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नकली ईश्वर

कुत्ता मंदिर के आगे से गुजर रहा था कि भीतर से आवाज सुनाई पड़ी. कुत्ते ने चौंककर गर्दन घुमाई. मंदिर के दरवाजे पर खड़े ईश्वर उसे बुला रहे थे. वह खिंचता चला गया.

सुनो, भीतर भोग में आए लड्डू, पेढ़ा, मेवा, मिष्ठान, खीरपूरी, फल वगैरह रखे हैं, तुम उनमें से जितना चाहे खा सकते हो, चाहो तो घर भी ले जा सकते हो.’

अचानक इतनी उदारता किसलिए भगवन्! आज से पहले तो आप अकेले ही भोग लगाते रहे हैं, तब तो गर्दन उठाकर देखते तक नहीं थे.’

सच तो यह है कि मैं इन्हें खातेखाते ऊब चुका हूं. जो भी आता है, मुंह में कुछ न कुछ ठूंस कर ही जाता है. बिना यह जाने कि मुझे भूख है या नहीं, मन नमकीन खाने का है या मीठा? मानो स्वाद की पहचान किए बगैर सुबह से शाम खाते रहना मेरे जीवन का उद्देश्य हो.’

यह क्यों नहीं कहते कि सुश्रुत महाराज ने मधुमेह का डर दिखा दिया है. इसलिए मीठे से बचना चाहते हैं!’ कुत्ता हंसकर बोला.

इस उम्र में सावधानी बरतने में ही समझदारी है. फिर सुबह से शाम तक खाता रहूंगा तो काम कब करूंगा. मैंने द्वापर में वचन दिया था कि पृथ्वी पर जबजब संकट आएगा, मैं जन्म लेकर उद्धार करूंगा. मगर यहां तो सारा दिन खानेभोग स्वीकारने में ही निकल जाता है.’

जमाना बदल चुका है भगवन्! आप चाहेंगे तो भी अब आपको कोई काम नहीं करने देगा.’

तुम ऐसा किस आधार पर कह सकते हों?’

आधार है भगवन! आपके पीछे परजीवी समाज की पूरी शृंखला है, जो शताब्दियों से दूसरे के श्रम पर जीती आई है. आप काम करेंगे तो पुजारी को भी करना पडे़गा. पुजारी काम करेगा तो उसके उन परिजनों और चेलेचपाटों को भी मेहनत के लिए आगे आना पड़ेगा, जो बैठेठाले खाने के अभ्यस्त हो चुके हैं. आप चाहें भी तो उससे काम नहीं करवा सकते. मंदिर से बाहर निकलते ही वही आपके सबसे बड़े दुश्मन होंगे.’ कुत्ते ने समझाया. बात ईश्वर को लग गई. यह सोचकर कि मंदिर छोड़ने से पहले पुजारी को बता देना उचित होगा, वे उससे मिलने के लिए चल दिए. पुजारी ने सुना तो वह ईश्वर पर बिगड़ पड़ा

ऐसे कैसे जा सकते हैं आप, मंदिर सिर्फ आपकी जागीर तो नहीं. फिर आप जहां सुबह से शाम तक पालथी मारे बैठे रहते हैं, उस मंदिर को बनवाने में भक्तों ने हजारों रुपये खर्च किए हैं. सैकड़ों श्रद्धालु सुबह से शाम तक यहां आते हैं, उन सबके विश्वास का मामला है.’

उन सबके विश्वास के लिए ही तो मेरा पृथ्वी पर जन्म लेना जरूरी है?’ ईश्वर ने कहा.

कल्याण करने के लिए आपको मृत्युलोक में जाने की जरूरत नहीं है, आपमें सामर्थ्य तो यहां बैठेबैठे भी कल्याण कर सकते हैं.’ इससे पहले किसी ने ईश्वर के सामर्थ्य को चुनौती नहीं दी थी. ईश्वर को बुरा लगा. पुजारी की बात माने बिना ही उन्होंने मृत्युलोक के लिए प्रस्थान कर दिया. ईश्वर के जाते ही पुजारी की पत्नी और बच्चे बाहर निकल आए. उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं.

अब क्या होगा?’ पुजारी की पत्नी ने पूछा.

होगा क्या, भक्तों के लिए तो ईश्वर वह है जो मैं बताता हूं. जाने दो, अभी दिमाग में गर्मी है, दोचार दिन कड़ी धूप में तपेंगे तो अवतार लेने का सारा उत्साह फीका पड़ जाएगा.’

मगर तब तक?’

बाजार में मूर्तियों की कोई कमी है, असली से भी बढ़कर दिखती हैं. भक्त तो पत्थर को ही देवता मानते आए हैं.’

 अगले दिन मंदिर में नई मूर्ति लगी हुई थी. भक्त दुगुने जोश के साथ पूजा के लिए आ रहे थे. उधर मंदिर से निकलते ही ईश्वर बड़बड़ाने लगे थे—‘पहले भी आदमी ही दुनिया चलाता था. आज भी वही चला रहा है. मैंने व्यर्थ ही मंदिर छोड़ा.’ कुछ दिन मृत्युलोक में भटकने के पश्चात ईश्वर मंदिर पहुंचे तो नकली मूर्ति उनके आसान पर जम चुकी थी. ईश्वर के लिए अब वहां कोई ठिकाना न था. आज हालत यह है कि असली ईश्वर ठिकाने की तलाश में दरदर भटक रहे हैं और मंदिरों में नकली ईश्वरों की भरमार है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

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2 comments on “नकली ईश्वर

  1. प्रभु,
    गजब कर रहे हैं आप…

    परजीवी वाला गद्यांश तो बेहतरीन….

  2. Sir,

    Neeche walaa ansh hata den to jyada achha ho..bura na maaniyega..

    ईश्वर के लिए अब वहां कोई ठिकाना न था. आज हालत यह है कि असली ईश्वर ठिकाने की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं और मंदिरों में नकली ईश्वरों की भरमार है.

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