर कुतिया कुत्ते से सट गई.
ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “कवियित्री

  1. सही निशाना के साथ मजेदार पोस्ट। बधाई।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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