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सड़कछाप

सड़कछाप कुत्ते की जिंदगी भी क्या जिंदगी है. रोटी के मामूली टुकड़े के लिए यहां से वहां भटकना. हर समय लोगों की लात और लानतें सहना. जरा-सी लापरवाही से यदि किसी वाहन से टक्कर हो जाए तो देह चील-कव्वों के लिए वहीं बिखर जाती है…लेकिन कुछ भी हो, इस खानाबदोश जिंदगी में चाहे जितने धक्के, लात और लानतें सही, आजादी भी खूब है. उस आजादी के लिए बेजान देह की कुछ घंटों तक बेकद्री का मोल ही क्या!’ सड़क किनारे से गुजरता हुआ कुत्ता सोचते-सोचते वीतरागी-सा बन गया. अचानक उसकी निगाह सड़क के दूसरे छोर पर पड़ी कुत्ते की लाश पर पड़ी. वाहन से कुचली…क्षत-विक्षत. कुत्ते का मन खिन्न हो गया. सारा वीतराग धरा का धरा रह गया. कुछ पल पहले तक मृत्यु-भय को मन से बाहर निकाल फेंकने, मान-अपमान से दूर हो जाने का जो ख़याल उसके दिमाग में पैठा था, वह एकाएक गायब हो गया.
चढ़ते दिन का समय था. उस समय लोग नाश्ते-भोजन के इंतजाम में लगे होते हैं. दो-चार घरों में जाने से ही पेट भर जाता था. मगर उसकी तो भूख ही मर चुकी थी. उदास कुत्ते ने बस्ती से बाहर का रास्ता पकड़ लिया. अनमना, अवसाद-ग्रस्त-सा वह बढ़ता गया, बढ़ता ही गया. सूरज सिर पर आया. शाम हुई. चलते-चलते बस्ती खत्म हुई. जंगल आ गया. एक भग्न मंदिर के चबूतरे पर वह आराम करने के लिए लेट गया. शरीर थकान से भारी था. लेटते ही झपकी आ गई. मगर कुछ देर बाद ही एक तीव्र दीप्ति से कुत्ते की नींद उचट गई. आंखें खोलकर देखा. दो भव्य आकृतियां उसके सामने थीं.
‘मैं ईश्वर हूं. और ये मेरी पत्नी. आज इनका जन्म-दिन है. इसलिए मैं अपने किसी भक्त का कल्याण करना चाहता हूं. तुम मनचाहा वरदान मांग सकते हो.’ कुत्ते के जी में आया कि कह दे, मैं तो ईश्वर-भक्त नहीं. फिर मन हुआ हुआ कि दिन में जिस कुत्ते को क्षत-विक्षत अवस्था में सड़क पर देखकर आया है, उसके लिए स्वस्थ पुनर्जीवन मांग ले. ईश्वर हैं तो उनके लिए क्या मुश्किल! लेकिन हिचक गया. यह सोचकर कि आज यदि जी सका जो एक न एक दिन उसे फिर मरना पड़ेगा. इसके बाद जितने दिन जिएगा, उतने दिन वह दुर्घटना उसके दिलो-दिमाग पर भूत बनकर सवार रहेगी. फिर अगली मौत न जाने कैसी हो. अगर वह इससे भी त्रासद हुई तो और भी बुरा होगा.’
‘क्या सोचने लगे?’ ईश्वर ने प्रश्न किया.
‘जाने दें प्रभु, वैसे भी मैं आपका भक्त नहीं हूं.’
‘न सही, जब ये कहते हैं तो वरदान मांग क्यों नहीं लेते, इसके लिए तो इंसान तक तरसते हैं. बरसों तक तपस्या करते हैं और तुम हो कि हाथ आए अवसर को ठुकरा रहे हो.’ इस बार ईश्वर-पत्नी ने दखल दिया.
‘मैं तो अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हूं…’ कुत्ते ने जोड़ा.
‘तुम मर्त्य-जीवन की बात कर रहे हो, वह जो एक दिन नष्ट हो जाने वाला है. चाहो तो इनसे कभी समाप्त न होने वाली अमरता और स्वर्ग का सुख मांग सकते हो.’ ईश्वर-पत्नी ने सुझाया.
‘क्या इससे पहले भी आपने किसी को यह वरदान दिया है?’ ‘क्यों नहीं, ये जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे अक्सर यही वरदान देते हैं, वे सभी प्राणी स्वर्ग में सुखपूर्वक दिन बिताते हैं.’ ईश्वर-पत्नी अपने पति की प्रशंसा में मिटी जा रही थी.
‘जिन्हें आपने स्वर्ग में रहने का वरदान दिया है, क्या बाद में आप कभी उनसे मिले हैं?’ कुत्ते ने अप्रत्याशित प्रश्न किया.
‘मिलने की जरूरत ही क्या है? स्वर्ग में उन्हें भला कौन-सा कष्ट हो सकता है!’ ईश्वर बोले.
‘आप वहां जाते नहीं, स्वर्ग में जाने के बाद वहां के प्राणी आपसे कभी मिलते नहीं, तब आप यह दावा कैसे कर सकते हैं कि वहां रहने वाले सभी सुखी हैं?’
‘मर्त्य-लोक में जरा है, मृत्यु है, सुख-दुःख, भाव-अभाव, हर्ष-शोक और विषाद हैं. इन्हीं से मुक्ति के लिए तो मनुष्य स्वर्ग की कामना करता है. पूजा-पाठ, धर्म-साधना, दान-दक्षिणा के द्वारा वहां तक पहुंचता भी है.’ ईश्वर-पत्नी ने बताया.
‘क्या बिना पूजा-पाठ, धर्म-साधना, दान-दक्षिणा के स्वर्ग की प्राप्ति असंभव है?’
‘बिलकुल बिना इनके भला कोई स्वर्ग कैसे जा सकता है.’
‘यानी प्राणी पहले तो पूजा-पाठ, धर्म-साधना, दान-दक्षिणा में लंबा निवेश करे, फिर स्वर्ग तक जाए और वहां जाने के बाद भी तुम देखो तक नहीं कि वह वहां पर खुश है या नहीं?’
‘स्वर्ग में भला कौन-सा कष्ट हो सकता है. वहां सब कुछ बैठे-बैठाए मिल जाता है.’
‘यदि वहां कोई अभाव नहीं है तो आप इस समय धरती पर किसलिए आए हैं? पत्नी का जन्मदिन क्यों मनाना चाहते है? स्वर्ग में यदि सभी सुखी हैं तो आप वहां स्वयं क्यों नहीं रम जाते? आपको कौन-सी कमी है, जो जन्म-दिन मनाने के लिए यहां तक चलकर आना पड़ा. शासन तो आप स्वर्ग से भी कर सकते हैं. आप यह क्यों चाहते हैं कि भक्तगण रात-दिन आप ही का नाम रटते रहें. यदि वे चूकें तो आप दंड का डर भी दिखाने लगते हैं. ईश्वर होकर आदमी के माध्यम से अमरता की लालसा किसलिए?’ कुत्ते ने एक के बाद एक सवाल दागे. ईश्वर और ईश्वर-पत्नी दोनों निरुत्तर हो गए. उन्हें चुप देख कुत्ते का रहा-सहा संकोच भी जाता रहा. बोला—
‘कुछ दिन पहले तक मेरा भी परिवार था. बच्चे अब बड़े होकर भोजन का स्वयं इंतजाम करते हैं. हमारी मुलकात महीने में कभी-कभार ही हो पाती है. सभी खुश हैं. लेकिन मैं उन्हें एक पल के लिए भूल नहीं पाता. अपने अनुभव से ही मैं समझ पाया हूं कि मोह-माया-ममता-प्राणी की छोटी-छोटी इच्छा-आकांक्षाएं ही उसके लिए वरदान हैं. इनसे भागकर सुख की कामना निकम्मे और परजीवी लोग ही करते है. उनके अलावा वे पाखंडी भी करते हैं, जो दूसरे को भ्रम में रखकर, उनके हिस्से की सुख-सुविधाएं और खुशियां स्वयं बटोर लेना चाहते हैं. इसलिए प्रभो, अपना यह वरदान, बैठे-ठाले खाने का यह उपदेश किसी और को ही देना.’
ईश्वर और ईश्वर पत्नी अपना-सा मुंह लेकर आगे बढ़ने लगे. उनके कुछ दूर जाते ही कुत्ते ने टोका—
‘सुनिए.’
ईश्वर और ईश्वर पत्नी रुके, मुड़कर पीछे देखने लगे.
‘हैप्पी वेडिंग ऐनवर्सरी…शादी की सालगिरह की बहुत-बहुत बधाई.’ कुत्ते ने कहा. ईश्वर और ईश्वर-पत्नी के चेहरे मुस्कान से खिल उठे.
ओमप्रकाश कश्यप

One comment on “सड़कछाप

  1. टेढ़े मेढ़े प्रश्न से ईश्वर मन अवसाद।
    बहुत तरीके से किया कुत्ता ने संवाद।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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